Friday, September 18, 2009

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-अपने अंदर के व्यसनों की उपेक्षा न करें (kautilya ka arthshastra in hindi)

इत्यादि सर्व प्रकृति तथावद्बुध्यत राजा व्यसनं प्रयत्नात्।
बुद्धया च शक्त्वा व्यसनस्य कुर्याकालहीन व्यवरोपर्णहि।।
हिंदी में भावार्थ-
राज विधिपूर्वक सबके व्यसनों को जाने तथा अपनी बुद्धि तथा शक्ति से अपने अंदर स्थित व्यसनों को अधूरेपन में ही नष्ट कर दे क्योंकि विपत्ति होने पर हीन वस्तु और व्यक्ति शीघ्र नष्ट हो जाते हैं।
प्रकृतिव्यवसननि भूतिकामः समुपेक्षेत नहि प्रमाददर्पात्।
प्रकृत्तिवयवसनान्यूपेक्षते यो न चिरात्तं रिपवःपराभवन्ति।।
हिंदी में भावार्थ-
विभूति की इच्छा पैदा से उत्पन्न प्रमाद या अहंकार से प्रकृत्ति से व्यसनों की उपेक्षा न करें। प्रकृत्ति के व्यसनों की उपेक्षा करने वाले को शत्रु शीघ्र नष्ट कर डालते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य के व्यसन उसको कमजोर करते हैं। शराब, तंबाकू तथा अन्य कोई भी बुरी आदत पालना ठीक नहीं होती। व्यसनों से न केवल देह की रोगों से लड़ने के लिये प्रतिरोधक क्षमता का क्षरण होता है बल्कि मानसिक रूप से भी मनुष्य कमजोर होता है। इतना ही नहीं व्यसनी मित्रों के साथ रहना भी ठीक नहीं है क्योंकि वह उनके वशीभूत होते हैं और किसी भी समय संकट का कारण बन सकते हैं। कहने का आशय यह है कि व्यवसनी का मन अपने वश में नहीं रहता इसलिये वह अपनी अन्मयस्कता की वजह से विश्वास योग्य नहीं होता। अपने अंदर कोई व्यसन हो और लगे कि उसे छोड़ना ही हितकर है तो बिना विलंब किये उससे परे हो जाना चाहिये।
उसी तरह मौसम के अनुसार ही भोजनादि ग्रहण करना चाहिये क्योंकि प्रकृत्ति के अनुसार न चलने पर भी भारी परेशानी उठानी पड़ती है। उसके विपरीत चलने का व्यसन बहुत हानिकारक होता है। व्यसन किसी भी प्रकार से मनुष्य को हानि पहुंचा सकते हैं चाहे वह शारीरिक हो या मानसिक।
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Thursday, September 17, 2009

संत कबीर वाणी-इस संसार में सच्चा साथी कोई नहीं (sant kabir vani-sansar aur sathi)

मेरा संगी कोय नहिं, सबै स्वारथी लोय।
मन परतीति न ऊपजै, जिस विश्वास न होय।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि इस संसार में कोई सच्चा मित्र या साथी नहीं है। जिसे देखो वही अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिये आता है। किसी के मन में प्रीति या विश्वास नहीं है बस दिखावा करते हैं।
कहत सुनत जग जात है, विषय न सूझै काल।
कहैं कबीर सुन प्रानिया, साहिब नाम समहाल।
संत शिरोमणि कबीरदास जी के अनुसार यहां सभी लोग विषयों को लेकर बहस करते हैं किसी को अपना काल दिखाई नहीं देता। सभी प्राणियों को चाहिये कि विषयों में मोह रखने की बजाय परमात्मा का स्मरण करें।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-कहने को यहां अनेक लोग प्रेम और विश्वास करते हुए एक दूसरे के प्रति मित्रता और सद्भाव का प्रदर्शन करते हैं पर सच सभी जानते हैं कि यह स्वार्थ की ही देन है। स्वार्थ हो तो एक नहीं हजार बार आदमी संपर्क करेगा और फिर मूंह फेरने में किसी को देर नहीं लगती। कहीं परंपराओं के नाम पर तो कहीं प्रेम के नाम पर अपना काम निकालने का प्रयास हर कोई करता है। ढौंग इतना हो गया है कि ऐसे में भले आदमी को भी पहचानना कठिन लगता है। ऐसा नहीं है कि समाज में भले लोग नहीं है पर चारों तरफ जब स्वार्थाी, लालची और घमंडी लोगों का मित्र और परिवार समूह हो तो उनको पहचानना कठिन है। अगर देखा जाये तो जहां विश्वास है वहीं धोखा हो सकता है जहां रिश्ता है वहीं बेवफाई का डर है। ऐसे में तो केवल एक ही मार्ग है कि भगवान का स्मरण करते हुए जीवन व्यतीत किया जाये और जो सामने आ रहा है उसे उसकी लीला मानकर संतोष कर लें। दूसरी बात यह है कि अपने अंदर इतनी विवेक शक्ति भी पैदा करें जिससे भले और स्वार्थी मित्र और रिश्तेदार की पहचान हो सके।
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Wednesday, September 16, 2009

चाणक्य नीति-कोल्हू में कुचले जाने पर भी ईख मिठास नहीं छोड़ती (chankya niti-kolhu aur eekh)

छिन्नोऽपि चन्दनतरुनं जहाति गन्धं।
वृद्धोऽपि वारणपतिर्न जहाति लीलाम्।
यन्त्रार्पितो मधुरतां न जहाति चेक्षुः
क्षीणोऽपि न त्यजति शीलगुणान् कुलीनः।।
हिंदी में भावार्थ-
कट जाने पर चंदन का वृक्ष अपनी सुंगध नहीं छोड़ता। बूढ़ा हो जाने पर भी हाथी विलसिता से विरक्त नहीं होता और ईख कोल्हू में पेरे जाने पर भी अपनी मिठास नहीं छोड़ती उसी प्रकार गुणवान और कुलीन मनुष्य दरिद्र हो जाने पर दया तथा अन्य गुणों को नहीं छोड़ता।
हिंदी में भावार्थ-मनुष्य को अपने चरित्र पर दृढ़ होना चाहिये और वही उसके गुणवान होने का प्रमाण है। जीवन में अपने कार्य के प्रति हमेशा उत्साहित रहकर ही कोई सफलता प्राप्त की जा सकती है। धन संपदा तो चंचल लक्ष्मी की प्रतीक हैं जो कभी इस घर जाती तो कभी उस घर। जिसके पास धन है वह अपने अंदर ढेर सारे गुण होने का बखान करता है। लोग भी यह मानते हैं कि जिसके पास धन है वह बड़ा आदमी ज्ञानी और गुणवान है। आजकल तो धन संपदा होना ही कुलीन होने का प्रतीक हो गयी है। जिसके पास धन है वह साहसी, ज्ञानी, और शक्तिशाली होने का प्रदर्शन करते हैं पर जैसे ही उनके पास से धन चला जाता है वह टूट जाते हैं। लोग धन संचय के प्रति इतना आकर्षित होते हैं अन्य गुणों के संचय पर उनका ध्यान ही नहीं जाता। आम तौर से सभी यही समझते हैं कि धन आने से समाज में उनको कुलीन, दयालु और ज्ञानी मान लिया जायेगा। मगर यह सच यह है कि गुणों की पहचान तो विपत्ति में ही होती है। जो कुलीन और गुणवान हैं वह दरिद्रता आने पर भी तनाव रहित होते अपनी दया, बौद्धिक कुशाग्रता और मधुरवाणी का त्याग नहीं करते और समाज के सामने यह एक आदर्श होता है।
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Saturday, September 12, 2009

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-व्यसनी होता है एक आसान लक्ष्य (drunkar a soft target-kautilya sandesh

नानाप्रकारैव्र्यसनेर्विमुक्तः शक्तिवेणाप्रतिमेन युक्तः।
परं दुरन्तव्यसनोपपन्नं याग्रान्नरन्द्रो विजयाभिकांक्षी।।
हिंदी में भावार्थ-
विभिन्न प्रकार के व्यसनों से रहित महाप्रभावशाली तीन शक्तियों से युक्त जीतने की इच्छा करने वाला राज प्रमुख व्यसनों से युक्त शत्रु पर आक्रमण की योजना बनाये।
प्रावेण सन्तो व्यसने रिपूणां यातव्यमित्येव सभादिशंति।
तत्रैव पक्षी व्यसने हि नित्यं क्षमस्तुन्नभ्युदितोऽभियायात्।
हिंदी में भावार्थ-
अधिकतर महानतम विचारक व्यसनों से युक्त व्यक्ति पर आक्रमण करने का सुझाव देते हैं और जिसके साथी भी व्यसनी हों अर्थात उसका पूरा पक्ष ही व्यसनी हो उस पर तो हमला कर ही देना चाहिए।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संदेश को हम अलग तरीके से भी समझ सकते हैं। अब राजा तो रहे नहीं और लोकतात्रिक सभ्यता में हर व्यक्ति अपने घर का राजा है अतः उसे अपने परिवार और अपनी रक्षा के लिये अनेक अवसर पर रणनीति बनानी पड़ती है। ऐसे में दूसरे व्यसनी पर आक्रमण की बात सोचने की बजाय इस बात पर ध्यान करना चाहिये कि अपने अंदर व्यसन न हों ताकि कोई दूसरा हमें और परिवार को परेशान करने के लिये आक्रमण न कर सके। इस समय हमारे देश में अधिकतर लोगोंआत्मसंयम का अभाव है जो कि इन्हीं व्यसनों का परिणाम है। शराब, जुआ सट्टे जैसे व्यसनों ने चहुं ओर से घेर रखा है और इससे जुड़े व्यवसायों में खूब कमाई है। सच तो यह है कि जिन व्यवसायों में कमाई है वह सभी व्यसनों से जुड़े हैं। लोगों के अंदर मनोरंजन के नाम पर ऐसे व्यसन पेश किये जा रहे हैं जिससे समाज विकृत हो रहा है। यही कारण है कि हमारे देश को बाहर से चुनौती मिल रही है तो अंदर असामाजिक प्रकृत्ति के लोग अपना प्रभुत्व कायम कर लोगों को आतंकित किये रहते हैं। मनोरंजन के नाम पर शराब, खेल, और फिल्मों के व्यसनों ने लोगों को कायर बना दिया है और साथ में उनकी चिंतन क्षमता भी लुप्त हो गयी है। यही कारण है कि जब चार लोग की बैठक जमने पर देश के सामने आ रही चुनौतियों की चर्चा तो है पर उसके हल का कोई उपाय उनको नहीं सूझता। सभी लोग निराशाजनक बातें करते हैं।
व्यक्तिगत रूप से देश की चिंता करने के साथ ही अपनी स्थिति पर भी विचार करना चाहिए। जितना हो सके उतना व्यसनों से बचें वरना धन, पद और बाहुबल से सुसज्ज्ति असामाजिक तत्व-जो व्यसनों के कारण स्वयं ही डरपोक होते हैं उन उनका डर क्रूरता पैदा करता है- आपको या परिवार को तंग कर सकते हैं। एक बात याद रखें अगर आप अपने चरित्र पर दृढ़ रहते हुए व्यसनों से परे हैं तो आपकी रक्षा स्वतः होगी। व्यसनी होने पर हर कोई आपको एक आसान लक्ष्य (साफ्ट टारगेट) समझने लगता है।
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Friday, September 11, 2009

