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Saturday, May 29, 2010

रहीम सन्देश-पानी के बिना मनुष्य, मोती और अनाज का अभ्युदय नहीं हो सकता

कविवर रहीम कहते हैं कि
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रहिमन पानी राखिये, बिनु पानी सब सून
पानी गए न ऊबरै, मोती, मानुष, चून

 आशय यह है  पानी को बचा कर रखें क्योंकि पानी बिना सब सून। पानी अगर न रहा तो मोती, मनुष्य और अनाज किसी का उद्धार नहीं हो सकता है।
वर्तमान संदर्भ में सम्पादकीय व्याख्या-जिनके पास पानी की अभाव है वह तड़प रहे हैं पर जिनके पास है वह भी फैलाने में लगे हैं। अपनी कारों और मोटर साइकिलों को ऐसे ही रोज नहलाते हैं जैसे कि वह गाय या बैल हों। लोग पानी को ऐसे फैलाये जा रहे हैं जैसे कभी खत्म नहीं होगा। यह आश्चर्य की बात है कि आज कई जगह जल बचाने के लिऐ आंदोलन चल रहे हैं।
जबकि रहीम जी का यह दोहा तो सैंकड़ों बरसों से इस देश में प्रचलित है और लोग इसे अक्सर अपना ज्ञान बघारने के लिये सुनाते हैं। सच बात तो यह है कि ज्ञान सुनना अलग बात है और उसे धारण करना अलग बात है। इस देश में संत हो या आम आदमी सभी लोग ज्ञान और ध्यान की किताबें पढ़-पढ़कर उसका लिखा एक दूसरे को सुनाते हैं पर धारण कोई नहीं करता। अगर धारण करने वाले लोग होते तो आज इस तरह पानी के लिये बेहाल नहीं होते। समस्या यह नहीं है कि जल की कमी है बल्कि बढ़ते शहरीकरण के कारण उसके स्त्रोतों में कमी आयी है पर उपयोगिता की मात्रा बढ़ गयी है। आजकल कूलरों में पानी डालने के अलावा अपने वाहनों को साफ करने पर भी उसका अपव्यय होता है। ऐसे में इतना तो हो ही सकता है कि गर्मियों में लोग पानी फैलाने का काम न करें पर शायद ही कोई यह बात माने।
एक बात ध्यान रखें के पश्चिमी भू वैज्ञानिक मानते हैं कि भारत में भू जल स्तर अन्य देशों से बहुत अच्छा है। इसे भगवान की कृपा ही समझना चाहिए और इसका उपयोग प्रसाद की तरह थोडा करें। आजकल जल बचाना भी एक दान पुण्य का काम समझना चाहिए।
 
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संकलक,लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Friday, May 21, 2010

भर्तृहरि नीति शतर्क-मणि होने के बावजूद विषधर से कोई प्रेम नहीं करता




भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि
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आरंभगुर्वी क्षयिणी क्रमेण लघ्वी पुरा वृद्धिमति च पश्चात्।
दिनस्य पूर्वाद्र्धपराद्र्ध-भिन्ना छायेव मैत्री खलसज्जनानाम्।।
            हिंदी में भावार्थ-जिस तरह दिन की शुरूआत में छाया बढ़ती हुई जाती है और फिर उत्तरार्द्ध  में धीरे-धीरे कम होती जाती है। ठीक उसी तरह सज्जन और दुष्ट की मित्रता होती है।
दुर्जनः परिहर्तवयो विद्ययाऽलङ्कृतोऽपि सन्।
मणिनाः भूषितः सर्पः किमसौ न भयंकर।।
     हिंदी में भावार्थ-कोई दुर्जन व्यक्ति विद्वान भी हो  तो उसका साथ छोड़ देना चाहिए। विषधर में मणि होती है पर इससे उससे उसका भयंकर रूप प्रिय नहीं हो जाता।
            वर्तमान संदर्भ में सम्पादकीय व्याख्या-सज्जन व्यक्तियों से मित्रता धीरे-धीरे बढ़ती है और स्थाई रहती है। सज्जन लोग अपना स्वार्थ न होने के कारण बहुत शीघ्र मित्रता नहीं करते पर जब वह धीरे-धीरे आपका स्वभाव समझने लगते हैं तो फिर स्थाई मित्र हो जाते हैं-उनकी मित्रता ऐसे ही बढ़ती है जैसे पूर्वाद्ध में सूर्य की छाया बढ़ती जाती है। इसके विपरीत दुर्जन लोग अपना स्वार्थ निकालने के लिए बहुत जल्दी मित्रता करते हैं और उसके होते ही उनकी मित्रता वैसे ही कम होने लगती है जैसे उत्तरार्द्ध  में सूर्य का प्रभाव कम होने लगता है। पड़ौस तथा कार्यस्थलों में हमारा संपर्क अनेक ऐसे लोगों से होता है जिनके प्रति हमारे हृदय में क्षणिक आत्मीय भाव पैदा हो जाता है। वह भी हमसे बहुत स्नेह करते हैं पर यह यह संपर्क नियमित संपर्क के कारण मौजूद हैं।  उन कारणों के परे होते ही-जैसे पड़ौस छोड़ गये या कार्य का स्थान बदल दिया तो-उनसे मानसिक रूप से दूरी पैदा हो जाती है।  इस तरह यह बदलने वाली मित्रता वास्तव में सत्य नहीं होती। मित्र तो वह है जो दैहिक रूप से दूर होते भी हमें स्मरण करता है और हम भी उसे नहीं भूलते। इतना ही नहीं समय पड़ने पर उनसे सहारे का आसरा मिलने की संभावना रहती है।  अतः स्थितियों का आंकलन कर ही किसी को मित्र मानकर उससे आशा करना चाहिये।जहां तक हो सके दुष्ट और स्वार्थी लोगों से मित्रता नहीं करना चाहिये जो कि कालांतर में घातक होती है।
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Thursday, May 20, 2010

