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Wednesday, June 22, 2011

चाणक्य नीति-ध्यान की महिमा जानना आवश्यक (dhyan ki mahima samjhana avshyak-chankya neeti in hindi)

          श्रीमद्भागवत में श्री कृष्ण कहते हैं कि यह संसार मेरे संकल्प के आधार पर ही स्थित है। इसका सीधा तात्पर्य यह है कि इस संसार में समस्त देहधारियों के जीवन का स्वरूप और आधार ही ध्यान है। हमारे जीवन में अक्सर उतार चढ़ाव आते हैं। जब अच्छा समय होता है तब हमें कुछ आभास नहीं होता पर बुरा समय आता है तो उस समय विलाप करते हैं। उस समय कभी भाग्य को दोष देते हैं तो कभी दूसरे मनुष्य या स्थिति को दोष देते हैं। यह सब भ्रम है। दरअसल जिस तरह परमात्मा का संसार उसके संकल्प के आधार पर बना है वैसे ही हमारा जीवन संसार भी हमारे संकल्प का आधार है। हम कभी अपने मन में चल रहे संकल्पों का अवलोकन नहीं करते पर उससे जो संसार बन रहा है उसे भोगना तो हमें ही होता है। इन संकल्पों में सदैव शुद्धता रहे इसके लिये ध्यान करने साथ ही ज्ञानी तथा विद्वान लोगों का दर्शन कर सत्संग का लाभ उठाना चाहिए।
           इस विषय में नीति विशारद चाणक्य नीति में कहा गया है कि
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             दर्शनध्यानसंस्पर्शे कूर्मी च पक्षिणी।
            शिशुं पालयते नित्यं तथा सज्जनसंगति।।
          ‘मछली, कछवी और मादा पक्षी चिडिया जिस प्रकार दर्शन, ध्यान और स्पर्श से अपने शिशुओं का पालन करती हैं उसी प्रकार उत्तम पुरुष की तरफ ध्यान करने से मनुष्य को भी लाभ होता है।’’
         पतंजलि योग में भी ध्यान का महत्व अत्यंत व्यापक ढंग से प्रतिपादन किया गया है। वैसे भी कहा जाता है कि हमारे धर्म की शक्ति का मुख्य बिंदु ध्यान है। श्रीमद्भागवत गीता में भी ध्यान को महत्व दिया गया है। योगासन करने के बाद किया गया ध्यान उसे पूर्णता प्रदान करता है। अनेक पशु पक्षी तो अपने ध्यान और दर्शन से ही बच्चों का पालन करते हैं। उनसे प्रेरणा लेना चाहिए।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

Friday, October 15, 2010

चाणक्य नीति-आंखों से देखकर ज़मीन पर पांव रखें (chanakya neeti in hindi-aankha aur paanv)

दृष्टिपूतं न्यसेत् पादं वस्त्रपूतं पिबेज्जलम्।
शास्त्रं वंदेद् वाक्यं मनः पूतं समाचरेत्।।
हिन्दी में भावार्थ-
नीति विशारद चाणक्य का कहना है कि दृष्टि से देखकर प्रथ्वी पर पांव रखें, कपड़े से छानकर पानी को पिऐं, शास्त्र से शुरु कर वाक्य बोलें और मन से सोचकर कार्य प्रारंभ करने पर उसे पूरा अवश्य करें।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जिंदगी में सावधानी के साथ ही चिंतन और मनन की आवश्यकता होती। अधिकतर लोग दूसरों की शान शौकत या दौलत देखकर वैसा ही बनने का सपना पाल लेते हैं। वह यह नहीं देखते कि किसने किस तरह अपनी जिंदगी में संघर्ष किया है। अनेक लोग हवाई किले बनाकर चल पड़ते हैं पर कामयाबी न मिलने पर संकट में पड़ जाते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि जीवन में हर कदम पर सोच समझकर ही अपना काम प्रारंभ करना चाहिए।
अनेक जगह लोग निरर्थक वार्तालाप करते हैं। अनेक बार तो बातचीत में झगड़े हो जाते हैं और नौबत खून खराब की आ जाती है। लोग अध्यात्म ग्रंथों की बजाय कल्पित साहित्य और फिल्मों से प्रभावित इतने हैं कि उनको यह पता नहीं है कि जिंदगी कितनी कठिन है और उसमें सपने देखना और उनको पूरा करना अलग अलग बातें हैं। खासतौर से नयी पीढ़ी को तो एकदम सुविधाभोगी जीवन के सपने प्रचार माध्यम दिखा रहे हैं। बंगला, कार, तथा घर में नौकर होने का ख्वाब सभी को है पर यह पता नहीं कि नौकर भी एक इंसान होता है जिसे बंगला और कार की तरह बेज़ान नहीं माना जा सकता। न ही हर नौकर फिल्म या धारावाहिक की तरह वफादार होता है। यही कारण है कि घरेलु नौकरों द्वारा किये जा रहे अपराधों की संख्या बढ़ रही है।
कहने का अभिप्राय यह है कि आंखें खुली होने के साथ ही बुद्धि भी सक्रिय रखना चाहिये। फिल्में देखना या कल्पित साहित्य पढ़ना बुरा नहीं है पर जीवन के यथार्थ का ज्ञान भी अपने आसपास की घटनाओं तथा पुराने लोगों से प्राप्त करना चाहिए।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Sunday, November 29, 2009

चाणक्य नीति-लोभी को धन दें तथा हठी को हाथ जोड़ें (lobhi aur hathi se bachen-chanakya niti)

लुब्धमथेंन गृह्णीयात् स्तब्धमंजलिकर्मणा।
मूर्ख छन्दोऽनृवृत्तेन यथार्थत्वेन पण्डितम्।।
हिंदी में भावार्थ-
नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि लोभी मनुष्य को धन देकर, हठी को हाथ जोड़कर, मूर्ख की इच्छा पूरी कर तथा बुद्धिमान को सही स्थिति बताकर अपने वश में किया जा सकता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-क्रोध या निराशा से जीवन में सफलता नहीं मिल सकती न ही केवल किसी की चाटुकारिता से कुछ मिलता है। जीवन में हमेशा रणनीति से काम करना चाहिये। वैसे तो अपने आसपास हमें लोभियों का समुदाय दिख ही रहा है। जिसे देखो वही अपने लिये धन जुटाना चाहता है। लोग इतना धन जुटा रहे हैं कि उनका पूरे जीवन में स्वयं उपयोग नहीं कर सकते पर फिर भी उनका मन नहीं भरता। अतः अपना काम करने पर किसी को पैसा देकर उसे करवाया जा सकता है। लोभ ने ही लोगों को मूर्ख बना रखा है अतः उनकी इच्छा पूर्ति कर ही उनसे काम निकाला जा सकता है। इसमें एक दूसरी समस्या है कि धन आने से लोगों में हठ आ जाता है। अपने समान वह किसी को कुछ नहीं समझते। अतः ऐसे लोगों से वाद विवाद करना भी ठीक है। वह कहते हैं कि ‘हम बड़े हैं’ तो उनसे बहस करने की बजाय हाथ जोड़कर उनकी बात स्वीकार कर लें। लोभियों मूर्खों तथा हठियों से बचना कठिन है क्योंकि उनका अस्तित्व सभी जगह है। ऐसे में अपने संपर्क बुद्धिमानों से अपने संबंध बनायें। अपने बुद्धिमान मित्रों को अपनी स्थिति से अवगत कराकर उनसे सलाह आदि लेना चाहिये। उनसे झूठ या मक्कारी करने अपने आपको धोखा देना है। इस तरह अगर जीवन में रणनीति से काम किया जाये तो क्रोध और निराशा से बचा जा सकता है।
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Tuesday, November 3, 2009

