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Friday, March 20, 2009

इस ब्लाग की पाठक संख्या 10 हजार के पार-संपादकीय

जहां तीन लाख के आसपास व्यूज मेरे सभी ब्लाग पर हों वहां दस हजार की संख्या कोई मायने नहीं रखती पर ब्लागस्पाट पर आधिकारिक रूप से यह संख्या पार करने वाला यह पहला ब्लाग है। अध्यात्मिक ब्लाग पर यह सफलता कोई अधिक नहीं है पर अगर वह ब्लागस्पाट का हो तो उसका महत्व इसलिये दिखता है क्योंकि वर्डप्रेस के मुकाबले यहां कम ही व्यूज आते हैं। वैसे इसका सहधर्मी ब्लाग शब्दलेख सारथी भी दस हजार के पार पहुंच चुका होगा स्टेटकांउटर उस पर बहुत विलंब से लगाया था इसलिये आधिकारिक रूप से वह इससे अभी कुछ पीछे है। वैसे मेरे ब्लाग स्पाट के ब्लाग भी यह संख्या पार कर चुकें होंगे पर आधिकारिक रूप से उसका कोई लेखा नहीं है।
इस ब्लाग पर कांउटर पहले दिन से ही लगा है इसलिये इसकी संख्या को लेकर कोई संदेह नहीं है। मजे की बात यह है कि मेरे मित्र ब्लाग लेखकों को यही ब्लाग पसंद है और यह संख्या पार होने में उनका ही योगदान अधिक है। प्रसंगवश अनेक मित्रों ने अन्य ब्लाग के मुकाबले इसे ही अधिक लिंक किया है।
जहां तक अध्यात्म विषयों पर लिखने का सवाल है तो मैं नहीं जानता इन पर क्यों लिखता हूं? एक आदत बन गयी है। मेरे पास जो किताबें हैं सुबह उठकर उनका अध्ययन करते हुए ही इन पर लिखता हूं। इस ब्लाग और शब्दलेख सारथी पर नये पाठ लिखता हूं बाकी अन्य अध्यात्म ब्लाग पर यहीं से पाठ कापी कर रखता हूं। आखिर इतने सारे ब्लाग क्यों?
यह सवाल कई मित्र मुझसे पूछते हैं? दरअसल मैंने कुछ ब्लाग सर्च इंजिनों के रुख को देखने के लिये बनाये हैं। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि मैं स्वयं भ्रमित हो रहा हूं पर फिर यह भी देखता हूं कि यहां कोई पूरी तरह अपने आपको सर्वज्ञानी नहीं है। कहने का तात्पर्य यह है कि अंतर्जाल पर कुछ नया सीखने और उसके प्रयोग करने की गुंजायश है और इसी कारण कुछ ब्लाग लेखक अधिक
संख्या में ब्लाग बनाते हैं और यकीनन वह कुछ इससे सीख रहे हैं।

शब्दलेख सारथी मैंने पहले छद्म नाम से बनाया था पर फिर एक मित्र के आग्रह पर उस पर अपना नाम लिखा। इन दोनों ब्लाग पर लिखते समय मेरे मन में कोई भाव नहीं होता। न तो टिप्पणियों की चिंता होती है न पाठकों की। इस भौतिक युग में सुख सुविधाओं से ऊबे लोगों के मन में अध्यात्म के प्रति रुझान अधिक बढ़ रहा है यह अलग बात है कि उनकी भावनाओं का शोषण कर उसे अपने आर्थिक लाभ में परिवर्तन करने वालों की सख्या भी बढ़ रही है। भारतीय अध्यात्म के मूल तत्वों की पूरी जानकारी होने का दावा तो कोई खैर क्या करेगा पर इतना जरूर कहा जा सकता है कि उसमें ही हृदय को प्रफुल्लित करने वाले तत्व मौजूद हैं पर उसके लिये ज्ञान का होना जरूरी है। दरअसल अध्यात्मिक ब्लाग शुरु करने का उद्देश्य श्रीगीता पर लिखना था पर उस समय हिंदी टूल लिखने वाले टूल संस्कृत के श्लोक लिखने के लिये ठीक नहीं लगे। तब अन्य महापुरुषों की रचनाओं से काम चलाया तो यह एक आदत बन गयी। भर्तृहरि,चाणक्य,कबीरदास,रहीम,मनुस्मृति,विदुर तथा अन्य अध्यात्मिक मनीषियों के संदेशों में आज भी भारत के लोगों की अथाह रुचि है यह बात अंतर्जाल पर ही आकर पता लगी।
इस ब्लाग के दस हजार पूरे होने पर कुछ लिखने का कुछ मतलब नहीं है पर यहां यह बताना जरूरी है कि हमारा देश विश्व में अध्यात्म गुरु इसलिये माना जाता है क्योंकि हमारे प्राचीन मनीषियों ने अपनी तपस्या से जो ज्ञान अर्जित किया वह सत्य के निकट था। उनके पास कोई लेबोरेटरी या दूरबीन नहीं थी जिसका प्रयोग कर वह सृष्टि के सत्यों के निकट पहुंचते बल्कि उन्होंने अपनी अंतदृष्टि को ही इतना सिद्ध बना दिया कि जो विश्लेषण उन्होंने बहुत पहले प्रस्तुत किये पश्चिम की दुनियां अब उस पर पहुंच रही है।
पहले तो मैं केवल महापुरुषों के संदेश ही लिखता था पर कृतिदेव का टूल मिलने के बाद इन पर व्याख्यान भी लिखने लगा। अनेक ब्लाग लेखक मित्र इसके लिये आग्रह करते थे पर इंडिक टूल से ऐसा करना संभव नहीं लगता था। अब जैसी बनती है लिखता हूं। कोई व्यवसायिक अध्यात्मिक गुरु तो हूं नहीं कि उन पर बहुत आकर्षक लिख सकूं। जैसा विचार मन में आता है लिखता हूं। सच बात तो यह है कि यह लिखना अपने अध्ययन के लिये होता है न कि अपना ज्ञान बघारने के लिये। इस अवसर पर अपने ब्लाग लेखक मित्रों और पाठकों को धन्यवाद।
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Thursday, January 10, 2008

