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Wednesday, June 29, 2011

भर्तृहरि नीति शतक-तृष्णा की नदी में आदमी जीवन भर भटकता रहता है(hindu dharmik vichar,trishna ki nadi mein aadmi ka jivan)

         मनुष्य मन में आशायें पालता है और उनकी पूर्ति करना ही उसका लक्ष्य रह जाता हैं पूरा जीवन इसमें वह व्यय करता है पर कभी संतुष्ट नहीं रह पाता। एक आशा पूरी होती है तो दूसरी मन में प्रज्जवलित हो जाती है। इस तरह मनुष्य निरंतर भागता रहता है। उसे यही नहीं पता रहता कि सुख क्या है और उसकी अनुभूति कैसे होती है।
            महाराज भर्तृहरि कहते हैं
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         आशा नाम नदी मनोरथजला तृष्णातरङगाकुला
           रामग्राहवती वितर्कविहगा धैर्यद्रुमध्वंसिनी
            मोहावर्तसुदुस्तराऽतिगहना प्रोत्तुङगचिन्तातटी
             तस्याः पारगता विशुद्धमनसो नन्दन्ति योगश्वराः
            "आशा एक नदी की भांति इसमे हमारी कामनाओं के रूप में जल भरा रहता है और तृष्णा रूपी लहरें ऊपर उठतीं है। यह नदी राग और अनुराग जैसे भयावह मगरमच्छों से भरी हुई हैं। तर्क वितर्क रूपी पंछी इस पर डेरा डाले रहते हैं। इसकी एक ही लहर मनुष्य के धैर्य रूपी वृक्ष को उखाड़ फैंकती है। मोह माया व्यक्ति को अज्ञान के रसातल में खींच ले जाती हैं, जहा चिंता रूपी चट्टानों से टकराता हैं। इस जीवन रूपी नदी को कोई शुद्ध हृदय वाला योगी तपस्या, साधना और ध्यान से शक्ति अर्जित कर परमात्मा से संपर्क जोड़कर ही सहजता से पार कर पाता है।

      कहते हैं कि ‘उम्मीद पर आसमान टिका है’। यह उम्मीद और आशा यानि क्या? सांसरिक स्वार्थों की पूर्ति होने ही हमारी आशाओं का केंद्र है। भक्ति, सत्संग तथा तत्वज्ञान से दूर भटकता मनुष्य अपना पेट भरते भरते थक जाता है पर वह है कि भरता नहीं। कभी कभी जीभ स्वाद बदलने के लालायित हो जाती है। सच तो यह है कि मन की तृष्णायें ही आशा का निर्माण करती हैं। भारत जो कभी एक शांत और प्राकृतिक रूप से संपन्न क्षेत्र था आज पर्यावरण से प्रदूषित हो गया है। हमेशा यहां आक्रांता आये और साथ में लाये नयी रौशनी की कल्पित आशायें। सिवाय ढोंग के और क्या रहा होगा? कुछ मूर्ख लोग तो कहते हैं कि इन आक्रांताओं ने यहां नयी सभ्यता का निर्माण किया। इस पर हंसा ही जा सकता है। यह नयी सभ्यता कभी अपना पेट नहीं भर पाती। जीभ के स्वाद के लिये अपना धर्म तक छोड़ देती है। रोज नये भौतिक साधनों के उपयोग की तरफ बढ़ चुकी यह सभ्यता जड़ हो चुकी है। आशायें हैं कि पूर्ण नहीं होती। होती है तो दूसरी जन्म लेती है। यह क्रम कभी थमता नहीं।

           इस सभ्यता में हर मनुष्य का सम्मान की बात कही जाती है। यह एक नारा है। योग्यता, चरित्र और वैचारिक स्तर के आधार पर ही मनुष्य को सम्मान की आशा करना चाहिये मगर नयी सभ्यता के प्रतिपादक यहां जातीय और भाषाई भेदों का लाभ उठाकर यहां संघर्ष पैदा कर मायावी दुनियां स्थापित करते रहे। भारतीय अध्यात्म ज्ञान में जहां मान सम्मान से परे रहकर अपनी तृष्णाओं पर नियंत्रण करने के लिये संदेश दिया जाता है। सभी के प्रति समदर्शिता का भाव रखने का आदेश दिया जाता है। वही नयी सभ्यता के प्रतिपादक अगड़ा पिछड़ा का भेद यहां खड़ा करते हुए बतलाते हैं कि जिन तबकों को पहले सम्मान नहीं मिला अब उनकी पीढ़ियों को विशेष सम्मान दिया जाना चाहिए। कथित पिछड़े तबकों को विशेष सम्मान की तृष्णा जगाकर वह दावा करते हैं कि हम यहां समाज में बदलाव ला रहे हैं। कितने आश्चर्य की बात है कि जिन जातियों में अनेक महापुरुष और वीर योद्धा पैदा हुए उनको ही पिछड़ा बताकर सामाजिक वैमनस्य पैदा केवल इसी ‘विशेष सम्मान’ की आड़ में पैदा किया गया है। आज हालत यह है कि पहले से अधिक जातिपाति का फैल गया है।
            विकास, सम्मान और आर्थिक समृद्धि की आशाऐं जगाकर भारतीय अध्यात्म ज्ञान को ढंकने का प्रयास किया गया। ऐसी आशायें जो कभी पूरी नहीं होती और अगर हो भी जायें तो उनसे किसी मनुष्य को तत्वज्ञान नहीं मिलता जिसके परिणाम स्वरूप समाज में आज रोगों का प्रकोप और तनाव का वातावरण बन गया है।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Sunday, March 6, 2011

कबीर के दोहे-साधुओं के निंदक की कभी मुक्ति नही होती (Kabir ke dohe-sadhu ke nindak ki mukti nahin)

          जिस तरह समाज में सभी तरह के लोग हैं उसी तरह साधु और संतों के बीच भी हैं। कुछ लोग तो साधु और संत का चोला इसलिये पहनते हैं जिससे उनको धन, सम्मान तथा शिष्यों की प्राप्ति होती रहे। एक तरह से धर्म उनका व्यापार हो जाता है। आजकल तो ऐसी खबरें भी आती हैं कि अमुक साधु संत दैहिक यौनाचार या अपराध करते हुए पकड़ा गया। हमारे समाज में अध्यात्मिक की जड़ें गहरी हैं जिसकी वजह से ऐसे लोग जिनको काम नहीं आता या वह करना नहीं चाहते वही साधु का वेश पहनते हैं। गेहुंआ या सफेद रंग का चोगा पहने अनेक साधुओं ने समाज को धोखा दिया है कई तो यौनाचार और बच्चों के अपहरण जैसे अपराध में लिप्त पाये गये हैं। इसका आशय यह कतई नहीं है कि सारे साधु या संत ऐसे हैं। कुछ लोग ऐसे भी संतों की आलोचना करते हैं जो शिष्यों का समुदाय बनाकर प्रवचन देते हैं। अनेक बुद्धिजीवियों को तो संतों पर कटाक्ष करने में मजा आता है। हमारा अध्यात्मिक दर्शन संतों या साधुओं को मानने या न मानने की पूरी छूट देता है मगर उनकी निंदा करने वालों को बुरी तरह फटकारता भी है।
          इस विषय पर कबीर कहते हैं कि
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        जो कोय निन्दै साधु को, संकट आवै सोय।
          नरक जाय जनमै भरे, मुक्ति कबहु नहिं होय।।
      ‘जो आदमी साधु और संतों की निंदा करता है वह अतिशीघ्र नष्ट हो जाता हे। वह नरक में जाता है और फिर उसे नारकीय यौनि में जन्म लेना पड़ता है। उसकी कभी मुक्ति नहीं होती।’’
            दरअसल हमारी वर्तमान शिक्षा पद्धति ऐसी है जिसमें नकारात्मक सोच का निर्माण होता है। दूसरे की निंदा या आलोचना करने वाले इस तरह प्रदर्शन करते हैं जैसे कि वह श्रेष्ठ हैं। हर कोई दूसरे के दोष गिनाकर यह प्रमाणित करता है कि वह उसमें नहीं है। अपने अंदर जो गुण है उसकी जानकारी कोई नहीं देता। फिर निंदा और आलोचना में अभ्यस्त लोगों के पास इतना समय भी कहां रहता है कि वह आत्ममंथन कर अपने गुणों की तलाश करें। ऐसे लोग न स्वयं सुखी रहते हैं न दूसरे को देख पाते हैं। अतः जिन लोगों को अपने अंदर सकारात्मक भाव बनाये रखना है वह किसी दूसरे की निंदा या आलोचना न करें, खासतौर से साधु और संतों की तो बिल्कुल नहीं। अगर कोई साधु ठीक नहीं लगता तो उसके पास न जायें। उसको अपना गुरु न माने पर सार्वजनिक रूप उसे उसकी निंदा न करे। वैसे भी हमारा भारतीय अध्यात्म दर्शन निरंकार की निष्काम भक्ति का संदेश देता है। परनिंदा से बचने पर मन में सकारात्मक विचार पैदा होते हैं उससे जीवन में स्वमेव प्रसन्नता आती है।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Saturday, September 4, 2010