संत कबीर दास के दोहे-प्रेम की फसल किसी खेत में नहीं होती (sant kabir das ke dohe-khet men prem nahin ugta)

यह तो घर है प्रेम का, ऊंचा अधिक इकंत
शीश काटि पग तर धरै, तब पैठ कोई संत
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि प्रेम का घर तो ऊंचे स्थान और एकांत में स्थित होता है जब कोई इसमें त्याग की भावना रखता है तभी वहां तक कोई पहुंच सकता है। ऐसा तो कोई संत ही हो सकता है।
प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट विकाय
राजा परजा जो रुचे, शीश देय ले जाय
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि किसी खेत में प्रेम की फसल नहीं होती न किसी बाजार में यह मिलता है। जिसे प्रेम पाना है उसे अपने अंदर त्याग की भावना रखनी चाहिए और इसमें प्राणोत्सर्ग करने को भी तैयार रहना चाहिए।
वर्तमान संदर्भ में सम्पादकीय व्याख्या-लोग कहते हैं कि ‘अमुक से प्रेम करते हैं’ या ‘अमुक हमसे प्रेम करता है’। यह वास्तव में बहुत बड़ा भ्रम हैं। सच देखा जाये तो अपने जिनके साथ हमारे स्वार्थों के संबंध हैं उनसे हमारा प्रेम तो केवल दिखावा है। प्रेम न तो किसी को दिखाने की चीज है न बताने की। वह तो एकांत में अनुभव करने वाली चीज है। ध्यान लगाकर उस परमपिता परमात्मा का स्मरण करें तब इस बात का आभास होगा कि वास्तव में उसने प्रेम के वशीभूत होकर ही यह हमें मानव जीवन दिया है। उसका हमारे प्रति निष्काम प्रेमभाव है जो हमारे जीवन का रास्ता सहज बनाये देता है। जब हम इसी निष्काम भाव से उसका स्मरण करेंगे तब पता लगेगा कि वास्तव में प्रेम क्या है? जो लोग एक दूसरे के प्रति प्रेमभाव का दिखावा करते हैं व न केवल स्वयं भ्रमित होते है बल्कि दूसरे को भी भ्रमित करते हैं। सच बात तो यह है कि आजकल समाज में जिस प्रेम की चर्चा की जाती है वह केवल मनुष्य की वासनाओं से उपजा एक क्षणिक भाव है। सच्चा प्रेम तो निरंकार परमात्मा को किया जा सकता है।  परमात्मा प्रेम का सच्चा रूप है। जो इंसान परमात्मा से प्रेम करते हुए उसकी भक्ति करता है वही सभी से प्रेंम कर सकता है।  जो केवल मनुष्य से प्रेम करते हैं वह संकीर्णता से घिर जाते हैं और उनका लक्ष्य केवल अपना स्वार्थ तथा कामना की पूर्ति करना होता है।
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Sunday, May 16, 2010

मनु स्मृति-दिल में बैठे देवता की अनदेखी न करें (dil ka devata-hindu dharma sandesh)

