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Thursday, December 24, 2015

राजसी पुरुष का आवामगमन निर्बाध होना चाहिये-कौटिल्य का अर्थशास्त्र(rajsi Purushon ki Raksha-Kautilya ka Arthshastra)

                           हमारे यहां के प्रचारकर्मी आमतौर से राजसी पदों पर प्रतिष्ठित लोगों के वाहन निकलने पर सामान्य लोगों का आवागमन रोकने का विरोध करते हैं। यह उनका अज्ञान हैै।  कहा जाता है कि राज्यप्रमुख की रक्षा पहरेदारो को उसी तरह करना चाहिये कोई पुरुष स्त्री की करता है। राज्य प्रमुख के जीवन का भय प्रजा के लिये संकट होता है। इसलिये विशिष्ट पदधारी लोगों की रक्षा पर आपत्ति होना ही नहीं चाहिये। प्रचारकर्मियों को चाहिये कि वह राजसी पदवाले लोगों की नीतियों, कार्यक्रमों तथा प्रबंध तक ही अपनी बात रखें। हमारे देश के लोग भी राजसी पुरुषों के रहन सहन व चालचलन से अधिक उनके राज्य के प्रति कर्मो पर अधिक ध्यान देते हैं।
कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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निर्गमे च प्रवेशो च राजमार्ग समान्ततः।
प्रोत्सारितजनम् गच्छेत्सम्यगाविष्कृतोन्नति।।
           हिन्दी में भावार्थ-राज्य प्रमुख कहीं जाये तो राजमार्ग स्वच्छ कर सामान्य लोगों का आवागमन रोककर सम्मान से गमन करे।
                           अभी दिल्ली में निजी कारों के आवागमन पर समविषम सूत्र लागू करते हुए विशिष्ट राजसी पदों वाले लोगों को उससे मुक्ति दी गयी है।  यह ठीक है इसका विरोध नहीं होना चाहिये। हां, इतना जरूर कह सकते हैं कि राजसी पदों वालों की रक्षा जहां आवश्यक है वहीं यह भी आवश्यक है कि वह सामान्य प्रजा के लिये हितैषी होकर काम करते रहें। उनके यही काम चर्चा का विषय होना चाहिये। यह चिंता की बात है कि आधुनिक लोकतंत्र से राजसी पदों पर आने वाले लोग पुरानी राजसी प्रवृत्ति का शिकार हो रहे है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
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Sunday, September 6, 2015

आपसी संबंधों में प्रतिकारसंधि का महत्व न भूलें-कौटिल्य का अर्थशास्त्र(apsi sambandhon mein paropkarsandhi ka mahtva-economocs of kautilya)

                                   हम अपने दैनिक जीवन में अनेक लोगों के संपर्क में आते हैं।  किन्हीं लोगों का हम उपकार करते हैं तो कोई हमारा करता है पर इसका प्रतिकार कहीं होता है कहंी नहीं।  सामान्य मनुष्य का स्वभाव होता है कि वह किसी संकट में पड़े साथी, रिश्तेदार या अन्य व्यक्ति की मदद को तत्पर हो जाता है। हम जब समाज की व्यवस्था की बात करते हैं तो वह बनता ही इसलिये है कि लोग एक दूसरे के साथ संबंध सहजता से निभायें।  इसी समाज में कई लोगों की ऐसी प्रवृत्ति भी देखी जाती है कि वह काम निकल जाने के बाद साथी, मित्र और रिश्तेदार से दूध   में से  मक्खी निकालने की भांति संपर्क तोड़ देते हैं। प्रतिकार भाव से रहित ऐसे व्यक्ति अंततः समाज में अविश्वसनीय हो जाते हैं।
कौटिल्य अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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उपकारं करोम्यस्यं ममाप्येष करिष्यति।
अयञ्वापि प्रतीकारो रामसुग्रीवयोरिव।।
                                   हिन्दी में भावार्थ-मैंने उसका उपकार किया तो  वह भी करेगा-राम सुग्रीव के बीच इसी तरह हुइ संधि प्रतिकार संधि कहलाती है।
मयास्योपकृतं पूर्वे ममाप्येष करिष्यति।
इतिः या क्र्रियते सन्धिः प्रतीकारः स उच्यते।।
                                   हिन्दी में भावार्थ-मैंने पहले उसका उपकार किया तो वह भी मेरा करेगा-इसे प्रतिकार संधि कहा जाता है।
                                   प्रतिकार संधि मैत्री का भी रूप है जिसके बारे में कहा जाता है कि वह की नहीं जाती वरन् स्वतः भाववश हो जाती है। यह ठीक है कि भाववश लोग एक दूसरे जुड़े रहते हैं पर इसका आशय यह कतई नहीं है कि वह परोपकार कर प्रतिकार की अपेक्षा न करें।  निष्काम कर्म या नेकी कर दरिया में डाल का सिद्धांत ज्ञानी अपनाते हैं पर इस संसार में सभी ऐसे नहीं होते। अतः जिन लोगों को अपनी समाज मेें गरिमा बनाये रखना र्है वह परोपकार कर कोई भले ही याचना न करे पर लाभ लेने वाले को उसका प्रतिकार करने के लिये तत्पर होना चाहिये।  अगर वह ऐसा नहीं करता तो परोपकार करने वाला निराश हो जाता है और कालांतर में काम करने पर मुंह भी फेर सकता है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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Saturday, August 29, 2015

अंतर्जाल पर प्रहारात्मक रूप से अंग्रेजी की अपेक्षा हिन्दी अधिक प्रभावी-हिन्दी दिवस पर विशेष लेख(hindi batter than inglish on internet-special hindi article on hindi diwas)

                                   ट्विटर, फेसबुक और ब्लॉग से आठ वषौं के सतत संपर्क से यह अनुभव हुआ है कि भले ही आपकी बात अंग्रेजी में अधिक पढ़ी जाती है पर भारत में समझने के लिये आपका पाठ हिन्दी में होना आवश्यक है।  महत्वपूर्ण बात यह है कि अगर आक्रामक शैली में शब्द लिखने हों तो अंग्रेजी से अधिक हिन्दी ज्यादा बेहतर भाषा है।  कटु  बात कहने के लिये मधुर शब्द का उपयोग भी व्यंजना भाषा में इस तरह किया जा सकता है कि  ंइसका अनुभव एक ऐसे ट्विटर प्रयोक्ता के खाते से संपर्क होने पर हुआ जो अपनी अंग्रेजी भाषा में लिखी गयी बात से प्रसिद्ध हो रहा है।  उसके अंग्रेजी शब्दों के जवाब में अंग्रेजी टिप्पणियां आती हैं पर जितना आक्रामक शब्द अंग्रेजी की अपेक्षा हिन्दी टिप्पणियों के होते हैं।  एक टिप्पणीकर्ता ने तो लिख ही दिया कि अगर अपनी बात ज्यादा प्रभावी बनाना चाहते हो तो हिन्दी में लिखो। वह ट्विटर प्रयोक्ता अंग्रेजी में लिख रहा है पर उसकी आशा के अनुरूप हवा नहीं बन पाती। अगर वह हिन्दी में लिखता तो शायद ज्यादा चर्चित होता। इसलिये हमारी सलाह तो यही है कि जहां तक हो सके अपना हार्दिक प्रभाव बनाने के लिये अधिक से अधिक देवनागरी हिन्दी में लिखे।