संत कबीर वाणी:जहाँ कपट हो वहाँ न जाएं

जीव हनेँ हिंसा करेँ, प्रगट पाप सिर होय
पाप सबन जो देखिया, पुन्न न देखा कोय


संत शिरोमणि कबीरदास जे कहते हैं कि जो जीव को मारता है उसके पाप का भार प्रत्यक्ष रुप से उसके सिर पर दिखाई देता है पर उनके जो पुण्य कर्म हैं वह किसी को दिखाई नहीं देते क्योंकि हिंसा करने वाले पापी होते हैं और उन्हें किसी भी तरह पुण्यात्मा नहीं माना जा सकता।

कबीर तहां न जाइए, जहाँ कपट का हेत
जानो काले अनार के, तन राता मन सेत


इसका आशय यह है कि वहां कदापि न जाइए जहाँ कपट का प्रेम हो। उस प्रेम को ऐसे ही समझो जैसे अनार की कली, जो ऊपरी भाग से लाल परंतु भीतर से सफ़ेद होती है। वैसे हे कपटी लोग मुहँ पर प्रेम दिखाते हैं पारु उनके भीतर कपट की सफेदी पुती रहती है ।

कबीर तहां न जाइए, जहाँ कपट को हेत
नौ मन बीज जू बोय के, खालि रहिगा खेत


इसका आशय यह है कि वहाँ कतई न जाएँ जहां कपट भरे प्रेम मिलने की संभावना हो। जैसे ऊसर वाले खेत में नौ मन बीज बोने पर भी खेत खाली रह जाता है, वैसे ही कपटी से कितना भी प्रेम कीजिये परन्तु उसका हृदय प्रेम-शून्य ही रहता है।

Friday, January 4, 2008

संत कबीर वाणी:मान पाने की लालसा कुत्ते का लक्षण

मान बढाई जगत में, कूकर की पहचान
प्यार किए मुख चाटई, बैर किये तन हान


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मान पाने की लालसा, बडाई सुनने की इच्छा तो कुत्ते के लक्षण है। कुता पुचकारे जाने पर पुँछ हिलाता हुआ अपने मालिक के प्रति सम्मान प्रकट करता है और जब उसे फटकारा जाता है तो काटने लगता है।

बड़ा बडाई ना करे, बड़ा न बोले बोल
हीरा मुख से ना कहै, लाख टका मेरो मोल


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते है कि जो व्यक्ति वास्तव में योग्य ज्_ंजानी, विद्वान और शक्तिशाली हैं वह कभी भी अपने मुहँ से अपनी बडाई नहीं करता जैसे कोई हीरा अपने मुहँ से अपने कीमती होने का बयान नहीं करता।

Wednesday, January 2, 2008

संत कबीर वाणी:साधू को वैरागी और गृहस्थ को उदार होना चाहिए

'कबीर' हरि कग नाव सूं , प्रीती रहे इकवार
तो मुख तैं मोती झडै , हीरे अंत न पार

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि यदि हरिनाम पर अविरल प्रीती बनी रहे तो उसके मुख से मोती ही मोती झाडेंगे और इतने हीरे कि उनकी गिनती नहीं हो सकती।

बैरागी बिरकत भला, गिरही चित्त उदार
दुहूँ चूका रीता पडै, वाकूं वार न पार


बैरागी वही अच्छा है जिसमें सच्ची विरक्ति हो और गृहस्थ वह अच्छा जिसका हृदय उदार हो। यदि बैरागी के मन में विरक्ति नहीं और गृहस्थ के मन में उदारता नहीं तो दोनों का ऐसा पतन होगा कि जिसकी हद नही है।

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