Showing posts with label परिवार. Show all posts
Showing posts with label परिवार. Show all posts

Thursday, April 14, 2016

कभी डरा भी देती यही जिंदगी-दीपकबापूवाणी (DeepakBapuWani)

स्वयं भटके वही पथप्रदर्शक बन जाते, मसखरी में ज्ञान देते गुरु तन जाते।
‘दीपकबापू’ गुरुकुल बनाये पंचसितारा, धवल चेहरा रखकर काला धन पाते।।
----------------------
कभी हसीन पल साथ लाती जिंदगी, कभी डरा भी देती यही जिंदगी।
धोखे भरोसे का सौदा रहेगा जारी, ‘दीपकबापू’ चलचित्र माने जिंदगी।।
----------------
दिल की बात जुबान पर नहीं लाते, धवल छवि काली नीयत में नहलाते।
‘दीपकबापू’ शब्द के सौदागर ठहरे, अनर्थ के अपने ही रंग से बहलाते।।
----------------
बाह्य आक्रमण का भय रहता है, चोट दे अंदर वाला इतिहास कहता है।
‘दीपकबापू’ सामने खंजर झेल लेते, पीछे के साथी का वार कौन सहता है।।
--------------------
भजन आमंत्रण में चार लोग नहीं आते, व्यसन के मेले सभी को भाते।
‘दीपकबापू मन के खेल में ऐसे फंसे, बदन में स्वाद के लिये विष लाते।।
----------------
माया के मद में अर्थहीन शब्द कहें, भ्रम में फंसे बुद्धिमान अहंकार में बहें।
‘दीपकबापू’ ऊंचे लोगों से बचे रहें, बोल अनुसना करें तो मौन भी न सहें।।
-------------

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

Wednesday, January 27, 2016

ट्विटर पर शनि शिंगणापुर में मंदिर में नारी प्रवेश आंदोलन-गर्व से कहो हम लोकतांत्रिक भी हैं-ट्विटर पर वाक्यांश (subject of women Entry in ShaniShingnapur)


             शनि शिंगणापुर मंदिर में महिलाओं को प्रवेश मिलना चाहिये पर अगर वहां के पुजारी यह नहीं चाहते तो उसके विरुद्ध सार्वजनिक आंदोलन करना भी ठीक नहीं हैं। मूलतः हिन्दू अध्यात्मिक ज्ञान स्त्री पुरुष की किसी प्रकार की पूजा निषेध नहीं करता पर ज्ञानी का यह काम नहीं है कि वह दूसरे के कर्मकांडों पर प्रतिकूल टिप्पणी करे। वैसे शनिशिंगणापुर मंदिर में प्रवेश के लिये हो रहे महिला आंदोलन से हिन्दू धर्म की प्रतिष्ठा बढ़ ही रही है।  यह इस बात का प्रमाण है कि हमारे समुदाय में नारियों के लिये भी स्वाभाविक लोकतंत्र है। शनिशिंगणापुर  में नारी प्रवेश के लिये आंदोलन से हिन्दू को विचलित न हों। खुश हों कि हमारे समुदाय में दूसरों की अपेक्षा ज्यादा जागरुकता है। हिन्दू समुदाय में नारियां अपने धार्मिक भेदभाव के विरुद्ध आंदोलन भी कर सकती हैं। अन्य समुदायों से श्रेष्ठ होने का यह एक बड़ा प्रमाण है। अध्यात्मिक योग व ज्ञान साधक के रूप में हमारी राय है कि शनिशिंगणापुर में हेलीकाप्टर से प्रवेश का नाटक रोके नहीं। हमारी धार्मिक सहिष्णुता का प्रमाण होगा। हिन्दू धर्म अपने प्राचीन तत्वज्ञान के कारण इतना शक्तिशाली है कि वह मंदिर में प्रवेश करने या न करने के नाटकों से खतरे में नहीं आता।

हिन्दू समुदाय की महिलायें अपने दायरे में ही तो आंदोलन करेंगी उन्हें दूसरे समुदायों के अंधविश्वासों के विरुद्ध लड़ने के लिये कहना ठीक नहीं। हमें दूसरे समुदायों के अंधविश्वासों पर टिप्पणी करने की बजाय स्वयं अपने ज्ञान के प्रति विश्वास जगाना चाहिये। शनिशिंगणापुर में नारी प्रवेश के लिये आंदोलन करने वालों को दूसरे समुदायों के उदाहरण बताकर मौन रहने के लिये कहना गलत। दिलचस्प! शनिशिंगणपुर में  नयी व पुरानी विचाराधारा की हिन्दू समुदाय की महिलाओं के बीच वाक्युद्ध! गर्व से कहो हम लोकतांत्रिक भी हैं। शनिशिंगणापुर में नारी प्रवेश के आंदोलन को धर्म पर हमला नहीं वरन् अपने लोकतांत्रिक होने का प्रमाण समझकर गर्व करें। प्रगतिशील व जनवादी विद्वान शनिशिंगणापुर में नारी प्रवेश आंदोलन पर न फुदकें क्योंकि उनके प्रिय  धर्म के प्रमुख स्थान में तो महिलायें जाने की सोचती भी नहीं।
--------------
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

Thursday, December 24, 2015

राजसी पुरुष का आवामगमन निर्बाध होना चाहिये-कौटिल्य का अर्थशास्त्र(rajsi Purushon ki Raksha-Kautilya ka Arthshastra)

