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Saturday, January 3, 2015

विश्व रत्न राजकीय सम्मान से सुशोभित नहीं होते-हिन्दी चिंत्तन लेख(vishwa ratna rajkiya samman se sushobhit nahin hote-hindi thought article)



            यह विचित्र बात है कि जब भी किसी शासकीय पुरस्कार की बात आती है विवाद प्रारंभ हो जाते हैं। देश में केंद्र तथा राज्य सरकारें साहित्य कला तथा खेल के क्षेत्र में पुरस्कार देती रहती हैं।  यह पुरस्कार सम्मानीय लोगों को उनके क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के रूप में दे दिया जाता है-सिद्धांतः ऐसा माना जाता है। यह अलग बात है कि बाद में उन पर अनेक प्रकार के विवाद प्रारंभ हो जाते हैं। हमारे यहां अनेक निजी प्रतिष्ठानों की तरफ से भी प्रदान किये जाने वाले-खासतौर से साहित्य और पत्रकारिता के पुरस्कार-विशुद्ध रूप से प्रबंध कौशल से निर्धारित होते हैं।
            सात वर्ष पूर्व हमारे अध्यात्मिक ब्लॉग पर एक बार एक ब्लॉग मित्र ने टिप्पणी करते हुए कहा था कि मनुस्मृति पर लिखने के बाद यह आशा आप कभी न करें कि आपका कभी सम्मान नहीं होगा।  हमें हसंी आ गयी।  जब युवावस्था में लिखते थे तो सम्मान की चाह होती थी पर अंतर्जाल पर लिखना प्रारंभ करते समय सम्मान का मोह समाप्त हो चुका था।  हम तो यही मानकर चलते हैं कि दो लोग भी हमारा पढ़कर प्रसन्न हुए तो वही हमारा सम्मान है।  स्थानीय स्तर पर हमसे सम्मान लेने के सर्शत प्रस्ताव आये पर उनमें हमारी रुचि नहीं रही।  इधर अध्ययन चिंत्तन और मनन की सतत प्रक्रिया के साथ ही योगाभ्यास ने हमारे इस दृष्टिकोण को मजबूत कर दिया कि हमारी अपनी सोच भी कम अनोखी नहीं है।  यह लेख हम आत्मप्रवंचन के लिये नहीं लिख रहे वरन् अभी भारत रत्न के लिये श्रीअटल बिहारी वाजपेयी और श्री मदन मोहल मालवीय का नाम चयनित होने पर विवाद हो रहा है।  इस पर जारी चर्चाओं में अनेक लोग कुछ ऐसे महापुरुषों को भारत रत्न न देने पर प्रश्न उठा रहे हैं जो विश्व रत्न हैं-यथा, श्रीगुरू नानक देव, संत कबीर, कविवर रहीम, संत विवेकानद आदि। इस पर केवल हंसा ही जा सकता है।
            वैसे तो श्रीअटल बिहारी वाजपेयी और स्वर्गीय मदन मोहन मालवीय को भारत रत्न का विरोध करना ही नहीं चाहिये अगर करना ही है तो ऐसे महापुरुषों का नाम नहीं लेना चाहिये जिनकी छवि अध्यात्मिक रूप से इतनी उज्जवल हो कि उन्हें पूरा विश्व ही रत्न मानता है।  इस चर्चा में प्रगतिशील और जनवादी विद्वानों का दर्द सामने आ ही गया है क्योंकि उनकी दृष्टि से यह दोनों महानुभाव दक्षिणपंथियों के नायक हैं। उनके लिये सबसे ज्यादा दर्दनाक तो इनके साथ जुड़े हिन्दु तत्व जुड़ा होना है जिसे दक्षिण पंथ का पर्याय माना जाता है।  यही वजह है कि कथित प्रगतिशील और जनवादी विद्वानों में मन में यह टीस तो होगी कि आगामी पांच वर्ष उन्हें अपनी विचारधारा के लिये केंद्रीय सम्मान की आशा छोड़नी पड़ेगी। यह टीस उनके रचनाकर्म को प्रभावित कर सकती है क्योंकि निष्काम कर्म के सिद्धांत की उनको समझ नहीं है जो कि श्रीमद्भागवत गीता उनकी दृष्टि से अध्ययन के लिये वर्जित ग्रंथ है।
            माननीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी हमारे ग्वालियर शहर में ही जन्मे हैं इस कारण उनसे हमारा स्वाभाविक लगाव है।  बाल्यकाल में हमने जिन दो नेताओं का नाम हमने सुना था उनमें एक थे स्वर्गीय प्रधान मंत्री श्री जवाहर लाल नेहरु अैार जनसंघ के नेता श्री अटल बिहारी वाजपेयी।  श्री लालकृष्ण आडवाणी के हम सहभाषी जातीय समुदाय से हैं पर उनका  नाम कम से कम दस वर्ष बाद सुना था। हमारे कुल परिवार के सभी वरिष्ठ सदस्य अटल बिहारी का नाम श्रद्धा से लेते थे।  अनेक लोगों को यह भ्रम है कि सिंधी भाषी होने के कारण इस भाषा जाति के सदस्य इन दोनों महानुभावों की पार्टी के समर्थक रहे हैं पर ऐसी सोच अज्ञान का प्रमाण ही है। यही कारण है कि हम जातिवाद के आधार पर किसी समीकरण पर विचार नहीं करते जैसा कि दूसरे लोग बताते हैं। दरअसल अटल बिहारी की भाषण शैली ऐसी रही है कि उनको किसी भी जाति या भाषा के लोग आत्मीय समझने लगते हैं और यही गुण उनको रत्न रूप प्रदान करता है।



दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
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2.शब्दलेख सारथि
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Friday, December 26, 2014

कथित धर्मों की छतरी के नीचे मनुष्य एकता का दिखावा-हिंदू चिन्तन लेख(kathit dharmon kee chhatri ke neeche manushya ekta kadikha-hindu religion thought)



            पेशावर में सैन्य स्कूल पर हमले में घायल एक बालक ने पलंग पर सोते हुए दिये गये साक्षात्कार में कहा-‘‘मैं बदला लूंगा। उनकी पूरी नस्ल मिटा दूंगा।
            वह बालक था जिसमें ऐसे विचार आप नहीं आ सकते।  उसके विचारों में कहीं न कहीं उसके परिवार की सोच परिलक्षित हो रही थी। तय बात है कि उसके माता पिता, दादा दादी, नाना नानी अथवा चाचा चाची में किसी विशेष नस्ल के प्रति दुराग्रह रहा होगा जो उसकी जुबान में प्रकट हो रहा था।  जब वह नस्ल मिटाने की बात कर रहा था तो वह जानता था कि वह जिन्होंने उस पर हमला किया वह किसी दूसरी नस्ल जाति, भाषा या क्षेत्र से जुड़े हैं।  भारतीय प्रचार माध्यम तथा यहां के विद्वान उसके इस वचन से दृष्टि ज्यादा देर तक नहीं रख पाये पर सच यह है कि धार्मिक विचाराधाराऐं क्षेत्र, जाति, भाषा तथा व्यवसायिक आधारों पर बने सामाजिक उपविभाजनों की सत्यता से परे नहीं ले सकीं हैं यह अब प्रमाणित हो गया है।
            मध्य एशिया में आतंकवादियों से निकाह न करने पर 150 महिलाओं को मार दिया गया।  यह खबर पाकिस्तान के पेशावर में आतंकी हमले में 141 बच्चों को मारने की घटना के तत्काल बाद हुई।  दोनों ही घटनाओं में मरने और मारने वाले एक ही धार्मिक विचाराधारा से जुड़े थे-यह तथ्य सतही बौद्धिक चिंत्तन करने वालों के लिये महत्वपूर्ण नहीं हो सकता पर तत्व ज्ञान के साधक इसमें बहुत कुछ देख सकते हैं।  कथित धार्मिक विचाराधाराऐं आकाश से प्रकट बताकर लोगों पर थोपी जाती हैं जबकि धरती पर रहने वाले सभी जीवों की मानसिकता दूसरी होती है।  हम कहते हैं कि सर्वशक्तिमान ने संसार बनाया है तो याद रखें उसने यहां विभिन्न प्रकार के जलचर, नभचर और थलचर जीवों की रचना की है। आकाश में उड़ने वाले सभी कबूतर नहीं होते वरन, कौआ, चिड़िया, गिद्द तथा उल्लू भी होते हैं। सभी धरती पर आते हैं।  जलचरों में मगरमच्छ भी होते हैं तो मछलियां भी वहां विचरती हैं। जलचर भी कभी धरती पर चले आते हैं।  थलचरों को धरती पर विचरना ही है पर उनमें भी नस्ल होती है-गोरे, काले और गेहुए रंग के चेहरे ही नस्ल की पहचान होते हैं यह आवश्यक नहीं है।  वरन् जलवायु से भी उनमें नस्लीय वैविधता आती है जिसे जानने के लिये तत्व ज्ञान और विज्ञान के सूत्रों की जरूरी है।
            दो नस्लें तो स्पष्ट रूप से ही होती हैं-असुर और दैवीय।  उसके बाद जलवायु के आधार पर विभाजन होते हैं। फिर भाषा, जाति, तथा क्षेत्र के विभाजन भी सामने आते हैं।  कृत्रिम धार्मिक विचाराधाराओं के आधार पर मनुष्य जाति को समूहबद्ध करने की योजनायें काम नहीं करतीं यह अब तय हो गया है। हम यहां धार्मिक विचारधाराओं के आधार पर समूहों को देखने की कोशिश की चर्चा कर रहे हैं जिनके आधार पर मनुष्य समाज को संचालित करने के प्रयास नाकाम हो चुके हैं।  इसके विपरीत इन धार्मिक विचाराधाराओं की रेत में आज के विद्वान शुतुरमुर्ग की तरह  नस्लीय अहंकार की वजह से चल रहे संघर्षों से मुंह छिपा रहे हैं।
            प्रचार माध्यमों में हमलावरों के घटना से पूर्व का चि़त्र देखने से पता चलता है कि वह पाकिस्तान की कथित आधुनिक सभ्रांत सभ्यता से अलग वह प्राचीन पद्धति से जीने वाले लोग हैं। कहने को वह भी पाकिस्तान की राजकीय तौर से मान्यता प्राप्त धार्मिक विचाराधारा को मानने वाले थे पर कहीं न कहीं उनके अंदर अपने साथ अन्याय, भेदभाव तथा सामान्य जीवन सुविधाओं के अभाव के प्रति एक असंतोष था जो इस हमले में रूप में प्रकट हुआ। हमलावरों के समर्थक कहते हैं कि यह वजीरिस्तान में में पाक सेना की हमले का जवाब हैं जिसमें हमारे बच्चे मर रहे हैं।  स्पष्टतः पाकिस्तान के दूर दराज के उन इलाकों पर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की नजर नहीं गयी जहां पाकिस्तान का पंजाब में रहने वाला सभ्रांत वर्ग अपना सम्राज्य बनाये रखने के लिये अपनी शक्ति का उपयोग धर्म तथा राज्य के नाम पर कर रहा है। पाकिस्तान में एक तरह से नस्लीय युद्ध चल रहा है।  अगर बालक किसी नस्ल को मिटाने की बात कर रहा है तो कहीं न कहीं वह समूचे पाकिस्तान के सभ्रांत वर्ग मे मौजूद विचार को ही प्रकट कर रहा है जिसके अंदर नस्लीय भाव मौजूद है।
            इससे एक बात तय हो गयी कि मनुष्य की दैहिक आवश्यकताओं की पूर्ति उसका सबसे बड़ा ध्येय होता है। उसमें बाधा पड़ने पर उसमें नाराजगी आती है और तब वह प्रतिकूल होकर कदम उठाता ही है।  भारतीय अध्यात्मिक दर्शन में मनुष्य की पहचान बताई गयी है।  यही कारण है कि विश्व में सत्य की निकट सबसे अधिक हमारी ही विचाराधारा मानी जाती है। पाकिस्तान का अस्तित्व चूंकि भारत और यहां से प्रवाहित धर्मों का विरोध पर ही टिका है इसलिये उससे किसी सार्थक बदलाव की आशा करना ही व्यर्थ है। वैसे भी पाकिस्तान एक देश नहीं वरन् विभिन्न नस्लीय समुदायों और भाषाओं के समूहों पर टिका है जिसने धार्मिक विचाराधारा के आधार पर एकरूप बनने का निरर्थक प्रयास किया है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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Sunday, November 9, 2014

