Thursday, September 11, 2008

रहीम के दोहे:परमार्थ करने वाले भेद नहीं करते

रहिमन पर उपकार के, करत न यारी बीच
मांस दियो शिवि भूप ने, दीन्हो हाड़ दधीच

कविवर रहीम कहते हैं कि जिस मनुष्य का परोपकार करना है वह जरा भी नहीं हिचकता। वह परोपकार करते हुए यारी दोस्ती का विचार नहीं करते। राजा शिवि ने ने प्रसन्न मुद्रा में अपने शरीर का मांस काट कर दिया तो महर्षि दधीचि ने अपने शरीर की हड्डियां दान में दीं।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-विश्व का हर बड़ा आदमी परोपकार करने का दावा करता है पर फिर भी किसी का कार्य सिद्ध नहीं होता। अभिनेता, कलाकार, संत, साहुकार तथा अन्य प्रसिद्ध लोग अनेक तरह के परोपकार के दावों के विज्ञापन करते हैं पर उनका अर्थ केवल आत्मप्रचार करना होता है। आजकल गरीबों, अपंगों,बच्चों,बीमारों और वृद्धों की सेवा करने का नारा सभी जगह सुनाई देता है और इसके लिये चंदा एकत्रित करने वाली ढेर सारी संस्थायें बन गयी हैं पर उनके पदाधिकारी अपने कर्मों के कारण संदेह के घेरे में रहते हैं। टीवी चैनल वाले अनेक कार्यक्रम कथित कल्याण के लिये करते हैं और अखबार भी तमाम तरह के विज्ञापन छापते हैं पर जमीन की सच्चाई यह है कि जो परोपकार भी एक तरह से व्यापार हो गया है और इसके माध्यम से प्रचार और आय अर्जित करने की योजनाओं को पूरा किण जाता है।

जिन लोगों को परोपकार करना है वह किसी की परवाह नहीं करते। न तो वह प्रचार करते हैं और न ही इसमें अपने पराये का भेद करते हैं। उनके लिये परोपकार करना एक नशे की तरह होता है। सच तो यह है कि यह मानव जाति अगर आज भी चैन की सांस ले रही है तो वह ऐसे लोगों की वजह से ले रही हैं. ऐसे लोग न केवल बेसहारा की मदद करते हैं बल्कि पर्यावरण और शिक्षा के लिये भी निरंतर प्रयत्नशील होते हैं। वरना तो जिनके पास पद, पैसे और प्रतिष्ठा की शक्ति है वह इस धरती पर मौजूद समस्त साधनों का दोहन करते हैं पर परोपकारी लोग निष्काम भाव से उन्हीं संसाधनों में श्रीवृद्धि करते है। जिनको परोपकार करने का संकल्प लेना है उन्हें यह तय कर लेना चाहिए कि वह प्रचार और पाखंड से दूर रहेंगे।
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Wednesday, September 10, 2008

रहीम के दोहेः मांगने वाला कभी बड़ा आदमी नहीं बन सकता

रहिमन चाक कुम्हार को, मांगे दिया ना देह
छेद में डंडा डारि कै, चहै नांद लै लेइ


कविवर रहीम कह्ते हैं कि कुम्हार का चाक याचना करने से दीपक नहीं बंना देता। चाक में छेद में डंडा डालकर घुमाने से दीपक तो क्या पूरी नांद (मिट्टी का बडा पात्र) का पात्र बना जाता है।
भावार्थ- आजकल सहजता से कोई काम नही होता। कई बार ऐसे अवसर आते हैं जब हमें कठोर होना पड्ता। हालांकि ऐसा हमेशा नहीं होता और कई बार सह्जता से काम भी होते हैं, पर कुछ लोगों का यह स्वभाव होता है कि वह कठोर होने पर ही आपकी बात
मानते हैं।

रहिमन खोटी आदि की, सो परिनाम लखाय
जैसे दीपक तम भखै, कज्जल वमन कराय


कविवर रहीम कहते हैं कि बुराई होने पर उसका फ़ल अवश्य दिखाई देता है। जैसे दीपक अंधकार को दूर कर देता है, परंतु शीघ्र ही कालिमा उगलने लगता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अक्सर लोग सोचते हैं कि दूसरे से वस्तुऐं मांग कर अपना काम चलायें। ऐसे लोगों में आत्म सम्मान नहीं होता और जिनमें आत्म सम्मान नहीं है वह मनुष्य नहीं बल्कि पशु समान होता है। अक्सर ऐसे लोग हैं जो अपने काम के लिये वस्तु या धन मांगने में संकोच नहीं करते। उनके पास अपना पैसा होता है पर वह उसको बचाने के चक्कर में दूसरे से वस्तुऐं उधार मांग कर काम चलाते हैं। उद्देश्य यही रहता है कि पैसा बचे। ऐसे कंजूस लोग जिंदगी भर पैसा बचाते हैं पर अंततः वह साथ कुछ भी नहीं ले जाते। कोई आदमी कितना भी बड़ा क्यों न हो जब किसी से कोई चीज मांगता है तो वह छोटा हो जाता है और अगर छोटा हो तो उसे भिखारी समझा जाता है। सच बात तो यह है कि मांगने से कोई बड़ा आदमी नहीं बनता बल्कि दान देने से समाज में सम्मान मिलता है।
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Tuesday, September 9, 2008

विदुर नीतिः विद्वानों के प्रति आक्रोश प्रकट नहीं करना चाहिए

1.पांच विषयों की तरफ आकर्षित होने वाली अपनी पांच इंद्रियों को जो वश में नहीं करता तो वह उसकी शत्रु हो जाती हैं और मनुष्य चारों तरफ से संकट में घिर जाता है।
2.गुणों में दोष न देखना, हृदय में सहज भाव, आचरण में पवित्रता, संतोष, मधुर वाणी, आत्म निंयत्रण, सत्य बोलना, तथा विचारों में स्थिरता ये कभी भी मूर्ख और दुरात्मा व्यक्ति में नहीं होते।
3.आत्मज्ञान, खिन्नता का अभाव, सहनशीलता, धर्मपरायणता, अपने वचन का निर्वाह तथा दान करने जैसे गुर्ण अधम पुरुष में नहीं होते।
4. विद्वानों के लिये अभद्र शब्द प्रयोग करते हुए उनकी अज्ञानी लोग निंदा करते हैं। विद्वान लोगों से अभद्र और आक्रोशित व्यवहार करने वाला मनुष्य पाप का भागी होता है और क्षमा करने वाला व्यक्ति पाप से मुक्त हो जाता है।
5.दुष्ट लोगों को त्याग न कर उनके साथ होने पर निरपराध होने पर भी सज्जन को दंड भोगना पड़ता है, जैसे सूखी लकड़ी में मिल जाने पर गीली लकड़ी भी जल जाती है। इसलिये दुष्ट लोगों की संगत कभी नहीं करना चाहिए।

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Monday, September 8, 2008

भृतहरि शतक: मित्र के गुप्त रहस्य प्रकट न करें

पापान्निवारयति योजयते हिताय
गुह्मं निगूहति गुणान्प्रकटीकरोति।
आपद्गतं च न जहाति ददाति काले
सन्मित्रलक्षणमिदं प्रवदन्ति सन्तः


हिन्दी में भावार्थ- अपने मित्र को अधर्म और पाप से बचाना, उसके हित में संलग्न रहते हुए उसके गुप्त रहस्य किसी अन्य व्यक्ति के सामने प्रकट न करना, विपत्ति काल में भी उसके साथ रहना और आवश्यकता पड़े तो उसकी तन, मन और धन से सहायता करना यही मित्रता का लक्षण है।

संक्षिप्त व्याख्या-अक्सर हम लोग कहते है कि अमुक हमारा मित्र है और यह दावा करते हैं कि समय आने पर वह हमारे काम आयेगा। आजकल यह दावा करना मिथ्या है। देखा जाये तो लोग अपने मित्रों पर इसी विश्वास के कारण संकट में आते हैं। सभी परिचित लोगों को मित्र मानने की प्रवृत्ति संकट का कारण बनती है। कई बार हम लोग अपने गुप्त रहस्य किसी को बिना जांचे-परखे मित्र मानकर बता देते हैं बाद में पता लगता है कि उसका वह रहस्य हजम नहीं हुए और सभी को बताता फिर रहा है। वर्तमान में युवा वर्ग को अपने मित्र ही अधिक भ्रम और अपराध के रास्ते पर ले जाते हैं।

आजकल सच्चे और खरे मित्र मिलना कठिन है इसलिये सोच समझकर ही लोगों को अपना मित्र मानना चाहिए। वैसे कहना तो पड़ता ही है कि‘अमुक हमारा मित्र है’ पर वह उस मित्रता की कसौटी पर वह खरा उतरता है कि नहीं यह भी देख लेना चाहिए। भले जुबान से कहते रहे पर अपने मन में किसी को मित्र मान लेने की बात बिना परखे नहीं धारण करना चाहिए।
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Sunday, September 7, 2008

संत कबीर वाणी:शिक्षित होकर भी पिंजरे में बंद रहने से क्या लाभ

पढ़ते गुनते जनम गया, आसा लागी हेत
बोया बीजहिं कुमतिन, गया जू निर्मल खेत


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि पढ़ते-लिखते जीवन व्यर्थ चला गया और हमेशा ही इच्छाओं और आशाओं के दास बने रहे। अपने अंदर कुमति का बीज बोया और इससे जीवन का पूरा खेत ही नष्ट हो गया।

चतुराई पोपट पढ़ी, पडि़ सो पिंजर मांहि
फिर परमोधे और को, आपन समुझै नांहि


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि तोते तो दुनियां भर की चतुराई सीख लेता है पर उससे क्या फायदा जो पिंजरे में ही पड़ा रहता है। वह दूसरों को तो उपदेश देता है पर स्वयं कुछ नहीं समझता।

संक्षिप्त संपादकीय व्याख्या-लोग पढ़लिख कर अपने को ज्ञानी समझते हैं पर वह भक्ति और जीवन के ज्ञान से परे होते हैं। वह किताबों से पढ़े हुए ज्ञान का प्रचार करते हुए लोगों को मोह माया से दूर रहने का उपदेश देते हैं पर वह स्वयं जीवन के बंधनों में पड़े हुए हैं। तनाव जीवन में अनेक बीमारियों का कारण है आधुनिक शिक्षा प्राप्त करने वाले सभी लोग जानते हैं पर भला कोई उससे मुक्त हो पाया। यह जीवन माया है और चिंता करने का कोई कारण नहीं है पर क्या लोग उसे छोड़ पाते हैं। जिन्होंने आधुनिक शिक्षा प्राप्त की है वह और अधिक दिखावे के मोह में स्वयं को फंसा देते हैं। वह कहते हैं कि हम आधुनिक हैं पर उनका आचरण फिर भी पुरानी रुढि़यों और कुप्रथाओं से स्वतंत्र नहीं दिखता। भारत में दहेज प्रथा इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। जितना अधिक शिक्षित दूल्हा उतना ही अधिक दहेज मांग जाता है। देश में इतनी शिक्षा बढ़ गयी है पर फिर भी पुरानी कुप्रथाओं और रूढि़यों को लोग छोड़ने के लिये तैयार नहीं हैं। ऐसे मेंे लगता है कि इस शिक्षा का कोई लाभ नहीं है। कबीरदास जी सहित अनेक अपढ़ संतों ने अपने तपस्या से जो ज्ञान अर्जित किया और उसे सारे संसार को दिया। उन्होंने ऐसी कुरीतियों और कुप्रथाओं के साथ भक्ति के नाम पर ढोंग का जमकर विरोध किया पर आधुनिक शिक्षा में उनके संदेशों को पढ़कर बड़ी बड़ी उपाधियां लेने वाले फिर भी अपने अंदर सुधार नहीं लाते।
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Saturday, September 6, 2008

भृतहरि शतकः विद्वानों की सभा में मिलता है अपनी अज्ञानता का प्रमाण

वरं पर्वतदुर्गेषु भ्रान्तं वनचरैः सह
न मूर्खजनसम्पर्कः सुरेन्द्रभवनेष्वपि

हिंदी में अर्थ- बियावान जंगल और पर्वतों के बीच खूंखार जानवरों के साथ रहना अच्छा है किंतु अगर मूर्ख के साथ इंद्र की सभा में भी बैठने का अवसर मिले तो भी उसे स्वीकार नहीं करना चाहिए।
यदा किंचिज्ज्ञोऽहं द्विप इव मदान्धः समभवम्
तदा सर्वज्ञोऽस्मीत्यभवदवलिपतं मम मनः
यदा किञ्चित्किाञ्चिद् बुधजनसकाशादवगतम्
तदा मूर्खोऽस्मीति जवन इव मदो में व्यपगतः