                           हमारे यहां के प्रचारकर्मी आमतौर से राजसी पदों पर प्रतिष्ठित लोगों के वाहन निकलने पर सामान्य लोगों का आवागमन रोकने का विरोध करते हैं। यह उनका अज्ञान हैै।  कहा जाता है कि राज्यप्रमुख की रक्षा पहरेदारो को उसी तरह करना चाहिये कोई पुरुष स्त्री की करता है। राज्य प्रमुख के जीवन का भय प्रजा के लिये संकट होता है। इसलिये विशिष्ट पदधारी लोगों की रक्षा पर आपत्ति होना ही नहीं चाहिये। प्रचारकर्मियों को चाहिये कि वह राजसी पदवाले लोगों की नीतियों, कार्यक्रमों तथा प्रबंध तक ही अपनी बात रखें। हमारे देश के लोग भी राजसी पुरुषों के रहन सहन व चालचलन से अधिक उनके राज्य के प्रति कर्मो पर अधिक ध्यान देते हैं।
कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
-------------------------
निर्गमे च प्रवेशो च राजमार्ग समान्ततः।
प्रोत्सारितजनम् गच्छेत्सम्यगाविष्कृतोन्नति।।
           हिन्दी में भावार्थ-राज्य प्रमुख कहीं जाये तो राजमार्ग स्वच्छ कर सामान्य लोगों का आवागमन रोककर सम्मान से गमन करे।
                           अभी दिल्ली में निजी कारों के आवागमन पर समविषम सूत्र लागू करते हुए विशिष्ट राजसी पदों वाले लोगों को उससे मुक्ति दी गयी है।  यह ठीक है इसका विरोध नहीं होना चाहिये। हां, इतना जरूर कह सकते हैं कि राजसी पदों वालों की रक्षा जहां आवश्यक है वहीं यह भी आवश्यक है कि वह सामान्य प्रजा के लिये हितैषी होकर काम करते रहें। उनके यही काम चर्चा का विषय होना चाहिये। यह चिंता की बात है कि आधुनिक लोकतंत्र से राजसी पदों पर आने वाले लोग पुरानी राजसी प्रवृत्ति का शिकार हो रहे है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

Wednesday, November 11, 2015

अनुपम खेर के सहिष्णुता मार्च पर ट्विटर (Twitter on Subject march of Anupam Kher) MarchForIndia


            अनुपमखेर के नेतृत्व में देश की प्रतिष्ठा खराब करने वालों के प्रतिकूल  किये गये प्रदर्शन को सहिष्णुता मार्च कहना चाहिये। अनुपमखेर में नेतृत्व में निकलने वाले भारत के लिये मार्च पर सकारात्मक रुख अपनाते हुए उनकी प्रशंसा करना चाहिये। अब यह सवाल तो पूछा ही जायेगा कि एक अभिनेता को देश में असहिष्णु माहौल कैसे दिखेगा जबकि दूसरा उसे नकार रहा है। देश के असहिष्णु माहौल के प्रचार का उत्तर भारत के लिये मार्च से दिया जाना इस बात का प्रमाण है कि देश लोकतांत्रिक रूप से सहिष्णु व परिपक्व है। असहिष्णु वातावरण के प्रचार का भारत के लिये मार्च से जवाब! अनुपम खेरजी की बौद्धिक योजना का जवाब नहीं! इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत के लिये मार्च में एकत्रित भीड़ ने भारत की सहिष्णुता की मर्यादित सीमा भी बता दी है। समस्या यह है कि प्रगतिशील और जनवादी शैली की रचनाओं को राज्य प्रबंध से समर्थन नहीं मिलने वाला। यह कुछ रचनाकार सहन नहीं कर पा रहे।
                                   अनुपमखेर के नेतृत्व में बुद्धिजीवियों के  सहिष्णुता मार्च से भारत की अंतर्राष्ट्रीय पटल पर प्रतिष्ठा बढ़ती है तो अच्छी बात होगी। अनुपम मार्च से  एक बात तय हो गयी कि बौद्धिक दृष्टि से भी सुविधानुसार घटनाओं पर राय कायम की जा सकती है। आपकीबात अनुपम मार्च यह ट्विटर  दिखाई दिया।

भारत में सहिष्णुता के प्रश्न उठाकर कथित बुद्धिमानों ने प्रचार में नाम जरूर पाया पर उनकी छवि देशविरोधी बन रही है। अब तो यह सवाल दिमाग में आता है कि सहिष्णुता का मसला उठाने के पीछे असली वजह क्या है? पर्दे के पीछे का राज बाहर आना चाहिये। आप जोर से चिल्लायें तो यह अभिव्यक्ति का अधिकार है, पर लोग सुनने से इंकार कर दें तो मानना पड़ेगा कि समाज सहिष्णु है। आप चिल्लाकर बोलें यह अभिव्यक्ति का अधिकार है, उसे कोई न सुने यह यह समाज की असहिष्णुता का प्रमाण नहीं हो सकता। समाज में जागरुकता बढ़ी पर चेतना कम हुई है अब कोई कहे तो कहता रहे कि  असहिष्णुता बढ़ी है।
----------------
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

Sunday, September 6, 2015

आपसी संबंधों में प्रतिकारसंधि का महत्व न भूलें-कौटिल्य का अर्थशास्त्र(apsi sambandhon mein paropkarsandhi ka mahtva-economocs of kautilya)

                                   हम अपने दैनिक जीवन में अनेक लोगों के संपर्क में आते हैं।  किन्हीं लोगों का हम उपकार करते हैं तो कोई हमारा करता है पर इसका प्रतिकार कहीं होता है कहंी नहीं।  सामान्य मनुष्य का स्वभाव होता है कि वह किसी संकट में पड़े साथी, रिश्तेदार या अन्य व्यक्ति की मदद को तत्पर हो जाता है। हम जब समाज की व्यवस्था की बात करते हैं तो वह बनता ही इसलिये है कि लोग एक दूसरे के साथ संबंध सहजता से निभायें।  इसी समाज में कई लोगों की ऐसी प्रवृत्ति भी देखी जाती है कि वह काम निकल जाने के बाद साथी, मित्र और रिश्तेदार से दूध   में से  मक्खी निकालने की भांति संपर्क तोड़ देते हैं। प्रतिकार भाव से रहित ऐसे व्यक्ति अंततः समाज में अविश्वसनीय हो जाते हैं।
कौटिल्य अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
-----------