रैगिंग की प्रथा भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के प्रतिकूल-हिन्दी चिंत्तन लेेख(raiging ki pratha bhartiya adhyatmik darshan ki pratikul-hindi thought article)



      भारत में अंग्रेजी शिक्षा पद्धति अपनाये जाने के बाद समाज के कथित सभ्रांत ने समूह  रहन सहन और खान पान में ऐसी परंपराओं को जन्म दिया है जो उसे सामान्य लोगों से अलग करती है। एक तरह से कहा जाये तो धनिक वर्ग ने सामान्य समाज में सभ्रांत दिखने के लिये पाश्चात्य परंपराओं को इसलिये नहीं अपनाया कि वह वास्तव में सभ्य है वरन् स्वयं को श्रेष्ठ दिखने क्रे लिये उन्होंने वह अतार्किक व्यवहार अपनाया है जिसके औचित्य वर सामान्य लोग कुछ कह नहीं पाते।  इन्हीं परंपराओं में एक प्रथा है रैगिंग परंपरा जिसका निर्वाह विद्यालयों, महाविद्यालयों और छात्रावासों में वरिष्ठ छात्र कनिष्ठों को परेशान करने के लिये करते हैं।  यह परंपरा पहले भी थी पर उसका रूप इतना निकृष्ट नहीं था जितना अब दिखाई देता है। 
      रैगिंग के दौरान वरिष्ठ छात्र कनिष्ठ छात्रों के साथ मजाक की परंपरा निभाने के लिये अत्यंत घृणित व्यवहार करते हैं-यह शिकायतें अब आम हो गयी है। इस तरह की घटनायें तब प्रकाश में आती हैं जब कोई छात्र अपनी जाने खो बैठता है।  दरअसल हमारी शिक्षा प्रणाली में आकर्षण लाने के लिये जिस व्यवसायिक भाव को अपनाया गया है उसमें अधिक से अधिक छात्र एकत्रित करने का प्रयास उस व्यापारी की तरह किया जाता है जो अपने सामान के लिये अधिक से अधिक ग्राहक चाहता है।  जब शिक्षा के क्षेत्र में राज्य का प्रभाव था तब तक कोई समस्या नहीं थी पर अब निजीकरण ने इस क्षेत्र को बेलगाम बना दिया है।  दूसरी बात यह कि निजी क्षेत्र में शिक्षा का स्वामित्व ऐसे लोगों के पास चला गया है जो धन, पद और बाहुबल के दम पर अपना काम चलाते हैं उनके यहां शिक्षक एक लिपिक से अधिक माननीय नहीं होता।  निजी क्षेत्र के शैक्षणिक संस्थान केवल शिक्षा का वादा नहीं करते वरन् वह खेल, मनोरंजन और नौकरी दिलाने तक की उन सुविधाओं का वादा करते हैं जिन्हें इतर प्रयास ही माना जा सकता है। उनके प्रचार विज्ञापनों में छात्रों को पाठ्यक्रम से अधिक सुख सुविधाओं की चर्चा होती है।

चाणक्य ने कहा है कि

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सुखार्थी वा त्यजेद्विधां विद्यार्थी वा त्यजेत् सुखम्।