140 शब्दों की सीमा से अधिक ट्विटरलौंगर पर लिखना भी दिलचस्प
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इधर ट्विटर ने भी 140 शब्दों से अधिक शब्द लिखने वाले प्रयोक्ताओं  ट्विटलोंगर की सुविधा प्रदान की है। हिन्दी के प्रयोक्ता शायद इसलिये उसका अधिक उपयोग नहीं कर पा रहे क्योंकि उसका प्रचार अधिक नहीं है। हमने जब एक प्रयोक्ता के खाते का भ्रमण किया तब पता लगा कि यह सुविधा मौजूद है। हालांकि हम जैसे ब्लॉग लेखक के लिये यह सुविधा अधिक उपयोगी नहीं है पर जब किसी विशेष विषय पर ट्विटर लिखना हो तो उसका उपयोग कर ही लेते हैं। वैसे ट्विटर पर अधिक लिखना ज्यादा अच्छा नहीं लगता क्योंकि वह लोग लिंक कम ही क्लिक करते हैं।  बहरहाल जो केवल ट्विटर पर अधिक सक्रिय हैं उनके लिये यह लिंक तब अधिक उपयोग हो सकता है जब वह अधिक लिखना चाहते हैं।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
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Thursday, August 27, 2015

गुजरात में सामूहिक हिंसा की पूर्ण पड़ताल आवश्यक-हिन्दी लेख(Gujrat mein samuhik hinsa ki poorn padtal aawashyak-hindi article)


                                   गुजरात में जिस तरह एकदम सामूहिक हिंसा हुई उससे लगता है कि कुछ लोग इसके लिये तैयार बैठे थे। इस हिंसा के लिये किसी खास समुदाय पर आक्षेप करना ठीक नहीं लगता। अगर प्रचार माध्यमों तथा समाचार पत्रों की बात माने तो वहां तमाम वर्ग के लोग इस हिंसा में शामिल रहे हैं।  गोधरा में रेल यात्रियों की  हत्या के बाद हुई हिंसा में भी सभी धर्मों के लोगों पर हमले हुए थे पर यह अलग बात है कि एक विशेष धर्म के लोगों के शिकार होने की अधिक चर्चा होती रहीं। आमतौर से गुजरात में बारह तेरह वर्ष पूर्व में सांप्रदायिक दंगे होना आम बात थी पर बाद में वह थम गयी।  हमारे विचार से कुछ असामाजिक तत्व वहां अपनी हिंसा और लूटपाट का अपना पुराना सपना पूरा करने के लिये लंबे समय से इंतजार में थे।  इसलिये वहां के जिम्मेदार नेताओं को अपने आंदोलन चलाते समय इसपर ध्यान देना चाहिये।  यहां यह भी बता दें कि एक खास समुदाय के सहारे पूरे देश की चुनावी राजनीति में छा जाने की संभावना नहीं रहती।
                                   वैसे हमारा मानना है कि सरकारी सेवाओं में व्यक्तिगत योग्यता के साथ ही प्रबंध कौशल की कला में शामिल लोगों को ही उच्च पदों पर नियुक्त करना चाहिये।  देश के विकास के लिये यह आवश्यक है कि सरकारी सेवायें व्यवसायिक ढंग से काम करें और बिना योग्यता और कौशल यह संभव नहीं है। हम यह देख रहे हैं कि सरकारी कार्य में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ रही है पर वहां आरक्षण का नियम काम नहंी करता।  जब हम राजकीय प्रबंध में निजी क्षेत्र की भागीदारी का सिद्धांत मान रहे हैं तो राजकीय सेवाओं में निजी योग्यता और प्रबंध कौशल की आवश्यकता खारिज नहीं किया जा सकता।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
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Wednesday, August 19, 2015

पाकिस्तान कड़े संदेश मिलने के भय से घबड़ा रहा है-हिन्दी लेख(kade sandesh milne se bhaybhit pakistan-hindi lekh)


                                   पाकिस्तान इस समय भारत से सुरक्षा सलाहकारों की वार्ता से बचना चाहता है।  उसकी स्थिति कुछ इस तरह है जैसे अदालत का समन मिलने से किसी ऐसे सभ्रांत नागरिक की होती है जिस पर किसी ने मामला दर्ज किया हो-कभी कभी गवाह के रूप में अदालत का समन मिलने से भी लोग घबड़ा जाते हैं।  दोनों के सुरक्षा सलाहकारों की बैठक एक तरह से एक अपराधी की पेशी किसी पुलिस अधिकारी के सामने उपस्थिति जैसी है।  भारत के सुरक्षा सलाहकार पुलिस की भूमिका में है और पाकिस्तान के दूत को उनके सामने अपराधी की तरह हाजिर होना पड़ रहा है।  जिस तरह सामान्य व्यक्ति पुलिस या अदालत से बचने के लिये कोई न कोई उपाय करता है वैसे ही पाकिस्तान सीमा पर हमले करने के साथ ही अन्य उपाय भी कर रहा है।  संभवतः उसे आशंका है कि इस बातचीत में भारत कहीं उसे ऐसे सत्य न कहे जिससे बचा जाना चाहिये।  अभी तक उसे कड़े संदेश हमेशा मीडिया में मिले हैं पर इस बार उसे आशंका है कि भारत में बदलाव होने से  कहीं ऐसा न हो जाये कि औपचारिक या आधिकारिक रूप से कड़ी बात सुनने को  मिले और उसके अनुरूप काम करना पड़े। जब तक नहीं मिले हैं तब तक टालमटोल ही ठीक है।  सभ्रांत आदमी का नियम होता है कि वह बिना चेतावनी के कार्यवाही नहीं करता।  अगर वह ऐसा करता है तो दुनियां उसे ताने देती है। पाकिस्तान को लगता है कि सभ्रांत भारत को चेतावनी देने का अवसर ही नहीं दिया जाये ताकि वह ऐसे कार्यवाही करे तो पूरा विश्व उसकी निंदा करे।
                                   पाकिस्तान भारत से बातचीत कराने में इसलिये कतरा रहा है क्योंकि उसे लगता है कि उफा में समझौते के बाद वह कश्मीर मामला नहीं उठा सकेगा। पाकिस्तान अपना दूत भेजने इसेलिये भी डर रहा है क्योंकि उसे आशंका है कि यह बातचीत बेनतीजा रही तो परिणाम खतरनाक होंगे।      हमारा विचार है कि  यह बातचीत होना चाहिये। भारत पाक सुरक्षा सलाहकारों की बातचीत होने पर इस बार धमकाने और समझाने का सही अवसर मिल सकता है। भारत के सुरक्षासलाहकार डाभोल के समकक्ष पाकिस्तानी सरताज अजीज अत्यंत बौने हैं और यह भय वहां की सेना को सता रहा है। पाकिस्तान को इस बात में भारत बता सकता है कि ब्लूचिस्तान में खुलकर उसके विरुद्ध बिगुल बजाया जा सकता है। इसलिये पाकिस्तान के बातचीत करने के परंपरागत ढंग से हो रहे कुत्सित प्रयासों की परवाह किये बिना भारतीय रणनीतिकारों को अपने प्रयास करना ही चाहिये। मौका मिले तो चार हिस्सों में अनौपचारिक रूप से विभाजित पाकिस्तान पर-पंजाब, सिंध, ब्लूचिस्तार और पख्तूनिस्तान-अपनी मोहर लगा ही देना चाहिये।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
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Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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Friday, August 14, 2015

