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Wednesday 25 January 2012

पतंजलि योग सूत्र-साधन से सिद्धि में भेद आता है (sadhna se siddhi-patanjali yoga sahitya)

          इस संसार में सभी मनुष्य का जीवन एक जैसा दृष्टिगोचर नहीं होता। इसका कारण यह है कि हर मनुष्य की संकल्प शक्ति प्रथक प्रथक है। वैसे देखा जाये तो मनुष्य इस संसार से जुड़ता है जिसे योग ही कहा जा सकता है। अर्थात योग तो हर मनुष्य कर रहा है पर कुछ लोग अभ्यास के माध्यम से स्वयं ही अपनी सक्रियता तथा परिणाम निर्धारित करते हैं जबकि कुछ मनुष्य परवश होकर जीवन में चलते हैं। जो स्वयं योग करते हैं वह सहज योग को प्राप्त होते हैं जबकि अभ्यास रहित मनुष्य असहज होकर जीवन गुजारते हैं। स्वयं योग करने वालों की सिद्धि भी एक समान नहीं रहती। जिनका संकल्प प्रबल है उनके मानसिक साधन अत्यंत शक्तिशाली होते हैं और उनको सिद्धि तीव्र गति से मिलती है। जिनकी संकल्प शक्ति मध्यम अथवा निम्न है उनको थोड़ा समय लगता है।
                                            पतंजलि योग में कहा गया है कि
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                                            तीव्रसंवेगानामासन्नः।।
             ‘‘जिसके साधन की गति तीव्र है उनकी शीघ्र सिद्धि हो जाती है।’’                                   मृदुमध्याधिमात्रत्वात्तोऽपि विशेषः।।
        ‘‘साधन की मात्रा हल्की, मध्यम और तीव्र गति वाली होने से भी सिद्धि में भेद आता है।’’
                     मुख्य बात यह है कि मनुष्य को अपनी साधना में निष्ठा रखना चाहिए। यह निष्ठा संकल्प से ही निर्मित होती है। जब मनुष्य यह तय करता है कि वह योग साधना के माध्यम से ही अपने जीवन को श्रेष्ठ बनायेगा तब उसका मन अन्यत्र नहीं भटकता, ऐसे में उसका साधन शक्तिशाली हो जाता है। जहां मनुष्य ने यह माना कि अन्य साधन भी आजमाये जायें वहां उसकी साधना क्षीण होती है। जब कोई साधक केवल इसलिये योग साधना करता है कि इससे कोई अधिक लाभ नहीं होगा तब उसका संकल्प कमजोर होता है। एक बात तय है कि अभ्यास करते करते मनुष्य अंततः पूर्ण सहज योग को प्राप्त होता है पर यह उसकी मनस्थिति पर निर्भर है कि वह कितनी तेजी से इस राह पर बढ़ेगा।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday 21 January 2012

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-उपेक्षा कर अपने जीवन मे आनंद लायें (kautilya ka arthshastra-upeksha aur anand)

              राजकर्म और  निज व्यवहार में साम, दाम, दंड और भेद की नीतियों से काम लिया जाता है। जब इन चारों नीतियों का उपयोग समझ में न आये तो क्या करे? हां, ऐसा कई बार अवसर आता है कि हमारा विवेक यह तय नहीं कर पाता कि क्या करें? दरअसल यह बात समझना चाहिए कि हमारे व्यवहार में आने वाले व्यक्ति हमारा ध्यान आकर्षित करने के लिये तमाम युक्तियां अपनाते हैं जिनसे हम प्रसन्न नहीं होते। कर भी कुछ नहीं पाते।  ऐसे में उपेक्षासन करना ही श्रेयस्कर है। ऐसा हमारा मत है। इसका कारण यह है कि हमारी निष्क्रियता दूसरे को विचलित कर सकती है।  वह हमें अप्रसन्न करने वाली क्रियायें बंद कर देगा।
          आज के युग में इस तरह के आसन का विशेष महत्व है। पहले तो छोटे राज्यों की वजह युद्ध आमतौर से होते थे पर आधुनिक लोकतंत्र प्रणाली से राज्यों स्वरूप बृहद बन जाने से युद्धों की आशंका समाप्त कर दी है। जब भौतिकवाद में डूबे विश्व समाज के लोग अहंकार और मद में एक दूसरे को नीचा दिखाने में लगे हों और उनसे बहस करने का कोई परिणाम नहीं निकलता हो तब ज्ञानी आदमी के लिये उपेक्षासन एक तरह से ब्रह्मास्त्र की तरह काम कर सकता है। आपसी वार्तालाप में लोग भौतिक साधनों की चर्चा करते हुए अपनी उपलब्धियों का बखान करने से नहीं चूकते। टीवी चैनलों और समाचार पत्रों के साथ इंटरनेट में बाज़ार के विज्ञापनों से प्रेरित होकर उपभोग संस्कृति को बढ़ावा दिया जा रहा है। ऐसे में हमें अपने मन को ऐसी चर्चाओं से मन व्यथित करने की बजाय सात्विक विषयों की तरफ अपना ध्यान ले जाना चाहिए। यह अलग बात है कि इस तरह उपेक्षासन करने पर लोग आपको पौंगापंथी समझें पर सच बात यह है कि इससे आपको आराम मिलेगा। जिस तरह मोर नाचने के बाद अपने गंदे पांव देखकर रोता है उसी आजकल लोग नववर्ष, वैलंटाईन डे तथा अन्य पाश्चात्य पर्व आने पर नाच गाकर और गलत सलत खाकर एंजॉयमेंट यानि आंनद करने का पाखंड करते हैं पर उसके बाद फिर जिंदगी के तनाव उनको घेरकर अधिक दुख देते हैं। पैसा खर्च होने के साथ ही शरीर टूटता है सो अलग।
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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आस्त प्रेक्ष्यारिमधिकमुपेक्षासनमुच्यते।
उपेक्षा कृतवानिन्द्र पारिजातग्रहं प्रति।।
              ‘‘जब कोई मनुक्ष्य अपने शत्रु या विरोधी को अपने से अधिक जानकर उसके प्रति उपेक्षा का भाव दिखाता है तब उसे उपेक्षासन कहा जाता है। जब भगवान श्रीकृष्ण ने सत्यभावा के लिये स्वर्ग से कल्पवृक्ष उठा लिया तो देवराज ने अपनी शक्ति को कम मानते हुए उसे युद्ध करने की बजाय उपेक्षासन किया था।"
उपेर्क्षितत्स चान्येस्तु कारणेनेह केन चित्त।
आसनं रुक्मिण इव तदुपेक्षासनं स्पुतम्।।
               ‘‘उसी तरह जिस समय रुक्मणी के भाई रुक्मी ने जब कृष्ण के साथ युद्ध में किसी ने सहायता की तो वह उपेक्षासन कर बैठ गया।’’
                 दरअसल आजकल हम चारों तरफ धन के सहारे फैल रहे आकर्षक वातावरण को देखकर अपने मन में अनेक तरह के सपने पाल लेते हैं। खासतौर से आजकल के मध्यम तथा निम्नवर्गीय युवा फिल्म, इंटरनेट तथा पत्रिकाओं में भौतिकतावाद के चलते आकर्षक संसार के उपभोग का जो सपना देखते हैं वह सभी के लिये साकार होना संभव नहीं है। जिनको विरासत में धन मिलता है वह तो चहकते हैं पर जिनको अपनी रोजी रोटी कमाने के लिये ही संघर्ष करना पड़ता है उनके लिये अपने अभावों का मानसिक तनाव झेलने के अलावा अन्य मार्ग नहीं रह जाता। ऐसे में कुछ युवा बहककर अपराध की तरफ बढ़ जाते हैं। उनके लिये बचने का तो बस यह एक ही मार्ग है कि वह भौतिक संसार के आकर्षण के प्रति उपेक्षासन कर जीवन का आनंद लें।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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Saturday 14 January 2012

पतंजलि योग साहित्य-मन के क्लेशों से बचने का उपाय है ध्यान (patanjali yoga sahitya-mansik tanav se bachata hai dhyaan,meditation is help for removel mental tension)

