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Saturday, March 21, 2015

संतोषी मनुष्य किसी की परवाह नहीं करता-भर्तृहरि नीति शतक के आधार पर चिंत्तन लेख(santoshi manushya kisi ki parvah nahin karta-A Hindu hindu religion thought based on bhartrihari neeti shatak)



            कहा जाता है कि संतोष सबसे बड़ा धन है पर आज हम जब समाज में इस सिद्धांत के आधार पर दृष्टि डालते हैं तो आभास होता है कि लोग माया की दृष्टि से अधिक धनी जरूर हो गये पर मानसिक रूप से बहुत दरिद्र हैं।  स्थिति यह है कि धन, पद और प्रतिष्ठा के अभाव से त्रस्त अनेक लोग आत्महत्या कर स्वयं को जीवन से मुक्ति दिला देते हैं।  नश्वर देह को समय से पहले ही नष्ट करना अने लोगों को  अच्छा लगने लगा है।
            हमारे एक मित्र ने एक किस्सा सुनाया जो  हमें अत्यंत रुचिकर लगा । वह मित्र अपनी धर्मपत्नी के साथ मंडी गये थे।  वहां उनका एक परिचित दूधिया अपनी साइकिल छायादार स्थान पर खड़ी कर गर्मी में बटी खा रहा था।  उसके पास आठ दस बटियां थीं। सभी जानते हैं कि गर्मी में बटियां खाने से पानी की कमी नहीं होती।  हमारे मित्र ने उस दूधिया से कहा-अरे, इतनी सारी बटियां जमा कर रखी हैं। सभी खाओगे या बचाकर घर ले जाओगे?’’
            उस दूधिया ने कहा कि-‘‘सभी खाऊंगा। मेरा घर यहां से सात  किलोमीटर दूर है। इस गर्मी में साइकिल चलाते हुए यही बटियां मेरे पेट में कूलर का काम करेंगी।’’
            हमारे मित्र ने उसकी आंखों में जो आत्मविश्वास देखा उससे वह आत्मविभोर हो गये।  उन्होंने अपनी पत्नी से कहा-‘‘पता नहीं यह गलतफहमी अनेक समाज सेवकों  को क्यों है कि गरीब और परिश्रमी लोग जीवन में मुश्किलों से हार जाते हैं। ऐस लोगों को देखो तो लगता है कि गरीब होना ही दुःख का प्रमाण नहीं है।  इस लड़के की आंखों में जो आत्मविश्वास था वह हम जैसे सभ्रांत वर्ग के बच्चों के पास कहां होता है? सबसे बड़ी बात यह कि गरीबों को भिखारी मानकर विचार नहीं करना चाहिए।’’

भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि

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वयमिह परितृष्टा वल्कलैस्त्वं दुकूलैस्सभ इह परितोषे निर्विशेषो विशेषः।

स तु भवतु दरिद्रो यस्य तृष्णा विशाला मनसि च परितुष्टे कोऽर्थवान् को दरिद्रः।।

            हिन्दी में भावार्थ-हे राजन्! हम पेड़ की छाल के वस्त्र पहनकर संतुष्ट हैं तो तुम रेशमी परिधान पहनकर प्रसन्न हो। संतोष तो हम दोनों को ही है तब विरोध वाली बात कहां है? इसमें विशेष कुछ नहीं है। दोनों ही संतुष्ट है तब अंतर नहीं है। मगर जो दरिद्र है पर जिसकी इच्छायें अधिक है उसका अगर मगर संतोष से भर जाये तो धनिक और दरिद्र में अंतर कहां रह जाता है।

            आधुनिक राज्यव्यवस्थाओं में पूरे विश्व के शिखर पुरुष हमेशा ही गरीबों के मसीहा होने का दावा करते हैं यह अलग बात है कि उनके प्रशासनिक तंत्र की नीतियां और कार्यशैली इसके विपरीत दिखती हैं।  गरीब, बेसहारा, बूढ़े, कमजोर तथा विकलांग की सेवा के नारे पूरे विश्व में लगते हैं।  तब ऐसा लगता है कि बस इस धरती पर देवता प्रकट होने वाले ही है।  ऐसा होता नहीं क्योंकि इस तरह के नारे लगाने वालों का उद्देश्य केवल प्रचार के माध्यम से अपना अर्थ साधने का होता है।  सभी गरीब भीख नहीं मांगते और श्रम से जीने वाले सभी लोग धनिक होने का सपना देखकर अपना समय भी नष्ट नहीं करते।  अभावों में जीने वाले जिंदा हैं तो संपन्न लोगों को अपनी रक्षा की चिंता खाये जाती है।
            इसलिये किसी गरीब को देखकर उस पर हंसना नहीं चाहिये और न ही अपनी संपन्नता के मद में रहकर जीवन बिताना चाहिये। जिसके पास मन का संतोष है वही सबसे बड़ा धनी है। बढ़त राजरोगों के बढ़़ते प्रभाव से तो यही निष्कर्ष निकलता है।


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Sunday, January 25, 2015

अज्ञानी के पास ज्ञानी नहीं रह सकते-हिन्दी चिंत्तन लेख(agani sa paas gyani nahin rah sakte-hindi thought article)