उपकारं करोम्यस्यं ममाप्येष करिष्यति।
अयञ्वापि प्रतीकारो रामसुग्रीवयोरिव।।
                                   हिन्दी में भावार्थ-मैंने उसका उपकार किया तो  वह भी करेगा-राम सुग्रीव के बीच इसी तरह हुइ संधि प्रतिकार संधि कहलाती है।
मयास्योपकृतं पूर्वे ममाप्येष करिष्यति।
इतिः या क्र्रियते सन्धिः प्रतीकारः स उच्यते।।
                                   हिन्दी में भावार्थ-मैंने पहले उसका उपकार किया तो वह भी मेरा करेगा-इसे प्रतिकार संधि कहा जाता है।
                                   प्रतिकार संधि मैत्री का भी रूप है जिसके बारे में कहा जाता है कि वह की नहीं जाती वरन् स्वतः भाववश हो जाती है। यह ठीक है कि भाववश लोग एक दूसरे जुड़े रहते हैं पर इसका आशय यह कतई नहीं है कि वह परोपकार कर प्रतिकार की अपेक्षा न करें।  निष्काम कर्म या नेकी कर दरिया में डाल का सिद्धांत ज्ञानी अपनाते हैं पर इस संसार में सभी ऐसे नहीं होते। अतः जिन लोगों को अपनी समाज मेें गरिमा बनाये रखना र्है वह परोपकार कर कोई भले ही याचना न करे पर लाभ लेने वाले को उसका प्रतिकार करने के लिये तत्पर होना चाहिये।  अगर वह ऐसा नहीं करता तो परोपकार करने वाला निराश हो जाता है और कालांतर में काम करने पर मुंह भी फेर सकता है।
----------------------
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

Saturday, August 29, 2015

अंतर्जाल पर प्रहारात्मक रूप से अंग्रेजी की अपेक्षा हिन्दी अधिक प्रभावी-हिन्दी दिवस पर विशेष लेख(hindi batter than inglish on internet-special hindi article on hindi diwas)

                                   ट्विटर, फेसबुक और ब्लॉग से आठ वषौं के सतत संपर्क से यह अनुभव हुआ है कि भले ही आपकी बात अंग्रेजी में अधिक पढ़ी जाती है पर भारत में समझने के लिये आपका पाठ हिन्दी में होना आवश्यक है।  महत्वपूर्ण बात यह है कि अगर आक्रामक शैली में शब्द लिखने हों तो अंग्रेजी से अधिक हिन्दी ज्यादा बेहतर भाषा है।  कटु  बात कहने के लिये मधुर शब्द का उपयोग भी व्यंजना भाषा में इस तरह किया जा सकता है कि  ंइसका अनुभव एक ऐसे ट्विटर प्रयोक्ता के खाते से संपर्क होने पर हुआ जो अपनी अंग्रेजी भाषा में लिखी गयी बात से प्रसिद्ध हो रहा है।  उसके अंग्रेजी शब्दों के जवाब में अंग्रेजी टिप्पणियां आती हैं पर जितना आक्रामक शब्द अंग्रेजी की अपेक्षा हिन्दी टिप्पणियों के होते हैं।  एक टिप्पणीकर्ता ने तो लिख ही दिया कि अगर अपनी बात ज्यादा प्रभावी बनाना चाहते हो तो हिन्दी में लिखो। वह ट्विटर प्रयोक्ता अंग्रेजी में लिख रहा है पर उसकी आशा के अनुरूप हवा नहीं बन पाती। अगर वह हिन्दी में लिखता तो शायद ज्यादा चर्चित होता। इसलिये हमारी सलाह तो यही है कि जहां तक हो सके अपना हार्दिक प्रभाव बनाने के लिये अधिक से अधिक देवनागरी हिन्दी में लिखे।

140 शब्दों की सीमा से अधिक ट्विटरलौंगर पर लिखना भी दिलचस्प
-------------------
इधर ट्विटर ने भी 140 शब्दों से अधिक शब्द लिखने वाले प्रयोक्ताओं  ट्विटलोंगर की सुविधा प्रदान की है। हिन्दी के प्रयोक्ता शायद इसलिये उसका अधिक उपयोग नहीं कर पा रहे क्योंकि उसका प्रचार अधिक नहीं है। हमने जब एक प्रयोक्ता के खाते का भ्रमण किया तब पता लगा कि यह सुविधा मौजूद है। हालांकि हम जैसे ब्लॉग लेखक के लिये यह सुविधा अधिक उपयोगी नहीं है पर जब किसी विशेष विषय पर ट्विटर लिखना हो तो उसका उपयोग कर ही लेते हैं। वैसे ट्विटर पर अधिक लिखना ज्यादा अच्छा नहीं लगता क्योंकि वह लोग लिंक कम ही क्लिक करते हैं।  बहरहाल जो केवल ट्विटर पर अधिक सक्रिय हैं उनके लिये यह लिंक तब अधिक उपयोग हो सकता है जब वह अधिक लिखना चाहते हैं।
---------------------
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

Thursday, August 27, 2015

गुजरात में सामूहिक हिंसा की पूर्ण पड़ताल आवश्यक-हिन्दी लेख(Gujrat mein samuhik hinsa ki poorn padtal aawashyak-hindi article)