         पंचतत्वों से बनी इस देह में मन, बुद्धि और अहंकार प्रकृति स्वतः विराजती हैं। मनुष्य का मन तो अत्यंत चंचल माना जाता है। यही मन मनुष्य का स्वामी बन जाता है और जीवात्मा का ज्ञान नहीं होने देता। अध्यात्म के ज्ञान के अभाव में सांसरिक क्रियाओं के अनुकूल मनुष्य प्रसन्न होता है तो प्रतिकूल होने पर भारी तनाव में घिर जाता है। मकान नहीं है तो दुःख है और है उसके होने पर सुख होने के बावजूद उसके रखरखाव की चिंता भी होती है। धन अधिक है तो उसके लुटने का भय और कम है नहीं है या कम है, तो भी सांसरिक क्रियाओं को करने में परेशानी आती है मनुष्य सारा जीवन इन्हीं  अपनी कार्यकलापों के अंतद्वंद्वों में गुजार देता है। विरले ज्ञानी ही इस संसार में रहकर हर स्थिति में आनंद लेते हुए परमात्मा की इस संसार रचना को देखा करते हैं। अगर किसी वस्तु का सुख है तो उसके प्रति मन में राग है और यह उसके छिन जाने पर क्लेश पैदा होता है। कोई वस्तु नहीं है तो उसका दुःख इसलिये है कि वह दूसरे के पास है। यह द्वेष भाव है जिसे पहचानना सरल नहीं है। मृत्यु का भय तो समस्त प्राणियों को रहता है चाहे वह ज्ञानी ही क्यों न हो। मनुष्य का पक्षु पक्षियों में भी यह भय देखा जाता है।
पतंजलि योग साहित्य में कहा गया है कि
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सुखानुशयी रागः।
‘‘सुख के अनुभव के पीछे रहने वाला क्लेश राग है।’’
‘‘दुःखानुशयी द्वेषः।
‘‘दुःख के अनुभव पीछे रहने वाला क्लेश द्वेष है।’’
स्वरसवाही विदुषोऽपि तथा रूडोऽभिनिवेशः।।
            ‘‘मनुष्य जाति में परंपरागत रूप से स्वाभाविक रूप से जो चला आ रहा है वह मृत्यु का क्लेश ज्ञानियों में भी देखा जाता है। उसे अभिनिवेश कहा जाता है।’’
ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः।
           ‘‘ये सभी सूक्ष्मावस्था से प्राप्त क्लेश चित्त को अपने कारण में विलीन करने के साधन से नष्ट करने योग्य हैं।’’
ध्यानहेयास्तद्वृत्तयः।।
‘‘उन क्लेशों की वृत्तियां ध्यान से नष्ट करने योग्य हैं।’’
       इस तरह अंतद्वंद्वों में फंसी अपनी मनस्थिति से बचने का उपाय बस ध्यान ही है। ध्यान में जो शक्ति है उसका बहुत कम प्रचार होता है। योगासन, प्राणायाम और मंत्रजाप से लाभ होते हैं पर उनकी अनुभूति के लिये ध्यान का अभ्यास होना आवश्यक है। दरअसल योग साधना भी एक तरह का यज्ञ है। इससे कोई भौतिक अमृत प्रकट नहीं होता। इससे अन्तर्मन   में जो शुद्ध होती है उसकी अमृत की तरह अनुभूति केवल ध्यान से ही की जा सकती है। इसी ध्यान से ही ज्ञान के प्रति धारणा पुष्ट होती है। हमें जो सुख या दुःख प्राप्त होता है वह मन के सूक्ष्म में ही अनुभव होते हैं और उनका निष्पादन ध्यान से ही करना संभव है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday 7 January 2012

अथर्ववेद से संदेश-श्रद्धाहीन मनुष्य दूसरों के धन पर वक्रदृष्टि डालते हैं (aaatharva ved se sandesh-shraddhahin manushya doosron ke dhan par vakradrshiti dalte hain)

            श्रीमद्भागवतगीता को लेकर हमारे देश में अनेक भ्रम प्रचलित हैं। कहा जाता है कि यह एक पवित्र किताब है और इसका सम्मान करना चाहिए पर उसमें जो तत्वज्ञान है उसका महत्व जीवन में कितना है इसका आभास केवल ज्ञानी लोगों को श्रद्धापूर्वक अध्ययन करने पर ही हो पाता है। श्रीगीता को पवित्र मानकर उसकी पूजा करना और श्रद्धापूर्वक उसका अध्ययन करना तो दो प्रथक प्रथक क्रियायें हैं। श्रीगीता में ऐसा ज्ञान है जिससे हम न केवल उसके आधार पर अपना आत्ममंथन कर सकते हैं बल्कि दूसरे व्यक्ति के व्यवहार, खान पान तथा रहन सहन के आधार पर उसमें संभावित गुणों का अनुमान भी कर सकते हैं। गीता का ज्ञान एक तरह से दर्पण होने के साथ दूरबीन का काम भी करता है। यही कारण है कि ज्ञानी लोग परमात्मा की निष्काम आराधना करते हुए अपने अंदर ऐसी पवित्र बुद्धि स्थापित होने की इच्छा पालते हैं जिससे वह ज्ञान प्राप्त कर सकें। जब एक बार ज्ञान धारण कर लिया जाता है तो फिर इस संसार के पदार्थों से केवल दैहिक संबंध ही रह जाता है। ज्ञानी लोग उनमें मन फंसाकर अपना जीवन कभी कष्टमय नहीं बनाते।
अथर्ववेद में कहा गया है कि
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ये श्रद्धा धनकाम्या क्रव्वादा समासते।
ते वा अन्येषा कुम्भी पर्यादधति सर्वदा।।
            ‘‘जो श्रद्धाहीन और धन के लालची हैं तथा मांस खाने के लिये तत्पर रहते हैं वह हमेशा दूसरों के धन पर नजरें गढ़ाये रहते हैं।’’
भूमे मातार्नि धेहि भा भद्रया सुप्रतिष्ठतम्।
सविदाना दिवा कवे श्रियां धेहि भूत्याम्।।
         ‘‘हे मातृभूमि! सभी का कल्याण करने वाली बुद्धि हमें प्रदान कर। प्रतिदिन हमें सभी बातों का ज्ञान कराओ ताकि हमें संपत्ति प्राप्त हो।’’
          इस तत्वज्ञान के माध्यम से हम दूसरे के आचरण का भी अनुमान प्राप्त कर सकते हैं। जिनका खानपान अनुचित है या जिनकी संगत खराब है वह कभी भी किसी के सहृदय नहीं हो सकते। भले ही वह स्वार्थवश मधुर वचन बोलें अथवा सुंदर रूप धारण करें पर उनके अंदर बैठी तामसी प्रवृत्तियां उनकी सच्ची साथी हो्रती हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि तत्वज्ञान में ज्ञान तथा विज्ञान के ऐसे सूत्र अंतर्निहित हैं जिनकी अगर जानकारी हो जाये तो फिर संसार आनंदमय हो जाता है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday 31 December 2011

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-अपनी शक्ति के अनुरूप कार्य का विचार करें (kautilya ka arthshastra-apni shakti ke anurup kam karen)

              किसी काम करने की सोचना और अपनी वाणी से उसे करने का दावा करना अत्यंत सहज है पर उसका निष्पादन करना तभी संभव है जब अपने सामर्थ्य के अनुरूप हो। आजकल फिल्म, टीवी तथा पत्र पत्रिकाओं में विज्ञापनों का ऐसा प्रभाव है कि लोग उसमें बहक जाते हैं। तमाम तरह के ऐसे ख्वाब देखते हैं जिनका पूरा कर सकना उनकी सामाजिक, आर्थिक तथा व्यक्तिगत स्तर की सीमित क्षमता के कारण संभव नहीं हो सकता। इतना ही नहीं अनेक बार अपने सामर्थ्य से बड़ा लक्ष्य निर्धारित करने पर लोग अपने सारे आर्थिक संसाधन और शारीरिक ऊर्जा बर्बाद कर देते हैं पर उनके हाथ कुछ नहीं आता जिसकी वजह से उनको भारी मानसिक तनाव का सामना करना पड़ता है।
कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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शक्याशक्यपद्धिविछेदं कुर्याद्बुद्धया प्रसन्नया।
केवलं दन्तभङ्गायदन्तिनः शैलताडनम्।।
            ‘‘अपनी शुद्ध बुद्धि के तय करें कि कौनसा कार्य करना अपनी शक्ति के अनसार है या नहंी। इस तरह का विचार किये बिना कोई काम करना ऐसा ही है जैसे कि हाथी पर्वत पर प्रहार कर अपने केवल दांत ही तोड़ता है।’’
अशक्यारम्भवृत्तीनां कुतः क्लेशादृते फलम्।
भविन्त परितापिन्यो व्यक्तं कर्मविपतयः।।
       ‘‘अपनी शक्ति या सामर्थ्य से बाहर कार्य करने पर सिवाय क्लेश के कुछ हाथ नहीं आता। अपने कर्म से बुलाई गई आपत्ति व्यक्ति के लिये अत्यंत दुःखदायी होती है।’’
           फिल्म, टीवी और समाचार पत्रों में विज्ञापनों के माध्यम से जिस आधुनिक संसार को आम जनमानस के सामने प्रस्तुत किया जा रहा है वह केवल धन की शक्ति से बना है। जिनके पास धन है उनकी शक्ति का प्रचार इस तरह किया जा रहा है कि लोग उनकी भक्ति करने लगते हैं। किसी धनपति की संपदा के उद्गम स्त्रोत पवित्र हैं या नहीं इसकी जानकारी कभी नहीं मिलती। यही कारण है कि समाज में अपराध के प्रति युवाओं का आकर्षण बढ़ रहा है। बुरे काम का बुरा नतीजा जब सामने आता है तब लोगों को अपनी जान तक गंवानी पड़ती है। लोग आत्ममंथन नहीं करते। बस जैसा बाहर देखते हैं वैसा ही अंदर होने की इच्छा पालते हैं। अगर हम आजकल व्याप्त तनाव का अध्ययन करें तो यही सोच उसके लिये जिम्मेदार दिखाई देती है।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Thursday 29 December 2011

भर्तृहरि नीति शतक-दुष्ट लोगों के लिये संसार में कोई गुणी आदमी नहीं (bhritrihari neeti shatka-dushta logon ke liye duniya mein koyee gunee nahin)