विदुर नीति-अधिक विश्वास किसी पर न करें (adhik vishvas na karen-vidur neeti in hindi)

अनीर्षुर्गुप्तदारश्च संविभागी पियंवदः।
श्लक्ष्णो मधुरपाक् स्वीणां न चासां वशगो भवेत्।।
हिन्दी में भावार्थ-
मनुष्य ईर्ष्या रहित, स्त्रियों की रक्षा करने वाला, संपत्ति का न्यायपूर्वक बांटने वाला, प्रिय वाणी बोलने वाला, साफ सुथरा तथा स्त्रियों से सद्व्यवहार करने वाला हो परंतु किसी के वश में न हो।
न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते नातिविश्वसेत्।
विश्वासाद भयमुत्पन्नं मूलान्यपि निकृन्तति।
हिन्दी में भावार्थ-
जिस मनुष्य का विश्वास प्रमाणिक न हो उस पर तो विश्वास करना ही नहंी चाहिए पर जिस पर जो योग्य हो उस भी अधिक विश्वास न करें। विश्वास से जो भय उत्पन्न होता है वह मूल लक्ष्य को ही नष्ट कर डालता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जहां तक हो सके मनुष्य को अपने विवेक से काम लेना चाहिये। सुनना सभी की चाहिए पर करना तो मन की ही ठीक रहता है।। अनेक लोग दूसरों के कहने में आकर अपनी हानि कर डालते हैं। हर कोई अपनी शक्ति और लक्ष्यों के बारे में अधिक केवल स्वयं ही जान सकता है। दूसरा उसे राय दे सकता है पर इसका अर्थ कदापि नहीं कि उसे मान लिया जाये। दूसरे की बात पर विचार करना चाहिये पर निर्णय लेते समय अपने विवेक का उपयोग करना ही अच्छा है।
इस संसार में बिना विश्वास किये काम नहीं चल सकता पर उसकी सीमायें हैं। हम अनेक बाद अपने मन की बात दूसरे से यह प्रमाण पत्र लेने के बाद उसे बता देते हैं कि वह किसी से कहेगा नहीं पर उस समय यह सोचना चाहिए कि जब हम अपनी बात स्वयं मन में नहीं रख सके तब दूसरा कैसे रखेगा? अतः विश्वास एक सीमा तक ही करना चाहिये।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,Gwalior
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Saturday, August 21, 2010

उजड़े जंगल में फूल खिलने से क्या लाभ-संत कबीर संदेश (ujade jungle men fool khilne se labh nahin-sandesh kabir sandesh)

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि तो हाथी पर चढ़कर अपने ऊपर चंवर डुलवाते हैं और लोग समझते हैं कि वह सुख भोग रहे तो यह उनका भ्रम है वह तो अपने अभिमान के कारण सीधे नरक में जाते हैं।
हाथी चढि के जो फिरै, ऊपर चंवर ढुराय
लोग कहैं सुख भोगवे, सीधे दोजख जाय
बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जोरे बड़ मति नांहि
जैसे फूल उजाड़ को, मिथ्या हो झड़ जांहि
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि आदमी धन, पद और सम्मान पाकर बड़ा हुआ तो भी क्या अगर उसके पास अपनी मति नहीं है। वह ऐसे ही है जैसे बियावन उजड़े जंगल में फूल खिल कर बिना किसी के काम आये मुरझा जाता है।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-समय ने ऐसी करवट ली है कि इस समय धर्म और जनकल्याण के नाम पर भी व्यवसाय हो गया है। इस मायावी दुनियां में यह पता ही नहीं लगता कि सत्य और माया है क्या? जिसे देखो भौतिकता की तरफ भाग रहा है। क्या साधु और क्या भक्त सब दिखावे की भक्ति में लगे हैं। राजा तो क्या संत भी अपने ऊपर चंवर डुलवाते हैं। उनको देखकर लोग वाह-वाह करते हैं। सोचते हैं हां, राजा और संत को इस तरह रहना चाहिये। सत्य तो यह है कि इस तरह तो वह भी लोग भी भ्रम में हो जाते हैं और उनमें अहंकार आ जाता है और दिखावे के लिये सभी धर्म करते हैं और फिर अपनी मायावी दुनियां में अपना रंग भी दिखाते हैं। ऐसे लोग पुण्य नहीं पाप में लिप्त है और उन्हें भगवान भक्ति से मिलने वाला सुख नहीं मिलता और वह अपने किये का दंड भोगते हैं।
यह शाश्वत सत्य है कि भक्ति का आनंद त्याग में है और मोह अनेक पापों को जन्म देता है। सच्ची भक्ति तो एकांत में होती है न कि ढोल नगाड़े बजाकर उसका प्रचार किया जाता है। हम जिन्हें बड़ा व्यक्ति या भक्त कहते हैं उनके पास अपना ज्ञान और बुद्धि कैसी है यह नहीं देखते। बड़ा आदमी वही है जो अपनी संपत्ति से वास्तव में छोटे लोगों का भला करता है न कि उसका दिखावा। आपने देखा होगा कि कई बड़े लोग अनेक कार्यक्रम गरीबों की भलाई के लिये करते हैं और फिर उसकी आय किन्हीं कल्याण संस्थाओं को देते हैं। यह सिर्फ नाटकबाजी है। वह लोग अपने को बड़ा आदमी सबित करने के लिये ही ऐसा करते हैं उनका और कोई इसके पीछे जनकल्याण करने का भाव नहीं होता।
कभी कभी तो लगता है कि जनकल्याण का नारा देने वाले लोग बड़े पद पर प्रतिष्ठत हो गये हैं पर लगता नहीं कि उनके पास अपनी मति है क्योंकि वह दूसरों की राय लेकर काम करने आदी हो गये हैं। ऐसे लोगों के लिये कल्याण तो बस दिखावा है वह तो उसके नाम पर सुख तथा एश्वर्य प्राप्त करने में ही अपने को धन्य समझते हैं। ऐसे कथित धर्म के सौदागर बहुत दिखाई देते हैं जिनका न तो स्वयं का ज्ञान प्रमाणिक होता है और न ही वह ही वह लोभ और लालच की प्रवृत्ति से परे रहते हैं। उनकी शरण लेने से मनुष्य का न तो उद्धार होता है और न मन का संताप दूर होता है।
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Sunday, May 30, 2010

विदुर नीति-दुष्टों को अनदेखा करने से जनता नाराज होती है

साहसे वर्तमानं तु यो मर्षयति पार्थिवः।
सः विनाशं व्रजत्याशु विद्वेषं चाधिगच्छति।।
हिन्दी में भावार्थ-
यदि राज्य प्रमुख  दुस्साहस करने वाले व्यक्ति को क्षमा या उसे अनदेखा करता है तो उसका अतिशीघ्र विनाश हो जाता है क्योंकि तब प्रजा में उसके विद्वेष की भावना पैदा होती है।


न मित्रकारणाद्राजा विपुलाद्वाधनागमात्।
समुत्सुजोत्साहसिकान्सर्वभुतभयावहान्।।
हिन्दी में भावार्थ-
राज्य प्रमुख को चाहिये कि वह स्नेह या लालच मिलने पर भी प्रजा में भय उत्पन्न करने वाले अपराधियों को क्षमा न करे। 


वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-क्षमा जीवन का मूलमंत्र है पर एक परिवार, समाज और राज्य के मुखिया को कहीं न कहीं अपने आश्रितों को बचाने के लिये दंड का उपयोग करना ही पड़ता है।  अगर वह इस दंड का उपयोग नहीं करेगा तो उसके आश्रित या प्रजाजन उसे कायर मानकर घृणा करने लगते हैं।  कहा जाता है कि योगियों को क्षमाक्षील होना चाहिये पर हमारी प्राचीन कथायें इस बात का प्रमाण हैं कि समय आने पर वही कोमल भाव वाले योगी अपने भक्तों और शिष्यों के लिये उग्र रूप धारण करते हुए अपराधियों को दंडित करते हैं। 
जिस परिवार, समाज या राज्य का मुखिया  अपराधियों और हिंसक तत्वों को क्षमा करता है या उनकी अनदेखी में भलाई समझता है वह शीघ्र नष्ट हो जाता है। उसके समूह या राज्य के विरोधी उसके आश्रित या प्रजा को लक्ष्य नहीं करते बल्कि उनका लक्ष्य मुखिया ही होता है।  फिर उसके विरोधी आंतरिक विरोधियों को सबसे पहले मैदान में उतारते हैं इसलिये समझदार मुखिया को चाहिये कि वह अंतर्विरोधियों का समूल नाश करे।
ऐसे आंतरिक शत्रु जो प्रजा में भय करते हुए विचरते हैं उनकी अनदेखी करना खतरे से खाली नहीं है।  जिस परिवार, समाज, या राज्य का प्रमुख अपने आंतरिक खतरों की अनदेखी करता है वह कायर मान लिया जाता है और उसके आश्रित प्रजाजन ही उसका सम्मान नहीं करते। अहिंसा का सिद्धात केवल अपने निजी जीवन में लागू किया जा सकता है पर जहां सार्वजनिक विषय हो वहां दंड का उपयोग करना चाहिये अन्यथा परिवार, समाज तथा राज्य में असंतोष का परिणाम मुखिया को भोगना पड़ता है। राज्य या परिवार में उत्पाती तत्वों से सख्ती से निपटना ही एक सर्वश्रेष्ठ उपाय है। 