पाकिस्तान के बंटने से ही भारत में शांति होगी-15 अगस्त पर विशेष हिन्दी लेख(dividle pakisan fevoareble for peace in india-special hindi article on 15 AUGUST)


                                   ब्लूचिस्तान टैग से अपने ही फेसबुक और ट्विटर से जाकर कुछ नया देखने की ख्वाहिश हुई।  यह पहला अनुभव था।  कुछ दिन पहले तक हमने कभी किसी शब्द को पूंछ नहीं लगायी थी।  अब जाकर यह अनुभव हुआ कि फेसबुक और ट्विटर से भी अपने ही शब्दों पर पूंछ लगाकर दूसरी जगह जाया जा सकता है। बहरहाल ब्लूचिस्तान शब्द से की गयी खोज से यह पता चला कि वाकई वहां कोई पाकिस्तान प्रेम जैसी कोई बात नहीं है। वहां के लोग आज भी अपना अपना स्वतंत्रता दिवस 11 अगस्त को मनाते हैं।  पाकिस्तान से एकता की बात तो दूर वहां उसके प्रति नफरत का ऐसा भाव है जिससे खत्म नहीं किया जा सकता।  इतना ही नहीं वहां के लोग  भारत से अब भी समर्थन की अपेक्षा रखते हैं। पिछले दिनों पाकिस्तानी मूल के कनाडाई नागरिक लेखक तारिक फतह का साक्षात्कार भारतीय प्रचार माध्यमों में देखा तब यह जानने की इच्छा हुई कि क्या वाकई पाकिस्तान एक संगठित राष्ट्र है या हम ही भ्रम पाले हैं।  फेसबुक में एक जगह तो भारतीय अधिकारी के माध्यम से पाकिस्तान को मिली इस चेतावनी का जिक्र भी था कि अगर फिर मुंबई जैसी घटना हुई तो पाकिस्तान ब्लूचिस्तान से हाथ धो बैठेगा।  फेसबुक पर पाकिस्तान के विरुद्ध जो भावना है उसका भारत लाभ उठा सकता है।
                                   बहरहाल तारिक फतह की बात को सही माने तो भारत 15 अगस्त अपने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर ब्लूचिस्तान और सिंध को अलग देश में रूप में मान्यता देकर पाकिस्तान को दबाव में डाले। एक बात तय रही कि पाकिस्तान से अब साठ साल से चल रहे संबंधों पर पुनर्विचार कर उसकी वर्तमान रूप में मान्यता समाप्त करना जरूरी है।  पाकिस्तान में पंजाबी लाबी अन्य तीनो प्रांतों के निवासियों के शोषण पर अपना उत्थान तो कर ही रही है वहां के निवासियों के मानवाधिकारों का भी हनन कर रही है।  हम यह तो मानते हैं कि पाकिस्तान को बांटे बगैर हम अपने देश से अशांति के बादल नहीं छांट सकते। तारिक फतह का यही मानना है कि पाकिस्तान को चार टुकड़ों में बांटने से ही विश्व में शांति होगी।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
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Saturday, August 8, 2015

समाचार और धर्म के व्यापारियों का आपसी द्वंद्व-हिन्दी चिंत्तन लेख(war between media and religion businessmen-hindi thought article)

                              
                   सभी हिन्दी प्रचार माध्यम जब किसी प्रतिष्ठत भारतीय धर्म के पेशेवर व्यक्तित्व की छवि खराब करने के लिये संयुक्त शब्द आक्रमण करते हैं तब हम जैसे लोगों के लिये मजाक जैसा वातावरण बन जाता है। प्रचार कर्मी अक्सर कहते हैं कि अमुक व्यक्ति धर्म के नाम पर भोले भाले भक्तों का ठग रहा है।  उस समय हमें लोगों के लोभ या लालच से पनपे अज्ञान की बजाय इन प्रचार कर्मियों पर हंसी आती है।  यह सभी जानते हैं कि भारत में प्रचार माध्यम सैद्धांतिक रूप से  ही स्वतंत्र दिखते हैं पर उनका आर्थिक स्वामित्व दो नंबर ही नहीं वरन् काले धंधे वालों के हाथ में ही है।  एक टीवी चैनल ने ही  बकायदा इस व्यवसाय में उन सफेदपोशों के स्वामित्व को उजागर करने के लिये अभियान के रूप में एक कार्यक्रम प्रारंभ किया है जिनके पास काला पैसा है या उनका धंधा काला है।
                                   भारत में धर्म चर्चा एक व्यवसाय की तरह भी है।  व्यवसाय में ऊंची नीच होता ही है।  इसलिये हिन्दी समाचार प्रसारण व्यवसायियों के अनुचरों को  रोज एक खलनायक विज्ञापनों के बीच समाचारा और बहस की सामग्री प्रसारण के लिये मिल ही जाता है। कभी गोल्डन बाबा, कभी राधे मां तो कभी सारथी बाबा। एक बात मजे की होने के साथ ही संदेहास्पद भी लगती है कि सभी निजी हिन्दी समाचार प्रसारण एक साथ ही एक ही खबर पर हमले करते हैं। कभी कभी तो लगता है कि इन समाचार व्यवसायी  इन पेशेवर धार्मिक गुरु आसान शिकार की तरह  लगते हैं जिसका चाहे जब हमला कर देते हैं। भारत के योग तथा ज्ञान साधकों की इन पेशेवर ठेकेदारों से कोई सहानुभूति नहीं है पर प्रचार माध्यम जिस तरह हल्के विषयों को भी गंभीर और देश के लिये महत्वपूर्ण विषयों को हल्का बनाते हैं वह भी उनको हैरानी काी बात लगती है। इन समाचार माध्यमों में अधिकतर ऐसे विद्वान हैं जो  अंग्रेजी शिक्षा के कारण विदेशी आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा धािर्मक विचारधाराओं को श्रेष्ठ मानते हैं। इन विदेशी विचाराधाराओं के पोषक बुद्धिजीवी और प्रचारक जब धर्म के ठेकेदारों की कमाई से चिढ़ते हैं तो हंसी आती है। उनकी कुंठा देखते ही बनती है।
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Monday, August 3, 2015

हर हर महादेव-सावन का माह भक्ति की चाह-हिन्दी लेख(har har mahadev-sawan ka mahin bhakti ka nageena-hindi article

