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Wednesday, January 27, 2016

ट्विटर पर शनि शिंगणापुर में मंदिर में नारी प्रवेश आंदोलन-गर्व से कहो हम लोकतांत्रिक भी हैं-ट्विटर पर वाक्यांश (subject of women Entry in ShaniShingnapur)


             शनि शिंगणापुर मंदिर में महिलाओं को प्रवेश मिलना चाहिये पर अगर वहां के पुजारी यह नहीं चाहते तो उसके विरुद्ध सार्वजनिक आंदोलन करना भी ठीक नहीं हैं। मूलतः हिन्दू अध्यात्मिक ज्ञान स्त्री पुरुष की किसी प्रकार की पूजा निषेध नहीं करता पर ज्ञानी का यह काम नहीं है कि वह दूसरे के कर्मकांडों पर प्रतिकूल टिप्पणी करे। वैसे शनिशिंगणापुर मंदिर में प्रवेश के लिये हो रहे महिला आंदोलन से हिन्दू धर्म की प्रतिष्ठा बढ़ ही रही है।  यह इस बात का प्रमाण है कि हमारे समुदाय में नारियों के लिये भी स्वाभाविक लोकतंत्र है। शनिशिंगणापुर  में नारी प्रवेश के लिये आंदोलन से हिन्दू को विचलित न हों। खुश हों कि हमारे समुदाय में दूसरों की अपेक्षा ज्यादा जागरुकता है। हिन्दू समुदाय में नारियां अपने धार्मिक भेदभाव के विरुद्ध आंदोलन भी कर सकती हैं। अन्य समुदायों से श्रेष्ठ होने का यह एक बड़ा प्रमाण है। अध्यात्मिक योग व ज्ञान साधक के रूप में हमारी राय है कि शनिशिंगणापुर में हेलीकाप्टर से प्रवेश का नाटक रोके नहीं। हमारी धार्मिक सहिष्णुता का प्रमाण होगा। हिन्दू धर्म अपने प्राचीन तत्वज्ञान के कारण इतना शक्तिशाली है कि वह मंदिर में प्रवेश करने या न करने के नाटकों से खतरे में नहीं आता।

हिन्दू समुदाय की महिलायें अपने दायरे में ही तो आंदोलन करेंगी उन्हें दूसरे समुदायों के अंधविश्वासों के विरुद्ध लड़ने के लिये कहना ठीक नहीं। हमें दूसरे समुदायों के अंधविश्वासों पर टिप्पणी करने की बजाय स्वयं अपने ज्ञान के प्रति विश्वास जगाना चाहिये। शनिशिंगणापुर में नारी प्रवेश के लिये आंदोलन करने वालों को दूसरे समुदायों के उदाहरण बताकर मौन रहने के लिये कहना गलत। दिलचस्प! शनिशिंगणपुर में  नयी व पुरानी विचाराधारा की हिन्दू समुदाय की महिलाओं के बीच वाक्युद्ध! गर्व से कहो हम लोकतांत्रिक भी हैं। शनिशिंगणापुर में नारी प्रवेश के आंदोलन को धर्म पर हमला नहीं वरन् अपने लोकतांत्रिक होने का प्रमाण समझकर गर्व करें। प्रगतिशील व जनवादी विद्वान शनिशिंगणापुर में नारी प्रवेश आंदोलन पर न फुदकें क्योंकि उनके प्रिय  धर्म के प्रमुख स्थान में तो महिलायें जाने की सोचती भी नहीं।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
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Wednesday, November 11, 2015

अनुपम खेर के सहिष्णुता मार्च पर ट्विटर (Twitter on Subject march of Anupam Kher) MarchForIndia


            अनुपमखेर के नेतृत्व में देश की प्रतिष्ठा खराब करने वालों के प्रतिकूल  किये गये प्रदर्शन को सहिष्णुता मार्च कहना चाहिये। अनुपमखेर में नेतृत्व में निकलने वाले भारत के लिये मार्च पर सकारात्मक रुख अपनाते हुए उनकी प्रशंसा करना चाहिये। अब यह सवाल तो पूछा ही जायेगा कि एक अभिनेता को देश में असहिष्णु माहौल कैसे दिखेगा जबकि दूसरा उसे नकार रहा है। देश के असहिष्णु माहौल के प्रचार का उत्तर भारत के लिये मार्च से दिया जाना इस बात का प्रमाण है कि देश लोकतांत्रिक रूप से सहिष्णु व परिपक्व है। असहिष्णु वातावरण के प्रचार का भारत के लिये मार्च से जवाब! अनुपम खेरजी की बौद्धिक योजना का जवाब नहीं! इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत के लिये मार्च में एकत्रित भीड़ ने भारत की सहिष्णुता की मर्यादित सीमा भी बता दी है। समस्या यह है कि प्रगतिशील और जनवादी शैली की रचनाओं को राज्य प्रबंध से समर्थन नहीं मिलने वाला। यह कुछ रचनाकार सहन नहीं कर पा रहे।
                                   अनुपमखेर के नेतृत्व में बुद्धिजीवियों के  सहिष्णुता मार्च से भारत की अंतर्राष्ट्रीय पटल पर प्रतिष्ठा बढ़ती है तो अच्छी बात होगी। अनुपम मार्च से  एक बात तय हो गयी कि बौद्धिक दृष्टि से भी सुविधानुसार घटनाओं पर राय कायम की जा सकती है। आपकीबात अनुपम मार्च यह ट्विटर  दिखाई दिया।

