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Wednesday, June 15, 2011

कबीर वाणी-अपने मुख से तोलकर शब्द व्यक्त करें (kabir wani-apne mukh se tolakar shabd bolen)

        देखा जाये तो संसार में ज्ञानी लोगों  की संख्या अत्यंत कम है। उसके बाद ऐसे लोगों की संख्या है जो ज्ञान की तलाश के लिये प्रयासरत रहते हैं यह अलग बात है कि योग्य गुरु के अभाव में उनको सफलता नहीं मिलती। मगर ऐसे लोगों की संख्या कम नहीं है जो न तो जिनके पास ज्ञान है न उनको पाने की जिज्ञासा है। देहाभिमान से युक्त ऐसे लोग हर समय अपने आपको श्रेष्ठ प्रमाणित करने के लिये बकवाद करते हैं। दूसरों का मजाक बनाते हैं। ऐसे मूर्ख लोग अपने आपको बुद्धिमान साबित करने के लिये किसी भी हद तक चले जाते हैं। न तो वह समय देखते हैं न व्यक्ति। अपने शब्दों का अर्थ वह स्वयं नहीं समझते। उनको तो बस बोलने के लिये बोलना है। ऐसे लोग न बल्कि दूसरों को दुःख देते हैं बल्कि कालांतर में अपने लिये संकट का निर्माण भी करते हैं।
संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं कि
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सहज तराजू आनि के, सब रस देखा तोल
सब रस माहीं जीभ रस, जू कोय जाने बोल
"संसार में विभिन्न प्रकार के रस हैं और हमने सब रसों को सहज स्वभाव की ज्ञान -तुला पर तौलकर देख-परख लिया है। सब रसों में जीभ का रस सर्वोत्तम एव अधिक वजन वाला है। उसे वही जान सकता है जो अपने शब्द और वाणी का सही उपयोग करना जानता है।"
मुख आवै सोई कहै, बोलै नहीं विचार
हटे पराई आतमा, जीभ बाँधि तलवार
"कुछ नासमझ लोग ऐसे हैं जो कभी भी सोच समझकर नहीं बोलते और मुहँ में जो आता है बक देते हैं। ऐसे लोगों की वाणी और शब्द तलवार की तरह दूसरों को कष्ट पहुँचाते हैं।"
         इसके विपरीत ज्ञानी लोग हर शब्द के रस का अध्ययन करते हैं। उनके प्रभाव पर दृष्टिपात करते हैं। उनका अभ्यास इतना अधिक हो जाता है कि उनके मुख से निकला एक एक शब्द न केवल दूसरों का सुख देता है बल्कि वह स्वयं भी उसका आनंद उठाते हैं। एक बात निश्चित है कि किसी भी मनुष्य के मुख से निकले शब्द उसके अंतर्मन का प्रमाण होते हैं। दुष्ट लोग जहां हमेशा अभिमान और कठोरता से भरे भरे शब्द उपयोग करते है जबकि सज्जन कठोर बात भी मीठे शब्दों में कहते हैं। इसलिये जब कहीं वार्तालाप करते हैं तो इस बात का विचार करें कि हमारे शब्द का बाहर प्रभाव क्या होगा? इससे न केवल हम दूसरे को सुख दे सकते हैं बल्कि अपने लिये आने वाले संकटों से भी बच सकते हैं। कहा भी जाता है कि यही वाणी आपको धूप में बैठने का दुःख और छांव में बैठने के सुख का कारण बनती है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

Saturday, February 26, 2011

बुरी कमाई को छोड़ देना चाहिए-हिन्दी धार्मिक संदेश (buri kamai n karen-hindi dharmik sandesh)

हर मनुष्य में स्वाभाविक रूप से यह ज्ञान रहता है कि कौनसा धन धर्म की कमाई है और कौनसा पाप की! दूसरा कोई आदमी यह नही बता सकता है आप पाप की कमाई कर रहे हो या नहीं उसी तरह किसी दूसरे को कहना भी नहीं चाहिये कि उसकी कमाई पाप की है। धन या माया तो सभी के पास आती है पर अपने परिश्रम, ज्ञान तथा कार्य के अभ्यास से कमाने वाले लोग वास्तव में धर्म का निर्वाह करते हैं जबकि झूठ, बेईमानी तथा अनाधिकारिक प्रयासों से धन कमाने वाले पाप की खाते हैं।
कहा जाता है कि जैसा आदमी खाये अन्न वैसा ही होता है उसक मन। अगर हम इसका शब्दिक अर्थ लेें तो इसका आशय यह है कि हम भोजन में मांस और मदिरा का सेवन करेंगे तो धीरे धीरे हमारी प्रकृति तामसी हो जायेगी। इसका लाक्षणिक अर्थ लें तो हमारी सेवा और व्यवसाय के प्रकार से है। जो लोग ऐसी जगहों पर काम करते हैं जहां का वातावरण अत्यंत दुर्गंधपूर्ण तथा गंदगी से भरा है तो चाहे वहा भले ही एक नंबर की कमाई करें पर उनकी देह में भरे विकार उनके अंदर सात्विक प्रवृत्तियां नहीं आने देतें। अपने कर्मस्थल से मिली पीड़ा उनका पीछा नहीं छोड़ती। इसका अगर व्यंजना विधा में अर्थ देखें तो यह स्पष्ट है कि जो धन दूसरे के शोषण, भ्रष्टाचार या अपराध से प्राप्त करते हैं वह चाहे अच्छी जगह पर रहे और शाकाहारी भोजन भी करें तब भी आसुरी प्रवृत्ति के हो जाते हैं।
इस विषय पर कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है
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दुष्यस्यादूषणार्थंचच परित्यागो महीयसः।
अर्थस्य नीतितत्वज्ञरर्थदूषणमुच्यते।।
"दुष्य तथा दूषित अर्थ का अवश्य त्याग करना चाहिये। नीती विशारदों ने अर्थ की हानि को ही अर्थदूषण बताया है।"
अतः हमें इस अपने जीवन में सतत आत्ममंथन करना चाहिए। जिंदगी तो सभी जीते हैं पर कुछ लोग ऐसे हैं जो अपने पास कुछ न होते ही हुए भी प्रसन्न रहते हैं और कुछ सब कुछ होते हुए भी दुःखी रहते हैं। जीवन जीने की कला सभी को नहीं आती इसके लिये जरूरी है कि ध्यान, चिंतन और मनन करते हुए अपनी आय के साधन तथा कार्यस्थलों में पवित्रता लाने का प्रयास करें।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Saturday, December 11, 2010

मनुस्मृति-प्रजा को डराने वाले अपराधियों को क्षमा नहीं करना चाहिए (manu smriti-praja aur apradhi)

साहसे वर्तमानं तु यो मर्थयति पार्थिवः।
सः विनाशं व्रजत्याशु विद्वेषं चाधिगच्छति।।
हिन्दी में भावार्थ-
जो राज्य प्रमुख दुस्साहस करने वाले व्यक्ति को क्षमा कर देता है वह स्वयं ही अतिशीघ्र नाश को प्राप्त होता है क्योंकि इससे राज्य की प्रजा में विद्रोह का भाव पैदा होता है।
न मित्रकारणांद्राजा विपुलाद्वाधनायामात्।
समुत्सृजेत्साहसिकान्सर्वभूतभयावहान्।।
हिन्दी में भावार्थ-
राज्य प्रमुख को चाहिए वह स्नेह अथवा लालचवश भी प्रजा में डर उत्पन्न करने वालो चोरों और अपराधियों को क्षमा न प्रदान करे।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुस्मृति का विरोध करते करते अनेक लोगों ने राजकाज में भागीदारी प्राप्त की मगर प्रजा को क्या दिया? सभी मुखौटों की तरह काम करते रहे। पूंजीपतियों और अपराध समूहों का आजकल इतना घालमेल हो गया है कि पता ही नहीं चलता कि राज्य वास्तव में उन लोगों से संचालित है जिनका चेहरा दिख रहा है या वह पुतले हैं जिनकी डोर कोई पीछे से खींच रहा है। दुस्साहस करने वाले अपराध्सियों पर हाथ डालना आसान नहीं रहा। प्रचार माध्यमों में घोटालों की चर्चा पर अगर विचार करें तो ऐसा लगता है कि राज्य का राजस्व लुट रहा है और जिम्मेदार लोग लाचार दिख रहे हैं। जो अनाज राज्य गरीबों के लिये सस्ते दामों पर बेचने के लिये भेजता है उसे राज्य के अधिकारी, कर्मचारी तथा व्यापारी मिलकर अपने कब्जे में ले लेते हैं। इधर ऐसे एक राज्य का गरीबों को बेचा जाने वा अनाज विदेशों में भेज दिया गया-इस घटना पर प्रचार माध्मयों के बहुत चर्चा है।
मनुस्मृति में केवल अपराधियों के लिये हीं कड़े दंड का प्रावधान नहीं वरन् उनकी अनदेखी करने वाले राज्य कर्मियों के लिये भी ऐसी ही व्यवस्था है। ऐसा लगता है कि राज्य कर्म से जुड़े कुछ तत्व मनुस्मृति की व्यवस्था और संदेशों से भय खाते हैं इसलिये ही निम्न जाति तथा स्त्रियों के प्रति कुछ संदेशों को लेकर दुष्प्रचार करते हैं ताकि कोई उनकी निष्कर्मता तथा लालच की वजह की जा रही लापरवाही पर लोग टिप्पणियां न करें। यही कारण है कि आज देश की व्यवस्था एकदम बुरी और दर्दनाक हो गयी है।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Wednesday, October 27, 2010