साक्ष्येऽनृतं वदन्याशैर्बध्यते वारुणैर्भृशम्।
विवशः शमाजातीस्तरस्मात्साक्ष्यं वदेदृतम्।।
हिन्दी में भावार्थ-
झूठी गवाही देने वाले मनुष्य, वरुण देवता के पाशों से बंधकर सैंकड़ों वर्षों तक जलोदर बीमारियों से ग्रसित जीवन गुजारता है। अतः हमेशा किसी के पक्ष में सच्ची गवाही ही देना चाहिये।
द्यौर्भूमिरापो हृदयं चंद्रर्काग्नि यमानिलाः।
रात्रिः सन्ध्ये च धर्मख्च वृत्तजाः सर्वदेहिनाम्।।
हिन्दी में भावार्थ-
मनु महाराज के अनुसार आकाश, पृथ्वी, पानी, हृदय, चंद्र, सूर्य, अग्नि, यम, वायु, रात संध्या और धर्म सभी प्राणियों के सत् असत् कर्मों को देखते हैं। इनको देवता ही समझना चाहिये।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-क्या हम सोचते हैं कि हम कोई भी काम कर रहे हैं तो दूसरा कोई उसे नहीं देख रहा? ऐसी गलती कभी न पालें। इस धरा पर ऐसे कई जीव विचरण कर रहे हैं जिनको हम नहीं देख पाते पर वह हमें देख रहे हैं। दूसरों की छोड़िये अपने अंदर के हृदय को ही कहां देख पाते हैं। यह हृदय भी देवता है पर उसे कहां समझ पाते हैं? वह लालायित रहता है धर्म और परोपकार का कार्य करने के लिये पर मनुष्य मन तो हमेशा अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर विचरण करता है। एक नहीं अनेक बार झूठ बोलते हैं। दूसरों की निंदा करने के लिये प्रवृत्त होने पर उसके लिये ऐसे किस्से गढ़ते हैं कि जो हम स्वयं जानते हैं कि वह सरासर झूठ है। मगर बोलते हैं यह मानते हुए कि कोई देख नहीं रहा है। उस समय हम अपने अन्दर बैठे आत्मा रुपी देवता को धोखा देते हैं।
आदमी एक के बाद एक झूठ बोलकर किसी के न देख पाने का भ्रम पालकर स्वयं को धोखा देता है। इस संसार  मने  चंद्रमा, सूर्य नारायण, प्रथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश के साथ हमारा हृदय देवता सब देख रहा है। समय आने पर यह देवता दंड भी देते हैं। अतः कोई भी अच्छा काम करते हुए इस बात की चिंता नहीं करना चाहिये कि कोई उसे देख नहीं रहा तो क्या?  उसका सुफल मिलेगा। उसी तरह  बुरा कर्म करते हुए इस बात से लापरवाह भी न हों कि कौन देख रहा है जो सजा मिलेगी?
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Thursday, May 13, 2010

रहीम संदेश-जहां छल की संभावना हो वहां से दूर रहें

कविवर रहीम कहते हैं कि
रहिमन वहां न आइए, जहां कपट को हेत
हम तन ढारत ढेकुली, सींचत अपनो खेत
वहां कतई न जाईये जहां कपट होने की संभावना है। रात भर ढेंकली कोई किसान चलाता रहे पर कोई कपटी उसके खेत का पानी अपनी खेत की तरफ कर ले ऐसा भी होता है।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-छलकपट तो पहले भी था पर अब तो आधुनिक तरीके आ गये हैं और इस तरह छलकपट होता है कि कई बार पता भी नहीं चलता कि हमने क्या और क्यों गंवाया? पहले तो आमने-सामने ही कपट होता था पर अब तो मोबाइल और इंटरनेट के आने से तो वह व्यक्ति हमारी आंखों के सामने भी नहीं होता जो हमें ठगता है। खासतौर से उन युवक और युवतियों को सजग रहना चाहिए जो अपने लिये जीवन साथी ढूंढते है। यहाँ  तो इतना झूठ बोला जा सकता है कि जिसे पकड़ना संभव ही नहीं है। कोई छद्म नाम रखकर, किसी बड़े परिवार से संबंध बताकर या अपने को बहुत व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत कर धोखा देना बहुत आसान है। इसीलिये कपट से बचने के लिए जितना हो सके सावधानीपूर्वक अपने संबंध बनाने चाहिए। नई तकनीकी ने आजकल धोखे के नये तरीकों को जन्म दिया है जिससे यह आसान हो गया है कि न नाम का पता चले न शहर की जानकारी हो और किसी से भी धोखे का शिकार जाये।
आजकल मोबाईल और इंटरनेट का ज़माना है। इस पर शादी तथा व्यवसाय को लेकर अनेक तरह की धोखेबाजी हो सकती है। ऐसी घटनायें भी सामने आयी हैं कि किसी लड़के ने लड़की को अपना गलत परिचय देकर मित्रता कायम की फिर उसे विवाह का प्रस्ताव दिया। लड़की ने स्वीकार कर लिया और विवाह भी हो गया और बाद में पता चला कि उसके साथाधोखा हुआ है। ऐसे भी प्रकरण आये हैं कि किसी लड़के ने लड़की से पहले घनिष्ट संपर्क बनाया और फिर उसे एक निर्धारित स्थान पर बुलाकर उसके साथ बदतमीजी की।
इसलिये आवश्यकता इस बात की है कि सतर्कता बरती जाये और भले ही इंटरनेट और मोबाईल पर संपर्क हो जाये पर यकीन किसी पर आसानी से नहीं करना चाहिये।
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Tuesday, May 4, 2010