भारत में सहिष्णुता के प्रश्न उठाकर कथित बुद्धिमानों ने प्रचार में नाम जरूर पाया पर उनकी छवि देशविरोधी बन रही है। अब तो यह सवाल दिमाग में आता है कि सहिष्णुता का मसला उठाने के पीछे असली वजह क्या है? पर्दे के पीछे का राज बाहर आना चाहिये। आप जोर से चिल्लायें तो यह अभिव्यक्ति का अधिकार है, पर लोग सुनने से इंकार कर दें तो मानना पड़ेगा कि समाज सहिष्णु है। आप चिल्लाकर बोलें यह अभिव्यक्ति का अधिकार है, उसे कोई न सुने यह यह समाज की असहिष्णुता का प्रमाण नहीं हो सकता। समाज में जागरुकता बढ़ी पर चेतना कम हुई है अब कोई कहे तो कहता रहे कि  असहिष्णुता बढ़ी है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
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Monday, November 2, 2015

दक्षिणपंथी और राष्ट्रवादी लेखकों को सम्मान देना आवश्यक(Rashtrawadi Dakishinpanthi Lekhkon ko Samman Dena Awashyak)


                                   इंटरनेट पर अनेक दक्षिणंपथी राष्ट्रवादी लेखक सक्रिय हैं, इस दीपावली पर सम्मानित कर जनमानस के हृदय पटल पर स्थापित किया जाये। हम जैसे अध्यात्मिकवादी लेखक मानते हैं कि इससे सम्मान वापसी कर रहे कथित बुद्धिजीवियों के प्रचार को चुनौती दी सजा सकती है।  इनमें से अनेक तो ऐसे हैं जिनके ब्लॉग है जिनमें किसी सामान्य पुस्तक से अधिक रचनायें हैं। यह लोग निष्काम भाव से काम करते हैं। सबसे बड़ी बात यह कि उन्हें अब वैसे ही प्रोत्साहन की आवश्यकता है जैसा कि उनके अनुसार ही जनवादियों और प्रगतिशीलों को मिलता है। इनमें से कुछ लोग सम्मान मिलने पर राष्ट्रीय प्रचार पटल पर आ जायेंगे तो उन्हें अपनी बात कहने के लिये व्यापक क्षेत्र मिलेगा। इससे परंपरागत प्रकाशन जगत का महत्व भी कम होगा और वहां लिख कर सम्मानित लोगों का महत्व भी अधिक नहीं रहेगा।
                                   हम अध्यात्मिकवादी लेखक है अंतप्रेरणा से लिख लेते हैं पर दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी लेखकों राजसी समर्थन की आवश्यकता प्रतीत हो।  प्रचार माध्यमों में जो सार्वजनिक  बहस होती है वह राजसी कर्म की श्रेणी के होते हैं।  हमारा मानना है कि राजसी कर्म राजसी बुद्धि और साधनों से संपन्न होते हैं। वहां सात्विक तत्व ढूंढना या रखते हुए दिखना स्वयं को धोखा देना है। राजसी कर्म में जस की तस नीति अपनाना ही श्रेयस्कर है। इन दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी लेखकों को अपना अभियान जारी रखने के लिये राजसी समर्थन की आवश्यकता है-यह हमारा विचार है। यहां यह भी स्पष्ट कर दें कि हमारा इसमें कोई निजी स्वार्थ नहीं है। न ही हमारा सम्मान पाने के लिये कोई ऐसा लिख रहे हैं।  हां, यह सही है कि दक्षिणपंथी  राष्ट्रवादी लेखकों से अपनी रचनाओं की वजह से करीबी रही है पर इसका मतलब यह नहीं है कि हमारा  उनमें स्वार्थ है।
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Sunday, October 11, 2015

विशेष रविवारीय दीपकबापू वाणी (Super Sundya Deepak Bapu Wani)


तरक्की के पहिये बड़े भारी, रास्ते जाम हो ही जाते हैं।
दीपकबापूभूख से बड़ी लालच, सस्ते काम हो ही जाते हैं।।
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भ्रष्ट इंसान की खोज जारी है, बेफिक्र हैं जिनकी नहीं बारी है।
दीपकबापूविकास की चमक में, काली माया का खेल जारी है।।
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राजसी कर्म में शुद्ध भाव की आस, जैसे बिना इक्के की तास।
दीपकबापू चले पवित्रता की राह, विरले ही करते जगत में वास।।
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Friday, September 25, 2015