            इस संसार में चार तरह के के भक्त पाये जाते हैं-आर्त, अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी।  श्रीमद्भागवत् गीता में श्रीकृष्ण ने स्पष्ट कहा है कि उन्हें ज्ञानी भक्त ही प्रिय है।  यह सभी मानते हैं कि श्रीगीता हमारी धार्मिक विचाराधारा का आधार ग्रंथ है पर आधुनिक संदर्भ में उसको समझ पाने की क्षमता उन लोगों में नहीं हो सकती जो धर्म से ही भौतिक समृद्धि की आशा करते हैं। इस तरह की भौतिक समृद्धि आर्ती तथा अर्थार्थी भाव वाले भक्त से धन मिलने पर ही संभव है जिनके लिये अध्यात्मिक तत्वज्ञान केवल सन्यासियों का विषय है।  उनके लिये अंदर के प्राणों से अधिक बाह्य विषयों की तरफ आकर्षित मन ही स्वामी होता है। आर्त भाव से अपनी समस्याओं के निराकरण तो अर्थार्थी अपनी भौतिक सिद्धि के लिये देव मूर्तियों पर धन चढ़ाते हैं।  वह चमत्कारों तथा दुआओं पर यकीन करते हैं।  उन्हें यह समझाना कठिन है कि सांसरिक विषयों का संचालन माया से स्वतः ही होता है।  अध्यात्मिक ज्ञान से प्रत्यक्षः समृद्धि नहीं आती पर देह, मन और पवित्रता की वजह से जो आनंद प्राप्त होता है  उसका मूल्य मुद्रा से आंका नहीं जा सकता। मगर समाज का अधिकांश वर्ग पश्चिमी प्रभाव के कारण प्रत्यक्ष प्रभुता में ही आनंद ढूंढ रहा है ऐसे में किसी से ज्ञान चर्चा भी व्यर्थ लगती है।

कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया है कि

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निरालोके हि लोकेऽस्मिन्नासते तत्रपण्डिताः।

जात्यस्य हि मणेर्यत्र काचेन समता मता।।

                        हिंदी में भावार्थ- अज्ञान के अंधेरे में रहने वाले अज्ञानी के पास विद्वान रहना पसंद नहीं करते।  जहां मणि हो वहां कांच का काम नहीं होता उसी तरह विद्वान के पास अज्ञानी के लिये कोई स्थान नहीं है।

            हम अक्सर समाचारों में यह सुनते हैं कि दक्षिण के एक मंदिर तथा महाराष्ट्र के  मुख्य संाई बाबा पर करोड़ों का चढ़ावा आता है।  वहां सोने के मुकुट और सिंहासन चढ़ाये जाते हैं।  एक बात निश्चित है कि छोटी रकम का चढ़ावा कोई सामान्य इंसान कर सकता है पर अगर भारी भरकम की बात हो तो यकीनन ईमानदारी की आय से यह संभव नहीं है। हम देख रहे हैं जैसे जैसे देश में काले धन की मात्रा बढ़ रही है वैसे वैसे ही चढ़ावा भी बढ़ रहा है।  हम यह कह सकते हैं कि जिस तरह नैतिकता का पैमाना नीचे जा रहा है वैसे ही पाखंड का स्तर ऊंचा जा रहा है। अध्यात्मिक ज्ञान से प्रत्यक्षः समृद्धि नहीं आती पर देह, मन और पवित्रता की वजह से जो आनंद प्राप्त होता है  उसका मूल्य मुद्रा से आंका नहीं जा सकता। मगर समाज का अधिकांश वर्ग पश्चिती प्रभाव के कारण प्रत्यक्ष प्रभुता में ही आनंद ढूंढ रहा है ऐसे में किसी से ज्ञान चर्चा भी व्यर्थ लगती है।
            अध्यात्मिक ज्ञान साधकों के लिये धर्म के नाम पर कर्मकांडों का तमाशा अधिक महत्व नहीं रखता पर अपने मन की बात सार्वजनिक रूप से कहते भी नहीं है क्योंकि श्रीमद्भागवत गीता में स्पष्टतः कहा गया है कि ज्ञानी कभी भी अज्ञानियों को अपनी भक्ति से विमुख करने का प्रयास न करे।  न ही वह उनकी राय का अनुमन करे।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Saturday, December 13, 2014

व्यवसायिक प्रचारक धर्म की रक्षा नहीं कर सकते-हिन्दी चिंत्तन लेख(vyavsayik pracharak dharm ki raksha nahin kar sakte-hindi thought article)