चाणक्य नीति-कुछ पुरुषों में भी विवेक नहीं होता (purush aur vivek-chankya niti)

मातृवत् परदारांश्चय परद्रव्याणि लोष्ठवत्।
आत्मवत् सर्वभूतानि यः पश्यति स नरः।।

हिंदी में भावार्थ-दूसरों की पत्नी को माता तथा धन को मिट्टी के ढेले की भांति समझना चाहिये। इस संसार में वह यथार्थ रूप से मनुष्य है जो सारे प्राणियों को अपनी आत्मा की भांति देखने वाला मानता है।
यो मोहन्मन्यते मूढो रक्तेयं मयि कामिनी।
स तस्य वशगो मूढो भूत्वा नृत्येत् क्रीडा-शकुन्तवत्।।

हिंदी में भावार्थ-नीति विशारद चाणक्य के अनुसार कुछ पुरुषों में विवेक नहीं होता और वह सुंदर स्त्री से व्यवहार करते हुए यह भ्रम पाल लेते हैं कि वह वह उस पर मोहित है। वह भ्रमित पुरुष फिर उस स्त्री के लिये ऐसे ही हो जाता है जैसे कि मनोरंजन के लिये पाला गया पक्षी।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हर व्यक्ति को अपने अंदर विवेक धारण करना चाहिये। कुछ लोग स्त्रियों के विषय में अत्यंत भ्रमित होते हैं। उनको लगता है कि कोई स्त्री उनसे अच्छी तरह बात कर रही है तो इसका आशय यह है कि वह उन पर मोहित है-यह उनका केवल एक भ्रम है। स्त्रियों का स्वभाव तथा वाणी कोमल होती है और इसी कारण वह हमेशा मृदभाषा से पुरुषों का मन मोह लेती हैं पर कुछ अज्ञानी और अविवेकी पुरुष यह भ्रम पाल कर अपने आपको ही कष्ट देते हैं कि वह उनके प्रति आकर्षित है।
नीति विशारद चाणक्य ऐसे व्यक्तियों की तरफ संकेत करते हुए कहते हैं कि दूसरे की स्त्री को माता के समान समझना चाहिये। उसी तरह दूसरे के धन को मिट्टी का ढेला समझना चाहिये। वह यह भी कहते हैं कि इस संसार में वही मनुष्य श्रेष्ठ है जो सभी लोगों को देह नहीं बल्कि इस संसार में दृष्टा की तरह उपस्थित आत्मा ही मानता है।

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Wednesday, September 16, 2009

चाणक्य नीति-कोल्हू में कुचले जाने पर भी ईख मिठास नहीं छोड़ती (chankya niti-kolhu aur eekh)

छिन्नोऽपि चन्दनतरुनं जहाति गन्धं।
वृद्धोऽपि वारणपतिर्न जहाति लीलाम्।
यन्त्रार्पितो मधुरतां न जहाति चेक्षुः
क्षीणोऽपि न त्यजति शीलगुणान् कुलीनः।।
हिंदी में भावार्थ-
कट जाने पर चंदन का वृक्ष अपनी सुंगध नहीं छोड़ता। बूढ़ा हो जाने पर भी हाथी विलसिता से विरक्त नहीं होता और ईख कोल्हू में पेरे जाने पर भी अपनी मिठास नहीं छोड़ती उसी प्रकार गुणवान और कुलीन मनुष्य दरिद्र हो जाने पर दया तथा अन्य गुणों को नहीं छोड़ता।
हिंदी में भावार्थ-मनुष्य को अपने चरित्र पर दृढ़ होना चाहिये और वही उसके गुणवान होने का प्रमाण है। जीवन में अपने कार्य के प्रति हमेशा उत्साहित रहकर ही कोई सफलता प्राप्त की जा सकती है। धन संपदा तो चंचल लक्ष्मी की प्रतीक हैं जो कभी इस घर जाती तो कभी उस घर। जिसके पास धन है वह अपने अंदर ढेर सारे गुण होने का बखान करता है। लोग भी यह मानते हैं कि जिसके पास धन है वह बड़ा आदमी ज्ञानी और गुणवान है। आजकल तो धन संपदा होना ही कुलीन होने का प्रतीक हो गयी है। जिसके पास धन है वह साहसी, ज्ञानी, और शक्तिशाली होने का प्रदर्शन करते हैं पर जैसे ही उनके पास से धन चला जाता है वह टूट जाते हैं। लोग धन संचय के प्रति इतना आकर्षित होते हैं अन्य गुणों के संचय पर उनका ध्यान ही नहीं जाता। आम तौर से सभी यही समझते हैं कि धन आने से समाज में उनको कुलीन, दयालु और ज्ञानी मान लिया जायेगा। मगर यह सच यह है कि गुणों की पहचान तो विपत्ति में ही होती है। जो कुलीन और गुणवान हैं वह दरिद्रता आने पर भी तनाव रहित होते अपनी दया, बौद्धिक कुशाग्रता और मधुरवाणी का त्याग नहीं करते और समाज के सामने यह एक आदर्श होता है।
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Saturday, August 29, 2009

चाणक्य नीति-इस धरती पर तीन रत्न हैं (chnakya niti-three gold coin on earth)