श्रीगुरुग्रंथ साहिब-धन न होने पर पत्नी, पुत्र, मित्र तथा संबंधी आदमी को छोड़ देते हैं (shri gurugranth sahib-dhan aur sambandh)

इहु धनु करते का खेल है कदे आवै कदे जाइ।
गिआनी का धनु नामु है सद ही रहे समाइ।।
हिन्दी में भावार्थ-
श्री गुरुग्रंथ साहिब के अनुसार सांसरिक धन तो ईश्वर का खेल। कभी किसी आदमी के पास आता है तो चला भी जाता है। ज्ञानी का धन तो प्रभु का नाम है जो हमेशा उसके हृदय में बना रहता है।
दारा मीत पूत सनबंधी सगर धन सिउ लागै।
जब ही निरधन देखिउ नर कउ संगि छाडि सभ भागै।
हिन्दी में भावार्थ-
श्री गुरु ग्रंथ सहिब के अनुसार पत्नी, मित्र, पुत्र और संबंधी तो धन के कारण ही साथ लगे रहते हैं। जिस दिन आदमी निर्धन हो जाता है उस दिन सब छोड़ जाते हैं।
धन जीबन का गरबु न कीजै कागद जिउ गलि जाहिगा।
हिन्दी में भावार्थ-
किसी भी मनुष्य को अपने जीवन और धन पर गर्व नहीं करना चाहिऐ। यह दोनों कागज की तरह है चाहे जब गल जायें।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य जीवन की यह विचित्र माया है कि उसकी अनुभूति में धन दुनियां का सबसे बड़ा सत्य है जबकि उससे बड़ा कोई भ्रम नहीं है। आधुनिक योग में सारे देशों की मुद्रा कागज की बनी हुई है और केवल राज्य के विश्वास पर ही वह धन मानी जाती है। मजे की बात यह है कि अनेक लोगों के पास तो वह भी हाथ में न रहकर बैंकों के खातों में आंकड़ों के रूप में स्थापित होती है। अनेक लोगों के खातों में दर्ज आंकड़ें तो इतने होते हैं कि वह स्वयं सौ जीवन धारण कर भी उनको खर्च नहीं कर सकते मगर फिर भी इस कागजी और आंकड़ा रूपी धन के पीछे अपना पूरा जीवन नष्ट कर देते हैं।
हम अपने जिस शरीर के बाह्य रूप को मांस से चमकता देखते हैं अंदर वह भी कीचड़ से सना रहता है। धीरे धीरे क्षय की तरफ बढ़ता जाता है। धन या देह न रहने पर अपने सभी त्याग देते हैं तब भी मनुष्य दोनों के लेकर भ्रम पालता है। उससे भी ज्यादा बुरा तो यह भ्रम हैं कि हमारे लोग हमेशा ही निस्वार्थ भाव से हमारे साथ हैं। हर आदमी स्वार्थ के कारण ही दूसरे से जुड़ा है। अलबत्ता कुछ परम ज्ञानी तथा ध्यानी महापुरुष संसार और समाज के हित के लिए निष्काम भाव से कर्म करते हैं पर वह भी इसके फल में लिप्त नहीं होते बल्कि उनका फल तो परमात्मा की भक्ति पाना ही होते। वह जानते हैं कि कागज का धन आज हाथ में आया है कल चला जायेगा। यह केवल जीवन निर्वाह का साधन न न कि फल।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Saturday, August 7, 2010

संत कबीर के दोहे-प्रचार पाने के लिये भक्ति का दिखावा करते हैं लोग (publicity ke liye ghakti-sant kabir ke dohe)



संत कबीर दास कहते हैं कि
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मान बड़ाई देखि कर, भक्ति करै संसार। जब देखैं कछु हीनता, अवगुन धरै गंवार।
            हिंदी में भावार्थ-संत कबीरदास जी कहते हैं कि दूसरों की देखादेखी कुछ लोग सम्मान पाने के लिये परमात्मा की भक्ति करने लगते हैं पर जब वह नहीं मिलता वह मूर्खों की तरह इस संसार में ही दोष निकालने लगते हैं।
मान बड़ाई ऊरमी, ये जग का व्यवहार। दीन गरीबी बन्दगी, सतगुरु का उपकार।।
      हिंदी में भावार्थ-संत शिरोमणि कबीरदास का कहना है कि जिस तरह दुनियां का व्यवहार है उससे देखकर तो यही आभास होता है कि मान और बड़ाई दुःख का कारण है। सतगुरु की शरण लेकर उनकी कृपा से जो गरीब असहाय की सहायता करता है, वही सुखी है।
     वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संसार में ऐसे अनेक लोग हैं जो अपनी धार्मिक छबि बनाये रखने के लिये भक्ति का दिखावा करते हैं। इनमें से कुछ तो ऐसे हैं जो गुरु बनकर अपने लिये शिष्य समुदाय का निर्माण कर अपनी रोजी रोटी चलाते हैं। ऐसे दिखावे की भक्ति करने वाले अनेक लोग हैं। इसके विपरीत जो भगवान की वास्तव में भक्ति करते हैं वह उसका प्रयार नहीं करते न ही अपना ज्ञान बघारते हैं।
भक्त और ज्ञानी की पहचान यह है कि वह कभी अपनी भक्ति और ज्ञान शक्ति का बखान नहीं करते बल्कि निर्लिप्त भाव से समाज सेवा करते हुए अपना जीवन यापन करते हैं। अपनी सच्ची भक्ति और ज्ञान के कारण कुछ लोग महापुरुषों की श्रेणी में आ जाते हैं उनको देखकर अन्य लोग भी यही प्रयास करते हैं कि उनकी पूजा हो। यह केवल अज्ञान का प्रमाण है अलबत्ता अपने देश में धार्मिक प्रवचन एक व्यवसाय के रूप में चलता रहा है। इस कारण तोते की तरह किताबों को रटकर लोगों को सुनाते हुए खूब कमाते हैं। उनको देखकर कुछ लोग यह सोचते हुए भक्ति का दिखावा करते हैं कि शायद उनको भी ऐसा ही स्वरूप प्राप्त हो। अनेक लोग संतों की सेवा में इसलिये जाते हैं कि हो सकता है कि इससे उनको किसी दिन उनकी गद्दी प्राप्त हो जाये। ऐसे में भक्ति और ज्ञान तो एक अलग विषय हो जाता है और वह मठाधीशी के चक्कर में राजनीति करने लगते हैं। किताबों को रटने की वजह से उनको शब्द ज्ञान याद तो रहता है ऐसे में वह थोड़ा बहुत प्रवचन भी कर लेते हैं पर उनकी भक्ति और ज्ञान प्रमाणिक नहीं है। वैसे भी अपने पौराणिक ग्रंथों का अध्ययन हर आदमी इतना तो कर ही लेता है कि उसे सारी कथायें याद रहती हैं। नहीं भी अध्ययन करे तो इधर उधर सुनकर उसे बहुत सारी कथायें याद आ ही जाती हैं। । किसी आदमी ने वह भी नहीं किया हो तो अपने अध्यात्मिक दर्शन के कुछ सूक्ष्म सत्य-निष्काम कर्म करो, परोपकार करो, दया करो और माता पिता की सेवा करे जैसे जुमले- सुनाते हुए श्रोताओं और दर्शकों की कल्पित कहानियों से मनोरंजन करता है। उनको सम्मानित होते देख अन्य लोग भक्ति में जुट जाते हैं यह अलग बात है कि कामना सहित यह भक्ति किसी को भौतिक फल दिलाती है किसी को नहीं।
      फिर भक्ति हो या ज्ञानार्जन अगर कामना सहित किया जाये और सफलता न मिले तो आदमी संसार में दोष ढूंढने लगता है। यह केवल भक्ति या ज्ञान के विषय में नहीं है बल्कि साहित्य और कला के विषयों में भी यही होता है। आदमी आत्ममुग्ध होकर अपना काम शुरु करता है पर जब उसे सफलता नहीं मिलती तो वह निराश हो जाता है। निष्कर्ष यह है कि सम्मान पाने का मोह आदमी के लिये दुःख का कारण बनता है। एक बात याद रखें सम्मान पाने की चाह पूरी नहीं हुई तो दुःख तो होगा और अगर पूरी भी हो गयी तो अपमान भी हो सकता है। जहां सुख है वहां दुःख भी है। जहां आशा है वहां निराशा भी है। जहां सम्मान है वहां अपमान भी है। अगर सम्मान मिल गया तो चार लोग आपके दोष निकालकर अपमान भी कर सकते हैं।
      इसलिये अच्छा यही है कि अपने कर्म निष्काम भाव से करें। इस संसार में निर्विवाद सम्मान पाने का बस एक ही तरीका है कि आप गरीब को धन और अशिक्षित को शिक्षा प्रदान करें। प्रयोजन रहित दया करें। ऐसे काम बहुत कम लोग करते हैं। जो सभी कर रहे हैं उसे आप भी करें तो कैसा सम्मान होगा? सम्मान तो उसी में ही संभव है जो दूसरे लोग न करते हों। 
----------------------- मान बड़ाई देखि कर, भक्ति करै संसार।
जब देखैं कछु हीनता, अवगुन धरै गंवार।
संत कबीरदास जी कहते हैं कि दूसरों की देखादेखी कुछ लोग सम्मान पाने के लिये परमात्मा की भक्ति करने लगते हैं पर जब वह नहीं मिलता वह मूर्खों की तरह इस संसार में ही दोष निकालने लगते हैं।
मान बड़ाई ऊरमी, ये जग का व्यवहार।
दीन गरीबी बन्दगी, सतगुरु का उपकार।।
संत शिरोमणि कबीरदास का कहना है कि जिस तरह दुनियां का व्यवहार है उससे देखकर तो यही आभास होता है कि मान और बड़ाई दुःख का कारण है। सतगुरु की शरण लेकर उनकी कृपा से जो गरीब असहाय की सहायता करता है, वही सुखी है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संसार में ऐसे अनेक लोग हैं जो अपनी धार्मिक छबि बनाये रखने के लिये भक्ति का दिखावा करते हैं। इनमें से कुछ तो ऐसे हैं जो गुरु बनकर अपने लिये शिष्य समुदाय का निर्माण कर अपनी रोजी रोटी चलाते हैं। ऐसे दिखावे की भक्ति करने वाले अनेक लोग हैं। इसके विपरीत जो भगवान की वास्तव में भक्ति करते हैं वह उसका प्रयार नहीं करते न ही अपना ज्ञान बघारते हैं।
भक्त और ज्ञानी की पहचान यह है कि वह कभी अपनी भक्ति और ज्ञान शक्ति का बखान नहीं करते बल्कि निर्लिप्त भाव से समाज सेवा करते हुए अपना जीवन यापन करते हैं। अपनी सच्ची भक्ति और ज्ञान के कारण कुछ लोग महापुरुषों की श्रेणी में आ जाते हैं उनको देखकर अन्य लोग भी यही प्रयास करते हैं कि उनकी पूजा हो। यह केवल अज्ञान का प्रमाण है अलबत्ता अपने देश में धार्मिक प्रवचन एक व्यवसाय के रूप में चलता रहा है। इस कारण तोते की तरह किताबों को रटकर लोगों को सुनाते हुए खूब कमाते हैं। उनको देखकर कुछ लोग यह सोचते हुए भक्ति का दिखावा करते हैं कि शायद उनको भी ऐसा ही स्वरूप प्राप्त हो। अनेक लोग संतों की सेवा में इसलिये जाते हैं कि हो सकता है कि इससे उनको किसी दिन उनकी गद्दी प्राप्त हो जाये। ऐसे में भक्ति और ज्ञान तो एक अलग विषय हो जाता है और वह मठाधीशी के चक्कर में राजनीति करने लगते हैं। किताबों को रटने की वजह से उनको शब्द ज्ञान याद तो रहता है ऐसे में वह थोड़ा बहुत प्रवचन भी कर लेते हैं पर उनकी भक्ति और ज्ञान प्रमाणिक नहीं है। वैसे भी अपने पौराणिक ग्रंथों का अध्ययन हर आदमी इतना तो कर ही लेता है कि उसे सारी कथायें याद रहती हैं। नहीं भी अध्ययन करे तो इधर उधर सुनकर उसे बहुत सारी कथायें याद आ ही जाती हैं। । किसी आदमी ने वह भी नहीं किया हो तो अपने अध्यात्मिक दर्शन के कुछ सूक्ष्म सत्य-निष्काम कर्म करो, परोपकार करो, दया करो और माता पिता की सेवा करे जैसे जुमले- सुनाते हुए श्रोताओं और दर्शकों की कल्पित कहानियों से मनोरंजन करता है। उनको सम्मानित होते देख अन्य लोग भक्ति में जुट जाते हैं यह अलग बात है कि कामना सहित यह भक्ति किसी को भौतिक फल दिलाती है किसी को नहीं।
फिर भक्ति हो या ज्ञानार्जन अगर कामना सहित किया जाये और सफलता न मिले तो आदमी संसार में दोष ढूंढने लगता है। यह केवल भक्ति या ज्ञान के विषय में नहीं है बल्कि साहित्य और कला के विषयों में भी यही होता है। आदमी आत्ममुग्ध होकर अपना काम शुरु करता है पर जब उसे सफलता नहीं मिलती तो वह निराश हो जाता है। निष्कर्ष यह है कि सम्मान पाने का मोह आदमी के लिये दुःख का कारण बनता है। एक बात याद रखें सम्मान पाने की चाह पूरी नहीं हुई तो दुःख तो होगा और अगर पूरी भी हो गयी तो अपमान भी हो सकता है। जहां सुख है वहां दुःख भी है। जहां आशा है वहां निराशा भी है। जहां सम्मान है वहां अपमान भी है। अगर सम्मान मिल गया तो चार लोग आपके दोष निकालकर अपमान भी कर सकते हैं।
इसलिये अच्छा यही है कि अपने कर्म निष्काम भाव से करें। इस संसार में निर्विवाद सम्मान पाने का बस एक ही तरीका है कि आप गरीब को धन और अशिक्षित को शिक्षा प्रदान करें। प्रयोजन रहित दया करें। ऐसे काम बहुत कम लोग करते हैं। जो सभी कर रहे हैं उसे आप भी करें तो कैसा सम्मान होगा? सम्मान तो उसी में ही संभव है जो दूसरे लोग न करते हों। 
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Wednesday, July 28, 2010

