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Saturday, July 10, 2010

वेदांत दर्शन साहित्य-इच्छानुसार अभक्ष्य भोजन करना निषेध (kharab khana nishedh)

सर्वानन्नुमतिश्च प्राणात्ययेतद्दर्शनात्।।
हिन्दी में भावार्थ-
अन्न बिना प्राण न रहने की आशंका होने पर ही सब प्रकार के अन्न भक्षण करने की अनुमति है।
आबधाच्च
हिन्दी में भावार्थ-
वैसे आपातकाल में भी आचार का त्याग नहीं करना चाहिए।
शब्दश्चातोऽकामकारे।।
हिन्दी में भावार्थ-
इच्छानुसार अभक्ष्य भोजन करना निषेध ही है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-
आजकल फास्ट फूड के सेवन की प्रवृत्ति बढ़ रही है जिसे स्वास्थ्य विशेषज्ञ अच्छा नहीं मानते। इसके अलावा तंबाकू की रसायन युक्त पुड़िया की आज की युवा पीढ़ी भक्त हो गयी है जो कि हर दृष्टि से खतरनाक है। समस्या यह है कि यह सब लोग अपनी इच्छानुसार कर रहे हैं। देश का उच्च तथा उच्च मध्यम वर्ग घर में खाने की बजाय बाहर के भोजन करने को उत्सुक रहता है। परिणाम यह है कि देश के अंदर अस्वस्थ लोगों की भीड़ बढ़ती जा रही है। अब स्थिति यह है कि हर बड़े शहर में फाइव स्टार चिकित्सालय खुल गये हैं जिनमें अपने स्वस्थ जीवन की तलाश करने वाले लोगों की भारी भीड़ रहती है। शीतल पेयों को पीना फैशन हो गया है। गर्मी के अवसर पर लोग सादा पानी पीने की बजाय शीतल पेयों से प्यास बुझाते हैं जिससे अनेक प्रकार की बीमारियां होती हैं।
कहने का आशय यह है कि पूरे विश्व में अपने अध्यात्मिक ज्ञान की पहचान रखने वाला भारतीय समाज फैशन की वजह से अंधे रास्ते पर चल रहा है। जिन भक्ष्य पदार्थों तथा अशुद्ध पेयों के सेवन से परे रहना चाहिए उनको फैशन बना लिया है यह जाने बिना कि उनका उपयोग तभी करना चाहिये जब भक्ष्य पदार्थ तथा शुद्ध पेय उपलब्ध न हों। हमारे देश पर प्रकृति की विशेष कृपा है इसलिये ही यहां आज भी भूजल स्तर अन्य देशों से अधिक है। अनेक प्रकार के खनिज पदार्थ तथा प्रकृति संपदा उपलब्ध हैं। हम प्रकृति के आभारी होने की बजाय उससे दूर जा रहे हैं। जिसके कारण हम स्वर्ग में रहते हुए भी नरक के होने का आभास करते हैं। मनुष्य होकर भी पशु पक्षियों की तरह बाध्य होकर फैशन की मार झेल रहे हैं। अतः अपने खान पान को लेकर सजग होना चाहिये ताकि हमारी आने वाली पीढ़ियां स्वस्थ और सजग रहें।
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संकलक लेखक  एवं संपादक-दीपक भारतदीप
http://teradipak.blogspot.com

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Sunday, December 20, 2009

विदुर नीति-शरीर रूप रथ की बुद्धि होती है सारथी (vidur niti-sharir hai rath aur buddhi sarthi)

रथः शरीरं पुरुषस्य राजन्नात्मा नियंन्तेनिद्रयाण्यस्य चाश्वाः।
तैरप्रमतः कुशली सवश्वैर्दान्तैः सुखं याति रथीव धीरः।।
हिन्दी में भावार्थ-
नीति विशारद विदुर जी के अनुसार मनुष्य की देह रथ की तरह और बुद्धि उसकी सारथी है। इंद्रियां घोड़े की तरह उसमें जुती हुई हैं। इन घोड़ों को अपनी बुद्धि के कौशल से जो बस में करता है वही अपनी इस देह रूप रथ से जीवन की यात्रा सुख से तय करता है।
अनर्थमर्थतः पश्यन्नर्थ चैवाप्यनर्थतः।
इन्द्रियैरजितैबांलः सुदुःखं मन्यते सुखम्।।
हिन्दी में भावार्थ-
इंद्रियां वश में न होने पर अज्ञानी मनुष्य अर्थ को अनर्थ तथा अनर्थ को अर्थ समझकर भारी कष्ट को भी सुख मान बैठता है।
वर्तमान संदर्भ में सम्पादकीय व्याख्या-जब हम अपने कर्तापन के अहंकार को त्यागकर अपने जीवन को दृष्टा की तरह देखेंगे तभी यह समझ पायेंगे कि हमारी देह का संचालन मन, बुद्धि और अहंकार किस तरह करते हैं। इंद्रियां स्वयमेव संचालित है पर उनका मार्गदर्शन बुद्धि के द्वारा ही होता है। यही बुद्धि उनको ऐसे कामों में लगाती है जिनका परिणाम दिखने में तात्कालिक रूप से लाभकर लगता है पर कहीं न कहीं उसका प्रभाव बुरा पड़ता है। आजकल मनोरंजन के नाम पर चहुं और असत्य और कल्पना को परोसा जा रहा है जिसे देखकर लोग भावनाओं के उतार चढ़ाव के साथ चलते हैं जो उनके मस्तिष्क को भारी कष्ट पहुंचाने वाली प्रक्रिया है। अमेरिका के एक विशेषज्ञ ने बताया है कि जो निरंतर रंगीन टीवी देखते हैं एक समय उनके नेत्रों की रंगों की पहचान करने की क्षमता क्षीण होती है। इससे यह समझा जा सकता है कि रंगीन टीवी पर रंगीन दृश्य देखकर सुखद अनुभूति होती है पर कालांतर में उसका परिणाम कितना बुरा होता है।
यही स्थिति आजकल के संगीत के बारे में भी कही जाती है। तेज आवाज लगातार सुनने से कानों की श्रवण शक्ति पर बुरा प्रभाव पड़ता है पर टीवी चैनल हों या रेडियो कानफाड़ूं संगीत चलाकर लोगों का मनोरंजन कर रहे हैं। सुनने वालों को शायद यह अच्छा भी लगता है पर शरीर पर होने वाले दुष्प्रभावों को कोई नहीं समझता। मन है तो मनोरंजन होगा पर उसके लिये अपने शरीर को हानि पहुंचे वह काम नहीं करना चाहिये। इसके लिये यह जरूरी है कि लोग अपनी बुद्धि का सदुपयोग करें। यही बुद्धि है जो कुशल सारथी हो सकती है बशर्ते हमारा संकल्प ऐसा हो।
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://anantraj.blogspot.com
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