खलानां कपटकानां च द्विविधैव प्रतिक्रिया।
उपानंमुखभंगो वा दूरतो वा विसर्जनम्।।
हिंदी में भावार्थ-
दुर्जन और कांटो को अपने से दूर करने का उनका मूंह कुचन दें अथवा उनसे दूर होकर उनका त्याग करें।
पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जनमन्नं सुभाषितम्।
मूढ़ैः पाषाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा विधीयते।।
हिंदी में भावार्थ-
इस प्रथ्वी पर तीन ही रत्न हैं, जल, अन्न और मधुर वचन किन्तु मूर्ख लोग इनका महत्व न समझते हुए पत्थर के टुकड़ों को ही रत्न कहते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-आजकल की सभ्यता भिन्न हैं। फिर पूरी दुनियां में इस तरह के कानून बने गये हैं कि बेईमान, अधर्मी, कुकर्मी तथा अन्य निंदक गतिविधियों में शामिल लोगों को सजा राज्य द्वारा नियुक्त न्यायाधीश ही दे सकते हैं इसलिये दुर्जन लोगों को स्वयं दंड देना ठीक नहीं है। अतः बेहतर यह है कि जिसका व्यवहार खराब हो या आचरण अनैतिक हो ऐसे दुष्ट व्यक्ति से परे ही रहें। याद रखें कि तात्कालिक लाभ के लिये कभी दुर्जन की संगत अच्छी लग सकती है पर कालांतर में उसके परिणाम बुरे होते हैं।
ऐसे दुष्ट लोग न केवल क्रूर बल्कि मूर्ख भी होते हैं, इसलिये इस धरती पर विद्यमान तीन रत्नों-जल, अन्न तथा मधुर वचनों-की पहचान उनको नहीं होती और पत्थर के टुकड़ों को ही रत्न मानते हैं। इस विश्व मेें जीवन की धारा बहाने वाले दो रत्न जल और अन्न तो प्रकृत्ति द्वारा प्रदाय किये जाते हैं पर मधुर तथा प्रिय वचन मनुष्य को स्वयं ही बोलना चाहिए। धन और पत्थर को सोना मानकर अपना जीवन नष्ट करना ही है। दुष्ट और मूर्ख लोग अपना सारा ध्यान सपंत्ति के संग्रह की ओर लगाते हैं और वह इसके लिये दूसरों को प्रेरित भी करते हैं ताकि अपनी श्रेष्ठता साबित कर सके। उनकी बात को न मानकर जहां देर को तृप्त करने के लिये शुद्ध जल और अन्न मिले वहीं रहते हुए जितना मिले उससे संतुष्ट हो जाना चाहिये। इसके अलावा अपने मूंह से हमेशा पवित्र वचन बोलना चाहिये। यह तीन रत्न हैं जिनका उपभोग करना ही हमें जीवन भर संतोष दे सकता है।
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Thursday, July 30, 2009

चाणक्य नीति-निर्धन को हमेशा अयोग्य न समझें (chankya niti in hindi)

धनहीनो न हीनश्च धनिकः स सुनिश्चयः।
विद्यारत्नेद यो हीनः स हीनः सर्ववस्तुष।।
हिंदी में भावार्थ-
नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि धन से रहित व्यक्ति को
दीन हीन नहीं समझना चाहिये अगर वह विद्या ये युक्त है। जिस व्यक्ति के पास धन और अन्य वस्तुयें हैं पर अगर उसके पास विद्या नहीं है तो वह वास्तव में दीन हीन है।
दुष्टिपतं न्यसेत् पादं वस्त्रपूतं पिबेजलम्।
शास्त्रपूतं वदेद् मनः पूतं समाचरेत्।।
हिंदी में भावार्थ-
आंखों से देखकर जमीन पर पांव रखें। कपड़े से छान कर पानी पियो। शास्त्र से शुद्ध कर वाक्य बोलें और कोई भी पवित्र काम मन लगाकर संपन्न करें।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-समाज में निर्धन आदमी को अयोग्य मान लेने की प्रवृत्ति है और यही कारण है कि उसमें वैमनस्य फैल रहा है। एक तरफ धनी मानी लोग यह अपेक्षा करते हैं कि कोई उनकी रक्षा करे दूसरी तरफ अपनी रक्षा के लिये शारीरिक सामथ्र्य रखने वाले निर्धन व्यक्ति का सम्मान करना उनका अपने धन का अपमान लगता है। संस्कार, संस्कृति और धर्म बचाने के लिये आर्तनाद करने वाले धनी लोग अपने देश के निर्धन लोगों का सम्मान नहीं करते और न ही उनके साथ समान व्यवहार उनको पसंद आता है। धनीमानी और बाहूबली लोग देश पर शासन तो करते हैं पर उसे हर पल प्रमाणिक करने के उनके शौक ने उनको निर्धन समाज की दृष्टि में घृणित बना दिया है।
यह एक सर्वमान्य तथ्य है कि युद्ध में कोई धनीमानी नहीं बल्कि गरीब परिवारों के बच्चे जाते हैं। अमीर तो उनकी बहादुरी और त्याग के वजह से सुरक्षित रहते हैं पर फिर भी उनके लिये गरीब और उसकी गरीबी समाज के लिये अभिशाप है। गरीब की गरीबी की बजाय उसे ही मिटा डालने के लिये उनकी प्रतिबद्धता ने निचले तबके का शत्रु बना दिया है। यह देश दो हजार वर्ष तक गुलाम रहा तो केवल इसलिये कि समाज के धनी और बाहूबली वर्ग ने अपना दायित्व नहीं निभाया।

आदमी को हमेशा ही सतर्क रहना चाहिये। कहीं भी जमीन पर पांव रखना हो तो उससे पहले अपनी आंखों की दृष्टि रखना चाहिये। आजकल जिस तरह सड़क पर हादसों की संख्या बढ़ रही है उससे तो यही लगता है कि लोग आंखों से कम अनुमान से अधिक चलते हैं। अधिकतर बीमारियां पानी के अशुद्ध होने से फैलती हैं और जितना स्वच्छ पानी का उपयोग किया जाये उतना ही बीमार पड़ने का खतरा कम हो जाता है। इसके अलावा निरर्थक चर्चाओं से अच्छा है आदमी धार्मिक ग्रंथों और सत्साहित्य की चर्चा करे ताकि मन में पवित्रता रहे।
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Thursday, July 23, 2009

चाणक्य नीति-काम करने का गुण सिंह और बगुले से सीखें (chankya niti-singh aur bagule ke gun)

प्रभूतं कार्यमल्पं या यन्नरः कर्तुमिच्छति।
सवरिमभेण तत्कार्य सिंहादेके प्रचक्षते।।
हिंदी में भावार्थ-
कार्य छोटा हो या बड़ा उससे पूरी शक्ति के साथ करने का गुण सिंह से सीखना चाहिये।
इंद्रियाणि च संयभ्य बकवत् पण्डितो नरः।
देशकालबलं ज्ञात्वां सर्वकार्याणि साधयेत्।।
हिंदी में भावार्थ-
ज्ञानी लोगों को चाहिये कि अपनी इंद्रियों को वश में कर देशकाल के अनुसार अपनी शक्ति को पहचाते हुए कोई भी कार्य एकाग्रता से करने का गुण बगुले से सीखे।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-आज के प्रतियोगी युग में जहां आदमी को अधिक सतर्कता, एकाग्रता तथा अपनी पूरी शक्ति से काम करने की आवश्यकता होती है वहां लोग लापरवाही तथा और बिना सोचे समझे कार्य करने के आदी होते जा रहे हैं। जीवन की सफलता का कोई संक्षिप्त मार्ग नहीं है। दूसरों के कहने में आकर बिना जांचे परखे काम प्रारंभ करने का अर्थ है कि अपने लिये नाकामी और तनाव मोल लेना। इतना ही नहीं दूसरों की सफलता को देखकर उन जैसा ही जल्दी बनने की इच्छा अनेक लोगों को कर्जे और अपराध के दलदल में डाल देती है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि लोगों ने परिश्रम के काम को छोटा काम मान लिया है। हर कोई चाहता है कि वह आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित कार्यालयों में काम करे जहां वह समाज में दूसरे लोगों को सभ्य लगे। परिश्रम के प्रति यह अरुचि समाज में वैमनस्य का भी कारण बन रही है। परिश्रमी व्यक्ति को असम्मानित दृष्टि से देखना उसके अंदर कुंठा को जन्म देती है जो अंततः कहीं घृणा तो कहीं अपराध के रूप में परिवर्तित हो जाती है। इसके अलावा जिन लोगों को परिश्रम से परहेज है वह जिंदगी में अधिक तरक्की भी नहीं कर पाते-केवल ख्वाब देखते हुए तनाव में जीते हैं। काम करने का गुण तो शेर से सीखना चाहिये जो अपने लिये भोजन स्वयं जुटाने के लिये परिश्रम करता है। एकाग्रता बगुले से सीखना चाहिये। जो काम करना है उसी में भविष्य की सफलता मानकर एकाग्रता से उसमें लगना चाहिये।
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Wednesday, July 22, 2009

