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Wednesday, June 10, 2009

चाणक्य नीतिः अधिकारी कभी कामना रहित नहीं होता

निस्पृहो नाऽधिकारी स्यान्नाकामी मण्डनप्रियः।
नाऽविदग्धः प्रियं ब्रूयात् स्पष्टवक्ता न वंचकः।।

हिंदी में भावार्थ-अधिकारी कभी इच्छा और लोभ रहित, श्रृंगार का रसिक निष्काम, मूर्ख मधुरवाणी तथा स्पष्टवादी कभी धोखा देने वाला नहीं होता।
अभ्यासाद्धर्यते विद्या कुलं शीलेन धार्यते।
गुणेन ज्ञायते त्वार्यः कोपो नेत्रेण गम्यते।।
हिंदी में भावार्थ-
अभ्यास से ज्ञान और गुण और शील से कुलप्रतिष्ठा प्राप्त हो जाती है। मनुष्य अपने गुणों से पहचाना जाता है और उसका क्रोध नेत्रों से प्रकट होता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जहां किसी व्यक्ति को कोई अधिकार मिला है वहां वह लोभ और कामना रहित नहीं हो सकता। कहते हैं न कि ‘घोड़ा घास से यारी करेगा तो खायेगा क्या?‘ मनुष्य में अधिकार आने पर अहंकार आ ही जाता है। ऐसे विरले ही लोग होत हैं जो आत्मज्ञान से युक्त होने पर अधिकार आने पर पर लालची नहीं होते। सच बात तो यह है कि आदमी अपने कर्तव्य बोध से अधिक अपने अधिकार पर अहंकार करता है।
जहां मनुष्य अधिकारी है वहां इस बात को भूल जाता है कि उसका कर्तव्य क्या है? वह बस अधिकार की बात करता और सोचता है। अगर उसके साथ वह अपने कर्तव्य के निर्वहन का अभ्यास करे तो उसके अधिकार स्वतः बने रह सकते हैं पर इसके विपरीत वह बिना कर्तव्य के अधिकार चाहता है। इसी कारण वह अलोकप्रिय होता है। अपने कर्तव्य निर्वाह के अभ्यास करने पर जहां मनुष्य की लोक प्रतिष्ठा में वृद्धि होती है और न करने पर वह अपयश का भागी बनता है। विश्व में जितने भी महापुरुष हुए हैं उन्होंने लोक प्रतिष्ठा इसलिये अर्जित की क्योंकि उन्होंने अपने कर्तव्य निर्वहन का निरंतर अभ्यास किया। जहां केवल अपने लिये अधिकारों की लड़ाई होती है वहां लड़ाई झगड़े और वैमनस्य फैलता है। विश्व में जो हम इस समय तनाव का वातावरण देख रहे हैं उसका कारण यही है कि लोग अपने अधिकार की बात तो करते हैं पर कर्तव्य के विषय में खामोश हो जाते हैं। अगर अधिकारी अपने कर्तव्य निर्वहन के प्रति सजग हों तो ही परिवार, समाज और राष्ट्र में शांति रह सकती है।
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Wednesday, April 8, 2009

चाणक्य नीतिः भंवरे को कमलिनी के रस का महत्व विदेश में पता चलता है

अलिरय नलिनीदलमध्यगः मलिनीमकरंदमदालसः।
विधिवशात्परदेशमुपागतः कुटजपुष्परसं बहु मन्यते।।