पतंजलि योग सूत्र-प्राणवायु अंदर बाहर निकालने से मन शुद्ध होता है (pranvayu aur man-Patanjli Yog Sootra)

            पतंजलि योग सूत्र एक प्रमाणिक कला और विज्ञान है। आज जब हम अपने देश में अस्वस्थ और मनोरोगों के शिकार लोगों की संख्या को देखते हैं तो इसको अपनाने की आवश्यकता अधिक अनुभव होती है। पतंजलि योग एक बृहद साहित्य है और इसमें केवल आसनों से शरीर को स्वस्थ ही नहीं रखा जा सकता बल्कि प्राणायाम तथा वैचारिक योग से मन को भी प्रसन्न रखा जा सकता है। यह अंतिम सत्य है कि दवाईयां मनुष्य की बीमारियां दूर सकती हैं पर योग तो कभी बीमार ही नहीं पड़ने देता।

पतंजलि योग सूत्र में  कहा गया है
प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य।

     हिन्दी में भावार्थ-प्राणवायु को बाहर निकालने और अंदर रोकने के निरंतर अभ्यास चित्त निर्मल होता है।

विषयवती वा प्रवृत्तिरुपन्न मनसः स्थितिनिबन्धनी।।

हिन्दी में भावार्थ-विषयवाली प्रवृत्ति उत्पन्न होने पर भी मन पर नियंत्रण रहता है।
विशोका वा ज्योतिवस्ती।
हिन्दी में भावार्थ-इसके अलावा शोकरहित प्रवृत्ति से मन नियंत्रण में रहता है।
वीतरागविषयं वा चित्तम्।
हिन्दी में भावार्थ-वीतराग विषय आने पर भी मन नियंत्रण में रहता है।
     वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-भारतीय योग दर्शन में प्राणायाम का बहुत महत्व है। योगासनों से जहां देह के विकार निकलते हैं वहीं प्राणायाम से मन तथा विचारों में शुद्धता आती है। जैसा कि स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते आ रहे हैं कि इस विश्व में मनोरोगियों का इतना अधिक प्रतिशत है कि उसका सही आंकलन करना संभव नहीं है। अनेक लोगों को तो यह भी पता नहीं कि वह मनोविकारों का शिकार है। इसका कारण यह है कि आधुनिक विकास में भौतिक सुविधाओं की अधिकता उपलब्धि और उपयेाग के कारण सामान्य मनुष्य का शरीर विकारों का शिकार हो रहा है वहीं मनोरंजन के नाम पर उसके सामने जो दृश्य प्रस्तुत किये जा रहे है वह मनोविकार पैदा करने वाले हैं।
    ऐसी अनेक घटनायें आती हैं जिसमें किसी फिल्म या टीवी चैनल को देखकर उनके पात्रों जैसा अभिनय कुछ लोग अपनी जिंदगी में करना चाहते हैं। कई लोग तो अपनी जान गंवा देते हैं। यह तो वह उदाहरण सामने आते हैं पर इसके अलावा जिनकी मनस्थिति खराब होती है और उसका दुष्प्रभाव मनुष्य के सामान्य व्यवहार पर पड़ता है उसकी अनुभूति सहजता से नहीं हो जाता।
प्राणायाम से मन और विचारों में जो दृढ़ता आती है उसकी कल्पना ही की जा सकती है मगर जो लोग प्राणायाम करते और कराते हैं वह जानते हैं कि आज के समय में प्राणायाम ऐसा ब्रह्मास्त्र है जिससे समाजको बहुत लाभ हो सकता है।
----------संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://anantraj.blogspot.com
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Saturday, July 17, 2010

संत कबीर वाणी-मनुष्य धन बटोरने के काम से थकता नहीं है (manushya ke dhan ki bhookh)

