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Tuesday, October 14, 2008

चाणक्य सन्देश: प्रत्युपकार से मनुष्य अपनी रक्षा करता है

1.पाँव धोने का जल और संध्या के उपरांत शेष जल विकारों से युक्त हो जाता अत: उसे उपयोग में लाना अत्यंत निकृष्ट होता है। पत्थर पर चंदन घिसकर लगाना और अपना ही मुख पानी में देखना भी अशुभ माना गया है।
२.बिना बुलाए किसी के घर जाने की बात, बिना पूछे दान देना और दो व्यक्तियों के बीच वार्तालाप में बोल पडना भी अधर्म कार्य माना जाता है।
३.शंख का पिता रत्नों की खदान है। माता लक्ष्मी है फिर भी वह शंख भीख माँगता है तो उसमें उसके भाग्य का ही खेल कहा जा सकता है।
४.उपकार करने वाले पर प्रत्युपकार, मारने वाले को दण्ड दुष्ट और शठ से सख्ती का व्यवहार कर ही मनुष्य अपनी रक्षा कर सकता है।

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Saturday, October 11, 2008

संत कबीर संदेशः इष्ट बदल कर पूजने वालों का उद्धार नहीं

संत कबीर दास जी के अनुसार
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कामी तरि क्रोधी तरै, लोभी तरै अनंत
आग उपासी कृतघनी, तरै न गुरु कहंत


सद्गुरुओं का कहना है कि कामी, क्रोधी और लोभी भी अनेक बार अपने इष्ट को हृदय से स्मरण कर तर जाता है पर परंतु अपने इष्ट और सदगुरु को छोड़कर अन्य की उपासना करने वाला कभी नहीं तर सकता।

देवि देव मानै सबै, अलख न मानै कोय
जा अलेख का सब किया, तासों बेबुख होय


अनेक देवों की आराधना करने वाले निरंकार को नहीं मानते जबकि यह चराचर विश्व उसी ने रच रखा है। मूर्तियों को पूजने वाले उस निरंकार को नहीं जानते इसलिये उसे प्राप्त नहीं कर पाते।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-संत कबीरदास जी के समय भी धर्म परिवर्तन संभवतः बड़े पैमाने पर हो रहा था इसलिये उन्होंने इसका प्रतिवाद करते हुए उसकी आलोचना की है। सत्य तो यह है कि बाल्यकाल से ही माता पिता जिस इष्ट या गुरु का संपर्क करा देते हैं फिर उसी का ही अनुसरण जीवन भर करना चाहिये क्योंकि वह इस देह में मौजूद आत्मा धारण कर चुकी होती है। जो धर्म परिवर्तन करते हैं एक तरह से वह अपने माता पिता का त्याग तो करते ही हैं अज्ञान की शरण भी लेते हैं। जब सभी स्वरूपों में एक ही ईश्वर है तब उसका स्वरूप बदलने का आशय यह है कि मन में लोभ, काम और क्रोध का प्रकोप है। अगर सच्चे मन से माना जाये तो जिस रूप में हम बचपन से ही आराधना करते हैं उसी में ही परमात्मा की स्नेहपूर्ण अनुभूति होती है। धर्म या इष्ट बदलने का अर्थ यह है कि कोई स्वार्थ है जो इसके लिये प्रेरित करता हैै। ऐसा करने वाले माता पिता और गुरुओं का अपमान भी करते हैं।

यह केवल धर्म परिवर्तन के ही विषय में नहीं कहा गया बल्कि इष्ट के स्वरूप बदलना भी गलत माना गया है। कभी जीवन में कुछ काम समय न आने का कारण नहीं हो पाते तब लोग इष्ट या गुरु को भी बदलने के लिये प्रेरित करते हैं। उनकी बात भी नहीं मानी जानी चाहिये। वैसे देखा जाये तो समय के अनुसार सारे काम होते हैं पर कुछ लोग अपने लाभ के लिये दूसरों को धर्म, इष्ट या गुरु बदने के लिये उकसाते हैं। वह स्वयं तो संकट में रहते ही हैं दूसरों को भी संकट में डालते हैं। वैसे भी परमात्मा को निच्छल हृदय से स्मरण करने पर ही मन को शांति मिलती है। उसके स्वरूप बदलना तो अपने आपको ही धोखा देना है।
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Friday, October 10, 2008

संत कबीर संदेशः दूसरों की निंदा कर वैमनस्य न बढ़ायें

संत श्री कबीरदास जी के अनुसार
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काहू का नहिं निन्दिये, चाहै जैसा होय
फिर फिर ताको बन्दिये, साधु लच्छ है सोय


किसी भी व्यक्ति का दोष देखकर भी उसकी निंदा न करें। अपना कर्तव्य तो यही है कि जो साधु और गुणी हो उसका सम्मान करें और उसकी बातों को समझें