ट्विटर पर भारतीय दर्शन पर लिखी गयी सामग्री (Twitter on bhartiya darshan-New post


                                   भारतीय प्राचीन ज्ञान की प्रशंसा व उसके अनुयायी होने का दावा करना तब तक व्यर्थ है जब तक हम पाश्चात्य राज्य प्रबंध नीति अपनाते हैं। जब हम यह कहते हैं कि हमारे प्राचीन ग्रंथ ज्ञान का भंडार है तब प्रगतिशील विद्वान देश के राज्यप्रबंध की कमियां दिखाकर सवाल करते हैं। हमारा अध्यात्मिक दर्शन व्यक्ति में सहजभाव के निर्माण के साथ राज्य प्रबंध के वैज्ञानिक सिद्धांतों से भरा है पर उस पर नहीं चलते। अगर हम भारतीय अध्यात्मिकवादी होने का दावा करते हैं तो यह भी आवश्यक है कि हम उसमें राज्य प्रबंध की बतायी गयी नीतियों भी पर चलें।  हम बात तो अपने प्राचीद दर्शन की करते हैं जबकि जबकि हमारा राज्य  पाश्चात विचार तथा नीतियों  पर आधारित है। यह विरोधाभास ही सबसे बड़ी समस्या है। अंतर्जाल पर भी भारतीय धार्मिक नीतियों से सहमत लोग लिखते हैं पर कोई सम्मानजनक स्थिति न होने से उन्हें निराश भी होना पड़ता है। हां, इतना जरूर है कि इंटरनेट पर जो लोग अपने पाठ लिखने का पूरा आनंद उठाते हैं वह किसी की परवाह नहीं करते।  जिन लोगों को परवाह होती है वह पसंद कम होने या टिप्पणियां कम मिलने से निराश होते हैं। उन्हें इससे बचना चाहिये।
                                   उत्तर प्रदेश में गंगा तथा यमुना में गणेश जी की प्रतिमा  विसर्जित करने पर विवाद चल रहा है। इन दोनों नदियों के प्रदूषित होने की चर्चा से दशकों से चर्चा में है और लग अब इनकी स्वच्छता को लेकर गंभीर हो गये हैं। ऐसे में गंगा तथा यमुना  में गणेश प्रतिमा विसर्जन करने की जिद्द कर प्रशासन से भिड़ने वाले समझ लें कि उन्हें सामान्य हिन्दू का समर्थन नहीं मिल सकता। गणेशजी की भक्ति करना पवित्र काम है पर इससे उनकी प्रतिमा गंगा  और यमुना नदियों  में विसर्जित कर जल प्रदूषित करने का अधिकार नहीं मिल जाता। अगर प्रशासन कहता है कि गणेशजी की प्रतिमा गंगा और यमुना नदी में विसर्जित करना ठीक नहीं तो उसे न मानना अधर्म ही है। गणेशजी विवेक का प्रतीक हैं और उनकी प्रतिमा का गंगा और यमुना  में विसर्जित करने की जिद्द कर प्रशासन से भिड़ना अविवेक का प्रमाण है। वैसे एक प्रश्न तो उठेगा कि सन्यासी रंग के वस्त्र धारण कर गणेशी जी की प्रतिमा गंगा में विसर्जित करने की जिद्द कर कौनसे नियम का पालन कर रहे हैं।
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Monday, September 14, 2015

हिन्दी दिवस पर दीपकबापूवाणी (DeepakBapuWani-Kavita On HindiDiwas)


हृदय धड़के मातृभाषा में, भाव परायी बाज़ार में मत खोलो।
कहें दीपकबापू खुशी हो या गम, निज शब्द हिन्दी में बोलो।।
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दिल के जज़्बात अपने हैं, अपनी जुबां हिन्दी में बोलो।
दीपकबापू हमदर्दी के रास्ते अब अंग्रेजी से मत खोलो।।
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अंग्रेजी में सम्मान कमाया नहीं, आत्मसम्मान भी समाया नहीं।
दीपकबापूअब भी गरीब, खुद की जुबां का भी साया नहीं।
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गोरी जुबां अर्थ की काली, कैसे दिल में अपने डाली।
दीपकबापू हिन्दी में लेते अर्थ, अंग्रेजी में बजाते ताली।
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राजाओं की स्तुति रोज करते, हिन्दीदिवस पर भी पेट में भोज भरते।
दीपकबापूमातृभाषा के नाम पर, कभी हिंग्लिश के शोज भी करते।।
..........................
हिन्दी के शब्द महंगे नहीं बिकते, इसलिये बाज़ार में कम दिखते।
दीपकबापू अंग्रेजी के सेवक, छद्मरूप में हिंदी की दम दिखते।।
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Sunday, July 13, 2014

रहीम दर्शन-बुरे काम को अधिक समय तक छिपाना कठिन(rahim darshan-bure kam ko adhik samay tak chhipana kathin)



      आधुनिक लोकतंत्र में जहां यह पूरे विश्व में एक अच्छी परंपरा बनी है कि लोग अपने देश, प्रदेश और शहर के लिये राज्य व्यवस्था की देखरेख करने वाले प्रमुख का चयन स्वयं ही कर सकते हैं वही इस तरह की बुरी प्रवृत्ति भी चालाक लोगों में आयी है कि वह जनमानस को अपने पक्ष में करने के लिये अनेक तरह के प्रपंच तथा स्वांग रचते हैं।  अपने प्रचार में वह स्वयं की छवि एक ईमानदार, समझदार तथा उच्च विचारों वाले व्यक्ति की बनाते हैं। इससे प्रभावित होकर लोग उन्हें अपना नायक भी मान लेते हैं पर जब बाद में पता चलता है कि वह तो पद पर बैठने के लिये एक बुत की तरह सज कर आये थे तब उनके प्रति निराशा का भाव पलता है। ऐसा भी देखा गया है कि अनेक लोगों ने अपनी छवि महान नायक की बनाई पर कालांतर में जब भेद खुला तो वह खलनायक कहलाने लगे।

कविवर रहीम कहते हैं कि

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रहिमन ठहरी धूरि की, रही पवन ते पूरि।

गांठ युक्ति की खुलि गई, अंत धूरि की धूरि।।

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-जिस तरह ठहरी हुई धूल हवा के रहने पर स्थिर नहीं रहती वैसे ही यदि किसी व्यक्ति के कुकृत्य या बुरे विचार का रहस्य खुल जाये तो उसकी सभी निंदा करते हैं।