            प्रकृति में उत्पन्न समस्त जीवों में मनुष्य सबसे अधिक बुद्धिमान माना गया है और विचित्र बात यह है कि जहां अन्य जीव सीमित आवश्यकताओं के कारण अपना जीवन सामान्य रूप से गुजार लेते हैं जबकि मनुष्य असीम लालच और लोभ को अपने मन में स्थान देता है और सदैव संकट बुलाता है। संत कबीर दास जी ने अपने संदेशों में इसी तरफ इंगित किया है।
कबीरा औंधी खोपड़ी, कबहूं धापै नाहिं|
तीन लोक की सम्पदा, कब आवै घर माहिं||
      संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मनुष्य की खोपड़ी उल्टी होती है क्योंकि वह कभी भी धन प्राप्ति से थकता नहीं है। वह अपना पूरा जीवन इस आशा में नष्ट कर देता है कि तीनों लोकों की संपदा उसके घर कब आयेगी।
     वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-इस दुनिया में मनुष्य ही एक ऐसा जीवन जिसके पास बुद्धि में विवेक है इसलिये वह कुछ नया निर्माण कर सकता है। अपनी बुद्धि की वह से ही वह अच्छे और बुरे का निर्णय कर सकता है। सच तो यह कि परमात्मा ने उसे इस संसार पर राज्य करने के लिए ही बुद्धि दी है पर लालच और लोभ के वश में आदमी अपनी बुद्धि गुलाम रख देता है। वह कभी भी धन प्राप्ति के कार्य से थकता नहीं है। अगर हजार रुपये होता है तो दस हजार, दस हजार से लाख और लाख से दस लाख की चाहत करते हुए उसकी लालच का क्रम बढ़ जाता है। कई बार तो ऐसे लोग भी देखने में आ जाते है जिनके पेट में दर्द अपने खाने से नहीं दूसरे को खाते देखने से उठ खड़ा होता है।
अनेक धनी लोग जिनको चिकित्सकों ने मधुमेह की वजह से खाने पर नियंत्रण रखने को कहा होता है वह गरीबों को खाता देख दुःखी होकर कहते भी हैं‘देखो गरीब होकर खा कैसे रहा है’। इतना ही नहीं कई जगह ऐसे अमीर हैं पर निर्धन लोगों की झग्गियों को उजाड़ कर वहां अपने महल खड़े करना चाहते हैं। आदमी एक तरह से विकास का गुलाम बन गया है। भक्ति भाव से पर आदमी बस माया के चक्कर लगाता है और वह परे होती चली जाती है। सौ रुपया पाया तो हजार का मोह आया, हजार से दस हजार, दस हजार से लाख और लाख से दस लाख के बढ़ते क्रम में आदमी चलता जाता है और कहता जाता है कि अभी मेरे पास कुछ नहीं है दूसरे के पास अधिक है। मतलब वह माया की सीढियां चढ़ता जाता है और वह दूर होती जाती है। इस तरह आदमी अपना पूरा जीवन नष्ट कर देता है।
   आजकल तो जिसे देखो उस पर विकास का भूत चढ़ा हुआ है। कहते हैं कि इस देश में शिक्षा की कमी है पर जिन्होने शिक्षा प्राप्त की है तो इसका मतलब यह कदापि नहीं है कि उन्होंने ज्ञान भी प्राप्त कर लिया है। इसलिये शिक्षित आदमी तो और भी माया के चक्कर में पड़ जाता है और उसे तो बस विकास की पड़ी होती है पर उसका स्वरूप उसे भी पता नहीं होता। लोगों ने केवल भौतिक उपलब्धियों को ही सबकुछ मान लिया है और अध्यात्म से दूर हो गये हैं उसी का परिणाम है कि सामाजिक वैमनस्य तथा मानसिक तनाव बढ़ रहा है। अत: जितना हो सके उतना ही अपनी पर नियंत्रण रख्नना चाहिये।
--------------------संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Sunday, July 4, 2010

हिन्दू धर्म संदेश-अधम पुरुषों से परे रहना ही अच्छा (adhma purushon se pare rahna hi shreshth-hindu dharma sandesh)

हमारे साथ व्यापार अथवा नौकरी के कारण अनेक लोग संपर्क में आते हैं। उनसे संबंध बनाना मज़बूरी होती है पर जहां किसी व्यक्ति के चाल चलन या आदतों में बुराई का आभास हो उससे औपाचारिकतावश ही संबंध रखना ही अच्छा है न कि उससे आत्मीयता या एकता दिखाकर अपने लिये संकट को आमंत्रण देना। एक बात तय है कि आदमी अपना स्वभाव आसानी से नहीं बदलता इसलिये अपने साथ संपर्क में रहने वाला व्यक्ति अगर अन्य लोगों के लिये संकट खड़ा करता है या दूसरों की निंदा करता है तो समझ लीजिये कि वह किसी दिन अपने मित्र को भी नहीं बख्शने वाला। अतः मनुस्मृति वर्णित इस संदेश का भाव का रहस्य समझते हुए ही अपने संबंध श्रेष्ठ मनुष्यों के साथ विकसित करना चाहिए।
उत्तमैरुत्तमैर्नित्यं संबंधनाचरेत्सह।
निनीषुः कुलमुत्कर्षमधमानधर्मास्त्यजेत्।
हिन्दी में भावार्थ-
अपने परिवार की रक्षा तथा सम्मान में वृद्धि के लिये अच्छे परिवारों के साथ अपनी कन्या और पुत्र के संबंध बनाने चाहिए। खराब आचरण तथा धर्म विरोधी पुरुषों के परिवारों के साथ किसी प्रकार का संबंध स्थापित करना ठीक नहीं है।
उत्तमानुत्तमान्गच्छन्हीनाश्च वर्जवन्।
ब्राम्हण श्रेष्ठतामेति प्रत्यावयेन शूद्रताम्।।
हिन्दी में भावार्थ-
श्रेष्ठ पुरुषों से संबंध जोड़ने और नीच तथा अधम पुरुषों से परे रहने वाले विद्वान की प्रतिष्ठा बढ़ जाती है। इसके विपरीत श्रेष्ठ लोगों की बजाय नीच पुरुषों से संबंध बनाने वाला मनुष्य और उसका कुल कलंकित हो जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-श्रेष्ठ व्यक्ति या परिवार के उच्च आचरण का पैमाना जाति, वर्ण, धन या भाषा नहीं वरन् चरित्र और व्यवहार है। आजकल तो मनुष्य जाति में जिस तरह पाखंड तथा ढोंग की प्रवृत्ति बढ़ गयी है ऐसे में किसी भी प्रकार के मैत्री या वैवाहिक संबंध सोच समझकर जोड़ना चाहिए। युवक युवतियां शैक्षणिक, व्यवसायिक तथा अन्य सार्वजनिक स्थानों पर एक दूसरे से मिलते हैं। लच्छेदार बातों से एक दूसरे पर प्रभाव डालकर संबंध बना देते हैं। कोई यह देखने का विचार भी नहीं करता कि सामने वाले का बौद्धिक, वैचारिक तथा चारित्रिक स्तर क्या है? इसलिये ही आजकल अधिकतर लोग मैत्री और प्यार में धोखे की शिकायत करते नज़र आते हैं। इतना ही नहीं माता पिता की उपेक्षा कर वैवाहिक जीवन साथी चुनने को लालायित युवक युवतियां जब बाद में निराश होते हैं तो आत्महत्या तक कर बैठते हैं। यौवन की अग्नि उनकी बौद्धिक सोच को कुंठित कर देते हैं और समझते हैं कि जैसे जीवन का पूरा अनुभव उनको हो गया है। वह माता पिता के अनुभव को पुराना समझकर उनकी उपेक्षा तो करते हैं पर उसके परिणाम कोई अच्छे नहीं रहते।
एक बात दूसरी भी है कि हमारे समाज के अनेक लोगों ने श्रेष्ठता का प्रमाण जाति, भाषा और आर्थिक स्तर मान लिया है जो कि गलत हैं। दरअसल जिस परिवार में उच्च विचार वाले लोग हैं वही श्रेष्ठ है। जिनका आचरण धार्मिक प्रवृत्ति का है वही श्रेष्ठ लोग हैं। मनोरंजन, विलासिता तथा श्रम बचाने वाले सुविधाभोगी साधनों का संचय करना ही उच्च कुल या व्यक्ति होने का प्रमाण नहीं है। न ही किसी जाति, भाषा या समूह का श्रेष्ठता पर एकाधिकार है। मुख्य विषय यह है कि वैवाहिक तथा मैत्री संबंध स्थापित करने से पहले अपने सामने वाली की बौद्धिक, वैचारिक, सामाजिक तथा चारित्रिक दृढ़ता को प्रमाणित कर लेना चाहिए। केवल चेहरा और पहनावा देखकर किसी को श्र्रेष्ठ मानकर उससे संबंध जोड़ना खतरनाक भी हो सकता है।
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Sunday, May 30, 2010

विदुर नीति-दुष्टों को अनदेखा करने से जनता नाराज होती है

साहसे वर्तमानं तु यो मर्षयति पार्थिवः।
सः विनाशं व्रजत्याशु विद्वेषं चाधिगच्छति।।
हिन्दी में भावार्थ-
यदि राज्य प्रमुख  दुस्साहस करने वाले व्यक्ति को क्षमा या उसे अनदेखा करता है तो उसका अतिशीघ्र विनाश हो जाता है क्योंकि तब प्रजा में उसके विद्वेष की भावना पैदा होती है।


न मित्रकारणाद्राजा विपुलाद्वाधनागमात्।
समुत्सुजोत्साहसिकान्सर्वभुतभयावहान्।।
हिन्दी में भावार्थ-
राज्य प्रमुख को चाहिये कि वह स्नेह या लालच मिलने पर भी प्रजा में भय उत्पन्न करने वाले अपराधियों को क्षमा न करे। 


वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-क्षमा जीवन का मूलमंत्र है पर एक परिवार, समाज और राज्य के मुखिया को कहीं न कहीं अपने आश्रितों को बचाने के लिये दंड का उपयोग करना ही पड़ता है।  अगर वह इस दंड का उपयोग नहीं करेगा तो उसके आश्रित या प्रजाजन उसे कायर मानकर घृणा करने लगते हैं।  कहा जाता है कि योगियों को क्षमाक्षील होना चाहिये पर हमारी प्राचीन कथायें इस बात का प्रमाण हैं कि समय आने पर वही कोमल भाव वाले योगी अपने भक्तों और शिष्यों के लिये उग्र रूप धारण करते हुए अपराधियों को दंडित करते हैं। 
जिस परिवार, समाज या राज्य का मुखिया  अपराधियों और हिंसक तत्वों को क्षमा करता है या उनकी अनदेखी में भलाई समझता है वह शीघ्र नष्ट हो जाता है। उसके समूह या राज्य के विरोधी उसके आश्रित या प्रजा को लक्ष्य नहीं करते बल्कि उनका लक्ष्य मुखिया ही होता है।  फिर उसके विरोधी आंतरिक विरोधियों को सबसे पहले मैदान में उतारते हैं इसलिये समझदार मुखिया को चाहिये कि वह अंतर्विरोधियों का समूल नाश करे।
ऐसे आंतरिक शत्रु जो प्रजा में भय करते हुए विचरते हैं उनकी अनदेखी करना खतरे से खाली नहीं है।  जिस परिवार, समाज, या राज्य का प्रमुख अपने आंतरिक खतरों की अनदेखी करता है वह कायर मान लिया जाता है और उसके आश्रित प्रजाजन ही उसका सम्मान नहीं करते। अहिंसा का सिद्धात केवल अपने निजी जीवन में लागू किया जा सकता है पर जहां सार्वजनिक विषय हो वहां दंड का उपयोग करना चाहिये अन्यथा परिवार, समाज तथा राज्य में असंतोष का परिणाम मुखिया को भोगना पड़ता है। राज्य या परिवार में उत्पाती तत्वों से सख्ती से निपटना ही एक सर्वश्रेष्ठ उपाय है। 

 

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Friday, May 21, 2010

भर्तृहरि नीति शतर्क-मणि होने के बावजूद विषधर से कोई प्रेम नहीं करता




भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि
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आरंभगुर्वी क्षयिणी क्रमेण लघ्वी पुरा वृद्धिमति च पश्चात्।
दिनस्य पूर्वाद्र्धपराद्र्ध-भिन्ना छायेव मैत्री खलसज्जनानाम्।।
            हिंदी में भावार्थ-जिस तरह दिन की शुरूआत में छाया बढ़ती हुई जाती है और फिर उत्तरार्द्ध  में धीरे-धीरे कम होती जाती है। ठीक उसी तरह सज्जन और दुष्ट की मित्रता होती है।
दुर्जनः परिहर्तवयो विद्ययाऽलङ्कृतोऽपि सन्।
मणिनाः भूषितः सर्पः किमसौ न भयंकर।।
     हिंदी में भावार्थ-कोई दुर्जन व्यक्ति विद्वान भी हो  तो उसका साथ छोड़ देना चाहिए। विषधर में मणि होती है पर इससे उससे उसका भयंकर रूप प्रिय नहीं हो जाता।
            वर्तमान संदर्भ में सम्पादकीय व्याख्या-सज्जन व्यक्तियों से मित्रता धीरे-धीरे बढ़ती है और स्थाई रहती है। सज्जन लोग अपना स्वार्थ न होने के कारण बहुत शीघ्र मित्रता नहीं करते पर जब वह धीरे-धीरे आपका स्वभाव समझने लगते हैं तो फिर स्थाई मित्र हो जाते हैं-उनकी मित्रता ऐसे ही बढ़ती है जैसे पूर्वाद्ध में सूर्य की छाया बढ़ती जाती है। इसके विपरीत दुर्जन लोग अपना स्वार्थ निकालने के लिए बहुत जल्दी मित्रता करते हैं और उसके होते ही उनकी मित्रता वैसे ही कम होने लगती है जैसे उत्तरार्द्ध  में सूर्य का प्रभाव कम होने लगता है। पड़ौस तथा कार्यस्थलों में हमारा संपर्क अनेक ऐसे लोगों से होता है जिनके प्रति हमारे हृदय में क्षणिक आत्मीय भाव पैदा हो जाता है। वह भी हमसे बहुत स्नेह करते हैं पर यह यह संपर्क नियमित संपर्क के कारण मौजूद हैं।  उन कारणों के परे होते ही-जैसे पड़ौस छोड़ गये या कार्य का स्थान बदल दिया तो-उनसे मानसिक रूप से दूरी पैदा हो जाती है।  इस तरह यह बदलने वाली मित्रता वास्तव में सत्य नहीं होती। मित्र तो वह है जो दैहिक रूप से दूर होते भी हमें स्मरण करता है और हम भी उसे नहीं भूलते। इतना ही नहीं समय पड़ने पर उनसे सहारे का आसरा मिलने की संभावना रहती है।  अतः स्थितियों का आंकलन कर ही किसी को मित्र मानकर उससे आशा करना चाहिये।जहां तक हो सके दुष्ट और स्वार्थी लोगों से मित्रता नहीं करना चाहिये जो कि कालांतर में घातक होती है।
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Thursday, May 20, 2010

संत कबीर दास के दोहे-प्रेम की फसल किसी खेत में नहीं होती (sant kabir das ke dohe-khet men prem nahin ugta)

यह तो घर है प्रेम का, ऊंचा अधिक इकंत
शीश काटि पग तर धरै, तब पैठ कोई संत
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि प्रेम का घर तो ऊंचे स्थान और एकांत में स्थित होता है जब कोई इसमें त्याग की भावना रखता है तभी वहां तक कोई पहुंच सकता है। ऐसा तो कोई संत ही हो सकता है।
प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट विकाय
राजा परजा जो रुचे, शीश देय ले जाय
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि किसी खेत में प्रेम की फसल नहीं होती न किसी बाजार में यह मिलता है। जिसे प्रेम पाना है उसे अपने अंदर त्याग की भावना रखनी चाहिए और इसमें प्राणोत्सर्ग करने को भी तैयार रहना चाहिए।
वर्तमान संदर्भ में सम्पादकीय व्याख्या-लोग कहते हैं कि ‘अमुक से प्रेम करते हैं’ या ‘अमुक हमसे प्रेम करता है’। यह वास्तव में बहुत बड़ा भ्रम हैं। सच देखा जाये तो अपने जिनके साथ हमारे स्वार्थों के संबंध हैं उनसे हमारा प्रेम तो केवल दिखावा है। प्रेम न तो किसी को दिखाने की चीज है न बताने की। वह तो एकांत में अनुभव करने वाली चीज है। ध्यान लगाकर उस परमपिता परमात्मा का स्मरण करें तब इस बात का आभास होगा कि वास्तव में उसने प्रेम के वशीभूत होकर ही यह हमें मानव जीवन दिया है। उसका हमारे प्रति निष्काम प्रेमभाव है जो हमारे जीवन का रास्ता सहज बनाये देता है। जब हम इसी निष्काम भाव से उसका स्मरण करेंगे तब पता लगेगा कि वास्तव में प्रेम क्या है? जो लोग एक दूसरे के प्रति प्रेमभाव का दिखावा करते हैं व न केवल स्वयं भ्रमित होते है बल्कि दूसरे को भी भ्रमित करते हैं। सच बात तो यह है कि आजकल समाज में जिस प्रेम की चर्चा की जाती है वह केवल मनुष्य की वासनाओं से उपजा एक क्षणिक भाव है। सच्चा प्रेम तो निरंकार परमात्मा को किया जा सकता है।  परमात्मा प्रेम का सच्चा रूप है। जो इंसान परमात्मा से प्रेम करते हुए उसकी भक्ति करता है वही सभी से प्रेंम कर सकता है।  जो केवल मनुष्य से प्रेम करते हैं वह संकीर्णता से घिर जाते हैं और उनका लक्ष्य केवल अपना स्वार्थ तथा कामना की पूर्ति करना होता है।
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Friday, May 14, 2010