            सामान्य मनुष्य पर उसकी संगति का प्रभाव अवश्य होता है। जो लोग चाहते हैं कि उनके अंदर कुविचार न आये, उनकी समाज में छवि सज्जन व्यक्ति की बने और उनके समक्ष कभी संकट न आये वह केवल इतना करें कि अपनी संगत पर ध्यान दें। ऐसे लोगों की संगत करें जिनसे मिलने पर प्रसन्नता होती हो। जो दुख देने वाले, निंदा करने वाले या असंतुलित मस्तिष्क के हैं उनसे दूर रहना ही श्रेयस्कर है। दुष्ट लोगों की संगत इतनी बुरी है कि वह शर्मदार को डरपोक, धर्मभीरु को पाखंडी, सत्यवादियों को कपटी और वीर को क्रूर बताते हैं। इन दुष्टों में बस एक ही गुण होता है दूसरों की निंदा करना। इतना ही नहीं न ऐसे लोगों से संगत करना चाहिए न ही इनकी संगत में रहने वाले के पास जाना चाहिए।
इस विषय में महाराज भर्तृहरि कहते हैं कि
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जाङ्यं ह्नीमति गणयते व्रतरुचौ दम्भः शुचौ कैतवं शूरे निर्घृणता मुनौ विमतिता दैन्यं प्रियालापिनि।
तेजस्विन्यवलिप्तता मुखरता वक्तर्यशक्तिः स्थिरे तत्को नाम गुणो भवेत् गुणिनां यो दुर्जनैनाकितः।।
         ‘‘दुष्ट संकोचशील पुरुषों में जड़ता, धर्मभीरुओं में पाखंड, सत्य धर्म में स्थित रहने वालों में कपट, वीरों में क्रूरता, विद्वानों में मूर्खता, नम्र लोगों में दीनता, प्रभावशालियों में अहंकार, अच्छे वक्तओं में बकवास तथा धीर गंभीर रहने वालों में असमर्थता का दुर्गुण होने का बयान करते हैं। ऐसा कौनसा गुणी आदमी है जिसमें दुष्ट लोग दोष नहीं ढूंढते।’’
              ऐसे दुष्टों की बात पर ध्यान देने से अपना ही मन खराब करना है। हम अच्छे है या बुरे इसकी पहचान हमें स्वयं ही कर सकते हैं। सीधी बात यह है कि हमारे मन में किसी के प्रति बुरा विचार नहीं आना चाहिए। दूसरा व्यक्ति अच्छा है या बुरा इसकी पहचान यह है कि भला आदमी कभी किसी निंदा नहीं करता। सज्जन आदमी हमेशा दूसरों के गुणों की प्रशंसा करता है। इतना ही नहीं दुष्ट व्यक्ति की पहचान होने पर उससे संबंध बनाये रखना ठीक नहीं है। यह सोचना बेकार है कि नियमित संबंध बनाये रखने में क्या दोष? दरअसल ऐसे दुष्ट व्यक्ति सामने कुछ न कहें पर पीठ पीछे अपने साथ का दोष बयान करने से बाज नहीं आते। अपनी छवि बनाने के लिये यह दूसरे की छवि खराब करते हैं।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Sunday 25 December 2011

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-जिस कार्य में निंदा की संभावना हो उसे न करें (kautilya ka arthshastra-jis karya mein ninda ki sanbhawana ho vah n karen)

             आवेश, निराशा, काम और लोभवश कोई काम करना कभी ठीक नहीं है। कार्य करने के परिणामों पर विचार किये बिना उनको प्रारंभ करना जीवन के लिये अत्यंत भयावह प्रमाणित होता है। आजकल आधुनिक प्रचार युग में विज्ञापन की अत्यंत महत्ता है। वस्तुओं और सेवाओं के विज्ञापन तो प्रत्यक्ष दिखते हैं पर विचारों के विज्ञापन किस तरह फिल्म, धारावाहिकों तथा विशेष अवसरों पर बहसों या चर्चाओं के माध्यम से प्रस्तुत किये जाते हैं। इस तरह के विज्ञापन धार्मिक क्षेत्र में अधिक देखे जाते हैं जहां विशेष स्थानों, व्यक्तियों या समूहों की प्रशंसा इस तरह की जाती है जैसे कि उनसे जुड़ने पर संसार में अधिक लाभ होगा। गीत और संगीत से मोहित कर लोगों के धर्म से जोड़ा जाता है ताकि वह वर्तमान समय में मौजूद धर्म समूहों से बंधकर अपनी जेब ढीली करते रहें। इसमें फंसने वाले मनुष्यो के हाथ कुछ नहीं आता है। देखा जाये तो सभी धर्मों में कर्मकांड इस तरह जुड़े हुए हैं कि उनको अलग देखना कठिन है। इन कर्मकांडों से बाज़ार का लाभ होता है न कि आम इंसान में धार्मिक शुद्धि होती है।
कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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तदात्वायसिंशुद्ध शुचि शुद्धकमागतम्।
हितानुबन्धि च सदा कर्म सद्धिः प्रशस्यते।।
             ‘‘जो वर्तमान और भविष्य में शुद्ध हो तथा शुद्ध कर्म से प्राप्त होने वाला फल की दृष्टि से हितकर है बुद्धिमान लोग उसे करना ही श्रेष्ठ समझते हैं।’’
हितानुबन्धि यत्कार्य गच्छेद्येन न वाच्यातम्।
तस्मिन्कर्माणि सज्जेत तदात्व कटुकेऽपि हि।।
          ‘‘हित करने वाला जो हितकारी कार्य है वह उसे ही कहा जा सकता है जिसे करने पर कहीं किसी प्रकार की निंदा नहीं होती। हमेशा ऐसे ही कार्य को प्रारंभ करें चाहे वह वर्तमान में किसी भी प्रकार का लगे।’’
             देखा तो यह गया है कि अनेक लोग काम, लोभ और लालच में आकर अपना धर्म त्याग कर दूसरे की राह पर चलना प्रारंभ कर देते हैं। उनको मालुम नहीं कि यह बाद में अत्यंत कष्टकारी होता है। बचपन से साथ चले संस्कारों का साथ छोड़ना कठिन होता है। हमने यह देखा होगा कि हमारे देश में बाज़ार ने अपने उत्पाद बेचने के लिये अनेक तरह के त्यौहारों का जन्म दिया है। इतना ही जन्म दिन जैसी परंपरा का भी विकास किया है जो कि भारत के प्राचीन संस्कारों का भाग नहीं है। बाज़ार के प्रायोजित प्रचार में फंसे आम भारतीय ऐसे दुष्प्रचार में आसानी से फंस जाते हैं।
               मुख्य बात यह है कि हमें अपने विवेक के अनुसार काम करना चाहिए। किसी दूसरे के कहने में आकर ऐसा काम नहीं करना चाहिए जो कालांतर में निंदा के साथ ही आत्मग्लानि का कारण बने। लोगों को आनंद खरीदने के लिये प्रचार माध्यम प्रेरित करते हैं। आम आदमी उसके प्रभाव में उस पर खर्चीली राह परचलने लगते हैं। इधर उधर दौड़ते हैं फिर थकहारकर मोर की की तरह अपने पांव देखकर विलाप करते हैं। सुख की अनुभूति के लिये ध्यान के अलावा अन्य कोई क्रिया है इस पर ज्ञानी लोग यकीन करते हैं। मुश्किल यह है कि अंतर्मन में सुख की अनुभूति का प्रचार करना बाज़ार की प्रचार शैली का भाग नहीं है जबकि आजकल प्रचार देखकर ही लोग अपना मार्ग चुनते हैं।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Friday 23 December 2011

रहीम के दोहे-राजा और भिखारी किसी की प्रार्थना और गर्जना नहीं सुनते (raja aur bhikhari kisi ki nahin sunte)

             हर मनुष्य को अपनी पहचान स्वयं विकसित करने के साथ ही परिश्रम से आत्मनिर्भर होने का प्रयास नहीं करना चाहिए। सामान्य लोग यह अपेक्षा करते हैं कि कोई उनकी सहायता करे या फिर जीवन में सफलता के लिये कोई ऐसा मार्ग मिल जाये जिसमें संकट उपस्थित न हो। यह संभव नहीं है। दैहिक जीवन जिस तरह सर्दी, गर्मी, बरसात तथा बसंत के मौसम के दौर से गुजरता है वैसे ही हालत भी कभी संकटपूर्ण तथा कभी खुशी देने वाले होते हैं। बुरे दौर में किसी से याचना करना केवल अपनी पहचान पर संकट लाना ही है। हम यह अपेक्षा करते हैं कि कोई धनाढ्य व्यक्ति हमारी सहायता करे तो वह व्यर्थ है। यह सोचना चाहिए कि अगर धनपति अपने धन को हाथ में पकड़ कर न रखने वाला न हो तो वह धनवान कैसे रह सकता है? यदि वह अपने धन से किसी का संकट मिटा दे तो फिर समाज में धनवान और निर्धन होने का अर्थ क्या रह जायेगा। यह अलग बात है कि कुछ दयालु धनपति दूसरे को दान आदि देकर समाज में संतुलन बनाये रखते हैं पर उनकी संख्या नगण्य होती है।
          उसी तरह हमें अपनी देह का स्वास्थ्य बनाये रखने के लिये जहां भोजन नियमित रूप से करना चाहिए वहीं योग साधना आदि के माध्यम से उसे स्वस्थ रखने का प्रयास करना चाहिए। यह बात तय है कि जब तक हम अपने शरीर के सहारे में तभी तक सब ठीक है। अगर कहीं उसमें दोष उत्पन्न हुआ तो फिर कोई सहायक नहीं मिल सकता। कोई न हमारी याचना सुनेगा न ही कोई हमसे डरेगा।
वैसे कविवर रहीम कहते हैं कि
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अरज गरज मानैं नहीं, ‘रहिमन ये जन चारि,।
रिनिया, राजा,मांगता, काम आसुरी नारि।।
‘‘कर्जदार, राजा, भिखारी तथा आसुरी प्रवृत्ति वाली नारी यह चार प्रकार के लोग न किसी की प्रार्थना सुनते हैं न किसी गर्जना को मानते हैं।’’
आदर घटै नरेस ढिंग, बसे रहे कछु नाहिं।
जो ‘रहीम’ कोटिन मिले, धिग जीवन जग माहिं।।
‘‘राजा के निकट रहने से आदर घटने के अलावा अन्य कोई फल नहीं मिलता। यदि भीड़ में शामिल हो जाये तो उसकी अपनी पहचान नहीं रहती। ऐसे में जीवन अपना ही जीवन धिक्कार योग्य लगता है।
प्रातःकाल अपनी देह, मन और विचार के विकार निकालने के बाद हमें इस संसार में जूझने के लिये निकलना चाहिए। जहां तक हो सके सत्संग करें। ऐसे लोगो से संपर्क रखें जो ज्ञानी हों। अपनी एक अलग पहचान हो। किसी की चमचागिरी कर अपना जीवन धन्य समझना एक महान मूर्खता है। प्रयास यह करना चाहिए कि हम किसी की सहायता न करें कि दूसरे पर हमारा काम या लक्ष्य निर्भर हो।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday 17 December 2011