                              सावन के माह  में हर सोमवार  शिवलिंग पर जलाभिषेक करने के लिये बड़ी संख्या में भक्त मंदिरामें जाते हैं।  अनेक पाश्चात्य हिन्दी भाषी ही ज्ञानी इसका मजाक बनाते हैं।  जानते हैं क्यों? इन लोगों को लगता है कि इनके प्रचार पर्दे और पत्रों के लिये दर्शक या पाठक कम हो जाते हैं। मूर्ति पूजा या जलाभिषेक का मजाक बनाने वाले भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के बारे में नहीं जानते। खाते हिन्दी से हैं पर माता अंग्रेजी को बताते हैं। पैंट पहनने वालों को सभी कुर्ते पायजामे और धोती वाले गंवार नज़र आते हैं। सबसे बड़ी बात यह कि मनुष्य के मन का खेल केवल भारतीय अध्यात्मिक दर्शन में समझा जाता है। इसे अंग्रेजी भक्त कतई नहीं समझ सकते।ं
                              मूर्तियों में भगवान नहीं होता। शिवलिंग पर चढ़ा जल गंगा नहीं होता, यह भी सभी जानते है। मगर जब मूर्ति के आगे कोई मत्थ ठेकता है तो वह अपने मन का शुद्धिकरण कर रहा होता है। शिवलिंग पर जल चढ़ाते हुए उसे मन में गंगा जैसी पवित्रता बहने की अनूभूति होती है।  यही अनूभूति मन को दृढ़ और पवित्र बनाती है। विश्व में धर्म के नाम पर अनेक विचाराधारायें प्रचलित हैं-यह अलग बात है कि सभी को धर्म कहा जाता है जबकि हमारे यहां इसका आशय केवल आचरण, व्यवहार तथा कर्म से ही लिया जाता है। इन विचाराधाराओं में भारतीय अध्यात्मिक विचाराधारा पर दृढ़ता पूर्वक चलने वाले ही सबसे अधिक बुद्धिमान और परिश्रमी माने जाते हैं-आज पूरा विश्व भारतीय साफ्टवेयर इंजीनियरों का लोहा मानता है जो कि इसका प्रमाण है।
                              इस विषय पर हमने कोई शोध तो नहीं किया योग तथा ज्ञान साधना के अभ्यास से अनेक ऐसी अनुभूतियां हुईं हैं जो अध्यात्मिक विषय पर लिखते हुए हमें आनंद आता है। निरंकार के उपासक होने के बावजूद मंदिरों में जाने पर भी आनंद मिलता है।  मूल बात है मन की जिसे समझने वाले इस बात को जानते हैं कि सांसरिक विषयों में निरंतर सक्रियता के बाद उससे कुछ समय के लिये-ध्यान और पूजा जैसी क्रियाओं से- प्रथक होने पर एक आनंद की अनूभूति होती है। करो तो जानो।
हर हर हर महादेव, जय शिव शंकर
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Thursday, July 23, 2015

उज्जैन में महाकाल में जनदेवता का प्रवेश-हिन्दी चिंत्तन लेख(Ujjain mein mahakal mein jandevata ka pravesh-hindi thought article)

          उज्जैन में महाकाल मंदिर में क्षिप्रा का पानी घुस गया है। भारतीय धार्मिक विचाराधाराओं के विरोधी यह कह सकते हैं कि जो महाकाल अपनी रक्षा नहीं कर सका वह अपने भक्तों की रक्षा क्या करेगा? विदेशी विचाराधारा के प्रचारकों ने अनेक पत्थर की मूर्तियों को तालाब मे डुबोकर इस तरह के तर्क ही दिये।  भारतीय बुद्धिमानों ने भी लकड़ी की मूर्तियां जलाकर यह तर्क दिये कि जो अपने को जलने से नहीं बचा सका वह अपने भक्तों को इस सांसरिक आग से क्या बचायेगा? बहरहाल इस तरह की बहसें धर्म से अधिक अधर्म को ही जन्म देती हैं।
                              भारत की प्राचीन नगरी में स्थित महाकाल के गर्भ में बाढ़ आयी फिर भी वहां प्रतिमायें बची रहीं-उनकी शक्ति का प्रमाण तर्क के रूप में आस्थावान  दे सकते हैं।  इस तरह के विवाद और उनका प्रतिकार करना अज्ञान तथा अहंकार का ही प्रमाण होता है।
                              अध्यात्मिक साधकों के लिये महाकाल के गर्भ गृह में जल देवता के प्रवेश करना पूरे विश्व में भौतिकता के नाम पर प्रकृत्ति से छेड़छाड़ के दुष्परिणाम के अलावा कुछ नहंी है । महाकाल जैसे स्थान अध्यात्मिक साधकों के लिये ध्यान आदि के लिये महत्वपूर्ण स्थान होते हैं।  उनकी आस्था में ज्ञान का पुट भी होता है इसलिये वह मूर्तियों के जल में डूबने से विचलित नहीं होते न ही जलदेवता के चुंगुल से  मुक्त होने पर प्रसन्न होते हैं।
                              उज्जैन भारत की सबसे प्राचीन अध्यात्मिक नगरी है।  महान ग्रंथ श्रीमद्भागवत्  गीता के प्रवर्तक भगवान श्रीकृष्ण के गुरु संदीपनि ऋषि यही निवास करते थे।  यहीं विक्रमादित्य नाम के उस राजा ने राज्य किया जिसे राजधर्म का प्रतीक माना जाता है।  हमारी कामना है कि जल्द ही उज्जैन में सामान्य स्थिति वापस हो। मन में इच्छा तो है कि जल्द ही महाकाल के दरबार में ध्यान कर हम अपनी योग साधना का परीक्षण करें।
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Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Tuesday, July 14, 2015

क्रिकेट के काले पन्नों पर न्याय की मुहर लगी-हिन्दी चिंत्तन लेख(cricket ke kala panno par nyay ki muhar lagi-hindi thoght article)


                             प्रचार माध्यमों के अनुसार न्यायाधीश मुदगल की क्रिकेट के संबंध में जारी रिपोर्ट से नये क्रिकेट प्रेमियों को चौंका सकती है पर पुराने लोग जानते हैं कि इस खेल की आड़ में बहुत सारे काले कारनामे चलते रहे हैं। स्थिति यह है कि हम तो भारत की क्रिकेट टीम को देश की बजाय भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड यानि बीसीसीआई की टीम मानते हैं।  अनेक बार अपने व्यंग्यों में यह बात लिख चुके हैं कि जीती तो हमारी टीम हारी तो बीसीसीआई मानते हैं। हम जैसे दर्शक देश के प्रति संवेदनशील होने के कारण बीसीसीआई टीम के जीतने पर प्रसन्न होते थे हारती थी तो मन उदास हो जाता था।
                              करीब बारह वर्ष पूर्व जब पहली बार इसमें सट्टेबाजी की बात सामने आयी तब दुःख जरूर हुआ पर हैरानी नहीं हुई। हमने देखा था कि अनेक मैच देश के नाम से खेल रही टीम जीतते हुए हार जाती थी।  उसके बाद मन ऐसा टूटा कि फिर कभी क्रिकेट को कभी देशप्रेम से नहीं जोड़ा।  फिर भी कभी कभी देख ही लेते हैं। अभी हाल ही में विश्व कप प्रतियोगिता आस्ट्रेलिया में हुई थी।  अंतर्जाल पर कुछ लोगों ने स्पष्ट कह दिया था कि यह टीम सेमीफायनल से आगे नहीं जायेगी।   बीसीसीआई की टीम सेमीफायनल तक ठीकठाक चली।  जिस दिन सेमीफायनल था उस दिन भारत के हिन्दी टीवी चैनल ने संकेत दिया कि सट्टेबाजों की फायनल में जगह बनाने वाली टीमों में बीसीसीआई पंसदीदा नहीं है। हमारा दिल बैठ गया।  मैच देखने फिर भी बैठे रहे। एक समय लगा कि बीसीसीआई की टीम सट्टेबाजों की पंसद तोड़कर रहेगी।  फिर लड़खड़ाई और फिर डटकर खेलती दिखी। अंततः ऐसी लड़खड़ाई कि हार ही गयी।  यह जरूर कहा जाता है कि भारत के समाचार टीवी चैनल क्रिकेट से कमाते हैं इसलिये इसमें हो रही काली करतूतों को छिपाते हैं पर उनकी इस बात की प्रशंसा करना चाहिये कि अप्रत्यक्ष रूप से सच कह भी देते हैं। यही कारण है कि हमारा मन इतना कड़ा था कि जैसे ही बीसीसीआई की टीम को हार की तरफ बढ़ते देखा टीवी में चैनल बदल दिया।  उस दिन कोई समाचार चैनल न देखकर टीम की हार के विश्लेषण देखने से बचते रहे। इस बात का अफसोस था कि काहे फिर क्रिकेट से दिल लगाया था।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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Saturday, July 4, 2015