           
            भारतीय अध्यात्मिक दर्शन तथा धर्म को  आमजन की निष्क्रियता से अधिक कथित साधु, संतों और योगियों की अति सक्रियता ने किया है। श्रीमद्भागवत गीता के दर्शन से काम, क्रोध , लोभ, मोह तथा अहंकार छोड़ने का उपदेश देने वाले इन पेशेवर अध्यात्मिक ने जितना संसास के विषयों का उपभोग किया है उतना तो आमजन भी नहीं करते।  एक बात यह हम आपको बता दें कि श्रीमद्भागवत गीता में कोई भी चीज छोड़ने या पकड़ने को नहीं कहा गया है।  त्रिगुणमयी माया में बंधी देह के साथ मन, बुद्धि और अहंकार की प्रकृत्तियों का चक्र बताया गया है।  कर्म के भेद बताये गये हैं।  इन कर्मों की प्रकृत्तियां क्या हैं यह तो बताया गया है पर साथ ही यह स्पष्ट कर दिया है कि उनके बिना अपनी इस संसार में कोई गति नहीं है।  दूसरी बात यह कि काम, क्रोध, मोह, लोभ तथा अहंकार जैसे दोष इस देह के रहते छूट ही नहीं सकते। अलबत्ता तत्वज्ञान से उनके जाल में फंसकर संकट से बचने का उपाय किया जा सकता है।  भारत के कथित संत समाज, अर्थ, प्रकृत्ति तथा विज्ञान से भरे श्रीगीता के वचनों को रटते हैं पर स्वयं समझ नहीं पाते। हम अहंकार की बात बता दें। किसी व्यापारी ने दुकान खोली। वह तत्वज्ञानी है पर अपने यहां रखे सामान के स्वामी होने का बोध उसे रखना ही पड़ेगा ताकि उसके लिये वह ग्राहकों से मूल्य ले सके।  स्वामी होने का यह बोध अहं की ऐसी सीमा है जहां तक उसे जाना ही होगा।  ग्राहक से पैसा लेना और उसे वस्तु देना एक सहज सांसरिक प्रक्रिया है। जहां व्यापारी इस प्रक्र्रिया को स्वयं प्रेरणा से संपन्न समझेगा वहां से अहंकार की वह सीमा प्रारंभ होती है जो दोष पैदा करती है।    उसी तरह काम, क्रोध, लोभ तथा मोह भी त्याज्य नहीं वरन् नियंत्रण योग्य हैं।  आप पूरी गीता पढ़ लें वहां कुछ छोड़ने या पकड़ने के लिये नहीं कहा गया।  आप किस कर्म से क्या बनते हैं-इसकी पहचान श्रीगीता के अध्ययन करने पर ही हो सकती है।
            हमारे देश में अनेक व्यवसायिक संत अपने सांसरिक अपराधों की वजह से जेल यात्रा पर जाते हैं तो उनके अनुयायी विलाप करते हैं। आजकल एक संत की चर्चा है।  सरकारी नौकरी से निकाले गये यह संत आजकल अपने तीना लाख भक्तों की वजह से भगवान बने फिर रहे हैं।  पीछे भारतीय संविधान के रक्षक लगे हैं। उनके कुछ ऐसे अपराध हैं जिसकी वजह से उन्हें जेल भेजा जा सकता है। उनके हमने प्रवचन सुने।  मोह, माया, क्रोध, लोभ तथा अहंकार के जाल में आमजन की अपेक्षा अधिक बुरी तरह यह संत फंसे दिखते हैं।  उनके शिष्य अपने भगवान की रक्षा के लिये बंदूकें ताने खड़े हैं। टीवी पर पूरा दृश्य देखकर कहीं से भी भारतीय धर्म और अध्यात्म का संबंध इससे  नहीं दिखाई देता।  टीवी चैनल पर चल रही बहस में अनेक विद्वान इन संत के कृत्यों का भारतीय धर्म तथा अध्यात्म के संदर्भ में इसलिये अध्ययन कर रहे हैं क्योंकि वह प्राचीन ग्रंथों की बात करते हैं।  इस तरह के प्रवचन तो हमारे देश में कदम कदम पर करने वाले मिल जायेंगे।  अनेक लोग तो इन्हीं प्रवचनों से अपनी रोजी रोटी चलाते हैं-कुछ ज्यादा हिट हुए तो महलनुमा आश्रम बनाने के साथ ही अधिकारीनुमा शिष्य उनके संचालन में नियुक्त करते हैं।
            ऐसा सदियों से चल रहा है। अनेक लोग तो केवल इसलिये धर्म व्यवसाय में आ जाते हैं क्योंकि उन्होंने अपने समय में इसके सहारे समाज में चमक कायम करने वाले लोगों की छवि देखकर वैसा बनने का मन बनाया होता है।  धर्म का अर्थ समझने से अधिक उसे विक्रय की वस्तु बनाने की उनकी ही इच्छा होती है।  सभी सफल नहीं होते जो सफल होते हैं वह राजसी ठाठबाट से रहते हैं।  असफल लोग भी अधिक नहीं तो रोज की रोटी का इंतजाम कर ही लेते हैं। मध्यम रूप से सफल लोग सुविधायुक्त आश्रम आदि बनाकर जीवन बिता देते हैं।
            दरअसल हम यहां श्रीमद्भागवत गीता तथा गुरुग्रंथ साहिब दोनों की चर्चा करना चाहेंगें। श्रीकृष्णजी ने अपने अगले जन्म की बात कहीं नहीं कही बल्कि यह कहा कि जो इस ग्रंथ का अध्ययन करेगा वह इस संसार में सहजता से विचरण करेगा। उन्होंने गुरू सेवा की बात कहीं मगर उसके लिये जो अध्यात्मिक ज्ञान दे। वह न मिले तो श्रीगीता का अध्ययन कर भी जीवन संवारा जा सकता है।  उसी तरह सिख पंथ के  दसवें गुरू श्री गोविंद सिंह जी ने भी गुरूग्रंथ साहिब को ही  गुरु मानने की प्रेरणा दी। उन्होंने एक तरह से गुरू की दैहिक पंरपरा का समापन किया।  गुरूग्रंथ साहिब भी श्रीगीता की तरह एक दैवीय ग्रंथ है-यह भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान साधक मानते हैं।  इधर जब हम अपने देश विशेषतः पंजाब तथा हरियाणा के क्षेत्र की अध्यात्मिक तथा धार्मिक स्थिति की तरफ देखते हैं वहां दैहिक गुरु की पंरपरा बनी हुई है।  अनेक  ऐसे पंथ इसी क्षेत्र से निकलकर आये हैं जो मूलतः सिख धर्म से प्रभावित दिखते हैं पर उनके अनुयायी पवित्र ग्रंथों को गुरु मानकर चलने में असहज अनुभव करते हैं।  उन्हें लगता है कोई दैहिक गुरू उन्हें कर्ण प्रिय शब्द कहकर बहलाये।  ऐसे स्थान बनाये जिसका पर्यटन की तरह इस्तेमाल किया जा सके। सच बात तो यह है कि यह अनुयायी धर्म से अधिक उससे मन बहलाने में अधिक रुचि रखते हैं।  इसी भाव का लाभ पेशेवर संत उठाते हैं।
            इन पेशेवरों से आदर्श स्थापित करने की आशा करना उसी तरह ही व्यर्थ  जैसे किसी दुकानदार से अपनी वस्तु बिना लाभ के मिलने की करते हैं। जो लोग ऐसे गुरुओं के अनुयायी नहीं है वह धर्म के नाम पर तमाशे से दुःखी होते हैं उन्हें ऐसी घटनाओं पर अधिक नहीं सोचना चाहिये।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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Monday, October 6, 2014

स्वार्थी फल न मिलने पर अपनी भक्ति से निराश हो जाते हैं-संत कबीर दर्शन पर आधारित चिंत्तन लेख(swarthi fal n milne se apni bhakti se nirash hote hain-A Hindu hindi religion messege based on sant kabir dashan)