      चुनावी वैतरणी पार करने के लिये प्रचार की नाव का सहारा सभी लेते हैं।  जो सौम्य व्यक्तित्व के स्वामी हैं उनके प्रति लोग वैसे ही सहृदयता का भाव रखते हैं पर जिनके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है उसके प्रति प्रचार देखकर ही अपना दृष्टिकोण बनाते हैं। यही वजह है कि जिन्होंने अपने जीवन में कोई परमार्थ नहीं किया होता वही उच्च पद की लालसा में प्रचार के माध्यम से अपनी छवि भव्य बनाने का प्रयास करते हैं।  कई बार प्रचार के दौरान ही उनकी पोल खुल जाती है पर अनेक लोग समाज की आंखें बचाकर अपना लक्ष्य ही पा लेते हैं।  ऐसे राजसी पुरुषों का निजी कार्यों तक सीमित रहने के कारण किसी को उनकी स्वार्थ वृत्ति का अनुभव नहीं होता पर सार्वजनिक पदों पर उनका चरित्र जाहिर होने लगता है तब लोग हताश हो जाते हैं।  वैसे तो पूरे विश्व में अनेक छद्म समाज सेवकों ने उच्च पद प्राप्त कर अपनी प्रतिष्ठा गंवाई है पर जिन्होंने बहुत प्रचार से लोकप्रियता अर्जित की पर अपना दायित्व निभाने में नाकाम रहे उन्हें उतने ही बड़े अपमान का भी सामना उनको करना पड़ा।
      उच्च पद पर बैठने का प्रयास करना बुरा नहीं है पर इसके लिये लोगों के साथ कोई ऐसी बात नहीं करना चाहिये जो बाद में निरर्थक सिद्ध हो। न ही ऐसे वादे करना चाहिये जिनको पूरा करना स्वयं को ही संदिग्ध लगे। लोगों को यह बात स्पष्ट रूप से समझाना चाहिये कि उनकी समस्याओं का वह निराकरण का पूरा प्रयास करेंगे। उच्च पद पर आने के बाद ईमानदारी से प्रयास भी करना चाहिये वरना लोगों में निराशा का भाव पैदा होता है जो कालांतर में घृणा में बदल जाता है।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Friday, June 27, 2014

दीन पर दया करे वही दीनबंधु-रहीम दर्शन पर आधारित चिंत्तन लेख(deenbandhu par jo daya kare vahi deenbandhu-A hindu hindi religion thought based on rahim darshan)



            पाश्चात्य संस्कृति तथा शिक्षा के प्रभाव में हमारे यहां समाज सेवा करना एक फैशन बन गया है। जहां पहले लोग दान आदि जैसे काम धार्मिक भावना से ओतप्रोत होकर स्वभाविक रूप से करते थे वहीं अब स्थिति यह है कि समाज सेवा करने वाले एक हाथ से चंदा लेते हैं तो दूसरे हाथ से गरीबों और असहायों की मदद का दावा करते हैं। एक तरह से पूर्णकालिक पेशेवर समाज सेवकों की जमात बन गयी है जिनका दावा यह होता है कि वह निष्काम भाव से परमार्थ कर रहे हैं।  इतना ही नहीं यह समाज सेवक अपनी छवि एक देवपूरुष की बनाकर सम्मान भी प्राप्त करते हैं।  अपनी छवि के लिये चंदे के रूप में प्राप्त धन का उपयोग वह प्रचार माध्यमों में बनाये रखने के लिये भी करते हैं।  इतना ही नहीं उनका कोई व्यवसाय नहीं होता इसलिये वह इसी चंदे से अपना घर भी चलाते हैं।

कविवर रहीम कहते हैं

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दिव्य दीनता के रसहि, का जाने जग अंधु
भली बिचारी दीनता, दीनबंधु से बंधु

      हिंदी में भावार्थ-भगवान की भक्ति दीन भाव से करने पर जो रस और आनंद मिलता है उसे अहंकार में अंधे लोग नहीं समझ सकते। दीनता में जो सोंदर्य है उससे ही दीनबंधु आकर्षित होते हैं।

दीन सबन को लखत है, दीनहिं लखै न कोय
जो रहीम दीनहि लखै, दीनबंधु सम होय

      हिंदी में भावार्थ-जो दीन है वह सबकी तरफ देखता है पर उसे कोई नहीं देखता। जो दीन की ओर देखकर उस पर दया करता है उसके लिये वह भगवान तुल्य हो जाता है।

     पहले समाज की एक स्वचालित व्यवस्था थी जिसमें धनी व्यक्ति के लिये दान का कर्तव्य निश्चित किया गया ताकि जिनके पास धन नहीं है उन्हें प्राप्त होता रहे और समाज में समरसता का भाव बना रहे मगर  अब लोग दान के नाम पर नाक भौं सिकोड़ते हैं या फिर ढिंढोरा पीटकर देते हें जिससे उनको आर्थिक लाभ और सामाजिक प्रतिष्ठा मिले। कुछ धनिक और उनकी संतानों के लिये तो माया शक्ति प्रदर्शन का एक हथियार बन गयी है। जिनके पास धन है उनको समाज में दीन और दरिद्र की तकलीफों का ख्याल नहीं होता और न ही इस बात का विचार होता है कि वह उनकी तरफ अपेक्षित भाव से देख रहे हैं। माया उनको अंधा बना देती हैं और फिर इन्हीं दीनों में से कोई अपराधी बनकर उनकी इसी माया का हरण तो कर ही लेता है और कहीं न कहीं तो शारीरिक हानि भी पहुंचा देता हैं।
      एक बात धनिकों को याद रखना चाहिये कि दीन उनको देखते हैं और उनके व्यवहार से ही उन पर अच्छा या बुरा प्रभाव पड़ता है। ऐसे में अगर वह स्वयं ही उन पर दया करें तो उनके लिये भगवान बन जायेंगे क्योंकि दीन तो बिचारे सभी तरफ देखते हैं पर उनकी तरफ अगर कोई देखे तो उनका मन प्रसन्न हो जाता है।
      दान करने से आशय यह नहीं है कि कहीं भिखारियों को खाना खिलाया जाये या किसी मंदिर में दान डाला जाये। यह अपने आसपास ही निर्धन और जरूरतमंद लोगों लोगों की सहायत कर भी किया जा सकता है। किसी मजदूर से काम कराकर उसके मांगे गये मेहनताने से थोड़ा अधिक देकर या अपने घर की अनावश्यक पड़ी वस्तु उनको देखकर भी उनका मन जीता जा सकता है। यह संदेश साफ है कि अगर आप धनी है तो आप अपने आसपास के निर्धन लोगों पर कृपा करते रहें तभी आप भी अमन से रह पायेंगे वरन आपको स्वयं ही अकेलापन और असुरक्षा का अनुभव होगा। मतलब यह कि आप दीनबंधु बने तभी आप दीनबंधु को पा सकते हैं। दान देते समय भी अपने अंदर दीन भाव रखना चाहिये और भक्ति करते समय भी। तभी परमानंद की प्राप्त हो सकती है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
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Saturday, May 17, 2014