विश्व महागुरु बनने के लिये विज्ञान में आत्मनिर्भरता जरूरी-हिन्दी चिंत्तन लेख(vishwa guru ke liye vigyan atmanirbharta jaroori-hindi thought article)


      हमारा मानना है कि भारत में अगर अंतर्जाल पर गूगल जैसा सक्षम स्वदेशी मस्तिष्क यानि सर्वर बन जाये तो विश्व पटल पर हमारा देश महागुरु बन जायेगा। कुछ उत्साही लोग अपने देश भाारत को विश्व गुरु दोबारा बनाना चाहते है-उनकी बातों ये तो यह लगता है कि  वह मानते हैं कि यह पदवी अब हमारे पास नहीं है-इसलिये तमाम तरह के अभियान चलाते हैं।  हमारे श्रेष्ठ ग्रंथ श्रीमद्भागवत गीता में ज्ञान के साथ विज्ञान को भी महत्व दिया गया है। उसके संदेश के अनुसार तो  तत्वज्ञान में स्थित होकर कर्म से वैराग्य लेने की जाय उसमें तत्पर होकर विज्ञान के साथ जीवन पथ पर विकास करना ही चाहिये।
                              अनेक लोगों को यह भ्रम है कि भारत के तीस चालीस पूंजीपतियों की संपत्ति गुणात्मक रूप से बढ़ने पर से देश विश्व की आर्थिक शक्ति बन जायेगा।  इनमें से भी तीन चार ने अगर विश्व बाज़ार पर कब्जा कर लिया तो भारत ही महाशक्ति कहलायेगा।  उसी तरह कुछ लोगों में यह अंधविश्वास भी है कि दस पांच कथित पेशेवर गुरु विदेशों में जाकर वहां की धार्मिक विचाराधाराऐं मानने वालों में अपने ज्ञान का वाचन करेंगे तो  अभी भी विश्व गुरु कहा जायेगा।  अन्य देशों में जहां वर्तमान में सर्वशक्तिमान के भारतीय स्वरूपों की दरबार  नहीं है वहां बन जाने पर शंख की ध्वनि तथा आरती के स्वर बजने से भारत के ज्ञान की पताका फहरायगी-ऐसे विचार करने का कोई मतलब नहीं।  हमारा मानना है कि किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा तब बढ़ती है उसके पास इतना धन हो जाये जब वह उदारता से दान कर सके।  समाज की प्रतिष्ठा तब बढ़ती है जो न स्वयं आत्मनिर्भर हो वरन् दूसरे समुदाय की भी सहायता करे।  राष्ट्र की प्रतिष्ठा तब बढ़ती है जब ज्ञान, विज्ञान और धन की दृष्टि भरपूर होने के साथ ही दूसरे राष्ट्रों की भी सहायता करे।  हमारे देश में अंतर्जाल पर इतनी निर्भरता बढ़  गयी है पर फिर भी हमारे पास अपना स्वदेशी सर्वर नहीं है।
                              हम अभी भी सामान्य जनजीवन के लिये विदेशों पर आश्रित हैं।  अगर विदेशी कंपनियां किसी दिन बंद हुईं या उनके प्रबंधकों की नाराजगी हुई तो वह अपनी सेवायें बंद कर या बाधिक कर यहां अव्यवस्था फैला सकती हैं।  भारी भरकम पूंजी स्वामी और उच्च तकनीकी विशारद होते हुए भी हम प्रबंध कौशल के अभाव में आगे नहीं बढ़ पाये। हमारे तकनीशियन विदेशों में जाकर नाम कमा रहे हैं क्योंकि उनके लिये यहां  विकास के अवसर नहीं बन पाते।  हमें अपनी आंतरिक समस्याओं से निजात पानी होगी तब विश्व में अपना खोया सम्मान पा सकेंगे।
                              अभी 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया गया। यह हमारे योग साधना ज्ञान की श्रेष्ठता का प्रमाण है पर विज्ञान में श्रेष्ठता के अभाव में हमारा देश अभी बहुत पीछे है। यही कारण है कि हमारे देश के कुछ कुंठित विद्वान विदेशी विचाराधाराओं के वैज्ञानिक होने का दावा करते हैं।  ज्ञान की दृष्टि से भारत हमेशा ही विश्व गुरु रहा है अब तो महागुरु की पदवी धारण करने का समय है।  यह तभी संभव है जब हम आधुनिक तकनीकी के आधार पर न केवल स्वयं आत्मनिर्भर होंगे वरन् दूसरों के सहायक भी बनेंगें।  इसलिये अंतर्जालीय स्वदेशी मस्तिष्क का निर्माण होने के लिये तत्परता से प्रयास किये जाने चाहिये।
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Saturday, June 27, 2015

स्वर्ग प्राप्ति का मोह अज्ञान का प्रमाण-भर्तृहरि नीति शतक के आधार पर चिंत्तन लेख(swarga prapti ka moh agyan ka praman-A Hindu hindi religion thought based on bhartrihari neeti shatak)

                              भगवान श्रीकृष्ण से श्रीमद्भागवत गीता में वेद वाक्यों में स्वर्ग दिलाने वाले वाक्यों से प्रीति रखने वाले लोगों को अज्ञानी बताया है। हमारे यहां से धार्मिक सत्संग तथा अन्य सामूहिक कार्यक्रमों की परंपरा रही है जिसमें अनेक पेशेवर विद्वान लोगों को स्वर्ग का मोह दिखाते हैं।  उन्हें कथित रूप से स्वर्ग प्राप्ति के लिये काम, क्रोध, लोभ, मोह तथा अहंकार से मुक्त होकर कार्य करने के लिये प्रेरणा देते हैं। ऐसे कथित विद्वान स्वयं सारी जिंदगी संपति, शिष्य तथा प्रतिष्ठा अर्जित करने में बिताते हैं पर दूसरों को भ्रम में डालते हैं।
भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि
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स्वपरप्रतारकोऽसौ निन्दति योऽलीपण्डितो युवतीः।
यस्मामात्तपसोऽपि फलं स्वर्गस्तस्यापि फलं तथाप्सरसः।।
                              हिन्दी में भावार्थ-शास्त्रों के ज्ञान का अधकचरा ज्ञान रखने वाले अनेक कथित विद्वान अपने तथा पराये सभी को धोखा देते हैं क्योंकि वह जिस तप की बात करते हैं वह स्वर्ग की प्राप्ति के लिये होता है जहां अप्सरायें और भोग विलास की प्रधानता है।
                              हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार हर मनुष्य अपने कर्म का फल स्वयं ही भोगता है। वह अपने संकल्प के अनुसार ही अपने जीवन में स्वर्ग और नरक का वातावरण बनाता है। यह संभव नहीं है कि  मनुष्य का कर्म दूसरा भोगे।  मनुष्य स्वयं ही अपने को संकट में डालता है या उद्धार करता है।  कितना भी सत्संग, भजन और शास्त्र पढ़ ले जब तक उसके कर्म, विचार और बुद्धि शुद्धि नहीं होगी तब तक कष्ट ही भेागेगा।  योग साधना से अपनी देह, मन और विचारों को शुद्ध रखने वाले इस संसार में स्वर्ग न भोगें पर कम से कम नारकीय स्थिति से दूर रहते हैं।
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Saturday, June 20, 2015