            मानव स्वभाव है कि वह दूसरे पर अपनी श्रेष्ठता दिखाना चाहता है।  इसके लिये वह कई उपाय करता है। इनमें एक है सर्वशक्तिमान के प्रति भक्ति के स्वरूप के आधार पर स्वयं को श्रेष्ठ साबित करना। विश्व के करीब करीब सभी धर्मों में धरती के बाहर स्वर्ग की कल्पना की चर्चा की जाती है हालांकि भारतीय धर्मों में भी कहीं कहीं इस तरह की चर्चा है पर श्रीमद्भागवत गीता में यह स्पष्ट कर दिया गया है कि इस तरह का विचार अज्ञान का प्रमाण है।  यही कारण है कि  हमारे तत्वज्ञानी मानते हैं कि अगर आदमी संयम के साथ जीवन बिताये तो वह इसी धरती पर ही सुख के साथ जीवन बिता सकता है जो कि स्वर्ग भोगने के समान है।  मगर कुछ लोगों को इस बात की बेचैनी रहती है कि वह समाज में श्रेष्ठता साबित करें। वही दूसरों के सामने अपनी भक्ति का प्रचार करते हैं।

संत कबीर दास कहते हैं कि

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मान बड़ाई देखि कर, भक्ति करै संसार।
जब देखैं कछु हीनता, अवगुन धरै गंवार।

            हिंदी में भावार्थ-संत कबीरदास जी कहते हैं कि दूसरों की देखादेखी कुछ लोग सम्मान पाने के लिये परमात्मा की भक्ति करने लगते हैं पर जब वह नहीं मिलता  मूर्खों की तरह इस संसार में ही दोष निकालने लगते हैं।

मान बड़ाई ऊरमी, ये जग का व्यवहार।
दीन गरीबी बन्दगी, सतगुरु का उपकार।।

      हिंदी में भावार्थ-संत शिरोमणि कबीरदास का कहना है कि जिस तरह दुनियां का व्यवहार है उससे देखकर तो यही आभास होता है कि मान और बड़ाई दुःख का कारण है। सतगुरु की शरण लेकर उनकी कृपा से जो गरीब असहाय की सहायता करता है, वही सुखी है।

     वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संसार में ऐसे अनेक लोग हैं जो अपनी धार्मिक छबि बनाये रखने के लिये भक्ति का दिखावा करते हैं। इनमें से कुछ तो ऐसे हैं जो गुरु बनकर अपने लिये शिष्य समुदाय का निर्माण कर अपनी रोजी रोटी चलाते हैं। ऐसे दिखावे की भक्ति करने वाले अनेक लोग हैं। इसके विपरीत जो भगवान की वास्तव में भक्ति करते हैं वह उसका प्रयार नहीं करते न ही अपना ज्ञान बघारते हैं।
     भक्त और ज्ञानी की पहचान यह है कि वह कभी अपनी भक्ति और ज्ञान शक्ति का बखान नहीं करते बल्कि निर्लिप्त भाव से समाज सेवा करते हुए अपना जीवन यापन करते हैं। अपनी सच्ची भक्ति और ज्ञान के कारण कुछ लोग महापुरुषों की श्रेणी में आ जाते हैं उनको देखकर अन्य लोग भी यही प्रयास करते हैं कि उनकी पूजा हो। यह केवल अज्ञान का प्रमाण है अलबत्ता अपने देश में धार्मिक प्रवचन एक व्यवसाय के रूप में चलता रहा है। इस कारण तोते की तरह किताबों को रटकर लोगों को सुनाते हुए खूब कमाते हैं। उनको देखकर कुछ लोग यह सोचते हुए भक्ति का दिखावा करते हैं कि शायद उनको भी ऐसा ही स्वरूप प्राप्त हो। अनेक लोग संतों की सेवा में इसलिये जाते हैं कि हो सकता है कि इससे उनको किसी दिन उनकी गद्दी प्राप्त हो जाये। ऐसे में भक्ति और ज्ञान तो एक अलग विषय हो जाता है और वह मठाधीशी के चक्कर में राजनीति करने लगते हैं। किताबों को रटने की वजह से उनको शब्द ज्ञान याद तो रहता है ऐसे में वह थोड़ा बहुत प्रवचन भी कर लेते हैं पर उनकी भक्ति और ज्ञान प्रमाणिक नहीं है। वैसे भी अपने पौराणिक ग्रंथों का अध्ययन हर आदमी इतना तो कर ही लेता है कि उसे सारी कथायें याद रहती हैं। नहीं भी अध्ययन करे तो इधर उधर सुनकर उसे बहुत सारी कथायें याद आ ही जाती हैं। । किसी आदमी ने वह भी नहीं किया हो तो अपने अध्यात्मिक दर्शन के कुछ सूक्ष्म सत्य-निष्काम कर्म करो, परोपकार करो, दया करो और माता पिता की सेवा करे जैसे जुमले- सुनाते हुए श्रोताओं और दर्शकों की कल्पित कहानियों से मनोरंजन करता है। उनको सम्मानित होते देख अन्य लोग भक्ति में जुट जाते हैं यह अलग बात है कि कामना सहित यह भक्ति किसी को भौतिक फल दिलाती है किसी को नहीं।
      फिर भक्ति हो या ज्ञानार्जन अगर कामना सहित किया जाये और सफलता न मिले तो आदमी संसार में दोष ढूंढने लगता है। यह केवल भक्ति या ज्ञान के विषय में नहीं है बल्कि साहित्य और कला के विषयों में भी यही होता है। आदमी आत्ममुग्ध होकर अपना काम शुरु करता है पर जब उसे सफलता नहीं मिलती तो वह निराश हो जाता है। निष्कर्ष यह है कि सम्मान पाने का मोह आदमी के लिये दुःख का कारण बनता है। एक बात याद रखें सम्मान पाने की चाह पूरी नहीं हुई तो दुःख तो होगा और अगर पूरी भी हो गयी तो अपमान भी हो सकता है। जहां सुख है वहां दुःख भी है। जहां आशा है वहां निराशा भी है। जहां सम्मान है वहां अपमान भी है। अगर सम्मान मिल गया तो चार लोग आपके दोष निकालकर अपमान भी कर सकते हैं।
      इसलिये अच्छा यही है कि अपने कर्म निष्काम भाव से करें। इस संसार में निर्विवाद सम्मान पाने का बस एक ही तरीका है कि आप गरीब को धन और अशिक्षित को शिक्षा प्रदान करें। प्रयोजन रहित दया करें। ऐसे काम बहुत कम लोग करते हैं। जो सभी कर रहे हैं उसे आप भी करें तो कैसा सम्मान होगा? सम्मान तो उसी में ही संभव है जो दूसरे लोग न करते हों। 
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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Saturday, September 27, 2014