चाणक्य नीति-विद्वान को धर्म संग्रह की चिंता करना चाहिए (chankya niti-gyani aur dharm sangrah)

नाहारं विच्तयेत् प्राज्ञो धर्ममेकं हि चिन्तयेत्।
आहारा हि मनुष्याणां जन्मना सह जायते।।
हिंदी में भावार्थ-
विद्वान को भोजन तथा अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति की चिंता छोड़कर केवल धर्म संग्रह की चिंता करना चाहिए क्योंकि परमात्मा ने दैहिक आवश्यकताओं की पूर्ति की व्यवस्था पहले ही कर दी है।
जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्वते घटः।
स हेतु सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य चः।।
हिंदी में भावार्थ-
पानी की एक एक बूंद से जिस तरह घड़ा भर जाता है उसी प्रकार थोड़े से अभ्यास से सभी प्रकार विद्यायें, धार्मिक ज्ञान तथा धन प्राप्त किया जा सकता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जीवन में सफलता प्राप्त करने का कोई संक्षिप्त मार्ग नहीं है। जीवन में धीरज के साथ अपने कर्म करने के साथ ही ज्ञानार्जन का अभ्यास सतत करना ही सफलता का मंत्र है। संक्षिप्त मार्ग ढूंढने का आशय है अप्राकृतिक साधनों की तरफ आकर्षित होकर अपने लिये विपत्तियों का बुलाना। लोग एक दिन में ही लखपति और फिर करोड़पति बनना चाहते हैं। सच बात तो यह है कि अवैध या अपराधिक कार्यों में ही यह संभव है पर स्वच्छ और पवित्र व्यवसायों में तो धीरज के साथ ही उन्नति की तरफ बढ़ा जाता है। इस बात पर विचार कर सुख के साथ शांति पूर्वक जीवन की इच्छा करने वालों को अपने व्यवसाय और नौकरी के साथ ही अध्यात्मिक विषयों में भी रुचि लेना चाहिए।
इतना ही नहीं जीवन में परिश्रम से बचने का कोई प्रयास नहीं करना चाहिए। काम करने से ही आत्मविश्वास बढ़ता है और इसके लिये जरूरी है कि अपने प्रयास में नैतिकता और ईमानदारी बरतें। अपने व्यवसाय और अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्ति के कार्य के निरंतर अभ्यासरत रहने से उपलब्धियों प्राप्त होती हैं और इस पर विश्वास करना चाहिए।
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Wednesday, July 8, 2009

चाणक्य नीति-पुत्र और शिष्य को डांटना भी चाहिये (chankya niti)

लालनाद् बहवो दोषस्ताहृनादफ बहवो गुणाः।
तस्मापुत्रं च शिष्यं च ताडयेन्न लालयेत्।।
हिंदी में भावार्थ-
नीति विशारद चाणक्य कहते हैं अधिक प्यार करने से पुत्र और शिष्य में अनेक दोष आ जाते हैं जबकि उनको ताड़ना देने से विकास होता है। अतः पुत्र शिष्य को डांटते रहना चाहिये।
माता शत्रुः पिता वैसे येन बालो न पाछितः।
न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा।।
हिंदी में भावार्थ-
ऐसे माता पिता अपनी संतान के लिये शत्रु समान है जो उसे शिक्षित नहीं करते। अशिक्षित व्यक्ति का बुद्धिमानों की सभा में भारी अपमान होता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-आजकल बच्चों को शिक्षा दिलाना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि उनके समक्ष अपने नैतिक आचरण और व्यवहार का प्रमाण भी प्रस्तंुत करना चाहिये। बच्चों का प्यार करना चाहिये पर इस वजह से उनके मन में उद्दंडता की प्रवृत्ति न आये इस पर ध्यान करना जरूरी है। इसलिये उनके द्वारा गलती किये जाने पर उनको डांटने के साथ समझाना चाहिये। इसके अलावा शैक्षणिक जीवन के दौरान ही उनमें यह प्रवृत्ति भी भरना चाहिये कि जिससे वह घर और बाहर की जिम्मेदारी उठा सकें। पढ़ने के अलावा उनके अंदर परिश्रम करने का भाव भरना चाहिये। अगर सारी सुविधायें शिक्षा के दौरान दी जायेंगी और परिश्रम से परे रखा जायेगा तो फिर बाद में उसे परेशानी आ सकती है।
यह भाव मन में नहीं लाना चाहिये कि अभी तो बच्चा पढ़ रहा है बाद में समझ जायेगा बल्कि उसके हृदय में जीवन के ं नैतिक और अध्यात्मिक भाव की भी स्थापना करने का प्रयास करना चाहिये।
आपने देखा होगा कि अधिकतर बड़े बूढ़े यह शिकायत करते हैं कि उन्होंने अपने लड़के को खूब पढ़ाया पर अब वह उनको पूछ नहीं रहा। अगर आप उन्हें यह बतायें कि यह संस्कार ही आपने उसके मन में नहीं भरे तो आप फिर यह आशा क्यों कर रहे हैं तो वह उत्तर नहीं दे पायेंगे। एक तो वह लोग होते हैं जो आम पाने की चाह में बबूल का पेड़ बोते हैं। हम ऐसे लोगों को मूर्ख कहते हैं पर उन लोगों के बारे में क्या कहा जाये जो पेड़ ही नहीं बोते पर फल की आकांक्षा करने लगते हैं।
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Saturday, June 13, 2009

