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Saturday, March 12, 2011

अच्छे लोगों से रिश्ते कायम करें-हिन्दू धार्मिक विचार (achche logon se rishta kayam karen-hindu dharmik vichar)

हम लोग सामाजिक तथा पारिवारिक नये संबंधों का निर्माण करते हुए अन्य व्यक्तियों के आचरण, विचार तथा व्यवहार के तौर तरीकों पर विचार नहीं करते। अब तो यह स्थिति यह हो गयी है कि लोग दादागिरी, गुंडागर्दी तथा बेईमान करने के लिये बदनाम लोगों को अपने साथ रखकर प्रसन्नता अनुभव करते हैं। अक्सर हमारे देश के लोग यह सवाल करते हैं कि देश में भ्रष्टाचार कम क्यों नहीं हो रहा? उत्तर में सरकार को दोष देकर चुप हो जाते हैं। सच बात तो यह है कि हमारे समाज में चेतना की कमी तथा वैचारिक आलस्य के परिणाम से ही देश में अपराध और भ्रष्टाचार बढ़ा है। इसके लिये सभी लोग जिम्मेदार है। सभी लोगों को एक दूसरे के बारे पता है कि कौन क्या करता है? कौन भ्रष्टाचारी है और कौन बेईमान? कौन तस्कर है कौन व्याभिचारी? मगर प्र्रेम, विवाह, सत्संग या नित्य कर्म के आधार पर संपर्क कायम करने वाले लोग यह देखने का प्रयास करते हैं कि किसका निज स्वरूप क्या है? यकीनन नहीं!
इस विषय पर मनु महाराज कहते हैं कि
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उत्तमैरुत्तमैर्नित्यं संबंधनाचरेत्सह।
निनीषुः कुलमुत्कर्षमधमानधर्मास्त्यजेत्।
"अपने परिवार की रक्षा तथा सम्मान में वृद्धि के लिये अच्छे परिवारों के साथ अपनी कन्या और पुत्र के संबंध बनाने चाहिए। खराब आचरण तथा धर्म विरोधी पुरुषों के परिवारों के साथ किसी प्रकार का संबंध स्थापित करना ठीक नहीं है।"
उत्तमानुत्तमान्गच्छन्हीनाश्च वर्जवन्।
ब्राम्हण श्रेष्ठतामेति प्रत्यावयेन शूद्रताम्।।
"श्रेष्ठ पुरुषों से संबंध जोड़ने और नीच तथा अधम पुरुषों से परे रहने वाले विद्वान की प्रतिष्ठा बढ़ जाती है। इसके विपरीत श्रेष्ठ लोगों की बजाय नीच पुरुषों से संबंध बनाने वाला मनुष्य और उसका कुल कलंकित हो जाता है।"
जब हम देश में नैतिक आचरण में आई गिरावट तथा संवेदनहीनता की बात करते हैं तो समाज या सरकार को कोसना सबसे आसान लगता है पर अगर हम अपना निज आचरण तथा वैचारिक दृढ़ता का अवलोकन करें तो यह साफ दिखाई देगा कि कहीं न कहीं हमारा स्वार्थपूर्ण जीवन तथा समाज के प्रति दायित्व बोध हीनता ही इसके लिये जिम्मेदार है। अगर हमने निजी रिश्ते बनाने में केवल किसी आदमी का धनपति, बाहूबली तथा उच्च पदस्था होन ही मान लिया है तब यह भी मान लेना चाहिए कि समाज में सम्मान पाने का मोह दूसरे लोगों को येनकेन प्रकरेण सफलता पाना रह जाना बुरा नहीं है। श्रेष्ठ और त्यागी पुरुषों के प्रति लोगों का उपेक्षा का भाव रहना इस बात के लिये सभी को प्रेरित करता है कि अधिक से अधिक उपलब्धि पाकर समाज में सम्मान प्राप्त किया जाये। ऐसे में देश में व्याप्त व्यवस्था में परिवर्तन की अपेक्षा तभी संभव है जब हम अपने विचारों में परिवर्तन किया जाये।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

Saturday, January 29, 2011

हमेशा बोलो और लिखो ‘बहुत बढ़िया’-हिन्दी चिंत्तन आलेख (hahesha bolo aur likho bahut badhiya or very nice-hindi chitan)

