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Friday, June 3, 2011

अथर्ववेद से संदेश-समाज की रक्षा करे वहीं देवराज इंद्र (atharved se sandesh-samaj ki raksha kare vahi devraj indra)

         सभी मनुष्य को अपने लिये नियत तथा स्वाभाव के अनुकूल कार्य करना चाहिए। इतना ही नहीं अगर सार्वजनिक हित के लिये कोई कार्य आवश्यक करने की अपने अंदर क्षमता लगे तो उसमें भी प्राणप्रण से जुट जाना चाहिए। अगर हम इतिहास और धर्म पुस्तकों पर दृष्टिपात करें तो सामान्य लोग तो अपना जीवन स्वयं और परिवार के लिये व्यय कर देते हैं पर जो ज्ञानी, त्यागी और सच्चे भक्त हैं पर सार्वजनिक हित के कार्य न केवल प्रारंभ करते हैं बल्कि समय आने पर बड़े बड़े अभियानों का नेतृत्व कर समाज को सम्मान और परिवर्तन की राह पर ले जाते हैं। ऐसे लोग न केवल इतिहास में अपना नाम दर्ज करते हैं वरन् अपने भग्वत्स्वरूप हो जाते हैं।
भारतीय अध्यात्म ग्रंथ अथर्ववेद में कहा गया है कि
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यः शर्धते नानुददाति शुध्यां दस्योर्हन्ता स जनास इन्द्रः।
‘‘जो मनुष्य अहंकारी के अहंकार को दमन करता है और जो दस्युओं को मारता है वही इन्द्र है।’’
यो जाभ्या अमेथ्यस्तधत्सखायं दुधूर्षति।
ज्योष्ठो पदप्रचेतास्तदाहु रद्यतिगति।
‘‘जो मनुष्य दूसरी स्त्री को गिराता है, जो मित्र की हानि पहुंचाता है जो वरिष्ठ होकर भी अज्ञानी है उसको पतित कहते हैं।’’
       एक बात निश्चित है कि जैसा आदमी अपना संकल्प धारण करता है उतनी ही उसकी देह और और मन में शक्ति का निर्माण होता है। जब कोई आदमी केवल अपने परिवार तथा स्वयं के पालन पोषण तक ही अपने जीवन का ध्येय रखता है तब उसकी क्षमता सीमित रह जाती है पर जब आदमी सामूहिक हित में चिंत्तन करता है तब उसकी शक्ति का विस्तार भी होता है। शक्तिशाली व्यक्ति वह है जो दूसरे के अहंकार को सहन न कर उसकी उपेक्षा करने के साथ दमन भी करता है। समाज को कष्ट देने वालों का दंडित कर व्यवस्था कायम करता है। ऐसी मनुष्य स्वयं ही देवराज इंद्र की तरह है जो समाज के लिये काम करता है। शक्तिशाली मनुष्य होने का प्रमाण यही है कि आप दूसरे की रक्षा किस हद तक कर सकते हैं।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

Friday, October 15, 2010

चाणक्य नीति-आंखों से देखकर ज़मीन पर पांव रखें (chanakya neeti in hindi-aankha aur paanv)

दृष्टिपूतं न्यसेत् पादं वस्त्रपूतं पिबेज्जलम्।
शास्त्रं वंदेद् वाक्यं मनः पूतं समाचरेत्।।
हिन्दी में भावार्थ-
नीति विशारद चाणक्य का कहना है कि दृष्टि से देखकर प्रथ्वी पर पांव रखें, कपड़े से छानकर पानी को पिऐं, शास्त्र से शुरु कर वाक्य बोलें और मन से सोचकर कार्य प्रारंभ करने पर उसे पूरा अवश्य करें।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जिंदगी में सावधानी के साथ ही चिंतन और मनन की आवश्यकता होती। अधिकतर लोग दूसरों की शान शौकत या दौलत देखकर वैसा ही बनने का सपना पाल लेते हैं। वह यह नहीं देखते कि किसने किस तरह अपनी जिंदगी में संघर्ष किया है। अनेक लोग हवाई किले बनाकर चल पड़ते हैं पर कामयाबी न मिलने पर संकट में पड़ जाते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि जीवन में हर कदम पर सोच समझकर ही अपना काम प्रारंभ करना चाहिए।
अनेक जगह लोग निरर्थक वार्तालाप करते हैं। अनेक बार तो बातचीत में झगड़े हो जाते हैं और नौबत खून खराब की आ जाती है। लोग अध्यात्म ग्रंथों की बजाय कल्पित साहित्य और फिल्मों से प्रभावित इतने हैं कि उनको यह पता नहीं है कि जिंदगी कितनी कठिन है और उसमें सपने देखना और उनको पूरा करना अलग अलग बातें हैं। खासतौर से नयी पीढ़ी को तो एकदम सुविधाभोगी जीवन के सपने प्रचार माध्यम दिखा रहे हैं। बंगला, कार, तथा घर में नौकर होने का ख्वाब सभी को है पर यह पता नहीं कि नौकर भी एक इंसान होता है जिसे बंगला और कार की तरह बेज़ान नहीं माना जा सकता। न ही हर नौकर फिल्म या धारावाहिक की तरह वफादार होता है। यही कारण है कि घरेलु नौकरों द्वारा किये जा रहे अपराधों की संख्या बढ़ रही है।
कहने का अभिप्राय यह है कि आंखें खुली होने के साथ ही बुद्धि भी सक्रिय रखना चाहिये। फिल्में देखना या कल्पित साहित्य पढ़ना बुरा नहीं है पर जीवन के यथार्थ का ज्ञान भी अपने आसपास की घटनाओं तथा पुराने लोगों से प्राप्त करना चाहिए।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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