चाणक्य नीति-ईख में गुड़ की तरह ही आत्मा है देह में

वाचः शौचं च मनसः शौचन्द्रियनिग्रहः।
सर्वभूतिे दया शौचं एतच्छौत्रं पराऽर्थिनाम्।।
हिंदी में भावार्थ-
वाणी की पवित्रता, मन की स्वच्छता, इंन्द्रियों पर नियंत्रण, समस्त जीवों पर दया और भौतिक साधनों की शुद्धता ही वास्तव में धर्म है।
पुष्पे गंधं तिले तैलं काष्ठेऽग्निं पयसि घृतम्।।
इक्षौ गुडं तथा देहे पश्चाऽऽत्मानं विवेकतः।।
हिंदी में भावार्थ-
पुष्पों में सुंगध, तिल में तेल, लकड़ी में आग और ईख में गुड़ प्रकार विद्यमान होते हुए भी दिखाई नहीं देता वैसे ही शरीर में आत्मा का निवास है। इस बात को विवेकशील व्यक्ति ही समझ पाते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस विश्व में अनेक प्रकार के धर्म प्रचलन में आये हैं और हरेक में एक मध्यस्थ होता है जो उसका आशय समझाता है-आम आदमी उसकी बात पर ही यकीन कर लेता है। अनेक तरह की कहानियां सुनाकर लोगों की धार्मिक भावनाओं का दोहन किया जाता है। धर्म के नाम पर शांति की बात इसलिये की जाती है क्योंकि उसी के नाम पर सबसे अधिक झगड़े होते हैं। कहीं धार्मिक मध्यस्थ का प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ होता है तो कहीं उसका सामाजिक महत्व ही इस प्रकार का होता है उसे राज्य और समाज से अप्रत्यक्ष रूप में लाभ मिलता है। धर्म के आशय इतने बड़े कर दिये गये हैं कि लोगों को यही पता नहीं रह जाता कि वह क्या है?
धर्म का आशय है वाणी, मन और विचारों में शुद्धता होना साथ ही अपने नियमित कर्म मेें पवित्रता रखना। केवल मनुष्य ही नहीं सभी प्रकार के जीवों पर दया करना ही मनुष्य का धर्म है। शेष बातें तो केवल सामाजिक एवं जातीय समूह बनाकर शक्तिशाली लोग उन पर नियंत्रण बनाये रखने के लिये करते हैं।

अक्सर लोग आत्मा को लेकर भ्रमित रहते हैं। उनके लगता है कि अपनी इंद्रियों से जो सुनने, बोलने, देखने और खाने की क्रियायें हम कर रहे हैं। यह केवल एक संकीर्ण सोच है। यह हमारी देह है जिसकी समस्त इंद्रियां स्वतः इसलिये कर पाती हैं क्योंकि आत्मा उनको ऊर्जा देती है। वही आत्मा हम है। जिस तरह ईख (गन्ने) में गुड़ दिखाई नहीं देता उसी तरह आत्मा भी नहीं दिखाई देता। जिस तरह एक गन्ने को निचोड़कर उसमें से गुड़ निकालने पर दिखाई देता है इसलिये इं्रद्रियों पर नियंत्रण कर जब उनहें निचोड़ा जाये तभी वह आत्मा दिखाई देता है। ध्यान योगासन,प्राणायम और भक्ति भाव से जीवन गुजारना ही वह प्रक्रिया है जिससे अपने आत्मा का दर्शन किया जा सकता है।
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Saturday, June 6, 2009

चाणक्य नीतिःसतत अभ्यास है सफलता का मंत्र

जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्वते घटः।
स हेतु सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य चः।।
हिंदी में भावार्थ-
पानी की एक एक बूंद से जिस तरह घड़ा भर जाता है उसी प्रकार थोड़े से अभ्यास से सभी प्रकार विद्यायें, धार्मिक ज्ञान तथा धन प्राप्त किया जा सकता है।
नाहारं विच्तयेत् प्राज्ञो धर्ममेकं हि चिन्तयेत्।
आहारा हि मनुष्याणां जन्मना सह जायते।।
हिंदी में भावार्थ-
विद्वान को भोजन तथा अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति की चिंता छोड़कर केवल धर्म संग्रह की चिंता करना चाहिए क्योंकि परमात्मा ने दैहिक आवश्यकताओं की पूर्ति की व्यवस्था पहले ही कर दी है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जीवन में सफलता प्राप्त करने का कोई संक्षिप्त मार्ग नहीं है। जीवन में धीरज के साथ अपने कर्म करने के साथ ही ज्ञानार्जन का अभ्यास सतत करना ही सफलता का मंत्र है। संक्षिप्त मार्ग ढूंढने का आशय है अप्राकृतिक साधनों की तरफ आकर्षित होकर अपने लिये विपत्तियों का बुलाना। लोग एक दिन में ही लखपति और फिर करोड़पति बनना चाहते हैं। सच बात तो यह है कि अवैध या अपराधिक कार्यों में ही यह संभव है पर स्वच्छ और पवित्र व्यवसायों में तो धीरज के साथ ही उन्नति की तरफ बढ़ा जाता है। इस बात पर विचार कर सुख के साथ शांति पूर्वक जीवन की इच्छा करने वालों को अपने व्यवसाय और नौकरी के साथ ही अध्यात्मिक विषयों में भी रुचि लेना चाहिए।
इतना ही नहीं जीवन में परिश्रम से बचने का कोई प्रयास नहीं करना चाहिए। काम करने से ही आत्मविश्वास बढ़ता है और इसके लिये जरूरी है कि अपने प्रयास में नैतिकता और ईमानदारी बरतें। अपने व्यवसाय और अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्ति के कार्य के निरंतर अभ्यासरत रहने से उपलब्धियों प्राप्त होती हैं और इस पर विश्वास करना चाहिए।
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Wednesday, May 20, 2009

चाणक्य नीतिः गुस्सा अपनी ताकत के अनुसार ही करें

सुसिद्धमौषधं धर्म गृहच्द्रिं मैथुनम्।
कुभुक्तं कुश्रुतं चैव मतिमान्न प्रकाशयेत्।।
हिंदी मे भावार्थ-
बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिऐ कि वह छह बातें किसी को भी न बताये। यह हैं अपनी सिद्ध औषधि, धार्मिक कृत्य, अपने घर के दोष, संभोग, कुभोजन तथा निंदा करने वाली बातें।
प्रस्तावसदृशं वाक्यं प्रभावसदृशं पिय्रम!
आत्मशक्तिसमं कोपं यो जानाति स पण्डितः।
हिंदी में भावार्थ-
जैसा प्रस्ताव देखें उसी के अनुसार प्रभावपूर्ण विचार मधुर वाणी में व्यक्त करे और अपनी शक्ति के अनुसार ही क्रोध करे वही सच्चा ज्ञानी है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-नीति विशारद चाणक्य के अनुसार मनुष्य को अपने जीवन में वाक्पटु होना चाहिये। समय के अनुसार ही किसी विषय को महत्व को देखते हुए अपना विचार व्यक्त करना चाहिए। इतना ही नहीं किसी विषय पर सोच समझ कर प्रिय वचनों में अपना बात रखना चाहिए। इसके अलावा अपने पास किसी सिद्ध औषधि का ज्ञान हो तो उसे सभी के सामने अनावश्यक रूप से व्यक्त करना ठीक नहीं है। अपने घर के दोष, तथा स्त्री के साथ समागम की बातें सार्वजनिक रूप से नहीं करना चाहिए। इसके अलावा जो भोजन अच्छा नहीं है उसके खाने का विचार तक अपने मन में न लाना ही ठीक है-दूसरे के सामने प्रकट करने से सदैव बचना चाहिए। किसी भी प्रकार के निंदा वाक्य किसी के बारे में नहीं कहना चाहिये।

अगर इतिहास देखा जाये तो वही विद्वान समाज में सम्मान प्राप्त कर सके हैं जिन्होंने समय समय पर कठिन से कठिन विषय पर अपनी बात इस तरह सभी लोगों के के सामने रखी जिसके प्रभाव से न केवल उनका बल्कि दूसरा समाज भी लाभान्वित हुआ। अधिक क्रोध अच्छा नहीं है और जब किसी के बात पर अपना दिमाग गर्म हो तो इस बात का भी ख्याल करना चाहिए कि अपने क्रोध के अनुसार संघर्ष करने की हमारी क्षमता कितनी है। अविवेकपूर्ण निर्णय न केवल हमारे उद्देश्यों की पूर्ति बाधक होते हैं बल्कि उनसे समाज में प्रतिष्ठा का भी हृास होता है।
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Monday, May 18, 2009