मनुस्मृति-क्लेश करते हुए भोजन ग्रहण न करें (bhojan aur manushya-manu smruti)

पूजयेदशनं नित्यमद्याच्चेतकुत्सयन्
दृष्टवा हृध्येत्प्रसीदेच्च प्रतिनन्देच्च सर्वशः।।
हिंदी में भावार्थ-
मनुष्य को जैसा भोजन मिले उसे देखकर प्रसन्नता हासिल करना चाहिए। उसे ईश्वर प्रदत्त मानकर गुण दोष न निकालते हुए उदरस्थ करें। भोजन करते हुए अपनी झूठन न छोड़ें। यह कामना करें कि ऐसा अन्न हमेशा ही मिलता रहे।
पूजितं ह्यशनं नित्यं बलमूर्ज च यच्छाति।
अपूजितं च तद्भुक्तमूभयं नाशयेदिदम्।।
हिंदी में भावार्थ-
सदाशयता से ग्रहण किया भोजन बल और वीर्य में वृद्धि करता है जब निंदा करते हुए उदरस्थ करने से उसके तत्व नष्ट होते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जिनको भोजन आराम से मिलता है उनको उसका महत्व नहीं पता इसलिये वह उसे ऐसे करते हैं जैसे कि उसकी उनको परवाह ही नहीं है। भोजन करते समय उनको यह अहंकार आता है कि यह तो हमारा अधिकार ही है और हमारे लिये बना है। सच तो यह है कि भोजन का महत्व वही लोग जानते हैं जिनको यह नसीब में पर्याप्त मात्रा में नहीं होता। स्वादिष्ट भोजन की चाह आदमी को अंधा बना देती है। अनेक बार ऐसा समय आता है जब वह सब्जी के कारण भोजन नहीं करता या उसे त्याग देता है। भोजन करते समय उसकी निंदा करेंगे। शादी विवाह में तो अब यह भी होने लगा है कि लोग भोजन थाली में भरकर लेते हैं पर उसमें से ढेर सारा झूठन में छोड़े देते हैं। सार्वजनिक अवसरों पर ऐसे भोजन की बरबादी देखी जा सकती है।
यह समझ लेना चाहिये कि भोजन तो ईश्वरीय कृपा से मिलता है। यह सही है कि दाने दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम, पर यह भी नहीं भूलना कि अपने कर्म और भाव से भी भाग्य का निर्माण होता है। अगर हम भोजन करते हुए अहंकार पालेंगे तो संभव है कि दानों पर लिखा हमारा नाम मिट भी जाये। अपनी गृहिणी को कभी भी सब्जी आदि को लेकर ताना नहीं देना चाहिये। यह भगवान की कृपा समझें कि एक ऐसी गृहिणी आपके साथ है जो अपने हाथ से खाना बनाकर देती है वरना तो अनेक लोग घर के खाने के लिये तरस जाते हैं।
कहने का तात्पर्य यह है कि खाते हुए अपना भाव सौम्य और सरल रखना चाहिए तभी भोजन के तत्व संपूर्ण रूप से काम करते हैं अगर मन में क्लेश या अप्रसन्नता है तो फिर खाना न खाना बराबर है।
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Thursday, September 10, 2009

विदुर नीति-क्षमा और धैर्य से आयु बढ़ती है (kshama aur dhiraj-vidur niti)

मार्दव सर्वभूतनामसूया क्षमा धृतिः।
आयुष्याणि बुधाः प्राहुर्मित्राणा चाभिमानना।।
हिंदी में भावार्थ-
संपूर्ण जीवों के प्रति कोमलता का भाव, गुणों में दोष न देखना, क्षमा, धैर्य और मित्रों का अपमान न करना जैसे गुण मनुष्य की आयु में वृद्धि करते हैं।
अपनीतं सुनीतेन योऽयं प्रत्यानिनीषते।
मतिमास्थाय सुदृढां तदकापुरुषव्रतम्।।
हिंदी में भावार्थ-
जो अन्याय के कारण नष्ट हुए धन को अपनी स्थिर बुद्धि का आश्रय लेकर पवित्र नीति से वापस प्राप्त करने का संकल्प लेता है वह वीरता का आचरण करता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य के स्वयं के अंदर ही गुण दोष होते हैं। उनको पहचानने की आवश्यकता है। दूसरे लोगों के दोष देखकर उनके प्रति कठोरता का भाव धारण करना स्वयं के लिये घातक है। जब किसी के प्रति क्रोध आता है तब हम अपने शरीर का खून ही जलाते हैं। अवसर आने पर हम अपने मित्रों का भी अपमान कर डालते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि अपने हृदय में कठोरता या क्रोध के भाव लाकर मनुष्य अपनी ही आयु का क्षरण करता है।
कोमलता का भाव न केवल मनुष्य के प्रति वरन् पशु पक्षियों तथा अन्य जीवों के प्रति रखना चाहिए। कभी भी अपने सुख के लिये किसी जीव का वध नहीं करना चाहिये। आपने सुना होगा कि पहले राजा लोग शिकार करते थे पर अब उनका क्या हुआ? केवल भारत में ही नहीं वरन् पूरे विश्व में ही राजशाही खत्म हो गयी क्योंकि वह लोगा पशुओं के शिकार का अपना शौक पूरा करते थे। यह उन निर्दोष और बेजुबान जानवरों का ही श्राप था जो उनकी आने वाली पीढ़ियां शासन नहीं कर सकी।
हम जब अपनी मुट्ठियां भींचते हैं तब पता नहीं लगता कि कितना खून जला रहे हैं। यह मानकर चलिये कि इस संसार में सभी ज्ञानी नहीं है बल्कि अज्ञानियेां के समूह में रह रहे हैं। लोग चाहे जो बक देते हैं। अपने को ज्ञानी साबित करने के लिये न केवल उलूल जुलूल हरकतें करते हैं बल्कि घटिया व्यवहार भी करते हैं ताकि उनको देखने वाले श्रेष्ठ समझें। ऐसे लोग दिमाग से सोचकर बोलने की बजाय केवल जुबान से बोलते हैं। उनकी परवाह न कर उन्हें क्षमा करें ताकि उनको अधिक क्रोध आये या वह पश्चाताप की अग्नि में स्वयं जलें। अपनी आयु का क्षय करने से अच्छा है कि हम अपने अंदर ही क्षमा और कोमलता का भाव रखें। दूसरे ने क्या किया और कहा उस कान न दें।
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Monday, September 7, 2009

मनुस्मृति-सभी के हित की कामना वाला सुखी (Wished everyone a happy interest-manu smriti)

योऽहिंसकानि भूतानि हिनस्त्यात्मसुखेच्छया।
स जीवेश्च मृतश्चैव नववचित्सुखमेधते।।
हिंदी में भावार्थ-
जो व्यक्ति अहिंसक तथा किसी को न सताने वाले जीवों को अपने सुख के लिये मारता है वह अपनी जिंदगी तथा मौत के बाद भी सुख प्राप्त नहीं करता।
जो बनधन्वधक्लेशाान्प्राणिनां न चिकीर्षति।
स सर्वस्य हिनप्रेप्सुः सुखमत्यन्तमश्नुते।।
हिंदी में भावार्थ-
ऐसा व्यक्ति जो किसी का वध तो दूर दूसरे प्राणियों को बांधकर भी नहीं रखता न ही पीड़ा देता, सभी के हित की कामना करता है वह सदैव सुखी रहता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हर कोई अपने हित और सुख की कामनाओं की पूर्ति में लगा रहता है यह किसी को ज्ञान नहीं है कि सभी के हित में ही हमारा हित है। सभी लोग पेड़ों और जलाशयों से सुख तो स्वयं लेना चाहते हैं पर लगाने बनाने के लिये उनके पास न समय है न इच्छा। कहने का तात्पर्य यह है कि लोग धरती और अन्य व्यक्तियों का दोहन करना चाहते हैं पर किसी के लिये स्वयं कुछ नहीं करते। कुंऐं से पानी निकालना है पर उसे भरने का जिम्मा दूसरे का हो तो बहुत अच्छा है-सभी यही सोचते हैं। इसी दोहन की प्रवृत्ति ने प्राकृतिक सुख के समस्त साधनों को सुखा दिया है।
हमें यह समझ लेना चाहिये कि इस संसार जीव तो सभी एक जैसे हैं पर मनुष्य को ही बुद्धि सभी से अधिक मिली है वह केवल इसलिये कि वह परमात्मा को इस दुनियां के संचालन में सहयोग दे पर हो रहा है इसका उल्टा! सभी मनुष्य यही सोचते हैं कि हम तो मनुष्य हैं और इस संसार के सर्वाधिक उपभोग के लिये ही हमें यह बुद्धि मिली है। हम देख रहे हैं कि समाज में प्राकृतिक और भौतिक साधनों के विषम वितरण ने जो वैमनस्य उत्पन्न किया है उसने हमारे समाज के समक्ष एक विशाल संकट उत्पन्न कर दिया है। यह संभव नहीं है कि हम तथा परिवार ही सदा सुखी रहे और बाकी समाज त्रस्त रहे। याद रखिये हम समाज के ही कुछ तत्वों द्वारा निष्काम भाव से किये गये सत्कार्यों का लाभ लेते हैं और बदले में वह दूसरे जरूरतमंद लोगों को लौटाना हमारा कर्तव्य बनता है। यह कभी नहीं हो सकता कि हम समाज और प्राकृति से लेते जायें पर दें कुछ नहीं।
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Friday, September 4, 2009

श्री गीता से-मनुष्य स्वयं ही अपना शत्रु और मित्र (from shri geeta- man himself your enemy and friendly)