हिंदी में अर्थ-जब मुझे कुछ ज्ञान हुआ तो मैं हाथी की तरह मदांध होकर उस पर गर्व करने लगा और अपने को विद्वान समझने लगा पर जब विद्वानों की संगत में बैठा और यथार्थ का ज्ञान हुआ तो वह अहंकार ज्वर की तरह उतर गया तब अनुभव हुआ कि मेरे समान तो कोई मूर्ख ही नहीं है।
संपादकीय व्याख्या-आदमी को अपने ज्ञान का अहंकार बहुत होता है पर जब वह आत्म मंथन करता है तब उसे पता लगता है कि वह तो अभी संपूर्ण ज्ञान से बहुत परे है। कई विषयों पर हमारे पास काम चलाऊ ज्ञान होता है और यह सोचकर इतराते हैं कि हम तो श्रेष्ठ हैं पर यह भ्रम तब टूट जाता है जब अपने से बड़ा ज्ञानी मिल जाता है। अपनी अज्ञानता के वश ही हम ऐसे अल्पज्ञानी या अज्ञानी लोगों की संगत करते हैं जिनके बारे में यह भ्रम हो जाता है वह सिद्ध हैं। ऐसे लोगों की संगत का परिणाम कभी दुखदाई भी होता है। क्योंकि वह अपने अज्ञान या अल्पज्ञान से हमें अपने मार्ग से भटका भी सकते हैं
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Friday, September 5, 2008

रहीम के दोहे: समय कभी एक जैसा नहीं रहता

समय लाभ सम लाभ नहिं, समय चूक सम चूक
चतुरन चित रहिमन लगी, समय चूक की हूक

कविवर रहीम कहते हैं कि समय ही लाभ है तथा समय ही हानि भी है। चतुर लोग समय का लाभ उठा लेते हैं और अगर चूक जाते हैं तो उनके मन में त्रास हमेशा ही बना रहता है।

समय पाय फल होत है, समय पाय झरि जात
सदा रहै नहीं एक सी, का रहीम पछतात


कविवर रहीम कहते हैं कि समय के अनुसार अपने निश्चित समय पर ही पेड़ पर फल लगता है और समय के अनुसार ही झड़ जाता है। समय कभी एक जैसा नहीं रहता इसलिये कभी अपने बुरे समय को देखकर परेशान नहीं होना चाहिये।

वतंमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-समय चक्र घूमता रहता है और मनुष्य की जीवन धारा भी उसी के अनुसार बहती जाती है। अपने जीवन से असंतुष्ट लोग अक्सर कहते हैं कि ‘मैंने अमुक की बात मान ली होती तो आज मैं कुछ और होता‘,या मैंने अमुक काम किया होता तो धनाढ्य होता‘। समय और सृष्टि का यह नियम होता है कि एक बार आदमी को इस संसार में उपलब्धि प्राप्त कराने के लिये अवसर अवश्य आता है बस उसे पहचान कर उसका उपयोग करने की बुद्धि होना चाहिए। कई लोग जो दूसरों की बुद्धि के अनुसार चलने के आदी हैं वह ऐसी शिकायतें करते हैं हमने अमुक की बात मानकर गलती की थी। यह सब अपनी गलतियां और बौद्धिक आलस्य की कमी छिपाने का बहाना है। जो लोग अपने कर्तव्य पथ पर चलने के लिये दृढ़संकल्पित होते हैं वह बिना किसी की परवाह किये चलते जाते हैं और अपने लक्ष्य का चरम शिखर प्राप्त करते हैं।
समय का पहिया ऊपर नीचे घूमता है और राजा हो या रंक उसके लिये अच्छा बुरा समय आता रहता है। ज्ञानी लोग इस रहस्य को जानते हैं और इसलिये विचलित नहीं होते।
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Tuesday, September 2, 2008

संत कबीर वाणीःसत्य शब्द की खोज कर मन पर नियंत्रण कर लें

शब्द गुरु का शब्द है, काया का गुंरु काय
भक्ति करै नित शब्द सतगुरु यौं समुझाय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं सत्य के शब्द का ज्ञान कराने वाला गुरु तो शब्द ही है और देह का ज्ञान कराने वाली तो देह ही है। नित्य शब्द के उच्चारण और भगवान का स्मरण करने से ही सच्चा ज्ञान प्राप्त कर सकता है।

एक शब्द सुख खानि है, एक शब्द दुख रासि
एक शब्द बन्धन कटै, एक शब्द गल फांसि

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि एक शब्द ऐसा होता है जो अपने साथ दूसरों के भी सुख प्रदान करता है और एक ऐसा हो दुख ही देता है।
एक शब्द ऐसा होता है जिससे अपने सारे बंधन कट जाते हैं और एक ऐसा होता है जो गले की फांसी बन जाती है।

शब्द खोजि मन बस कर, सहज जोग है येह
सत्त शब्द निज सार है, यह तो झूठी देह

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि हर मनुष्य को सत्य का ज्ञान होना चाहिए तभी उसका मन बस में रहता है। सत्य ही जीवन का सार है और यह देह तो झूठी है जो धीरे धीरे नष्ट होने की तरफ बढ़ती जाती है।
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Saturday, August 30, 2008

रहीम के दोहे:मन की व्यथा मन में ही रखो

रहिमन निज मन की बिधा, मन ही राखो गोय
सुनि अठिलैहैं लोग सब, बांटि न लैहैं कोय


कविवर रहीम कहते है अपने मन के दुःख दर्द किसी से मत करो। लोग उसे सुनकर उपहास करेंगे। कोई भी उसे बांटने वाला नहीं मिलेगा।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-जीवन में दुख दर्द तो सभी को होता है पर जो उसे दूसरों को सुनाकर उसे हल्का करने का प्रयास करते हैं उन्हें समाज में उपहास का पात्र बनना पड़ता है। अब तो वैसे भी लोगों की पीड़ाएं इतनी हो गयीं हैं कि कोई किसी की पीड़ा क्या सुनेगा? सब अपनी कह रहे हैं पर कोई किसी की सुनता नहीं है। अमीर हो या गरीब सब अपने तनाव से जूझ रहे हैं। ऐसे में बस सबके पास हंसने का बस एक ही रास्ता है वह यह कि दूसरा अपनी पीड़ा कहे तो दिल को संतोष हो कि कोई अन्य व्यक्ति भी दुखी है। उसकी पीड़ा का मजाक उड़ाओ ‘‘देख हम भी झेल रहे हैं पर भला किसी से कह रहे हैं‘।

कई चालाक लोग अपने दुख को कहते नहीं है पर अपनी पीड़ा को हल्का करने के लिये दूसरों की पीड़ा को सबके सामने सुनाकर उसे निशाना बनाते हैं। ऐसे लोगों को अपनी थोड़ी पीड़ा बताना भी मूर्खता है। वह सार्वजनिक रूप से उसकी चर्चा कर उपहास बनाते है। ऐसे में अपना दर्द कम होने की बजाय बढ़ और जाता है। अपने दुःख दर्द जब हमें खुद ही झेलने हैं तब दूसरों को वह बताकर क्या मिलने वाला है? जब हमारे दर्द को कोई इलाज करने वाला नहीं है उसकी दवा हमें ढूंढनी है तो फिर क्योंकर उसे सार्वजनिक चर्चा का विषय बनाएं। उसका हल हो न हो पर लोग पूछते फिरेंगे-‘‘क्या हुआ उसका?’’

हम अपनी उस पीड़ा को भूल गये हों पर लोग उसे याद कर बढ़ा देते हैं। ऐसे में कुछ अन्य विषय पर सोच रहे हों तो उससे ध्यान हटकर अपनी उसी समस्या की तरफ चला जाता है। बेहतर है अपने दर्द अपने मन में रखें।
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Friday, August 29, 2008

रहीम के दोहे:जब तक इज्जत मिले तब तक ही कहीं ठहरें

रहिमन जा डर निसि परै, ता दिन डर सब कोय
पल पल करके लागते, देखु कहां धौ होय

कविवर रहीम कहते हैं भारी संकट झेलने वाला व्यक्ति न तो रात को चैन से सो पाता है और न दिन में जाग पाता है। उसके हर अपने सामने संकट आता दिखता है। तमाम तरह की आशंकायें और भय उसके मन में समा जाते हैं।
रहिमन ठठरी धूर की, रही पवन ते पूरि
,गांठ युक्ति की खुलि गई, अन्त धूरि की धूरि

कविवर रहीम कहते हैं कि यह देह एक धूल की भरी हुई गठरी है जिसमें पांचो तत्व समाहित है। जब वह सब बिखर कर अलग हो जाते हैं तब यह अस्थि पंजर पड़ा रहता है और उसी धूल में मिल जाता है जहां से उत्पन्न हुआ था।

रहिमन तब लगि ठहरिये, दान, मान, सम्मान
घटत मान देखिए जबहि, तुरतहि करिय पयान

कविवर रहीम कहते हैं कि किसी भी स्थान पर तब तक ठहरिये आपको मान और सम्मान के साथ कुछ मिलता है। जब अपना मान सम्मान वहां कम होते देखें तो वहां से पलायन कर जाईये।

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Thursday, August 28, 2008

संत कबीर वाणीःभक्ति का तो होता है दो प्रकार का स्वभाव

भक्ति दुवारा सांकरा, राई दशवें भाव
मन मैंगल होम रहा, कैसे आये जाय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि भक्ति का द्वार कि राई के दाने के दसवें भाग के बराबर संकरा होता है उसमें पागली हाथी की तरह मतवाला विशाल मन में कैसे प्रवेश कर सकता है।

भाव बिना नहिं भक्ति जग, भक्ति बिना नहीं भाव
भक्ति भाव इक रूप है, दोअ एक सुभाव


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जब तक हृदय में निच्छल और निर्मल भाव नहीं है तब तक इस जगत में भक्ति का भाव नहीं बन सकता है। भक्ति के भाव तो रूप एक है पर उसके दो प्रकार के स्वभाव हैं-एक सकाम भाव दूसरा निष्काम भाव।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-भक्ति और ज्ञान का स्वरूप अत्यंत सूक्ष्म है। संत और साधु लोग प्रवचन देते हुए तमाम तरह की कहानियां और संस्मरण जोड़ देते हैं तो ऐसा लगता है कि ज्ञान का कोई बृहद स्वरूप है। अक्सर ऐसे संत लोग कहते हैं कि श्रीगीता का ज्ञान गूढ और रहस्यपूर्ण है पर यह उनका भी भ्रम है। श्रीगीता का ज्ञान सरल और सहज है पर प्रश्न यह है कि उसका अध्ययन और श्रवण करने वाला किस मार्ग पर स्थित है। जो भक्त सकाम भाव में स्थित हैं उसके लिये वह राई के बराबर है और वह उसमें प्रवेश नहीं कर सकता क्योंकि उसका मन तो अपने अंदर इच्छायें और आकांक्षाओं को पालकर मदमस्त हाथी हो जाता है। उसको निष्काम भक्ति का यह द्वार दिखाई ही नहीं देगा। जिसने निष्काम भाव अपनाते हुए श्रीगीता का अध्ययन और श्रवण किया वह सहजता से




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Wednesday, August 27, 2008

संत कबीर वाणी:अपने महल पर गर्व करना व्यर्थ

कबीर गर्व न कीजिए, ऊंचा देखि आवास
काल परौं भूईं लेटना, ऊपर जमसी घास


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं की अपना शानदार मकान और शानशौकत देख कर अपने मन में अभिमान मत पालो जब देह से आत्मा निकल जाती हैं तो देह जमीन पर रख दी जाती है और ऊपर से घास रख दी जाती है।

आज के संदर्भ में व्याख्या-यह कोई नैराश्यवादी विचार नहीं है बल्कि एक सत्य दर्शन है। चाहे अमीर हो या गरीब उसका अंत एक जैसा ही है। अगर इसे समझ लिया जाये तो कभी न तो दिखावटी खुशी होगी न मानसिक संताप। सबमें आत्मा का स्वरूप एक जैसा है पर जो लोग जीवन के सत्य को समझ लेते हैं वह सबके साथ समान व्यवहार करते हैं। हम जब किसी अमीर को देखते हैं तो उसको चमत्कृत दृष्टि से देखते हैं और कोई गरीब हमारे सामने होता है तो उसे हेय दृष्टि से देखते हैं। यह हमारे अज्ञान का प्रतीक है। यह अज्ञान हमारे लिए कष्टकारक होता है। जब थोडा धन आता है तो मन में अंहकार आ जाता है और अगर नहीं होता तो निराशा में घिर जाते हैं और अपने अन्दर मौजूद आत्मा को नहीं जान पाते। यह आत्मा जब हमारी देह से निकल जाता है तो फिर कौन इस शरीर को पूछता है, यह अन्य लोगों की मृतक देह की स्थिति को देख सीख लेना चाहिऐ।
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Monday, August 25, 2008

रहीम के दोहे:निजी हित के अनुसार लोगों की दृष्टि होती है

स्वारथ रचत रहीम सब, औगनहूं जग मांहि
बड़े बड़े बैठे लखौ, पथ रथ कूबर छांहि

कविवर रहीम कहते हैं कि लोग अपने स्वार्थ के लिये दूसरे में गुण दोष निकालते हैं। जो कभी अपनी हित साधने के लिये मार्ग में रुके रथ के हरसे की टेढ़ी-मेढ़ी छाया को अशुभ कहा करते थे वही लोग उसी हरसी की छाया में बैठ कर अपने को धूप से बचाते हैं।