चाणक्य नीतिः नीम के वृक्ष को घी और दूध से सींचा जाये तो भी मधुर नहीं होता

गृहाऽसक्तस्य नो विद्या नो दया मांसभोजिनंः।
द्रव्ययालुब्धस्य नो सत्यं स्त्रेणस्य न पवित्रता।
हिंदी में भावार्थ-
नीति विशारद चाणक्य महाराज के मतानुसार जिसकी घर में आसक्ति अधिक है उसे कभी विद्या प्राप्त नहीं होती। मांस का सेवन करने वाले में कभी दया नहीं होती। जिसके मन में धन का लोभ है वह कभी सत्य की सहायता नहीं लेता। दुराचारी, व्याभिचारी तथा भोग विलास वाले व्यक्ति से पवित्रता की आशा करना व्यर्थ है।
न दुर्जनः साधुदशामुपैति बहुप्रकारैरपि शिक्ष्यमाणः।
आमूलसिक्तः पया घृतेन न निम्बवृक्षो मधुरत्वमेति।।
हिंदी में भावार्थ-
दुर्जन व्यक्ति को कितना भी प्रेम से समझाया जाये पर वह किसी भी हालत में सज्जन भाव को प्राप्त नहीं होता, जैसे नीम का वृक्ष दूध और घी से सींचा जाये पर उसमें मधुरता नहीं आती।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-नीति विशारद चाणक्य महाराज कहते हैं कि जिस व्यक्ति को अपने घर के मामलों में अधिक रुचि है वह कोई अन्य विद्या या ज्ञान नहीं प्राप्त कर सकता।
मांसाहार के विषय में अनेक प्रकार की बहस होती है। अब तो यह पश्चिमी स्वास्थ्य और मनोचिकित्सक भी मानने लगे है कि मांसाहार से व्यक्ति में हिंसा की प्रवृ त्ति आती है। भारतीय अध्यात्मिक संदेश भी यही कहता है कि मनुष्य देह पंचतत्वों से बनी है और उनके गुणों के प्रभाव से ही उसका संचालन होता है। इसका सीधा आशय यह कि जिस तरह का खानपान मनुष्य ग्रहण करेगा उसके गुण दोषों के अनुसार ही उसकी सोच का निर्माण होगा। अगर मनुष्य सात्विक भोजन ग्रहण करेगा तो उसमें स्वाभाविक रूप से दया, प्रेम और अहिंसा के भाव आयेंगे। यदि वह तामसिक पदार्थों का भक्षण और सेवन करेगा तो उसकी मूल प्रवृत्ति में क्रोध, हिंसा और घृणा के भाव स्वयं ही आयेंगे। इस विषय में किसी तर्क वितर्क की गुंजायश नहीं है भले ही कहने वाले कुछ भी कहते रहें। जैसे गुण हम बाहर से अपने अंदर ग्रहण करेंगे वैसे ही बाहर विसर्जन भी होगा।
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Saturday, May 9, 2009

चाणक्य नीति-दूसरों की विपत्ति पर प्रसन्न होने वाले दुष्ट होते हैं

हस्ती अंकुशमात्रेण वाजी हस्तेन ताडयते।
श्रृङगी लगुडहस्तेन खङगहस्तेन दुर्जनः।।
हिंदी में भावार्थ-
जिस तरह अंकुश से हाथी तथा चाबुक से घोड़ा, बैल तथा अन्य पशु नियंत्रित किये जाते हैं वैसे ही दुष्ट से निपटने के लिये खड्ग हाथ में लेना ही पड़ता है।
तुष्यन्ति भोजने विप्रा मयूरा धनगर्जिते।
साधवः परसम्पतिौ खलः परविपत्तिषुः।।
हिंदी में भावार्थ-
विद्वान अच्छा भोजन, मेघों की गर्जना से मोर तथा साधु लोग दूसरों की संपत्ति देखकर प्रसन्न होते हैं वैसे ही दुष्ट लोग दूसरों को संकट में फंसा देखकर हंसते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संसार में भांति भांति प्रकार के लोग हैं। जो ज्ञानी और विद्वान है उनको रहने, खाने,पीने और पहनने के लिये अच्छी सुविधा मिल जाये तो वह संतुष्ट हो जाते हैं। जो सच्चे साधु और सज्जन हैं वह दूसरों की भौतिक उपलब्धियों देखकर प्रसन्न होते हैं क्योंकि उनकी मान्यता होती है कि आसपास के लोग प्रसन्न होंगे तो उनके स्वयं के पास अच्छा वातावरण रहेगा और वह शांति से रह सकेंगे। इसके विपरीत कुछ लोग दुष्ट प्रवृत्ति के भी होते हैं जो स्वयं तो विपत्ति में पड़े रहते हैं पर उनका खेद तब कम हो जाता है जब कोई दूसरा भी विपत्ति मेें पड़ता है। ऐसे लोग अपने दुःख से अधिक दूसरे के सुख से अधिक दुःखी होती हैं। इसके अलावा अपने सुःख से अधिक दूसरे का दुःख उनको अधिक प्रसन्न करता है।
वैसे तो जीवन में हिंसा कभी नहीं करना चाहिये क्योंकि फिर प्रतिहिंसा का सामना करने पर स्वयं को भी कष्ट उठाना पड़ा सकता है, पर इस संसार में कुछ ऐसे दुष्ट लोग भी हैं जिनको कितना भी समझाया जाये वह दैहिक आक्रमण से बाज नहीं आते। उनसे शांति और अहिंसा की अपील निरर्थक साबित होती है। ऐसे लोगों से मुकाबला करने के लिये अपने अस्त्रों शस्त्रों तथा अन्य साधनों उपयोग करने में कोई झिझक नहीं करना चाहिये। ऐसे लोगों के लिये धर्म और ज्ञान एक निरर्थक वस्तु हैं। देहाभिमान से ग्रस्त ऐसे लोगों के विरुद्ध लड़ना पड़े तो संकोच त्याग देना चाहिए।
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Wednesday, May 6, 2009