                                   गुजरात में जिस तरह एकदम सामूहिक हिंसा हुई उससे लगता है कि कुछ लोग इसके लिये तैयार बैठे थे। इस हिंसा के लिये किसी खास समुदाय पर आक्षेप करना ठीक नहीं लगता। अगर प्रचार माध्यमों तथा समाचार पत्रों की बात माने तो वहां तमाम वर्ग के लोग इस हिंसा में शामिल रहे हैं।  गोधरा में रेल यात्रियों की  हत्या के बाद हुई हिंसा में भी सभी धर्मों के लोगों पर हमले हुए थे पर यह अलग बात है कि एक विशेष धर्म के लोगों के शिकार होने की अधिक चर्चा होती रहीं। आमतौर से गुजरात में बारह तेरह वर्ष पूर्व में सांप्रदायिक दंगे होना आम बात थी पर बाद में वह थम गयी।  हमारे विचार से कुछ असामाजिक तत्व वहां अपनी हिंसा और लूटपाट का अपना पुराना सपना पूरा करने के लिये लंबे समय से इंतजार में थे।  इसलिये वहां के जिम्मेदार नेताओं को अपने आंदोलन चलाते समय इसपर ध्यान देना चाहिये।  यहां यह भी बता दें कि एक खास समुदाय के सहारे पूरे देश की चुनावी राजनीति में छा जाने की संभावना नहीं रहती।
                                   वैसे हमारा मानना है कि सरकारी सेवाओं में व्यक्तिगत योग्यता के साथ ही प्रबंध कौशल की कला में शामिल लोगों को ही उच्च पदों पर नियुक्त करना चाहिये।  देश के विकास के लिये यह आवश्यक है कि सरकारी सेवायें व्यवसायिक ढंग से काम करें और बिना योग्यता और कौशल यह संभव नहीं है। हम यह देख रहे हैं कि सरकारी कार्य में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ रही है पर वहां आरक्षण का नियम काम नहंी करता।  जब हम राजकीय प्रबंध में निजी क्षेत्र की भागीदारी का सिद्धांत मान रहे हैं तो राजकीय सेवाओं में निजी योग्यता और प्रबंध कौशल की आवश्यकता खारिज नहीं किया जा सकता।
--------------------
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

Wednesday, August 19, 2015

पाकिस्तान कड़े संदेश मिलने के भय से घबड़ा रहा है-हिन्दी लेख(kade sandesh milne se bhaybhit pakistan-hindi lekh)


                                   पाकिस्तान इस समय भारत से सुरक्षा सलाहकारों की वार्ता से बचना चाहता है।  उसकी स्थिति कुछ इस तरह है जैसे अदालत का समन मिलने से किसी ऐसे सभ्रांत नागरिक की होती है जिस पर किसी ने मामला दर्ज किया हो-कभी कभी गवाह के रूप में अदालत का समन मिलने से भी लोग घबड़ा जाते हैं।  दोनों के सुरक्षा सलाहकारों की बैठक एक तरह से एक अपराधी की पेशी किसी पुलिस अधिकारी के सामने उपस्थिति जैसी है।  भारत के सुरक्षा सलाहकार पुलिस की भूमिका में है और पाकिस्तान के दूत को उनके सामने अपराधी की तरह हाजिर होना पड़ रहा है।  जिस तरह सामान्य व्यक्ति पुलिस या अदालत से बचने के लिये कोई न कोई उपाय करता है वैसे ही पाकिस्तान सीमा पर हमले करने के साथ ही अन्य उपाय भी कर रहा है।  संभवतः उसे आशंका है कि इस बातचीत में भारत कहीं उसे ऐसे सत्य न कहे जिससे बचा जाना चाहिये।  अभी तक उसे कड़े संदेश हमेशा मीडिया में मिले हैं पर इस बार उसे आशंका है कि भारत में बदलाव होने से  कहीं ऐसा न हो जाये कि औपचारिक या आधिकारिक रूप से कड़ी बात सुनने को  मिले और उसके अनुरूप काम करना पड़े। जब तक नहीं मिले हैं तब तक टालमटोल ही ठीक है।  सभ्रांत आदमी का नियम होता है कि वह बिना चेतावनी के कार्यवाही नहीं करता।  अगर वह ऐसा करता है तो दुनियां उसे ताने देती है। पाकिस्तान को लगता है कि सभ्रांत भारत को चेतावनी देने का अवसर ही नहीं दिया जाये ताकि वह ऐसे कार्यवाही करे तो पूरा विश्व उसकी निंदा करे।
                                   पाकिस्तान भारत से बातचीत कराने में इसलिये कतरा रहा है क्योंकि उसे लगता है कि उफा में समझौते के बाद वह कश्मीर मामला नहीं उठा सकेगा। पाकिस्तान अपना दूत भेजने इसेलिये भी डर रहा है क्योंकि उसे आशंका है कि यह बातचीत बेनतीजा रही तो परिणाम खतरनाक होंगे।      हमारा विचार है कि  यह बातचीत होना चाहिये। भारत पाक सुरक्षा सलाहकारों की बातचीत होने पर इस बार धमकाने और समझाने का सही अवसर मिल सकता है। भारत के सुरक्षासलाहकार डाभोल के समकक्ष पाकिस्तानी सरताज अजीज अत्यंत बौने हैं और यह भय वहां की सेना को सता रहा है। पाकिस्तान को इस बात में भारत बता सकता है कि ब्लूचिस्तान में खुलकर उसके विरुद्ध बिगुल बजाया जा सकता है। इसलिये पाकिस्तान के बातचीत करने के परंपरागत ढंग से हो रहे कुत्सित प्रयासों की परवाह किये बिना भारतीय रणनीतिकारों को अपने प्रयास करना ही चाहिये। मौका मिले तो चार हिस्सों में अनौपचारिक रूप से विभाजित पाकिस्तान पर-पंजाब, सिंध, ब्लूचिस्तार और पख्तूनिस्तान-अपनी मोहर लगा ही देना चाहिये।
------------------
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