हिन्दी में भावार्थ-भंवरा जब तक कमलिनी के बीचों बीच रहकर उसके रस का सेवन करता तब उसके नशे में आलस्य उसे घेरे रहता है मगर जब समय और भाग्यवश परदेस में जाना पड़ता है तब कुटज के फूल के रस को भी बहुत महत्वपूर्ण मानता है जिसमेें किसी प्रकार की गंध नहीं होती।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- जिन लोगों का जन्म ही सुविधा संपन्न परिवारों में होता है वह अभावों का अर्थ नहीं जानते। तब वह लोग अपनी सुविधाओं के बारे में यह सोचते हैं कि यह तो उनको जन्मजात विरासत में मिली है। इसके अलावा अपने लिये उपलब्ध धन तथा भौतिक उपलब्ध साधनों का महत्व नहीं समझते। ऐसे में जब किसी कारण वश जब उनको उन सुविधाओं से वंचित हो पड़ता है तब पता लगता है कि वास्तव में उनका क्या मोल है?
इस संदेश में भारत में उपलब्ध जल संपदा का उदाहरण ले सकते हैं। विश्व के अनेक वैज्ञानिकों के अनुसार भारत में भू जल स्तर किसी भी अन्य देश से अधिक है। प्रकृत्ति की इस कृपा का महत्व हम कम वर्षा काल में भी नहीं कर पाते क्योंकि भूजल स्तर इतना तो उपलब्ध हो ही जाता है कि हमारा काम चल जाये। जिन देशों में यह उपलब्ध नहीं है वहां एक वर्ष की अल्प वर्षा में ही अकाल का महान प्रकोप उपस्थित हो जाता है। भारत में वह लोग जो पानी का अपव्यय करते हैं और उनका विदेश में-खासतौर से मध्य एशिया में-प्रवास होता है तब उनको वहां पता लगता है कि पानी कितना महत्वपूर्ण है। इतना ही नहीं भारत के ही कुछ रेगिस्तानी भागों में जाने पर भी उनको पता लगता है कि पानी का कितना महत्त है? कहने का तात्पर्य यह है कि जो वस्तु उपलब्ध है उसका महत्व तब पता लगता है जब वह हाथ से निकल जाती है।
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Sunday, April 5, 2009

चाणक्य नीतिः उच्च कुल में उत्पन्न होने पर भी विद्या रहित होने से क्या लाभ?

किं कुलेन विशालेन विद्याहीनेन देहिनाम्।
दुष्टकुलीनोऽपि विद्वांश्च देवैरपि सुपूज्यते।।

हिंदी में भावार्थ- आचार्य चाणक्य कहते हैं कि प्रतिष्ठित कुल में जन्म लेने के बावजूद ज्ञान और विद्या से रहित होने वाले व्यक्ति से समाज को कोई लाभ नहीं होता। उससे तो निम्म कोटि में उत्पन्न व्यक्ति धन्य है जो विद्वता अजिर्त कर समाज में सम्मान पाते हैं।
विद्वान् प्रशस्यते लोक विद्वान् गच्छति गौरवम्।
विद्ययां लभते सर्व विद्या सर्वत्र पूज्यते।।

हिंदी में भावार्थ-सारे संसार में विद्वान ही प्रशंसा के योग्य होते हैं और उनका अपनी विद्या े कारण गौरव प्राप्त होता है। विद्या का यह गुण है कि उससे प्राप्त करने वाले व्यक्ति का सभी जगह सम्मान हेाता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-चाहे कोई व्यक्ति कितने भी धनी,प्रतिष्ठत और उच्च कुल में पैदा क्यों न हुआ अगर उसके पास विद्या और ज्ञान नहीं है तो उसका समाज में कोई हृदय से सम्मान नहीं करता। यह अलग बात है कि धनी, बाहूबली और उच्च परिवार का होने के कारण किसी व्यक्ति के समक्ष कोई उसका दोष नहीं कहता और दिखाने के लिये सामने सभी वाह वाह करते हैं पर हृदय से उसका सम्मान नहीं होता। यह सही है कि धन जीवन की जरूरत है पर मान सम्मान से जीन में भी मनुष्य की शान होती है। समाज तभी किसी व्यक्ति का सम्मान करता है जब वह अपने कर्म से जनहित मेें काम करता है। जिसके पास विद्या है वही इस सत्य को जानते हैं इसलिये समाज को भी यही शिक्षा देते हैं। विद्या के बिना मनुष्य पशु की तरह बनकर रह जाता है। चाहे व्यक्ति गरीब हो या अमीर, राजा हो या रंक, और स्त्री हो या पुरुष विद्यावान व्यक्ति का ही सम्मान करते हैं क्योंकि उससे उनको आपातकाल में बौद्धिक सहायता मिलती है।
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Thursday, April 2, 2009