तन मन के साथ ही साधना और कर्म के स्थान की शुद्धि आवश्यक-2 अक्टूबर गांधी जयंती पर स्वच्छता अभियान के लिये विशेष लेख(tan man ke sath he sadhan aur karma ke sathan ke shuddhi awashayak- 2 october gandhi jayanti par swachchhata abhiyan ke liye vishesh hindi lekh, clean and green city nececary-A Special hindi religion thought article on gandhiji's birth day)




                    देश में 2 अक्टूबर महात्मा गांधी की जयंती दिवस से स्वच्छता अभियान प्रारंभ होने वाला है। हमारी आधुनिक शिक्षा पद्धति में भारतीय अध्यात्मिक दर्शन नहीं पढ़ाया जाता इसलिये लोग अपनी प्राचीन मान्यताओं का ज्ञान नहीं रखते।  हमारे अधिकतर प्राचीन ग्रंथों ने दैहिक तथा मानसिक स्वच्छता के साथ ही कर्म के स्थान की स्वच्छता पर भी जोर दिया है। यह अलग बात है कि हमारे प्रचार माध्यमों में अक्सर हमारे देश में सार्वजनिक स्थानों, मार्गों तथा उद्यानों में भारी गदंगी होने के समाचार आते हैं। अनेक पुराने लोग यह शिकायत करते मिलते हैं जो राजतंत्र के समय शहर के साफ होने की बात कहते हुए आधुनिक लोकतंत्र में व्यवस्था चौपट होने का दावा करते हैं पर सच यह है कि उस समय उपभोग की ऐसी प्रवृत्ति नहीं थी जैसी कि आज है।  लोगों का खान पान अब घर से अधिक बाहर हो गया है।  अंडे, मांस, सिगरेट, शराब, तथा तैयार  खान पान के सामानों का उपभोग बाजारों में धड़ल्ले से होने लगा है जिससे कचरे का भंडार कहीं भी देखा जा सकता है।  ऐसा नहीं है कि बाजारों में ऐसी वस्तुओं का उपभोग बढ़ा हो वरन् लोग घरों में मंगवाकर भी इन्हें सड़क पर ही फेंकते हैं।
            वर्षा ऋतु में पिकनिक मनाने की परंपरा बन गयी है, यह अलग बात है कि यही ऋतु भोजन के पाचन की दृष्टि से संकटमय मानी जाती है।  आजकल पंचसितारा निजी चिकित्सालयों में इसी ऋतु में भीड़ लगती है।  हर जगह कचरा कीचड़ में तब्दील हो जाता है और इससे महत्वपूर्ण जलस्थल तथा उद्यान सामान्य पर्यटकों के सामने बुरे दृश्य लेकर उपस्थित रहते हैं।  कहा जाता है कि प्लास्टिक कभी नष्ट नहीं होती मगर सभी वस्तुओं को इसी में बांधकर उपभोक्ता को दिया जाता है। अनेक शहरों में  इस प्लास्टिक ने सीवर लाईनों को अवरुद्ध करने के साथ ही नदियों और नालों को प्रदूषित कर दिया है।  हमारे यहां पर्वतों तथा नदियों को पूज्यनीय बताया जाता है पर हिमालय और उससे निकलने वाली नदियों पर जाने वाले कथित भक्तों ने किस तरह वहां अपनी उपभोग प्रवृत्तियों से प्रदूषण फैलाया है उस पर अनेक पर्यावरण विशेषज्ञ नाखुशी जताते रहते हैं।
मनुस्मृति में कहा गया है कि

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समुत्सृजेद्राजमार्गे यस्त्वऽमध्यमनापदि।

स द्वौ कार्यापर्णे दद्यादमेध्यं चाशुशेधयत्।।

            हिन्दी में भावार्थ-सार्वजनिक मार्ग पर कूड़ा फेंकने वाले ऐसे नागरिक जो अस्वस्थ न हों उन पर अर्थ दंड देने के साथ ही उसकी सफाई भी करवाना चाहिये।

आपद्गतोऽधवा वृद्धो गर्भिणो बाल एव वा।

परिभाषणमर्हन्ति तच्च शोध्यमिति स्थितिः।।

            हिन्दी में भावार्थ-यदि कोई संकट ग्रस्त, वृद्ध, गर्भवती महिला तथा बालक सड़क पर कचरा फैंके तो उसे धमकाकर सफाई कराना चाहिये।
            हमारे देश में मनस्मृति का विरोध एक बुद्धिमानों का समूह करता है। यह समूह कथित रूप से आम आदमी की आजादी को सर्वोपरि मानता है।  उस लगता है कि मनुस्मृति में जातिवादी व्यवस्था है जबकि सच यह है कि इसमें ऐसे अनेक महत्वपूर्ण संदेश है जो आज के समय भी अत्यंत प्रासांगिक हैं। एक तरफ समाज प्लास्टिक के रंग बिरंगे रूपों में बंधे सामानों को देखकर विकास पर आत्ममुग्ध हो रहा है  जबकि अनेक प्रकार के विषाक्त, मिलावटी तथा सड़े खानपान से जो बीमारियां पैदा हो रही हैं उस पर किसी का ध्यान नहीं है।  उससे अधिक यह महत्वपूर्ण बात है कि अनेक लोग सार्वजनिक स्थानों को स्वच्छ रखने की बजाय वहां कचरा डालकर न केवल अपने लिये वरन् दूसरों को भी कष्ट देते हैं।  इसलिये जागरुक लोगों को इस बात पर ध्यान देना चाहिये कि वह कचरा उचित स्थान पर डालकर पुण्य का काम करें।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
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Saturday, September 20, 2014