तुलसी के दोहे-अमृत और शराब की कीमत बर्तन से तय नहीं होती (tulsi ke dohe-amrit aur sharab or wine)

             मनुष्य को अपना कर्म करते समय अपने विवेक का ही उपयोग करना चाहिए। अपने जीवन के लक्ष्य तथा उनकी प्राप्ति के साधनों के संग्रह करने के साथ ही इस बात का भी ध्यान रखना आवश्यक है कि वह पवित्र हों। दूसरों को हानि पहुंचाये बिना अपने व्यवसाय या नौकरी करना जीवन के सहजता और सुख दिलाने का एकमात्र उपाय है। यह सही है कि आज के भौतिकवाद युग में काले व्यवसाय और अपराध से पैसा कमाना आसान लगता है पर अंततः उसके दुष्परिणाम भोगने वालों से यह सबक लेना चाहिए कि केवल दौलतमंद होना ही पर्याप्त नहीं वरन् चरित्रवान भी हों तो बेहतर है।
             मनुष्य के गुण ही उसे समाज में सम्मान दिलाते हैं। दुर्गुणी व्यक्ति को धनवान, पदवान या बाहुबली होने के कारण कोई सामने बुरा न कहे पर पीठ पीछे लोग अपनी भड़ास निकालते हैं। दुष्ट लोग अपनी छवि को लेकर भले ही भ्रम में रहें पर गुणवान अपनी प्रतिष्ठा की चिंता किये बिना अपने सत्कर्म में लिप्त रहते हैं।
इस विषय में संत कवि तुलसीदास कहते हैं कि
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मनि भाजन मधु पारई, पूरन अभी निहारि।
का छांड़िअ का संग्रहिअ, कहहु बिबेक बिचारि।।
             ‘‘शराब और अमृत की कीमत और पहचान उसके बर्तन से नहीं वरन् गुण से है। शराब का पात्र मणि का और अमृत का पात्र मिट्टी का बना हो तो आप विवेक से विचार कर बताईये किसका त्याग करेंगे।’’
सुजन कहत भल पोच पथ, पापि न परखइ भेद।
करमनास सुरसरित मिस, बिधि निषेध बद बेद।।
              सज्जन लोग अच्छे और बुरे काम की पहचान करने की योग्यता करते हैं जबकि दुष्ट लोग इस तरफ ध्यान नहीं देते।’’
सज्जन और सद्भाव रखने वाला व्यक्ति भले ही निर्धन हो पर लोग उसका सम्मान करते हैं जबकि दुष्ट और क्रूर व्यक्ति कितना भी बड़ा क्यों न हो उसके लिये सभी के मन मे घृण होती है। समय समय पर अपने चरित्र और व्यवहार का आत्ममंथन करते हुए अपना जीवन सावधानी के साथ बिताना आज के संघर्षपूर्ण युग में बहुत आवश्यक है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Wednesday 14 December 2011

दादू दयाल दोहावली-मनुष्य के पहचान करने का गुण नहीं होता (dadudayal dohawali-mansuhya ki pahachan shakti kam)

          इस संसार में ऐसे ज्ञानी और ध्यानी लोगों की कमी नहीं है जो अपने सांसरिक ज्ञान को बघारते हुए नहीं थकते। इतना ही नहीं धर्म के नाम कर्मकांडों का महत्व इस तरह किया जाता है कि मानो उनको करने से स्वर्ग मिल जाता है। क्षणिक लाभ और मनोरंजन के लिये लोग अपने संबंध बनाते हैं। उनको ऐसा लगता है कि इससे उनका जीवन आराम से कट जायेगा पर इसके विपरीत ऐसे ही संबंध बाद में बोझ बन जाते हैं।
             आजकल हमारे यहां प्रेम विवाहों का प्रचलन अधिक हो गया है। देखा यह जाता है कि अंततः लड़कियों को ही अपने परिवार से वेदना अधिक मिलती है। एक तो उनके परिजन उसकी सामाजिक जिम्मेदारियों से मुक्त हो जाते हैं और अपनी मर्जी से विवाह करने का आरोप लगाकर संपर्क नहीं रखते दूसरे पति के परिजन भी दहेज आदि न मिलने के कारण उनको बहू रूप में ऐसे स्वीकारते हैं जैसे कि मजबूरी हो। फिर परिवार आदि में खटपट तो होती है साथ ही चाहे लड़की नौकरीशुदा हो या नहीं उससे अपेक्षा यह की जाती है कि वह घर का काम करे। ऐसे में जिन लड़कियों ने प्रेम विवाह किया होते हैं उनको वही लड़के संकट देते हैं जिन्हें उन्होंने प्रेमवश सर्वस्व न्यौछावर किया होता है।
संत कवि दादू दयाल कहते हैं कि
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झूठा साचा करि लिया, विष अमृत जाना।
दुख कौ सुख सब कोइ कहै, ऐसा जगत दिवाना।।
            ‘‘मनुष्य को सत्य असत्य, विष अमृत और दुःख सुख की पहचान ही नहीं है। लोगों का दीवाना पन ऐसा है दुख देने वाली वस्तुओं और व्यक्तियों से सुख मिलने की आशा करते हैं।
               
इस तरह दीवानापन लड़कों में भी देखा जाता है। वह लड़कियों के बाह्य रूप देखकर बहक जाते हैं पर जब घर चलाने का अवसर उपस्थित होता है तब पता चलता है कि जीवन उतना सहज नहीं है जितना उन्होंने समझा था। जिस इश्क को उर्दू शायर गाकर थकते नहीं है वही एक दिन नफरत का कारण बन जाता है। आई लव यू कहने वाले फिर आई हेट यू कहने लगते हैं।
        तत्वज्ञानियों को पता है कि यहां हर देहधारी वस्तु अंततः पुरातन अवस्था में आती है। हम अपने मुख से करेला खायें या मिठाई पेट में अंततः वह कचड़ा ही हो जाता है। हम शराब पियें या शरबत पेट में वह विषाक्त जल में परिवर्तित होता है जिसके जिसके निष्कासन पर ही हमारी देह ठंडी होती है। इस ज्ञान को बुढ़ापे में धारण करने अच्छा है कि बचपन में धारण किया जाये तभी संसार के उन संकटों से बचा जा सकता है जो अज्ञान के कारण हमारे सामने उपस्थित होते हैं। कभी कभी तो उनकी वजह से देह का नाश भी होता है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday 10 December 2011

दादू दयाल दोहावली-शिष्य पर प्रभाव न हो तो गुरु क्या कर लेगा (dadu dayal dohawali or dohavali-guru aur shishya)