चाणक्य नीतिः अपनी भौतिक उपलब्धियों पर संतोष करना ही उचित

संतोषाऽमृत-तुप्तानां यत्सुखं शान्तचेतसाम्।
न च तद् धनलूब्धानामितश्चयेतश्च धावताम्।।
हिंदी में भावार्थ-
जो मनुष्य संतोष रूप अमृत से तुप्त है उसका ही हृदय शांत रह सकता है। इसके विपरीत जो मनुष्य असंतोष को प्राप्त होता है उसे जीवन भर भटकना ही पड़ता है उसे कभी भी शांति नहीं मिल सकती।
संतोषस्त्रिशु कत्र्तव्यः स्वदारे भोजने धने।
त्रिषु चैव न कत्र्तव्योऽध्ययने तपदानयोः।।
हिंदी में भावार्थ-
मनुष्य को अपनी पत्नी, भोजन और धन से ही संतोष करना चाहिये पर ज्ञानार्जन, भक्ति और दान देने के मामले में हमेशा असंतोषी रहे यही उसके लिये अच्छा है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-नीति विशारद चाणक्य के संदेशों के ठीक विपरीत हमारा देश चल रहा है। जिन लोगों के पास धन है उनके पास भी संतोष नहीं है और जिनके पास नहीं है उनसे तो आशा करना ही व्यर्थ है। अपनी पत्नी और घर के भोजन से धनी लोगों को संतोष नहीं है। जीभ का स्वाद बदलने के लिये ऐसी वस्तुओं का सेवन बढ़ता जा रहा है जो स्वास्थ्य के लिये हितकर नहीं है। कहा जाता है कि खाने पीने की वस्तुओं को स्वच्छता होना चाहिये पर होटलों और बाजार की वस्तुओं में कितनी स्वच्छता है यह हम देख सकते हैं। किसी रात एक साफ रुमाल घर में रख दीजिये और सुबह देखिये तो उस पर धूल जमा है तब बाजार में कई दिनों से रखी चीजों में स्वच्छता की अपेक्षा कैसे रखी जा सकती है। घर में गृहिणी सफाई से भोजन बनाती है पर क्या वैसी अपेक्षा होटलों के भोजन में की जा सकती है। ढेर सारे ट्रक, ट्रेक्टर,बसेें, मोटर साइकिलें तथा अन्य वाहन सड़कों से गुजरते हुए तमाम तरह की धूल और धूंआ उड़ाते हुए जाते हैं उनसे सड़कों पर स्थित दुकानों,चायखानों और होटलों में रखी वस्तुओं के विषाक्त होने की आशंका हमेशा बनी रहती है। ऐसे में बाजारों में खाने वाले लोगों के साथ अस्पतालों में मरीजों की संख्या भी बढ़ रही है तो आश्चर्य की बात क्या है?
इसके विपरीत लोगों की आध्यात्मिक ज्ञान और भक्ति के भाव के प्रति कमी भी आ रही है। लोगों को ऐसा लगता है कि यह तो पुरातनपंथी विचार है। असंतोष को बाजार उकसा रहा है क्योंकि वहां उसे अपने उत्पाद बेचने हैं। प्रचार के द्वारा बैचेनी और असंतोष फैलाने वाले तत्वों की पहचान करना जरूरी है और यह तभी संभव है कि जब अपने पास आध्यात्मि ज्ञान हो।
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Friday, April 24, 2009

चाणक्य नीतिः गुणों की पहचान न होने पर उपेक्षा होती है

न वेत्ति यो यस्य गुणप्रकर्ष स तं सदा निन्दति नाऽत्र चित्रम्।
यथा किराती करिकुम्भजाता मुक्ताः परित्यज्य विभति गुंजाः।।

हिंदी में भावार्थ- अगर कोई मनुष्य किसी वस्तु या अन्य मनुष्य के गुणों को नहीं पहचानता तो तो उसकी निंदा या उपेक्षा करता है। ठीक उसी तरह जैसे जंगल में रहने वाली कोई स्त्री हाथी के मस्तक से मिलने वाली मोतियों की माला मिलने पर भी उसे त्यागकर कौड़ियों की माला पहनती है।
अकृष्टफलमूलेन वनवासरतः सदा।
कुरुतेऽहरहः श्राद्धमृषिर्विप्रः स उच्यते।।
हिंदी में भावार्थ-
वह विद्वान ऋषि कहलाता है जो जमीन को जोते बिना पैदा हृए फल एवं कंधमूल आदि खाकर हमेशा वन में जीवन व्यतीत करता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-नीति विशारद चाणक्य का कहना है कि अगर किसी व्यक्ति या वस्तु के गुणों का ज्ञान नहीं है तो उसकी उपेक्षा हो ही जाती है। यह स्थिति हम अपने भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान के बारे में आज समाज द्वारा बरती जा रही उपेक्षा के बारे में समझ सकते हैं। हमारे देश के प्राचीन और आधुनिक ऋषियों, मुनियों और तपस्वियों ने बड़े परिश्रम से हमें जीवन और सृष्टि के रहस्यों को जानकर उसका ज्ञान हमारे लिये प्रस्तुत किया पर हमारे देश के विद्वानों ने उसकी उपेक्षा कर दी। यही कारण है कि आज हमारे देश में विदेशी विद्वानों के ज्ञान की चर्चा खूब होती है। देश में पश्चिम खान पान ही सामान्य जीवन की दिनचर्या का भाग बनता तो ठीक था पर वहां से आयातित विचार और चिंतन ने हमारी बौद्धिक क्षमता को लगभग खोखला कर दिया है। यही कारण है कि सामान्य व्यक्ति को शिक्षित करने वाला वर्ग स्वयं भी दिग्भ्रमित है और भारतीय अध्यात्म उसके लिये एक फालतू का ज्ञान है जिससे वर्तमान सभ्यता का कोई लेना देना नहीं है।
जबकि इसके विपरीत पश्चिम में भारतीय अध्यात्म ज्ञान की पुस्तकों पर अब जाकर अनुसंधान और विचार हो रहा है। अनेक महापुरुषों के संदेश वहां दिये जा रहे हैं। हमारी स्थिति भी कुछ वैसी है जैसे किसी घर में हीरों से भरा पात्र हो पर उसे पत्थर समझकर खेत में चिड़ियों को भगाने के लिये कर रहा हो।
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Thursday, April 16, 2009

चाणक्य नीतिः गलत संबंध बनाना श्रेष्ठ व्यक्ति के लिये दुःखदायी

दुराचारी च दुर्दृष्टिराऽवासी च दुर्जनः।
यन्मैत्री क्रियते पुम्भिर्नरः शीघ्रं विनश्यति।।