सर सूखै पंछी उड़ै, औरे सरन समाहि
दीन मीन बिन पंख के, कहु रहीम कहं जाहिं


कविवर रहीम कहते हैं कि तालाब का पानी सूखते ही पक्षी उड़कर दूसरे तालाब में चले जाते हैं पर उसमें रहने वाली मछली का क्या? वह तो असमर्थ होकर वहीं पड़ी रहती है। परमात्मा का ही उसे आसरा होता है।

साधु सराहै साधुता, जती जोखिता जान
रहिमन सांचे सूर को, बैरी करे बखान


सज्जन लोग ही सज्जनता की सराहना करते हैं दुष्ट नहीं। जो योगी हैं वही ज्ञान और ध्यान की सराहना करते है जबकि सामान्य जन उससे परे रहते हैं। पर जो शूरवीर हैं उनकी वीरता की प्रशंसा सभी करते हैं।
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Sunday, August 24, 2008

रहीम के दोहे:दुरूपयोग करने से संपत्ति और प्रतिष्ठा समाप्त हो जाती है

संपति भरम गंवाइ के, हाथ रहत कछु नाहिं
ज्यों रहीम ससि रहत है, दिवस अकासहिं मांहि


कविवर रहीम कहते हैं कि भ्रम में आकर आदमी तमाम तरह की आदतों का शिकार हो जाता है और उसमें अपनी संपत्ति का अपव्यय करता रहता है और एक दिन ऐसा आ जाता है जब उसके पास कुछ भी शेष नहीं रह जाता। इसके साथ ही समाज में उसकी प्रतिष्ठा खत्म हो जाती है।

संतत संपति जानि कै, सबको सब कुछ देत
दीन बंधु बिन दीन की, कौ रहीम सुधि लेत


कविवर रहीम कहते हैं कि जिनके पास धन पर्याप्त मात्रा में लोग उनको सब कुछ देने को तैयार हो जाते हैं और जिसके पास कम है उसकी कोई सुधि नहीं लेता।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-इस संसार में माया का खेल विचित्र है। वह कभी स्थिर नहीं रहती। आजकल जितने धन के उद्भव के काले स्त्रोत बने हैं उतने उसके पराभव के मार्ग बने हैं। ऐसे अनेक लोग हैं जिन्होंने अपने पद, प्रतिष्ठा और परिवार के नाम पर गलत तरीके से अथाह धनार्जन किया पर उनके घर के सदस्यों ने ही गलत मार्ग अपना कर जूए, शराब, सट्टे तथा अन्य व्यसनों में तबाह कर दिया। देखने के लिये अनेक भले लोग अपने धन का अहंकार दिखते हैं पन अपने बच्चों की आदतों से उनका मन हमेशा विचलित होता है। हालांकि कुछ लोग अनाप-शनाप पैसा कमा रहे हैं और अपने बच्चों के विरुद्ध शिकायत न तो सुनते हैं और न ही कोई उनके सामने करता है।

यह कारण है कि आजकल जो कथित बड़े लोग उनके अनेक घर के रहस्य जब सामने आते हैं तो लोग हैरान रह जाते हैं। उनका अपने परिवार पर बस नहीं हैं। कई लोग तो जिनका नाम था अब इसलिये गुमनाम हो गये क्योंकि उनका धन पूरी तरह गलत कामों की वजह से तबाह हो गया। उनकी चर्चा अब इसलिये नहीं होती क्योंकि जिनके पास धन नहीं है उनकी चर्चा भला कौन करता है? इसके बावजूद भी शिक्षित और कथित ज्ञानी लोग भी वैभवशाली लोगों का चाटुकारिता करते हैं और गरीब को अनदेखा करते हैं। अमीर के दौलत से कुद पाने के लिये ही वह लोग उनके इर्दगिर्द चक्कर लगाते है। गरीब को तो वह पांव की जुती समझते हैं। इसके बावजूद हमें समझदार होना चाहिए और सबके प्रति समान व्यवहार करना चाहिए। ऐसा भी होता है कि अमीर की चाटुकारिता करते रहो पर हाथ कुछ नहीं आता। कोई अमीर किसी की बिना कारण सहायता नहीं करता। यह हमें समझना चाहिए। अगर कोई हमारी सहायता करने आ रहा है तो समझ लो उसका कोई स्वार्थ है।
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Saturday, August 23, 2008

संत कबीर वाणीः परमात्मा से परिचय हुआ तो दुःख सुख का मेला दूर हो गया

गगन मंडल के बीच में, तुरी तत्त इक गांव
लच्छन निशाना रूप का, परखि दिखाया ठांव

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि हृदय वह स्थान स्थित है जो इस देह में आकाश के नीचे स्थित किसी छोटे गांव की तरह है जहां परमात्मा का वास होता है। वह लक्षणों और संकेतों में अपना रूप प्रकट कर अपने वहां रहने का प्रमाण देता है।
मानसरोवर सुगम जल, हंसा केलि कराय
मुक्ताहल मोती चुगै, अब उडि़ अंत न जाय


संत शिरोमणि कबीरदास जी के मतानुसार हृदय में ही वह मानसरोवर है जहां परमात्मा रूपी हंस विचरण करता है। वह तो ज्ञान के मोती चुनने को लालाचित रहता है जब तक वहां से उड़कर न चला जाये।

पूरे से परिचय भया, दुःख सुख मेला दूर
जम सो बाकी कटि गई, साईं मिला हजूर

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जब हृदय में स्थित परमात्मा से पूा परिचय हो गया तो दुःख और सुख का मेला दूर लगने लगा। शेष आयु यमराज की चिंता से मुक्ति मिल गयी और परमात्मा के दर्शन हो गये।
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Friday, August 22, 2008

रहीम के दोहेःपति पत्नी को एक ही देव की आराधना करना चाहिए

पुरुष पूजै देवरा, तिय पूजे रघुनाथ
कहि रहीम दोउन बने, पड़ौ बैल के साथ

कविवर रहीम कहते हैं कि घर का पुरुष किसी दूसरे देवता की पूजा करता है या केवल कमाने में ही उसका मन लगता है और पत्नी भगवान श्रीराम को मानती है तो उनका साथ नहीं बन पाता। उनक यह साथ ऐसा ही जैसे बैल के साथ पड़ा चल रहा हो।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-आजकल की विषम परिस्थतियों में लोगोंें के घर तनाव का यह भी एक कारण है। वर्तमान भौतिक युग में कठिन होते जा रहे इस जीवन में जहां केवल कमाने का दायित्व पुरुष सदस्यों का है वहां ऐसे तनाव जरूर पैदा होता है। पुरुष तो रोज कमाने के चक्कर में घर से निकल जाते हैं और स्त्री समय निकालकर भगवान की पूजा करती हैं और सत्संग में जाती है। इसके अलावा पुरुषों के मन में यह भी होता है कि यह पूजा वगैरह तो केवल बुढ़ापे में करने का काम है और फिर अपने घर की स्त्री यह सब कर ही रही है तो उसका फल उसे मिलेगा तो हम भी लाभान्वित होंगे। इससे दोनों के बीच एक वैचारिक अंतर पैदा होता है जो दोनों के लिये तनाव का कारण बनता है। इसके अलावा कहीं पुरुष किसी तांत्रिक या सिद्ध के चक्कर में पड़े रहते हैंं पर स्त्री केवल भगवान का भजन करती है वहां यही संकट पैदा होता है। हर घर में स्त्री और पुरुष को एक ही देव की उपासना करना चाहिए। यहां यह बात याद रखना चाहिए कि जैसे देव या इष्ट की पूजा आदमी करता है वैसा ही गुण उसमें आता है। अगर किसी ऐसे देव की जीवंत भावना रखकर आराधना की जायेगी तो हमारा मन प्रफुल्लित हो उठेगा और अगर किसी देव में उसके स्वर्गीय होने का आभास होता है तो उसकी आराधना से हमारा मन भी निराशा और निष्कियता की ओर अग्रसर हो जायेगा और वैसा ही फल भी होता है। अतः स्त्री और पुरुष को एक ही देव को पूजना चाहिए।
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Thursday, August 21, 2008

रहीम के दोहेःजिसने दीवान खरीदा, समझो राजा खरीद लिया


मन से कहां रहीम प्रभु, दृग सों कहां दीवान
देखि दृगन जो आदरै, मन तोहि हाथ बिकान

                      कविवर रहीम कहते हैं कि मन जैसा कहां स्वामी और कहां किले जैसा अभेद्य दीवान! जो चतुर व्यक्ति उस किले   के  दीवान का आदर करता है तो स्वामी उसके हाथ बिक जाता है।
                        वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-कविवर रहीम के समय में भी राजकाज कोई बादशाह स्वयं नहीं देखते थे बल्कि उनके मंत्री और दीवान ही सारे राज्य के भाग्य नियंता थे। सच तो यह है राजा या बादशाह तो बस देखने भर की उपाधि है। असल राज्य तो मंत्रियों और दीवानों के इशारे पर ही चलता है। राजा या बादशाह के नाम पर तो सभी जगह मुखौटे ही बैठे दिखाई देते हैं। बड़े पद पर बैठै व्यक्ति को अपने बड़प्पन के कारण किसी पर दया भी आती हो तो यह जरूरी नहीं है कि उसके मातहत भी यही भाव अपनायें। कई बार तो राजा या राज्य प्रमुख उदारता से प्रजा की हितार्थ कोई बात कह भी दे पर यह जरूरी नहीं है कि उसके मातहत या चमचे वह काम होने दें।
                     कहने को कहा जाता है कि अमुक व्यक्ति ने अमुक देश पर इतने बरस राज्य किया पर वास्तविकता यह है कि वह केवल मुखौटे थे। राजकाज के लिये तो मंत्री और दीवान ही निर्णय करते रहे थे। राजशाही बहुत बदनाम हो गयी पर सच तो यह है राज्य की ताकत तो सामंतों और साहुकारों के हाथ में होती और राजा के मातहत चाहे जैसे अपने निर्णय करते थे। वह अपने राजा को भोग विलास में या अन्य व्यर्थ के कामों में लगाये रहते ताकि उसका ध्यान प्रजा की तरफ नहीं जाये। प्रजा भी इसी भ्रम में रहती है कि अमुक उनका राजा है जबकि वास्तविकता यह है कि वह नाम भर का है। राज्य तो दीवानों और मंत्रियों का ही चलता है और वह भी अपने मातहतों के अधीन ही रहते हैं। आज भी यह संच्चाई बदल गयी हो लगता नहीं है। यह अलग बात है कि आजकल दीवानों की जगह चमचों ने ले ली है।
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Wednesday, August 20, 2008

संत कबीर वाणी:सहजता की तराजू में सब रस तौल कर देखें

सहज तराजू आनि के, सब रस देख तोल
सब रस माहीं जीभ रस, ज कोय जानै बोल

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि इस दुनिया मेे विभिन्न प्रकार के रस है पर भी को परख लिया। इमने सबसे अधिक वजन जीभ के रस का है। जो मीठे वचन बोलता है वही इस रस का महत्व जानता है।

बौलै बोल विचारि के, बैठे ठौर संभारि
कहैं कबीर ता दास को, कबहू न आवै हारि

संत कबीरदास जी कहते हैं कि जो सोच समझकर समय के अनुसार बोलता है और उपयुक्त स्थान पर बैठता है तो वह कभी पराजित नहीं कर सकता।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-हमने कुछ लोग ऐसे देखे होंगे जो शांत भाव से जीवन जीते हैं और उनको किसी की परवाह नहीं रहती। दरअसल वह समय के अनुसार उचित और अनुचित का महत्व जानते हुए कार्य करते हैं। अनावश्यक रूप से किसी से वार्ता नहीं करते और जब बोलते हैं तो बहुत ही सधे शब्दों में का उपयोग करते है। ऐसे लोग कभी भी कहीं अपमानित नहीं होते। ऐसे लोग अंर्तमुखी होते हैं और बहुत सोच विचार कर बोलते हैं। जीवन में सफलता उनके कदम चूमती है।
इस संसार में ऐसे भी बहुत लोग हैं जो जीवन में बहुत काम करते हैं। उनका पूरा जीवन परिश्रम करते हुए निकल जाता है और फिर भी समाज में सम्मान नहीं प्राप्त कर पाते वजह यह कि वह अपने मुख से अनर्गल प्रलाप कर अपने ही किये पर पानी फेर देते हैं। बहुत काम करते हैं पर फिर भी अनुभव के नाम पर कोरे रह जाते हैं। अपनी सारी ऊर्जा व्यर्थ बोलने में लगाते है।

Tuesday, August 19, 2008

संत कबीर वाणी:गर्व करते हुए किसी रंक पर नहीं हंसें

अहं अगनि हिरदै, जरै, गुरू सों चाहै मान
जिनको जम नयौता दिया, हो हमरे मिहमान


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जब किसी मनुष्य में अहंकार की भावना जाग्रत होती है तो वह अपने गुरू से भी सम्मान चाहता है। ऐसी प्रवृत्ति के लोग अपने देह को कष्ट देकर विपत्तियों को आमंत्रण भेजते हैं और अंततः मौत के मूंह में समा जाते हैं।