भर्तृहरि नीति शतक-दूसरों का मुंह ताकने से कोई लाभ नहीं

किं कन्दाः कन्दरेभ्यः प्रलयमुपगता निर्झरा वा गिरिभ्यः
प्रघ्वस्ता तरुभ्यः सरसफलभृतो वल्कलिन्यश्च शाखाः।
वीक्ष्यन्ते यन्मुखानि प्रस्भमपगतप्रश्रयाणां खलानां
दुःखाप्तसवल्पवित्तस्मय पवनवशान्नर्तितभ्रुलतानि ।।
हिंदी में भावार्थ- वन और पर्वतों पर क्या फल और अन्य खाद्य सामग्री नष्ट हो गयी है या पहाड़ों से निकलने वाले पानी के झरने बहना बंद हो गये हैं? क्या वृक्षों से रस वाले फलों की शाखायें नहीं रहीं हैं। उनसे तो तन ढंकने के लिये वल्कल वस्त्र भी प्राप्त होते हैं। ऐसा क्या कारण है कि गरीब लोग उन अहंकारी और दुष्ट लोगों की और मुख ताकते हैं जिन्होंनें थोड़ा धन अर्जित कर लिया हैं।
वर्तमान संदर्भ में संक्षिप्त संपादकीय व्याख्या-यह तो प्रकृति का ही कुछ रहस्य है कि माया सभी के पास समान नहीं रहती। जन्म तो सभी एक तरह से लेते हैं पर माया के आधार पर ही गरीब और अमीर का श्रेणी तय होती है। वैसे प्रकृति ने इतना सभी कुछ बनाया है कि आदमी अगर आग न भी जलाये तो भी उसका    पेट भरने का काम चल जाये। तमाम तरह के रसीले फल पेड़ पर लगते हैं पहाड़ों से निकलने वाले झरने पानी देते हैं पर मनुष्य का मन भटकता है केवल उन भौतिक पदार्थों में जो न खाने के काम आते हैं न पीने के। सोना चांदी रुपया और तमाम तरह के अन्य पदार्थ वह संग्रह करता है जो केवल मन के तात्कालिक संतोष के लिये होते हैं। जिनके पास थोड़ा धन आ जाता है गरीब आदमी उसकी तरफ ही ताकता है कि काश इतना धन मुझे भी प्राप्त होता। या वह इस प्रयास में रहता है कि उस धनी से उसका संपर्क बना जाये ताकि समाज में उसका सम्मान बने भले ही उससे कोई आर्थिक लाभ न हो-जरूरत पड़ने पर सहायता की भी आशा वह करता है।
ऐसे विचार हमारे अज्ञान का परिचायक होते हैं। हमें इस प्रकृति की तरफ देखना चाहिये जिसने इतना सब बनाया है कि कोई आदमी दूसरे की सहायता न करे तो भी उसका काम चल जाये। ऐसे में धनिक लोगों की तरफ मूंह ताक कर अपने अंदर कुंठा नहीं पालना चाहिये। 
कागज के बने नोट या सोने, चांदी तथा हीरे मोती का संग्रह करने वाले अमीर जरूर कहलाते हैं पर इनसे पेट नहीं भरता। पेट भरने तथा तन ढंकने के लिये तो प्रकृति द्वारा उत्पन्न पदार्थ ही आवश्यक होते हैं।  अगर मनुष्य अपना पेट भरने में स्वयं सक्षम हैं तो वह सबसे बड़ा अमीर है उसे किसी का मुंह ताकने की आवश्यकता नहीं है।  इसके अलावा जो अपनी आवश्यकताऐं सीमित रखते हैं वह स्वतंत्र रूप से रह पाते हैं जहां किसी ने अपनी चादर से पांव बाहर निकाला वहां दूसरे से ऋण लेकर उसका गुलाम बनना पड़ता।  
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Wednesday, May 12, 2010

चाणक्य दर्शन-धैये हो तो धनाभाव संकट नहीं बनता (dhiraj hi dhan hai-chankya neeti)

दरिद्रता श्रीरतया विराजते कुवस्त्रता शुभ्रतया विराजते।
कदन्नता चोष्णतया विराजते कुरूपता शीतया विराजते।।
हिंदी में भावार्थ-
अगर मनुष्य में धीरज हो तो गरीबी की पीड़ा नहीं होती। घटिया वस्त्र धोया जाये तो वह भी पहनने योग्य हो जाता है। बुरा अन्न भी गरम होने पर स्वादिष्ट लगता है। शील स्वभाव हो तो कुरूप व्यक्ति भी सुंदर लगता है।
अधमा धनमिच्छन्ति मानं च मध्यमाः।
उत्तमा मानमिच्छन्ति मानो हि महतां धनम्।।
हिंदी में भावार्थ-
अधम प्रकृत्ति का मनुष्य केवल धन की कामना करता है जबकि मध्यम प्रकृत्ति के धन के साथ मान की तथा उत्तम पुरुष केवल मान की कामना करते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस विश्व में धन की बहुत महिमा दिखती है पर उसकी भी एक सीमा है। जिन लोगों के अपने चरित्र और व्यवहार में कमी है और उनको इसका आभास स्वयं ही होता है वही धन के पीछे भागते हैं क्योंकि उनको पता होता है कि वह स्वयं किसी के सहायक नहीं है इसलिये विपत्ति होने पर उनका भी कोई भी अन्य व्यक्ति धन के बिना सहायक नहीं होगा। कुछ लोग ऐसे होते हैं जो अपने ऊपर यकीन तो करते हैं पर फिर भी धन को शक्ति का एक बहुत बड़ा साधन मानते हैं। उत्तम और शक्तिशाली प्रकृत्ति के लोग जिन्हें अपने चरित्र और व्यवहार में विश्वास होता है वह कभी धन की परवाह नहीं करते।
धन होना न होना परिस्थितियों पर निर्भर होता है। यह लक्ष्मी तो चंचला है। जिनको तत्व ज्ञान है वह इसकी माया को जानते हैं। आज दूसरी जगह है तो कल हमारे पास भी आयेगी-यह सोचकर जो व्यक्ति धीरज धारण करते हैं उनके लिये धनाभाव कभी संकट का विषय नहीं रहता। जिस तरह पुराना और घटिया वस्त्र धोने के बाद भी स्वच्छ लगता है वैसे ही जिनका आचरण और व्यवहार शुद्ध है वह निर्धन होने पर भी सम्मान पाते हैं। पेट में भूख होने पर गरम खाना हमेशा ही स्वादिष्ट लगता है भले ही वह मनपसंद न हो। इसलिये मन और विचार की शीतलता होना आवश्यक है तभी समाज में सम्मान प्राप्त हो सकता है क्योंकि भले ही समाज अंधा होकर भौतिक उपलब्धियों की तरफ भाग रहा है पर अंततः उसे अपने लिये बुद्धिमानों, विद्वानों और चारित्रिक रूप से दृढ़ व्यक्तियों की सहायता आवश्यक लगती है। यह विचार करते हुए जो लोग धनाभाव होने के बावजूद अपने चरित्र, विचार और व्यवहार में कलुषिता नहीं आने देते वही उत्तम पुरुष हैं। ऐसे ही सज्जन पुरुष समाज में सभी लोगों द्वारा सम्मानित होते हैं।
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Sunday, May 9, 2010

रहीम के दोहे-सीधी चाल से ही किसी का दिल जीता जा सकता (sidhi chal se dil jeeten-rahim ke dohe)

प्रेम पंथ ऐसी कठिन, सब कोउ निबहत नाहिं
रहिमन मैन-तुरगि बढि, चलियो पावक माहिं
कविवर रहीम कहते हैं कि प्रेम का मार्ग ऐसा दुर्गम हे कि सब लोग इस पर नहीं चल सकते। इसमें वासना के घोड़े पर सवाल होकर आग के बीच से गुजरना होता है।
फरजी सह न ह्म सकै गति टेढ़ी तासीर
रहिमन सीधे चालसौं, प्यादा होत वजीर
कविवर रहीम कहते हैं कि प्रेम में कभी भी टेढ़ी चाल नहीं चली जाती। जिस तरह शतरंज के खेल में पैदल सीधी चलकर वजीर बन जाता है वैसे ही अगर किसी व्यक्ति से सीधा और सरल व्यवहार किया जाये तो उसका दिल जीता जा सकता है।
आज के संदर्भ में व्याख्या-आजकल जिस तरह सब जगह प्रेम का गुणगान होता है वह केवल बाजार की ही देन है जो युवक-युवतियों को आकर्षित करने तक ही केंद्रित है। उसे प्रेम में केवल वासना है और कुछ नहीं है। सच्चा प्रेम किसी से कुछ मांगता नहीं है बल्कि उसमें त्याग किया जाता है। सच्चे प्रेम पर चलना हर किसी के बस की बात नहीं है। प्रेम में कुछ पाने का आकर्षण होतो वह प्रेम कहां रह जाता है। सच तो यह है कि लोग प्रेम का दिखावा करते हैं पर उनके मन में लालच और लोभ भरा रहता है। लोग दूसरे का प्यार पाने के लिये चालाकियां करते हैं जो कि एक धोखा होता है।
आजकल हम देख रहे हैं कि प्रेम के नाम पर अनेक लोग धोखे का शिकार हो रहे हैं। दरअसल फिल्म और टीवी चैनलों पर आज के युवक और युवतियों की यौन भावनाओं को भड़काया जा रहा है। अनेक ऐसी बेसिर पैर की कहानियां दिखाई जाती हैं जिनका यथार्थ के धरातल पर कोई आधार नहीं मिलता। केवल शादी तक तक ही लिखी गयी कहानियां गृहस्थी के यथार्थो का विस्तार नहीं दिखाती। इनको देखकर युवक युवतियां प्यार की कल्पना तो करते हैं पर उसके बाद का सच उनके सामने तभी आता है जब वह गल्तियां कर चुके होते हैं।
इतना ही नहीं कई प्रेम कहानियों में तो लड़कों को छल कपट से लड़कियों को अपने प्यार के जाल मेें फंसाते हुए दिखाया जाता है। इन कहानियों के दृश्य देखकर अनेक युवक युवतियां भ्रमित होकर उसी राह पर चलते है। इस तरह के प्रचार को समझने की जरूरत है।
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संकलक, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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Tuesday, May 4, 2010