चाणक्य नीतिः अर्थोपासक विद्वान समाज के किसी काम के नहीं होते

अर्थार्थीतांश्चय ये शूद्रन्नभोजिनः।
त द्विजः कि करिष्यन्ति निर्विषा इन पन्नगाः।।


हिंदी में भावार्थ- नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि अर्थोपासक विद्वान समाज के लिये किसी काम के नहीं है। वह विद्वान जो असंस्कारी लोगों के साथ भोजन करते हैं उनको यश नहीं मिल पता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- इस देश का अध्यात्मिक ज्ञान सदेशों के अनमोल खजाने से भरा पड़ा है। उसका कारण यह है कि प्राचीन विद्वान अर्थ के नहीं बल्कि ज्ञान के उपासक थे। उन्होंने अपनी तपस्या से सत्य के तत्व का पता लगाया और इस समाज में प्रचारित किया। आज भी विद्वानों की कमी नहीं है पर प्रचार में उन विद्वानों को ही नाम चमकता है जो कि अर्थोपासक हैं। यही कारण है कि हम कहीं भी जाते हैं तो सतही प्रवचन सुनने को मिलते हैं। कथित साधु संत सकाम भक्ति का प्रचार कर अपने भोले भक्तों को स्वर्ग का मार्ग दिखाते हैं। यह साधु लोग न केवल धन के लिये कार्य करते हैं बल्कि असंस्कारी लोगों से आर्थिक लेनदेने भी करते हैं। कई बार तो देखा गया है कि समाज के असंस्कारी लोग इनके स्वयं दर्शन करते हैं और उनके दर्शन करवाने का भक्तों से ठेका भी लेते हैं। यही कारण है कि हमारे देश में अध्यात्मिक चर्चा तो बहुत होती है पर ज्ञान के मामले में हम सभी पैदल हैं।
समाज के लिये निष्काम भाव से कार्य करते हुए जो विद्वान सात्विक लोगों के उठते बैठते हैं वही ऐसी रचनायें कर पाते हैं जो समाज में बदलाव लाती हैं। असंस्कारी लोगों को ज्ञान दिया जाये तो उनमें अहंकार आ जाता है और वह अपने धन बल के सहारे भीड़ जुटाकर वहां अपनी शेखी बघारते हैं। इसलिये कहा जाता है कि अध्यात्म और ज्ञान चर्चा केवल ऐसे लोगों के बीच की जानी चाहिये जो सात्विक हों पर कथित साधु संत तो सार्वजनिक रूप से ज्ञान चर्चा कर व्यवसाय कर रहे हैं। वह अपने प्रवचनों में ही यह दावा करते नजर आते हैं कि हमने अमुक आदमी को ठीक कर दिया, अमुक को ज्ञानी बना दिया।
अतः हमेशा ही अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने के लये ऐसे लोगों को गुरु बनाना चाहिये जो एकांत साधना करते हों और अर्थोपासक न हों। उनका उद्देश्य निष्काम भाव से समाज में सामंजस्य स्थापित करना हो।
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Sunday, February 8, 2009

चाणक्य संदेश: धन की शोभा उसके व्यय करने में हैं

1.मन की शुद्ध भावना से यदि लकड़ी, पत्थर या किसी धातु से बनी मूर्ति की पूजा की जायेगी तो सब में व्याप्त परमात्मा वहां भी भक्त पर प्रसन्न होंगें। अगर भावना है तो जड़ वस्तु में भी भगवान का निवास होता है ।

2.इस क्षण-भंगुर संसार में धन-वैभव का आना-जाना सदैव लगा रहेगा। लक्ष्मी चंचल स्वभाव की है। घर-परिवार भी नश्वर है। बाल्यकाल, युवावस्था और बुढ़ापा भी आते हैं और चले जाते हैं। कोई भी मनुष्य उन्हें सदा ही उन्हें अपने बन्धन में नहीं बाँध सकता। इस अस्थिर संसार में केवल धर्म ही अपना है। धर्म का नियम ही शाश्वत है और उसकी रक्षा करना ही सच्चा कर्तव्य है।