उद्धरेदात्मनाऽमानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैय ह्यात्मनो बंधुरात्मैव रिपुरात्मनः।।
हिंदी में भावार्थ-
स्वयं ही अपना संसार रूप समुद्र से उद्धार करते हुए अधोगति से बचे, क्योंकि मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र और शत्रु है।
बन्धुरात्मात्मनस्तस्य यैनात्मैवात्मना जितः।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्ः।।
हिंदी में भावार्थ-
जिस जीवात्मा द्वारा मन और इंद्रियों सहित देह जीत ली गयी है उस जीवात्मा के लिये वह मित्र जिसके द्वारा नहीं जीता गया उसके लिये वह शत्रु है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-किसी दूसरे में अपना मित्र ढूंढना या सहयोग की आशा करना व्यर्थ है। हम अपने मित्र और शत्रु स्वयं हैं। मनुष्य स्वयं खोटे काम करते हुए धर्म का दिखावा करता है पर अंततः उसे बुरे परिणाम भोगने हैं यह वह नहीं सोचता। हर कोई दूसरे को धर्म का ज्ञान देता है पर स्वयं उसे धारण नहीं करता। सच तो यह है कि लोगों में धर्म और अधर्म की पहचान ही नहीं रही। देश में आप देखिये कितने जोर शोर से धार्मिक कार्यक्रम होते हैं पर समाज का आचरण देखें तो कितना निकृष्ट दिखाई देता है। देश में व्याप्त भ्रष्टाचार, अपराध, दहेज प्रथा तथा भ्रुण हत्या जैसे प्रतिदिन होने वाले कृत्य इस बात का प्रमाण है कि हमारे लिये देह केवल उपभोग करने के लिये ही एक साधन बन गयी है भक्ति तो हम सांसरिक लोगों को दिखाने के लिये करते हैं न कि भगवान को पाने के लिये। धर्म के नाम पर ऐसे आस्तिकों के हाथ से ऐसे काम हो रहे हैं कि नास्तिक इंसान करने की भी न सोचे। अधर्म से धन कमाकर उसे धर्म के नाम पर व्यय कर लोग सोचते हैं कि हमने पुण्य कमा लिया।
सच बात तो यह है कि हमें आत्मंथन करना चाहिये। दूसरा क्या कर रहा है यह देखने की बजाय यह सोचना चाहिये कि हम क्या कर रहे हैं। दूसरे ने भ्रष्टाचार से संपत्ति अर्जित की तो हम भी वैसा ही करे यह जरूरी नहीं है। एक बात याद रखिये जिस तरह से धन आता है वैसे जाता ही है। जिन लोगों ने भ्रष्टाचार या अपराध से पैसा कमाया है वह उसका परिणाम भोगते हैं। अगर हम स्वयं करेंगे तो वह भी हमें भोगना ही है। कहने का तात्पर्य यह है कि हम अपने मित्र और शत्रु स्वयं ही हैं।
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Wednesday, September 2, 2009

मनु स्मृति-छोटी मछली को बड़ी मछली न निगले, यह दायित्व राज्य का है (duty of state-manu smriti in hindi)

यदि न प्रणयेद्राजा दण्डं उण्डयेघ्वतन्द्रितः।
शूले मत्स्यानिवापक्ष्यन्दुर्बलन्बलवत्तराः।।
हिंदी में भावार्थ-
यदि अपराध कर्म करने वालो को सजा देने में राज्य अगर सावधानी से काम नहीं लेता तो शक्ति शाली व्यक्ति कमजोर को उसी तरह नष्ट कर देता है जैसे बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है।
अद्यत्काकः पुरोडाशं श्वा च लिह्याद्धविस्तथा।
स्वाम्यं च न स्यात्कस्मिंश्चितप्रवतेंताधरोत्तरम्।।
हिंदी में भावार्थ-
अगर राज्य अपनी प्रजा को बचाने के लिये अपराधियों को दंड नहीं देता तो कौआ पुरोडाश खाने लगेगा, श्वान हवि खा जायेगा और कोई किसी को स्वामी नहीं मानेगा अंततः समाज पहले उत्तम से मध्यम और फिर अधम स्थिति को प्राप्त होगा।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-किसी भी देश में राज्य दंड का प्रभावी होना आवश्यक है। वहां की न्यायायिक व्यवस्था का मजबूत होना ही जनता की शांति और सुख की गारंटी होती है। अगर वर्तमान संदर्भ में अपने देश की स्थिति देखें तो ऐसा लगता है कि हमारे देश में कानून व्यवस्था की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। मजे की बात यह है कि अपराधियों और धनियों के इशारे पर चलने वाले लोग मनुस्मृति के विरुद्ध प्रचार अभियान छेड़े रहते हैं शायद इसका कारण यह है कि इसमें अपराधों कें लिये कड़े दंड का प्रावधान किया गया है। हालांकि इसमें कुछ जातीय पूर्वाग्रह हैं पर जातिगत व्यवस्था जन्म पर आधारित हो इसका समर्थन नहीं किया गया। फिर सभी जातियों को अपने स्वाभाविक कर्म में लिप्त होने का आग्रह इसमें किया गया है पर इसका आशय यह नहीं कि कोई उसमें बदलाव नहीं किया जा सकता।
इस आधार पर ही मनुस्मृति का विरोध नहीं किया जाता कि उसमेें छोटी जातियों और महिलाओं आज के संदर्भ में प्रासंगिक बातें लिखी हुई है। हो सकता है कि मनुजी के काल में उन बातों को लिखने वाले प्रसंग रहे हों और अब उनका कोई महत्व नहीं हो। दूसरा यह भी है कि अनेक विद्वान कहते हैं कि मनुस्मृति में अनेक अंश उनके बाद जोड़े गये हैं।
इस आधार पर यह तो कहा जा सकता है कि मनुस्मृति के कुछ अंश वर्तमान संदर्भ में महत्व न हों पर उसे पूरी तरह नकारना एक तरह से समाज को चेतनाविहीन बनाये रखने की एक योजना लगती है। इसमें कई ऐसे संदेश हैं जो व्यक्तिगत जीवन में भी बहुत महत्व रखते हैं।
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Saturday, August 29, 2009

चाणक्य नीति-इस धरती पर तीन रत्न हैं (chnakya niti-three gold coin on earth)

खलानां कपटकानां च द्विविधैव प्रतिक्रिया।
उपानंमुखभंगो वा दूरतो वा विसर्जनम्।।
हिंदी में भावार्थ-
दुर्जन और कांटो को अपने से दूर करने का उनका मूंह कुचन दें अथवा उनसे दूर होकर उनका त्याग करें।
पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जनमन्नं सुभाषितम्।
मूढ़ैः पाषाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा विधीयते।।
हिंदी में भावार्थ-
इस प्रथ्वी पर तीन ही रत्न हैं, जल, अन्न और मधुर वचन किन्तु मूर्ख लोग इनका महत्व न समझते हुए पत्थर के टुकड़ों को ही रत्न कहते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-आजकल की सभ्यता भिन्न हैं। फिर पूरी दुनियां में इस तरह के कानून बने गये हैं कि बेईमान, अधर्मी, कुकर्मी तथा अन्य निंदक गतिविधियों में शामिल लोगों को सजा राज्य द्वारा नियुक्त न्यायाधीश ही दे सकते हैं इसलिये दुर्जन लोगों को स्वयं दंड देना ठीक नहीं है। अतः बेहतर यह है कि जिसका व्यवहार खराब हो या आचरण अनैतिक हो ऐसे दुष्ट व्यक्ति से परे ही रहें। याद रखें कि तात्कालिक लाभ के लिये कभी दुर्जन की संगत अच्छी लग सकती है पर कालांतर में उसके परिणाम बुरे होते हैं।
ऐसे दुष्ट लोग न केवल क्रूर बल्कि मूर्ख भी होते हैं, इसलिये इस धरती पर विद्यमान तीन रत्नों-जल, अन्न तथा मधुर वचनों-की पहचान उनको नहीं होती और पत्थर के टुकड़ों को ही रत्न मानते हैं। इस विश्व मेें जीवन की धारा बहाने वाले दो रत्न जल और अन्न तो प्रकृत्ति द्वारा प्रदाय किये जाते हैं पर मधुर तथा प्रिय वचन मनुष्य को स्वयं ही बोलना चाहिए। धन और पत्थर को सोना मानकर अपना जीवन नष्ट करना ही है। दुष्ट और मूर्ख लोग अपना सारा ध्यान सपंत्ति के संग्रह की ओर लगाते हैं और वह इसके लिये दूसरों को प्रेरित भी करते हैं ताकि अपनी श्रेष्ठता साबित कर सके। उनकी बात को न मानकर जहां देर को तृप्त करने के लिये शुद्ध जल और अन्न मिले वहीं रहते हुए जितना मिले उससे संतुष्ट हो जाना चाहिये। इसके अलावा अपने मूंह से हमेशा पवित्र वचन बोलना चाहिये। यह तीन रत्न हैं जिनका उपभोग करना ही हमें जीवन भर संतोष दे सकता है।
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Friday, August 28, 2009

विदुर नीति-अच्छा काम सिद्ध न हो तो भी ग्लानि अनुभव न करें (vidur niti-work and result)

मिथ्यापेतानि कर्माण सिध्येवुर्यानि भारत।
अनुपायवुक्तानि मा स्म तेष मनः कृथाः।।
हिंदी में भावार्थ-
मिथ्या उपाय से कपट पूर्ण कार्य सिद्ध हो जाते हैं पर उनमें मन लगाना ठीक नहीं है।
तथैव योगविहितं यत्तु कर्म नि सिध्यति।
उपाययुक्तं मेधावी न तव्र गलपयेन्मनः।।
हिंदी में भावार्थ-
अच्छे और सात्विक प्रयास करने पर कोई सत्कर्म सिद्ध नहीं भी होता है तो भी बुद्धिमान पुरुष को अपने अंदर ग्लानि नहीं अनुभव करना चाहिए।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अक्सर आपने सुना होगा कि प्यार और जंग में सब जायज है-यह पश्चिम से आयातित विचार है। जीवन की तो यह वास्तविकता है कि जैसा कर्म करोगे वैसा परिणाम सामने आयेगा। जैसा मन में संकल्प होगा वैसे ही यह संसार हमारे साथ व्यवहार करेगा। अपने स्वार्थ को सिद्ध करने में मनुष्य इतना तल्लीन हो जाता है कि उसे अपने कर्म की शुद्धता और अशुद्धता का बोध नहीं रहता। इसी कारण वह ऐसे उपायों का भी सहारा लेता है जो अपवित्र और अनैतिक हैं। फिर उसको अपनी बात के प्रमाण रखने के लिये अनेक प्रकार के झूठ भी बोलने पड़ते हैं। इस तरह वह हमेशा पाप की दुनियां में घूमता है। मगर मन तो मन है वह उसकी तृप्ति के लिये भक्ति और साधना का ढोंग भी करता है। इससे प्रकार वह एक ऐसे मायाजाल में फंसा रहता है जिससे जीवन भर उसकी मुक्ति नहीं होती।
इसलिये अपने जीवन में अच्छे संकल्प धारण करने के साथ ही अपने कार्य की सिद्ध के लिये पवित्र और नैतिक उपायों की ही सहायता लेना चाहिए।