कबीर गर्व न कीजिये, रंक न हंसिये कोय
अजहूं नाव समुद्र में, ना जानौं क्या होय


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपनी उपलब्धियों पर अहंकार करते हुए किसी निर्धन पर हंसना नहीं चाहिए। हमारा जीवन ऐसे ही जैसे समुद्र में नाव और पता नहीं कब क्या हो जाये।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-अहंकार आदमी का सबसे बड़ा शत्रू होता है। कुछ लोग अपने गुरू से कुछ सीख लेकर जब अपने जीवन में उपलब्धियां प्राप्त कर लेते हैं तब उनमें इतना अहंकार आ जाता है कि वह अपने गुरू से भी सम्मान चाहते हैं। वैसे आजकल के गुरू भी कम नहीं है वह ऐसे ही शिष्यों को सम्मान देते हैं जिसके पास माल टाल हो। यह गुरू दिखावे के ही होते हैं और उन्होंने केवल भारतीय अध्यात्म ग्रंथों की विषय सामग्री को रट लिया होता है और जिसे सुनाकर वह अपने लिये कमाऊ शिष्य जुटाते हैं। गरीब भक्तों को वह भी ऐसे ही दुत्कारते हैं जैसे कोई आम आदमी। कहते सभी है कि अहंकार छोड़ दो पर माया के चक्कर में फंस गुरू और शिष्य इससे मुक्त नहीं हो पाते। ऐसे में यह विचार करना चाहिए कि हमारा जीवन तो ऐसे ही जैसे समुद्र के मझधार में नाव। कब क्या हो जाये पता नहीं। माया का खेल तो निराला है। खेलती वह है और मनुष्य सोचता है कि वह खेल रहा है। आज यहां तो कल वहां जाने वाली माया पर यकीन नहीं करना चाहिए। इसलिये अपने संपर्क में आने वाले व्यक्ति को सम्मान देने का विचार मन में रखें तो बहुत अच्छा।

Monday, August 18, 2008

भृतहरि शतक:स्वर्ग का फल भी तो भोग विलास ही है

स्वपरप्रतारकोऽसौ निन्दति योऽलीकपण्डितो युवतीः
यस्मात्तपसोऽपि फलं स्वर्गस्तयापि फलं तथाप्सरसः


हिंदी में भावार्थ- जो शास्त्र ज्ञान में अधकचरे पण्डित स्त्रियों की निंदा करते हैं वे अपने और पराए सभी को धोखा देते हैं, क्यों तपस्या से जिस स्वर्ग की प्राप्ति होती है, उस स्वर्ग का फल भी अप्सराओं के साथ भोग विलास ही है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- अनेक कथित ज्ञानी लोग स्त्री को नरक का द्वार कहते हुए उससे दूर रहने का उपदेश देते हैं। ऐसे लोग केवल पाखंड के अलावा कुछ नहीं करते। वास्तविकता यह है कि वह अपने कथित ज्ञान से वह जिस तपस्या आदि करने का प्रचार करते हैं वह केवल कल्पित स्वर्ग की प्राप्ति करवाने वाला होता है। उसमें भी अप्सराओं से मिलन का सुख बखान किया जाता है। भर्तुहरि कहते हैं कि जब अप्सराओं जैसी सुंदर स्त्रियां इस धरती पर ही मिल जातीं हैं तो उनकी अवहेलना क्यों की जाये। एक तरफ स्वर्ग में अप्सराओं से मिलने के मोह में तप आदि का उपदेश करना और इस धरती की नारी से दूर रहने की बात करना पाखंड के सिवाय कुछ नहीं है।
वर्तमान संदर्भ में इस बात का उल्लेख करना दिलचस्प रहेगा कि फिल्मों और टीवी चैनलों से जुड़ी अभिनेत्रियों को कहीं सैक्सी और सर्वाधिक सुंदर कहकर इसी संसार में काल्पनिक स्वर्ग की अनुभूति करवाकर यह दिखाने का प्रयास करते हैं कि अन्य कहीं भी स्त्री सुंदर नहीं है। यह भी एक एसा भ्रम है जिसमें युवक अपने हृदय में उनके चेहरे स्थापित कर लेते हैं। सामान्य लड़कियों में भी पर्दे की कथित सुंदरियों जैसा आकर्षण ढूंढने लगते है। अपनी जेब में उनके फोटो रखने लगते हैं। वह जिस सौंदर्य को वास्तविक समझते हैं केवल उन कथित पर्दे वाली सुंदरियों द्वारा उपयोग में लायी गयी सौदर्य प्रसाधन सामग्री और कैमरे का कमाल होता है। अतः कथित अप्सराओं के सौदर्य की कल्पना-चाहे वह धार्मिक संतों द्वारा प्रचारित हो या अन्य प्रचार माध्यमों द्वारा-में बहना नहीं चाहिए क्योंकि ऐसा करना व्यर्थ है।
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दीपक भारतदीप की

Saturday, August 16, 2008

संत कबीर वाणीःशीतल गंगाजल पर्वतों को तोड़कर अपना मार्ग बनाता है

कुबुधि कमानी चढ़ि, कुटिल वचन के तीर
भरि भरि मारे कान में, सालै सकल सरीर

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि कटुता पूर्ण वचन बोलना सबसे बुरा है। जिनकी बुद्धि भ्रष्ट है वह ऐसे वचन बोलकर दूसरे के शरीर को दग्ध कर देते हैं।

कुटिल वचन सबतें बुरा, जारि करै सब छार
सांधु वचन जल रूप है, बरसै अमृत धार

संत शिरोमणि कबीरदास जी के अनुसार दुष्ट लोगों के वचन बहुत दुःखदायी होते और उनको सुनकर पुरा शरीर जल जाता है परंतु साधुओं के वचन जल के समान अत्यंत शीतल हैं और ऐसा लगता है जैसे अमृत बरस रहा हो।

कुटिल बचन नहिं बोलिये, शीतल बैन ले चीन्हि
गंगा जल शीतल भया, परबत फोड़ा तीन्हि


संत शिरोमणि कबीर दास जी के अनुसार कटु वचन कभी नहीं बोलना चाहिये। हृदय के शीतलता प्रदान करने वाले वाक्यों का प्रयोग करना चाहिए। गंगा जल कितना शीतल होता है जो पर्वतों को तोड़कर अपना मार्ग बनाता है।
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Friday, August 15, 2008

संत कबीर वाणीःगांठ से हीरा वहां न निकालें जहां बाजार खोटा हो

हीरा तहां न खोलिए,जहां खोटी है हाट
कसि करि बांधो गठरी, उठि चालो बाट


संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं कि अगर अपनी गांठ में हीरा है तो उसे वहां मत खोलो जहां बाजार में खोटी मनोवृत्ति के लोग घूम रहे हैं। उस हीरे को कसकर अपनी गांठ में बांध लो और अपने मार्ग पर चले जाओ।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-संत कबीर दास जी ने यह बात व्यंजना विद्या में कही हैं। इसका सामान्य अर्थ तो यह है कि अपनी कीमती वस्तुओं का प्रदर्शन वहां कतई मत करो जहां बुरी नीयत के लोगों का जमावड़ा है। दूसरा इसका गूढ़ आशय यह है कि अगर आपके पास अपना कोई ज्ञान है तो उसे सबके सामने मत बघारो। कुछ लोग ऐसे होते हैं जो आपकी बात सुनकर अपना काम चलायेंगे पर आपका नाम कहीं नहीं लेंगे या आपके ज्ञान का मजाक उड़ायेंगे क्योंकि आपके ज्ञान से उनका अहित होता होगा। अध्यात्म ज्ञान तो हमेशा सत्संग में भक्तों में ही दिया जाना चाहिए। हर जगह उसे बताने से सांसरिक लोग मजाक उड़ाने लगते हैं। समय पास करने के लिये कहते हैं कि ‘और सुनाओ, भई कोई ज्ञान की बात’।
अगर कोई तकनीकी या व्यवसायिक ज्ञान हो तो उसे भी तब तक सार्वजनिक न करें जब तक उसका कोई आर्थिक लाभ न होता हो। ऐसा हो सकता है कि आप किसी को अपने तकनीकी और व्यवसायिक रहस्य से अतगत करायें और वह उसका उपयोग अपने फायदे के लिये कर आपको ही हानि पहुंचाये।
अक्सर आदमी सामान्य बातचीत में अपने जीवन और व्यवसाय का रहस्य उजागर कर बाद में पछताते हैं। कबीरदास जी के अनुसार अपना कीमती सामान और जीवन के रहस्यों को संभाल कर किसी के सामने प्रदर्शित करना चाहिए।
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Thursday, August 14, 2008

संत कबीर वाणी:बाल सफ़ेद होना ज्ञान का प्रमाण नहीं

आंखि न देखि बावरा,शब्द सुनै नहिं कान
सिर के केस उज्जल भये, अबहूं निपट अजान
संत शिरोमिणि कबीरदास जी कहते हैं कि संसार के लोग अपनी देह की अवस्था का विचार नहीं करते। इन बावलों को आंख से दिखते नहीं है और कानों से उपदेश और संतों के प्रवचन सुनाई नहीं देते है। सिर के बाल पूरी तरह सफेद हो और तब भी अज्ञानी हैं।

मूरख शब्द न मानई, धर्म न सुनै विचार
सत्य शब्द नहिं खोजई, जावैं जम के द्वारा


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मूर्ख व्यक्ति सत्य शब्द नहीं मानता न ही धर्म आदि का विचार करता। वह बिना सत्संग और भगवान भक्त के बिना ही मृत्यू को प्राप्त होता है।

संक्षिप्त व्याख्या-इस देश में इतने सारे कथित संत और उनके शिष्य हैं और इतने सारे धार्मिक अनुष्ठान होते हैं पर फिर भी समाज निरंतर संस्कृति, संस्कार और साहित्य के क्षेत्र में पतन की तरफ जा रहा है। लोग अपने संस्कारों को निरर्थक, संस्कृति को पिछड़ा और धार्मिक साहित्य को अप्रासंगिक मानने लगे हैं। इसका कारण यह है कि हमारे देश में पाखंड बहुत बढ़ चुका है। लोग ऐसे धार्मिक कार्यक्रमों में जाते हैं पर आखें होते हुए भी देखते नहीं, कान से सुनी बात दूसरे कान से निकाल देते हैं और बुद्धि का उपयोग करना तो उनको निरर्थक समय नष्ट करना होता है। वैसे वह फिल्मी और राजनीतिक विषयों पर बातचीत कर अपने आपको विद्वान और ज्ञानी समझते हैं पर सत्संग की बात करो तो कहते हैं-‘इनसे कोई संसार थोड़े ही चलता है।’

आधुनिक शिक्षा से भारतीय अध्यात्म विषय को दूर रखने की वजह से आजकल लोगों में मानसिक विकृतियां जन्म ले चुकी हैं। ऐसे में वही लोग थोड़ा बहुत ज्ञान धारण किये हुए हैं जिनको माता पिता या किसी योग्य गुरू द्वारा उससे परिचित कराया गया है वरन लोग तो मन की आखों से दृष्टिहीन, कान से बहरे और बुद्धि से विवेकहीन हो गये हैं। उनको केवल सांसरिक विषय ही प्रिय लगते हैं।
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Wednesday, August 13, 2008

संत कबीर वाणी:बाहर के दरवाजे बंद कर अन्दर झांकें

सुमिरन सुरति लगाय के, मुख ते कछु न बोल
बाहर के पट देय के, अंतर के पट खोल


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मन का एकाग्र और वाणी पर नियंत्रण करते हुए परमात्मा का स्मरण करो। आपनी बाह्य इंदियों के द्वार बंद कर अंदर के द्वार खोलो।

संपादकीय व्याख्या-इससे पता चलता है कि कबीरदास जी ध्यान की चरम स्थिति प्राप्त कर चुके थे और यही उनकी भक्ति और शक्ति का निर्माण करता था। भगवान की भक्ति का श्रेष्ठ रूप भी ध्यान ही है। अक्सर लोग कहते हैं कि हमारा ध्यान नहीं लगता या थोड़ी देर लगता है फिर भटक जाता है। दरअसल हम लोग शोरशराबे से भक्ति करने के आदी हो जाते हैं इसलिये यह सब होता है। इसके अलावा ध्यान के लिये गुरू की आवश्यकता होती है वह मिलते नहीं है। अधिकतर गुरू सकाम भक्ति के लिए प्रेरित कर केवल अपने प्रति लोगों का आकर्षण बनाये रखना चाहते हैं।