मनमौजी लोग ही समाज का हित कर सकते हैं-भर्तृहरि नीति शतक के आधार पर चिंत्तन लेख(manmauji log hi samaj ka hit kar sakte hain-A hindi thought based on bhartrihari neeti shatak)



      इस संसार में दो प्रकार के लोग होते हैं-एक भोगी तथा दूसरे योगी। भोगी लोग जीवन में विषयों में लिप्तता को ही सर्वोपरि मानते हैं। भोगी  लोगउपभोग के सामानों का संग्रह ही अपना लक्ष्य मानते हुए अपना जीवन उन्हीं को समर्पित कर देते हैं जबकि योगी लोग भौतिक सामानों का जीवन में आनंद उठाने का साधन मानकर समाज के लिये आदर्श स्थितियों का निर्माण करने में लगे रहते हैं। ज्ञानियों की दृष्टि में बिना सामानों के भी जीवन में उठाया जा सकता है। उल्टे अधिक सामानों का संग्रह चिंता तथा तनाव का कारण होता है। कुछ लोग स्वादिष्ट भोजन के चक्कर में अनेक प्रकार स्वांग रचते हैं जबकि योगी तथा ज्ञानी भोजन को देह पालने की दृष्टि से दवा के रूप में ग्रहण करते हैं।  
भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि

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क्वचित् पृथ्वीशय्यः क्वचिदपि च पर्वङ्कशयनः क्वच्छिाकाहारः क्वचिदपि च शाल्योदनरुचिः।

क्वचित्कन्धाधारी क्वचिदपि च दिव्याभवरधरोः मनस्वी कार्यार्थी न गपयति दुःखः न च सुखम्।।

     हिन्दी में भावार्थ-कभी प्रथ्वी पर सोना पड़े कभी पलंग पर मखमली बिछोने पर शयन का सौभाग्य मिले, कभी बढ़िया तो कभी सादा खाना मिले, जिनकी रुचि अपने लक्ष्य में रहती है वह कभी इन बातों की परवाह नहीं करते।  मनस्वी पुरुष दुःख सुख की चिंता में न पड़कर कभी सामान्य तो कभी दिव्य वस्त्र पहनकर  अपने जीवन मार्ग पर दृढ़ता पूर्वक बढ़ते हुए दूसरों के सामने अपना आदर्श प्रस्तुत करते हैं।
      सच बात तो यह है कि उपभोग की प्रवृत्ति मनुष्य को कायर बना देती है। वह किसी बड़े सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक अथवा सांस्कृतिक अभियान में लंबे समय तक सक्रिय नहीं रह पाता। इतना ही अधिक उपभोग मानसिक, वैचारिक तथा अध्यात्मिक से कमजोर भी बनाता है। हम इसे अपने देश में अनेक सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक तथा साहित्यक अभियानों का नेतृत्व करने वाले कथित  शीर्ष पुरुषों की क्षीण वैचारिक, मानसिक तथा अध्यात्मिक स्थिति को देखकर समझ सकते है। यह सभी कथित शीर्ष पुरुष बातें बड़ी बड़ी करते हैं पर किसी का अभियान लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाता।  इसका कारण यह है कि जिनका जीवन सुविधाओं के साथ व्यतीत होता है वह अपने कथित अभियानों की वजह से लोकप्रियता भले ही प्राप्त कर लें पर उनमें इतनी क्षमता नहीं होती कि वह अपने सिद्धांतों या वादों को धरातल पर उतार सकें।  इसके लिये जिस त्याग भाव की आवश्यकता होती है वह केवल उन्हीं लोगों में हो सकता है जो सुविधायें मिलने की परवाह न करते हुए मनस्वी हो जाते हैं। 

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Saturday, April 26, 2014

गुणी लोग ही सुख भोगते हैं-कौटिल्य के अर्थशास्त्र के आधार पर चिंत्तन लेख(guni log hi sukhg bhogte hain-kautilya ka arthshastra)



            अनेक कथित धार्मिक गुरु यह तो कहते हैं कि मोह, माया, अहंकार तथा क्रोध का त्याग करें पर न तो वह स्वयं उनके प्रभाव से मुक्त हैं न वह अपने शिष्यों को कोई विधि बता पाते हैं। सत्य और माया के बीच केवल अध्यात्मिक ज्ञानी और साधक ही समन्वय बना पाते हैं। एक बात तय है कि सत्य के ज्ञान का विस्तार नहीं है पर माया का ज्ञान अत्यंत विस्तृत है।  कोई ऐसा बुरा काम नहीं करना चाहिये दूसरे को पीड़ा यह सत्य का ज्ञान है यह सभी जानते हैं पर माया के पीछे जाते हुए अनेक ऐसे काम करने पड़ते हैं जिनके उचित या अनुचित होने ज्ञान सभी को नहीं होता।  माया के अनेक रूप हैं सत्य का कोई रूप नहीं है। अनेक रूप होने के कारण धन, संपदा तथा उच्च के पद की प्राप्ति के लिये अनेक प्रकार के मार्ग हैं।  हर मार्ग का ज्ञान अलग है। स्थिति यह है कि लोग धन और संपत्ति प्राप्त करने के मार्ग बताने वालों को ही धार्मिक गुरु मान लेते हैं। मजे की बात तो यह है कि ऐसे गुरु श्रीमद्भागवत गीता से निष्काम कर्म तथा निष्प्रयोजन का संदेश नारे के रूप में देते देते ही मायावी संसार का ज्ञान देने लगते हैं।  इस संसार में माया की संगत जरूरी है पर सत्य का ज्ञान हो तो माया दासी होकर सेवा करते हैं वरना स्वामिनी होकर नचाने लगती है।
कौटिल्य महाराज ने अपने अर्थशास्त्र में कहा है कि