बाकी लोग किस रास्ते पर जा रहे हैं यह विचार करने की बजाय यह देखना चाहिए कि हमारे लिये उचित मार्ग कौनसा है। इसके अलावा यह भी एक अन्य बात यह भी है कि अगर हमारा कोई पवित्र और सात्विक कर्म अपने उचित उपाय से सिद्ध नहीं होता तो भी परवाह नहीं करना चाहिए। याद रखें कार्य सिद्ध होने का भी अपना एक समय होता है और जब आता है तो हमें यह भी पता नहीं लगता कि वह काम कैसे पूरा हुआ।
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Wednesday, August 26, 2009

एक प्रयास भर-आलेख (one efforts-hindi lekh)

अक्सर अनेक कवितायें, शायरियों गीत, और गद्य रचनायें हमारे सामने आती हैं जिसमें भारतीय धर्म ग्रंथों के साथ ही अन्य धर्मों की पवित्र पुस्तकें भूलकर इंसान से प्रेम करने का संदेश शामिल होता है। जिन कवियों और शायरों को देशभक्ति, एकता और धार्मिक सद्भावना सुसज्जितत कर अपनी रचनाओं में दिखानी होती है वह अक्सर भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों के साथ ही अन्य धार्मिक ग्रंथों पर भी बरसने लगते हैं। इस पर कोई आपत्ति नहीं करता क्योंकि अपने देश के लोगों का यह रवैया है कि चलो हमारे साथ दूसरे धर्म की पुस्तक को भी भुलाने की बात तो कही। हमारा कान पकड़ तो दूसरे का भी तो नहीं छोड़ा।
अगर कोई कवि या शायर अकेली यह बात कहे कि श्री रामायण या श्री रामचरित मानस पढ़ना छोड़ दो, श्रीगीता और वेद पुराण और श्रीगीता भूल जाओ तो उस पर हाहाकार मच जायेगा। लोग उस पर छद्म धर्मनिरपेक्ष होने का आरोप लगा देंगे। अगर उसने किसी अन्य धर्म का नाम लिया तो उस पर सांप्रदायिक होने का आरोप लग जायेगा। अगर भारतीय अध्यात्म ग्रंथों के साथ अन्य धर्म की पुस्तकों को त्यागने की बात कोई शायर, कवि या निबंधकार कहता है तो कोई उस पर ध्यान नहीं देता। चलो हमें काना कहा तो दूसरे को भी तो एक आंख वाला कहा।
अगर कोई अन्य भारतीय धर्मग्रंथ की बात कहे तो हम भी मूंह फेर सकते हैं पर जब मामला श्रीगीता का हो तब बात हमें कुछ जमती नहीं। हमें याद है कि बचपन में हमने जब हिंदी का प्रारंम्भिक ज्ञान प्राप्त किया था तब महाभारत ग्रंथ पढ़ते समय हमने श्रीगीता को पढ़ा था तब समझ में नहीं आया, पर कहते हैं कि बचपन में कोई बात भले ही समझ में न आये पर उसका अर्थ कहीं न कहीं आदमी के जेहन में रहता है। यही हाल हमारे साथ श्रीगीता का हुआ। अन्य किसी धर्मग्रंथ से जब भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथ की तुलना किसी फिल्मी या साहित्यक गीत, कविता, शायरी या आलेख में होती तो हम सहजता से लेते पर श्रीगीता का नाम आते ही असहज होते हैं। जब हिंदी का पूर्णता से ज्ञान हुआ तब पता लगा कि यह दुनियां की इकलौती ऐसी पुस्तक है जिसमें ज्ञान और विज्ञान है। समय के साथ हम भी चलते रहे पर श्रीगीता का ज्ञान कहीं न कहीं हमारे मस्तिष्क में रहा। इस पर अनेक लेख समाचार पत्रों में भेजे पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। तब हम सोचते थे कि हो सकता है कि हमारे लिखे में कमी हो।

इधर जब से अंतर्जाल पर लिखने का सौभाग्य मिला तो हमने सोचा कि चलो यहां अपनी अध्यात्मिक भूख भी मिटा लो। ऐसा करते हुए हमारा ध्यान श्रीगीता की तरफ जाना स्वाभाविक था। सच बात तो यह है कि अंतर्जाल पर लिखने से पहले हम इतना नहीं लिखते थे पर कहते हैं कि लिखते लिखते लव हो जाये। जब भी अवसर मिलता है श्रीगीता पर अवश्य लिखते हैं और यही लिखते लिखते हमें ऐसा लग रहा है कि या तो हम ही कुछ दिमाग से विचलित हैं या फिर शायर और कवि लोग ही सतही रूप से लिखते रहे हैं। एक तरह से वह कार्ल माक्र्स और अंग्रेजों के चेलों की संगत में नारे और वाद ढोने आदी हो गये हैं।
नारों और वाद पर चलने के आदी हो चुके इस समाज से यह आशा ही नहीं करना चाहिये कि वह कवियों और शायरों की चालाकियों को समझकर उनकी योग्यता पर उंगली उठाये। हम तो दूसरी बात कहते हैं कि जिस विषय पर आप जानते नहीं उस पर नहीं लिखें। हमने केवल भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथ ही पढ़े हैं इसलिये उन पर लिखते हैं-वह भी सकारात्मक पक्ष में। न तो हमने विदेशी लेखकों को पढ़ा है न ही गैर भारतीय धर्म ग्रंथों को देखा है इसलिये उन पर नहीं लिखते। उनकी आलोचना भी नहीं करते क्योंकि उर्दू शायरों की यह प्रवृत्ति हमें बिल्कुल नहीं भाती कि बिना जाने ही किसी विषय पर भी कुछ लिखने लगो।
एक सवाल हमारे दिमाग में आता है कि अगर कोई अन्य धर्म का भारतीय व्यक्ति भारतीय धर्म ग्रंथ पर कुछ प्रतिकूल बात कहता है तो हम उस पर चढ़ दौड़ते हैं चाहे भले ही उसने अपने धर्म ग्रंथ पर भी प्रतिकूल लिखा या कहा हो पर अगर कोई भारतीय धर्म का व्यक्ति ऐसा करे तो उसे हम सामान्य कहकर नजरअंदाज करते हैं-क्या यह हमारी बौद्धिका संकीर्णता का प्रमाण नहीं है।
दरअसल हुआ यह है कि उर्दू शायरों की लच्छेदार शायरियों से प्रभावित होकर जब देश के लोग वाह वाह करने लगे होंगे तो तो हिंदी कवि भी इसी राह पर चल पड़े होंगे। इसमें भी एक पैंच हैं। भले ही उर्दू और हिंदी समान भाषायें लगती हैं पर दोनों का भाव अलग है। एक बार धर्म को लेकर मामला बढ़ गया था तब एक विद्वान ने कहा कि अंग्रेजी में रिलीजन शब्द का भाव सीमित है पर हिंदी में धर्म शब्द का भाव बहुत व्यापक है। यही हाल उर्दू का है। उर्दू का प्यार शब्द दैहिक संबंधों तक ही सीमित है जबकि हिंदी का प्रेम शब्द इतना व्यापक है कि उसे इंसान के अलावा सर्वशक्तिमान और अन्य जीवों से भी जोड़ जाता है और उसे तभी समझा जा सकता है जब हमारे अपने आध्यात्मिक ज्ञान के प्रति आस्था हो। मुख्य बात संकल्प की है और हिंदी के प्रेम शब्द का उच्चारण करते ही हमारे अंदर समस्त जीवों के प्रति दया, करुणा और सहृदयता का भाव आता है।
बात कहां से शुरु हुई और कहां पहुंच गयी। उर्दू शायरों में केवल श्रोताओं और लेखकों में सतही भाव पैदा करने की ललक होती है। इसके विपरीत हिंदी कवियों में इसके साथ ही अध्यात्मिक ज्ञान जाग्रत करने का भाव भी पैदा होता है। मगर उर्दू शायरों की सफलता ने हिंदी कवियों को भी पथभ्रष्ट कर दिया है। यही कारण है कि कबीर, रहीम, तुलसी और मीरा के बाद फिर कोई कवि रत्न पैदा ही नहीं हुआ। यह शिकायत नहीं है और न ही किसी कवि विशेष के विरुद्ध प्रचार है बल्कि अपनी बात कहने का अंतर्जाल पर कहने का जो अवसर मिला है उसका लाभ उठाने का एक प्रयास भर है। हमें तो हर पाठक और लेखक प्रिय है। जो लिखने और पढ़ने में परिश्रम करते हैं। परिश्रम करने वालों का प्रेम करते हुए उनका सम्मान करना चाहिये- श्रीगीता को पढ़ने और समझने के बाद हम इसी निष्कर्ष पर पहुंचे हैं। शेष फिर कभी
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Saturday, August 22, 2009

मनुस्मृति-अध्ययन से पहले ॐ शब्द का जाप करें (manu smruti-om word and education)

अध्येयष्यमाणं तु गुरुर्नित्यकालमतन्द्रितः।
‘अधीष्व भो! इति ब्रुयाद्विरामोऽस्त्विति चारमेत्।।
हिंदी में भावार्थ-
शिष्य को पढ़ाने के विषय में गुरु को कभी भी आलस नहीं बरतना चाहिये। इसके अलावा बेमन से भी अध्यापन का कार्य करना उचित नहीं है। अध्यापन प्रारंभ करने से पहले छात्र से कहना चाहिये कि ‘पढ़ो’ और समाप्ति पर कहना चाहिये कि विश्राम करो।
ब्रह्यणः प्रणवः कुर्यादादावन्ते च सर्वदा।
स्त्रवत्यनोंकृतं पूर्व परस्ताच्च विशीर्यति।।
हिंदी में भावार्थ-
गुरु का यह कर्तव्य है कि वह अध्यापन प्रारंभ करने से पहले ॐ शब्द का आप छात्र से करावे। ऐसा न करने से पढ़ा हुआ स्मरण में नहीं रहता। इस कारण दोनों का परिश्रम व्यर्थ हो जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-वर्तमान शिक्षा पद्धति में अनेक दोष हैं और इसी कारण हमारे यहां समाज में विकृत्तियां बढ़ती जा रही है। हम समाज के आचरण को लेकर तमाम तरह की निराशाजनक प्रतिक्रियायें तो व्यक्त करते हैं पर उसमें सुधार की कोई योजना हमारे पास नहीं है। किसी भी मनुष्य में संस्कार और बौद्धिक निर्माण का समय उसका छात्र जीवन ही रहता है। उस समय संयम और नियम से जीवन व्यतीत करने पर ही शिक्षा प्राप्त हो सकती है। समाज चल रहा है इसकी विपरीत दिशा में। आजकल तो छात्र जीवन ही मौज मस्ती का माना जाता है और कहा जाता है कि आजकल बच्चे अपने माता पिता से अधिक कुशाग्र बुद्धि हैं क्योंकि वह मोबाइल और टीवी का रिमोट चलाना जानते हैं। मगर हम संस्कारों की बात नहीं करते जिनके बारे में सभी मानते हैं कि उनका क्षरण हो गया है। छात्र जीवन में ज्ञान प्राप्त करने के साथ ही इस बात की भी होड़ लगी है कि उसका अधिक से अधिक प्रदर्शन किया जाये।
कहते हैं कि भजन और भक्ति तो बुढ़ापे में किया जाना चाहिये जबकि सच यह है कि जो संस्कार बचपन में नहीं पड़े फिर उनकी स्थापना एकदम कठिन है। ऐसे में बचपन से बच्चों को अपनी नियमित शिक्षा के साथ ही आध्यात्म का ज्ञान भी दिया जाना चाहिये। विद्यालयों में तो यह शिक्षा मिलती नहीं है इसलिये माता पिता या दादा दादी को ही यह दायित्व उठाना चाहिये।
ॐ शब्द का हमारे अध्यात्म में बहुत महत्व है और इसलिये अध्ययन से पूर्व उसका जाप मन ही मन में अवश्य करना चाहिये। शब्दों में ओम को सर्वोत्तम माना गया है। विद्यालयों और महाविद्यालयों में तो इसका जाप अध्यापक कराते नहीं है इसलिये माता पिता को चाहिये कि वह अपने बच्चों को इसका जाप करने का संदेश दें। इसके जाप से पढ़ा हुआ याद रहता है और इससे मन भी स्वच्छ रहता है।
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Saturday, August 8, 2009