 

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Monday, May 10, 2010

संत कबीर के दोहे-कपटी कभी साधु नहीं बनते (kapti kabhi sadhu nahin hote-kabir ke dohe)

चाल बकुल की चलत हैं, बहुरि कहावैं हंस
ते मुक्ता कैसे चुंगे, पडे काल के फंस
संत शिरोमणि कबीरदास जीं कहते हैं कि जो लोग चाल तो बगुले की चलते हैं और अपने आपको हंस कहलाते हैं, भला ज्ञान के मोती कैसे चुन सकते हैं? वह तो काल के फंदे में ही फंसे रह जायेंगे। जो छल-कपट में लगे रहते हैं और जिनका खान-पान और रहन-सहन सात्विक नहीं है वह भला साधू रूपी हंस कैसे हो सकते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संसार में कुछ लोग अपनी बौद्धिक चालाकियों से दौलत, शौहरत और ऊंचे ओहदे का लक्ष्य प्राप्त करते हैं। ऐसे लोग तमाम तरह की किताबें पढ़कर उसमें लिखी बातें रट लेते हैं। उसके बाद सामान्य लोगों में उनका बखान करते हैं गोया कि कोई बहुत बड़े ज्ञानी हों पर सच तो यह है कि ऐसे लालची, लोभी तथा ढोंगी लोगा सम्मान लायक नहीं होते। मगर आज यह स्थिति है कि आधुनिक शिक्षा से गुलामी की मानसिकता प्राप्त कर चुका समाज अपने अध्यात्मिक ज्ञान के बारे में जानता नहीं है और वह ऐसे कथित ज्ञानियों के जाल में फंस जाता है। भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान अध्ययन, पठन तथा श्रवण में अत्यंत मधुर है पर पाश्चात्य जीवन शैली में लिप्त समाज के पास इतना समय नहीं है कि वह अपने पुराने ग्रंथों का अध्ययन करे जिसमें ज्ञान और विज्ञान का भारी खजाना भरा हुआ है। अतः सामान्य लोग कथित ज्ञानियों के मुख से श्रवण कर ही अपना काम चलाते हैं। कथित ज्ञानी केवल मधुर वाणी में उस ज्ञान का बखान करते हैं पर न तो उसका मर्म जानते हैं न उसे धारण करते हैं। समय आने पर उनकी पोल खुलती है पर फिर भी ढोंगियों का रथ नहीं रुकता। ऐसे लोग चाहे कितना भी प्रयास करें पर समाज में वह अधिक समय तक सम्मान प्राप्त नहंी करते। अगर करते भी हैं तो उनके बाद कोई याद यहां नहीं रह जाती।
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Sunday, May 9, 2010

रहीम के दोहे-सीधी चाल से ही किसी का दिल जीता जा सकता (sidhi chal se dil jeeten-rahim ke dohe)

प्रेम पंथ ऐसी कठिन, सब कोउ निबहत नाहिं
रहिमन मैन-तुरगि बढि, चलियो पावक माहिं
कविवर रहीम कहते हैं कि प्रेम का मार्ग ऐसा दुर्गम हे कि सब लोग इस पर नहीं चल सकते। इसमें वासना के घोड़े पर सवाल होकर आग के बीच से गुजरना होता है।
फरजी सह न ह्म सकै गति टेढ़ी तासीर
रहिमन सीधे चालसौं, प्यादा होत वजीर
कविवर रहीम कहते हैं कि प्रेम में कभी भी टेढ़ी चाल नहीं चली जाती। जिस तरह शतरंज के खेल में पैदल सीधी चलकर वजीर बन जाता है वैसे ही अगर किसी व्यक्ति से सीधा और सरल व्यवहार किया जाये तो उसका दिल जीता जा सकता है।
आज के संदर्भ में व्याख्या-आजकल जिस तरह सब जगह प्रेम का गुणगान होता है वह केवल बाजार की ही देन है जो युवक-युवतियों को आकर्षित करने तक ही केंद्रित है। उसे प्रेम में केवल वासना है और कुछ नहीं है। सच्चा प्रेम किसी से कुछ मांगता नहीं है बल्कि उसमें त्याग किया जाता है। सच्चे प्रेम पर चलना हर किसी के बस की बात नहीं है। प्रेम में कुछ पाने का आकर्षण होतो वह प्रेम कहां रह जाता है। सच तो यह है कि लोग प्रेम का दिखावा करते हैं पर उनके मन में लालच और लोभ भरा रहता है। लोग दूसरे का प्यार पाने के लिये चालाकियां करते हैं जो कि एक धोखा होता है।
आजकल हम देख रहे हैं कि प्रेम के नाम पर अनेक लोग धोखे का शिकार हो रहे हैं। दरअसल फिल्म और टीवी चैनलों पर आज के युवक और युवतियों की यौन भावनाओं को भड़काया जा रहा है। अनेक ऐसी बेसिर पैर की कहानियां दिखाई जाती हैं जिनका यथार्थ के धरातल पर कोई आधार नहीं मिलता। केवल शादी तक तक ही लिखी गयी कहानियां गृहस्थी के यथार्थो का विस्तार नहीं दिखाती। इनको देखकर युवक युवतियां प्यार की कल्पना तो करते हैं पर उसके बाद का सच उनके सामने तभी आता है जब वह गल्तियां कर चुके होते हैं।
इतना ही नहीं कई प्रेम कहानियों में तो लड़कों को छल कपट से लड़कियों को अपने प्यार के जाल मेें फंसाते हुए दिखाया जाता है। इन कहानियों के दृश्य देखकर अनेक युवक युवतियां भ्रमित होकर उसी राह पर चलते है। इस तरह के प्रचार को समझने की जरूरत है।
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संकलक, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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Saturday, May 8, 2010

रहीम दर्शन-नदी के तट को पार करने वाला पानी व्यर्थ चला जाता है (rahim ke dohe-nadi aur pani)

जो मरजाद चली सदा, सोई तो ठहराय
जो जल उमगै पारतें, कहे रहीम बहि जाय
कविवर रहीम कहते हैं कि जो सदा से मर्यादा चली आती है, वही स्थिर रहती है। जो पानी नदी के तट को पार करके जाता है वह बेकार हो जाता है।
जो बड़ेन को लघु कहें, नहिं रहीम घटि जाहिं
गिरधर मुरलीधर कहे, कछु दुख मानत नाहिं
कविवर रहीम कहते हैं कि बड़े लोगों को कोई छोटा कहता है तो वह छोटे नहीं हो जाते। भगवान श्री कृष्ण जिन्होंने गिरधर पर्वत उठाया उनको कुछ लोग मुरलीधर भी कहते हैं पर इससे उनकी मर्यादा कम नहीं हो जाती।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-कई लोगों को तब बहुत पीड़ा होती है जब कोई उनको छोटा या महत्वहीन बताता है। सच बात तो यह है कि आजकल हर कोई एक-दूसरे को छोटा बताकर अपना महत्व साबित करना चाहता है। ऐसे में कोई व्यक्ति अगर हमको छोटा कहता है या आलोचना करता है तो उसे सहज भाव से ग्रहण करना चाहिए। अपने मन में यह सोचना चाहिए कि जो हम और हमारा कार्य है वह अपने आप हमारा महत्व साबित कर देगा। भौतिक साधनों की उपलब्धता आदमी को बड़ा नही बनाती और उनका अभाव छोटा नहीं बनाती। आजकल के युग में जिसके पास भौतिक साधनों का भंडार है लोग उसे बड़ा कहते है और जिसके पास नहीं है उसे छोटा कहते है। जबकि वास्तविकता यह है कि जो अपने चरित्र में दृढ़ रहते हुए मर्यादित जीवन व्यतीत करता है वही व्यक्ति बड़ा है। इसलिये अगर हम इस कसौटी पर अपने को खरा अनुभव करते हैं तो फिर लोगों की आलोचना को अनसुना कर देना चाहिए।वैसे भी आजकल लोग आत्मप्रशंसा में ही अपनी प्रसन्नता समझते हैं और दूसरे के गुण देखने का न तो उनके पास समय और न ही इच्छा। इसलिये अच्छा काम करने के बाद यह अपेक्षा तो कतई नहीं करना चाहिये कि स्वार्थी, लालची और अहंकार लोग उसकी प्रशंसा करेंगे। कोई भी परोपकार और परमार्थ का काम अपने दिल की तसल्ली के लिये ही करना श्रेयस्कर है क्योंकि इससे ही हमारी आत्मा प्रसन्न होती है।
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संकलक,लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Saturday, March 13, 2010