3.सच्ची भावना से कोई भी कल्याणकारी काम किया जाये तो परमात्मा की कृपा से उसमें अवश्य सफलता मिलेगी। मनुष्य की भावना ही प्रतिमा को भगवान बनाती है। भावना का अभाव प्रतिमा को भी जड़ बना देता है।

4.विद्या की शोभा उसकी सिद्धि में है । जिस विद्या से कोई उपलब्धि प्राप्त हो वही काम की है।

5.धन की शोभा उसके उपयोग में है । धन के व्यय में अगर कंजूसी की जाये तो वह किसी मतलब का नहीं रह जाता है, अत: उसे खर्च करते रहना चाहिऐ।
6.तेल में जल नहीं मिल सकता, घी में जल नहीं मिलता. पारा किसी से नहीं मिल सकता। इसी प्रकार विपरीत स्वभाव और संस्कार वाले एक दूसरे से नहीं मिल सकते।

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Tuesday, October 14, 2008

चाणक्य सन्देश: प्रत्युपकार से मनुष्य अपनी रक्षा करता है

1.पाँव धोने का जल और संध्या के उपरांत शेष जल विकारों से युक्त हो जाता अत: उसे उपयोग में लाना अत्यंत निकृष्ट होता है। पत्थर पर चंदन घिसकर लगाना और अपना ही मुख पानी में देखना भी अशुभ माना गया है।
२.बिना बुलाए किसी के घर जाने की बात, बिना पूछे दान देना और दो व्यक्तियों के बीच वार्तालाप में बोल पडना भी अधर्म कार्य माना जाता है।
३.शंख का पिता रत्नों की खदान है। माता लक्ष्मी है फिर भी वह शंख भीख माँगता है तो उसमें उसके भाग्य का ही खेल कहा जा सकता है।
४.उपकार करने वाले पर प्रत्युपकार, मारने वाले को दण्ड दुष्ट और शठ से सख्ती का व्यवहार कर ही मनुष्य अपनी रक्षा कर सकता है।

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Wednesday, October 1, 2008

चाणक्य नीति:कांच को मुकुट में जड़वाने से मणि का मोल कम नहीं होता

१.मन के संयम के बिना कोई दूसरा तप नहीं है, संतोष जैसा कोई सुख और तृष्णा जैसा कोई भयंकर रोग नहीं है और दया जैसा कोई धर्म नहीं है.
२.कोई राजवंश का व्यक्ति मणि रुपी रत्न को पैर की उँगलियों में धारण करे और कांच को सिर पर मुकुट में जड्वाकर धारण करे तो भी मणि का मूल्य कम नहीं हो जाता और बाजार में उसकी कीमत वही रहती है और कांच का मूल्य भी कम ही रहता है.

संक्षिप्त व्याख्या
- यहाँ अभिप्राय यह है की किसी गुणी व्यक्ति का उच्च वर्ग के लोग सम्मान न करे तो यह समझ नहीं लेना चाहिऐ कि उसके गुण का कोई मोल नहीं है और उसी तरह दुष्ट व्यक्ति को अगर उसके भय और दुर्गुणों के कारण सम्मान मिलता तो भी उसका कोई मोल नहीं है. वैसे आजकल हम देख रहे हैं कि अनुचित तरीके से धन बटोरने वाले और दूसरों को भय देने वाले लोग समाज में अधिक सम्मान पा रहे हैं. लोग किसी भले की बजाये गुंडे से संबंध रखकर अपने को सुरक्षित समझते हैं पर मन से उनका सम्मान नहीं करते. समाज को अपने रचनात्मक कार्यों के लिए अंतत: गुणी और ज्ञानी व्यक्ति की ही आवश्यकता होती है. वैसे भी जिन्होंने दुष्ट व्यक्तियों का संग किया उन्हें अपने जीवन से हाथ धोना पडा है ऐसे एक नहीं हजारों उदाहरण हमारे सामने हैं.
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Tuesday, August 5, 2008