Saturday, June 27, 2015

स्वर्ग प्राप्ति का मोह अज्ञान का प्रमाण-भर्तृहरि नीति शतक के आधार पर चिंत्तन लेख(swarga prapti ka moh agyan ka praman-A Hindu hindi religion thought based on bhartrihari neeti shatak)

                              भगवान श्रीकृष्ण से श्रीमद्भागवत गीता में वेद वाक्यों में स्वर्ग दिलाने वाले वाक्यों से प्रीति रखने वाले लोगों को अज्ञानी बताया है। हमारे यहां से धार्मिक सत्संग तथा अन्य सामूहिक कार्यक्रमों की परंपरा रही है जिसमें अनेक पेशेवर विद्वान लोगों को स्वर्ग का मोह दिखाते हैं।  उन्हें कथित रूप से स्वर्ग प्राप्ति के लिये काम, क्रोध, लोभ, मोह तथा अहंकार से मुक्त होकर कार्य करने के लिये प्रेरणा देते हैं। ऐसे कथित विद्वान स्वयं सारी जिंदगी संपति, शिष्य तथा प्रतिष्ठा अर्जित करने में बिताते हैं पर दूसरों को भ्रम में डालते हैं।
भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि
-----------------------
स्वपरप्रतारकोऽसौ निन्दति योऽलीपण्डितो युवतीः।
यस्मामात्तपसोऽपि फलं स्वर्गस्तस्यापि फलं तथाप्सरसः।।
                              हिन्दी में भावार्थ-शास्त्रों के ज्ञान का अधकचरा ज्ञान रखने वाले अनेक कथित विद्वान अपने तथा पराये सभी को धोखा देते हैं क्योंकि वह जिस तप की बात करते हैं वह स्वर्ग की प्राप्ति के लिये होता है जहां अप्सरायें और भोग विलास की प्रधानता है।
                              हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार हर मनुष्य अपने कर्म का फल स्वयं ही भोगता है। वह अपने संकल्प के अनुसार ही अपने जीवन में स्वर्ग और नरक का वातावरण बनाता है। यह संभव नहीं है कि  मनुष्य का कर्म दूसरा भोगे।  मनुष्य स्वयं ही अपने को संकट में डालता है या उद्धार करता है।  कितना भी सत्संग, भजन और शास्त्र पढ़ ले जब तक उसके कर्म, विचार और बुद्धि शुद्धि नहीं होगी तब तक कष्ट ही भेागेगा।  योग साधना से अपनी देह, मन और विचारों को शुद्ध रखने वाले इस संसार में स्वर्ग न भोगें पर कम से कम नारकीय स्थिति से दूर रहते हैं।
-----------------------
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

Wednesday, June 3, 2015

सर्वशक्तिमान पर निरर्थक बहस-हिन्दी चिंत्तन लेख(discussion on God(men or women-A hindu hindi thought article)


    प्रचार माध्यमों के अनुसार ब्रिटेन में इस बात पर बहस छिड़ी है कि गॉड स्त्री है या पुरुष! हमारे हिसाब से उन्हें इस बात पर बहस करना ही नहीं चाहिये क्योंकि अंग्रेजी में स्त्री या पुरुष की क्रिया के वाचन शब्द का कोई विभाजन ही नहीं है। स्त्री कार्य कर रही है(Women is working) या पुरुष कार्य कर रहा है(Men is working) इसमें अंग्रेजी वर्किंग शब्द ही उपयोग होता है। यही कारण है कि अनेक कट्टर हिन्दी समर्थक अपनी भाषा को वैज्ञानिक और अंग्रेजी को भ्रामक मानते हैं। यह बहस देखकर उनके तर्क स्वाभाविक लगते हैं|
   सर्वशक्तिमान की स्थिति पर भारतीय दर्शन स्पष्ट है। हमारे यहां परब्रह्म शब्द  सर्वशक्तिमान के लिये ही उपयोग  किया जायेगा।  मुख्य बात यह कि वह अनंत माना जाता है-यह स्पष्ट किया गया है कि वह चित में धारण किया जा सकता है पर वह रूप, रस, गंध, स्वर और स्पर्श के गुणों से नहीं जाना जा सकता। वह चिंत्तन से परे है पर मनुष्य अपने चित्त में जिस गुण से उसका स्मरण करेगा वही उसका ब्रह्म है।
         हमारे यहां विदेशी विचाराधारा के प्रवर्तक सब का सर्वशक्तिमान एक है का नारा लगाते हुए यहां भ्रम पैदा करते हैं। सद्भाव के नाम पर यही नारा लगाते हैं पर सच यह है कि वह एक है कि अनेक, यह कहना या मानना संभव नहीं। अनेक विद्वान तो यह भी कहते हैं कि वह है भी कि नहीं इस पर भी कुछ नहीं कहा जा सकता क्योंकि वह अनंत है। इसलिये उस पर बहस करना ही नहीं चाहिये। वह वैसा ही है जैसा भक्त है। भक्त जिस रूप में चाहता है उसे धारण कर ले। हमारे यहां अनेक साकार स्वरूप माने जाते हैं। भक्ति को जीवन का अभिन्न भाग माना जाता है। यही कारण है कि निराकार परब्रह्म की कल्पना में असहजता अनुभव करने वाले साकार रूप में उसे स्थापित करते हैं पर उनमें यह ज्ञान रहता ही है कि वह अनंत है। अपने अपने स्वरूपों को लेकर बहस कहीं नहीं होती। यह तत्वज्ञान हर भारतीय विचारधारा में स्थापित है  इसलिये यहां ऐसी निरर्थक तथा भ्रामक चर्चा कभी नहीं होती।
--------------
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