तिनका कबहू न निंदिये, पांव तले जो होय
कबहुं उडि़ आंखों पड़े, पीर घनेरी होय


आशय यह है कि दूसरे के दोष देखकर उसकी निंदा से बचने का प्रयास करना चाहिये। तिनके तक की निंदा भी नहीं करना चाहिये। पता नहीं कब आंखों में गिरकर त्रास देने लगे।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जिसे देखो वही दूसरों की निंदा करने में लगा है। इसी प्रवृत्ति के कारण एक दूसरे से दूर हो जाते हैं। सक एक दूसरे की सामने तो प्रशंसा करते हैं पर पीठ पीछे निंदा पर आमादा हो जाते हैंं। यही कारण है कि किसी का किसी पर यकीन नहीं हैंं। अगर हम किसी की यह सोचकर निंदा करते हैं कि उससे क्या डरना वह कुछ नहीं कर सकता। यह भ्रम है। इस जीवन में पता नहीं कब किसकी आवश्यकता पड़ जाये-यही सोचकर किसी की निंदा नहीं करना चाहिये। दोष सभी में होते हैं। मानव देह तो दोषों का पुतला है फिर निंदा कर दूसरे लोगों से अपना वैमनस्य क्यों बढ़ाया जाये?

बजाय दूसरों की निंदा करने के ऐसे लोगोंे से संपर्क रखना चाहिये जो साधु प्रवृत्ति के हों। उनके सद्गुणों की चर्चा करना चाहिये। यह तय बात है कि हम अपने मूंह से अगर किसी के लिये बुरे शब्द निकालते हैं तो उसका हमारी मानसिकता पर ही बुरा प्रभाव पड़ता है। अगर किसी के बारे मे सद्चर्चा की जाये तो उसका सकारात्मक प्रभाव दिखता है।
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Tuesday, October 7, 2008

रहीम के दोहेः जो दीन पर दया करे वही दीनबंधु कहलाता है

कविवर रहीम कहते हैं
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दिव्य दीनता के रसहि, का जाने जग अंधु
भली बिचारी दीनता, दीनबंधु से बंधु
      हिंदी में भावार्थ-भगवान की भक्ति दीन भाव से करने पर जो रस और आनंद मिलता है उसे अहंकार में अंधे लोग नहीं समझ सकते। दीनता में जो सोंदर्य है उससे ही दीनबंधु आकर्षित होते हैं।
दीन सबन को लखत है, दीनहिं लखै न कोय
जो रहीम दीनहि लखै, दीनबंधु सम होय
      हिंदी में भावार्थ-जो दीन है वह सबकी तरफ देखता है पर उसे कोई नहीं देखता। जो दीन की ओर देखकर उस पर दया करता है उसके लिये वह भगवान तुल्य हो जाता है।
     वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-पहले समाज की एक स्वचालित व्यवस्था थी जिसमें धनी व्यक्ति के लिये दान का कर्तव्य निश्चित किया गया ताकि जिनके पास धन नहीं है उन्हें प्राप्त होता रहे और समाज में समरसता का भाव बना रहे मगर  अब लोग दान के नाम पर नाक भौं सिकोड़ते हैं या फिर ढिंढोरा पीटकर देते हें जिससे उनको आर्थिक लाभ और सामाजिक प्रतिष्ठा मिले। कुछ धनिक और उनकी संतानों के लिये तो माया शक्ति प्रदर्शन का एक हथियार बन गयी है। जिनके पास धन है उनको समाज में दीन और दरिद्र की तकलीफों का ख्याल नहीं होता और न ही इस बात का विचार होता है कि वह उनकी तरफ अपेक्षित भाव से देख रहे हैं। माया उनको अंधा बना देती हैं और फिर इन्हीं दीनों में से कोई अपराधी बनकर उनकी इसी माया का हरण तो कर ही लेता है और कहीं न कहीं तो शारीरिक हानि भी पहुंचा देता हैं।
      एक बात धनिकों को याद रखना चाहिये कि दीन उनको देखते हैं और उनके व्यवहार से ही उन पर अच्छा या बुरा प्रभाव पड़ता है। ऐसे में अगर वह स्वयं ही उन पर दया करें तो उनके लिये भगवान बन जायेंगे क्योंकि दीन तो बिचारे सभी तरफ देखते हैं पर उनकी तरफ अगर कोई देखे तो उनका मन प्रसन्न हो जाता है।
      दान करने से आशय यह नहीं है कि कहीं भिखारियों को खाना खिलाया जाये या किसी मंदिर में दान डाला जाये। यह अपने आसपास ही निर्धन और जरूरतमंद लोगों लोगों की सहायत कर भी किया जा सकता है। किसी मजदूर से काम कराकर उसके मांगे गये मेहनताने से थोड़ा अधिक देकर या अपने घर की अनावश्यक पड़ी वस्तु उनको देखकर भी उनका मन जीता जा सकता है। यह संदेश साफ है कि अगर आप धनी है तो आप अपने आसपास के निर्धन लोगों पर कृपा करते रहें तभी आप भी अमन से रह पायेंगे वरन आपको स्वयं ही अकेलापन और असुरक्षा का अनुभव होगा। मतलब यह कि आप दीनबंधु बने तभी आप दीनबंधु को पा सकते हैं। दान देते समय भी अपने अंदर दीन भाव रखना चाहिये और भक्ति करते समय भी। तभी परमानंद की प्राप्त हो सकती है।
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