          हम यह कहते हैं कि आज समय खराब आ गया है पर जब प्राचीन कवियों और संतों की रचनाओं का अध्ययन करते हैं तो पाते हैं कि हमारे समाज में पाखंडी और ढोंगियों की कभी वर्तमान में क्या प्राचीन काल में भी कमी नहीं रही। इसका कारण यह है कि हमारे अध्यात्मिक ज्ञान और दर्शन में गजब का प्रभाव है। उसमें सकाम तथा निष्काम भक्ति को समान मान्यता दी गयी है। साकार तथा निराकार भक्ति के आपसी विरोध की बजाय सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास किया गया है। हालांकि निराकार परमात्मा के साथ ही निष्काम भक्ति को श्रेष्ठ माना गया है पर सकाम तथा साकार भक्ति का प्रचार अधिक होता है। कथित गुरु हमारे अवतारों की कहानियों के आड़ में मनोरंजन करते हैं। अनेक सत्संग तो फिल्मी ढंग से मनोरंजन, दुःख, खुशी तथा नृत्य के साथ गीत संगीत के शोरशराबे के साथ मिश्रित रस बिखेरने वाले होते हैं। अनेक लोग तो प्रमाद भी करते हुए हास्य का भाव भी भरना उसी तरह नही भूलते जैसे कि फिल्म में एक मजाकिया पात्र रखा जाता है। उस समय यह बात ध्यान में नहीं रखी जाती है कि अध्यात्मिक चर्चा अत्यंत शांति से हृदय में एकाग्रता के भाव से लाभदायक होती है। सत्संगों में संगीत और गीत के माध्यम से भक्तों को बहलाया जाता है। हम व्यवसायिक संतों को ढोंगी या पाखंडी न भी माने पर इतना तय है कि उनका लक्ष्य भारतीय अध्यात्म दर्शन की आड़ में आत्मप्रचार करना ही होता है। अधिकतर धार्मिक स्थानों पर गीत संगीत बजता है जबकि भक्ति या साधना के लिये शांत वातावरण होना आवश्यक है।
निर्गुण भक्ति के उपासक कवि दादू दयाल कहते हैं कि
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झूठे अंधे गुर घणें, भरम दिढावै।
‘दादू’ साचा गुर मिलैं, जीव ब्रह्म ह्वै जाइ।।
        ‘‘अंधे गुरुओं की संख्या बहुत ज्यादा होती है जो लोगों को भ्रम में डालते हैं। इस संसार में अगर सच्चा गुरु मिल जाये तो समझ लो साक्षात् ईश्वर के दर्शन हो गये।’’
‘दादू’ वैद बिचारा क्या करै, जै रोगी रहैं न साच।
मीठा खारा चरपरा, मांगै मेरा वाछ।।
           ‘‘वेद शास्त्रों का ज्ञान क्या कर सकता है जब उसका अध्ययन करने वाले में धारणा शक्ति का अभाव है। उस रोगी का क्या इलाज हो सकता है जो सावधानी नहीं बरतता। अगर रोगी मीठा, खारा, चटपटा खाना चाहता है तो कोई औषधि उस पर प्रभाव नहीं डाल सकती।
            व्यवसायिक संतों के प्रवचनों का प्रभाव भी क्षणिक रहता है। लोग तीर्थ स्थानों या गुरुओं के आश्रमों पर पर्यटन करने की दृष्टि से जाते हैं। उनका लक्ष्य भक्ति से अधिक मन बहलाना होता है। स्थान परिवर्तन से मन को ताजगी का यह भाव कहीं भी भक्ति का प्रतीक नहीं है। ऐसे में अगर कुछ सत्य मार्ग का संदेश तो उसका प्रभाव नहीं रहता। यही कारण है कि हम विश्व में जैसे जैसे संचार के क्षेत्र में आधुनिक साधनों का उपयोग होते देख रहे हैं वैसे वैसे भारतीय अध्यात्मिक की चर्चा अधिक हो रही है। कभी कभी तो यह लगता है कि जैसे पूरा देश ही धर्मवादी हो रहा है पर यह सच नहीं है। लोगों की भीड़ धार्मिक चर्चाओं में व्यस्त दिखती है पर उनमें उस अध्यात्मिक ज्ञान का अभाव है जो जीवन को सहज बनाता है।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday 3 December 2011

मलूकदास के दोहे-सुदंर शरीर देखकर बहको मत (malukdas ke dohe-sundar sharir dekhkar bahako mat)

           हमारे अध्यात्मिक ज्ञान के अनुसार इस संसार में समस्त दृश्यव्य वस्तुऐं नश्वर हैं। बाकी की बात क्या करें यह प्रथ्वी, सूर्य, चंद्रमा और अन्य ग्रह भी नश्वर माने गये हैं। आधुनिक विज्ञान भी यह मानता है कि प्रथ्वी और इस पर विचरण करने वाले समस्त जीवों के साथ ही अन्य ग्रहों का भी एक जीवन है जो अंततः नष्ट होता है। अमेरिकन वैज्ञानिकों ने तो एक ब्लैकहोल का पता भी लगाया है जो प्रतिदिन सैंकड़ों तारों को लील जाता है। कहने का अभिप्राय यह है कि यहां कुछ भी स्थिर नहीं है।
            इस संसार में विचरण करने वाले समस्त प्राणियों की देह भले ही बाहर से आकर्षण लगती है पर अगर उसे आधुनिक सूक्ष्म यंत्रों से देखा जाये तो अंदर का ढांचा अत्यंत गंदगी भरा रहता है। वहां हड्डियां, रक्त, कीचड, और मांस के टुकड़ों के साथ कीड़े मकौड़े रैंगते दिखाई देते हैं। कम से कम अंदर का दृश्य दर्शनीय नहीं होता। इतना ही नहीं समय के अनुसार सभी की देह पतन की तरफ बढ़ती जाती है। इसके बावजूद अनेक लोग सुंदर देह के अनेक दीवाने हैं। कुछ मनुष्यों को अपनी सुंदर देह पर अत्यंत अहंकार भी रहता है। हमारे अध्यात्मिक महर्षि सदैव इस तरफ ध्यान दिलाते रहे हैं कि यह मनुष्य देह जहां नश्वर है वहीं आत्मा अमर है अतः मनुष्य को योग ध्यान तथा जाप से स्वयं पर नियंत्रण करना चाहिए।
मलूकदास कहते हैं कि
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सुंदर देही देखि कै, उपजत है अनुराग।
मढ़ी न होती चाम की, तो जीवन खाते काम।।
          ‘‘मनुष्य का स्वभाव है कि वह किसी भी सुंदर शरीर को देखकर उससे प्रीति करने को लालाचित होने लगता है जबकि इसमें मांस, खून और हड्डी भरे हुए हैं। अगर इस कचड़े के ऊपर यह देह न हों तो कौऐ इसे जीते जी खाने लगें।
सुंदर देही पाइ कै, मत कोइ करै गुमान।
काल दरेरा खायगा, क्या बूढ़ा क्या जवान।।
            ‘‘सुंदर शरीर पाकर किसी को इतरना नहीं चाहिए। आदमी बूढ़ा हो या जवान काल किसी को भी खा सकता है।’’
         हम देख रहे हैं कि हमारे देश में आधुनिक शिक्षा तथा मनोरंजन के साधनों की वजह से पूरा समाज अपने अध्यात्मिक ज्ञान को भूलकर माया तथा सौंदर्य के पीछे भाग रहा है। ऐसा लगता है कि लोगों ने अक्ल के द्वारा बंद कर दिये हैं। ऐसे में भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान पर दृष्टिपात करते है तो लगता है कि अज्ञानियों का झुंड चहुं ओर फैला है। स्थिति यह है कि स्त्रियों के नग्न चित्रों को देखने के लिये लोग मरे जा रहे हैं। जिन लोगों को तत्वज्ञान है वह ऐसी स्थिति में हंसते हैं।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Wednesday 30 November 2011

तुलसी दर्शन-वाणी और वेश से किसी को जानना संभव नहीं (tulsi darshan-vani aur vesh aur aadmi)

                  आधुनिक समाज में लोगों की नज़रों में सौंदर्य, चतुराई तथा बुद्धिमानी के मायने ही बदल गये हैं। रसायनिक पदार्थों से व्यक्तियों तथा वस्तुओं का सौंदर्य निखारा जा रहा है। बाज़ार के सौदागर तथा उनके प्रचारक मिलकर समाज की बुद्धि का हरण करते जा रहे हैं। किसी वस्तु के उपभोग को विज्ञापनो से प्रेरित करने के प्रयास में उनको आकर्षक शाब्दिक शोर तथा संगीत से इस तरह भरा जाता है कि उसके माध्यम से आम जनमानस का विवेक तथा बुद्धि का हरण किया जा सके। यही कारण है कि उपभोग की वस्तुओं के उपयोग को चतुराई माना जाता है। लोहे लकड़ी और प्लास्टिक की चीजों के रंगे होने से उनमें जो सौंदर्य उभरकर इस तरह आता है कि लोग उस पर मोहित हो जाते हैं।
संत कवि तुलसी दास जी कहते हैं कि
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बचन बेष क्या जानिए, मनमलीन नर नारि।
सूपनखा मृग पूतना, दस मुख प्रमुख विचारि।।
         ‘‘वाणी और वेश से किसी मन के मैले स्त्री या पुरुष को जानना संभव नहीं है। सूपनखा, मारीचि, रावण और पूतना ने सुंदर वेश धरे पर उनकी नीचत खराब ही थी।’’
मार खोज लै सौंह करि, करि मत लाज न ग्रास।
मुए नीच ते मीच बिनु, जे इन के बिस्वास।।
          ‘‘वह निबुर्द्धि मनुष्य ही कपटियों और ढोंगियों का शिकार होते हैं। ऐसे कपटी लोग शपथ लेकर मित्र बनते हैं और फिर मौका मिलते ही वार करते हैं। ऐसे लोगों भगवान का न भगवान का भय न समाज का, अतः उनसे बचना चाहिए।
          आधुनिक शिक्षा पद्धति में रचाबसा समाज आपनी बुद्धि तथा विवेक का इस्तेमाल करना फालतू तनाव मोल लेना समझता है। यही कारण है कि हमारे यहां दैहिक विकारों के साथ मानसिक रोगों का भी विस्तार हो रहा है। हम जब देश की जनंसख्या 121 करोड़ होने के दावे पर इतराते हैं तब इस बात की जानकारी एकत्रित नहीं करते कि उसमें शारीरिक तथा मानसिक विकारों से रहित कितने लोग हैं? मानसिक तथा दैहिक स्वास्थ्यय विशेषज्ञ देश में बढ़ रहे रोगियो की संख्या अब चालीस और पचास प्रतिशत से ऊपर बताने लगे हैं। इसका कारण यह है कि हम लोग अपने अध्यात्मिक दर्शन को प्राचीन मानकर उसकी अवहेलना करते हैं जबकि वह प्रकृत्ति तत्वों के सत्य पर आधारित है जो कभी नहीं बदलते भले ही हमारी नज़र में कथित रूप से जमाना बदल जाये।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday 26 November 2011

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-जहां मित्र पहुंच सकते हैं वह भ्राता नहीं (kautilya ka arthshastra-friend and brother or father,mitra, pita aur bhai)