योग साधना से दृष्टिकोण बदलता है-विश्व योग दिवस 21 जून पर विशेष संपादकीय लेख(yoga sadhana se drishtikon badalata hai-A Hindu hindi thoughta article on world yoga day, internation yoga day21 june 2015)

                                                        ’‘योग हमारे जीवन की स्थितियां नहीं बदलता पर उन्हें देखने को दृष्टिकोण बदलता है।’’योगाचार्य आंयगार की एक शिष्या ने अपने गुरु का संदेश सुनाते हुए कहा।  टीवी पर उनका यह विचार देखकर खुशी हुई।  इसे सुनकर एक विचार हमारे मन में आया कि योग से जुड़े लोगों का चिंत्तन एक ही दिशा में इसलिये होता है क्योंकि उनके कदम एक ही धरातल पर होते हैं।  योग साधक सहज होते हैं इसलिये उनका चिंत्तन सीमित दायरे में होने के बावजूद व्यापक दृष्टिकोण वाला होता है जबकि सामान्य मनुष्य अनेक धरातलों पर कदम रखते हुए असीमित दायरों में सोचते हैं इसके बावजूद उनका दृष्टिकोण संकुचित हो जाता है।
                              योग से साधक के चिंत्तन को वायु जैसी गति, अग्नि जैसी शक्ति और जल जैसी निर्मल भक्ति प्राप्त होती है और वह जीवन में वैचारिक रूप से स्वतंत्र होकर आकाश में विचरते हुए  विषयों में प्रवेश करता है जबकि सामान्य मनुष्य विषयों की बोतल में सदैव बंद रहता है-एक तरह से कूंऐं का मेंढक हो जाता है।  लगातार योग तथा ज्ञान साधना करते हुए इस लेखक ने भी यह निष्कर्ष निकाला कि योग साधना से कोई सिद्ध नहीं बनता वरन् साधक का दृष्टिकोण सबसे अलग और सटीक हो जाता है इसलिये वह सिद्ध दिखता है।  एक योग साधक की हमेशा ही सत्संग चर्चा में रहती है। दूसरों के विचार सुनने पर यह पता लगता है कि हम अकेले ऐसा सोचने वाले नहीं है। साथ ही यह भ्रम भी दूर होता है कि हमने ही ऐसा सोचा था।
21 जून को विश्व योग दिवस पर टीवी पर अनेक ऐसे कार्यक्रम देखने को मिले जो रुचिकर थे। कुछ चैनल तो इस योग दिवस में भारत से बाहर उत्पन्न वैचारिक धाराओं के विद्वानों को इसके विरोध में लाकर अपने कार्यक्रमों में निष्पक्षता का रस विष की तरह घोलते रहे-यह अलग बात है कि दृढ़ संकल्पित योग साधकों में विष पचाने की क्षमता होती है- पर कुछ ने वाकई ऐसे कार्यक्रम प्रसारित किये जिससे लगा कि योग साधना का वैश्वीकरण तो बहुत पहले ही चुका है जबकि अब जाकर उसे स्वीकार किया गया है। अनेक विदेशी योग शिक्षकों को योग कराते देखकर अच्छा लगा।  योग के अनेक नाम सुनने को मिले-जैसे नृत्य और मुक्केबाजी योग आदि। योग के प्रति अंग्रेज तथा अमेरिकन लोगों की निष्ठा ने हृदय को इतना प्रभावित किया कि लगने लगा कि हम भारतीय योग की नहीं वरन् विश्व योग की बात कर रहे हैं।
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Wednesday, June 3, 2015

सर्वशक्तिमान पर निरर्थक बहस-हिन्दी चिंत्तन लेख(discussion on God(men or women-A hindu hindi thought article)


    प्रचार माध्यमों के अनुसार ब्रिटेन में इस बात पर बहस छिड़ी है कि गॉड स्त्री है या पुरुष! हमारे हिसाब से उन्हें इस बात पर बहस करना ही नहीं चाहिये क्योंकि अंग्रेजी में स्त्री या पुरुष की क्रिया के वाचन शब्द का कोई विभाजन ही नहीं है। स्त्री कार्य कर रही है(Women is working) या पुरुष कार्य कर रहा है(Men is working) इसमें अंग्रेजी वर्किंग शब्द ही उपयोग होता है। यही कारण है कि अनेक कट्टर हिन्दी समर्थक अपनी भाषा को वैज्ञानिक और अंग्रेजी को भ्रामक मानते हैं। यह बहस देखकर उनके तर्क स्वाभाविक लगते हैं|
   सर्वशक्तिमान की स्थिति पर भारतीय दर्शन स्पष्ट है। हमारे यहां परब्रह्म शब्द  सर्वशक्तिमान के लिये ही उपयोग  किया जायेगा।  मुख्य बात यह कि वह अनंत माना जाता है-यह स्पष्ट किया गया है कि वह चित में धारण किया जा सकता है पर वह रूप, रस, गंध, स्वर और स्पर्श के गुणों से नहीं जाना जा सकता। वह चिंत्तन से परे है पर मनुष्य अपने चित्त में जिस गुण से उसका स्मरण करेगा वही उसका ब्रह्म है।
         हमारे यहां विदेशी विचाराधारा के प्रवर्तक सब का सर्वशक्तिमान एक है का नारा लगाते हुए यहां भ्रम पैदा करते हैं। सद्भाव के नाम पर यही नारा लगाते हैं पर सच यह है कि वह एक है कि अनेक, यह कहना या मानना संभव नहीं। अनेक विद्वान तो यह भी कहते हैं कि वह है भी कि नहीं इस पर भी कुछ नहीं कहा जा सकता क्योंकि वह अनंत है। इसलिये उस पर बहस करना ही नहीं चाहिये। वह वैसा ही है जैसा भक्त है। भक्त जिस रूप में चाहता है उसे धारण कर ले। हमारे यहां अनेक साकार स्वरूप माने जाते हैं। भक्ति को जीवन का अभिन्न भाग माना जाता है। यही कारण है कि निराकार परब्रह्म की कल्पना में असहजता अनुभव करने वाले साकार रूप में उसे स्थापित करते हैं पर उनमें यह ज्ञान रहता ही है कि वह अनंत है। अपने अपने स्वरूपों को लेकर बहस कहीं नहीं होती। यह तत्वज्ञान हर भारतीय विचारधारा में स्थापित है  इसलिये यहां ऐसी निरर्थक तथा भ्रामक चर्चा कभी नहीं होती।
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Thursday, May 28, 2015

भारतीय अध्यात्म दर्शन में जीवमात्र के बीच भेदभाव वर्जित-हिन्दी चिंत्तन लेख(bhartiya adhyatma darshan mein jeevmatra ke beech bhedbhav varjit-hindi thought article)