Thursday, May 28, 2015

भारतीय अध्यात्म दर्शन में जीवमात्र के बीच भेदभाव वर्जित-हिन्दी चिंत्तन लेख(bhartiya adhyatma darshan mein jeevmatra ke beech bhedbhav varjit-hindi thought article)

अज्ञानी मनुष्यों के दूसरों के प्रति भेदभाव की प्रवृत्ति स्वभाविक रूप से रहती है जबकि ज्ञानी लोग मनुष्य और मनुष्यों के बीच की बात तो छोड़िये इस प्रकृत्ति के जीवों में ही भेद नहीं करते। हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार जीवन की 84 लाख यौनियां होती हैं। अक्सर यह कहा भी जाता है कि जो जीव भगवान नाम का स्मरण करेगा वह 84 के चक्कर से बच जायेगा। भक्त के सच्ची पहचान भी यही बताई गयी है कि वह किसी भी जीव को हेय न समझे। सभी को सम्मान दे। यही कारण है कि भारत में वानर, सिंह, चूहे तथा सर्प को भी जनमानस में भगवतस्वरूप स्थापित किया गया है। एक सामान्य भारतीय कभी भी पशु और पक्षी तक को अपमान की दृष्टि से नहीं देखता।  यह अलग बात है कि पाश्चात्य शिक्षा के चलते हमारे देश में वहां प्रचलित भेदभाव आ गया है। लोगों की सोच अब पूरी तरह से देसी न होकर पश्चिमी हो गयी है। इसी कारण हमारे देश में भेदभाव बढ़ा है।
भारतीय अध्यात्मिक दर्शन में मूलतः जीव मात्र में ही भेदभाव की प्रेरणा नहीं दी जाती। मध्यकाल के दौर में जब भारतीय समाज पर विदेशी लोगों के हमले हुए और उस दौरान तत्कालीन समाज पर नियंत्रण के लिये उनके दलालों ने यहां पर बौद्धिक प्रकृत्ति बदलने का प्रयास किया।  उस दौरान अनेक भारतीय चिंत्तकों ने समाज को बचाने के लिये कुछ ऐसे मार्ग तलाश करने चाहे जो विदेशी तथा देसी सोच के साथ ही  लोगों के बीच भेद दिखाने वाले थे। उनके सिद्धांत अच्छे या बुरे थे यह अलग से बहस का विषय है पर चिंत्तकों की नीयत पवित्र थी यह तय है।
समय के साथ भारतीय समाज परिवर्तनशील रहा है।  वह केवल अपने दर्शन से तत्कालीन संदर्भों में बेहतर संदेश ही स्वीकार करता है। उस पर रूढ़ता का आरोप नहीं लगाया जा सकता है। विदेशी कू्रर लोगों के शासन तथा उनके बौद्धिक दलालों से संघर्ष के कारण भारतीय अध्यात्मिक विचाराधारा का प्रवाह अवरुद्ध हुआ पर इसे रूढ़ता नहीं माना जा सकता। बहरहाल हमारा यह मानना है कि मनुष्य ही नहीं वरन् जीव मात्र में ही भेद करना हमारे अध्यात्मिक के सिद्धांतों के विपरीत है।
--------------
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

Sunday, May 10, 2015

संकल्प में सर्वजन हिताय की कामना स्थापित करें-हिन्दी चिंत्तन लेख(sankalp mein sarwjan hitay ki kamana sthaapit karen-hindi thought article)


जिस तरह यह संसार परमात्मा के संकल्प के आधार स्थित है वैसे ही हमारे हृदय  और मस्तिष्क के संकल्प के अनुसार ही हमारा जीवन चलता है। अगर हम दूसरे के कार्य में विघ्न आने की संभावना आने पर खुश होते हैं तो यह तय मानिये कि  कि हमारे काम में विघ्न आयेंगे हालांकि तब हमारे अंदर यह विचार नहीं आता कि हमारे किस संकल्प के कारण यह हुआ?
हमें अपने अंदर स्थित समस्त इंद्रियों में पवित्रता का संकल्प स्थापित करना ही चाहिये।  ऐसा नहीं हो सकता कि हम मन में घृणा रखें और वाणी में मीठे शब्द विष की तरह उपयोग करें। हम अपने कर्ण से अच्छे स्वर सुनना चाहें पर मन के वश ऐसे स्थानों पर जायें जहां दृश्य तो अनूकूल हो पर स्वर विपरीत मिलें। वहां चक्षु और वाणी का सुख तो मिले पर कर्णों को अप्रिय स्वर घेर लें।  कहने का अभिप्राय यह है कि हमें पवित्रता, शुद्धता और सहजता के भाव को पहले अपने मूल स्थान पर स्थापित करें। इससे हमारा संकल्प सौंद्रर्य भाव में स्थित हो जायेगा तो जीवन के धारा भी उसी में प्रवाहित होगी।

समय समय  पर आत्ममंथन करें कि  कहीं हमारे अंदर किसी के प्रति विद्वेष या घृणा का भाव तो नहीं आ रहा? हम दूसरों के अनिष्ट पर प्रसन्न तो नहीं हो रहे? हम दूसरो के गुणों की बजाय उसमें दोषों पर तो ध्यान नहीं दे रहे?
नकारात्मक विचारों से हमें दूर रहने का अभ्यास इस तरह करना चाहिये कि कभी किसी के लिये विद्वेष, घृणा या निंदा का भाव नहीं आये। हमें दूसरों की उन्नति, उत्थान और सुख की कल्पना करना चाहिये। हम अकेले इस संसार का भाग नहीं होते। इतना ही नहीं हम जिन सुविधाओं का उपयोग करते हैं वह भी समूह में मिलती हैं। सूर्य की उष्मा, चंद्रमा की शीतलता और बादलों का अमृत सभी के लिये बरसता है। हम किसी दूसरे के खेत पर अकाल या बाढ़ की कामना नहीं कर सकते क्योंकि प्रकृति ने हमें समूह में बांधा है।  हम पड़ौसी के घर पर संकट की कामना नहीं कर सकते क्योंकि वह हमसे भी जुड़ा है। इसलिये हमें सर्वजन हिताय संकल्प रखन चाहिये। यही जीवन का अंतिम सत्य है। इसे हम तत्वज्ञान भी कह सकते हैं।
--------------------------
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