पतंजलि योग दर्शन-प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम ये तीन प्रमाण हैं (patanjali yoga darshan-teen prakar ke praman)

प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि।।
हिन्दी में भावार्थ-
प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम ये तीन प्रमाण हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-हमारे जीवन में अनेक बार ऐसे अवसर आते हैं जब किसी कार्य या व्यक्ति को लेकर संशय होता है तथा अनेक बार हम किसी विषय पर विचार करते हुए निर्णायक स्थिति में नहीं पहुंच पाते। दरअसल सोचने का भी एक तरीका होता है। हम अपने कर्म तथा परिणामों में इतना लिप्त होते हैं कि हमें अपने ही द्वारा की जा रही क्रियाओं का ध्यान नहीं रहता। कल्पना करिये हमने किताब अल्मारी से निकालने का प्रयास किया। किताब निकालना एक कर्म है और हम उसे पढ़ना चाहते है यानि कर्ता है। मगर वहां से निकालने का जो प्रयास किया उसे क्रिया कहा जाता है। आप पूछेंगे कि इसमें खास बात क्या है? दरअसल हम जब हाथ अल्मारी की तरफ बढ़ा रहे हैं तो पहले उससे खोलना है, फिर वहां से किताब निकालते हुए इस बात का ध्यान रखना है कि दूसरी किताब वहां से गिर न जाये तथा जो किताब हमने निकली है वह किताब हमारे हाथ से फटे नहीं ताकि उसे हम सुरक्षित अल्मरी में रख सकें। ऐसा तभी हो सकता है जब हमें अपनी क्रियाओं पर ध्यान देने की आदत हो। वरना हम किताब निकालते हुए कहीं दूसरी जगह ध्यान दे रहे हैं तो पता लगा कि किताबा जमीन पर गिर कर फट गयी या फिर दूसरी किताब हाथ में आ गयी। दरअसल यहां बात ध्यान की ही हो रही है जिसका हमारे जीवन में बहुत महत्व है।
जब हम संशयों में होते हैं तब हम निर्णय करने वाले कर्ता है और जिस व्यक्ति या वस्तु पर निर्णय करना है वह एक लक्ष्य है। जब हम किसी वस्तु या व्यक्ति को प्रत्यक्ष देख रहे हैं तो उसके अच्छे या बुरे का निर्णय तुरंत ले सकते हैं। पर यदि कोई वस्तु या व्यक्ति प्रत्यक्ष है पर उसकी क्रिया तथा कर्म की प्रमाणिकता नहीं है तो उस पर अनुमान किया जा सकता है। ऐसे में वस्तु या व्यक्ति का व्यवहार देखकर उसके बारे में निर्णय किया जा सकता है। इसके लिये जरूरी है कि सामने जो प्रत्यक्ष दिख रहा है उसकी क्रियाओं और कर्मों कास विश्लेषण करने के लिये हम अपने ज्ञान चक्षु खोलें और वस्तु या व्यक्ति के व्यवहार को देखकर अनुमान करें। जब हम प्रत्यक्ष कि कियाओं को समझकर निर्णय करते हैं तो वह एक प्रमाण बन जाता है।
उसी तरह कुछ विषयों पर हम निर्णय नहीं ले पाते तो उसके लिये पुस्तकों आदि में पढ़कर निर्णय लेना चाहिये। इसे आगम कहा जाता है। जैसे हम आत्मा को न देख पाते हैं न अनुमान कर पाते हैं तो इसके लिये हमें प्राचीन धर्म ग्रंथों की बातों पर यकीन करना पड़ेगा। इस तरह प्रमाणों की पक्रिया को समझेंगे तो हमें अपने निर्णयों में कठिनाई नहीं आयेगी।
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Sunday, February 7, 2010

संत कबीर वाणी-आग में जलकर भी सोना चमक नहीं खोता (fire and gold-sant kabir vani)

सोने रूप धाह दइ, उत्तम हमारी जात।
वन ही में की घूंघची, तोली हमरे साथ।
।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि सोने  की परख के लिये उसे आग में जलाया जाता है पर फिर भी  अपनी श्रेष्ठता प्रमाणित करते हुए सोना मानो शिकायत करता है कि कहां मेरी तुलना वन में पैदा हुई घुंघची से की?
तोल बराबर घूंघची, मोल बराबर नांहि।
मेरा तेरा पटतरा, दीजै आगी मांहि।।
संत कबीरदास जी कहते हैं कि तोल में घूंघची सोने की बराबरी कर सकती है पर मोल में नहीं।  इनकी असलियत का पता तब चलता है जब आग में जलने पर सोने की श्रेष्ठता प्रमाणित हो जाती है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-आदमी का बाह्य रूप चाहे कितना भी आकर्षक हो पर उसमें बुद्धि और विवेक की शुद्धता नहीं है तो वह किसी काम का नहीं है।  सोना का मूल गुण चमक है और वह उसे अग्नि में जलकर भी बचाये रहता है उसी तरह मनुष्य का मुख्य गुण परोपकार और भक्ति करना है।  कोई मनुष्य चाहे कितने भी अच्छे कपड़े पहनता हो, धनवान हो, उच्च पदारूढ़ हो या बाहूबली, अगर वह समाज के काम का नहीं है तो उससे कुछ सीखने का प्रयास नहीं करना चाहिये क्योंकि अपने लिये उपभोग की सामग्री तो पशु भी जुटा लेते हैं अगर किसी मनुष्य ने दूसरों की अपेक्षा अधिक  समृद्धि जुटा ली तो कौनसा तीर मार लिया?
दूसरी बात हम  यह भी देखें कि हमारी दैनिक समस्याओं के हल में ऐसे लोग ही मदद करते हैं जिनको हम तुच्छ या गरीब कहते हैं। अनेक पूंजीपति  अपने यहां काम करने वाले श्रमिकों या कर्मचारियों को छोटा जरूर समझते हैं पर दैहिक या मानसिक संकट आने पर वही लोग उनके सबसे पहले सहायक बनते हैं।  हमारे देश में लोगों की प्रवृत्ति है कि वह धनवान, उच्च पदारूढ़ तथा बाहूबली लोगों की चाटुकारिता इस आशा से करते हैं कि पता नहीं उनमें कब काम फंस जाये, पर जब विपत्ति काल आता है तो उनको छोटे लोगों से ही सहायता मिलती है।
कहने का अभिप्राय यह है कि हम अपने बाह्य रूप में निखार करने की बजाय अपने अंदर आंतरिक गुणों का विकास करें ताकि समाज में हमारी उत्कृष्ट छबि  का निर्माण हो सके।  इसके अलावा बाह्य रूप देखकर किसी के बारे में अच्छी राय कायम नहीं करना चाहिये जब तक उसके आंतरिक गुणों की पहचान न हो जाये।
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Thursday, December 31, 2009

मनुस्मृतिः अपराध न रोकने वालों के विरुद्ध कड़ी कार्यवाही जरूरी (action against corrupt state officer-hindu dharama sandesh)

 ये नियुक्तासतुकार्येषफ हन्युः कार्याणि कार्विणामम्

धनोष्मणा पञ्चमानांस्तानिन्स्वान्कारवेन्नृपः।।

हिन्दी में भावार्थ-
राज्य द्वारा जो कर्मचारी द्यूत आदि वर्जित पापों को रोकने के नियुक्त किये गये हैं वह पैसे की लालच में ऐसे पापों को नहीं रोकते तो इसका आशय यह है कि वह उसे बढ़ावा दे रहे हैं। इसलिये उनको पद से हटाकर उनका सभी कुछ छीन लेना चाहिये।