हिन्दी में भावार्थ-दुराचारी, कुदृष्टि रखने और बुरे स्थान पर रहने वाले व्यक्ति से संबंध बनाने पर श्रेष्ठ और सज्जन व्यक्ति शीघ्र नष्ट हो जाता है।
ग्रहीत्वां दक्षिणां विप्रास्त्यजन्ति यजमानकम्।
प्राप्तविद्यां गुरुं शिष्या दग्धाऽरण्यं मृगास्तथा।
हिंदी में भावार्थ-
ब्राह्मण दक्षिणा लेकर यजमान का घर छोड़ देते हैं। गुरु से शिक्षा प्राप्त कर शिष्य उसे दक्षिण देकर आश्रम से चले जाते हैं। उसी तरह जंगल जल जाने पर मृग उसका त्याग कर देते हंै।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-संबंध बनाने में हमेशा सतर्कता बरतना चाहिये। देखा गया है कि आजकल के युवक युवतियां अक्सर संबंध तात्कालिक आकर्षण में फंसकर मित्रता ऐसे लोगों से कर बैठते हैं जिनके स्वभाव और इतिहास का पता उनको नहीं होता। बाद में जब वह उनकी वजह से कहीं फंस जाते हैं तब उनको अपनी गलती की अनुभूति होती है मगर तब देर भी हो जाती है। ऐसी एक नहीं अनेक घटनायें घटित हो चुकी हैं जिसमें किसी भले युवक ने किसी गलत साथी का चुनाव किया और बाद में उसके अपराध के छींटे उस पर भी पड़े। उसी तरह युवतियों ने भी प्रारंम्भिक आकर्षण में आकर ऐसे लड़कों से प्रेम प्रसंग स्थापित किये जिसका परिणाम उनके लिये घातक रहा। कई बार तो वह ऐसे युवकों से विवाह भी कर बैठती हैं जो दिखाने के लिये अपने संस्कर अच्छे दिखाते हैं पर बाद में उनकी असलियत सामने आती है तो युवतियों को पछतावा होता है। अनेक युवतियां पहले अपने घरेलू संस्कारों को भुलाकर ऐसे लड़कों से विवाह कर बैठती हैं जिनके घरेलू संस्कार बिल्कुल विपरीत होते हैं। विवाह से पहले तो उनके घर से लड़कियों का संबंध नहीं होता पर बाद विवाह बाद जब उसके परिवार वाले अपने संस्कार अपनाने को विवश करते हैं तब लड़कियों को बहुत परेशानी आती है और इसी बात पर सबसे अधिक तनाव उनको ही झेलना पड़ता है क्योंकि पुरुष तो घर से बाहर रहता है। कहने का तात्पर्य यह है कि लड़का हो या लड़की उसे अपने संबंध बनाने से पहले सामने वाले व्यक्ति की पूरी जांच करना चाहिये।

नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि जब कहीं से अपना उद्देश्य पूरा हो जाये तो उस स्थान पर अधिक नहीं ठहरना चाहिये। कहने का तात्पर्य यह है कि इस जीवन में अपने कार्य और उद्देश्य पूर्ति के लिये अनेक स्थानों पर जाने के साथ ही लोगों से संपर्क भी बनाने पड़ते हैं। उनमें अपनी लिप्तता उतनी ही रहना चाहिये जितनी अपने हित के लिये आवश्यक हो। अधिक लिप्तता कार्य और उद्देश्य पर बुरा प्रभाव डाल सकती है।
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Friday, April 10, 2009

चाणक्य नीतिः अधिक धन को घर से वैसे ही निकालें जैसे तालाब से पानी! (chankya niti on tha money and house)

उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणम्।
तडागोदरसंस्थानां परीवाह इवाऽमभासाम् ।।

हिंदी में भावार्थ-अपने द्वारा अर्जित धन का त्याग करना ही उसकी रक्षा करने का प्रयास है। जिस तरह तालाब में अधिक भरे जल को निकालने से उसकी रक्षा होती है वैसे ही अपने धन की रक्षा भी तभी संभव है जब उसमें से कुछ निकाल दिया जाये।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-व्यक्ति के लोभ की कोई सीमा नहीं है और यही कारण है कि वह केवल धन संग्रह में लगा रहता है। हर आदमी यही सोचता है कि उसका धन केवल उसे ही दिख रहा है बाकी लोग तो उसे जानते नहीं है इसलिये वह सुरक्षित है। यह केवल एक वहम है। दरअसल धन का कोई महत्व हो या नहीं पर इतना तो जरूर है कि वह आत्मविश्वास का एक बहुत बड़ा स्त्रोत है। इसलिये जिस आदमी के पास धन आता है उसका अहंकार भी बढ़ता जाता है। कहीं न कहीं आदमी अपने मुख से ही अपने धन की महिमा का बखान करने ही लगता है। इस तरह अन्य लोगों को वैसे भी धन होने का आभास हो जाता है। यह संभव नहीं है कि आदमी के पास बहुत सारा धन हो और यह बात किसी अन्य को पता नहीं चले। ऐसे में अल्प धन वाले लोगों की नजरें उस पर लगी रहती हैं। ऐसे में अपने धन की रक्षा का एक ही उपाय है कि उसे निकाला जाये। निकालने से यह आशय यह नहीं कि उसका अपव्यय किया जाये बल्कि गरीब और मजबूरों की सहायता करने के उद्देश्य से दान किया जाना चाहिये।
यह दान करते हुए अपने मन में कोई अहंकार नहीं पालने की बजाय यह सोचना चाहिये कि हम तो अपने धन के तालाब की रक्षा कर रहे हैं। जिस तरह तालाब में पानी भर जाने पर उसे निकाला न जाये तो वह किनारों को क्षतिग्रस्त और गंदा करते हुए बाहर स्वतः बहने लगता है वैसे ही धन भी पानी की तरह है। अगर अधिक धन का परित्याग नहीं करेंगे तो वह बुरी नजर वालों को आपके घर में आने का आमंत्रण देगा या फिर ऐसी परेशानियां देगा जिसमें आपका धन अनावश्यक व्यय होगा।
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Tuesday, March 31, 2009

चाणक्य नीतिः बांस का पेड़ खोखलेपन के कारण वायु का प्रभाव ग्रहण नहीं कर पाता

अंतःसारविहनानामुपदेशो न जायते।
मलयाचलसंसर्गान् न वेणुश्चंदनायते।।

नीति विशारद चाणक्य जी का मानना है कि मलयाचल पर्वत से प्रवाहित वायु देह के स्पर्श से ही सामान्य पेड़ भी चंदन जैसे सुगंधित हो जाते हैं। एक मात्र बांस का पेड़ ही खोखला होता है जिस पर कोई हवा अपना प्रभाव नहीं डालती।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-यहां महात्मा चाणक्य ने मनुष्य के गुणों पर प्रकाशा डाला है। जिस मनुष्य में उत्साह और विश्वास है वह कहीं थोड़ा ज्ञान अपने कान से सुनता या पढ़ता है तो उसे आत्मसात कर लेता है। उसे धारण कर वह अपना जीवन प्रसन्नता से व्यतीत करने मेें समर्थ होता है। इसके विपरीत जिन लोगों के अहंकार है वह ज्ञान चर्चा को एक व्यर्थ की चर्चा समझते हैं। इसके अलावा वह धनहीन ज्ञानी का मजाक उड़ाते हैं। उनके लिये धन संपदा और कथित सामाजिक प्रतिष्ठा ही जीवन का सार है। ऐसे लोगों को कितना भी ज्ञान दिया जाये पर प्रभाव नहीं पड़ता। जिस तरह मलयाचल पर्वत की वायु के स्पर्श से कोई भी हरा भरा पेड़ चंदन की खुशबु बिखरने लगता है पर बांस का पेड़ अपने खोखले पन के कारण ऐसा नहीं कर पाता। अहंकार और बुद्धिरहित व्यक्ति की भी यही स्थिति होती है। वह चाहे दिखावे के लिये अध्यात्मिक चर्चा करे लों या सत्संग में चले जायें पर उनका अज्ञान और अहंकार जा नहीं सकता।

इसलिये ज्ञान प्राप्त करने के लिये आवश्यक है कि पहले मन में मौजूद अहंकार पर नियंत्रण किया जाये। इसके अलावा मन में यह संकल्प करना भी जरूरी है कि हम ज्ञान चर्चा और सत्संग से अपने मन को शांत करेंगे। तभी अपने जीवन का आनंद उठाया जा सकता है।
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