Saturday, March 21, 2015

संतोषी मनुष्य किसी की परवाह नहीं करता-भर्तृहरि नीति शतक के आधार पर चिंत्तन लेख(santoshi manushya kisi ki parvah nahin karta-A Hindu hindu religion thought based on bhartrihari neeti shatak)



            कहा जाता है कि संतोष सबसे बड़ा धन है पर आज हम जब समाज में इस सिद्धांत के आधार पर दृष्टि डालते हैं तो आभास होता है कि लोग माया की दृष्टि से अधिक धनी जरूर हो गये पर मानसिक रूप से बहुत दरिद्र हैं।  स्थिति यह है कि धन, पद और प्रतिष्ठा के अभाव से त्रस्त अनेक लोग आत्महत्या कर स्वयं को जीवन से मुक्ति दिला देते हैं।  नश्वर देह को समय से पहले ही नष्ट करना अने लोगों को  अच्छा लगने लगा है।
            हमारे एक मित्र ने एक किस्सा सुनाया जो  हमें अत्यंत रुचिकर लगा । वह मित्र अपनी धर्मपत्नी के साथ मंडी गये थे।  वहां उनका एक परिचित दूधिया अपनी साइकिल छायादार स्थान पर खड़ी कर गर्मी में बटी खा रहा था।  उसके पास आठ दस बटियां थीं। सभी जानते हैं कि गर्मी में बटियां खाने से पानी की कमी नहीं होती।  हमारे मित्र ने उस दूधिया से कहा-अरे, इतनी सारी बटियां जमा कर रखी हैं। सभी खाओगे या बचाकर घर ले जाओगे?’’
            उस दूधिया ने कहा कि-‘‘सभी खाऊंगा। मेरा घर यहां से सात  किलोमीटर दूर है। इस गर्मी में साइकिल चलाते हुए यही बटियां मेरे पेट में कूलर का काम करेंगी।’’
            हमारे मित्र ने उसकी आंखों में जो आत्मविश्वास देखा उससे वह आत्मविभोर हो गये।  उन्होंने अपनी पत्नी से कहा-‘‘पता नहीं यह गलतफहमी अनेक समाज सेवकों  को क्यों है कि गरीब और परिश्रमी लोग जीवन में मुश्किलों से हार जाते हैं। ऐस लोगों को देखो तो लगता है कि गरीब होना ही दुःख का प्रमाण नहीं है।  इस लड़के की आंखों में जो आत्मविश्वास था वह हम जैसे सभ्रांत वर्ग के बच्चों के पास कहां होता है? सबसे बड़ी बात यह कि गरीबों को भिखारी मानकर विचार नहीं करना चाहिए।’’

भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि

---------------

वयमिह परितृष्टा वल्कलैस्त्वं दुकूलैस्सभ इह परितोषे निर्विशेषो विशेषः।

स तु भवतु दरिद्रो यस्य तृष्णा विशाला मनसि च परितुष्टे कोऽर्थवान् को दरिद्रः।।

            हिन्दी में भावार्थ-हे राजन्! हम पेड़ की छाल के वस्त्र पहनकर संतुष्ट हैं तो तुम रेशमी परिधान पहनकर प्रसन्न हो। संतोष तो हम दोनों को ही है तब विरोध वाली बात कहां है? इसमें विशेष कुछ नहीं है। दोनों ही संतुष्ट है तब अंतर नहीं है। मगर जो दरिद्र है पर जिसकी इच्छायें अधिक है उसका अगर मगर संतोष से भर जाये तो धनिक और दरिद्र में अंतर कहां रह जाता है।

            आधुनिक राज्यव्यवस्थाओं में पूरे विश्व के शिखर पुरुष हमेशा ही गरीबों के मसीहा होने का दावा करते हैं यह अलग बात है कि उनके प्रशासनिक तंत्र की नीतियां और कार्यशैली इसके विपरीत दिखती हैं।  गरीब, बेसहारा, बूढ़े, कमजोर तथा विकलांग की सेवा के नारे पूरे विश्व में लगते हैं।  तब ऐसा लगता है कि बस इस धरती पर देवता प्रकट होने वाले ही है।  ऐसा होता नहीं क्योंकि इस तरह के नारे लगाने वालों का उद्देश्य केवल प्रचार के माध्यम से अपना अर्थ साधने का होता है।  सभी गरीब भीख नहीं मांगते और श्रम से जीने वाले सभी लोग धनिक होने का सपना देखकर अपना समय भी नष्ट नहीं करते।  अभावों में जीने वाले जिंदा हैं तो संपन्न लोगों को अपनी रक्षा की चिंता खाये जाती है।
            इसलिये किसी गरीब को देखकर उस पर हंसना नहीं चाहिये और न ही अपनी संपन्नता के मद में रहकर जीवन बिताना चाहिये। जिसके पास मन का संतोष है वही सबसे बड़ा धनी है। बढ़त राजरोगों के बढ़़ते प्रभाव से तो यही निष्कर्ष निकलता है।


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

Friday, February 3, 2012

पतंजलि योग साहित्य-नतीजों से भी काम का अनुमान किया जा सकता है(patanjali yaog literature-word and result, kaam aur uska parinam)