           इस संसार में सभी प्रकार के पारिवारिक तथा सामाजिक संबंधों की सीमा है। पारिवारिक संबंध जन्म के आधार पर बनते हैं तो सामाजिक लोगों के साथ बनाये जाते हैं, पर मित्रता या आत्मीय रिश्ता मनुष्य के व्यवहार, कार्य तथा विचारों से प्रकृति के अनुसार बनता है। आत्मीय या मित्रता संबंध न बनते हैं न बनाये जाते हैं बल्कि प्रकृति ही मनुष्य के सामने उनको उपस्थित करती है। जहां पारिवारिक संबंध सामाजिक आधारों पर कभी इच्छा से तो कभी मन की बाध्यता की वजह से निभाये जाते हैं वही प्रकृति निर्मित मित्रता तथा आत्मीय संबंध निभाने की कोई अनिवार्यता नहीं होती। इसके बावजूद आदमी जिससे मित्रता करता है उसके प्रति बिना किसी फल के मित्रता का निर्वाह करने को तैयार रहता है। कई बार स्थिति यह होती है कि विपत्ति आने या विशेष काम उपस्थित होने पर जहां परिवार के सदस्य या रिश्तेदार सहयोग करने नहीं पहुंच सकते वहां मित्र अपनी भूमिका निभाने के लिये तत्पर हो जाते हैं।
           फिर आज के समय जब भौतिकता का बोलबाला है और लोग अपनी रोटी रोटी कमाने के लिये अपने शहरों से पलायन कर दूसरी जगह बस रहे हैं। इससे उनके पारिवारिक तथा सामाजिक संबंधों से दूरी बन जाती है। कहा भी जाता है कि जो देह से दूर है वह दिल से भी दूर है। इसके अलावा महिलाओं के विवाह भी अपने शहरों से दूर दूसरे शहरों में काम कर रहे पुरुषों होते हैं, तब परिवार और रिश्तेदार उनसे दूर हो जाते हैं। इसलिये  उनको प्रकृत्ति निर्मित बाह्य संबंधों पर निर्भर होना पड़ता है। जब किसी खास अवसर पर पारिवारिक लोग उनको महत्व अधिक मिलते देखते हैं तो दुःखी हो जाते हैं। कुछ लोग ताने भी देते हैं पर वह इस सत्य को नहीं समझते कि आदमी अपनी देह की आवश्यकताओं के कारण उन मैत्री और आत्मीय संबंधों पर निर्भर रहता है जहां पारिवारिक तथा सामाजिक रिश्तेदार काम नहीं करते।
कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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न तत्र विष्ठति भ्राता न पितोऽयोऽपि वा जनः।
पुंसामापत्प्रत्तीकार सन्मित्रं यत्र तिष्ठति।।
          ‘‘जहां किसी आदमी पर आपत्ति आने पर मित्र पास आकर उसे दूर कर सकता है वहां भ्राता, पिता तथा अन्य आत्मीय जन पहुंच भी नहीं सकता।
प्रकाशपक्षग्रहणं न कुर्यात्सहृदां स्वयंम्।
अन्योन्यमत्सरंवषा स्वयमेवाशं धारवेत्।।
           ‘‘अपने प्रियजनों का पक्ष कहीं भी स्वयं प्रकट रूप से न लें बल्कि गुप्त रूप से किसी को इसके लिये प्रेरित कर इस कार्य को संपन्न करें।’’
            वैसे संबंध चाहे पारिवारि हो या सामजिक हों या मैत्री वाले उनका कहीं अगर पक्ष रखना हो तो स्वयं यह काम न करें बल्कि किन्हीं अन्य लोगों से परस्पर सहयोग के आधार पर उनसे यह काम करवायें। बदल में आप उनका ऐसा ही काम करें। कहीं वाद विवाद या किसी अनुबंध के अवसर पर आप अपने आदमी का पक्ष रखेंगे तो यह माना जायेगा कि आप तो उसका पक्ष लेंगे ही इसलिये उसका महत्व कम हो जाता है।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Tuesday 22 November 2011

तुलसीदास के दोहे-दूसरे की अपकीर्ति करने वाले के मुख पर कालिख लगी नजर आती है (tulsidas ke dohe-doosre ke ninda karne valon ka munh kala)

           सामान्य मनुष्य अपनी प्रकृतियों के वशीभूत होकर काम करता है, जबकि ज्ञानी मनुष्य उनको पहचानते हुए अपने विवेक से किसी काम को करने या न करने का निर्णय लेता है। देखा जाये तो समाज में ज्ञानी मनुष्य अत्यंत कम होते हैं पर दूसरे की अपकीर्ति के माध्यम से स्वयं की कीर्ति अपने मुख से बखान करने वालों की संख्या बहुत होती है। उससे भी अधिक संख्या तो दूसरों की निंदा करने वालों की होती है जो यह मानकर चलते हैं कि दूसरे के दोष गिनाकर हम यह साबित कर सकते हैं कि हमारे पास गुण है।
          आपसी वार्तालाप में लोग एक दूसरे से कहते हैं कि ‘‘अमुक आदमी में वह दोष है’, ‘अमुक आदमी यह बुरा काम करता है’, अमुक आदमी इस तरह का गंदा विचार पालता है’, या फिर ‘अमुक आदमी गंदा भोजन खाता है या पानी पीता है’। इस तरह आदमी यह साबित करना चाहता है कि अमुक बुराई ये वह स्वयं दोषमुक्त है। ज्ञानी आदमी अपना आत्ममंथन करता है। वह दूसरों की बजाय अपनी कमियां ढूंढकर उनको दूर करने का प्रयास करता है।
महाकवि तुलसीदास कहते हैं कि
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‘तुलसी’ जे कीरति चहहिं, पर की कीरति खोइ।
तिनके मुंह मसि लागहैं, मिटिहि न मरिहै धोइ।।
         ‘‘दूसरों की निंदा कर स्वयं प्रतिष्ठा पाने का विचार ही मूर्खतापूर्ण है। दूसरे की अपकीर्ति कर अपनी कीर्ति गाने वालों के मुंह पर ऐसी कालिख लगेगी जो कितना भी धोई जाये मिट नहीं सकती।’’
तनु गुन धन महिमा धरम, तेहि बिनु जेहि अभियान।
तुलसी जिअत बिडम्बना, परिनामहु गत जान।।
        ‘‘सौंदर्य, सद्गुण, धन, प्रतिष्ठा और धर्म भाव न होने पर भी जिनको अहंकार है उनका जीवन ही बिडम्बना से भरा है। उनकी गत भी बुरी होती है।
          सच बात तो यह है कि आधुनिक समय में आदमी धन, प्रतिष्ठा और बाहुबल अर्जित करने के प्रयास में लगा रहता है। न उसके व्यक्तित्व में आकर्षण न व्यवहार में गुण दिखता हैं और न ही व्यसनों की वजह से प्रतिष्ठा और धन भी उसके स्थिर रहता है। इसके बावजूद अधिकतर लोगों के पास अहंकार होता है। जो लोग जुआ, शराब या यौन अपराधों में लिप्त होते हैं उनको अगर नैतिकता का उपदेश दिया जाये तो वह उत्तेजित होते हैं। इतना ही नहीं अनेक लोग तो ऐसे हैं जो अपने में ढेर सारे दोष होने के बावजूद दूसरों की निंदा में लगकर अपनी स्थिति हास्यास्पद बना देते हैं।
ज्ञानी आदमी इन सबसे परे होकर जीवन व्यतीत करता है। उसे मालुम होता है कि गुण और ज्ञान के संचय के लिये समय कम होता है तब परनिंदा में उसे नष्ट करना बेकार है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday 19 November 2011

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-मद्यपान मनुष्य को पशु बना देता है

             शराब पीना एक ऐसा व्यसन है जिससे अनेक दोष पैदा हो जाते हैं। आजकल शादी तथा अन्य कार्यक्रमों पर शराब का फैशन आम हो गया है। अध्यात्मिक ज्ञान से परे समाज इसके दोषों को नहीं जानता। इससे जो मानसिक और शारीरिक विकार पैदा होते हैं इसकी तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता। वैसे तो हमारे देश में मद्यपान प्राचीनकाल से प्रचलित रहा है पर इस तरह कभी समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग इसकी चपेट में रहा होगा यह कल्पना करना कठिन है। हमारे यहां पाश्चात्य सभ्यता के आगमन के साथ ही इसका प्रचलन बढ़ता जा रहा है। अंग्रेजी शराब और दवाओं के बीच फंसे भारत के अधिकतर लोग अध्यात्मिक ज्ञान के बिना यह नहीं जान सकते कि इस शरीर में ही वह तत्व मौजूद हैं जो कोई विकार नहीं आने देते और आ भी जायें तो उनका निवारण भी वही करते हैं। इसके लिये आवश्यक है कि योग विज्ञान का अध्ययन किया जाये
कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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गमनं विह्वलत्बञ्व संज्ञानाशो विवस्त्रता।
असम्बंधप्रलापित्वकस्माद्वयसनं मुहुः।।
प्राणाग्लानि सहृदन्नाशः प्रजाश्रृतिमतिभ्रमः।
सद्धिर्वियोगोऽसद्धिश्व संगोऽनर्ष्टोन संगमः।।
स्खलनं वेपथुस्तन्द्र नितांतस्त्रीन्विेषणं।
इत्यादिपानव्यसनम्तयंतं सद्विगर्हितं।।
          ‘‘चलते और घूमते रहना, व्याकुलता,संज्ञानाश वस्त्ररहित होना, वृथा, बकवास या प्रलाप करना और अकस्मात् व्यसन में पड़ना’’
       ‘‘अपने मन में ग्लानि करना, मित्रों का नाश, बुद्धि, शास्त्र और मति में भ्रम होना, तत्पुरुषों से वियुक्त रहना, असत्पुरुषों की संगति करना, अनर्थो की संगत में पड़ना’’
         "पद
पद पर स्खलित होना, शरीर में कपंना होना, तन्द्रा तथा स्त्रियों के प्रति अत्यधिक आकर्षित होना, यह सब मद्यपान के व्यसन है। इनकी इसलिये निंदा की जाती है।
        अनेक लोग तो ऐसे हैं जो शराब पीना नहीं छोड़ना चाहते वह इससे उत्पन्न शारीरिक दोषों के निवारण के लिये ऐसे पदार्थों का सेवन करते है जो अधिक विषैले होते हैं। इससे जो मानसिक हानि होती हैं इसका आभास किसी को नहीं है। इतना ही नहीं जिस समाज को दिखाने के लिये वह शराब पीते हैं उसमें उनकी छवि कितनी खराब हो रही है यह भी नहीं जानते। हमारे अध्यात्म ग्रंथ इस बात की जानकारी देते हैं कि अंततः मद्यपान मनुष्य का मनुष्यत्व लीलकर उसे पशु बना देते हैं।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Wednesday 16 November 2011