ध्यान लगाना सरल भी है और कठिन भी। यह हम पर निर्भर करता है कि हमारे मन और विचारों पर हमारा नियंत्रण कितना है। इस संसार के दो मार्ग हैं। एक सत्य का दूसरा माया का। हमारा मन माया के प्रति इतना आकर्षित रहता है कि उसे वहां से हटाने के लिये दृढ़ इच्छाशक्ति की आवश्यकता होती है। अगर हमने तय कर लिया कि हमें ध्यान लगाना ही है तो दुनियां की कोई ताकत उसे लगने से रोक नहीं सकती और अगर संशय है तो कोई गुरू उसे लगवा नहीं सकता।
इन पंक्तियों का लेखक कोई सिद्ध पुरुष नहीं है पर ध्यान की विधि जो अनुभव से आई है उसे तो बता ही सकता है। कहीं शांत स्थान पर सुखासन में बैठ जाईये और आंखें बंद कर शरीर को ढीला छोड़ दें। अपने हृदय में चक्रधारी देव की कल्पना कर उसे पर अपनी दृष्टि रखें। अपना पूरा नाक के बीच में भृकुटि पर ही रखें। दुनियां के विचार आयें आने दीजिये। आप तो तय कर लीजिये कि मुझे ध्यान लगाना है। जो विचार आते हैं उनके बारे में चिंतित होने की बजाय यह सोचिये कि वह आपके जीवन के जो घटनाक्रम आपने देखे और अनुभव किये हैं उनसे उत्पन्न विकार है जो वहां भस्म हो रहे हैं। जिस तरह हम कोई पदार्थ मुख से ग्रहण करते हैं पर शरीर में वह गंदगी के रूप में बदल जाता है। हम मुख से करेला खायें यह क्रीमरोल उसका हश्र एक जैसा ही होता है। हम काढ़ा पियें या शर्बत वह भी कीचड़ के रूप में परिवर्तित हो जाता है। यही हाल आखों से देखे गये अच्छे बुरे दृश्य और कानों से सुने गये प्रिय और कटु स्वर का भी होता है। उसके विकार हम देख नहीं पाते पर वह हमारी देह में होते है और उसको वहां से निकालने के लिये ब्रह्मास्त्र का काम करता है ध्यान। जब ध्यान लगाते हैं और जो विचार हमारे दिमाग में आते हैं उनके बारे में यह समझना चाहिए कि वह विकार हैं जो वहां भस्म होने आ रहे हैं और हमारा मन शुद्ध हो रहा है। धीरे-धीरे हमारी बाह्य इंद्रियों के द्वार ध्यान के कारण स्वतः बंद होने लगेंगे। बस अपने अंदर दृढ़ इच्छा शक्ति की आवश्यकता है।
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Tuesday, August 12, 2008

रहीम के दोहेःपृथ्वी के सभी प्राणी एक ही ईश्वर का स्वरूप हैं

जो विषया संतन तजी, मूढ़ ताहि, लपटाय
ज्यों नर डारत वमन कर, स्वाद स्वाद सों खाय

कविवर रहीम कहते हैं कि जैसे कोई आदमी उल्टी कर देता है पर श्वान उसे स्वादिष्ट समझकर चाटने लगता है उसी प्रकार के संसार के विषय और भोग विलास का ज्ञानी त्याग देते हैं और मूर्ख उसे ग्रहण करने हैं।

भूप गनत लघू गुनिन को, गुनी गलत लघु भूप
रहिमन गिर तें भूमि लौं, लखो तो एकैं रूप


कविवर रहीम कहते हैं कि राजा लोग अपने राज्य के गुणवानों को हेय दृष्टि से देखते हैं और गुणी तथा ज्ञानी लोग राजा को अपने से छोटा समझते हैं जबकि इस पृथ्वी पर सभी प्राणी एक ही ईश्वर के स्वरूप हैं।

मथन मथत माखन रहे, दही मही बिलगाय
रहिमन सोई मीत है, भीर परै ठहराय

कविवर रहीम कहते हैं कि जब दही को लगतार मथा जाता है तब उसमें से मक्खन निकल पाता है और दही स्वयं मट्ठा होकर मक्खन को आश्रय देती है। उसी प्रकार सच्चा मित्र वही है जो संकट आने पर मदद करता है।
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Monday, August 11, 2008

संत कबीर वाणी:अहंकारी आदमी गुरु से भी सम्मान चाहता है

अहं अगनि हिरदै, जरै, गुरू सों चाहै मान
जिनको जम नयौता दिया, हो हमरे मिहमान


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जब किसी मनुष्य में अहंकार की भावना जाग्रत होती है तो वह अपने गुरू से भी सम्मान चाहता है। ऐसी प्रवृत्ति के लोग अपने देह को कष्ट देकर विपत्तियों को आमंत्रण भेजते हैं और अंततः मौत के मूंह में समा जाते हैं।

कबीर गर्व न कीजिये, रंक न हंसिये कोय
अजहूं नाव समुद्र में, ना जानौं क्या होय


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपनी उपलब्धियौं पर अहंकार करते हुए किसी निर्धन पर हंसना नहीं चाहिए। हमारा जीवन ऐसे ही जैसे समुद्र में नाव और पता नहीं कब क्या हो जाये।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-अहंकार आदमी का सबसे बड़ा शत्रू होता है। कुछ लोग अपने गुरू से कुछ सीख लेकर जब अपने जीवन में उपलब्धियां प्राप्त कर लेते हैं तब उनमें इतना अहंकार आ जाता है कि वह अपने गुरू से भी सम्मान चाहते हैं। वैसे आजकल के गुरू भी कम नहीं है वह ऐसे ही शिष्यों को सम्मान देते हैं जिसके पास माल टाल हो। यह गुरू दिखावे के ही होते हैं और उन्होंने केवल भारतीय अध्यात्म ग्रंथों की विषय सामग्री को रट लिया होता है और जिसे सुनाकर वह अपने लिये कमाऊ शिष्य जुटाते हैं। गरीब भक्तों को वह भी ऐसे ही दुत्कारते हैं जैसे कोई आम आदमी। कहते सभी है कि अहंकार छोड़ दो पर माया के चक्कर में फंस गुरू और शिष्य इससे मुक्त नहीं हो पाते। ऐसे में यह विचार करना चाहिए कि हमारा जीवन तो ऐसे ही जैसे समुद्र के मझधार में नाव। कब क्या हो जाये पता नहीं। माया का खेल तो निराला है। खेलती वह है और मनुष्य सोचता है कि वह खेल रहा है। आज यहां तो कल वहां जाने वाली माया पर यकीन नहीं करना चाहिए। इसलिये अपने संपर्क में आने वाले व्यक्ति को सम्मान देने का विचार मन में रखें तो बहुत अच्छा।
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Sunday, August 10, 2008

विदुर नीतिःसात्विक मार्ग से आया धन ही स्थाई रहता है

१.मनुष्य में धन और आरोग्य को छोड़कर कोई दूसरा गुण नहीं है, क्योंकि रोगी मनुष्य मुर्दे के समान है।
२.जो बिना रोग के उत्पन्न, कड़वा, सिर में दर्द पैदा करने वाला, पाप से संबद्ध, कठोर, तीखा और गरम है जो सज्जनों द्वारा ग्रहण करने योग्य नही और जिसे दुर्जन ही व्यक्त सकते हैं, उस क्रोध को पी जाइये और शांत हो जाइये।
३.रोग से पीड़ित मनुष्य मधुर फलों का आदर नहीं करते, विषयों में भी उन्हें जीवन का सुख और सार भी नहीं मिल पता। रोगी सदा ही दुखी रहते हैं। वह धारण से प्राप्त धन का और वैभव के सुख का अनुभव नहीं कर पाते हैं ।
४.वह बल नहीं है जिसका जो सरल स्वभाव का विरोधी हो। सूक्ष्म धर्म को शीघ्र ही ग्रहण करना चाहिए। क्रूरता से अर्जित धन नष्ट होता है। यदि धन सात्विक मार्ग से आया है तो वह लंबे समय तक स्थिर रहता है.
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Saturday, August 9, 2008

संत कबीर वाणीःहठ करने से यहां कोई बात नहीं बनती

अति हठ मत कर बावरे, हठ से बात न होय
ज्यूं ज्यूं भीजे कामरी, त्यूं त्यूं भारी होय।

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अधिक हठ करने कोई बात नहीं बनती है जैसे जैसे कंबल पानी में भीगता है और अधिक भारी होता जाता है।

नाम भजो मन बसि करो, यही बात है तंत
काहे को पढि़ मरो, कोटि ज्ञान गिरंथ


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि परमात्मा का नाम जपनते हुए ही मन को बस में किया जा सकता है यही जीवन का मूल मंत्र है। व्यर्थ में ज्ञान की पुस्तकेंं पढ़ने से कोई लाभ नहीं है। ढेर सारे ग्रंथ पढ़ने से कोई ज्ञान थोड़े ही मिल जाता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-हर मनुष्य में अहंकार होता है पर किसी किसी में यह इतना अधिक हो जाता है कि वह किसी सही बात को भी स्वीकार नहीं करता। लोगों के आत्मप्रवंचना करने की आदत होती है। वह चाहते हैं कि हर कोई उनका सम्मान और प्रशंसा करे। इस मोह के कारण मनुष्य हठी हो जाता है और अपने मूंह से निकली बात यह हाथ से हुई गलती मान लेना उसे अपनी हेठी लगता है। उसे सही साबित करने के लिये वह अनर्गल तर्क देता या बहाने बनाते हुए अपनी गलती का वजन बढ़ाता जाता है। ऐसे हठी लोग समाज में मजाक का पात्र बनते हैं।

इस विश्व में तमाम तरह के धार्मिक ग्रंथ हैं और उनमें तमाम तरह का ज्ञान भरा हुआ है। उसमें कहानियों के साथ अनेक तरह की बातें कही गयी हैं और अगर उनको पढ़ा जाये तो यह समझ में नही आता कि भगवान की भक्ति का सही स्वरूप कौनसा है। ऐसे में लोग तमाम तरह के भ्रम अपने मन में पाल लेते हैं। भारतीय अध्यात्म के अनुसार केवल प्रभु का नाम हृदय में धारण कर उसे स्मरण करना ही पर्याप्त है। इसके लिये कोई समय या दिन निर्धारित नहीं है। चाहे जब आये मन में अपने ईश्वर का ध्यान लगा लो तो पूरे शरीर में स्फूर्ति आ जाती है। उसके लिये जरूरी नहीं है कि कोई किताब पढ़ी जाये। इन किताबों से ज्ञान रटकर तो अनेक लोगों ने अपने नाम के आगे संत की उपाधि लगा ली है पर उनके कर्म तो सांसरिक मनुष्यों की तुलना में निम्न कोटि के हैं क्योंकि वह भगवान का नाम अपनी वाणी से लेते हैं पर उनके हृदय में तो माया का ही वास होता है।
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Wednesday, August 6, 2008

विदुर नीति:बिना परखे किसी को सहयोगी न बनाएं

1. जो मित्र न हो, मित्र होने पर भी ज्ञानी न हो, ज्ञानी होने पर जिसका अपने मन पर नियंत्रण न हो उसे अपना गुप्त मंत्र नहीं बताना चाहिये। किसी की परीक्षा किये बिना अपना सहयोगी नहीं बनाना चाहिये।
2.जो मोहवश बुरे कर्म करता है, उन कार्यों का विपरीत परिणाम होने से अपने जीवन को ही नष्ट कर देता है।
3.जिसके क्रोध और हर्ष व्यर्थ नहीं जाते और आवश्यक कार्य करते हुए स्वयं ही सतर्कता बरतता है और अपने आर्थिक स्थिति का पूरा ज्ञान जिसे है उसको पृथ्वी पर्याप्त संपदा प्रदान करती है।
4.जो संधि विग्रह आद छः गुणों का ज्ञान होने के लिये प्रसिद्ध है तथा अपनी स्थिति, विकास और पतन का समझता है और जिसके स्वभाव से सभी लोग प्रभावित होते हैं पृथ्वी उसकी रक्षा करती है।
5. उत्तम कर्मो का अनुष्ठान तो सुख देने वाला होता है, किंतु उन्हीं का अनुष्ठान न किया जाये तो पश्चाताप भी होता है।

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Tuesday, August 5, 2008

चाणक्य नीतिःसचेत न रहें तो बीमारी और दुश्मन हमला कर देते हैं

1.निरंतर परिश्रम करना ही अपनी निर्धनता हटाने का सबसे अधिक अच्छा उपाय है। परिश्रमी कभी निर्धन नहीं रह सकता। उद्यम करने वाले को उसका भाग्य का लिखा मिलता है। अगर कोई सिंह सो रहा है तो उसके मूंह में पशु अपने आप नहीं चले जाते। अगर वह परिश्रम न करे तो उसे भी भूखा मरना पड़ता है।
2.भगवान का नाम जपने से सभी पाप अपने आप नष्ट हो जाते हैं। प्राचीन ग्रंथों में पापों के प्रायश्चित को के रूप में तप का ही महत्व प्रतिपादित किया गया है, जो व्यक्ति निरंतर जप करता रहता है उसके पाप तो रह ही नहीं सकते।
3.उत्तर का प्रत्युत्तर देना ही झगड़े का कारण बनता है। अगर किसी ने अपशब्द कहें हैं और दूसरा भी उसके उत्तर में अपशब्द कहता है तो झगड़ा अपने आप शूरू हो जाता है। अगर की झगड़े का निराकरण करना है तो उसका सबसे अच्छा उत्तर मौन है।
4.जागरुक और सावधान व्यक्ति को किसी प्रकार के भय की आशंका नहीं रहती। प्रायः रोग, शत्रू तथा अपराधिक प्रवृत्ति के लोग असावधान और सोते व्यक्ति पर ही प्रहार करते हैं और उनके जागते ही भाग जाते हैं।