मनु दर्शन-आत्म नियंत्रित कार्य ही करें (atmanilantri kam karen-manu darshan in hindi)

सर्वे परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम्।
एतद्विद्यात्समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः।।
हिन्दी में भावार्थ-
जो कार्य दूसरे के अधीन है वह दुःखदायी होता है। जिस काम पर अपना पूरी तरह से नियंत्रण हो उसी से ही सुख मिलता है। यही सुख और दुःख का लक्षण है।
यत्कर्मकुर्वतोऽस्य स्यात्परितोषोऽन्तरात्मनः।
तत्प्रयतनेन कुर्वीत विपरीतं तु वर्जयेत्।
हिन्दी में भावार्थ-
जिस काम को करने से मन और अंतरात्मा को शांति मिलती हो वही करना चाहिए। जिससे इसके विपरीत स्थिति हो तो उस काम को त्याग देना चाहिए।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जब भी हमारे सामने कोई कार्य उपस्थित होता है तो उसके परिणामों, प्रकृति तथा स्वरूप पर अवश्य विचार करना चाहिए। कभी कोई कार्य दबाव या परप्रेरणा से नहीं करना चाहिऐ। इसके अलावा जो कार्य पूरे या आंशिक रूप से दूसरे पर निर्भर हो उसे अपने हाथ में न लें तो ही अच्छा। क्योंकि तब लक्ष्य की प्राप्ति दूसरे की गतिविधि पर निर्भर हो जाती है। अनेक बार ऐसा भी होता है कि दूसरा आदमी अगर अंदर ही अंदर द्वेष रखता है तो वह जानबूझकर उस काम का अपना पूरा या आंशिक दायित्व नहीं निभाता तब अपना लक्ष्य या अभियान संकट में पड़ जाता है।
इसके अलावा किसी भी कार्य को करते हुए इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि उससे अपने मन और अंतरात्मा को संतोष मिलेगा या नहीं। जिस काम को करने से मन और अंतरात्मा में क्लेश होता हो उससे करने का विचार ही छोड़ दें तो ही अच्छा होगा। कहने का अभिप्राय यह है कि अपने हाथ से किये जाने वाले कार्यों पर विचार करना चाहिए ताकि उनके परिणामों को लेकर बाद में पछताना न पड़े। बुद्धिमान व्यक्ति किसी भी काम को करने से पहले उसके हर पहलू पर विचार कर लेते हैं। बिना विचारे काम करने से उसका परिणाम प्राप्त नहीं होता कहीं कहीं वह बुरा भी निकलता है।
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Tuesday, April 27, 2010

रहीम संदेश-समय कभी एक जैसा नहीं रहता (samay ms saman nahit rahta-rahim ke dohe)