श्री गुरु ग्रंथ साहिब-नाचने कूदने से भक्ति नहीं होती (shri guru granth sahib)

नचिअै टपिअै भगति न होइ।
सब्दि मरै भगति पाए जन सोइ।।
हिंदी में भावार्थ-
श्री गुरु ग्रंथ साहिब वाणी के अनुसार नाचने और कूदने से भक्ति नहीं होती। गुरु के शब्द अनुसार ही चलने वाला व्यक्ति ही भक्ति को प्राप्त होता है।
मूत पलीती कपड़ु होइ। दे साबुण लइअै उहु धोइ।।
भरीअै मति पापा के संगि। उहु धोपैं नावे कै रंगि।।
हिंदी में भावार्थ-
मल मूत्र से मलिन वस्त्र साबुन से साफ हो जाते हैं पर जो मन में विकारों की गंदगी है उन्हें तो ईश्वर का नाम स्मरण कर ही धोया जा सकता है।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-भक्ति का भाव किसी को दिखाना संभव नहीं है। जब हम सभी को दिखाने के लिये नाचते कूदते हुए भगवान का नाम लेते हैं तो इसका आशय यह है कि हमारे हृदय में भगवान नहीं बल्कि वह लोग स्थित हैं जिनको हम प्रभावित करने का प्रयास करते हैं। नाम जुबान पर भगवान का होता है पर हृदय में यह भाव होता है कि लोग हमें भक्त समझकर सम्मान दें। इस तरह का ढोंग या पाखंड करने वाले कहीं भी देखे जा सकते हैं। अनेक धार्मिक कार्यक्रमों में संत गीत गाते हैं और उनके भक्त जोर जोर से गाते हुए नाच कर ऐसा दिखाते हैं गोया कि वह भक्ति में लीन हों। यह एक तरह से दिखावा है।

सच तो यह है कि जब आदमी भक्ति के चरम पर होता है उस समय उसका अपने अंगों पर से नियंत्रण समाप्त हो जाता है और वह कहीं मूर्तिमान होकर बैठा रहता है। उसके हाथ कहीं फैले रहते हैं तो सिर कहीं लटका होता है। वैसे भी भक्ति एकांत में की जाने वाली साधना है। भीड़ में तो केवल दिखावा ही हो सकता है।

तन और उस पर पहने जाने वाले कपड़े तो साबुन से साफ हो जाते हैं पर मन के मैले कुचले विचारों का ध्यान, योग साधना तथा हृदय से भगवान का नाम स्मरण किये बिना शुद्ध होना संभव नहीं है। कुछ लोग कहते हैं कि हम तो अपना कर्म ही धर्म समझते हैं पर अपनी आजीविका के लिये कर्म तो सभी जीव करते हैं। मनुष्य यौनि में ही यह सौभाग्य प्राप्त होता है कि हम भगवान का नाम स्मरण कर सकें। इसलिये यह जरूरी है कि हम अपने मन की शांति के लिये नित्य कुछ समय प्राणायम और भक्ति के लिये निकालें।
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Friday, August 7, 2009

मनुस्मृति-योग्य व्यक्तियों से संधि करना ही उचित (manu smruti-study of life)

प्राज्ञं कुलीनं शूरं च दक्षं दातारमेव च।
कृतज्ञः धुतिमंत च कष्टमाहुररि बुधाः।।
हिंदी में भावार्थ-
बुद्धिमान, कुलीन, शूरवीर, चतुर, धर्मात्मा, धैर्यवान, तथा कृतज्ञ व्यक्ति पर विजय पाना कठिन है। ऐसे व्यक्ति से संधि कर लेना चाहिए।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-अनेक अवसर पर क्रोध अथवा विवाद के कारण आदमी अपनी बुद्धि पर नियंत्रण खो बैठता है और यही उसके लिये आपत्ति का कारण बनता है। क्रोध या निराशा की स्थिति क्षणिक और जीवन बहुत लंबा होता है। इसलिये अवसाद के क्षणों में भी बुद्धिमान, वीर, चतुर, धर्मात्मा तथा धैर्य धारण करने वाले व्यक्ति से विवाद मोल नहीं लेना चाहिये। जीवन में पता नहीं कम किस के सहयोग की आवश्यकता पड़ जाये। क्रोध और निराशा के क्षणिक आवेग में सुयोग्य व्यक्ति से बैर लेना भविष्य में उससे मिलने वाले सहयोग की अपेक्षाओं को समाप्त करना है। जब कोई आपत्ति आती है तब उससे निपटने के लिये योजनाबद्ध तरीके से निपटने के लिये कार्यक्रम बनाना, साधन जुटाना तथा नियत समय पर कार्यवाही करने के लिये जिस बौद्धिक चातुर्य की आवश्यकता होती है उसकी पूर्ति के लिये सुयोग्य व्यक्तियों का साथ होना जरूरी है। ऐसे लोगों के साथ हमेशा अच्छा व्यवहार रखना चाहिये।
अनेक लोगों को यह भ्रम होता है कि धनी, प्रतिष्ठित तथा बाहूबली लोगों के साथ मित्रता होने से ही सारे संकट दूर हो जायेंगे तो यह उनका भ्रम है। कुछ लोग तो ऐसे लोगों की संगत में शांतिप्रिय, धैयैवान तथा बुद्धिमान लोगों से बैर भी लेते हैं पर जब विपत्ति आती है तो उन्हें ऐसे ही लोगों की आवश्यकता होती है। यही कारण है कि जीवन में अपने मित्र और सहयोगियों के संग्रह करते समय इस बात को अवश्य देखना चाहिये कि वह न केवल सुयोग्य हों बल्कि समय आपने पर मददगार भी हों। इसके लिये उनके साथ हमेशा सौहार्दपूर्ण संबंध रखें।
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Tuesday, August 4, 2009

गीता संदेश-स्वप्न,भय,शोक,विषाद एवं मद तामसी धारणाशक्ति का प्रमाण (gita sandesh-tamsi dharna shakti)

श्री गीता में श्री कृष्ण महाराज कहते हैं कि
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यथा स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च।
न विमुंचति दुमेंधा धृति सा पार्थ तामसी।।
हिंदी में भावार्थ-
मनुष्य में जिस धारणा शक्ति में स्वप्न, भय, शोक, विषाद और मद व्याप्त होते हैं उसे तामसी धारणाशक्ति कहा जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-पंचतत्वों से बनी यह देह नश्वर है पर मनुष्य अपना पूरा जीवन इसकी रक्षा करते हुए बिता देता है। यह देह जो कभी इस संसार को छोड़ देगी-इस सत्य से मनुष्य भागता है और इसी कारण उसे भय की भावना हमेशा भरी होती है। मनुष्य कितना भी धन प्राप्त कर ले पर फिर भी उसमें यह भय बना रहता है कि कभी वह समाप्त न हो जाये। परिणामतः वह निरंतर धन संग्रह में लगता है। भगवान की सच्ची भक्ति करने की बजाय वह दिखावे की भक्ति करता है-कहीं वह स्वयं को तो कहीं वह दूसरों को दिखाकर अपने धार्मिक होने का प्रमाण जुटाना ही उसका लक्ष्य रहता है।
दिन रात वह अपनी उपलब्धियों के स्वप्न देखता है। अगर आपको रात का सपना सुबह याद रहे तो इसका अर्थ यह है कि आप रात को सोये नहीं-निद्रा का सुख आपसे दूर ही रहा। लोग इसके विपरीत रात के स्वप्न याद रखकर दूसरों को सुनाते हैं। दिन में भौतिक लक्ष्य की प्राप्ति का हर मनुष्य हर पल सपना देखता है। जो उसके पास है उससे संतुष्ट नहीं होता।

सभी जानते हैं कि इस संसार में जो आया है उसे एक दिन यह छोड़ना है पर फिर भी अपने सगे संबंधी के मरने पर वह दुःखी होता है। न हो तो भी जमाने को दिखाने के लिये शोक व्यक्त करता है।
यह देह कभी स्वस्थ होती है तो कभी अस्वस्थ हो जाती है। इस दैहिक विपत्ति से बड़े बड़े योगी मुक्त नहीं हो पाते पर मनुष्य के शरीर में जब पीड़ा होती है तब वह विषाद में सब भूल जाता हैं वह पीड़ा उसके मस्तिष्क और विचारों में ग्रहण लगा देती है। देह में यह परेशान मौसम, खान पान या परिश्रम से कभी भी आ सकती है और जैसे ही उसका प्रभाव कम हो जाता है वैसे ही मनुष्य स्वस्थ हो जाता है पर इस बीच वह भारी विषाद में पड़ा रहता है।
थोड़ा धन, संपदा और शक्ति प्राप्त होने से मनुष्य में अहंकार आ जाता है। उसे लगता है कि बस यह सब उसके परिश्रम का परिणाम है। सब के सामने वह उसका बखान करता है।
कहने का तात्पर्य यह है कि हम दृष्टा की तरह इस संसार को देखें। गुण ही गुणों को बरतते हैं अर्थात हमारे अंदर सपनें, शोक, भय, विषाद और मद की प्रवृत्ति का संचालन वाले तत्व प्रविष्ट होते हैं जिनका अनुसरण यह देह सहित उसमें मौजूद इंद्रियां करती हैं। जब हम दृष्टा बनकर अपने अंदर की चेष्टाओं और क्रियाओं को देखेंगे तब इस बात का आभास होगा कि हम देह नहीं बल्कि आत्मा हैं।
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Saturday, August 1, 2009

विदुर नीति-ईर्ष्या रोग के इलाज के लिये कोई औषधि नहीं (vidur sandesh-irshya ka koyi ilaj nahin)