खुश रहना भी एक कला है जो हमारे अंतर्मन में विराजमान रहती है। हम अक्सर आपनी आखों से दूसरों के दोष देखने, कानों से दूसरे का अहित सुनने और वाणी से दूसरे के लिए निंदात्मक वाक्य कहने के आदी हो जाते हैं। यह आदत भले ही हमें अच्छी लगती है पर कालांतर में यह हमारे लिये मानसिक तनाव का ऐसा कारण बनर जाती है कि हमें कोई अच्छी चीज दिखाई नहीं देती। यहां तक सुखद वस्तुओं से स्वतः घृणा होने लगती है। हमारा स्वभाव नकारात्मक हो जाता है और इससे हम स्वयं ही नकारा हो जाते हैं।
आपने देखा होगा कि कुछ लोग हमेशा ही दूसरों से विनम्रता से पेश आते हैं और हमेशा ही अन्य लोगों को ‘बहुत अच्छा’ या ‘बहुत बढ़िया’ उनको प्रेरित करते हैं। भले ही लोग उनको चाटुकार या झूठा कहें पर सच यह है कि ऐसे लोग सकारात्मक विचाराधारा के होते हैं और अपनी जिंदगी आनंद से जीते हैं।
इस विषय पर मनु महाराज कहते हैं कि
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भद्र भद्रमिति ब्रूयाद् भ्रदमित्येव वा वदेत्।
शुष्कवैरं विवादं च न कुर्यात्केनचित्साह।।
‘‘सभ्य आदमी को हमेशा दूसरे के काम पर ‘बहुत बढ़िया‘ ‘बढ़िया’ ‘बहुत अच्छा’ या अच्छा जरूर बोलना चाहिये। किसी से व्यर्थ विवाद और शत्रुता नहीं करना चाहिये। न ही रूखा व्यवहार कर दूसरे को हतोत्तासहित करना चाहिये।’’
इस संसार में सभी लोग लोकप्रिय नहीं होते। कुछ तो अपने दृष्कृत्यों की वजह से निंदा का पात्र बनते हैं। अपने स्वार्थ में मस्त रहने वाले लोगों को कौन सम्मान देता है? समाज में वही मनुष्य लोकप्रिय होता है जो दूसरों को भी अच्छे काम के लिये प्रेरित करता है। इसलिये हमेशा ही हर पल दूसरे के काम पर उसकी प्रशंसा में बहुत अच्छा या अच्छा जरूर बोलना चाहिये। कहीं लिखकर किसी के कार्य की प्रशंसा करनी हो तो उसके लिये बहुत बढ़िया या बढ़िया शब्दों के उपयोग  की आदत डालना चाहिये। इससे न हमारा स्वभाव सकारात्मक होगा बल्कि दूसरों के बीच लोकप्रियता भी मिलेगी।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
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Sunday, November 14, 2010

विवाद न करना भी एक तरह से आसन-धार्मिक विचार (vivad n karna bhee ek tarah se asan-dharmik vichar)

क्षीणस्य चैव क्रमशो दैवात् पूर्वकृतेन वा।
मित्रस्य चानुरोधेन द्विविधं स्मृतमासनम्।।
हिन्दी में भावार्थ-
जब शक्ति क्षीण हो जाने पर या अपनी गलतियों के कारण चुप बैठना तथा मित्रों की बात का सम्मान करते हुए उनसे विवाद न करना यह दो प्रकार के शांत आसन हैं।
यदावगच्छेदायत्वयामाधिक्यं ध्रृवमात्मनः।
तदा त्वेचाल्पिकां पीर्डा तदा सन्धि समाश्चयेत्।।
हिन्दी में भावार्थ-
भविष्य में अच्छी संभावना हो तो वर्तमान में विरोधियों और शत्रुओं से भी संधि कर लेना चाहिए।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-किसी भी मनुष्य के जीवन में दुःख, सुख, आशा और निराशा के दौर आते हैं। आवेश और आल्हाद के चरम भाव पर पहुंचने के बाद किसी भी मनुष्य का अपने पर से नियंत्रण समाप्त हो जाता है। भावावेश में आदमी कुछ नहीं सोच पाता। मनु महाराज के अनुसार मनुष्य को अपने विवेक पर सदैव नियंत्रण करना चाहिये। जब शक्ति क्षीण हो या अपने से कोई गलती हो जाये तब मन शांत होने लगता है और ऐसा करना श्रेयस्कर भी है। अनेक बार मित्रों से वाद विवाद हो जाने पर उनके गलत होने पर भी शांत बैठना एक तरह से आसन है। यह आसन विवेकपूर्ण मनुष्य स्वयं ही अपनाता है जबकि अज्ञानी आदमी मज़बूरीवश ऐसा करता है। जिनके पास ज्ञान है वह घटना से पहले ही अपने मन में शांति धारण करते हैं जिससे उनको सुख मिलता है जबकि अविवेकी मनुष्य बाध्यता वश ऐसा करते हुए दुःख पाते हैं।
जीवन में ऐसे अनेक तनावपूर्ण क्षण आते हैं जब आक्रामक होने का मन करता है पर उस समय अपनी स्थिति पर विचार करना  चाहिए। अगर ऐसा लगता है कि भविष्य में अच्छी आशा है तब बेहतर है कि शत्रु और विरोधी से संधि कर लें क्योंकि समय के साथ यहां सब बदलता है इसलिये अपने भाव में सकारात्मक भाव रखते स्थितियों में बदलाव की आशा रखना चाहिए। कहने का अभिप्राय यह है कि हमेशा ही शांत होकर अपना काम करना चाहिए। शांत रहना भी एक तरह से आसन है।
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