भर्तृहरि नीति शतक-चीजों का मोल गरीब और अमीर के लिए अलग अलग होता है

             इस संसार में अनेक वस्तुएं हैं और धनी और निर्धन दोनों ही उसे पाना चाहिते हैं पर समय और हालात के अनुसार उनका मोल के साथ महत्व में भी अंतर होता है। मनुष्य का यह स्वभाव है कि वह अगर धनार्जन करता है तो उसे व्यय के लिये भी तत्पर रहता है। जैसे जैसे उसके पास धन संपदा बढ़ती है अपना वैभव दिखाने के लिये वह उतना ही उतावला होता हैै। अगर कोई अल्पधनी अपनी मेहनत से धनवान हो जाता है तो उसे इस बात की प्रसन्नता कम होती है बल्कि वह इस चिंता को अधिक पाल लेता है कि वह अपने वैभव का प्रदर्शन समाज के सामने कर अपनी गरीब की छवि से मुक्ति पाये।
         नवधनाढ्य आदमी समाज के सामने अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने कें लिये अनेक पदार्थों का संचय करता है। अपनी चाल ढाल से वह यह सिद्ध करने का प्रयास करता है कि वह अब धनवान हो गया है। यही कारण है कि हमारे देश में धनवानों की बढ़ती संख्या के कारण भौतिक पदार्थों के संचय के साथ ही विलासिता का प्रदर्शन भी तेज हो गया है।
भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि
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परिक्षीणः कश्चित्स्पृहयति यवानां प्रसृतये स पश्चात्सम्पूर्णः कलयति धरित्रीं तृणसमाम्।
अतश्चानैकान्त्याद् गुरु लघुतयाऽर्थेषु धनिनामवस्था वस्तुनि प्रथयति च संकोचयति च।।
         ‘‘जब मनुष्य गरीब होता है तब वह अपने रहने के लिये एक गज जमीन की चाहत करता है पर जब अमीर होने पर वही पूरे भूमंडल की कामना करने लगता है। इस संसार में अनेक पदार्थ हैं और अमीरी गरीबी के अनुसार उनको पाने की कामना बदलती रहती है। वस्तुओं का महत्व भी मनुष्य की आर्थिक स्थिति के अनुसार बदलता रहता है।"
            जहां तक धन कम या ज्यादा होने का सवाल है तो यह त्रिगुणमयी माया अपने रंग रूप इंसान को इस तरह दिखाती है कि वह उसी को ही सत्य मानकर उसके इर्दगिर्द घूमता रहता है। अपनी आत्मा और परमात्मा विषयक अध्यात्म ज्ञान उसके लिये सन्यासियों का विषय होता है। धन न होने पर आदमी अपने सांसरिक संघर्ष में निरंतर व्यस्त रहता है इसलिये सत्संग तथा ज्ञान चर्चा उसके लिये दूर की कौड़ी हो जाती है तो धन आने पर आदमी ऐसे सात्विक स्थानों पर भी अपने राजस भाव का प्रदर्शन बहुत उत्तेजना के साथ करता है जहां अध्यात्मिक विषयक विचार हो रहा है। मजे की बात यह है कि धनवान लोगों को यह भ्रम रहता है कि उनके पास अध्यात्मिक ज्ञान है वह उसका बखान भी करते हैं। यह अलग बात है कि उनकी वाणी के पीछे ज्ञान का नहीं  वरन् धन का ओज होता है। उनके सामने प्रस्तुत लोग ज्ञान बघारते समय भले कुछ न कहें पर पीठ पीछे  उन पर हंसते हैं। वजह साफ है, ज्ञान का प्रमाण भौतिक पदार्थों की उपलिब्ध नहीं वरन! उनका त्याग है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Sunday 13 November 2011

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-घमंड या मजाक में भी प्रकृति व्यसन की उपेक्षा नहीं करना चाहिए

कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
प्रकृतिव्यसनानि भूतिकामः समुपेक्षेत नहि प्रमाददर्पात।
प्रकृतिव्यसनान्युपेक्षते यो न चिरातं रिपवःपराभतवन्ति।।
           ‘‘भौतिक वस्तुओं की प्राप्ति से आने मस्तिष्क में आने वाले प्रमाद या अपनी स्थिति से उत्पन्न होने वाले दर्प के कारण प्रकृति के व्यसनों की उपेक्षा नहीं करना चाहिए। प्रकृति के व्यसनों की अपेक्षा करने वालों की स्थिति खराब हो जाती है।
राजा स्वयव्यसनी राज्यव्यसनापीह्न्क्षमः।
न राज्यव्यसनापोहसमर्थ राज्यपूर्जितम्।।
"जो राज्य प्रमुख स्वयं व्यसनों से रहित हो वही प्रजा के व्यसनों को दूर कर सकता है अन्यथा वह अपने अपने विशाल राज्य को विपत्तियों और व्यसनों से बचा नहीं सकता।"
                वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-कौटिल्य का अर्थशास्त्र एक बृहद राजनीतिक सिद्धांतों का भंडार है। हम में से अधिकतर लोग राजनीति को केवल राजकाज से जुड़ा विषय मानते हैं जबकि राजनीति का अर्थ है राजस कर्म की प्रक्रिया से जुड़ना। देखा जाये तो इस संसार में फल की इच्छा से किया गया हर कर्म राजस प्रवृत्ति से जुड़ा है इसलिये शायद पहले के अनेक महान ऋषियों ने राजस बुद्धि के उपयोग तथा उस पर नियंत्रण के सिद्धांतों का प्रतिपादन करते हुए इस बात का ध्यान रखा कि उसका राजा और प्रजा दोनों ही पालन करें। जिस तरह राज अपनी प्रजा को अपनी प्रजा पर नियंत्रण करना होता है उसी तरह परिवार के मुखिया को भी अपने आश्रित सदस्यों को भी पालना होता है। ऐसे में दोनों को ऐसे सिद्धांतों का पालन करना पड़ता है जो राजस कर्म को भली प्रकार संपन्न करने में सहायक होते हैं। उनके अनुसार राज्य या परिवार प्रमुख को अपनी आदतों, विचारों तथा बुद्धि पर नियंत्रण करना चाहिए तभी वह अपने अंतर्गत रहने वाले लोगों पर नियंत्रण कर सकते हैं।
           देखा यह गया है कि शक्ति के मद में आदमी अनियंत्रित होकर मदमस्त होकर चलता है। ऐसे में हादसें होने की संभावना बढ़ जाती है पर इस विषय पर कोई नहीं सोचता। इतना ही नहीं धन, बल और प्रतिष्ठा अधिक होने पर आदमी पागल तक हो जाते हैं और अपनी बकवास को ब्रह्म वाक्य की तरह व्यक्त करते हैं। धन संग्रह तथा मनोरंजन की चाहत से आजकल लोगों ने अपनी निद्रा तक का त्याग कर दिया है। प्रातः उठना तो एक तरह से पुराना फैशन हो गया है। परिणाम यह हुआ है कि हमारे देश का अभिजात्य वर्ग राजरोगों का शिकार हो गया है। ऐसे में मनुष्य दिखने में भले ही मनुष्य लगता है पर उसका जीवन पालतु पशुओं की तरह हो गया है। जिस तरह पशु पालतु अपने मालिक की मर्जी से चलते हैं वैसे ही आजकल लोग उपभोग की वस्तुओं के दास हो गये हैं। राजा हो या प्रजा, पिता हो या पुत्र या मात हो या पुत्री सभी अनियंत्रित हो गये हैं। फिर भी सभी को ऐसा नहीं माना जा सकता। ऐसे ज्ञानी लोग जिनको पता है कि किसी वस्तु का उपभोग करना और उसे व्यसन की तरह उपयोग में लाने की प्रक्रिया में अंतर है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Tuesday 8 November 2011

यजुर्वेद से संदेश-नारी को पुरुष से न डरना चाहिए न कांपना (yajurved se sandesh-nari ko purush se darana nahin chahiye