य ईर्षुः परवित्तेषु रूपे वीर्य कुलान्वये।
सुखभौभाग्यसत्कारे तस्य व्याधिनन्तकः।।
हिंदी में भावार्थ
-जो दूसरे का धन, सौंदर्य, शक्ति और प्रतिष्ठा से ईष्र्या करता है उसकी व्याधि की कोई औषधि नहीं है।
न कुलं वृत्तही प्रमाणमिति मे मतिः।
अन्तेध्वपि हि जातानां वृत्तमेव विशिष्यते।।
हिंदी में भावार्थ-
अगर प्रवृत्ति नीच हो तो ऊंचे कुल का प्रमाण भी सम्मान नहीं दिला सकता। निम्न श्रेणी के परिवार में जन्मा व्यक्ति प्रवृत्ति ऊंची का हो तो वह अवश्य विशिष्ट सम्मान का पात्र है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-ईर्ष्या का कोई इलाज नहीं है। मनुष्य में रहने वाली यह प्रवृत्ति उसका पूरा जीवन ही नरक बना देती है। मनुष्य जीवन में बहुत सारा धन कमाता और व्यय करता है पर फिर भी सुख उससे परे रहता है। सुख कोई पेड़ पर लटका फल नहीं है जो किसी के हाथ में आ जाये। वह तो एक अनुभूति है। अगर हमारे रक्तकणों में आनंद पैदा करने वाले तत्व हों तभी सुख की अनुभूति हो सकती है। इसके विपरीत लोग तो दूसरे के सुख से जले जा रहे हैं। अपनी पीड़ा से अधिक कहीं उनको दूसरे का सुख परेशान करता है। इससे कोई विरला ही मुक्त हो पाता है। ईर्ष्या और द्वेष से मनुष्य में पैदा हुआ संताप मनुष्य को बीमार बना देता है। उसके इलाज के लिये वह चिकित्सकों के पास जाता है। फिर भी उसमें सुधार नहीं होता क्योंकि ईष्र्या और द्वेष का इलाज करने वाली कोई दवा इस संसार में बनी ही नहीं है।

जो लोग जाति, भाषा, धर्म और क्षेत्र के नाम पर सम्मान पाने का मोह पालते हैं वह मूर्ख हैं। उसी तरह पैसा, पद, और प्रतिष्ठा पाने पर अगर कोई यह भ्रम पाल लेता है कि लोग उनका सम्मान करते हैं तो वह भी नहीं रखना चाहिये। लोग दिखाने के लिये अपने से अधिक धनवान का सम्मान करते हैं पर हृदय से उसी व्यक्ति को चाहते हैं जो उनसे अधिक गुणवान होता है। गुणों की पहचान ही मनुष्य की पहचान होती हैं। इसलिये अपने अंदर सद्गुणों का संचय करना चाहिए।
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Thursday, July 30, 2009

चाणक्य नीति-निर्धन को हमेशा अयोग्य न समझें (chankya niti in hindi)

धनहीनो न हीनश्च धनिकः स सुनिश्चयः।
विद्यारत्नेद यो हीनः स हीनः सर्ववस्तुष।।
हिंदी में भावार्थ-
नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि धन से रहित व्यक्ति को
दीन हीन नहीं समझना चाहिये अगर वह विद्या ये युक्त है। जिस व्यक्ति के पास धन और अन्य वस्तुयें हैं पर अगर उसके पास विद्या नहीं है तो वह वास्तव में दीन हीन है।
दुष्टिपतं न्यसेत् पादं वस्त्रपूतं पिबेजलम्।
शास्त्रपूतं वदेद् मनः पूतं समाचरेत्।।
हिंदी में भावार्थ-
आंखों से देखकर जमीन पर पांव रखें। कपड़े से छान कर पानी पियो। शास्त्र से शुद्ध कर वाक्य बोलें और कोई भी पवित्र काम मन लगाकर संपन्न करें।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-समाज में निर्धन आदमी को अयोग्य मान लेने की प्रवृत्ति है और यही कारण है कि उसमें वैमनस्य फैल रहा है। एक तरफ धनी मानी लोग यह अपेक्षा करते हैं कि कोई उनकी रक्षा करे दूसरी तरफ अपनी रक्षा के लिये शारीरिक सामथ्र्य रखने वाले निर्धन व्यक्ति का सम्मान करना उनका अपने धन का अपमान लगता है। संस्कार, संस्कृति और धर्म बचाने के लिये आर्तनाद करने वाले धनी लोग अपने देश के निर्धन लोगों का सम्मान नहीं करते और न ही उनके साथ समान व्यवहार उनको पसंद आता है। धनीमानी और बाहूबली लोग देश पर शासन तो करते हैं पर उसे हर पल प्रमाणिक करने के उनके शौक ने उनको निर्धन समाज की दृष्टि में घृणित बना दिया है।
यह एक सर्वमान्य तथ्य है कि युद्ध में कोई धनीमानी नहीं बल्कि गरीब परिवारों के बच्चे जाते हैं। अमीर तो उनकी बहादुरी और त्याग के वजह से सुरक्षित रहते हैं पर फिर भी उनके लिये गरीब और उसकी गरीबी समाज के लिये अभिशाप है। गरीब की गरीबी की बजाय उसे ही मिटा डालने के लिये उनकी प्रतिबद्धता ने निचले तबके का शत्रु बना दिया है। यह देश दो हजार वर्ष तक गुलाम रहा तो केवल इसलिये कि समाज के धनी और बाहूबली वर्ग ने अपना दायित्व नहीं निभाया।

आदमी को हमेशा ही सतर्क रहना चाहिये। कहीं भी जमीन पर पांव रखना हो तो उससे पहले अपनी आंखों की दृष्टि रखना चाहिये। आजकल जिस तरह सड़क पर हादसों की संख्या बढ़ रही है उससे तो यही लगता है कि लोग आंखों से कम अनुमान से अधिक चलते हैं। अधिकतर बीमारियां पानी के अशुद्ध होने से फैलती हैं और जितना स्वच्छ पानी का उपयोग किया जाये उतना ही बीमार पड़ने का खतरा कम हो जाता है। इसके अलावा निरर्थक चर्चाओं से अच्छा है आदमी धार्मिक ग्रंथों और सत्साहित्य की चर्चा करे ताकि मन में पवित्रता रहे।
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Monday, July 27, 2009

विदुर नीति-सदा चमत्कारपूर्ण वाणी बोलना भी कठिन (vidur niti in hindi)

वाक्संयमो हि नपते सुदुष्करतमो मतः।
अर्थवच्च विचित्रं च न शक्यं बहु भाषितम्।
हिंदी में भावार्थ-
मुख से वाक्य बोलने पर संयम रखना तो कठिन है पर हमेशा ही अर्थयुक्त तथा चमत्कारपूर्ण
वाणी भी अधिक नहीं बोली जा सकती।
अभ्यावहति कल्याणं विविधं वाक् सुभाषिता।
सैव दुर्भाषिता राजन्नर्थायोपपद्यते।।
हिंदी में भावार्थ-
अच्छे और मधुर ढंग से कही हुई बात से सभी का कल्याण होता है पर यदि कटु वाक्य बोले जायें तो महान अनर्थ हो जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-यह सच है कि अपनी वाणी पर सदैव संयम रखना कठिन है। दूसरा यह भी कि हमेशा अपने मुख से चमत्कार पूर्ण वाक्य निकलें यह संभव नहीं है। पांच तत्वों से बनी इस देह में मन, बुद्धि और अहंकार की प्रवृत्तियां हमेशा अपना घर किये बैठी हैं और जब तक आदमी उन पर दृष्टि रखता है तभी तब नियंत्रण में रहती हैं। जहां आदमी ने थोड़ा दिमागी आलस्य दिखाया उनका आक्रमण हो जाता है और मनुष्य उनके प्रभाव में अपने ही मुख से अंटसंट बकने लगता है। आत्मनिंयत्रण करना जरूरी है पर पूर्ण से करना किसी के लिये संभव नहीं है। हम हमेशा अच्छा बोलने का प्रयत्न करें पर दूसरे लोग कभी न कभी अपने व्यवहार से उत्तेजित कर गलत बोलने को बाध्य कर ही देते हैं।

मधुर स्वर और प्रेमभाव से कही गयी बात का प्रभाव होता है यह सत्य है। इसी तरह ही अपने जीवन को सहजता से व्यतीत किया जा सकता है। कठोर एवं दुःख देने वाली वाणी बोलकर भले ही हम अपने अहं की शांति कर लें पर कालांतर में वह स्वयं के लिये ही बहुत कष्टदायी होती है। यह तय है कि हम अपनी मधुर वाणी से दस काम किसी से करवा सकते हैं पर कठोर वाणी से किसी को कष्ट पहुंचाकर स्वयं भी चैन से नहीं बैठ सकते।
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Saturday, July 25, 2009

मनुस्मृति-पश्चाताप के लिये कुरुक्षेत्र या गंगा नहीं जाना तो झूठ का आसरा न लें (jhuth ka asara na len-manu smruti)

एकोऽहमस्मीत्यातमानं यत्तवं कल्याण मन्यसे।
नित्यं स्थितस्ते हृद्येष पुण्यपापेक्षिता मुनिः।।
हिंदी में भावार्थ-
यदि कोई आदमी यह सोचकर झूठी गवाही दे रहा है कि वह अकेला है और सच्चाई कोई नहंी जानता तो वह भूल करता है क्योंकि पाप पुण्य का हिसाब रखने वाला ईश्वर सभी के हृदय में रहता है।
यमो वैवस्वतो देवो यस्तवैध हृदिस्थितः।
तेन चेदविवादस्ते मां गंगा मा कृरून गमः।।
हिंदी में भावार्थ-
सभी के हृदय में भगवान विवस्वान यम साक्षी रूप में स्थित रहते हैं। यदि उनसे कोई विवाद नहीं करना है तथा पश्चाताप के लिये गंगा या कुरुक्षेत्र में नहीं जाना तो कभी झूठ का आश्रय न लें।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अपने स्वार्थ के लिये झूठ बोलना अज्ञानी और पापी मनुष्य का लक्षण है। सभी का पेट भरने वाला परमात्मा है पर लालची, लोभी, कामी और दुष्ट प्रवृत्ति के लोग झूठ बोलकर अपना काम सिद्ध करना अपनी उपलब्धि मानते हैं। अनेक लोग झूठी गवाही देते हैं या फिर किसी के पक्ष में पैसा लेकर उसका झूठा प्रचार करते हैं। अनेक कथित ज्ञानी तो कहते हैं कि सच बोलने से आज किसी का काम नहीं चल सकता। यह केवल एक भ्रम है।
यह दुनियां वैसी ही होती है जैसी हमारी नीयत है। अगर हम यह मानकर चल रहे हैं कि झूठ बोलने से अब काम नहीं चलता तो यह अधर्म की तरफ बढ़ाया गया पहला कदम है। कई लोग ऐसे है जो अपनी झूठी बेबसी या समस्या बताकर दूसरे से दान और सहायता मांगते हैं और उनको मिल भी जाती है। अब यह सोच सकते हैं कि झूठ बोलने से कमाई कर ली पर उनको यह विचार भी करना चाहिये कि दान या सहायता देने वाले ने अपनी धार्मिक प्रवृत्ति के कारण ही अपना कर्तव्य निभाया। इसका आशय यह है कि धर्म का अस्तित्व आज भी उदार मनुष्यों में है। इसे यह भी कहना चाहिये कि यह उदारता ही धर्म के अस्तित्व का प्रमाण है। इसलिये झूठ बोलने से काम चलाने का तर्क अपने आप में बेमानी हो जाता है क्योंकि अंततः झूठ बोलना धर्म विरोधी है।
आदमी अनेक बार झूठ बोलता है पर उसका मन उस समय कोसता है। भले ही आदमी सोचता है कि झूठ बोलते हुए कोई उसे देख नहीं रहा पर सच तो यह है कि परमात्मा सभी के हृदय में स्थित है जो यह सब देखता है। एक मजेदार बात यह है कि आजकल झूठ बोलने वाली मशीन की चर्चा होती है। आखिर वह झूठ कैसे पकड़ती है। होता यह है कि जब आदमी झूठ बोलता है तब उसके दिमाग की अनेक नसें सामान्य व्यवहार नहीं करती और वह पकड़ा जाता है। यही मशीन इस बात का प्रमाण है कि कोई ईश्वर हमारे अंदर है जो हमें उस समय इस कृत्य से रोक रहा होता है।
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Friday, July 24, 2009