अज्ञानी मनुष्यों के दूसरों के प्रति भेदभाव की प्रवृत्ति स्वभाविक रूप से रहती है जबकि ज्ञानी लोग मनुष्य और मनुष्यों के बीच की बात तो छोड़िये इस प्रकृत्ति के जीवों में ही भेद नहीं करते। हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार जीवन की 84 लाख यौनियां होती हैं। अक्सर यह कहा भी जाता है कि जो जीव भगवान नाम का स्मरण करेगा वह 84 के चक्कर से बच जायेगा। भक्त के सच्ची पहचान भी यही बताई गयी है कि वह किसी भी जीव को हेय न समझे। सभी को सम्मान दे। यही कारण है कि भारत में वानर, सिंह, चूहे तथा सर्प को भी जनमानस में भगवतस्वरूप स्थापित किया गया है। एक सामान्य भारतीय कभी भी पशु और पक्षी तक को अपमान की दृष्टि से नहीं देखता।  यह अलग बात है कि पाश्चात्य शिक्षा के चलते हमारे देश में वहां प्रचलित भेदभाव आ गया है। लोगों की सोच अब पूरी तरह से देसी न होकर पश्चिमी हो गयी है। इसी कारण हमारे देश में भेदभाव बढ़ा है।
भारतीय अध्यात्मिक दर्शन में मूलतः जीव मात्र में ही भेदभाव की प्रेरणा नहीं दी जाती। मध्यकाल के दौर में जब भारतीय समाज पर विदेशी लोगों के हमले हुए और उस दौरान तत्कालीन समाज पर नियंत्रण के लिये उनके दलालों ने यहां पर बौद्धिक प्रकृत्ति बदलने का प्रयास किया।  उस दौरान अनेक भारतीय चिंत्तकों ने समाज को बचाने के लिये कुछ ऐसे मार्ग तलाश करने चाहे जो विदेशी तथा देसी सोच के साथ ही  लोगों के बीच भेद दिखाने वाले थे। उनके सिद्धांत अच्छे या बुरे थे यह अलग से बहस का विषय है पर चिंत्तकों की नीयत पवित्र थी यह तय है।
समय के साथ भारतीय समाज परिवर्तनशील रहा है।  वह केवल अपने दर्शन से तत्कालीन संदर्भों में बेहतर संदेश ही स्वीकार करता है। उस पर रूढ़ता का आरोप नहीं लगाया जा सकता है। विदेशी कू्रर लोगों के शासन तथा उनके बौद्धिक दलालों से संघर्ष के कारण भारतीय अध्यात्मिक विचाराधारा का प्रवाह अवरुद्ध हुआ पर इसे रूढ़ता नहीं माना जा सकता। बहरहाल हमारा यह मानना है कि मनुष्य ही नहीं वरन् जीव मात्र में ही भेद करना हमारे अध्यात्मिक के सिद्धांतों के विपरीत है।
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Sunday, May 10, 2015

संकल्प में सर्वजन हिताय की कामना स्थापित करें-हिन्दी चिंत्तन लेख(sankalp mein sarwjan hitay ki kamana sthaapit karen-hindi thought article)


जिस तरह यह संसार परमात्मा के संकल्प के आधार स्थित है वैसे ही हमारे हृदय  और मस्तिष्क के संकल्प के अनुसार ही हमारा जीवन चलता है। अगर हम दूसरे के कार्य में विघ्न आने की संभावना आने पर खुश होते हैं तो यह तय मानिये कि  कि हमारे काम में विघ्न आयेंगे हालांकि तब हमारे अंदर यह विचार नहीं आता कि हमारे किस संकल्प के कारण यह हुआ?
हमें अपने अंदर स्थित समस्त इंद्रियों में पवित्रता का संकल्प स्थापित करना ही चाहिये।  ऐसा नहीं हो सकता कि हम मन में घृणा रखें और वाणी में मीठे शब्द विष की तरह उपयोग करें। हम अपने कर्ण से अच्छे स्वर सुनना चाहें पर मन के वश ऐसे स्थानों पर जायें जहां दृश्य तो अनूकूल हो पर स्वर विपरीत मिलें। वहां चक्षु और वाणी का सुख तो मिले पर कर्णों को अप्रिय स्वर घेर लें।  कहने का अभिप्राय यह है कि हमें पवित्रता, शुद्धता और सहजता के भाव को पहले अपने मूल स्थान पर स्थापित करें। इससे हमारा संकल्प सौंद्रर्य भाव में स्थित हो जायेगा तो जीवन के धारा भी उसी में प्रवाहित होगी।

समय समय  पर आत्ममंथन करें कि  कहीं हमारे अंदर किसी के प्रति विद्वेष या घृणा का भाव तो नहीं आ रहा? हम दूसरों के अनिष्ट पर प्रसन्न तो नहीं हो रहे? हम दूसरो के गुणों की बजाय उसमें दोषों पर तो ध्यान नहीं दे रहे?
नकारात्मक विचारों से हमें दूर रहने का अभ्यास इस तरह करना चाहिये कि कभी किसी के लिये विद्वेष, घृणा या निंदा का भाव नहीं आये। हमें दूसरों की उन्नति, उत्थान और सुख की कल्पना करना चाहिये। हम अकेले इस संसार का भाग नहीं होते। इतना ही नहीं हम जिन सुविधाओं का उपयोग करते हैं वह भी समूह में मिलती हैं। सूर्य की उष्मा, चंद्रमा की शीतलता और बादलों का अमृत सभी के लिये बरसता है। हम किसी दूसरे के खेत पर अकाल या बाढ़ की कामना नहीं कर सकते क्योंकि प्रकृति ने हमें समूह में बांधा है।  हम पड़ौसी के घर पर संकट की कामना नहीं कर सकते क्योंकि वह हमसे भी जुड़ा है। इसलिये हमें सर्वजन हिताय संकल्प रखन चाहिये। यही जीवन का अंतिम सत्य है। इसे हम तत्वज्ञान भी कह सकते हैं।
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Saturday, March 21, 2015

संतोषी मनुष्य किसी की परवाह नहीं करता-भर्तृहरि नीति शतक के आधार पर चिंत्तन लेख(santoshi manushya kisi ki parvah nahin karta-A Hindu hindu religion thought based on bhartrihari neeti shatak)



            कहा जाता है कि संतोष सबसे बड़ा धन है पर आज हम जब समाज में इस सिद्धांत के आधार पर दृष्टि डालते हैं तो आभास होता है कि लोग माया की दृष्टि से अधिक धनी जरूर हो गये पर मानसिक रूप से बहुत दरिद्र हैं।  स्थिति यह है कि धन, पद और प्रतिष्ठा के अभाव से त्रस्त अनेक लोग आत्महत्या कर स्वयं को जीवन से मुक्ति दिला देते हैं।  नश्वर देह को समय से पहले ही नष्ट करना अने लोगों को  अच्छा लगने लगा है।
            हमारे एक मित्र ने एक किस्सा सुनाया जो  हमें अत्यंत रुचिकर लगा । वह मित्र अपनी धर्मपत्नी के साथ मंडी गये थे।  वहां उनका एक परिचित दूधिया अपनी साइकिल छायादार स्थान पर खड़ी कर गर्मी में बटी खा रहा था।  उसके पास आठ दस बटियां थीं। सभी जानते हैं कि गर्मी में बटियां खाने से पानी की कमी नहीं होती।  हमारे मित्र ने उस दूधिया से कहा-‘अरे, इतनी सारी बटियां जमा कर रखी हैं। सभी खाओगे या बचाकर घर ले जाओगे?’’
            उस दूधिया ने कहा कि-‘‘सभी खाऊंगा। मेरा घर यहां से सात  किलोमीटर दूर है। इस गर्मी में साइकिल चलाते हुए यही बटियां मेरे पेट में कूलर का काम करेंगी।’’
            हमारे मित्र ने उसकी आंखों में जो आत्मविश्वास देखा उससे वह आत्मविभोर हो गये।  उन्होंने अपनी पत्नी से कहा-‘‘पता नहीं यह गलतफहमी अनेक समाज सेवकों  को क्यों है कि गरीब और परिश्रमी लोग जीवन में मुश्किलों से हार जाते हैं। ऐस लोगों को देखो तो लगता है कि गरीब होना ही दुःख का प्रमाण नहीं है।  इस लड़के की आंखों में जो आत्मविश्वास था वह हम जैसे सभ्रांत वर्ग के बच्चों के पास कहां होता है? सबसे बड़ी बात यह कि गरीबों को भिखारी मानकर विचार नहीं करना चाहिए।’’

भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि

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वयमिह परितृष्टा वल्कलैस्त्वं दुकूलैस्सभ इह परितोषे निर्विशेषो विशेषः।

स तु भवतु दरिद्रो यस्य तृष्णा विशाला मनसि च परितुष्टे कोऽर्थवान् को दरिद्रः।।

            हिन्दी में भावार्थ-हे राजन्! हम पेड़ की छाल के वस्त्र पहनकर संतुष्ट हैं तो तुम रेशमी परिधान पहनकर प्रसन्न हो। संतोष तो हम दोनों को ही है तब विरोध वाली बात कहां है? इसमें विशेष कुछ नहीं है। दोनों ही संतुष्ट है तब अंतर नहीं है। मगर जो दरिद्र है पर जिसकी इच्छायें अधिक है उसका अगर मगर संतोष से भर जाये तो धनिक और दरिद्र में अंतर कहां रह जाता है।

            आधुनिक राज्यव्यवस्थाओं में पूरे विश्व के शिखर पुरुष हमेशा ही गरीबों के मसीहा होने का दावा करते हैं यह अलग बात है कि उनके प्रशासनिक तंत्र की नीतियां और कार्यशैली इसके विपरीत दिखती हैं।  गरीब, बेसहारा, बूढ़े, कमजोर तथा विकलांग की सेवा के नारे पूरे विश्व में लगते हैं।  तब ऐसा लगता है कि बस इस धरती पर देवता प्रकट होने वाले ही है।  ऐसा होता नहीं क्योंकि इस तरह के नारे लगाने वालों का उद्देश्य केवल प्रचार के माध्यम से अपना अर्थ साधने का होता है।  सभी गरीब भीख नहीं मांगते और श्रम से जीने वाले सभी लोग धनिक होने का सपना देखकर अपना समय भी नष्ट नहीं करते।  अभावों में जीने वाले जिंदा हैं तो संपन्न लोगों को अपनी रक्षा की चिंता खाये जाती है।
            इसलिये किसी गरीब को देखकर उस पर हंसना नहीं चाहिये और न ही अपनी संपन्नता के मद में रहकर जीवन बिताना चाहिये। जिसके पास मन का संतोष है वही सबसे बड़ा धनी है। बढ़त राजरोगों के बढ़़ते प्रभाव से तो यही निष्कर्ष निकलता है।


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Sunday, January 25, 2015

अज्ञानी के पास ज्ञानी नहीं रह सकते-हिन्दी चिंत्तन लेख(agani sa paas gyani nahin rah sakte-hindi thought article)



            इस संसार में चार तरह के के भक्त पाये जाते हैं-आर्त, अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी।  श्रीमद्भागवत् गीता में श्रीकृष्ण ने स्पष्ट कहा है कि उन्हें ज्ञानी भक्त ही प्रिय है।  यह सभी मानते हैं कि श्रीगीता हमारी धार्मिक विचाराधारा का आधार ग्रंथ है पर आधुनिक संदर्भ में उसको समझ पाने की क्षमता उन लोगों में नहीं हो सकती जो धर्म से ही भौतिक समृद्धि की आशा करते हैं। इस तरह की भौतिक समृद्धि आर्ती तथा अर्थार्थी भाव वाले भक्त से धन मिलने पर ही संभव है जिनके लिये अध्यात्मिक तत्वज्ञान केवल सन्यासियों का विषय है।  उनके लिये अंदर के प्राणों से अधिक बाह्य विषयों की तरफ आकर्षित मन ही स्वामी होता है। आर्त भाव से अपनी समस्याओं के निराकरण तो अर्थार्थी अपनी भौतिक सिद्धि के लिये देव मूर्तियों पर धन चढ़ाते हैं।  वह चमत्कारों तथा दुआओं पर यकीन करते हैं।  उन्हें यह समझाना कठिन है कि सांसरिक विषयों का संचालन माया से स्वतः ही होता है।  अध्यात्मिक ज्ञान से प्रत्यक्षः समृद्धि नहीं आती पर देह, मन और पवित्रता की वजह से जो आनंद प्राप्त होता है  उसका मूल्य मुद्रा से आंका नहीं जा सकता। मगर समाज का अधिकांश वर्ग पश्चिमी प्रभाव के कारण प्रत्यक्ष प्रभुता में ही आनंद ढूंढ रहा है ऐसे में किसी से ज्ञान चर्चा भी व्यर्थ लगती है।

कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया है कि

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निरालोके हि लोकेऽस्मिन्नासते तत्रपण्डिताः।

जात्यस्य हि मणेर्यत्र काचेन समता मता।।

                        हिंदी में भावार्थ- अज्ञान के अंधेरे में रहने वाले अज्ञानी के पास विद्वान रहना पसंद नहीं करते।  जहां मणि हो वहां कांच का काम नहीं होता उसी तरह विद्वान के पास अज्ञानी के लिये कोई स्थान नहीं है।

            हम अक्सर समाचारों में यह सुनते हैं कि दक्षिण के एक मंदिर तथा महाराष्ट्र के  मुख्य संाई बाबा पर करोड़ों का चढ़ावा आता है।  वहां सोने के मुकुट और सिंहासन चढ़ाये जाते हैं।  एक बात निश्चित है कि छोटी रकम का चढ़ावा कोई सामान्य इंसान कर सकता है पर अगर भारी भरकम की बात हो तो यकीनन ईमानदारी की आय से यह संभव नहीं है। हम देख रहे हैं जैसे जैसे देश में काले धन की मात्रा बढ़ रही है वैसे वैसे ही चढ़ावा भी बढ़ रहा है।  हम यह कह सकते हैं कि जिस तरह नैतिकता का पैमाना नीचे जा रहा है वैसे ही पाखंड का स्तर ऊंचा जा रहा है। अध्यात्मिक ज्ञान से प्रत्यक्षः समृद्धि नहीं आती पर देह, मन और पवित्रता की वजह से जो आनंद प्राप्त होता है  उसका मूल्य मुद्रा से आंका नहीं जा सकता। मगर समाज का अधिकांश वर्ग पश्चिती प्रभाव के कारण प्रत्यक्ष प्रभुता में ही आनंद ढूंढ रहा है ऐसे में किसी से ज्ञान चर्चा भी व्यर्थ लगती है।
            अध्यात्मिक ज्ञान साधकों के लिये धर्म के नाम पर कर्मकांडों का तमाशा अधिक महत्व नहीं रखता पर अपने मन की बात सार्वजनिक रूप से कहते भी नहीं है क्योंकि श्रीमद्भागवत गीता में स्पष्टतः कहा गया है कि ज्ञानी कभी भी अज्ञानियों को अपनी भक्ति से विमुख करने का प्रयास न करे।  न ही वह उनकी राय का अनुमन करे।

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