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Saturday, August 2, 2008

चाणक्य नीति: मनुष्यों में होते हैं कई प्रकार के अंधे

1.मनुष्य में अंधापन कई प्रकार का होता है। एक तो जन्मांध होते हैं जिनको वास्तव में आंखों से कुछ भी नहीं दिखता, पर दूसरे वह होते हैं जो आखें होते हुए भी नहीं देखते या न देखने का नाटक करते हैं।
2.सावन के अंधे को केवल हरियाली ही दिखती है। इसका तात्पर्य यह है कि आदमी को आंखें तो हैं पर वह सूखे में भी सावन की हरियाली की बात करता है क्योंकि उस पर केवल उसी का प्रभाव होता है
3.कामवासना के अंधे को कुछ भी नहीं सूझता उसकी आखों में केवल मद छाया रहता है। वह केवल इसी विषय पर बात कर अपना तथा दूसरों को मनोरंजन का प्रयास करता है। इसी प्रकार लोभी को भी अपने स्वार्थ की अलावा कुछ नहीं सूझता।
कुछ इस प्रकार के कामांध, मदांध और लोभी ऐसे मनुष्य होते हैं जो आंखें रहते हुए भी अंधों की तरह व्यवहार करते हैं। ऐसे लोग अपने नजरिये से दुनियां को देखते हैं और अपने स्वार्थ के अनुसार उसके स्वरूप का वर्णन करते हैं।

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Friday, August 1, 2008

रहीम के दोहे:काम का जैसा आरंभ वैसा ही होता है अंत

रहिमन धरिया रहंट की, त्यों ओछे की डीठ
रीतेहि सन्मुख होत है, भरी दिखावै पीठ


कविवर रहीम कहते हैं कि नीच आदमी की प्रवृत्ति रहंट की घडि़या की तरह होती है जब पानी भरना होता है तो वह उसके आगे अपना सिर झुकाती है और जब जब भर जाता है तो उससे मूंह मूंह फेर लेती है। ऐसे ही नीच आदमी जब किसी में काम पड़ता है तो उसके आगे सिर झुकाता है और कम करते ही मूंह फेर लेता है।

रहिमन खोटि आदि की, सो परिनाम लखाय
जैसे दीपक तम भरवै, कज्जल वमन कराय


कविवर रहीम कहते हैं कि अगर किसी काम का आरंभ जैसे होता है वैसे ही उसके अनुसार परिणाम पर उसका अंत होता है। जैसे दीपक अपने प्रज्जवलित होते ही ऊपर के अंधेरे को अंदर भरता है और रोशनी करने के बावजूद उसके तल में अंधेरा ही रहता है।

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Thursday, July 31, 2008

विदुर नीतिःभूख ही भोजन में स्वाद पैदा करती है

1.दरिद्र मनुष्य सदा ही स्वादिष्ट भोजन करते हैं क्योंकि भूख उनके भोजन में स्वाद उत्पन्न कर देती है और वह भूख धनियों के लिये सदैव दुर्लभ होती है।
2.संसार में धनियों को प्रायः भोजन करने की शक्ति नहीं होती किंतु दरिद्र के पेट में तो काठ की हजम हो जाते हैं।
3.दुष्ट पुरुषों को जीविका न होने से भय लगता है, मध्यम श्रेणी का पुरुष सदैव मृत्यु से भयभीत रहता है। परंतु उत्तम पुरुष को अपमान से ही भय रहता है।
3.शराब पीने का नशा आदमी पढ़ चढ़ता है किंतु वैभव और संपत्ति का नशा तो बहुत ही बुरा है क्योंकि उसके मद में आदमी अपना होश खोकर धर्म से भ्रष्ट हो जाता है।
4.जिस मनुष्य की इद्रियां अपने वश में नहीं होने के कारण विषय में रमती हैं वह इस संसार में भांति भांति के कष्ट पाता है, जैसे सूर्य आदि ग्रहों से नक्षत्र कष्ट पाते हैं।
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Wednesday, July 30, 2008

संत कबीर वाणी:मसखरों को साधू न समझें

कबीर कलियुग कठिन हैं, साधू न मानै कोय
कामी क्रोधी मसखरा तिनका आदर होय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अब इस घोर कलियुग में कठिनाई यह है कि सच्चे साधू को कोई नहीं मानता बल्कि जो कामी, क्रोधी और मसखरे हैं उनका ही समाज में आदर होने लगा है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अगर हम कबीरदास जी के इस कथन के देखें तो हृदय की पीडा कम ही होती है यह सोचकर कि उनके समय में भी ऐसे लोग थे जो साधू होने के नाम पर ढोंग करते थे। हम अक्सर सोचते हैं कि हम ही घोर कलियुग झेल रहे हैं पर ऐसा तो कबीरदास जी के समय में भी होता था। धर्म प्रवचन के नाम पर तमाम तरह के चुटकुले सुनकर अनेक संत आजकल चांदी काट रहे हैं। कई ने तो फाईव स्टारआश्रम बना लिए हैं और हर वर्ष दर्शन और समागम के नाम पर पिकनिक मनाने तथाकथित भक्त वहाँ मेला लगाते हैं। सच्चे साधू की कोई नहीं सुनता। सच्चे साधू कभी अपना प्रचार नहीं करते और एकांत में ज्ञान देते हैं और इसलिए उनका प्रभाव पड़ता है। पर आजकल तो अनेक तथाकथित साधू-संत चुटकुले सुनाते हैं और अगर अकेले में किसी पर नाराज हो जाएं तो क्रोध का भी प्रदर्शन करते हैं। उनके ज्ञान का इसलिए लोगों पर प्रभाव नहीं पड़ता भले ही समाज में उनका आदर होता हो।
अनेक कथित संत और साधु अपने प्रवचनों के चुटकलों के सहारे लोगों का प्रभावित करने का प्रयास करते हैं। लोग भी चटखारे लेकर अपने दिल को तसल्ली देते हैं कि सत्संग का पुण्य प्राप्त कर रहे हैं। यह भक्ति नहीं बल्कि एक तरह से मजाक है। न तो इससे मन में शुद्धता आती है और न ज्ञान प्राप्त होता है। सत्संग करने से आशय यह होता है कि उससे मन और विचार के विकार निकल जायें और यह तभी संभव है जब केवल अध्यात्मिक ज्ञान की चर्चा हो। इस तरह चुटकुले तो मसखरे सुनाते हैं और अगर कथित संत और साधु अपने प्रवचन कार्यक्रमों में सांसरिक या पारिवारिक विषय पर सास बहु और जमाई ससुर के चुटकुले सुनाने लगें तो समझ लीजिये कि वह केवल मनोरंजन करने और कराने के लिये जोगी बने है। ऐसे में न तो उनसे लोक और परलोक सुधरना तो दूर बिगड़ने की आशंका होती है।
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Tuesday, July 29, 2008

विदुर नीतिःबुद्धिमान की होती हैं बाहें लंबी

1.बुद्धिमान मनुष्य की कहीं निंदा कर यह नहीं सोचना चाहिए कि अब निश्चित हो गये। बुद्धिमान की बाहेंे लंबी होती हैं और निंदा करने या सताये जाने वह उन्हीं बाहों से बदला लेता है।
2. जो विश्वास पात्र नहीं है उस पर तो कभी विश्वास करना ही नहीं चाहिए पर जिस पर किया जा सकता है उस पर भी अधिक विश्वास नहीं करना चाहिए।
3.वैसे तो सभी को ईष्यारहित, स्त्रियों की रक्षा करने वाला, संपत्ति का न्याय करने वाला, प्रियवचन बोलने वाला, स्वच्छ तथा स्त्रियों से मधुर बोलने वाला होना चाहिए पर किसी के वश में कभी नहीं होने से सभी को बचना चाहिए।

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Monday, July 28, 2008

संत कबीर वाणीः भक्त के लिये देह होती है विदेश समान

तीन गुनन की बादरी, ज्यों तरुवर की छांहि
बाहर रहै सो ऊबरै, भींजै मन्दिर मांहि

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि इस त्रिगुणमयी बादलों की माया भी वैसे ही जैसे वृक्ष की छाया जो कभी स्थिर नहीं रहती। इस दुनियां में उसी व्यक्ति का उद्धार हो सकता है जो इसमें हृदय से लिप्त नहीं होता।

पंछि उड़ानी गगन को, पिंड रहा परदेस
पानी पीया, चोंच बिन, भूलि गया वह देस

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं जब अपना हृदय भगवान में लग जाता है शरीर भी एक तरह से विदेश की तरह लगता है। जब मनुष्य ध्यान और स्मरण के द्वारा परमात्मा की अनुभूति का रस बिना चोंच के पीने लगता है तब वह इस शरीर का भूल जाता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-सात्विक, राजस और तमास इन तीन गुणों की माया में यह संसार बसा हुआ है। इन तीनों गुणों से पर होकर परमात्मा में मन लगाने वालों को इनसे कोई मतलब नहीं रहा जाता। इन तीनों के वशीभूत होकर कोई भी कर्म किया जाये वह सकाम होता है। इनके आधार पर की गयी भक्ति भी सकाम होती है। निष्काम भाव का आशय यही है कि इन तीनों गुणों से परे होकर केवल परमात्मा में मन लगाया जाये। इस संसार में देह है तो उसे जीवित रखने के लिये कार्य करना है यह जानते हुए ही जो कार्य करते हैं वही प्रसन्न रहता है। ‘यह देह मैं नहीं हूं, बल्कि परमात्मा का अंश आत्मा हूं’ यह भाव रखने वाला ही निष्काम भाव से इस संसार का आनंद उठा पाता है। उसके लिये यह देश ऐसे ही जैसे विदेश में रहना।

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Sunday, July 27, 2008

विदुर नीति;विद्वान पुरुष दूसरे के विषय में दखल नहीं देते

1.संपूर्ण भौतिक पदार्थों की वास्तविकता का जो ज्ञान रखता है तथा सभी कार्यों को संपन्न करने का ढंग तथा उसका परिणाम जानता है वही विद्वान कहलाता है।
2.जिसकी वाणी में वार्ता करते हुए कभी बाधा नहीं आती तथा जो विचित्र ढंग से बात करता है और अपने तर्क देने में जिसे निपुणता हासिल है वही पंडित कहलाता है।
3.जिनकी बुद्धि विद्वता और ज्ञान से परिपूर्ण है वह दुर्लभ वस्तु को अपने जीवन में प्राप्त करने की कामना नहीं करते। जो वस्तु खो जाये उसका शोक नहीं करते और विपत्ति आने पर घबड़ाते नहीं हैं। ऐसे व्यक्ति को ही पण्डित कहा जाता है।
4.जो पहले पहले निश्चय कर अपना कार्य आरंभ करता है, कार्य को बीच में नहीं रोकता। अपने समय को व्यर्थ नहीं जाने देता और अपने चित्त को वश में रखता है वही पण्डित कहलाता है।
5.विद्वान पुरुष किसी भी विषय के बारे में बहुत देर तक सुनता है और तत्काल ही समझ लेता है। समझने के बाद अपने कार्य से कामना रहित होकर पुरुषार्थ करने के तैयार होता है। बिना पूछे दूसरे के विषय में व्यर्थ बात नहीं करता। इसलिये वह पण्डित कहलाता है।

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Saturday, July 26, 2008

विदुर नीति- अपने कार्य का मंत्र गुप्त रखना ही हितकर

1.जो कभी उद्दण्ड रूप नहीं बनाता, दूसरों के सामने अपने पराक्रम की प्रशंसा नहीं करता तथा क्रोध आने पर भी कटु वाणी में नहीं बोलता उसे सभी लोग प्यार करते हैं।
2.जो मनुष्य अपने शांति हुए वैर की अग्नि फिर से प्रज्जवलित नहंी करता, जिसमें कोई गर्व का भाव नहंी हैं और जो अपने कर्तव्य को विपत्ति नहीं समझता वही सर्वश्रेष्ठ मनुष्य है।
3.जो अपने सुख में प्रसन्न नही होता और दूसरे के दुःख में हर्ष नहीं करता और अपना दान करने के पश्चात अपने मन में संताप नहीं करता वह सदाचारी कहलता है।
4.जो अपने आश्रितों को बांटकर थोड़ा ही भोजन करता है, बहुत अधिक काम करके भी थोड़ा सोता है तथा मांगने पर जो मित्र न होने पर भी देता है उस मनस्वी मनुष्य को अनर्थ दूर से ही छोड़ देते हैं।
5.जिसके अपनी इच्छा के अनुसार दूसरों की इच्छा के विरुद्ध कार्य करने की तरीका दूसरे लोग नहीं जान पाते, तथा जो मनुष्य अपने मंत्र गुप्त रखते हुए अपना कार्य ठीक ढंग से करते हैं उनका कोई कुछ बिगाड़ नहीं पाता।

लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप

Friday, July 25, 2008

विदुर नीतिःदूसरे में दोष न देखने वाले की आयु बढ़ती है

1.मनुष्य मन, वाणी और कर्म से जिसका निरंतर चिंतन और उपयोग करता है कार्य उसे अपनी ओर खींच लेता है। इसलिये सदा ही कल्याण करने वाले विचार और कार्य करें।
2.संपूर्ण प्राणियों के प्रति कोमलता का भाव रखना, किसी गुणवान के दोष न देखना, क्षमाभाव, धैर्य और मित्रों का अपमान न करने जैसे गुणों का धारण करने से आयु बढ़ती है।
3.इंद्रियों को रोक पाना तो मृत्यु से भी अधिक कठिन है और उन्हें अनियंत्रित होने देना तो अपने पुण्य और देवताओं का नाश करना है।
4. जो अपने संभावित दुःख को का प्रतिकार करने का उपाय जानता है और वर्तमान में अपने कर्तव्य के पालने में दृढ़ निश्चय रखने वाला है और जो भूतकाल में शेष रह गये कार्य को याद रखता है वह मनुष्य कभी भी आर्थिक दृष्टि से गरीब नहीं रह सकता।
5.जो शक्तिहीन है वह तो सबके प्रति क्षमा का भाव अपनाये। जो शक्तिशाली है वही धर्म के लिए क्षमा करे तथा जिसकी दृष्टि में अर्थ और अनर्थ दोनों ही समान है उसके लिये तो क्षमा सदा ही हितकारिणी है।

संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Thursday, July 24, 2008

संत कबीर वाणीःकर्तापन का अहंकार राम की भक्ति में बाधक

पद गावै मन हरषि के, साखी कहै अनंद
राम नाम नहिं जानिया, गल में परिगा फंद

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि ऐसे कई लोग हैं जो प्रसन्न होकर भजन गाते है और साखी कहते हैं पर वह राम का नाम और उसका महत्व नहीं समझते। अतः उनके गले में मृत्यु का फंदा पड़ा रहता है।
राम नाम जाना नहीं, जपा न अजपा जाप
स्वामिपना माथे पड़ा ,कोइ पुरबले पाप

संत शिरोमणि कबीरदास जी कि मनुष्य ने राम का नाम जाना नहीं और कभी जपा तो कभी नहीं जपा। मन में अहंकार है और अपने स्वामी होने के अनुभव से मनुष्य पाप करता हुआ फिर उसके परिणाम स्वरूप दुःख भोगता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या- भगवान राम के चरित्र और जीवन पर व्याख्या करने वाले अनेक कथित संत और साधु हैं जो भक्तों को सुनाते हैं पर यह उनका व्यवसाय है। अनेक लोग भगवान राम के भजन गाते हैं। उनके वीडियो और आडियो कैसिट जारी होते हैं पर यह कोई उनके भक्ति का प्रमाण नहीं है। इस तरह कथायें सुना और भजन गाकर व्यवसायिक संत और गायक अपनी छबि एक भक्त के रूप में समाज में बना लेते हैं पर यह लोगों का भ्रम हैं। राम के चरित्र पर अनेक लोग अपने हिसाब से व्याख्यायें करते हैं पर वह भगवान श्रीराम के नाम का महत्व नहीं जानते। भगवान राम तो अपने भक्तों के हृदय में बसते हैं पर उनका नाम लेकर जो व्यापार करते हैं वह तो अपने अहंकार में होते हैं। दिखाने को कभी कभार वह भी भगवान का नाम लेते हैं पर वह उनके व्यवसाय का हिस्सा होता है। राम के नाम हृदय में धारण करने के बाद आदमी उसका दिखावा नहीं करता और वह इस संसार के दुःख से मुक्त हो जाता है। केवल जुबान लेने पर उसे हृदय में न धारण करने वाले तो हमेशा विपत्ति में पड़े रहते हैं क्योंकि उन्हें अपने कर्तापन का अहंकार होता है।
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Wednesday, July 23, 2008

संत कबीर वाणी-चिंतामणि ही चित्त में बसे तो चिंता किस बात की

हरिजन गांठि न बाधहीं, उदर समाना लेय
आगे पीछे हरि खड़े, जो मांगै सो देय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि कि परमात्म की सच्ची भक्ति करने वाले लोग कभी धन का संचय करने का विचार नहीं करते। अपनी भक्ति के कारण उनको यह दृढ़ विश्वास होता है कि उनके साथ तो हर जगह परमात्मा है जो उनक उदर की पूर्ति करता रहेगा।

चिन्तामनि चित में बसै, सोइ चित्त में आनि
बिना प्रभु चिन्ता करै, यह मूरख का बानि


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि सबकी चिंता करने करने वाले परमात्मा तो चित्त में बसते हैं और जो लोग उसका स्मरण न कर अपने जीवन की चिंता करते हैं वह तो निर्बुद्धि हैं।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-धन और वैभव तो एक माया का बहुत बृहद रूप है। धनी और प्रतिष्ठित लोगों को देखकर सभी उनका अनुकरण करना चाहते हैं पर यह संभव नहीं है। फिर भी लोग माया के पीछे लगे रहते हैं और अपने को ही दिखाने के लिये परमात्मा की भक्ति करते हैं पर उनकी यह भक्ति विश्वास रहित है क्योंकि वह अपने फल का दाता स्वयं ही को समझते है। कहीं किसी मूर्ति के सामने मत्था टेक दिया या कोई धार्मिक किताब ऊंची आवाज में पढ़ ली और फिर निकल पड़े इस मायावी संसार में तमाम तरह के छल कपट करने के लिये क्योंकि उनको इस बात का यकीन नहीं है कि सहजता पूर्वक श्रम करने पर स्वतः ही उदर पूर्ति के लिये धन प्राप्त हो जायेगा।

अनेक कथित साधु संत तो अपने भक्तों पर भक्ति की बरसात करते हैं पर अपने आश्रमों के लिये धन मांगना नहीं भूलते। इसे वह दान कहते हैं। इस दान का वह फिर दान करते हैं। इस मायावी संसार में ऐसे कथित संतों और भक्तों को देखकर यह कहा जा सकता है कि उनका परमात्मा में विश्वास नहीं है। कई कथित संत तो भंडारों आदि के लिये दान मांगते हैं और फिर वह दूसरे के भोजन के लिये अपने को निमित बनाने का प्रयास करते हैंं। वह यह दिखाते हैं कि देखो हमने दूसरे को भोजन करवाया। यह उनका ढोंग है। उनको तो केवल भक्ति का ही प्रचार करना चाहिए यह विचार कर कि सबका दाता तो वह परमात्मा है और सभी को भोजन करवाना चाहिए। इसके विपरीत वह दान का भी संग्रह करते और तमाम तरह के कार्यक्रम आयोजित कर अपने को दानी बताते हैं।
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दीपक भारतदीप, संकलक एवं संपादक

Tuesday, July 22, 2008

संत कबीर वाणी-ऊंच नीच की पहचान गुणों से होती है

ऊंची जाति पपीहरा, पिये न नीचा नीर
कै सुरपति को जांचई, कै दुःख सहै सरीर

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि पपीहरा तो एक तरह से ऊंची जाति का दिखता है जो कभी भी नीचे धरती पर स्थित जल का सेवन न कर स्वाति नक्षत्र क जल के लिये याचना देवराज इंद्र से याचना करता है या अपना जीवन त्याग देता है।

पड़ा पपीरा सुरसर, लागा बधिक का बान
मुख मूंदै सुरति गगन में, निकसि गये यूं प्रान


संत शिरामणि कबीरदास जी कहते है शिकारी का बाण लगने से पपीहा नदी में जा गिरा पर इसके बावजूद उसने वहां का जल ग्रहण नहीं किया और उसने अपना मूंह बंद कर ऊपर आकाश में ध्यान लगाया और अपने प्राण त्याग दिये।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-देश में ऊंच और नीच को लेकर सदैव विवाद होते रहे हैं। लोग जन्म के आधार पर अपने को ऊंचा और दूसरे को नीचा समझते हैं। यह एक भ्रम होता है। सच बात तो यह है कि आदमी की पहचान गुणों से है। ऊंची जाति में जन्म लेने के अहंकार में लोग यह मान लेते हैं कि हम जो कर रहे हैं वह ठीक है और वह व्यसनों और अपराधों की तरफ बढ़ जाते हैं। जबकि आदमी के गुण ही उसके ऊंची और नीच होने के प्रमाण हैं। गुणवान, धैर्यवान और शीलवान लोग बड़ी से बड़ी विपत्ति आने पर भी अपने नैतिक आचरण और सिद्धांतों का त्याग नहीं करते जबकि निम्न कोटि के लोग थोड़ी लालच और लोभ में अपना धर्म तक बेचने को तैयार हो जाते हैं। अतः जन्म के आधार पर अपनी जाति का गर्व करने की बजाय आत्म मंथन करते हुए गुणों के आधार पर ही अपने जीवन पथ पर अग्रसर होना चाहिए।
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दीपक भारतदीप, संकलक एंव संपादक

Monday, July 21, 2008

रहीम के दोहे-दुष्ट लोगों की संगत से लगता है कलंक

रहिमन उजली प्रकृति को, नहीं नीच को संग
करिया वासन कर गहे, कालिख लागत अंग

कविवर रहीम कहते हैं कि जिनकी प्रवृत्ति उजली और पवित्र है अगर उनकी संगत नीच से न हो तो अच्छा ही है। नीच और दुष्ट लोगों की संगत से कोई न कोई कलंक लगता ही है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-सज्जन और उज्जवन प्रकृति के लोग शांत रहते हैं इसलिये उनको ऐसे लोगों की संगत नहीं करना चाहिये जो दुष्टता और अशांत प्रवृत्ति के होते हैं। वैसे आजकल के लोगों में यह प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है कि वह दलाल और दादा प्रवृत्ति के लोगों की संगत चाहते हैं ताकि कोई उनका कोई बिगाड़ नहीं सके। फिल्म देखकर यह धारणा बना लेते हैं कि दादा लोग किसी से किसी की भी रक्षा कर सकते हैं। कई सज्जन परिवार को लड़के भी भ्रमित होकर दादा किस्म के लड़कों के चक्कर में पड़ जाते हैं तो कई लड़कियां भी अपने लिये ऐसे मित्र चुनती है जो दादा टाईप के हों। उनको लगता है कि वह दादा किस्म के मित्र इस समाज में प्रतिष्ठित होते हैं। देश में इसलिये ही सभी जगह अपराधीकरण का बोलबाला हो रहा है क्योंकि जो उज्जवल और शांत प्रकृत्ति के हैं वह अपना विवेक खोकर ऐसे लोगों को संरक्षण देते हैं जो समाज के लिये खतरा है।

यह बात समझ लेना चाहिये कि बुरे का अंत बुरा ही होता है। दादा और दलाल आकर्षक लगते हैं पर उनकी समाज में कोई सम्मान नहीं होता। बुराई का अंत होता है और ऐसे में जो दुष्ट लोगों की संगत करते हैं उनको भी दुष्परिणाम भोगना पड़ता है।

संत कबीर वाणी:दूसरे की पीडा न समझे वह मूर्ख

पीर सबन की एकसी, मूरख जाने नांहि
अपना गला कटाक्ष क, भिस्त बसै क्यौं नांहि


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि सभी मनुष्यों की पीड़ा एक जैसी होती है पर मूर्ख लोग इसे नहीं समझते। ऐसे अज्ञानी और हिंसक लोग अपना गला कटाकर स्वर्ग में क्यों नहीं बस जाते।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-इस दोहे में अज्ञानता और हिंसा की प्रवृत्ति वाले लोगों के बारे में बताया गया है कि अगर किसी दूसरे को पीड़ा होती है तो अहसास नहीं होता और जब अपने को होती है तो फिर दूसरे भी वैसी ही संवेदनहीनता प्रदर्शित करते हैं। अनेक लोग अपने शौक और भोजन के लिये पशुओं पक्षियों की हिंसा करते हैं। उन अज्ञानियों को यह पता नहीं कि जैसा जीवात्मा हमारे अंदर वैसा ही उन पशु पक्षियों के अंदर होता है। जब वह शिकार होते हैं तो उनके प्रियजनों को भी वैसा ही दर्द होता है जैसा मनुष्यों के हृदय में होता है। बकरी हो या मुर्गा या शेर उनमें भी मनुष्य जैसा जीवात्मा है और उनको मारने पर वैसा ही पाप लगता है जैसा मनुष्य के मारने पर होता है। यह अलग बात है कि मनुष्य समुदाय के बनाये कानून में के उसकी हत्या पर ही कठोर कानून लागू होता है पर परमात्मा के दरबार में सभी हत्याओं के लिऐ एक बराबर सजा है यह बात केवल ज्ञानी ही मानते हैं और अज्ञानी तो कुतर्क देते हैं कि अगर इन जीवो की हत्या न की जाये तो वह मनुष्य से संख्या से अधिक हो जायेंगे।

आजकल मांसाहार की प्रवृत्तियां लोगोंे में बढ़ रही है और यही कारण है कि संवदेनहीनता भी बढ़ रही है। किसी को किसी के प्रति हमदर्दी नहीं हैं। लोग स्वयं ही पीड़ा झेल रहे हैं पर न तो कोई उनके साथ होता है न वह कभी किसी के साथ होते हैं। इस अज्ञानता के विरुद्ध विचार करना चाहिये ।