रहीम के दोहे-परोपकार करने वाले दोस्ती बीच में नहीं लाते (rahim ke dohe-paropkar aur dosti)

रहिमन पर उपकार के, करत न यारी बीच
मांस दियो शिवि भूप ने, दीन्हो हाड़ दधीच

कविवर रहीम कहते हैं कि जिस मनुष्य का परोपकार करना है वह जरा भी नहीं हिचकता। वह परोपकार करते हुए यारी दोस्ती का विचार नहीं करते। राजा शिवि ने ने प्रसन्न मुद्रा में अपने शरीर का मांस काट कर दिया तो महर्षि दधीचि ने अपने शरीर की हड्डियां दान में दीं।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-विश्व का हर बड़ा आदमी परोपकार करने का दावा करता है पर फिर भी किसी का कार्य सिद्ध नहीं होता। अभिनेता, कलाकार, संत, साहुकार तथा अन्य प्रसिद्ध लोग अनेक तरह के परोपकार के दावों के विज्ञापन करते हैं पर उनका अर्थ केवल आत्मप्रचार करना होता है। आजकल गरीबों, अपंगों,बच्चों,बीमारों और वृद्धों की सेवा करने का नारा सभी जगह सुनाई देता है और इसके लिये चंदा एकत्रित करने वाली ढेर सारी संस्थायें बन गयी हैं पर उनके पदाधिकारी अपने कर्मों के कारण संदेह के घेरे में रहते हैं। टीवी चैनल वाले अनेक कार्यक्रम कथित कल्याण के लिये करते हैं और अखबार भी तमाम तरह के विज्ञापन छापते हैं पर जमीन की सच्चाई यह है कि परोपकार भी एक तरह से व्यापार हो गया है और इसके माध्यम से प्रचार और आय अर्जित करने की योजनाओं को पूरा किया जाता है।
हमारे देश में निरंतर गरीबी और बेरोजगारी बढ़ रही है। कहने को दान धर्म करने वाले बहुत लोग हैं पर देखने वाली बात यह है कि उनके आय के स्त्रोत कितने पवित्र हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि स्वच्छ और परिश्रमी व्यवसायों में लोग इतना नहीं कमा पाते जितना अपवित्र व्यापारों में कमा लेते हैं। ऐसे लोग दान और धर्म भी इसी तरह करते हैं कि जिससे प्रचार मिले और उसकी आड़ में वह अपनी छबि साफ बनाकर समाज में प्रतिष्ठित रह सकें।

जिन लोगों को परोपकार करना है वह किसी की परवाह नहीं करते। न तो वह प्रचार करते हैं और न ही इसमें अपने पराये का भेद करते हैं। उनके लिये परोपकार करना एक नशे की तरह होता है। सच तो यह है कि यह मानव जाति अगर आज भी चैन की सांस ले रही है तो वह ऐसे लोगों की वजह से ले रही हैं ऐसे लोग न केवल बेसहारा की मदद करते हैं बल्कि पर्यावरण और शिक्षा के लिये भी निरंतर प्रयत्नशील होते हैं। वरना तो जिनके पास पद, पैसे और प्रतिष्ठा की शक्ति है वह इस धरती पर मौजूद समस्त साधनों का दोहन करते हैं पर परोपकारी लोग निष्काम भाव से उन्हीं संसाधनों में श्रीवृद्धि करते है। जिनका परोपकार करने का संकल्प लेना है उन्हें यह तय कर लेना चाहिए कि वह प्रचार और पाखंड से दूर रहेंगे।
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Thursday, July 23, 2009

चाणक्य नीति-काम करने का गुण सिंह और बगुले से सीखें (chankya niti-singh aur bagule ke gun)

प्रभूतं कार्यमल्पं या यन्नरः कर्तुमिच्छति।
सवरिमभेण तत्कार्य सिंहादेके प्रचक्षते।।
हिंदी में भावार्थ-
कार्य छोटा हो या बड़ा उससे पूरी शक्ति के साथ करने का गुण सिंह से सीखना चाहिये।
इंद्रियाणि च संयभ्य बकवत् पण्डितो नरः।
देशकालबलं ज्ञात्वां सर्वकार्याणि साधयेत्।।
हिंदी में भावार्थ-
ज्ञानी लोगों को चाहिये कि अपनी इंद्रियों को वश में कर देशकाल के अनुसार अपनी शक्ति को पहचाते हुए कोई भी कार्य एकाग्रता से करने का गुण बगुले से सीखे।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-आज के प्रतियोगी युग में जहां आदमी को अधिक सतर्कता, एकाग्रता तथा अपनी पूरी शक्ति से काम करने की आवश्यकता होती है वहां लोग लापरवाही तथा और बिना सोचे समझे कार्य करने के आदी होते जा रहे हैं। जीवन की सफलता का कोई संक्षिप्त मार्ग नहीं है। दूसरों के कहने में आकर बिना जांचे परखे काम प्रारंभ करने का अर्थ है कि अपने लिये नाकामी और तनाव मोल लेना। इतना ही नहीं दूसरों की सफलता को देखकर उन जैसा ही जल्दी बनने की इच्छा अनेक लोगों को कर्जे और अपराध के दलदल में डाल देती है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि लोगों ने परिश्रम के काम को छोटा काम मान लिया है। हर कोई चाहता है कि वह आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित कार्यालयों में काम करे जहां वह समाज में दूसरे लोगों को सभ्य लगे। परिश्रम के प्रति यह अरुचि समाज में वैमनस्य का भी कारण बन रही है। परिश्रमी व्यक्ति को असम्मानित दृष्टि से देखना उसके अंदर कुंठा को जन्म देती है जो अंततः कहीं घृणा तो कहीं अपराध के रूप में परिवर्तित हो जाती है। इसके अलावा जिन लोगों को परिश्रम से परहेज है वह जिंदगी में अधिक तरक्की भी नहीं कर पाते-केवल ख्वाब देखते हुए तनाव में जीते हैं। काम करने का गुण तो शेर से सीखना चाहिये जो अपने लिये भोजन स्वयं जुटाने के लिये परिश्रम करता है। एकाग्रता बगुले से सीखना चाहिये। जो काम करना है उसी में भविष्य की सफलता मानकर एकाग्रता से उसमें लगना चाहिये।
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Wednesday, July 22, 2009

चाणक्य नीति-विद्वान को धर्म संग्रह की चिंता करना चाहिए (chankya niti-gyani aur dharm sangrah)

नाहारं विच्तयेत् प्राज्ञो धर्ममेकं हि चिन्तयेत्।
आहारा हि मनुष्याणां जन्मना सह जायते।।
हिंदी में भावार्थ-
विद्वान को भोजन तथा अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति की चिंता छोड़कर केवल धर्म संग्रह की चिंता करना चाहिए क्योंकि परमात्मा ने दैहिक आवश्यकताओं की पूर्ति की व्यवस्था पहले ही कर दी है।
जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्वते घटः।
स हेतु सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य चः।।
हिंदी में भावार्थ-
पानी की एक एक बूंद से जिस तरह घड़ा भर जाता है उसी प्रकार थोड़े से अभ्यास से सभी प्रकार विद्यायें, धार्मिक ज्ञान तथा धन प्राप्त किया जा सकता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जीवन में सफलता प्राप्त करने का कोई संक्षिप्त मार्ग नहीं है। जीवन में धीरज के साथ अपने कर्म करने के साथ ही ज्ञानार्जन का अभ्यास सतत करना ही सफलता का मंत्र है। संक्षिप्त मार्ग ढूंढने का आशय है अप्राकृतिक साधनों की तरफ आकर्षित होकर अपने लिये विपत्तियों का बुलाना। लोग एक दिन में ही लखपति और फिर करोड़पति बनना चाहते हैं। सच बात तो यह है कि अवैध या अपराधिक कार्यों में ही यह संभव है पर स्वच्छ और पवित्र व्यवसायों में तो धीरज के साथ ही उन्नति की तरफ बढ़ा जाता है। इस बात पर विचार कर सुख के साथ शांति पूर्वक जीवन की इच्छा करने वालों को अपने व्यवसाय और नौकरी के साथ ही अध्यात्मिक विषयों में भी रुचि लेना चाहिए।
इतना ही नहीं जीवन में परिश्रम से बचने का कोई प्रयास नहीं करना चाहिए। काम करने से ही आत्मविश्वास बढ़ता है और इसके लिये जरूरी है कि अपने प्रयास में नैतिकता और ईमानदारी बरतें। अपने व्यवसाय और अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्ति के कार्य के निरंतर अभ्यासरत रहने से उपलब्धियों प्राप्त होती हैं और इस पर विश्वास करना चाहिए।
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Monday, July 20, 2009

भर्तृहरि शतक-अपने अज्ञान के कारण पंतगा भस्म होता है (gyan n hone ka parinam-adhyatmik sandesh)

स्तनौ मांसग्रन्थी कनककलशावित्यूपमिती मुखं श्लेष्मागारं तदपि च शशांकेन तुलितम्।
स्रवमूलक्लिन्नं करिवरकरस्र्धि जघनंमुहूर्निद्यं रूपं कविजन विशेषैर्गुरुकृतिम्