सुखार्थिन कुतो विद्या विद्यार्थिनः कुतोः सुखम्।।

     हिन्दी में भावार्थ-सुख की कामना वाले को विद्या औरं विद्या की कामना वाले को  सुख का त्याग कर देना चाहिये। सुख चाहने वाले को विद्या और विद्या चाहने वाले को सुख नहीं मिल सकता।  

      आजकल मोबाइल, कंप्यूटर और वाहनों का प्रभाव समाज में इस तरह बढ़ा है कि हर वर्ग का सदस्य उसका प्रयोक्ता है। स्थिति यह है कि बच्चों को आज खिलौने  से अधिक उनके पालक मोबाइल, कंप्यूटर और वाहन दिलाने की चिंता करते हैं। अब तो यह मान्यता बन गयी है कि अच्छी सुविधा होगी तो बच्चा अधिक अच्छे ढंग से पढ़ सकता है। जबकि हमने आधुनिक इतिहास में ऐसे अनेक महापुरुषों के बारे में पढ़ा है जिन्होंने भारी कष्टों के साथ जीवन बिताते हुए शिक्षा प्राप्त करने के अपने प्रयासों से प्रतिष्ठा का शिखर पाया।

मनुस्मृति में कहा गया है कि

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द्यूतं च जनवादं च परिवादं तथाऽनृतम!।

स्त्रीणां च प्रेक्षणालम्भावुपघातं परस्य च।।

     हिन्दी में भावार्थ-विद्यार्थी को चाहिये कि वह जुआ, झगड़े, विवाद झूठ तथा हंसीमजाक करने के साथ ही दूसरों को हानि पहुंचाने से दूर रहे।

      शैक्षणिक गतिविधियों से इतर सुविधाओं ने छात्रों को इतना बहिर्मुखी बना दिया है कि जिस काल में एकांत चिंत्तन की आवश्यकता होती है उस समय वह  मनोरंजन में अपना समय बर्बाद करते हैं।  हमारा अध्यात्मिक दर्शन तो यह मानता है कि शिक्षा के दौरान अन्य प्रकार की गतिविधियां न केवल अनुचित हैं वरन् धर्मविरोधी भी हैं।  चाणक्य तथा मनुस्मृति में यह स्पष्ट कहा गया है कि शिक्षा की अवधि में छात्रों को सुख सुविधाओं से दूर रहना चाहिये।  इतना ही नहीं गुरुकुल या छात्रावासों में रहना जरूरी हो तो सभी का सम्मान किया जाये। जुआ, मनोरंजन, निंदा, झगड़े तथा विवादों से विद्यार्थियों को बचना चाहिये।  यह हमारी धार्मिक पुस्तकें स्पष्ट रूप कहती हैं पर हैरानी की बात है कि कथित धर्म प्रवचनकर्ता कभी रैगिंग के विरुद्ध टिप्पणी नहीं करते। वैसे उनका दोष नहीं है क्योंकि अगर उन्होंने रैगिंग को धर्म विरोधी कहा तो उनके विरुद्ध प्रचार यह कहते हुए शुरु हो जायेगा कि वह सांप्रदायिक हैं।  यही प्रचार माध्यम जो रैगिंग के वीभत्स समाचार देकर विलाप कर रहे हैं उसे धर्म विरोधी घोषित करने पर समर्थन देने लगेंगे और दावा यह करेंगे कि एक दो छोटी घटना पर रैगिंग को निंदित नहीं कहा जा सकता।
      हम जैसे सामान्य लेखकों के पाठक कम ही होते हैं इसलिये इस बात की चिंता नहीं रहती कि कोई बड़ी बहस प्रारंभ हो जायेगी। दूसरी बात यह कि हम भारतीय अध्यात्मिक संदेशों के नये संदर्भों में चर्चा के लिये प्रस्तुत करते हैं तो अक्सर यह विचार आता है कि क्यों न ऐसा लिखा जाये जिससे लोग आकर्षित हों इसलिये यह सब लिखा दिया।  यह विचार इसलिये भी आया कि रैगिंग की घटनाओं से जब कुछ युवा जान गंवाते हैं तो तकलीफ होती है।  इसलिये हम चाहते हैं कि युवा वर्ग अपने प्राचीन अध्यात्मिक दर्शन का अध्ययन कर इस तरह की घटनाओं से बचे।
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday, November 1, 2014

मन चंगा हो तो फिर जीवन में भटकाव नहीं होता-हिन्दी चिंत्तन लेख(man changa hot jivan mein bhatkav nahin hota-hindi thought article)



