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Friday, September 5, 2008

रहीम के दोहे: समय कभी एक जैसा नहीं रहता

समय लाभ सम लाभ नहिं, समय चूक सम चूक
चतुरन चित रहिमन लगी, समय चूक की हूक

कविवर रहीम कहते हैं कि समय ही लाभ है तथा समय ही हानि भी है। चतुर लोग समय का लाभ उठा लेते हैं और अगर चूक जाते हैं तो उनके मन में त्रास हमेशा ही बना रहता है।

समय पाय फल होत है, समय पाय झरि जात
सदा रहै नहीं एक सी, का रहीम पछतात


कविवर रहीम कहते हैं कि समय के अनुसार अपने निश्चित समय पर ही पेड़ पर फल लगता है और समय के अनुसार ही झड़ जाता है। समय कभी एक जैसा नहीं रहता इसलिये कभी अपने बुरे समय को देखकर परेशान नहीं होना चाहिये।

वतंमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-समय चक्र घूमता रहता है और मनुष्य की जीवन धारा भी उसी के अनुसार बहती जाती है। अपने जीवन से असंतुष्ट लोग अक्सर कहते हैं कि ‘मैंने अमुक की बात मान ली होती तो आज मैं कुछ और होता‘,या मैंने अमुक काम किया होता तो धनाढ्य होता‘। समय और सृष्टि का यह नियम होता है कि एक बार आदमी को इस संसार में उपलब्धि प्राप्त कराने के लिये अवसर अवश्य आता है बस उसे पहचान कर उसका उपयोग करने की बुद्धि होना चाहिए। कई लोग जो दूसरों की बुद्धि के अनुसार चलने के आदी हैं वह ऐसी शिकायतें करते हैं हमने अमुक की बात मानकर गलती की थी। यह सब अपनी गलतियां और बौद्धिक आलस्य की कमी छिपाने का बहाना है। जो लोग अपने कर्तव्य पथ पर चलने के लिये दृढ़संकल्पित होते हैं वह बिना किसी की परवाह किये चलते जाते हैं और अपने लक्ष्य का चरम शिखर प्राप्त करते हैं।
समय का पहिया ऊपर नीचे घूमता है और राजा हो या रंक उसके लिये अच्छा बुरा समय आता रहता है। ज्ञानी लोग इस रहस्य को जानते हैं और इसलिये विचलित नहीं होते।
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Thursday, August 21, 2008

रहीम के दोहेःजिसने दीवान खरीदा, समझो राजा खरीद लिया


मन से कहां रहीम प्रभु, दृग सों कहां दीवान
देखि दृगन जो आदरै, मन तोहि हाथ बिकान

                      कविवर रहीम कहते हैं कि मन जैसा कहां स्वामी और कहां किले जैसा अभेद्य दीवान! जो चतुर व्यक्ति उस किले   के  दीवान का आदर करता है तो स्वामी उसके हाथ बिक जाता है।
                        वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-कविवर रहीम के समय में भी राजकाज कोई बादशाह स्वयं नहीं देखते थे बल्कि उनके मंत्री और दीवान ही सारे राज्य के भाग्य नियंता थे। सच तो यह है राजा या बादशाह तो बस देखने भर की उपाधि है। असल राज्य तो मंत्रियों और दीवानों के इशारे पर ही चलता है। राजा या बादशाह के नाम पर तो सभी जगह मुखौटे ही बैठे दिखाई देते हैं। बड़े पद पर बैठै व्यक्ति को अपने बड़प्पन के कारण किसी पर दया भी आती हो तो यह जरूरी नहीं है कि उसके मातहत भी यही भाव अपनायें। कई बार तो राजा या राज्य प्रमुख उदारता से प्रजा की हितार्थ कोई बात कह भी दे पर यह जरूरी नहीं है कि उसके मातहत या चमचे वह काम होने दें।
                     कहने को कहा जाता है कि अमुक व्यक्ति ने अमुक देश पर इतने बरस राज्य किया पर वास्तविकता यह है कि वह केवल मुखौटे थे। राजकाज के लिये तो मंत्री और दीवान ही निर्णय करते रहे थे। राजशाही बहुत बदनाम हो गयी पर सच तो यह है राज्य की ताकत तो सामंतों और साहुकारों के हाथ में होती और राजा के मातहत चाहे जैसे अपने निर्णय करते थे। वह अपने राजा को भोग विलास में या अन्य व्यर्थ के कामों में लगाये रहते ताकि उसका ध्यान प्रजा की तरफ नहीं जाये। प्रजा भी इसी भ्रम में रहती है कि अमुक उनका राजा है जबकि वास्तविकता यह है कि वह नाम भर का है। राज्य तो दीवानों और मंत्रियों का ही चलता है और वह भी अपने मातहतों के अधीन ही रहते हैं। आज भी यह संच्चाई बदल गयी हो लगता नहीं है। यह अलग बात है कि आजकल दीवानों की जगह चमचों ने ले ली है।
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