समय पाय फल होत है, समय पाय झरि जाय
सदा रहे नहिं एक सौ, का रहीम पछिताय
कविवर रहीम कहते हैं कि समय आने पर अपने अच्छे कर्मों के फल की प्राप्ति अवश्य होती है। वह सदा कभी एक जैसा नहीं रहता इसीलिये कभी बुरा समय आता है तो भयभीत या परेशान होने की आवश्यकता नहीं है।
समय परे ओछे बचन, सब के सहे रहीम
सभा दुसासन पट गहे, गदा लिए रहे भीम
कविवर रहीम कहते हैं कि बुरा समय आने पर तुच्छ और नीच वचनों का सहना करना पड़ा। जैसे भरी सभा में देशासन ने द्रोपदी का चीर हरण किया और शक्तिशाली भीम अपनी गदा हाथ में लिए रहे पर द्रोपदी की रक्षा नहीं कर सके।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-जीवन में सभी के पास कभी न कभी अच्छा समय आता है ऐसे में अपना काम करते रहने के अलावा और कोई चारा नहीं है। आजकल लोग जीवन में बहुत जल्दी सफलता हासिल करने को बहुत आतुर रहते हैं और कुछ को मिल भी जाती है पर सभी के लिये यह संभव नहीं है।
कई लोग जल्दी सफलता हासिल करने के लिये ऐसे मार्ग पर चले जाते हैं वहां उन्हें शुरूआत में बहुत अच्छा लगता है पर बाद में वह पछताते है।
यह सही है कि कुछ लोगों के लिये जीवन का संघर्ष बहुत लंबा होता है पर उन्हें अपना धीरज नहीं खोना चाहिए। कई बार ऐसा लगता है कि हमें जीवन में किसी क्षेत्र मे सफलता नहीं मिलेगी पर सत्य तो यह है कि आदमी को अपने अच्छे कर्मों का फल एक दिन अवश्य मिलता है।
जिस तरह दिन रात हैं और धूप छांव है वैसे ही जीवन में समय का फेर आता है। कभी दुःख तो कभी सुख की अनुभूति के साथ ही जीवन आगे बढ़ता है। जब आदमी तकलीफ में होता है तो संसार वाले उसका मजाक बनाते हुए कटु वचन तक कहते हैं। जब आदमी शक्तिशाली होता है तब सभी उसके सामने नतमस्तक होते हैं। ऐसे में जीवन में आये हर पल को सहजता से स्वीकार करना चाहिए।
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Tuesday, February 23, 2010

श्रीगुरुग्रंथ साहिब से-आदमी अपने कर्म से पीछा नहीं छुड़ा सकता

चित्रगुप्त सभ लिखते लेखा।
भगत जना कउ दृस्टि न पेखा।।
हिन्दी में भावार्थ-
मनुष्य के सारे कर्मों का लेख चित्रगुप्त रखते हैं पर जो भगवान भक्ति में लीन रहते हैं।
देइ किवाड़ अनिक पड़दे महि, परदारा संग फाकै।
चित्रगुप्तु जब लेखा मागहि, तब कउशु पड़दा तेरा ढाकै।।
हिन्दी में भावार्थ-
चाहे हम दरवाजा बंद करके या परदा कर बुरे कर्म करें पर उसका हिसाब चित्रगुप्त महाराज रखते हैं। मनुष्य अपने कर्मों से मरने पर भी पीछा नहीं छुड़ा सकता।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य के मन में कुछ होता है और वह बोलता कोई दूसरी बात है। देखता कुछ है बताता दूसरे ढंग से है। पाखंड और ढोंग का जीवन जीने की मानव की सहज प्रवृत्ति है। वह दरअसल अपने आप से भागता है पर छिप नहीं पाता। झूठ बोलते हुए मनुष्य यह सोचता है कि उसे कोई नहीं देख रहा है पर वह स्वयं को तो देखता है। इस धरा पर जीवन चलाने वाले उस परमात्मा को किसने देखा है? वह सभी को देखता है। इसलिये अपने कर्म करते समय यह विचार अवश्य करना चाहिये कि उनका लेखा कोई रख रहा है।
झूठ, बेईमानी, भ्रष्टाचार और ठगी का कर्म करने वाले यह सोचते हैं कि उनको कोई नहीं देख रहा है तो उनका वहम है। हर आदमी अपने आपको देख रहा है यानि उसके अंदर परमात्मा का अंश आत्मा भी उसका आभास देता है कि वह कौनसा काम कर रहा है। बुरे काम करने वाले को पता होता है कि वह गलती कर रहा है पर खालीपीली अपने आपको दिलासा देता है कि कोई नहीं देख रहा है।
इस संसार में जहां अच्छे काम का परिणाम मिलता है तो बुरे काम की सजा भी सामने आती है। इतना ही नहीं मनुष्य का कर्म उसके मरने के बाद भी पीछा नहीं छोड़ते। इसलिये अपने अंदर हमेशा ही सात्विक कार्य करने का विचार करना चाहिए।

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