Sunday, July 20, 2008

संत कबीर वाणीः गाय गंदगी खाने लगे तो समझ लो कलियुग आ गया

छाजन भोजन हक्क है, और अनाहक लेय
आपन दोजख जात है, औरों दोजख देय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि प्रत्येक मनुष्य को जीवन निर्वाह के लिये वस्त्र और भोजन पाने का अधिकार है पर जो अनुचित रूप से अपेय या नशीले पदार्थ लेता है उसे नरक में जाना पड़ता है।

गऊ जो विष्ठा भच्छई, विप्र तमाखू भंग
सस्तर बांधे दरसनी, यह कलियुग का रंग

संत कबीर दास जी कहते हैं कि जब गाय गंदगी खाने लगे, विद्वान अनेक प्रकार के व्यसर करने लगे और जब दर्शन करने वाले साधु अस्त्र-शस्त्र बांधने लगे तब समझ लो घोर कलियुग आ गया।

मद तो बहुतक भांति का, ताहि न जानै कोय
तनमद, मनमद जातिमद, मायामद सब लोय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मद तो बहुत प्रकार का होता है पर सभी इस बात को नहीं जानते। यह मद हैं शरीर, मन, जाति और माया का मद।

Saturday, July 19, 2008

रहीम के दोहे-अपने कार्य और व्यवहार में अति न कीजिये

रहिमन अति न कीजिए, गहि रहिए निज कानि
सैंजन अति फूलै तऊ, डार पात की हानि

कविवर रहीम कहते हैं कि कभी भी किसी कार्य और व्यवहार में अति न कीजिये। अपनी मर्यादा और सीमा में रहें। इधर उधर कूदने फांदने से कुछ नहीं मिलता बल्कि हानि की आशंका बलवती हो उठती है

यही रहीम निज संग लै, जनमत जगत न कोय
बैर प्रीति अभ्यास जस, होत होत ही होय


कविवर रहीम कहते हैं कि प्रीति, अभ्यास और प्रतिष्ठा में धीरे धीरे ही वृद्धि होती है। इनका क्रमिक विकास की अवधि दीर्घ होती है क्योंकि यह सभी आदमी जन्म के साथ नहीं ले आता। इन सभी का स्वरूप आदमी के व्यवहार, साधना और और आचरण के परिणाम के अनुसार उसके सामने आता है।

Friday, July 18, 2008

संत कबीर वाणी-शिष्यों से पांव पुजवाने वाले गुरुओं की दीक्षा से मुक्ति नहीं

सूर लड़ै गुरु दाव से, इक दिस जूझन होय
जूझै बीना सूरमा भला न कहसी कोय


संत शिरोमणि कबीरदास जी के अनुसार जो शूरवीर होता है वह अपने गुरु के बताये ज्ञान के अस्त्र शस्त्र से इस जीवन संघर्ष में जूझता है। जब तक कोई इस संघर्ष में लड़ने के लिये मैदान में नही उतरता वह साहसी नहीं कहलाता।

पांव पुजावे बैठि के, भखै मांस मद दोय
तिनकी दीच्छा मुक्ति नहिं, कोटि नरक फल होय


संत शिरोमणि कबीर दास जी के अनुसार ऐसे गुरु जो बैठकर केवल अपने शिष्यों से पांव पुजवाते हैं उनकी दीक्षा से कभी मुक्ति नहीं हो सकती बल्कि करोड़ों और नरक भोगने पड़ते हैं।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-गुरु से शिक्षा ्रपाप्त करने के बाद मनुष्य को जीवन संघर्ष में लड़ने के लिये उतरना चाहिए। यह संघर्ष दैहिक और मानसिक दोनों स्तरों पर होता है। दैहिक से आशय यह है कि मनुष्य को अपने रोजगार आदि के लिये कार्य करना पड़ता है जिसमें उसे नैतिक आचरण और ईमानदारी से जुटना चाहिए। अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण करते हुए मीठी वाणी बोलना, किसी के कटु बोलने पर भी क्रोध न करना, परोपकार करना और सहज भाव से सभी के प्रति समान भाव रखने के साथ बुरा समय आने पर विचलित न होना आदमी के मानसिक रूप से पुख्ता होने का प्रमाण है। यह किसी सद्गुरू की शिक्षा से सहज और संभव हो जाता है।

जो गुरु शिक्षा देने के बाद अपने शिष्य को अपने से अलग न कर अपने पास ही बुलाते रहते हैं वह गुरु नहीं है बल्कि व्यवसायी है। वह अपने पास शिष्य को बुलाकर उससे अपनी सेवा कराते हैं। ऐसे गुरु तो कभी ज्ञानी नहीं होते बल्कि उनकी संगत करने से इस धरती के अलावा परलोक में भी नरक भोगना पड़ सकता है। गुरु का कार्य है कि वह अध्यात्म की शिक्षा देकर अपने शिष्य को अपने से अलग कर दूसरे शिष्यों को शिक्षा देने का काम शुरू करे अगर वह ऐसा नहीं करता तो इसका आशय यह है कि वह दिखावटी ज्ञानी है। अध्यात्म शिक्षा देने और प्राप्त करने का उद्देश्य यही है कि मनुष्य अपने जीवन संघर्ष में आगे बढ़ता जाये न कि वह बार-बार गुरु के सेवा में लौटकर आये। जब तक वह शिक्षा प्राप्त कर रहा है तभी तक उसका कर्तव्य है कि वह गुरु की सेवा करे और बाद में दक्षिणा देकर चला जाये न कि केवल गुरु की प्रदक्षिणा कर अपना जीवन नष्ट करता रहे।

Thursday, July 17, 2008

संत कबीर वाणीःजिसने घड़े जैसा मुख दिया वह दाना भी देता है

भूखा भूखा क्या करै, कहा सुनावै लोग
भांड़ा घडिया मुख दिया, सोही पूरन जोग

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं अपने भूख के बारे में दूसरे लोगों को बताने से क्या लाभ? जिस परमात्मा ने घड़े जैसा मुख दिया है वह उसकी भूख की पूर्ति के लिये भोजन भी देगा-इस बात पर विश्वास करना चाहिए।

सिरजन हारे सिरजिया, आटा पानी लीन
देनेहारा देत है, मेटनहारा कौन

संत कबीरदास जी कहते हैं कि इस संसार के सृजनकर्ता परमात्मा ने सबके लिये व्यवस्था की है। वह सभी को आटा पानी और नमक देने वाले हैं। उनकी व्यवस्था को मिटाने वाला कोई नहीं है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-परमात्मा ने सभी जीवों को मुख दिया है तो भोजन की व्यवस्था भी की है, पर आदमी है कि अपनी समस्याओं को रोना दूसरे लोगों के सामने रोता रहता है। इस तरह सभी मनुष्य एक दूसरे की हंसी उड़ाते हैं। मनुष्य तो अपना पूरा जीवन कमाते, खाते और रोते बिता देता है। इस सृष्टि में खाने के मुख हैं तो उसको भरने के लिये परमात्मा ने अन्न, जल और नमक का इंतजाम भी कर दिया है पर आदमी का मन नहीं भरता। वह हमेशा अपने जीवन में कभी भूखों मरने की आशंका से संचय करता जाता है। उसका यह भय कभी समाप्त नहीं होता और संचय की लालसा उसे गोल गोल केवल धन के आसपास घुमाने लगती है। यह भाग्यवादी विचार धारा नहीं है कि परमात्मा ने सभी के खाने का प्रबंध कर दिया है तो उसे फिर कर्म करने की क्या आवश्यकता है?बल्कि अपना कर्म करते हुये यह विश्वास करना चाहिए कि कर्ता तो वह परमात्मा है जिसने यह जीवन दिया है। मनुष्य ने देह प्राप्त तो की है पर अपने मन की लालसाओं के कारण वह धन संग्रह से आगे विचार नहीं करता और अपना पूरा जीवन नष्ट कर देता है। सभी अपना सांसरिक दुःखों का रोना एक दूसरे के सामने रोते हैं जैसे कि वह कर्ता हों। इस तरह सभी एक दूसरे का उपहास भी उड़ाते हैं।

Wednesday, July 16, 2008

संत कबीर वाणी-नाचते और गाते हुए भक्ति नहीं हो सकती

कबीर तृस्ना टोकना, लीये, डोलै स्वाद
राम नाम जाना नही, जनम गंवाया बाद

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मन की तृष्णा तो आदमी को अपने स्वाद के लिये इधर उधर भटकाती है। वह राम का नाम को नहीं जानती और आदमी उसकी संतुष्टि में अपना जीवन व्यर्थ कर देता है।

नाचे गावै पद कहै, नाहीं गुरु सों हेत
कहैं कबीर क्यों नीपजै, बीच बिहुला खेत


संत कबीर दास जी कहते हैं कि कुछ लोग नाचते और गाते हुए भक्ति में लीन होने का अपना अहंकार होने का का प्रदर्शन करते हैं उनका वास्तव में परमात्मा के प्रति प्रेमभाव नहीं होता। वह तो ऐसे खेत की तरह हैं जिनमें भक्ति के बीज बोए हीं नहीं नहीं गये। इसलिये उनका जीवन सफल नहीं हो सकता।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-अनेक गुरुओं के सत्संग में प्रवचन के दौरान ही लोग भजन के समय नाचते और गाते यह बताने का प्रयास करते हैं कि वह भगवान की भक्ति में लीन है। गुरु भी यह सोचकर प्रसन्न होते हैं कि इस तरह तो उनकी शक्ति का प्रचार हो रहा है। यह दिखावा है। भक्ति और ज्ञान दिखाने की चीज नहीं होती। उनका प्रभाव तो आदमी के चेहरे से दिखने लगता है। भक्ति एकांत साधना है और इस तरह जो लोग सबके सामने नाचते और गाते हैं वह केवल अहंकार के वशीभूत होकर नाचते हैं जैसे कि वह भक्ति कर रहे हैं जबकि उनका पूरा ध्यान इस तरफ होता है कि वह लोगों को अपनी तरफ आकर्षित करें। मन में परमात्मा का ध्यान हो तो आदमी स्थिर हो जाता है इस तरह नाचता गाता नहीं है।

अपने प्रति लोगों में रुझान पैदा करने की तृष्णा उनके अंदर होती है और वह उन्हें भक्ति के नाम पर ऐसे नाटक करने को प्रेरित करती है। वह वास्तव में परमात्मका का नाम नहीं लेते बल्कि अपने अंदर स्थित अहंकार का प्रदर्शन करते हैं। लोगों में आकर्षण का कें्रद बने रहने की तृष्णा की वजह से कई लोग भक्ति का दिखावा करते है। इतना ही नहीं वह यह भी साबित करने का प्रयास करते हैं कि जैसे बहुत बड़े ज्ञानी हों। सच्ची भक्ति तो केवल एकांत में भी संभव है और ज्ञानी आदमी कभी अपने ज्ञान का बिना वजह प्रदर्शन नहीं करते।

Tuesday, July 15, 2008

संत कबीर वाणी:दूसरे से आशा करने पर होता है अपमान

आस आस घर घर फिरै, सहै दुखारी चोट
कहैं कबीर भरमत फिरै,ज्यों चैसर की गोट

संत शिरोमणि कबीरदास कहते हैं कि अपने हृदय मं आशा कर मनुष्य घर घर भटकता है पर पर उसे दूसरे के मुख से अपने लिये अपमान के वचन सुनने पड़ते हैं। केवल आशा पूरी होने के लिये अपनी अज्ञानता के कारण मनुष्य चैसर के गोट की तरह कष्ट उठाता है।
आशा तृस्ना सिंधु गति, तहां न मन ठहराय
जो कोइ आसा में फंसा, लहर तमाचा खाय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं आशा और तृष्णा और समुद्र की लहरों के समान है हो उठती और गिरती हैं जो मनुष्य इसके चक्कर में फंसता है वह इसके तमाचा खाता रहता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-अपना हर कार्य अपने ऊपर ही रखना चाहिए। इस सांसरिक जीवन में सारे कार्य अपने नियत समय पर होते हैं और मनुष्य को केवल निष्काम भाव से कार्य करते हुए ही सुख की प्राप्त हो सकती हैं। श्रीगीता में निष्काम भाव से कार्य करने का उपदेश इसलिये दिया गया है। यह संसार अपनी गति से चल रहा है और उसमें सब कर्मों का फल समय पर प्रकट होता। मनुष्य सोचता है कि मैं इसे चला रहा हूं इसलिये वह अपने ऐसे कार्यों के लिये दूसरों से आशा करता है जो स्वतः होने हैं और अगर मनुष्य उसके लिये अपने कर्म करते हुए परिणाम की परवाह न करे तो भी फलीभूत होंगे। जब अपने आशा पूर्ति के लिये आदमी किसी दूसरे घर की तरफ ताकता है तो उसे उसे अपना आत्मसम्मान भी गिरवी रखना पड़ता है। वैसे अपना कर्म करते जाना चाहिये क्योंकि फल तो प्रकट होगा ही आखिर वह भी इस संसार का एक ही भाग है। आशा और कामना का त्याग कर इसलिये ही निष्काम भाव से कार्य करने का संदेश दिया गया है।

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