           
            भक्ति से मन का भटकाव दूर होता है यह पहला सच है। दूसरा सच यह है कि अनियंत्रित मन हमेशा ही भटकता है। वह एक विषय से ऊबता है तो दूसरे की तरफ भागता है। फिर दूसरे से तीसरा और तीसरे से चौथा विषय उसे अपनी तरफ खींचता है। ऐसे में कोई सर्वशक्तिमान की भक्ति की राय देता है तो भटकता मन वहां भी उसी तरह जाता है जैसे कि वह एक नया सांसरिक विषय है। ऐसी क्षणिक भक्ति से मन को तात्कालिक रूप से आंनद मिलता है।  लगभग वैसा नष्टप्राय होता है जैसे एक विषय से दूसरे विषय की तरफ जाने पर मिलता है।
            नवीन विषय, नई अनुभूति, नया रोमांच फिर वही उकताहट! मानव इंद्रियां बाहर सहजता से सक्रिय रहती हैं।  इसलिये ही साकार भक्ति सहज लगती है।  मन के लिये बाहर इष्ट का कोई रूप चाहिये यह बेबसी सकाम भक्तों के लिये सदैव रहती है।
            निरंकार भक्ति सहज बनाती है पर सहजता से नहीं होती। इंद्रियां देह के पिंजरे के बाहर ही झांकना चाहती हैं। अंदर की अस्वच्छता उन्हें बाहर के विषयों में देखने, सुनने, कहने, सूंघने और के लिये विवश करती हैं।  जहां उन्हें मौन रहना चाहिये वहां चीखती हैं और जहां बोलना चाहिये वहां डर कर मौन हो जाती हैं।
            इसका उपाय यही है कि योग साधना कर अपनी देह, मन और विचारों को नई स्फूर्ति प्रदान की जाये।  योग साधना के दौरान आसनों से देह, प्राणायाम से मन और ध्यान से विचार शक्ति प्रखर होती है।
            एक योग साधक की अपने ही एक पुराने धार्मिक गुरु से मुलाकात हुई।
            गुरु ने कहा-‘‘क्या बात है? आजकल तुमने हमारे आश्रम पर आना ही बंद कर दिया है। लगता है तुम्हें हमारी जरूरत नहीं है?
            उस योग साधक ने जवाब दिया-तृप्त मन लेकर आपके पास कैसे आंऊ? आपकी कृपा से अब मन तृप्त रहने लगा है।’’
            गुरु ने कहा-बताओ तो सही हमारी कृपा से तुम्हारा मन तृप्त कैसे रहने लगा है?’’
            योग साधक ने कहा-अब मैं योग साधना में जो समय प्रातःकाल गुजारता हूं उससे मेरा मन पूरी तरह से तृप्त हो जाता है। अक्सर में इधर उधर जाने की सोचता हूं पर जब मन की तरफ देखता हूं तो उसे मौन पाता हूं।’’
            गुरु जी ने कहा-‘‘योग साधना की सलाह तो मैंने कभी नहीं दी थी।  मैं तो भक्ति की बात करता हूं।’’
            योग साधक ने जवाब दिया-‘‘आपने सलाह नहीं दी, पर आपके पास आते आते कहीं से यह प्रेरणा आ ही गयी। फिर संगत भी मिली।  जहां तक भक्ति का प्रश्न है वह तो मंत्र जाप से हो ही जाती है। मुख्य बात यह कि अब अतृप्त मन नहीं जो अपनी अध्यात्मिक प्यास बुझाने इधर उधर जांऊ।
            आत्मा मनुष्य का स्वामिनी हैं पर मन उसका प्रबंधक है। जिस तरह किसी उद्यम का स्वामी अपने प्रबंधकों की सहायता से चलता है वैसे ही यह देह भी है।  यह मन प्रबंधक अगर योग्य है तो देह का स्वामी ज्ञान से संपन्न होता है और अकुशल हो तो भटका देता है।  अकुशल मन प्रबंधक देह का समय और शक्ति इधर उधर विनिवेश कराता है पर कहीं से लाभ प्राप्त नहीं करता। इसलिये मन को  कुशल प्रबंधक का प्रशिक्षण देना चाहिये जो कि योग साधना से ही संभव है। त कवि रैदास ने कहा भी है कि ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’। इसका तात्पर्य यही है कि अगर मन में शांति और ंसतोष तो फिर भटकाव नहीं होता।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Thursday, October 23, 2014

विश्व योग दिवस मनाया जाना चाहिये-हिन्दी चिंत्तन लेख(vishwa yoga diwas manaya jana chahiye-hindi thought article)