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वे शूरा येऽपि विद्वांतो ये च सेवाविपिश्चितः।

तेषा मेव विकाशिन्यों भोग्या नृपतिसम्भवः।।

            हिन्दी में भावार्थ-जिस मनुष्य में वीरता, विद्वता और सेवा करने का गुण है वही भोग के लिये  सम्पत्ति प्राप्त करता है।

कुलं वृत्तञ् शौर्य्यञ्च सर्वमेतन्ना गभ्यते।

दुवृतेऽश्न्यकुलीनेऽप जनो दातरि रज्यते।।

            हिन्दी में भावार्थ-कुल, चरित्र और वीरता को भी कोई ऐसे नहीं सराहता। दुष्ट तथा अकुलीन भी अगर दातार हो तो सामान्य जन उसमें अनुराग रखते हैं।

            अध्यात्मिक ज्ञानी मानते हैं कि मनुष्य अगर अपने अंदर ज्ञान साधना कर सत्य समझ ले तो उसमें वीरता और पराक्रम के गुण स्वतः आ जाते हैं और तब वह इस संसार में माया का स्वामी बनता है पर उसे अपनी स्वामिनी बनकर नचाने का अवसर नहीं देता।  दूसरी बात यह है कि ज्ञानी आदमी धन का व्यय इस तरह करता है कि उसके आसपास के लोग भी प्रसन्न रहें। वह दान और सहायता के रूप में ऐसे लोगों को धन या वस्तुऐं देता है जो उसके लिये सुपात्र हों। जिन लोगों के पास अध्यात्म ज्ञान नहीं है वह पैसा, पद और प्रतिष्ठा के मद में दूसरों को छोटा समझकर उनकी उपेक्षा कर देते हैं जिससे उनके प्रति समाज में विद्रोह का भाव निर्माण होता है।


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


Monday, April 21, 2014

संकट आने की आशंकायें हृदय में न धारण करें-पतंजलि योग साहित्य पर आधारित चिंत्तन(sankat aane ki aashankaen hridya mein n paalen-patanjlai yoga sahitya)



      मनुष्य का मस्तिष्क सोते समय भी सक्रिय रहता है जिस कारण वह अनेक तरह के अच्छे और बुरे सपने देखता है। उसी तरह दिन में भी वह काम करते समय भी अनेक प्रकार की चिंतायें और आशंकायें पालता है। मनुष्य का मन ही उसका वास्तविक स्वामी है। कभी वह प्रफुल्लित होता है कभी आत्मग्लानि को बोध से ग्रस्त होकर शांत बैठ जाता है। कभी आर्थिक, सामाजिक या रचना के क्षेत्र में अपनी भारी सफलता का सपने देखता है।  यही मन मनुष्य को भौतिक संपदा के संचय में इसलिये भी फंसाये रहता है कि कभी विपत्ति आ जाये तो उसका सामना माया की शक्ति से किया जाये।  हमारा अध्यात्मिक दर्शन कहता है कि खाने धन जरूरी है पर खाने के लिये बस दो रोटी चाहिये।  मनुष्य का मन भूख, बीमारी तथा दूसरे के आक्रमण को लेकर हमेशा चिंतित रहता है।  उसे लगता है कि पता नहीं कब कहां से दुःख आ जाये। इस तरह मन की यात्रा चलती है पर सामान्य मनुष्य इसे समझ नहीं पाता। संसार में सुख और दुःख आता जाता है पर मनुष्य का मानस हमेशा ही उसे संभावित आशंकाओं भयभीत रखता है।
महर्षि पतंजलि के योगशास्त्र में कहा गया है कि

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हेयं दुःखमनागतम्।।

हिन्दी में भावार्थ-जो दुःख आया नहीं है, वह हेय है।
      योग साधक और अध्यात्मिक ज्ञान के छात्र इस मन पर नियंत्रण करने की कला जानते हैं।  योग तथा ज्ञान साधक हमेशा ही सामने आने पर ही समस्या का निवारण करने के लिये तैयार रहते हैं। देह, मन तथा विचारों पर उनका नियंत्रण रहता है इसलिये वह संभावित दुःखों से दूर होकर अपनी जीवन यात्रा करते हैं।  देखा जाये तो अनेक लोग तो भविष्य की चिंताओं में अपनी देह, विचार तथा मन में बुढ़ापा लाते हैं।  एक बात तो यह है कि लोग अपने  अध्यात्मिक दर्शन का यह संदेश अपने मस्तिष्क में धारण नहीं करते कि समय कभी एक जैसा नहीं रहता।  दूसरी बात यह कि भगवान उठाता जरूर भूखा  है पर सुलाता नहीं है।  इसके बावजूद लोग यह भावना अपने मन में धारण किये रहते हैं कि कभी उनके सामने रोटी का संकट न आये इसलिये जमकर धन का संचय किया जाये।
      योग दर्शन की दृष्टि से जो दुःख आया नहीं है उसकी परवाह नहीं करना चाहिये।  धन या अन्न का संग्रह उतना ही करना जितना आवश्यक हो पर उसे देखकर मन में यह भाव भी नहीं लाना चाहिये कि वह भविष्य के किसी संकट के निवारण का साथी है। हमारे पास भंडार है यह सोच जहां आत्मविश्वास बढ़ाती है वहीं भविष्य की आशंका उससे अधिक तो देह का खून जलाती है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Monday, April 14, 2014