               कभी हमें किसी व्यक्ति की स्थिति देखकर उसकी सक्रियता का अनुमान लग सकता है। अगर हमें योग का ज्ञान है तो हम किसी को नतीजा भोगते देखकर यह अनुमान भी लगा सकते है कि उसने किस तरह काम किया होगा। इतना ही नहीं हम जो कर्म करते हैं उसके परिणामों का भी हमें अच्छी तरह आभास हो जाता है।  आमतौर से आधुनिक विज्ञापन ज्योतिष तथा मनुष्यों की सिद्धि पर विश्वास नही करता पर पतंजलि योग के अनुसार अगर कोई योगासन, ध्यान, प्राणायाम करने के साथ ही संयम का पालन करे तो वह इतना सिद्ध हो जाता है कि उसे अपने भविष्य का ज्ञान होने लगता है। इतना ही नहीं अगर हम किसी व्यक्ति को काम करते नहीं देख पाए  पर उसे नतीजे भोगते देखकर भी यह अंदाज लगाया जा सकता है कि उसने क्या किया होगा।
पतंजलि योगशास्त्र  में कहा गया है कि
-------------------------

क्रमान्यत्वं परिणामन्यत्वे हेतुः।

             ‘‘किसी कार्य करने के क्रम में भिन्नता से परिणाम भी भिन्न होता है।’’
परिणामन्नयसंयमादतीतानागतज्ञानम्।।
              ‘‘अतीत, वर्तमान तथा भविष्य का विचार करने से परिणाम का ज्ञान हो जाता है।’’

                    पतंजलि योग में न केवल भौतिक तथा दृश्यव्य संसार को जानने की विधा बताई गयी है बल्कि अभौतिक तथा अदृश्यव्य स्थितियों के आंकलन का भी ज्ञान दिया गया है। हमारे सामने जो भी दृश्य आता है वह तत्काल प्रकट नहीं होता बल्कि वह किसी के कार्य के परिणाम स्वरूप ही ऐसा होता है। कोई व्यक्ति हमारे घर आया तो इसका मतलब वह किसी राह से निकला होगा। वहां भी उसके संपर्क हुए होंगे। वह हमारे घर पर जो व्यवहार करता है वह उसके घर से निकलने से लेकर हमारे यहां पहुंचने तक आये संपर्क तत्वों से प्रभावित होता है। वह धूप में चलकर आया है तो दैहिक थकावट के साथ मानसिक तनाव से ग्रसित होकर व्यवहार करता है। कोई घर से लड़कर आया है तो उसका मन भी वहीं फंसा रह जाता है और भले ही वह उसे प्रकट न करे पर उसकी वाणी तथा व्यवहार अवश्य ही नकारात्मक रूप से परिलक्षित होती है।

            कहने का अभिप्राय यह है कि हम प्रतिदिन जो काम करते हैं या लोगों हमारे लिये काम करते हैं वह कहीं न कहीं अभौतिक तथा अदृश्यव्य क्रियाओं से प्रभावित होती हैं। इसलिये कोई दृश्य सामने आने पर त्वरित प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त करना चाहिए। हमें यह विचार करना चाहिए कि उस दृश्य के पीछे कौन कौन से तत्व हैं। व्यक्ति, वस्तु या स्थितियों से प्रभावित होकर ही कोई धटना हमारे सामने घटित होती है। जब हमें यह ज्ञान हो जायेगा तब हमारे व्यवहार में दृढ़ता आयेगी और हम अनावश्यक परिश्रम से बच सकते हैं। इतना ही नहीं किसी दृश्य के सामने होने पर जब हम उसका अध्ययन करते हैं तो उसके अतीत का स्वरूप भी हमारे अंतर्मन में प्रकट होता है। जब उसका अध्ययन करते हैं तो भविष्य का भी ज्ञान हो जाता है।         
         हम अपने साथ रहने वाले अनेक लोगों का व्यवहार देखते हैं पर उसका गहराई से अध्ययन नहीं करते। किसी व्यक्ति के मन में अगर पूर्वकाल में से दोष रहे हैं और वर्तमान में दिख रहे हैं तो मानना चाहिए कि भविष्य में भी उसकी मुक्ति नहीं है। ऐसे में उससे व्यवहार करते समय यह आशा कतई नहीं करना चाहिए कि वह आगे सुधर जायेगा। योग साधना और ध्यान से ऐसी सिद्धियां प्राप्त होती हैं जिनसे व्यक्ति स्वचालित ढंग से परिणाम तथा दृश्यों का अवलोकन करता है। अतः वह ऐसे लोगों से दूर हो जाता है जिनके भविष्य में सुधरने की आशा नहीं होती। जब हमारा कोई कार्य सफल नहीं होता तब हम भाग्य को दोष देते हैं जबकि हमें उस समय अपने दोषों और त्रुटियों पर विचार करना चाहिए।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग

समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढ़ें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका


इस लेखक की लोकप्रिय पत्रिकायें

आप इस ब्लॉग की कापी नहीं कर सकते

Text selection Lock by Hindi Blog Tips

हिंदी मित्र पत्रिका

यह ब्लाग/पत्रिका हिंदी मित्र पत्रिका अनेक ब्लाग का संकलक/संग्रहक है। जिन पाठकों को एक साथ अनेक विषयों पर पढ़ने की इच्छा है, वह यहां क्लिक करें। इसके अलावा जिन मित्रों को अपने ब्लाग यहां दिखाने हैं वह अपने ब्लाग यहां जोड़ सकते हैं। लेखक संपादक दीपक भारतदीप, ग्वालियर

विशिष्ट पत्रिकायें

Blog Archive

stat counter

Labels