            प्रधानमत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र संघ में अपने संबोधन में सारे विश्व में योग दिवस मनाने का प्रस्ताव दिया है। इस तरह की बात विश्व के सबसे बड़े राजनीतिक मंच पर अधिकारिक रूप से पहली बार कही गयी है इसलिये इसका महत्व निश्चित रूप से बहुत है।  इसकी भारत में स्वाभाविक रूप से प्रतिकूल प्रतिक्रिया हुई।  हम जैसे अध्यात्मिक और ज्ञान साधकों के लिये इस तरह के घटनाक्रम न केवल रुचिकर होते हैं बल्कि शोध का अवसर भी प्रदान करते हैं।
            देश में अनेक प्रतिक्रियायें आयीं। उनमें एक योग शिक्षक ने एक  महत्वपूर्ण बात कही कि योग के विषय पर जब कोई साधना करने वाला बोलता है तब उसका महत्व बहुत होता है।  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं योग साधना करते हैं इसलिये उनके पास इस विषय पर बोलने का अधिकार है।  उन्होंने एक तरह से अपना अनुभव बांटा है।  इसकी हमारे जैसे लोगों पर सुखद प्रतिक्रिया होती है पर जब हम अन्य लोगों को योग विषय बोलते और लिखते हुए देखते हैं तो यह यकीन करना कठिन होता है कि उनके पास योग का कोई ज्ञान भी है। मोदी जी को योग साहित्य का ज्ञान भी है यह देखकर प्रसन्नता होती है पर उनके संबोधन पर प्रसन्न होने वालों में ऐसे लोग भी हैं जो केवल भारतीय विचाराधारा के प्रचार पर ही उछलते हैं पर उसके मूल सिद्धांतों को नहीं समझते।
            जिस योग साधना की बात होती है वह अनेक लोगों के लिये इसलिये कठिन नहीं है क्योंकि   उसमें समय और श्रम का व्यय होता है जिससे आज के भौतिक प्रभाव में फंसे समाज के अनेक लोग बचना चाहते हैं।  योग साधना मनुष्य को शक्तिशाली, आकर्षक व्यक्तित्व का स्वामी सहज वाणी का प्रवाहक बनाती है। इसके प्रभाव को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसे योग साधना में निरंतर सक्रिय रहने वाले  लोग ही अनुभव कर सकते हैं।
            योग के आठ भाग हैं।  आमतौर से लोग प्राणायाम और आसनों को ही योग साधना समझते हैं।  एक तरह से समाज इसे  व्यायाम समझता है जबकि मोदी ने अपने संबोधन में यह स्पष्ट रूप से बताया कि यह एक व्यापक सिद्धि प्रदान करने वाली साधना है। हम यहां बता दें कि इस सिद्धि का यह आशय कतई नहीं समझना चाहिये कि इससे कोई आकाश से तारे जमीन पर उतार कर ला सकता है। योग साधना मनुष्य के व्यवहार, विचार तथा व्यक्तित्व में ऐसे तत्व स्थापित कर देती है कि वह इस जीवन सागर में बिना थपेड़ों के तैरता है-हमारा अभिप्राय यही है।
            मुख्य बात संकल्प की है।  श्रीमद्भागवत गीता के अनुसार परमात्मा के संकल्प के आधार पर संसार के सारे भूत स्थित हैं पर वह किसी में स्थित नहीं है।  उससे यह समझना चाहिये कि जिस तरह का हमारा संकल्प होगा उसी तरह का संसार हमारे सामने होगा पर हम उसमें नहीं समा सकते।  हमारी समस्या यह है कि  परमात्मा के इस संसार का भाग अपने ही अपने ही संकल्प के कारण सामने आता है हम उसमें समाना चाहते हैं या सोचते हैं कि वह हमारे अंदर समा जाये।  मकान मिला तो उसमें हम समाना चाहते हैं या चाहते हैं कि वह हमारे अंदर समाज जाये। इसी तरह का दृष्टिकोण संतान, धन, वाहन तथा अन्य भौतिक उपलब्धियों के बारे में रहता है। ऐसा हो नहीं सकता पर हमारा पूरा जीवन इसी प्रयास में नष्ट हो जाता है। देखा जाये तो हर इंसान योग करता ही है।  अज्ञानी लोग  भौतिकता से जुड़ने का प्रयास करते हैं। इसे हम असहज योग भी कह सकते हैं क्योंकि अंतत इससे तनाव ही पैदा होता है। उनका मन उन्हें अपना बंधुआ बना लेता है। सहज योगी स्वयं से जुड़कर संसार के विषयों से अपनी आवश्यकतानुसार संबंध रखते हैं।  वह कभी मन से कभी किसी भी विषय से संयोग करने के लिये बाध्य नहीं किये जाते।
            विश्व में योग दिवस मनाये जाने के प्रस्ताव पर भी अनेक लोग विश्व का अध्यात्मिक गुरु बनने का सपना देखकर प्रसन्न हो रहे हैं। हमारा मानना है कि भारत की यह पहले से बनी बनायी छवि है जिसके लिये प्रथक प्रयास करने की आवश्यकता नहीं है। पतंजलि योग साहित्य के अलावा हमारी श्रीमद्भावगत गीता भी एक ऐसा स्वर्णिम ज्ञान ग्रंथ है जिससे पूरा विश्व परिचित है।
            हम तो यह चाहते हैं कि विश्व समुदाय से पहले हमारे ही देश का अपना रुग्ण मानसिकता से बाहर आये। योग की बातें बहुत होती हैं पर साधना करने वालों की संख्या अभी भी नगण्य है। विश्व में क्रांति आने की हमारी कल्पना तभी सफल होगी जब हम पहले अपने देश में योग साधना को दिन चर्या का एक अभिन्न भाग बनायेंगे।  हम जैसे अप्रचारित योग साधकों के पास ऐसे साधन नहीं होते कि अपने इस प्राचीन विज्ञान पर जनसामान्य में अपनी बात कह सकें, इसलिये प्रधानमंत्री श्रीनरेंद्र मोदी जैसे प्रतिष्ठित लोग जब योग विषय का प्रचार करते हैं तो मन प्रसन्न कर लेते हैं। इसके लिये हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आभारी भी है कि उन्होंने योग प्रचार के लिये वह भूमिका निभाई जिसकी हम प्रतिष्ठित लोगों से अपेक्षा करते हैं।


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
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Saturday, June 29, 2013

संत नागरी दास का दर्शन-ज्यादा अक्ल मुसीबत का कारण (jyada akal musibat ka kaaran-sant nagri das ka darshan)