चाणक्य नीतिःसचेत न रहें तो बीमारी और दुश्मन हमला कर देते हैं

1.निरंतर परिश्रम करना ही अपनी निर्धनता हटाने का सबसे अधिक अच्छा उपाय है। परिश्रमी कभी निर्धन नहीं रह सकता। उद्यम करने वाले को उसका भाग्य का लिखा मिलता है। अगर कोई सिंह सो रहा है तो उसके मूंह में पशु अपने आप नहीं चले जाते। अगर वह परिश्रम न करे तो उसे भी भूखा मरना पड़ता है।
2.भगवान का नाम जपने से सभी पाप अपने आप नष्ट हो जाते हैं। प्राचीन ग्रंथों में पापों के प्रायश्चित को के रूप में तप का ही महत्व प्रतिपादित किया गया है, जो व्यक्ति निरंतर जप करता रहता है उसके पाप तो रह ही नहीं सकते।
3.उत्तर का प्रत्युत्तर देना ही झगड़े का कारण बनता है। अगर किसी ने अपशब्द कहें हैं और दूसरा भी उसके उत्तर में अपशब्द कहता है तो झगड़ा अपने आप शूरू हो जाता है। अगर की झगड़े का निराकरण करना है तो उसका सबसे अच्छा उत्तर मौन है।
4.जागरुक और सावधान व्यक्ति को किसी प्रकार के भय की आशंका नहीं रहती। प्रायः रोग, शत्रू तथा अपराधिक प्रवृत्ति के लोग असावधान और सोते व्यक्ति पर ही प्रहार करते हैं और उनके जागते ही भाग जाते हैं।


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Saturday, August 2, 2008

चाणक्य नीति: मनुष्यों में होते हैं कई प्रकार के अंधे

1.मनुष्य में अंधापन कई प्रकार का होता है। एक तो जन्मांध होते हैं जिनको वास्तव में आंखों से कुछ भी नहीं दिखता, पर दूसरे वह होते हैं जो आखें होते हुए भी नहीं देखते या न देखने का नाटक करते हैं।
2.सावन के अंधे को केवल हरियाली ही दिखती है। इसका तात्पर्य यह है कि आदमी को आंखें तो हैं पर वह सूखे में भी सावन की हरियाली की बात करता है क्योंकि उस पर केवल उसी का प्रभाव होता है
3.कामवासना के अंधे को कुछ भी नहीं सूझता उसकी आखों में केवल मद छाया रहता है। वह केवल इसी विषय पर बात कर अपना तथा दूसरों को मनोरंजन का प्रयास करता है। इसी प्रकार लोभी को भी अपने स्वार्थ की अलावा कुछ नहीं सूझता।
कुछ इस प्रकार के कामांध, मदांध और लोभी ऐसे मनुष्य होते हैं जो आंखें रहते हुए भी अंधों की तरह व्यवहार करते हैं। ऐसे लोग अपने नजरिये से दुनियां को देखते हैं और अपने स्वार्थ के अनुसार उसके स्वरूप का वर्णन करते हैं।

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Tuesday, May 13, 2008

चाणक्य नीति:शास्त्रों की निंदा करने वाले अल्पज्ञानी


1.आकाश में बैठकर किसी से वार्तालाप नहीं हो सकता, वहां कोई किसी का संदेश वाहक न जा सकता है और न वहां से आ सकता है जिससे कि एक दूसरे के यहां के रहस्यों जाना जा सकें। अंतरिक्ष के बारे में सामान्य मनुष्यों को कोई ज्ञान नहंी रहता पर फिर भी विद्वान लोगों ने सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण के बारे में ज्ञान कर लिया। ऐसे विद्वान प्रतिभाशाली और दिव्य दृष्टि वाले होते हैं।