मनु दर्शन-आत्म नियंत्रित कार्य ही करें (atmanilantri kam karen-manu darshan in hindi)

सर्वे परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम्।
एतद्विद्यात्समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः।।
हिन्दी में भावार्थ-
जो कार्य दूसरे के अधीन है वह दुःखदायी होता है। जिस काम पर अपना पूरी तरह से नियंत्रण हो उसी से ही सुख मिलता है। यही सुख और दुःख का लक्षण है।
यत्कर्मकुर्वतोऽस्य स्यात्परितोषोऽन्तरात्मनः।
तत्प्रयतनेन कुर्वीत विपरीतं तु वर्जयेत्।
हिन्दी में भावार्थ-
जिस काम को करने से मन और अंतरात्मा को शांति मिलती हो वही करना चाहिए। जिससे इसके विपरीत स्थिति हो तो उस काम को त्याग देना चाहिए।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जब भी हमारे सामने कोई कार्य उपस्थित होता है तो उसके परिणामों, प्रकृति तथा स्वरूप पर अवश्य विचार करना चाहिए। कभी कोई कार्य दबाव या परप्रेरणा से नहीं करना चाहिऐ। इसके अलावा जो कार्य पूरे या आंशिक रूप से दूसरे पर निर्भर हो उसे अपने हाथ में न लें तो ही अच्छा। क्योंकि तब लक्ष्य की प्राप्ति दूसरे की गतिविधि पर निर्भर हो जाती है। अनेक बार ऐसा भी होता है कि दूसरा आदमी अगर अंदर ही अंदर द्वेष रखता है तो वह जानबूझकर उस काम का अपना पूरा या आंशिक दायित्व नहीं निभाता तब अपना लक्ष्य या अभियान संकट में पड़ जाता है।
इसके अलावा किसी भी कार्य को करते हुए इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि उससे अपने मन और अंतरात्मा को संतोष मिलेगा या नहीं। जिस काम को करने से मन और अंतरात्मा में क्लेश होता हो उससे करने का विचार ही छोड़ दें तो ही अच्छा होगा। कहने का अभिप्राय यह है कि अपने हाथ से किये जाने वाले कार्यों पर विचार करना चाहिए ताकि उनके परिणामों को लेकर बाद में पछताना न पड़े। बुद्धिमान व्यक्ति किसी भी काम को करने से पहले उसके हर पहलू पर विचार कर लेते हैं। बिना विचारे काम करने से उसका परिणाम प्राप्त नहीं होता कहीं कहीं वह बुरा भी निकलता है।
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संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Friday, April 30, 2010

रहीम संदेश-मनुष्य नाचता है कठपुतली की तरह (manushya kathputli hai-rahim sandesh)

ज्यों नाचत कठपूतरी, करम नचावत गात
अपने हाथ रहीम ज्यों, नहीं आपुने हाथ
कविवर रहीम कहते हैं कि जैसे नट कठपुतली को नचाता है वैसे ही मनुष्य को उसके कर्म नाच करने के लिऐ बाध्य करते हैं। जिन्हें हम अपने हाथ समझते हैं वह भी अपने नियंत्रण में नही होते हैं।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-जब हम  रहीम के दोहे देखते हैं तो सोचते हैं  कि इस संत ने जीभर कर जीवन का आनंद लिया होगा क्योंकि उन्होंने जीवन के रहस्यों को समझ लिया और भ्रमों से परे रही । किसी प्रकार के भ्रम में नहीं जीना ही मनुष्य की पहचान है और रहीम हमेशा सत्य के साथ जिये।  अज्ञानी लोग किस तरह भ्रम में जीवन गुजरते हैं   यह उनके दोहे पढ़कर समझा जा सकता है। सभी लोग और आपको कर्ता समझते है जबकि सभी जीवों का शरीर पांच तत्वों से बना वह पुतला है जिसमें तीन प्रकृतियां-मन, बुद्धि और अहंकार -अपना काम करती हैं। आंख है तो देखेगी, कान है तो सुनेंगे, नाक है तो सूंघेगी, पांव है तो चलेंगे और हाथ हैं तो हिलेंगे। मन विचार करता है, बुद्धि योजना बनाती है और अहंकार उकसाता है। हम सोचते हैं कि हम करते हैं जबकि हम तो एक तरह से सोये हुए हैं। अपने आपको देखते ही नहीं। हमारी आत्मा तो परमार्थ से प्रसन्न होती है पर हम अपने कर्मों के अधीन होकर स्वार्थ में लगे रहते हैं जबकि यह काम तो हमारी इंद्रियां तब भी करेंगी जब इन पर नियंत्रण करेंगे। मतलब हम जो कर रहे हैं वह तो करेंगे ही पर जो हमें करना चाहिए परमार्थ वह करते नहीं। सत्संग और भक्ति केवल दिखावे की करते है। कुल मिलाकर कठपुतली की तरह नाचते रहते हैं।
हमने काम, क्रोध,.मोह, लोभ, तथा अहंकार का भाव नाचता है पर हम सोचते हैं कि हम अपने विवेक से चल रहे हैं। आवश्यकताओं की पूर्ति तथा भौतिक संपन्नता को जीवन का ध्येय बना लेते  हैं।
संकलक,लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Monday, November 16, 2009

भर्तृहरि शतक-सज्जनता का व्रत किसने बताया (hindu dharm sandesh-sjjanta ka vrat)

प्रदानं प्रच्छन्नं गृहमुपगते सम्भ्रमविविधः प्रिय कृत्वा मौनं सदसि कथनं चाप्युपकृते।
अनुत्सेको लक्ष्म्यांनभिभवगन्धाः परकथाः सतां केनोद्दिष्टं विषमसिधाराव्रतमिदम्।।
हिंदी में भावार्थ-
गुप्त दान देना, घर पर आये मेहमान का सम्मान करना, दूसरे का काम कर चुप रहना, अन्य के उपकार को समाज में सभी को बताना। धन वैभव पाकर भी गर्व न करना, दूसरों की कभी निंदा न करना जैसे गुणों का अपनाना तलवार के धार पर चलने जैसा व्रत है। यह व्रत सज्जन पुरुषों को किसने बताया है?
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अधिकतर मनुष्य तो दान देकर प्रचार करते, घर आये मेहमान को दुत्कारते, दूसरे का काम करते कम गाते अधिक हैं। इससे भी अधिक यह है कि दूसरा उपकार करे तो उसे तो सुनाते नहीं बल्कि उसका काम अपने नाम से दिखाते हैं। जिसे देखो वही दूसरों की निंदा में व्यस्त है।
दरअसल सज्जनता का व्रत कठोर होता है जिसका पालन हर कोई नहीं करता। अधिकतर लोग बहिर्मुखी होकर आत्मप्रचार करते हुए निम्नकोटि का व्यवहार करते हैं। स्थित यह है कि अब तो सम्मान उसी आदमी का रह गया जिसके पास धन, पद और बाहुबल है। उनके नाम पर ही सारे श्रेष्ठ कार्य दर्ज किये जाते हैं भले ही काम उनके मातहतों ने किया हो। इतना ही नहीं गरीब और आम इंसान द्वारा किये गये कार्य को समाज को सुनाने में बड़े लोग संकोच करते हैं चाहे भले ही उनका कितना भी हित उससे हुआ हो।
यही कारण है कि हमारा समाज जड़ हो गया है। हर क्षेत्र में वंशवाद का बोलबाला है। स्थापित वंश केवल आत्मप्रचार कर रहे हैं कि वही श्रे्रष्ठ है। आम इंसान के कार्य को तो मामूली मान लिया जाता है। क्या साहित्य, क्या फिल्म और क्या पत्रकारिता, सभी में स्तुति गान हो रहे हैं पर रचनाधर्मिता के नाम पर सब जगह शून्य है। कहते हैं कि फिल्म अच्छी नहीं बनती? कहानी अच्छी नहीं लिखी जा रही । देश में कोई अविष्कार नहीं हो रहा। किसी भी विषय में सजावट का काम आम इंसान करता है पर हमारे समाज की प्रवृत्ति है कि वह उपलब्धि का आधार पहले से प्राप्त परिलब्धियों के आधार पर तय करता है। यही इस समाज की जड़ता का कारण है।
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Sunday, November 15, 2009

रहीम के दोहे-लोग तो अपने मतलब के अनुसार नज़र रखते हैं (matlab aur nazar-rahim ke dohe in hindi)