राज्यकर्म में लगे लोगों में धूर्तता का भाव आ ही जाता है-मनुस्मृति के आधार पर चिंत्तन लेख(rajya karma mein logon mein dhoortata ka bhav aa hi jata hai-A Hindu hindi religion thought based o manu smriti)



      हमारे देश में लोकतांत्रिक प्रणाली अवश्य है पर यहां की राज्य प्रबंध व्यवस्था वही है जो अंग्रेजों ने प्रजा को गुलाम बनाये रखने की भावना से अपनायी थी। उन्होंने इस व्यवस्था को इस सिद्धांत पर अपनाया था कि राज्य कर्मीं ईमानदार होते हैं और प्रजा को दबाये रखने के लिये उन्हें निरंकुश व्यवहार करना ही  चाहिये।  राजनीतिक रूप से देश स्वतंत्र अवश्य हो गया पर जिस तरह की व्यवस्था रही उससे देश में राज्य प्रबंध को लेकर हमेशा ही एक निराशा का भाव व्याप्त  दिखता रहा है।  इसी भाव के कारण  देश में अनेक ऐसे आंदोलन चलते रहे हैं जिनके शीर्ष पुरुष देश में पूर्ण स्वाधीनताा न मिलने की शिकायत करतेे है।

मनुस्मृति में कहा गया है कि

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शरीकर्षात्प्राणाः क्षीयन्ते प्राणिनां यथा।

तथा राज्ञामपि प्राणाः क्षीयन्ते राष्ट्रकर्षणात्।।

     हिन्दी में भावार्थ-जिस प्रकर शरीर का अधिक शोषण करने से प्राणशक्ति कम होती उसी तरह जिस राज्य में प्रजा का अधिक शोषण होने वहां अशांति फैलती है।

राज्ञो हि रक्षाधिकृताः परस्वादयिनः शठाः।

भृत्याः भवन्ति प्रायेण तेभ्योरक्षेदियाः प्रजाः।।

     हिन्दी में भावार्थ-प्रजा के लिये नियुक्त कर्मचारियों में स्वाभाविक रूप से धूर्तता का भाव आ ही जाता है। उनसे निपटने का उपाय राज्य प्रमुख को करना ही चाहिए।
      देश की अर्थव्यवस्था को लेकर अनेक विवाद दिखाई देते हैं।  यहां ढेर सारे कर लगाये जाते हैं।  इतना ही नहीं करों की दरें जिस कथित समाजवादी सिद्धांत के आधार पर तय होती है वह कर चोरी को ही प्रोत्साहित करती है।  इसके साथ ही  कर जमा करने तथा उसका विवरण देते समय करदाता  इस तरह  अनुभव करते हैं जैसे कि उत्पादक नागरिक होना जैसे एक अपराध है।  देश के कमजोर, गरीब तथा अनुत्पादक लोगों की सहायता या कल्याण करने का सरकार को करना चाहिये पर इसका यह आशय कतई नहीं है कि उत्पादक नागरिकों पर बोझ डालकर उन्हें करचोरी के लिये प्रोत्साहित किया जाये।      यह हैरानी की बात है कि कल्याणकारी राज्य के नाम करसिद्धांत अपनाये गये कि गरीब लोगों की भर्लाइै के लिये उत्पादक नागरिकों पर इतना बोझ डाला जाये कि वह अमीर न हों पर इसका परिणाम विपरीत दिखाई दिया जिसके अनुसार  पुराने पूंजीपति जहां अधिक अमीर होते गये वहीं मध्यम और निम्न आय का व्यक्ति आय की दृष्टि से नीचे गिरता गया।  इतना ही नहीं  ऐसे नियम बने जिससे निजी व्यवसाय या लघु उद्यमों की स्थापना कठिन होती गयी।
            हालांकि अब अनेक विद्वान यह अनुभव करते हैं कि राज्य प्रबंध की नीति में बदलाव लाया जाये। इस पर अनेक बहसें होती हैं पर कोई निर्णायक कदम इस तरह उठाया नहीं जाता दिख रहा है जैसी कि अपेक्षा होती है।  हालांकि भविष्य में इसकी तरफ कदम उठायेंगे इसकी संभावना अब बढ़ने लगी है।  एक बात तय है कि कोई भी राज्य तभी श्रेष्ठ माना जाता है जहां प्रजा के अधिकतर वर्ग खुश रहते हैं।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday, July 5, 2014

चमचागिरी में अपना जीवन न गंवायें-भर्तृहरि नीति शतक(chamachagiri mein jiwan vyarth n karen-bhartrihari neeti shatak)



            वर्तमान भौतिक युग में जिनके पास अधिक धन, उच्च पद और प्रतिष्ठा है उनका आभा मंडल समाज में इतना व्यापक होता है कि हर सामान्य आदमी उनके पास पहुंचकर अपना कल्याण पाना चाहता है।  यह अलग बात है कि ऐसे कथित महापुरुष सामान्य लोगों से कहीं अधिक डरपोक, लालची तथा अहंकारी होते हैं।  अपनी उपलब्धि का मद उन्हें हमेशा ही धेरे रहता है। यह समाज का शोषण कर सारी सफलता प्राप्त करते हैं पर सामान्य आदमी फिर उनसे दयालुता दिखाने की आशा करता है।  देखा यही जा रहा है कि वही शिखर पुरुष समाज में प्रतिष्ठ प्राप्त करता है जो अपने इर्दगिर्द चाटुकारों की सेना एकत्रित करता है।

भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि

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दुरारध्याश्चामी तुरचलचित्ताः क्षितिभुजो वयं
तु स्थूलेच्छाः सुमहति बद्धमनसः

जरा देहं मृत्युरति दयितं जीवितमिदं
सखे नानयच्छ्रेयो जगति विदुषेऽन्यत्र तपसः।।

     हिंदी में भावार्थ- जिन राजाओं का मन घोड़े की तरह दौड़ता है उनको कोई कब तक प्रसन्न रख सकता है? हमारी अभिलाषाओं  और आकांक्षाओं  की तो कोई सीमा ही नहीं है। सभी के मन में अधिक धन, बड़ा पद तथा प्रतिष्ठत छवि  पाने की लालसा स्वाभाविक रूप से होती  है। इधर शरीर बुढ़ापे की तरह बढ़ रहा होता है। मृत्यु पीछे पड़ी हुई होती  है। इन सभी को देखते हुए तो यही कहा जा सकता है कि भक्ति और तप के अलावा को अन्य मार्ग ऐसा नहीं है जो हमारा कल्याण कर सके।

     लोगों के मन में धन पाने की लालसा बहुत होती है और इसलिये वह धनिकों, उच्च पदस्थ एवं बाहुबली लोगों की और आशा भरी दृष्टि स ताकते हुए  उनकी चमचागिरी करने के लिये तैयार रहते हैं। उनकी चाटुकारिता में कोई कमी नहीं करते। चाटुकार लोगों  को यह आशा रहती है कि कथित ऊंचा आदमी उन पर रहम कर उनका कल्याण करेगा। यह केवल भ्रम है। जिनके पास वैभव है उनका मन भी हमारी तरह चंचल होता है और वह अपना काम निकालकर भूल जाते हैं या अगर कुछ देते हैं तो केवल चाटुकारिता  के कारण नहीं बल्कि कोई सेवा करा कर। वह भी जो प्रतिफल देते हैं तो वह भी न के बराबर। इस संसार में बहुत कम ऐसे लोग हैं जो धन, पद और प्रतिष्ठा प्राप्त कर उसके मद में डूबने से बच पाते हैं।  अधिकतर लोग तो अपनी शक्ति के अहंकार में अपने से छोटे आदमी को कीड़े मकौड़े जैसा समझने लगते हैं और उनकी चमचागिरी करने पर भी कोई लाभ नहीं होता।  अगर ऐसे लोगों की निंरतर सेवा की जाये तो भी सामान्य से कम प्रतिफल मिलता है।
      सच तो यह है कि आदमी का जीवन इसी तरह गुलामी करते हुए व्यर्थ चला जाता हैं। जो धनी है वह अहंकार में है और जो गरीब है वह केवल बड़े लोगों की ओर ताकता हुआ जीवन गुंजारता है। जिन लोगों का इस बात का ज्ञान है वह भक्ति और तप के पथ पर चलते हैं क्योंकि वही कल्याण का मार्ग है।इस संसार में प्रसन्नता से जीने का एक ही उपाय है कि अपने स्वाभिमान की रक्षा करते हुए ही जीवन भर चलते रहें।  अपने से बड़े आदमी की चाटुकारिता से लाभ की आशा करना अपने लिये निराशा पैदा करना है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’ 
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Thursday, June 12, 2014

सभी के हित की सोचना राज्य का दायित्व-रहीम दर्शन पर आधारित चिन्तन लेख(sabhi ke hit ki sochana rajya ka kam-A hindu hindi religion thoght based on rahim darshan)


                      हमारे देश में राजपद पाने की लालसा अनेक लोग राजनीति में सक्रिय करते हैं।  जिनके पास पैसा, प्रतिष्ठा और पराक्रम है वह आधुनिक लोकतंत्र में पद पाकर समाज में अपना प्रभाव बढ़ने को उत्सुक रहते हैं।  यह पद की चाहत अपने मन में पूज्यता का भाव शांत करने के लिये पैदा होती है। सच बात तो यह है कि राजपद पाना हमारे देश में एक उपलब्धि तो माना जाता है पर उसके साथ जो दायित्व हैं उन पर किसी की दृष्टि नहीं जाती।  किसी भी राज्य का प्रबंध सहज नहीं होता उस पर भारत जैसे विशाल तथा विविधताओं वाले देश में तो सुशासन बनाय रखना एक बड़ी चुनौती होती है पर कभी यह नहीं लगता कि राजपद की कामना रखने अनेक लोगों को इसका आभास होता है।
कविवर रहीम कहते हैं कि

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रहिमन राज सराहिए, ससि सम सुखद जो होय।

कहा बापुरो भानु है, तपै तरैयन खोय।।

                   हिन्दी में भावार्थ-वही राज्य सराहनीय है जिसमें सभी लोग वर्ग के लोग खुश रहें। जहां सभी को आगे बढ़ने का अवसर मिले और जहां सभी को अपने काम काम पूरा दाम मिले वही राज्य सुशासित कहलाता है।
                      राज्य प्रमुख का यह कर्तव्य रहता है कि वह अपने अंतर्गत रहने वाले विभिन्न वर्ग, वर्ण तथा विचार वाले लोगों की रक्षा करे।  सभी को आगे बढ़ने के समान अवसर मिले। हम देख रहे हैं भारत में आधुनिक लोकतंत्र प्रणाली होने के बावजूद वैसी अपेक्षायें पूरी नहीं हो सकीं जैसी अपेक्षा की गयी थी।  देखा यह गया कि इस लोकतंत्र की आड़ में वैसी राजशाही, वंशवाद तथा वणिक वृत्ति राज्यकर्म में व्याप्त हो गयी है जैसे पहले हुआ करती थी।  हालांकि अभी हाल ही में संपन्न लोकसभा चुनाव के परिणामों में आम लोगों ने यह जता दिया है कि वह देश में एक सच्चा लोकतंत्र चाहते हैं।  इन चुनाव परिणामों से यही संदेश मिला है कि लोग इस देश में राज्य से अपने विकास तथा रक्षा की अपेक्षा करते हैं।  वह छोटी छोटी बातों से बहलने वाले नहीं है। न ही कथित नारे उनको प्रभावित कर सकते हैं।  यह अलग बात है  कि इस संदेश को राजपद पाने का मोह रखने वाले लोग कितना समझ पाते हैं