2.वेद के ज्ञान की गहराई न समझकर वेद की निंदा करने वाले वेद की महानता को कम नहीं कर सकते। शस्त्र निहित आचार-व्यवहार को कार्य बताने वाले अल्पज्ञ लोग शास्त्रों की मर्यादा को नष्ट नहीं कर सकते।

3.बुद्धिमान मनुष्य को कौवे से पांच बातें सीखनी चाहिए। छिपकर मैथुन करना, चारों और दृष्टि रखना अर्थात चैकन्ना रहना, कभी आलस्य न करना, तथा किसी पर विश्वास न करना।


संपादकीय व्याख्या-कई लोग भारतीय वेद शास्त्रों के बारे में दुष्प्रचार में लगे हैं। इनमें तो कई अन्य धर्मों के विद्वान भी हैं। उन्होंने इधर-उधर से कुछ श्लोक सुन लिये और अब वेदों के विरुद्ध विषवमन करते हैं। उनके बारे में वह कुछ नहीं जानते। लाखों श्लोकों में से दो चार श्लोक पढ़कर उन पर टिप्पणियां करना अल्पज्ञान का ही प्रतीक है। इन वेदों के अध्ययन से ऐसा लगता है कि आज अप्रासंगिक लगने वाले कुछ संदेश अपने समय में उपयुक्त रहे होंगे। भारतीय वेदों ने ही इस विश्व में सभ्यता स्थापित की है। वेदों मेें यह कहीं नहीं लिखा हुआ है कि समय के साथ अपने अंदर परिवर्तन नहीं लाओ।

आधुनिक विज्ञान में पश्चिम का गुणगान करने वालों को यह पता होना चहिए कि सूर्य ग्रहण और चंद्रग्रहण के बारे मेें भारतीय विद्वान बहुत पहले से ही जानते थे। भारत के अनेक पश्चिम को ही आधुनिक विज्ञान को सर्वोपरि मानता है जो आज भी पूर्ण नहीं है और प्रयोगों के दौर से गुजर रहा है।

Thursday, May 8, 2008

चाणक्य नीति:मुर्गे से चार गुण ग्रहण करें

प्रत्युत्थानं च युद्ध्र च संविभागं च बन्धुषु
स्वयमाक्रभ्य भुक्तं च शिक्षेेच्चात्वारि कुक्कुटात्

आचार्य चाणक्य कहते हैं कि मनुष्य को अपने जीवन में चार गुण मुर्गे से ग्रहण करना चाहिए, समय पर जागना, युद्ध की ललकार पर उसके लिए तैयार हो जाना, अपने परिवार के साथ मिलकर खाना और अपने खाने के खोज स्वयं करना।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-जितना ही जीवन में आधुनिक सुविधाओं का समावेश होता जा रहा है लोगों के उठने बैठने और सोने जागने की क्रियाओं पर उसका दुष्प्रभाव हुआ है। सुबह देर से उठने से शरीर में भारीपन रहता है और इसी कारण आदमी कई कामों में आलस करता है। कुछ विद्वान कहते हैं कि सुबह जल्दी उठने से दिमाग में फुर्ती रहती है जो कि जीवन में विकास के लिये आवश्यक होती है। देर से उठने से जो आलस होता है उससे आदमी अपने जीवन में चुनौतियों से भागता है और उससे उसके आत्मविश्वास में कमी आती है। इसलिये समय पर उठने और सोने के नियम बनाना चाहिए। अपने भोजन के मामले में स्वावलंबी होना चाहिए और भोजन परिवार के समस्त सदस्य मिलकर बैठकर करें। अनियमित जीवन से मानसिक अस्थिरता पैदा होती है और जीवन में स्वयं निरर्थक तनाव और संकट में घिर जाते हैं। जीवन में हमेशा ही संघर्ष के लिए तैयार रहना चाहिए।