     अध्ययन की दृष्टि से अध्यात्म और सांसरिक विषय प्रथक प्रथक हैं।  अध्यात्म ज्ञान से संपन्न मनुष्य सहजता से आचरण करते हैं। यह उनकी स्वाभाविक चतुराई है।  जब किसी के पास अध्यात्म ज्ञान होता है उसका दृष्टिकोण सांसरिक विषयों के प्रति सीमित होता है। वह उन विषयों में रत होकर कर्म तो करते हैं पर उसमें अपने हृदय को लिप्त नहीं करते।  निष्काम करने के कारण उनकी बुद्धि में क्लेश का भाव नहीं होता जिससे वह कभी स्वयं को संकट में नहीं फंसने देते।   इसके विपरीत स्वयं को सांसरिक विषयों में चतुर समझने वाले लोग न केवल कामना के साथ कर्म करते हैं बल्कि उसका प्रचार अन्य लोगों को सामने करते हुए स्वयं के लिये चतुर होने को प्रमाण पत्र भी जुटाते हैं। दरअसल ऐसे आत्ममुग्ध लोगों की बुद्धि उनके संकट का कारण ही होती हैं। संसार के एक विषय से मुक्ति पाते हैं तो दूसरा उनके सामने आता है। दूसरे के बाद तीसरा आता है। यह क्रम अनवरत चलता है और केवल सांसरिक विषयों में लिप्त लोग कभी अपने मानसिक तनाव से मुक्ति नहीं पाते।  
संत नागरी दास कहते हैं कि
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अधिक सयानय है जहां, सोई बुधि दुख खानि।
सर्वोपरि आनंदमय, प्रेम बाय चौरानि।
            सामान्य हिन्दी भाषा में भावार्थ-जो मनुष्य अधिक चुतराई दिखाता है उसकी बुद्धि दुख की खान होती है। इसके विपरीत जो प्रेम का मार्ग लेता है वह सर्वोच्च आनंद पाता है।
अधिक भये तो कहा भयो, बुद्धिहीन दुख रास।
साहिब बिग नर बहुत ज्यौं, कीरे दीपक पास।।
            सामान्य हिन्दी भाषा में भावार्थ-अधिक संख्या होने पर भी कुछ नहीं होता यदि किसी मनुष्य समूह में बुद्धि का अभाव है तो उससे कोई आशा नहीं करना चाहिये। परमात्मा के पास अनेक नर है जैसे दीपक के पास अनेक कीड़े होते हैं।
       अनेक बार हम देखते हैं कि अपराधियों के नाम के साथ भी चतुर या बुद्धिमान होने की संज्ञायें सुशोभित की जाती हैं।  उनकी सफलताओं का बखान किया जाता है पर सच यह है कि यही अपराधी अपने साथ प्रतिशोध लेने की आशंकाओं अथवा कानून के  शिकंजे में फंसने से डरे रहते हैं।  देखा यह भी गया है कि अनेक मानव समूह अपने संख्याबाल पर इतराते हैं क्योंकि उनको लगता है कि इनके पास ढेर सारा बाहुबल है।  समय पड़ने पर जब उनके पास संकट आता है तो वह मिट भी जाते हैं।  कहने का अभिप्राय यह है कि अपराध, अत्याचार या किसी पर आक्रमण करने को बुद्धिमानी नहीं कहा जाता क्योंकि उसमें प्रतिरोध के खतरे भी होते हैं। बुद्धिमानी तो इसमें है कि जीवन में ऐसा मार्ग चुना जो कंटक रहित होने के साथ ही सहज भी हो।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Sunday, April 21, 2013

सर्वरक्षक आत्मा का स्मरण करें-यजुर्वेद (sarvarakshak aatma ka smaran kar-yajurved)