कुटशासनकर्तृश्च प्रकृतीनां च दूषकान्।

स्त्रीबालब्राहम्णघ्राश्च हन्यात् द्विट्सेविनस्तथा।

हिन्दी में भावार्थ-
राज्य के प्रतीक चिन्हों की नकल से अपना स्वार्थ निकालने वालों, प्रजा को भ्रष्ट करने में रत, स्त्रियों, बालकों व विद्वानों की हत्या करने वाले और राज्य के शत्रु से संबंध रखने वालों को अतिशीघ्र मार डालना चाहिये।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-आज अगर हम पूरे विश्व की व्यवस्थाओं पर दृष्टिपात करें तो जिन व्यसनों को करने और कराने वालों को पापी कहा जाता है वही अब फैशन बनते जा रहे हैं। लोगों में अज्ञान, मोह तथा लालच तथा काम भावना पैदा करने के लिये खुलेआम चालाकी से विज्ञापन की प्रस्तुति देखकर यह आभास अब बहुत कम लोग करते हैं कि लोगों की मानसिकता को भ्रष्ट करना ही प्रचार माध्यमों का उद्देश्य रह गया है।  सभी जानते हैं कि दुनियां के सभी मशहूर खेलों में सट्टा लगता है और अनेक देशों ने तो उसे वैद्यता भी प्रदान कर दी है।  पर्दे पर खेलने वाले खिलाड़ियों को देखकर लगता ही नहीं है कि वह तयशुदा मैच खेल रहे हैं-यह संभव भी नहीं है क्योंकि हर कोई अपने व्यवसाय में माहिर होता है।  पहले तो क्रिकेट के बारे में भी कहा जाता था पर अब फुटबाल और टेनिस जैसे खेलों पर भी उंगलियां उठने लगी हैं।  समाचार पत्र पत्रिकायें अनेक बार अपने यहां ऐसे समाचार छापते हैं। केवल यही नहीं जुआ खेलने के लिये पश्चिमी देशों में तो बकायदा कैसीनो हैं। अपने देश में भी ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो जुआ खेलने और खिलाने के कर्म मेें जुटे हैं। एक मजे की बात यह है कि उन्हीं खेल प्रतियोगिताओं में अधिक सट्टा या जुआ होता है जिसमें देशों के नाम से टीमें भाग लेती हैं। इससे कुछ लोग तो कथित राष्ट्र प्रेम की वजह से देखते हैं तो दूसरे टीम के हारने या जीतने पर दांव लगाते हैं। सट्टा तो क्लब स्तर की प्रतियोगिताओं पर भी लगता है पर इतना नहीं इसलिये देश का नाम उपयोग करना पेशेवर मनोरंजनकर्ताओं को लाभप्रद लगता है।

इसके अलावा लोगों के अंदर व्यसनों का भाव पैदा करने वाले अन्य अनेक व्यवसायक भी हैं जिनमें लाटरी भी शामिल है। कहने का तात्पर्य यह है कि  लोगों को भ्रमित कर उनको भ्रष्ट करने वालों को कड़ी सजा देना चाहिये।  यह राज्य का कर्तव्य है कि वह हर ऐसे काम को रोके जिससे लोगों में अज्ञान, हिंसा तथा व्यवसन का भाव पैदा करने का काम किया जाता है।

वैसे द्यूत और सट्टे को पाप कहना भी गलत लगता है बल्कि यह तो मनुष्य के लिये एक तरह से दिमागी विष की तरह है।  द्यूत खेलने वालों का सजा क्या देना? वह तो अपने दुश्मन स्वयं ही होते हैं।  समाचार पत्र पत्रिकाओं में ऐसे नित किस्से आते हैं जिसमें जुआ और सट्टे में हारे जुआरी कहीं स्वयं तो कहीं पूरे परिवार को ही मार डालते हैं। राज्य को जुआ खिलाने वालों के विरुद्ध कार्यवाही करना चाहिये पर आम लोग इस बात को समझ लें कि जुआ खेलना तो दूर जुआरी की छाया से स्वयं तथा परिवार के सदस्यों को दूर रखें।
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Saturday, December 26, 2009

भर्तृहरि शतक-ज्ञानियों का उद्देश्य व्यापक होता है (gyaniyon ka uddeshya-hindu dharam sandesh)

सवल्पस्नायुवशेषमलिनं निर्मासमप्यस्थिगोः श्वा लब्ध्वा परितोषमेति न तु तत्तस्य क्षुधाशान्तये।

सिंहो जम्बुकंकमागतमपि त्यकत्वा निहन्ति द्विपं सर्वः कृच्छ्रगतोऽप वांछति जनः सत्तवानुरूपं फलम्।।

हिन्दी में भावार्थ-
जिस तरह कुत्ता थोड़े रस और चरबी वाली हड्डी पाकर प्रसन्न हो जाता है किन्तु सिंह समीप आये भेड़िए को छोड़कर भी हाथी के शिकार की मानता करता है। हाथी का शिकार करने पर ही उसे संतुष्ट प्राप्ति होती है।

यद चेतनोऽपिपादैः स्पृष्टः प्रज्वलित सवितुरिनकान्तः।

तत्तेजस्वी पुरुषः परकृत निकृतिं कथं सहते?।।

हिन्दी में भावार्थ-
जैसे सूर्य की किरणों से जड़ सूर्यकांतमणि जल जाती वैसे ही चेतन और जागरुक पुरुष भी दूसरे लोगों के अपमान को सहन न कर उसका प्रतिकार करते हैं।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हर व्यक्ति अपनी क्षमता और बुद्धि के अनुसार अपने लक्ष्य तय करता है। जिन लोगों की  अध्यात्मिक ज्ञान में रुचि नहीं होती वह केवल धन और माया के फेर में ही अपना जीवन व्यतीत करते हैं। दान, धर्म परोपकार तथा सभी जीवों के प्रति उदारता के भाव का उनमें अभाव होता है। उनका एक ही छोटा लक्ष्य होता है अधिक से अधिक धन कमाना।  इसके विपरीत जो ज्ञानी और बुद्धिमान पुरुष होते हैं वह सांसरिक कार्य करते हुए न केवल अध्यात्मिक ज्ञान तथा सत्संग से अपने हृदय की शांति का प्रयास करते हैं तथा  साथ ही दान और परोपकार के कार्य कर समाज को भी संतुष्ट करते हैं।  उनका लक्ष्य न केवल धन कमाना बल्कि धर्म कमाना भी आता है।  उनकी रुचि अपने नियमित व्यवसायिक कार्यों के अलावा ज्ञान अर्जित करना भी होती है।  देखा जाये तो धन तो हरेक कोई कमा रहा है। हर कोई खर्च भी करता है पर फिर भी कुछ लोग अपने व्यवहार की वजह से समाज में लोकप्रिय होते हैं और कुछ अपने स्वार्थों के कारण बदनाम हो जाते हैं।

अक्सर वार्तालाप में लोग एक दूसरे को अपमानित करते हैं। यह अच्छी बात नहीं है।  एक बात याद रखें कि कोई व्यक्ति अगर अपमानित होकर चुप हो गया तो यह नहीं समझ लेना चाहिये कि वह डर गया।  हो सकता है कि वह आंतरिक रूप से गुण धारण करता हो और समय आने पर अपना बदला ले।  तेजस्वी पुरुष ज्ञानी होते हैं। अपमानित किये जाने पर समय और हालात देख चुप हो जाते हैं पर समय आने पर अपने विरोधी को चारों खाने चित्त करते हैं।  यह बात भी याद रखने लायक है कि यह प्रक्रिया केवल तत्वज्ञानियों द्वारा ही अपनायी जा सकती है।  अल्पज्ञानी तो थोड़ी थोड़ी बात पर उत्तेजित होकर अपने गुस्से को ही नष्ट करते हैं जबकि ज्ञानी समय आने पर अपने तेज को प्रकट करते हैं।  इसलिये अपने संपर्क में आने वाले व्यक्तियों के गुण अवगुण देखकर व्यवहार करना चाहिए। 

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Saturday, December 19, 2009

विदुर नीति-यज्ञ, अध्ययन, दान और तप तो अहंकारवश भी किये जाते हैं (yagya, dan, tap aur adhyayan-vidur niti)

इन्याध्ययनदानादि तपः सत्यं क्षमा घृणा।

अलोभ इति मार्गोऽयं धर्मस्याष्टविधः समृतः।।

हिन्दी में भावार्थ-
नीति विशारद विदुर का कहना है कि यज्ञ, अध्ययन, दान, तप, सत्य, क्षमा, दया और अलोभ वह गुण है जो धर्म के मार्ग भी हैं।

तत्र पूर्वचतुर्वर्गो दम्भार्थमपि सेव्यते।

उत्तरश्च चतुर्वर्गो नामहात्मसु तिष्ठति।।

हिन्दी में भावार्थ-
इनमें पहले चार का तो अहंकार वश भी पालन किया जाता है जबकि आखिरी चार के मार्ग पर केवल महात्मा लोग ही चल पाते हैं।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-ऐसा नहीं है कि किसी मनुष्य में कोई गुण नहीं होता और न ही कोई बिना भला काम किये रह जाता है।  अलबत्ता उसकी मूल प्रकृत्ति के अनुसार ही उसके पुण्य या भले काम का मूल्यांकन भी होता है।  देखा जाये तो दुनियां के अधिकतर लोग अपने  धर्म के अनुसार यज्ञ, अध्ययन, दान और परमात्मा की भक्ति सभी करते हैं पर इनमें कुछ लोग दिखावे के लिये अहंकार वश करते हैं।  उनके मन में कर्तापन का अहंकार इतना होता है कि उसे देखकर हंसी ही आती है।  हमारे देश के प्रसिद्ध संत रविदास जी ने कहा है कि ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’ जिसका आशय यही है कि अगर हृदय पवित्र है तो वहीं भगवान का वास है।  लोग अपने घरों पर रहते हुए हृदय से परमात्मा का स्मरण नहीं कर पाते जिससे उनके मन में विकार एकत्रित होते हैं।  फिर वही लोग  दिल बहलाने के लिये पर्यटन की दृष्टि से धार्मिक यात्राओं पर जाते हैं यह दिखाने के लिये कि वह धार्मिक प्रवृत्ति के हैं।  फिर वहां से आकर सभी के सामने बधारते हैंे कि ‘मैंने यह किया’, ‘मैंने वह किया’ या ‘मैंने दान किया’-यह उनकी अहंकार की प्रवृत्ति का परिचायक है। इससे यह भी पता चलता है कि उनके मन का विकार तो गया ही नहीं।