Tuesday, January 8, 2008

चाणक्य नीति:भोजन के तत्काल बाद मेजबान का घर छोड़ दें

१.मन का संयम अर्थात शांति और स्थिर भाव के समान कोई दूसरा तप नहीं है, संतोष जैसा कोई सुख नहीं, तृष्णा जैसा दु:ख देने वाला और भयंकर रोग नहीं तथा दया जैसा स्वच्छ और अच्छा दूसरा कोई धर्म नहीं । अत: सुख के इच्छुक व्यक्ति को तृष्णा से बचना चाहिए तथा सफलतम जीवन में शांति,संतोष और दया को अपनाना चाहिए। इसी में महानता है।
२.जिस प्रकार सोने की चार विधियों-घिसना, काटना, तपाना तथा पीटने-से जांच की जाती है, उसी प्रकार मनुष्य की श्रेष्ठता की जांच भी चार विधियों-त्यागवृति, शील, गुण तथा सतकर्मो -से की जाती है।
३.संसार के दुखों से दुखित पुरुष को तीन ही स्थान पर थोडा विश्राम मिलता है- वह हैं संतान, स्त्री और साधूराजा की आज्ञा, पंडितों का बोलना और कन्यादान एक ही बार होता है।एक व्यक्ति का तपस्या करना, दो का एक साथ मिलकर पढ़ना, तीन का गाना, चार का मिलकर राह काटना, पांच का खेती करना और बहुतों का मिलकर युद्ध करनापक्षियों में कोआ, पशुओं में कुत्ता और मुनियों में पापी चांडाल होता है पर निंदा करने वाला सबसे बड़ा चांडाल होता है।

4.जिस प्रकार कोई गायिका निर्धन प्रेमी को नहीं पूछती, पराजित राजा को जनता मान नहीं देती, उसी प्रकार से सूखे और टूटे वृक्ष को पक्षी छोड़ जाया करते हैं। अत: अतिथि को चाहिए कि वह भोजन के तुरन्त बाद मेजबान का घर छोड़ दे।
5.यजमान के घर सर पुरोहित दक्षिणा लेकर और विद्या अर्जन के बाद विद्यार्थी गुरू के द्वार से चला जाता है उसी प्रकार से वन के जल जाने पर पहु-पक्षी वन का त्याग कर अन्यत्र पलायन कर जाते हैं।
लेखकीय अभिमत-चाणक्य एक महान विद्धान थे और इन अन्तिम दोनों संदेशों में उनका यही आशय है कि आदमी को और परिस्थियों को ध्यान में रखते हुए अपनी शारीरिक सुरक्षा और मान-सम्मान के लिए सतर्कता बरतना चाहिए।

Monday, January 7, 2008

चाणक्य नीति:कार्य में स्थिरता बिना सम्मान नहीं मिलता

१.जिसके कार्य में स्थिरता नहीं है, वह समाज में सुख नहीं पाता न ही उसे जंगल में सुख मिलता है. समाज के बीच वह परेशान रहता है और किसी का साथ पाने के लिए तरस जाता है.
२.गंदे पड़ोस में रहना, नीच कुल की सेवा, खराब भोजन करना, और मूर्ख पुत्र बिना आग के ही जला देते हैं.
३.कांसे का बर्तन राख से, तांबे का बर्तन इमले से,स्त्री रजस्वला कृत्य से और नदी पानी की तेज धारा से पवित्र होती है.
४.मनुष्य में अंधापन कई प्रकार का होता है. एक तो जन्म के अंधे होते हैं और आंखों से बिलकुल नहीं देख पाते और कुछ आँख के रहते हुए भी हो जाते हैं जिनकी अक्ल को कुछ सूझता नहीं है.
५.काम वासना के अंधे के कुछ नहीं सूझता और मदौन्मत को भी कुछ नहीं सूझता. लोभी भी अपने दोष के कारण वस्तु में दोष नहीं देख पाता. कामांध और मदांध इसी श्रेणी में आते हैं.
६.कुछ लोगों की प्रवृतियों को ध्यान में रखते हुए उनको वश में किया जा सकता है, और उनको वश में किया जा सकता है, लोभी को धन से, अहंकारी को हाथ जोड़कर, मूर्ख को मनमानी करने देने से और सत्य बोलकर विद्वान को खुश किया जा सकता है.

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