स्वारथ रचत रहीम सब, औगुनहूं जग मांहि
बड़े बड़े बैठे लखौ, पथ रथ कूबर छांहि।।
कविवर रहीम कहते हैं कि लोग अपने स्वार्थ के अनुसार दूसरे में गुण और अवगुण ढूंढते रहते हैं। जो कभी अपना स्वाथ साधने के लिये रथ के हरसो को टेढ़ा मेढ़ी छाया को अशुभ कहते हैं वह लोग उसकी छाया में भी बैठ जाते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अगर आपको अपने जीवन में तरक्की करनी हैं तो फिर लोगों के कहने सुनने की परवाह छोड़ दो। लोग तो अपने स्वार्थ के अनुसार गुण और अवगुण देखते हैं। अगर आपका कार्य किसी के अनुकूल नहीं है तो वह कभी आपको उसे करने के लिये प्रेरित नहीं करेगा। यदि प्रतिकूल हुआ तो वह जमकर आलोचना करेगा। यह मनुष्य स्वभाव है। कभी कभी ऐसा भी होता है कि एक आदमी दूसरे की तरक्की को रोकने के लिये उसके लक्ष्य से भटकाते हुए अनेक दोष गिनाता है। जब कोई मनुष्य वास्तव में समाज सेवा के लिये प्रेरित होता है तो लोग उसे पागल तक कहते हैं। लोगों के कहने की परवाह करने वाले कभी भी विकास नहीं कर पाते। इसलिये जब आपने कोई लक्ष्य तय कर लिया है तो उस पर बढ़ चलिये। जब उसमें आपको सफलता मिलेगी तो वही लोग प्रशंसा कर आपकी छाया में बैठने का प्रयास करेंगे जिन्होंने आपकी आलोचना की थी। यह इस संसार की प्रकृति है कि वह गरीब को देता नहीं है और अमीर को सहन नहीं करता। गुणवान की गाता नहीं वरन् अवगुणी का बखान कर अपनी प्रशंसा कराना चाहता है। इसलिये अपने पथ पर चलते रहो। किसी की परवाह न करो।
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Saturday, November 14, 2009

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-शिक्षित व्यक्ति करता हैं सैंकड़ों शिकार (economics of kautilya ka -educated parson)

अशिक्षितनयः सिंहो हन्तीम केवलं बलात्।
तच्च धीरो नरस्तेषां शतानि जतिमांजयेत्।।
हिंदी में भावार्थ-
सिंह किसी नीति की शिक्षा लिये बना सीधे अपने दैहिक बल से ही आक्रमण करता है जबकि शिक्षित एवं धीर पुरुष अपनी नीति से सैंकड़ों को मारता है।
पश्यदिभ्र्दूरतोऽप्रायान्सूपायप्रतिपत्तिभिः।
भवन्ति हि फलायव विद्वादभ्श्वन्तिताः क्रिया।।
हिन्दी में भावार्थ-
विद्वान तो दूर से विपत्तियों को आता देखकर पहले ही से उसकी प्रतिक्रिया का अनुमान कर लेता है और इसी कारण अपनी क्रिया से उसका सामना करता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-सिंह बुद्धि बल का आश्रय लिये बिना अपने बल पर एक शिकार करता है पर जो मनुष्य ज्ञानी और धीरज वाला है वह एक साथ सैंकड़ों शिकार करता है। महाराज कौटिल्य का यह संदेश आज के संदर्भ में देखें तो पता लगता है कि हमारे देश में लोगों की समझ इसलिये कम है क्योंकि वह अपने अध्यात्मिक साहित्य आधुनिक शिक्षा में पढ़ाया नहीं जाता। अंग्रेज हिंसा से इस देश में राज्य नहीं कर पा रहे थे तब उन्होंने अपने विद्वान मैकाले का यह जिम्मेदारी दी कि वह कोई मार्ग निकालें। उन्होंने ऐसी शिक्षा पद्धति निकाली कि अब तो अंग्रेज ब्रिटेन में हैं पर अंग्रेजियत आज भी राज्य कर रही है। अब तलवारों से लड़कर जीतने का समय गया। अब तो फिल्म, शिक्षा, धारावाहिक, समाचार पत्र, किताबें तथा रेडियो से प्रचार कर भी सैंकड़ों लोगों को गुलाम बनाया जा सकता है। इनमें फिल्म और टीवी तो एक बड़ा हथियार बन गया है। आप फिल्में और टीवी की विषय सामग्रंी देखकर उसका मनन करें तो पता लग जायेगा कि जाति, धर्म, और भाषा के गुप्त ऐजेडे वहीं से लागू किये जा रहे हैं। फिल्म और टीवी वाले तो कहते हैं कि समाज में जो चल रहा है वही दिखा रहे हैं पर सच तो यह है कि उन्होंने अपनी कहानियों में ईमानदार लोगों का परिवार समेत तो हश्र दिखाया वह कहीं नहीं हुआ पर उनकी वजह से समाज डरपोक होता चला गया और आज इसलिये अपराधियों में सार्वजनिक प्रतिरोध का भय नहीं रहा। वजह यह थी कि इन फिल्मों में अपराधियों का पैसा लगता रहा था। फिल्मों के अपराधी पात्र गोलियों से दूसरों को निशाना बनाते थे पर उनको नायक के हाथ से पिटते हुए दिखाया गया। स्पष्टतः संदेश था कि आप अगर नायक नहीं हो तो आतंक या बेईमानी से लड़ना भूल जाओ। इस तरह समाज को डरपोक बना दिया गया और अब तो पूरी तरह से अपराधियों को महिमा मंडन होने लगा है।
अगर आप कभी फिल्म या टीवी धारवाहिकों की पटकथा तथा अन्य सामग्री देखें और उस पर चिंतन करें तो हाल पता लग जायेगा कि उसके पीछे किस तरह के प्रायोजक हैं? यह एक चालाकी है जो धनवान और शिक्षित लोग करते हैं। अंग्रेज लोग हमारे धार्मिक ग्रंथों को खूब पढ़ते रहे होंगे इसलिये उन्होंने एसी शिक्षा पद्धति थोपी कि उनसे यह देश अपनी प्राचीन विरासत से दूर हो जाये। अब क्या हालत है कि जो अंग्रेज जो कहें वही ठीक है। वह अपनी परंपराओं तथा भाषा के कारण आज भी यहां राज्य कर रहे हैं। उनकी दी हुई शिक्षा पद्धति यहां गुलाम पैदा करती है जो अंग्रेजों की सेवा के लिये वहां जाकर उनकी सेवा के लिये तत्पर रहते हैं।
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Monday, November 9, 2009

मनुस्मृतिः गाली का उत्तर गाली से नहीं देना चाहिए (gaalie ke badle gaali n den-hindi sandesh)

अति वादांस्तितिक्षेत नावमन्येत कञ्चन
न चेमं देहमाश्रित्य वैरं कुर्वीत केनचित्
न क्रुद्धयंन्तं प्रतिक्रुध्येदाक्रृष्टः कुशलं वदेत्
सप्तद्वाराऽवकीर्णां च न वाचमनृतां वदेत्


हिंदी में भावार्थ-दूसरे के कड़वे वचनों को सहना करना चाहिये। अभद्र शब्द (गाली)का उत्तर कभी वैसा ही नहीं देना चाहिये। न ही किसी का अपमान करना चाहिये। यह शरीर तो नश्वर है इसके लिये किसी से शत्रुता करना ठीक नहीं माना जा सकता।
अध्यात्मरतिरासीनो निरपेक्षो निरामिषः
आत्मनैव सहायेन सुखार्थी विचरेदिह

हिंदी में भावार्थ-अध्यात्म विषयों में अपनी रुचि रखते हुए सभी वस्तुओं और व्यक्तियों के प्रति निरपेक्ष भाव रखना चाहिये। इसके साथ ही शाकाहारी तथा इद्रियों से संंबंधित विषयो में निर्लिप्त भाव रखते हुए अपने अध्यात्म उत्थान के लिये अपने प्रयास करते रहना चाहिये। इससे मनुष्य सुखपूर्वक इस दुनियां में विचरण कर सकता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-खानपान और रहन सहन में आई आधुनिकता ने लोगों की सहनशीलता को कम कर दिया है। लोग जरा जरा सी बात पर उत्तेजित होकर झगड़ा करने पर आमादा है। स्वयं के पास कितना भी बड़ा पद,धन और वैभव हो पर दूसरे का सुख सहन नहीं कर पाते। गाली का जवाब गाली से देना के लिये सभी तत्पर हैं। अध्यात्म विषय के बारे में लोगों का कहना है कि उसमें तो वृद्धावस्था में ही जाकर दिलचस्पी रखना चाहिये। इस अज्ञानता का परिणामस्वरूप आदमी वृद्धावस्था में अधिक दुखी होता हैं। अगर बचपन से ही अध्यात्म में रुचि रखी जाये तो फिर बुढ़ापे में आदमी को अकेलापन नहीं सताता। जिसकी रुचि अध्यात्म में नहीं रही वह आदमी वृद्धावस्था में चिढ़चिढ़ा हो जाता है। ऐसे अनेक वृद्ध लोग हैं जो अपना जीवन शांतिपूर्वक व्यतीत करते हैं क्योंकि वह बचपन से मंदिर आदि में जाकर अपने मन की शुद्धि कर लेते हैंं और अध्यात्म विषयों पर चिंतन और मनन भी करते हैं।

बदले की भावना इंसान को पशु बना देती हैं और वह तमाम तरह के ऐसे अपराध करने लगता है जिससे समाज में उसे बदनामी मिलती है। कई लोग ऐसे हैं जो गाली के जवाब में गाली देकर अपने लिये शत्रुता बढ़ा लेते है। कुछ लोग ऐसे हैं जिनको अभद्र शब्द बोलने और लिखने में मजा आता है जबकि यह अंततः अपने लिये ही दुःखदायी होता है। अपने मस्तिष्क में अच्छी बात सोचने से रक्त में भी वैसे ही कीटाणु फैलते हैं और खराब सोचने से खराब। यह संसार वैसा ही जैसा हमारा संकल्प होता है। अतः अपनी वाणी और विचारों में शुद्धता रखना चाहिये। दूसरे के व्यवहार या शब्दों से प्रभावित होकर उनमें अशुद्धता लाना अपने आपको ही कष्ट देना है।
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