इतना ही नहीं कुछ लोग अक्सर यह भी कहते हैं कि ‘हमारे धर्म के अनुसार यह होता है’, या ‘हमारे धर्म के अनुसार ऐसा होना चाहिये’।  इससे भी आगे बढ़कर वह खान पान, रहन सहन तथा चाल चलन को लेकर अपने धार्मिक ग्रंथों के हवाले देते हैं।  उनका यह अध्ययन एक तरह से अहंकार के इर्दगिर्द आकर सिमट जाता है।  सत्संग चर्चा होना चाहिये पर उसमें अपने आपको भक्त या ज्ञानी साबित करना अहंकार का प्रतीक है।  कहने का तात्पर्य यही है कि यज्ञ, अध्ययन, तप और दान करना ही किसी मनुष्य की धार्मिक प्रवृत्ति होने का प्रमाण नहीं है जब तक उसके व्यवहार में वह अपने क्षमावान, दयालु, सत्यनिष्ठ, और लोभरहित नहीं दिखता।  यह चारों गुण ही आदमी के सात्विक होने का प्रतीक हैं।


 

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Friday, December 18, 2009

संत कबीर वाणी-ऐसी जगह न जायें जहां मन दुःखी हो (vahan n jayen-hindu dharam sandesh)

कबीर तहां न जाइये, जहां कपट का हेत।

जानो कली अनार की, तन राता मन सेत।।


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि वहां कभी न जायें जहां कपट का प्रेम मिलता हो। ऐसे कपटी प्रेम को अनार की कली की तरह समझें जो उपरी भाग से लाल परंतु अंदर से सफेद होती है। कपटी लोगों का प्रेम भी ऐसा ही होता है वह बाहर तो लालित्य उड़ेलते हैं पर उनके भीतर शुद्ध रूप से कपट भरा होता है।

कबीर न तहां न जाइये, जहां जु नाना भाव।

लागे ही फल ढहि पड़े, वाजै कोई कुबाव।।

संत शिरोमणि कबीरदास का कहना है कि वह कभी न जायें जहां नाना प्रकार के भाव हों। ऐसे लोगों से संपर्क न कर रखें जिनका कोई एक मत नहीं है। उनके संपर्क से के दुष्प्रभाव से हवा के एक झौंके से ही मन का प्रेम रूपी फल गिर जाता है।

वर्तमान संदर्भ  में संपादकीय व्याख्या-जीवन में प्रसन्न रहने का यह भी एक तरीका है कि उस स्थान पर न जायें जहां आपको प्रसन्नता नहीं मिल जाती। कुछ लोग ऐसे होते हैं जो बाहर से तो बहुत प्रेम से पेश आते हैं जैसे कि उनका दिल साफ है पर व्यवहार में धीरे धीरे उनके स्वार्थ या कटु भाव दिखने लगता है तब मन में एक तरह से व्यग्रता का भाव पैदा होता है।  अनेक लोग अपने घर इसलिये बुलाते हैं ताकि दूसरे को अपमानित कर स्वयं को सम्मानित बनाया जा सके।  वह बुलाते तो बड़े प्यार से हैं पर फिर अपमान करने का मौका नहीं छोड़ते।  ऐसे लोगों के घर जाना व्यर्थ है जो मन को तकलीफ देते हैं वह चाहे कितने भी आत्मीय क्यों न हों? मुख्य बात यह है कि हमें अपने जीवन के दुःख या सुख की तलाश स्वयं करनी है अतः ऐसे ही स्थान पर जायें जहां सुख मिले। जहां जाने पर हृदय में क्लेश पैदा हो वहां नहीं जाना चाहिये।  उसी तरह ऐसे लोगों का साथ ही नहीं करना चाहिये जो एकमत के न हों। ऐसे भ्रमित लोग न स्वयं ही परेशान होते हैं बल्कि साथ वाले को भी तकलीफ देते हैं

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Sunday, December 13, 2009

चाणक्य नीति-ऊंचे स्थान पर बैठने से कोई महान नहीं हो जाता (mahan insan-hindu dharm sandesh)

गुणैरुत्तमतां याति नीच्चैरासनसंस्थिताः।
प्रासादशिखरस्थोऽपि काकः किं गरुडायते।।
हिन्दी में भावार्थ-
ऊंचे स्थान पर बैठने से कोई ऊंचा या महान नहीं हो जाता। गुणवान ही ऊंचा माना जाता। महल की अटारी पर बैठने से कौआ, गरुड़ नहीं कहलाने लगता है।
पर-प्रौक्तगुणो वस्तु निर्गुणोऽपि गुणी भवेत्।
इन्द्रोऽपि लघुतां याति स्वयं प्रख्यापितैर्गृणैः।।
हिन्दी में भावार्थ-
जिसके गुणों की प्रशंसा अन्य लोग भी करें उसका ज्ञान भले ही अल्प हो पर फिर भी उसे गुणवान माना जायेगा। इसके विपरीत जिसे ज्ञान में पूर्णता प्राप्त हो वह अगर स्वयं उनका बखान करे तो गुणहीन माना जायेगा भले ही वह साक्षात देवराज इंद्र ही क्यों न हो।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-आजकल की भौतिक दुनियां में संचार साधन अत्यंत प्रभावशाली हो गये हैं। अखबार, टीवी चैनल, मोबाईल, कंप्यूटर तथा अन्य साधनों से अधिकतर लोग जुड़े हुए हैं। अपनी व्यवसायिक बाध्यताओं के चलते प्रचार प्रबंधकों ने फिल्म, राजनीति, टीवी चैनल, साहित्य, कला, तथा पत्रकारिता में अनेक मिथक स्थापित कर दिये हैं। दुनियां भर में ऐसे मिथक एक दो हजार से अधिक नहीं होंगे। अपने ही देश में भी सौ दो सौ ऐसे अधिक प्रभावशाली नाम और चेहरे नहीं होंगे जो प्रचार माध्यमों में छाये हुए हैं। प्रचार माध्यम उनके चेहरे, नाम और बयान प्रस्तुत कर लोगों को व्यस्त रखते हैं। यह देखकर आजकल के अनेक युवा भ्रमित हो जाते हैं। उनको लगता है कि यह काल्पनिक चरित्र ही जीवन का सत्य है। राजनीति, अर्थतंत्र, प्रशासन, साहित्य, पत्रकारिता, फिल्म तथा कला के शिखर पर स्थापित लोग त्रिगुणमयी माया के गुणों से परे हैं-यह भ्रम पता नहीं कैसे लोगों में हो जाता है। जबकि सच यह है कि यह शिखर ही अपने आप में मायावी हैं इसलिये इन पर बैठे लोगों के सात्विक होने की आशा ही करना बेकार है। बाजार और प्रचार केवल उनके चेहरे, नाम और बयान भुनाने का प्रयास करते हैं। फिल्मों के कल्पित नायक सदी के महानायक और गायक सुर सम्राट कहलाते हैं पर सच यह है कि उनका कोई सामाजिक योगदान नहीं होता।
महान वही है जिसका कृत्य समाज में चेतना, आत्मविश्वास तथा दृढ़ता लाने का काम करता है। इतना ही नहीं उनका बदलाव लंबे समय तक रहता है। कहने का तात्पर्य यही है कि आर्थिक, सामाजिक तथा सामाजिक शिखरों पर विराजमान लोगों को महान समझने की गलती नहीं करना चाहिये। वह भी आम आदमी की तरह होते हैं। जिस तरह आम आदमी अपने परिवार की चिंता करता है वैसे ही वह करते हैं। महान आदमी वह है जो पूरी तरह से समाज की चिंता करते हुए उसे हित के लिये काम करता है।
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Friday, December 11, 2009

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-जिस पर कर्जा न हो उसी को राजकाज में नियुक्त करें (hindu dharm sandesh-rajkaj men karj rahit ko niyukt karen)