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Tuesday, June 3, 2014

भगवान नाम स्मरण के अलावा भक्ति के अन्य प्रयास व्यापार-भर्तृहरि नीति शतक के आधार पर चिंत्तन(bhagwan nam ke alawa bhakti ka anya prayas vyapar-A hindi hindu religion thought based on bhartrihari polciy century)



      हमारे देश में धर्म के नाम पर अनेक प्रकार के भ्रम इस तरह प्रचलित हो गये हैं कि लोग यह समझ नहीं पाते कि आखिर परमात्मा की भक्ति का कौनसा तरीका प्रभावकारी है? यह भ्रम भारत में सदियों से सक्रिय उन पेशेवर शिखर पुरुषों के कारण है जो लोगों की इंद्रियों को बाहर सक्रिय कर उनसे आर्थिक लाभ पाने के लिये यत्नशील होते हैं। समाज में अंतर्मुखी होकर परमात्मा की भक्ति करने के लिये वह उपदेश जरूर देते हैं पर उसकी जो विधि बताते हैं वह बर्हिमुखी भक्ति की  ही प्रेरक होती है।  भारत में गुरु शिष्य तथा सत्संग की परंपरा का इन पेशेवर धार्मिक ठेकेदारों ने जमकर उठाया है।  गुरु बनकर वह जीवन भर के लिये शिष्य को अपने साथ बांध लेते हैं।  शायद ही कोई शिष्य हो जो ज्ञान प्राप्त कर इन गुरुओं के सानिध्य से मुक्त हो पाता हो।  इतना ही नहीं ऐसे धार्मिक ठेकेदार अपने धर्म की दुकान भी किसी शिष्य की बजाय अपने ही घर के किसी सदस्य को सौंपते हैं।  कहने का  अभिप्राय यह है कि अपने पूरे जीवन में धार्मिक व्यवसाय के दौरान एक भी ऐसा शिष्य तैयार नहीं कर पाते जो उनके बाद कोई संभाल सके। सत्संग के नाम पर यह अपने सामने श्रोताओं की भीड़ एकतित्र कर रटा हुआ ज्ञान देते हैं और कभी प्रमाद वाली बातें भी कर माहौल को हल्का करने का दावा भी करते हैं।

भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि

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किं वेदै स्मृतिभिः पुराणपठनैः शास्त्रैर्महाविस्तरैः स्वर्गग्रामकुटीनिवाफलदैः कर्मक्रयाविभमैः।

मुक्तवैकं भवदुःख भाररचना विध्वंसकालानलं स्वात्मानन्दपदप्रवेशकलन। शेषाः वणिग्वृत्तयः।।

     हिन्दी में भावार्थ-वेद, स्मृतियां और पुराणों के पठन,  शास्त्रों के सूत्रों के विस्तार तथा किसी स्वर्गरूप कुटिया में रहकर स्वर्ग पाने के लिये तप करने से कोई लाभ नहीं होता। संसार में कष्ट से रहित मुक्तभाव सेे विचरण करने के लिये परमात्मा के नाम का स्मरण करने के अलावा अन्य कर्मकांड व्यापारिक प्रवृत्ति का ही प्रतीक हैं।
      वेद, पुराण, शास्त्र तथा अन्य प्राचीन धार्मिक ग्रंथों  के सू़त्र रटकर सुनाने वाले हमारे समाज में बहुत लोग हैं। हमारे देश में कथित रूप से अनेक धर्मों का अस्तित्व स्वीकार किया जाता है जबकि सच यह है कि शुद्ध आचरण ही मनुष्य के धमभीरु होने का परिचायक है।  हमारे देश में विभिन्न धार्मिक पहचान वाले समूह हैं जिनके तयशुदा रंग के वस्त्र पहनकर कथित ठेकेदार  ऐसा पाखंड करते हैं कि वह देश में अपने धार्मिक समूह के खैरख्वाह है।  ऐसे लोग धार्मिक ही  नहीं आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा प्रचार के क्षेत्र में अपने संपर्क बनाते हैं। अवसर आने पर इस तरह बयान देते हैं कि गोया कि उनके वाक्य सर्वशक्तिमान के श्रीमुख से प्रकट हुए हैं।
      हमारे देश के लोगों में अध्यात्मिक ज्ञान के प्रति झुकाव सदैव रहा है इसलिये समाज का एक बड़ा वर्ग इन धार्मिक गुरुओं के चक्कर में नहीं पड़ता पर जिस तरह यह लोग प्रचार करते हैं उससे तो बाहरी देशों में यह धारण बनती है कि भारत के नागरिक अधंविश्वासी हैं।  हम जैसे योग तथा ज्ञान साधकों की दृष्टि से स्थिति ठीक विपरीत है पर चूंकि गुणीजन स्वतः प्रचार नहीं करते जबकि यह पेशेवर धार्मिक ठेकेदार अपने विज्ञापन के लिये धन भी व्यय करते हैं तो ऐसा लगता है कि उनका समाज पर उनक भारी प्रभाव है।
      योग साधना, भक्ति तथा चिंत्तन एकांत में की जाने वाली क्रियायें हैं।  एक तरह से यह ज्ञान यज्ञ होता है जबकि कर्मकांड द्रव्यमय यज्ञ हैं जिसको हमारे अध्यात्मिक दार्शनिक अधिक महत्व नहीं देते।  पेशेवर धार्मिक लोग समाज को इसी द्रव्यमय यज्ञ के लिये प्रेरित करते हैं जबकि ज्ञान यज्ञ से ही परमात्मा की अनुभूति की जा सकती है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
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