समाज में व्याप्त असंतोष से आँखें फेरना थी नहीं-तुलसीदास दर्शन पर आधारित चिंत्तन लेख(samaj mein vyapta asantosh se aankhen ferna theek nahin-tulsidas darshan par adharit chintta lekh)



      भारत में लोकसभा के चुनाव 2014 में होने हैं।  इसके लिये देश में प्रचार अभियान जोरों पर है।  एक तरफ सत्ता पक्ष दावा करता है कि उसने देश के विकास का काम जमकर किया है दूसरी तरफ विपक्ष जमकर यह प्रचार कर रहा है कि सत्ता पक्ष ने कुछ काम नहीं किया।  इस बहस का निष्कर्ष तो चुनाव परिणाम आने पर ही पता लगेगा पर एक बात तय है कि आर्थिक उदारीकरण की कथित प्रणाली देश के समाज को आंदोलित कर दिया है।  जहां हम यह देख रहे हैं कि भौतिक साधनों का उपभोग बड़ा है जिसे विकास कहा जाता है तो वहीं आर्थिक असमानता ने देश में एक भारी कलह की स्थिति भी पैदा की है। मुदा्रस्फीति की दर के साथ ही महंगाई भी बढ़ी है जिसने मध्यम वर्गीय परिवारों को निम्न वर्ग में लाकर खड़ा कर दिया है। मजे की बात यह है कि जहां से धन लेना है वहां तो मध्यम वर्गीय लोग गरीब कहलाने के लिये तैयार हैं पर जहां उपभोग का प्रश्न आये तो वहां सभी एक दूसरे से होड़ करना चाहते हैं।  बैंक या बाज़ार से कर्ज लेकर स्वयं को सभ्य कहलाने के लिये उनके यह प्रयास अच्छे लगते हैं पर जब उसे चुकाने की बात आती है तो उनकी हवा निकल जाती है।

संत तुलसीदास कहते हैं कि

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कलह न जानब छोट करि, कलह कठिन परिनाम।

गत अगिनि लघु नीच गृह, जरत धनिक धन धाम।।

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-कलह को कभी छोटा विषय नहीं मानना चाहिये। कलह का परिणाम अत्यंत भयानक होता है। एक छोटे आदमी के घर में लगी आग धनिकों के महल तक नष्ट कर देती है।

      आर्थिक विशेषज्ञ भले ही देश के विकसित होने की बात करते हों पर सामाजिक विशेषज्ञों की दृष्टि से देश में इस कारण जो जातीय, भाषाई, क्षेत्रीय, धार्मिक तथा आर्थिक आधार पर जो कलह या वैमनस्य का वातावरण बन गया है वह अत्यंत चिंताजनक है।  दूसरी बात यह भी है कि जिन लोगों ने धन का प्रचुर मात्रा में संग्रह किया है उन्होंने अपने आसपास आर्थिक विपन्नता की उपस्थिति से मुंह फेर लिया है।  इससे अल्प धनिक लोगों के मन में संपन्न लोगो के प्रति जो निराशा तथा वैमनस्य  का भाव है उसका अनुमान सामाजिक विशेषज्ञ ही कर सकते हैं।  हमारे देश में अनेक समाज सेवक उस कलह को रेखांकित करते हैं जो अंततः अपराध को जन्म देती है।  यह अपराध चाहे स्वयं के प्रति हो या दूसरे के प्रति अंततः उसका परिणाम समाज को ही भोगना होता है।  प्रचार  माध्यमों में इस विषय पर चर्चा या बहस होती तो है पर उसका स्तर सतही रहता है।  सच बात तो यह है कि देश में सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक, भाषाई तथा क्षेत्रीय कलह को निपटाने का गंभीर प्रयास होना चाहिये तभी देश में खुशहाली लायी जा सकती है।


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Wednesday, April 9, 2014

विदुर नीति के आधार चिंत्तन लेख-दुर्जन की संगत में सज्जन भी बिगड़ जाता है(vidur neeti-durjan ki sangat mein sajjan bhi bigad jaata hai)



      अक्सर देखा गया है कि लोग अपने संगी साथियों की छवि तथा आचरण को लेकर यह सोचते हुए उदासीन रहते हैं कि इससे उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। उनको शायद इस बात का ज्ञान नहीं होता कि अंततः मनुष्य पर उसकी संगत का प्रभाव पड़ता ही है।आमतौर से लोग एक दूसरे के प्रति सद्भाव दिखाते ही है। कोई अनावश्यक विवाद नहीं चाहता इसलिये परस्पर मैत्री भाव दिखाना बुरा नहीं है पर दूसरे के कर्म में दोष होने पर उसे न टोकना एक तरह से उसे धोखा देना ही है। संग रहने वाले व्यक्ति का यह दायित्व है कि वह मित्र को उसके कर्म के प्रति सचेत करे पर कोई इसके लिये करने को तैयार नहीं होता।  हालांकि आजकल लोगों की सहनशीलता भी कम हो गयी। कोई अपनी आलोचना को सहजता से नहीं लेता। यदि किसी मित्र ने आलोचना कर दी तो लोग मित्रता तक दांव पर लगाकर उससे मुंह फेर लेते हैं। जिस व्यक्ति में सहनशीलता या वफादारी का भाव नहीं है उससे वैसे भी संपर्क रखना गलत है। यह  सोचना ठीक नहीं है कि असहज या असज्जन व्यक्ति का हम पर प्रभाव नहीं पड़ेगा।
विदुरनीति में कहा गया है कि

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यदि सन्तं सेवति वद्यसंन्तं तपस्विनं यदि वा स्तेनमेव।