अभ्यस्तकम्र्मणस्तज्ज्ञान् शुचीन् सुझानम्मतान्।
कुय्र्यादुद्योगसम्पन्नानध्याक्षान् सर्वकम्र्मसु।।
हिन्दी में भावार्थ-
राज्य प्रमुख को चाहिये कि वह राजकीय कार्य के अभ्यास करने वाले, संबंधित कार्य विशेष का ज्ञान रखने वाले पवित्र तथा ऐसे लोगों को अपने विभागों का प्रमुख नियुक्त करे जिन पर किसी का कर्जा न हो।
जो यद्वस्तु विजानाति तं तत्र विनियोजयेत्।
अशेषविषयप्राप्तविन्द्रियार्थ इवेन्द्रियम्।।
हिन्दी में भावार्थ-
राज्य प्रमुख को चाहिये कि जो व्यक्ति संबंधित विषय का ज्ञाता हो उससे संबंधित विभाग और कार्य में ही उसे नियुक्त करे। जिस तरह समस्त इंद्रियां अपने गुणों में ही बरतती हैं वैसे ही किसी विषय में अनुभवी व्यक्ति ही अपने कार्य का निर्वाह सहजता से कर सकता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-हमारे देश के विश्व में पिछड़े होने का कारण कुप्रबंध है। यह आश्चर्य की बात है कि हम आधुनिक अर्थशास्त्र के नाम पर पश्चिम का ही अर्थशास्त्र पढ़ते हैं जबकि हमारा कौटिल्य का अर्थशास्त्र भी वही बातें कह रहा है जिनको पश्चिमी अर्थशास्त्र अब बता पा रहे हैं। वैसे आधुनिक अर्थशास्त्री कहते हैं कि आर्थिक विशेषज्ञ को सभी विषयों को पढ़ना चाहिये सिवाय धर्मग्रंथों को। हमारे कौटिल्य महाराज को भी हमारे अध्यात्मिक ज्ञान का भाग माना जाता है। चूंकि अध्यात्म को धर्म का हिस्सा मान लिया गया है इसलिये कौटिल्य का अर्थशास्त्र का अध्ययन अधिक लोग नहीं करते।
आज देश में बड़ी बड़ी प्रबंधकीय, औद्योगिक तथा व्यवसायिक संस्थाओं को देखें तो वह अनेक ज्ञानी उच्चाधिकारी लोग काम रहे हैं। शिक्षा विज्ञान में मिली पर लेखा का काम रहे हैं। अनेक लोगों ने विज्ञान में शिक्षा प्राप्त की पर वह प्रबंध के उच्च पदों पर पहुंच गये हैं। अब प्रश्न यह है कि जिनको प्रबंध और लेखा का ज्ञान कभी नहीं रहा वह अपना दायित्व उचित ढंग से कैसे निभा सकते हैं। यही कारण है कि देश की प्रबंधकीय तथा औद्योगिक संस्थाओं में बड़े पदों पर लोग तो पहुंच गये हैं और काम करते भी दिखते हैं पर फिर भी इस देश कह प्रबंधकीय कौशल को लेकर कोई अच्छी छबि विश्व पटल पर नहीं दिखाई देती। सच बात तो यह है कि कार्य और पद योग्यता के आधार पर देना चाहिये पर यहां ऐसी शिक्षा के आधार पर यह सब किया जाता है जिसका फिर कभी जीवन में उपयोग नहीं होता न वह कार्यालयीन और व्यवसायिक निर्देशन के योग्य रहती है। ऐसे में सभी जगह कामकाज के स्तर में गिरावट के साथ ही असहिष्णुता का वातावरण बन गया है। बड़े पद पर बैठा व्यक्ति काम के ज्ञान के अभाव में कुंठा का शिकार हो जाता है और वह अपने मातहत के साथ आक्रामक व्यवहार कर अपने अज्ञान का दोष स्वयं से छिपाता है। वह अपने को ही यह विश्वास दिलाता है कि ‘आखिर वह एक उच्चाधिकारी है, जिसे काम करना नहीं बल्कि करवाना है।’ एक मजे की बात यह है कि कौटिल्य महाराज कहते हैं कि राजकाज में उसी व्यक्ति को नियुक्त करें जिस पर कर्जा न हो पर हम देख रहे हैं कि कम से कम इस व्यवस्था को अब तो कोई नहीं मान रहा। बाकी देश की जो हालात हैं उसे सभी जानते हैं।
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Saturday, December 5, 2009

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-समय पर अग्नि की तरह प्रज्जवलित हो जायें (samay aur aag-economics of kautilya ka arthshastra)

असत्यता निष्ठुरता कृताज्ञता भयं प्रमादोऽलसता विषादिता।

वृथाभिमानों ह्यतिदीर्घसूत्रतातथांनाक्षदिविनाशनंश्रियः।।

हिन्दी में भावार्थ
-
असत्य बोलने, निष्ठुरता बरतने, कृतज्ञता न दिखाने, भय, प्रमाद, आलस्य, विषाद, वृथा प्रयास, अभिमान, अतिदीर्घसूत्रता निरंतर  स्त्री समागम तथा पासे खेल से लक्ष्मी का विनाश होता है।

काले सहिष्णुगिंरिवदसहिश्णुश्चय वह्वित्।।

स्कन्धेनापि वहेच्छत्रन्प्रियाणि समुदाहरन्।।

हिन्दी में भावार्थ-
समय आने पर पर्वत के समान सहनशील और अग्नि के समान असहनशील हो जायें। समय पर मित्र के कंधे पर हाथ रखें तो शत्रु पर भी उसका प्रयोग करें।

वर्तमान समय में संपादकीय व्याख्या-जीवन में उतार चढ़ाव तो आते हैं। इन उतार चढ़ावों तथा अन्य घटनाक्रमों का अच्छा या बुरा परिणाम हमारे कर्म, विचार तथा  संकल्प के अनुसार ही प्राप्त होता है।  झूठ बोलने, क्रूरता का भाव रखने, दूसरे के उपकार का आभार न मानने, आलस्य करने वाले तथा थोड़े कष्ट में ही आर्तनाद करने वाले लोग अपनी लक्ष्मी का विनाश कर डालते हैं।  कुछ लोग तो ऐसे होते हैं जो छोटी छोटी बातों पर भयभीत हो जाते हैं।  अगर आज हम सभी तरफ राक्षसी वृत्तियों का शासन देख रहे हैं तो वह केवल इसलिये कि भले लोग भय के कारण निष्क्रिय हो गये हैं।  समाज अपने ही अध्यात्मिक ज्ञान से विमुख हो गया है। अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति का मोह तथा अभाव का भय उसे आशंकित किये रहता है। यही कारण है कि वह अपने समाज के प्रति एकता नहीं दिखाता या दिखाता है तो केवल तब तक जब शांति है और संकट आने पर हर कोई अपने घर में दुबक जाता है।  इतना ही नहीं दूसरे के उपकार सदाशयता तथा अनुसंधान का कोई आभार ज्ञापित नहीं करता। कृत्घनता चालाकी का प्रमाण मान ली गयी है।

मृत्यु तय है यह सभी जानते हैं पर उसका भय ऐसा है कि लोग मर मर की जीने को तैयार हैं।  नतीजा यह है कि कायरों पर महाकायर राज कर रहे हैं जो शीर्ष पर इसलिये पहुंचते हैं क्योंकि उनको भय रहता है कि अगर वहां नहीं रहे तो कोई भी उनको क्षति पहुंचा सकता है। कहने का तात्पर्य यह है कि अध्यात्मिक ज्ञान के बिना समाज पशुओं का समूह बन गया है।  कब मित्र से निभाना है या कब शत्रु पर प्रहार करना है इसका ज्ञान लोगों को नहीं रहा।  आत्म प्रवंचना करना तथा प्रशंसा पाने के मोह लोगों को चोर बना दिया है। वह दूसरे का धन, अविष्कार तथा विचार चुराकर अपने नाम से प्रस्तुत करते हैं।  कहने को समाज देवताओं को मानता है पर कृत्य दानवों जैसे हो गये हैं। मगर सभी लोग ऐसे नहीं है। यही कारण है कि आज भी यह समाज इतने सारे हमलों और दबावों के बाद जिंदा है। आज भी दानवीर, कर्मवीर तथा धर्मवीर हैं जो निष्काम कर्म में लिप्त रहते हुए निष्प्रयोजन दया करते हैं।



 

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Saturday, November 14, 2009

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-शिक्षित व्यक्ति करता हैं सैंकड़ों शिकार (economics of kautilya ka -educated parson)