       पूरे विश्व समाज  में सोने  को अत्यंत महंगी धातु माना जाता है। हैरानी की बात यह है कि सोना किसी का पेट न भर सकता है न गले की प्यास  बुझा सकता है फिर भी  लोग उसे पाने को आतुर रहते है।  खासतौर से महिलाओं को सोने के आभूषण पहनने का शौक रहता है।  अपने आप में यह आश्चर्य की बात है कि जिस अन्न से मनुष्य का पेट भरता है उसे कोई सम्मान से नहीं देखता।  इतना ही नहीं जिस अन्न को प्रसाद मानकर खाना चाहिये लोग उसे मजबूरी समझ कर खाते हैं क्योंकि उसके बिना शरीर नहीं चल सकता।   अधिकतर मनुष्य भोजन कर शरीर इसलिये चलाना चाहते हैं कि अधिक से अधिक दैहिक रूप सक्रिय होकर धन संचय कर सकें। इस द्रव्य धन का सर्वश्रेष्ठ भौतिक रूप सोना ही है।  आज के विश्व समाज में सोने  का उपयोग कागजी मुद्रा को भौतिक रूप में स्थिर रखने के लिये किया जाता है।  इसी सोने के पात्र में जीवन का सच छिप जाता है।  यह संसार बिना अधिक धन संपदा, भूमि तथा अन्य भौतिक साधनों के भी स्वर्ग हो सकता है यह तथ कोई सिद्ध या ज्ञान साधक ही समझ सकता है।  
यजुर्वेद में कहा गया है कि
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हिरण्मपेन पवित्र सत्यस्थापिहितं सुखम्।
हिन्दी में भावार्थ-सोने के पात्र से सत्य ढका हुआ है।
वापुरनिलमृतथेदं भस्मान्थमशरीरम्।
क्रततो स्मद।।
क्लिवे स्मर।
कृथ्स्मर।।
हिन्दी
में भावार्थ-प्राण अपार्थिव अमृत हैं जबकि यह शरीर अंततः भस्म हो जाता है। अतः सर्वरक्षक आत्मा का स्मरण कर। अपनेअंदर स्थित कर्म करने वाला पुरुष का स्मरण कर।
       हमारी देह में विराजमान ही आत्म ही वास्तविक स्वर्ण है। यही वह अमृत है जिसका स्मरण करना चाहिये।  निरंतर बहिर्मुखी होने से मनुष्य बाह्य विषयों में सिद्धहस्त हो जाता है पर आंतरिक विषयों के बारे में उसका अज्ञान अंततः उसके लिये घातक होता है। आजकल लोगों के पास भौतिक साधनों का जमावड़ा तो हो गया है पर फिर भी कोई खुश नहीं दिखता। मानसिक तलाव के चलते लोग राजरोगों का शिकार होते जा रहे हैं।  समस्या यह भी है कि शारीरिक रूप से लोग अपने विकारों की चर्चा तो कर सभी को बता देते हैं पर उससे उनकी मानसिकता में  जिंदगी के प्रति उत्पन्न  नकारात्मक  भाव की  अनुभूति प्रत्यक्ष नहीं दिखती पर उनका आचरण तथा व्यवहार पर उसका दुष्प्रभाव अवश्व ही पड़ता है।  यही कारण है कि लोगों को दूसरों के द्वंद्व में मनोरंजन, पीड़ा में सनसनी और व्यसनों में ताजगी का अनुभव हेाता है।  आध्यात्कि विषय पर चर्चा उनके लिये केवल समय नष्ट करना ही होता है।  अपने मन के वेग से भौतिक संपदा के पीछे भाग रहे लोग अपनी आत्मा से साक्षात्कार तो दूर उसका विचार तक नहीं करते।
      जिन लोगों के हृदय में  शारीरिक तथा मानसिक रूप से स्वस्थ् रहने की इच्छा है उनको अंतमुखर््ी होकर योगासन, प्राणायाम, ध्यान और मंत्र जाप में अवश्य लगना चाहिये।  अंतमुर्खी  होकर अध्ययन करने से संसार के विषयों में स्वतः प्रवीणता आती हे पर बहिमुर्खी रहकर सांसकिर विषयों में लिप्त रहने से अध्याित्मक ज्ञान नहीं आ सकता।  जब भौतिकता से मोहभंग होता है तब अध्यात्मिक ज्ञान के अभाव  में मनुष्य निराशा, हताशा और मानसिक विकृतियों का शिकार होकर अपना जीवन दाव पर लगा देता है।
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 



Thursday, September 2, 2010

मनुस्मृति-दो प्रकार का शांत आसन (manu smruti-shant aasan)

मनु स्मृति में कहा गया है कि
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क्षीणस्य चैव क्रमशो दैवात् पूर्वकृतेन वा।
मित्रस्य चानुरोधेन द्विविधं स्मृतमासनम्।।

           
हिन्दी में भावार्थ-जब शक्ति क्षीण हो जाने पर या अपनी गलतियों के कारण चुप बैठना तथा मित्रों की बात का सम्मान करते हुए उनसे विवाद न करना यह दो प्रकार के शांत आसन हैं।
यदावगच्छेदायत्वयामाधिक्यं ध्रृवमात्मनः।
तदा त्वेचाल्पिकां पीर्डा तदा सन्धि समाश्चयेत्।।

           
हिन्दी में भावार्थ-भविष्य में अच्छी संभावना हो तो वर्तमान में विरोधियों और शत्रुओं से भी संधि कर लेना चाहिए।
            वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-किसी भी मनुष्य के जीवन में दुःख, सुख, आशा और निराशा के दौर आते हैं। आवेश और आल्हाद के चरम भाव पर पहुंचने के बाद किसी भी मनुष्य का अपने पर से नियंत्रण समाप्त हो जाता है। भावावेश में आदमी कुछ नहीं सोच पाता। मनु महाराज के अनुसार मनुष्य को अपने विवेक पर सदैव नियंत्रण करना चाहिये। जब शक्ति क्षीण हो या अपने से कोई गलती हो जाये तब मन शांत होने लगता है और ऐसा करना श्रेयस्कर भी है। अनेक बार मित्रों से वाद विवाद हो जाने पर उनके गलत होने पर भी शांत बैठना एक तरह से आसन है। यह आसन विवेकपूर्ण मनुष्य स्वयं ही अपनाता है जबकि अज्ञानी आदमी मज़बूरीवश ऐसा करता है। जिनके पास ज्ञान है वह घटना से पहले ही अपने मन में शांति धारण करते हैं जिससे उनको सुख मिलता है जबकि अविवेकी मनुष्य बाध्यता वश ऐसा करते हुए दुःख पाते हैं।
            जीवन में ऐसे अनेक तनावपूर्ण क्षण आते हैं जब आक्रामक होने का मन करता है पर उस समय अपनी स्थिति पर विचार कना चाहिए। अगर ऐसा लगता है कि भविष्य में अच्छी आशा है तब बेहतर है कि शत्रु और विरोधी से संधि कर लें क्योंकि समय के साथ यहां सब बदलता है इसलिये अपने भाव में सकारात्मक भाव रखते स्थितियों में बदलाव की आशा रखना चाहिए।
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