वासी था रङ्गबशं प्रयानि तथा स तेषां वशमभ्यूवैति।।

     हिन्दी में भावार्थ-यदि कोई सज्जन, दुर्जन, तपस्वी अथवा चोर की संगत करता है तो वह उसके वश में ही हो जाता है। संगत का रंग चढ़ने से कोई बच नहीं सकता।
      एक बात निश्चित है कि हम जैसे लोगों के बीच उठेंगे और बैठेंगे उनका रंग चढ़ेगा जरूर चाहे उससे बचने का प्रयास कितना भी किया जाये।  किसी से मित्रता करें या किसी की सेवा करें उसके साथ रहते हुए उसके हाव भाव तथा वाणी की शैली का हम पर प्रभाव अवश्य पड़ता है। कई बार हमने देखा होगा कि कुछ लोग अपने संपर्क वाले व्यक्तियों की बोलने चालने की नकल कर  सुनाते हैं। अनेकों के हावभाव और चाल की नकल कर भी दिखाई जाती है। इससे यह बात समझी जा सकती है कि संगत का असर तो होता ही है। यह अलग बात है कि कुछ लोग अपने संगी या मित्र की पीठ पीछे नकल कर मजाक उड़ाते हैं पर सच यह है कि अपने सामान्य व्यवहार में भी उसकी नकल उनसे ही हो जाती है।
      अगर हम चाहते हैं कि हमारी छवि धवल रहे और हम हास्य का पात्र न बने तो सबसे पहले अपनी संगत पर दृष्टिपात करना चाहिये। जीवन में सहजता पूर्वक समय निकालने के लिये यह एक बढ़िया उपाय है कि अपनी निरंतर भलाई का क्रम बनाये रखने के लिये हम ऐसे लोगों से दूर हो जायें जिनसे हमारे आसपास वातावरण विषाक्त होता है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Tuesday, April 1, 2014

संत कबीर दर्शन-गाली का उत्तर में मौन धारण करें(sant kabir darshan-gali ka uttar mein maun dharan karen)



      हमारे देश में समाज ने  शिक्षा, रहन सहन, तथा चल चलन में पाश्चात्य शैली अपनायी है पर वार्तालाप की शैली वही पुरानी रही है। उस दिन हमने देखा चार शिक्षित युवा कुछ अंग्रेजी और कुछ हिन्दी में बात कर रहे थे।  बीच बीच में अनावश्यक रूप से गालियां भी उपयोग कर वह यह साबित करने का प्रयास भी कर रहे थे कि उनकी बात दमदार है। हमने  देखे और सुने के आधार पर यही  समझा कि वहां वार्तालाप में अनुपस्थित किसी अन्य मित्र के लिये वह गालियां देकर उसकी निंदा कर रहे हैं।  उनके हाथ में मोबाइल भी थे जिस पर बातचीत करते हुए  वह गालियों का धड़ल्ले से उपयोग कर रहे थे। कभी कभी तो वह अपना वार्तालाप पूरी तरह अंग्रेजी में करते थे पर उसमें भी वही हिन्दी में गालियां देते जा रहे थे।  हमें यह जानकर हैरानी हुई कि अंग्रेजी और हिन्दी से मिश्रित बनी इस तोतली भाषा में गालियां इस तरह उपयोग हो रही थी जैसे कि यह सब वार्तालाप शैली का कोई नया रूप हो।
संत  कबीर कहते हैं कि

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गारी ही से ऊपजे कष्ट और मीच।

हारि चले सो सन्त है, लागि मरै सो नीच।।

      सामान्य हिन्दी में भावार्थ-गाली से कलह, कष्ट और झंगडे होते हैं। गाली देने पर जो उत्तेजित न हो वही संत है और जो पलट कर प्रहार करता है वह नीच ही कहा जा सकता है।

आवत गारी एक है, उलटत होय अनेक।

कहें कबीर नहि उलटियो, वही एक की एक।।

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-जब कोई गाली देता है तो वह एक ही रहती है पर जब उसे जवाब में गाली दी जाये तो वह अनेक हो जाती हैं। इसलिये गाली देने पर किसी का उत्तर न दें यही अच्छा है।
      कई बार हमने यह भी देखा है कि युवाओं के बीच केवल इस तरह की गालियों के कारण ही भारी विवाद हो जाता है। अनेक जगह हिंसक वारदातें केवल इसलिये हो जाती हैं क्योंकि उनके बीच बातचीत के दौरान गालियों का उपयोग होता है। जहां आपसी विवादों का निपटारा सामान्य वार्तालाप से हो सकता है वह गालियों का संबोधन अनेक बार दर्दनाक दृश्य उपस्थित कर देता है।
      एक महत्वपूर्ण बात यह कि अनेक बार कुछ युवा वार्तालाप में गालियों का उपयोग अनावश्यक रूप से यह सोचकर करते हैं कि उनकी बात दमदार हो जायेगी।  यह उनका भ्रम है। बल्कि इसका विपरीत परिणाम यह होता है कि जब किसी का ध्यान गाली से ध्वस्त हो तब वह बाकी बात धारण नहीं कर पाता।  यह भी एक मनोवैज्ञानिक सत्य है वार्तालाप क्रम टूटने से बातचीत का विषय अपना महत्व खो देता है और गालियों के उपयोग से यही होता है। इसलिये जहां अपनी बात प्रभावशाली रूप से कहनी हो वहां शब्दिक सौंदर्य और उसके प्रभाव का अध्ययन कर बोलना चाहिये। अच्छे वक्ता हमेशा वही कहलाते हैं जो अपनी बात निर्बाध रूप से कहते हैं तो श्रोता भी उनकी सुनते हैं। गालियों का उपयोग वार्तालाप का ने केवल सौंदर्य समाप्त करता है वरन उसे निष्प्रभावी बना देता है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

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