अशिक्षितनयः सिंहो हन्तीम केवलं बलात्।
तच्च धीरो नरस्तेषां शतानि जतिमांजयेत्।।
हिंदी में भावार्थ-
सिंह किसी नीति की शिक्षा लिये बना सीधे अपने दैहिक बल से ही आक्रमण करता है जबकि शिक्षित एवं धीर पुरुष अपनी नीति से सैंकड़ों को मारता है।
पश्यदिभ्र्दूरतोऽप्रायान्सूपायप्रतिपत्तिभिः।
भवन्ति हि फलायव विद्वादभ्श्वन्तिताः क्रिया।।
हिन्दी में भावार्थ-
विद्वान तो दूर से विपत्तियों को आता देखकर पहले ही से उसकी प्रतिक्रिया का अनुमान कर लेता है और इसी कारण अपनी क्रिया से उसका सामना करता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-सिंह बुद्धि बल का आश्रय लिये बिना अपने बल पर एक शिकार करता है पर जो मनुष्य ज्ञानी और धीरज वाला है वह एक साथ सैंकड़ों शिकार करता है। महाराज कौटिल्य का यह संदेश आज के संदर्भ में देखें तो पता लगता है कि हमारे देश में लोगों की समझ इसलिये कम है क्योंकि वह अपने अध्यात्मिक साहित्य आधुनिक शिक्षा में पढ़ाया नहीं जाता। अंग्रेज हिंसा से इस देश में राज्य नहीं कर पा रहे थे तब उन्होंने अपने विद्वान मैकाले का यह जिम्मेदारी दी कि वह कोई मार्ग निकालें। उन्होंने ऐसी शिक्षा पद्धति निकाली कि अब तो अंग्रेज ब्रिटेन में हैं पर अंग्रेजियत आज भी राज्य कर रही है। अब तलवारों से लड़कर जीतने का समय गया। अब तो फिल्म, शिक्षा, धारावाहिक, समाचार पत्र, किताबें तथा रेडियो से प्रचार कर भी सैंकड़ों लोगों को गुलाम बनाया जा सकता है। इनमें फिल्म और टीवी तो एक बड़ा हथियार बन गया है। आप फिल्में और टीवी की विषय सामग्रंी देखकर उसका मनन करें तो पता लग जायेगा कि जाति, धर्म, और भाषा के गुप्त ऐजेडे वहीं से लागू किये जा रहे हैं। फिल्म और टीवी वाले तो कहते हैं कि समाज में जो चल रहा है वही दिखा रहे हैं पर सच तो यह है कि उन्होंने अपनी कहानियों में ईमानदार लोगों का परिवार समेत तो हश्र दिखाया वह कहीं नहीं हुआ पर उनकी वजह से समाज डरपोक होता चला गया और आज इसलिये अपराधियों में सार्वजनिक प्रतिरोध का भय नहीं रहा। वजह यह थी कि इन फिल्मों में अपराधियों का पैसा लगता रहा था। फिल्मों के अपराधी पात्र गोलियों से दूसरों को निशाना बनाते थे पर उनको नायक के हाथ से पिटते हुए दिखाया गया। स्पष्टतः संदेश था कि आप अगर नायक नहीं हो तो आतंक या बेईमानी से लड़ना भूल जाओ। इस तरह समाज को डरपोक बना दिया गया और अब तो पूरी तरह से अपराधियों को महिमा मंडन होने लगा है।
अगर आप कभी फिल्म या टीवी धारवाहिकों की पटकथा तथा अन्य सामग्री देखें और उस पर चिंतन करें तो हाल पता लग जायेगा कि उसके पीछे किस तरह के प्रायोजक हैं? यह एक चालाकी है जो धनवान और शिक्षित लोग करते हैं। अंग्रेज लोग हमारे धार्मिक ग्रंथों को खूब पढ़ते रहे होंगे इसलिये उन्होंने एसी शिक्षा पद्धति थोपी कि उनसे यह देश अपनी प्राचीन विरासत से दूर हो जाये। अब क्या हालत है कि जो अंग्रेज जो कहें वही ठीक है। वह अपनी परंपराओं तथा भाषा के कारण आज भी यहां राज्य कर रहे हैं। उनकी दी हुई शिक्षा पद्धति यहां गुलाम पैदा करती है जो अंग्रेजों की सेवा के लिये वहां जाकर उनकी सेवा के लिये तत्पर रहते हैं।
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Tuesday, November 10, 2009

विदुर नीति-दूसरों में दोष देखने वाला कष्ट को प्राप्त होता है (hindi sandesh-doosron me dosh dekhna nahin)

विदुर नीति में कहा गया है कि
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असूय को दन्दशू को निष्ठुरो वैरकृच्छठः।
स कृच्छम् महदाप्नोति न चिरात् पापमाचरन्।।

       हिन्दी में भावार्थ-गुणों में दोष देखने वाला, दूसरे के मर्म को छेदने वाला, निर्दयी, शत्रुता का व्यवहार रखने वाला और शठ मनुष्य शीघ्र ही अपने आचरण के कारण महान कष्ट को प्राप्त होता है।
अनूसयुः कृतप्रज्ञ शोभनान्याचरन् सदा।
न कृच्छ्रम् महदाप्नोति सर्वत्र च विरोचते।।

      हिन्दी में भावार्थ-दोषदृष्टि से रहित शुद्ध मंतव्य वाला सदा अनुष्ठान तथा पवित्र कार्य करते हुए महान सुख के साथ सम्मान भी प्राप्त करता है।
       चाहे कोई कितना भी कहे कि आजकल बुरे काम और गलत मार्ग अपनाये बिना कुछ नहीं मिलता पर यह उसका भ्रम है। जो मार्ग कुऐं की तरफ जाता है और कोई अज्ञानी उस पर चलता चला जायेगा तो वह उसमें गिरेगा ही-वह कोई आकाश में उड़ने का विमान प्राप्त नहीं कर लेगा। यही स्थिति कर्म, व्यवहार और दृष्टि की है।
      दूसरे में दोष देखते रहकर उसकी चर्चा करने रहने से वह दुर्गुण हमारे अंदर भी आ जाता है। हमारे मन में जिस प्रकार का स्मरण होता है वैसे ही दृश्य सामने आते हैं। दूसरे के दोषों का स्मरण करने मात्र से भी वह दोष हमारे अंदर आ जाता है। दूसरे को मर्म भेदने वाली बात कहकर उसे कष्ट देना बहुत बुरा है। किसी के दुःख को उभारने उसके मन में जो कष्ट आता है उसका प्रभाव कहीं न कहीं हम पर भी पड़ता है। इस तरह का नकारत्मक व्यवहार करने वाले लोग न केवल अपने जीवन में विकास से वंचित रहते हैं बल्कि उनको महान कष्ट भी प्राप्त होता है।
जो सदा दूसरों में गुण देखते हुए सभी का सम्मान करते हैं उनको अपने काम में न केवल सफलता मिलती है बल्कि समाज में उनको सम्मान भी प्राप्त होता है।संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,gwalior
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Tuesday, November 3, 2009

चाणक्य नीति-कुछ पुरुषों में भी विवेक नहीं होता (purush aur vivek-chankya niti)

मातृवत् परदारांश्चय परद्रव्याणि लोष्ठवत्।
आत्मवत् सर्वभूतानि यः पश्यति स नरः।।

हिंदी में भावार्थ-दूसरों की पत्नी को माता तथा धन को मिट्टी के ढेले की भांति समझना चाहिये। इस संसार में वह यथार्थ रूप से मनुष्य है जो सारे प्राणियों को अपनी आत्मा की भांति देखने वाला मानता है।
यो मोहन्मन्यते मूढो रक्तेयं मयि कामिनी।
स तस्य वशगो मूढो भूत्वा नृत्येत् क्रीडा-शकुन्तवत्।।

हिंदी में भावार्थ-नीति विशारद चाणक्य के अनुसार कुछ पुरुषों में विवेक नहीं होता और वह सुंदर स्त्री से व्यवहार करते हुए यह भ्रम पाल लेते हैं कि वह वह उस पर मोहित है। वह भ्रमित पुरुष फिर उस स्त्री के लिये ऐसे ही हो जाता है जैसे कि मनोरंजन के लिये पाला गया पक्षी।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हर व्यक्ति को अपने अंदर विवेक धारण करना चाहिये। कुछ लोग स्त्रियों के विषय में अत्यंत भ्रमित होते हैं। उनको लगता है कि कोई स्त्री उनसे अच्छी तरह बात कर रही है तो इसका आशय यह है कि वह उन पर मोहित है-यह उनका केवल एक भ्रम है। स्त्रियों का स्वभाव तथा वाणी कोमल होती है और इसी कारण वह हमेशा मृदभाषा से पुरुषों का मन मोह लेती हैं पर कुछ अज्ञानी और अविवेकी पुरुष यह भ्रम पाल कर अपने आपको ही कष्ट देते हैं कि वह उनके प्रति आकर्षित है।
नीति विशारद चाणक्य ऐसे व्यक्तियों की तरफ संकेत करते हुए कहते हैं कि दूसरे की स्त्री को माता के समान समझना चाहिये। उसी तरह दूसरे के धन को मिट्टी का ढेला समझना चाहिये। वह यह भी कहते हैं कि इस संसार में वही मनुष्य श्रेष्ठ है जो सभी लोगों को देह नहीं बल्कि इस संसार में दृष्टा की तरह उपस्थित आत्मा ही मानता है।

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