             कहा जाता है कि हमारे वेदों में नारी को हेय समझा गया है। इतना ही नहीं कुछ लोग तो इसी कारण वेदों को पठनीय मानकर उनका तिरस्कार करते हैं।  जबकि इस बात ज्ञानी ही जानते हैं कि वेदों में ही स्त्री के बिना पुरुष और पुरुष के बिना स्त्री का संसार नीरस होने की बात बताई गयी है। वेदों में स्त्री को छुईमुई बने रहने की बजाय शक्तिशाली और पराक्रमी बनने की बात कहीं जाती है। धर्म का आधार स्त्री और पुरुष दोनों एक ही समान है इसलिये किसी भी पुरुष के साथ योग्य स्त्री होने पर उसे जीवन संघर्ष में पार लगा देती है। जो पुरुष अपनी स्त्री को हेय मानकर उनको पराक्रमी या शक्तिशाली नहीं बनने देते वह स्वयं ही कष्ट उठाते हैं।
यजुर्वेद में कहा गया है कि
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मां भेर्मा सं विवस्था उर्ज हात्स्व धिषणे वीड्वी सती वीऽयेथासूर्ज दधाधाम्।
पाम्पा हतो न सोमः।।
            ‘‘हे नारी, तुम दैहिक शक्ति से युक्त हो जाओ, पति से न डरो न कांपो बल्कि पराक्रम धारण कर। तुम दोनों स्त्री पुरुष पराक्रमी होकर बल धारण करो। उत्तम व्यवहार से दोनों अपने दोष दूर कर चंद्रमा के समान गुणी बनकर अपना जीवन आनंदित करो।’’    
          आजकल हम नारी जाति में आये बदलाव के लिये पश्चिमी संस्कृति को श्रेय देते नहीं थकते जबकि सच यह है कि यह हमारे खून में ही है कि समय के अनुसार हमारा समाज विकास के पथ पर चलता है।  यह अलग बात है कि हमारे देश के समाज पर नियंत्रित करने वाले समूह चाहते हैं कि भारतीय समाज वेदों, उपनिषदों तथा अन्य महाग्रंथों से दूर रहे ताकि वह पश्चिम का ज्ञान यहां बघारकर अपने आधुनिक होने के साथ ही शक्ति केंद्रों पर अपना नियंत्रण बनाये रखें।  कहा जाता है कि इन वेदों की रचनाऐं ऋषियों ने की तो पर यह भी  कहा जाता है कि इसमें स्त्रियों का भी योगदान रहा है। इसी कारण इसमें लिखे गये श्लोंको ऋचायें कहा जाता है। ऋषि शब्द पुरुष के लिये तो ऋचायें शब्द स्त्रियों के लिये प्रयुक्त हुआ है। महर्षियों के कथनों को ऋचाओं ने लिखा इसी कारण संस्कृत में रचे गये इन रचनाओं को ऋचायें भी कहा जाता है। कहने का अभिप्राय यह है कि वेदों में कही गयी बातों का गूढ़ अर्थ है पर इसे सहजता से ज्ञानी लोग ही समझ पाते हैं। अज्ञानियों के लिये तो यह काला अक्षर भैंस बराबर है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Sunday 6 November 2011

वेदांत दर्शन-परमात्मा के स्वरूप पर कोई विरोध नहीं (vedant darshan-parmatma ke swaroop ka virodh nahin)

              विश्व में अनेक धर्म हैं। इनसे जुड़े धर्म समुदायों में भी विभाजन हो चुका है। विदेशों में प्रवर्तित धर्म और उसके समुदाय को वर्तमान में अध्ययन करें तो पायेंगे कि वह दो तीन तो कहीं चार भागों में बंट गये हैं। उनके धर्मगुरु अपने अनुयायियों को दूसरे धर्म के लोगों का भय दिखाकर भले ही अपने पाले में रखते हैं पर फिर भी उनके आपसी हिंसक संघर्ष होते रहते हैं। एक ही धर्म का एक समुदाय अपने को असली एवं शुद्ध बताता है तो दूसरे समुदाय को दुष्ट कहता है। इसके विपरीत भारतीय धर्मों में विभिन्न समुदाय होने के बावजूद कहीं आपसी संघर्ष का इतिहास नहीं है। सभी धर्म और उनके प्रवर्तक यह मानते हैं कि परमात्मा अनंत है। उसको साकार रूप से भले ही न देखा जाये पर ध्यान, योग तथा भक्ति के माध्यम से उसकी उपस्थिति की अनुभूति अपने हृदय में की जा सकती है। यह बात सही है कि लोग अपनी सुविधा के अनुसार साकार तथा निराकार भक्ति करते हैं पर एक दूसरे के प्रति उनमें आदरभाव रहता है। यहां तक कि एक ही परिवार में अनेक सदस्यों का अलग अलग इष्ट देव होता है पर मूल रूप से यह सभी मानते हैं कि परमात्मा एक है। इस पर कहीं कोई विवाद न होता है न होना चाहिए।
हमारे वेदांत दर्शन में कहा गया है कि
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साक्षादष्विरोधं जैमिनि।
            ‘‘शब्द को साक्षात् परब्रह्म मानने में भी कोई विरोध नहीं है ऐसा जैमिनि आचार्य मानते हैं।
अभिव्यक्तेरित्याश्मरथ्यः।
              ‘‘देश विशेष में ब्रह्म का प्रकट रूप होता है इसलिये इसमें कोई विरोध नहीं है।’’
‘‘अनुस्मृतेर्बादरिः।
             ‘‘ऐसा बादरि नामक आचार्य मानते हैं।
         कहने का अभिप्राय यह है कि भक्ति के स्वरूप या परमात्मा के अस्तित्व को लेकर भले ही आपस में मतभेद हों पर मनभेद नहीं होना चाहिए। इसके अलावा किसी की भक्ति की प्रक्रिया और परमात्मा के रूप पर भी प्रतिकूल टिप्पणियां न करना ही उचित है। हमारा अध्यात्मिक दर्शन मानव मन की व्यापकता का चिंतन करते हुए नित नये सिद्धांतों का प्रतिपादन करता है। हमारे यहां समय समय पर ऐसे महापुरुष भी इस धरती पर प्रकट होते हैं जो भले ही किसी धर्म या समुदाय के हों पर उनको सारा देश बाद में देवत्व का दर्जा प्रदान करता है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Thursday 3 November 2011

यजुर्वेद से संदेश-अज्ञानी लोग ज्ञान अधिक बघारते हैं (yajurved se sandesh-agyani log gayn gagharte hain)

         हमारे देश का अध्यात्म ज्ञान अनेक ग्रंथों में वर्णित है। इन ग्रंथों में सकाम तथा निष्काम दोनों प्रकार की भक्ति के सिद्धांतों का प्रतिपादन किया गया है। कर्म और फल के नियमों का उल्लेख किया गया है। यह अंतिम सत्य है कि हर मनुष्य को अपने ही कर्म का फल स्वयं भोगना पड़ता है। कोई व्यक्ति भी किसी की नियति और फल को बदल नहीं सकता। यह अलग बात है कि समस्त ग्रंथों का अध्ययन करने के बावजूद अनेक लोग उसका ज्ञान धारण नहंी कर पाते पर सुनाने में सभी माहिर हैं।
        हमारे देश का तत्वज्ञान प्रकृत्ति और जीवन के मूल सिद्धांतों पर आधारित एक विज्ञान है। इस संबंध में हमारे अनेक प्राचीन ग्रंथ पठनीय है। यह अलग बात है कि उनका रटा लगाने वाले अनेक लोग अपने आपको महान संत कहलाते हुए मायापति बन जाते हैं। उनके आश्रम घास फूस के होने की बजाय पत्थर और सीमेंट से बने होते हैं। उसमें फाइव स्टार होटलों जैसी सुविधायें होती हैं। गुरु लोग एक तरह से अपने महल में महाराज की तरह विराजमान होते हैं और भक्तों की दरबार को सत्संग कहते हैं। तत्वज्ञान का रट्टा लगाना उसे दूसरों को सुनाना एक अलग विषय है और उसे धारण करना एक अलग पक्रिया है।
               इस विषय पर यजुर्वेद में कहा गया है कि
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            नीहारेण प्रवृत्त जल्प्या चासुतृप उम्थ्शासरचरन्ति
‘‘जिन पर अज्ञान की छाया है जो केवल बातें बनाने के साथ ही अपनी देह की रक्षा के लिये तत्पर हैं वह तत्वज्ञान का प्रवचन बकवाद की तरह करते हैं।’’
        तत्वज्ञानी वह नहीं है जो दूसरे को सुनाता है बल्कि वह है जो उसे धारण करता है। किसी ने तत्वज्ञान धारण किया है या नहीं यह उसके आचरण, विचार तथा व्यवहार से पता चल जाता है। जो कभी प्रमाद नहीं करते, जो कभी किसी की बात पर उत्तेजित नहीं होते और सबसे बड़ी बात हमेशा ही दूसरे के काम के लिये तत्पर रहते हैं वही तत्वाज्ञानी हैं। सार्वजनिक कार्य के लिये वह बिना आमंत्रण के पहुंच कहीं भी मान सम्मान की परवाह किये बिना पहंच जाते हैं और अगर कहीं स्वयं कोई अभियान प्रारंभ करना है तो बिना किसी शोरशराबे के प्रारंभ कर देते हैं। लोग उनके सत्कर्म से प्रभावित होकर स्वयं ही उनके अनुयायी हो जाते हैं।
        इसके विपरीत अज्ञानी और स्वार्थी लोग तत्वज्ञान बघारते हैं पर उसे धारण करना तो दूर ऐसा सोचते भी नहीं है। किसी तरह अपने प्रवचन करते हुए आम लोगों को भ्रम में रखते हैं। वह उन कर्मकांडों को प्रोत्साहित करते हैं जो सकाम भक्ति का प्रमाण माने जाने के साथ ही फलहीन माने जाते हैं। अतः जिन लोगों को अध्यात्म में रुचि है उनको अज्ञानी और अज्ञानी की पहचान उस समय अवश्य करना चाहिए जब वह किसी को अपना गुरु बनाते हैं।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
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