हिंदी में भावार्थ-मांस पिण्ड से बनी नारी देह का कवियों ने बहुत घृणित ढंग से वर्णन किया है। वह ख्खारने और थूकने के लिये जो मुख उपयोग में आता है उसकी तुलना चंद्रमा से करते हैं जो कि निंदनीय है।

अजानन्दाहात्भ्यं पततु शालभे दीपदहने स मीनोऽप्यज्ञानाद्वडियुतमश्नातु पिशितम्।
विजानंतोऽप्येतेवयमिह विषज्जालजटिलाः न मुंजचामः कामानहह गहनो मोह महिमा

हिंदी में भावार्थ-अपने अज्ञान के कारण पंतगा दीपक की लौ की तरफ आकर्षित होकर उसमें प्रवेश कर प्राण गंवा देता है और मछली कांटे में फंस जाती है पर मनुष्य तो इस संसार में भोग विलास के में यह जानते हुए भी लिप्त होता है कि उसका परिणाम अच्छा नहीं होगा।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-देखा जाये तो स्त्री के प्रति कवियों के मन में आकर्षण सदियों से है। वह उसकी देह की व्याख्या कर उसे बहुत सुंदर प्रतिपादित करते हैं जबकि देखा जाये तो स्त्री और पुरुष दोनों की देह मांस पिंड से ही बनी है। इस देह के साथ अच्छाई और बुराई दोनों ही समान रूप से जुड़ी हैं।
प्रत्येक मनुष्य की देह में विकार होते हैं। इतना ही नहीं हम अपने मुख से मिठाई खायें या करेला उनको हमारी देह के अंग ही कचड़े के रूप में परिवर्तित कर देते हैं। वह कचड़ा जब निष्कासन अंगों से बाहर आता है तो हम ही उसे देखना नहीं चाहते। कहने का तात्पर्य यह है कि यह देह मांस के पिंड से बनी है पर स्त्री की देह पर अनेक रसिक कवि ऐसी टिप्पणियां लिखते हैं जो हास्यास्पद और निंदनीय है। यह परंपरा आज भी चली आ रही है। हमारे यहां सूफी भक्ति की भी परंपरा शुरु हुई है पर उसमें गीत इस तरह लिखे गये जैसे वह निरंकार ईश्वर के लिये गाये जा रहे हैं पर उसे दैहिक प्रेम करने वाले लोग अपने संदर्भ में लेते हैं। फिल्मों में कई ऐसे गीत हैं जिनका सृजन तो निरंकार के लिये किया जाता है पर दृश्य में नायक या नायिक दिखाई देती है।
पतंगा अपने अज्ञान के कारण दीपक की लौ में जलकर भस्म होता है पर उसे भी प्रेम का प्रतीक बना दिया गया है। एक तरह से रसिक कवि न केवल स्वयं ही अज्ञानता के अंधेरे में होते हैं बल्कि अपनी कविताओं से दूसरे लोगों को भी भ्रमित करते हैं।
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Sunday, July 19, 2009

मनुस्मृतिः कन्या अपना वर स्वयं चुन सकती है (kanya apna var khud chun sakti hai-manu smurti)

अलंकारं नाददीत पित्र्यं कन्या स्वयंवरा।
मातृकभ्रातृदतं वा स्तेना स्वाद्यदि तं हरेत्।।
हिंदी में भावार्थ-
कोई युवती अपने लिये वर स्वयं ही चुनकर विवाह कर सकती है पर उसे अपने माता पिता तथा भाई द्वारा दिये गये आभूषणों को ले जाने का अधिकार नहीं है। स्वयं वर चुनकर विवाह करने पर अगर वह आभूषण ले जाती है तो उसे अनुचित ही कहा जायेगा।
देवदतां पतिर्भार्यां विन्दते नेच्छत्यात्मनः।
तां साध्वीं बिभृयान्नित्यं दीनां प्रियमाचरन्।।
हिंदी में भावार्थ-
पुरुष स्वयं की इच्छा ने नहीं वरन् देवताओं द्वारा पूर्व निर्धारित स्त्री को ही पत्नी के रूप में प्राप्त करता है। उन्हीं देवताओं के प्रसन्न करने तथा उनके प्रति आस्था प्रदर्शित करने के लिये पुरुष का कर्तव्य है कि वह अपनी आश्रिता पत्नी का भरण भोषण करे।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-कहते हैं कि भारतीय समाज में कन्या को स्वयं अपना वर चुनने या विवाह करने का अधिकार नहीं है-यह आरोप पूरी तरह से मिथ्या है। मनु महाराज के समय में यह अधिकार था शायद इसी कारण उन्होंने इसकी चर्चा की है पर इतना अवश्य है कि उस पर उन्होंने यह विचार व्यक्त किया है कि जो कन्या युवती ऐसा करती है अपने माता, पिता तथा भाई द्वारा समस समय पर उपहार रूप में प्रदान आभूषण ले जाने का अधिकार नहीं है। यह स्वाभाविक भी है। जब माता पिता तथा भाई अपने कर्तव्य का निर्वाह करने के लिये अपनी कन्या युवती के लिये वर का चयन करते हैं तो वह अपनी प्रतिष्ठा के लिये उपहार स्वरूप दहेज भी देते हैं पर जहां उनको ऐसा अधिकार नहीं मिलता वहां वह अपने उपहार देने के कर्तव्य से विमुख भी हो सकते हैं। अगर किसी युवती ने अपनी इच्छा से वर चुनकर विवाह करने का निर्णय किया है तो उसे अपने माता पिता तथा भाई द्वारा दिये गये आभूषण लौटा देना चाहिये वरना उसके इस कृत्य को अनुचित कहा जायेगा। हां अगर माता पिता और भाई अगर उन आभूषणों को वापस नहीं चाहते तो फिर कन्या पर कोई आरोप नहीं लगाया जा सकता है। आजकल की परिस्थतियों में प्रेम विवाह का प्रचलन बढ़ रहा है और कोई जगह तो माता पिता और भाई न केवल उसे स्वीकृति देते हैं पर अपनी क्षमतानुसार उपहार भी देते हैं।
हालांकि इस तरह का प्रतिबंध मनु महाराज ने लगाया जरूर है पर उन्होंने कन्या युवती के स्वयं वर चुनने के अधिकार को स्वीकार भी किया है।

इसके अलावा प्रत्येक पुरुष को यह समझना चाहिये कि उसे जो युवती पत्नी के रूप में प्राप्त हुई है वह देवताओं द्वारा तय किये भाग्य के कारण प्राप्त हुई है। इसलिये उसका यह कर्तव्य है कि वह अपनी पत्नी का भरण भोषण का कर्तव्य पूरा करे। उसे यह कर्तव्य देवताओं के प्रति आस्था प्रदर्शित करते हुए उनको प्रसन्न करने के लिये करना चाहिये। तात्पर्य यह है कि जो लोग अपनी पत्नी का भरण भोषण अच्छी तरह नहीं करते देवता उनसे रुष्ट हो जाते हैं।
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Thursday, July 16, 2009

भर्तृहरि नीति शतक-न नट न गायक फ़िर राजाओं से क्या काम


न नटा न विटा न गायकाः न च सभ्येतरवादचंचवः।
नृपमीक्षितुमत्र के वयं स्तनभारानमिता न योषितः।।
                     हिंदी में भावार्थ-महाराज भर्तृहरि कहते हैं कि न तो हम नट हैं न गायक न असभ्य ढंग से बात करने वाले मसखरे और न हमारा सुंदर स्त्रियों से कोई संबंध है फिर हमें राजाओं से क्या लेना देना?



स जातः कोऽप्यासीनमदनरिमुणा मूध्निं धवलं कपालं यस्योच्चैर्विनहितमलंकारविधये।
नृभिः प्राणत्राणप्रवणमतिभिः कैश्चिदधुना नमद्धिः कः पुंसामयमतुलदर्प ज्वर भरः।
                     हिंदी में भावार्थ-महाराज भर्तृहरि कहते हैं कि भगवान शिव ने अपने अनेक खोपड़ियों की माला सजाकर अपने गले में डाल ली पर जिन मनुष्यों को अहंकार नहीं आया जिनके नरकंकालों से वह निकाली गयीं। अब तो यह हालत है कि अपनी रोजी रोटी के लिये नमस्कार करने वाले को देखकर उससे प्रतिष्ठित हुआ आदमी अहंकार के ज्वर का शिकार हो जाता है।

                 वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जिसे देखो वही अहंकार में डूबा है। जिसने अधिक धन, उच्च पद और अपने आसपास असामाजिक तत्वों का डेरा जमा कर लिया वह अहंकार में फूलने लगता है। अपने स्वार्थ की वजह से सामने आये व्यक्ति को नमस्कार करते हुए देखकर कथित बड़े, प्रतिष्ठित और बाहूबली लोग फूल जाते हैं-उनको अहंकार का बुखार चढ़ता दिखाई देता है। यह तो गनीमत है कि भगवान ने जीवन के साथ उसके नष्ट होने का तत्व जोड़ दिया है वरना वह स्वयं चाहे कितने भी अवतार लेते ऐसे अहंकारियों को परास्त नहीं कर सकते थे।
                            अधिक धन, उच्च पद और बाहूबल वालों को राजा मानकर हर कोई उनसे संपर्क बढ़ाने के लिये आतुर रहता है। जिसके संपर्क बन गये वह सभी के सामने उसे गाता फिरता है। इस तरह के भ्रम वही लोग पालते हैं जो अज्ञानी है। सच बात तो यह है कि अगर न हम अभिनेता है न ही गायक और न ही मसखरी करने वाले जोकर और न ही हमारी सुंदर स्त्रियों से कोई जान पहचान तब आजकल के नये राजाओं से यह आशा करना व्यर्थ है कि वह हमसे संपर्क रखेंगे। बड़े और प्रतिष्ठित लोग केवल उन्हीं से संपर्क रखते हैं जिनसे उनको मनोरंजन या झूठा सम्मान मिलता है या फिर वह उनके लिये व्यसनों को उपलब्ध कराने वाले मध्यस्थ बनते हों। अगर इस तरह की कोई विशेष योग्यता हमारे अंदर नहीं है तो फिर बड़े लोगों से हमारा कोई प्रयोजन नहीं रह जाता।
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Saturday, July 11, 2009

संत कबीर वाणी-मनुष्यों में बुद्धि का अंतर होता है (manushy aur buddhi-sant kabir vani)

यह ब्लाग/पत्रिका विश्व में आठवीं वरीयता प्राप्त ब्लाग पत्रिका ‘अनंत शब्दयोग’ का सहयोगी ब्लाग/पत्रिका है। ‘अनंत शब्दयोग’ को यह वरीयता 12 जुलाई 2009 को प्राप्त हुई थी। किसी हिंदी ब्लाग को इतनी गौरवपूर्ण उपलब्धि पहली बार मिली थी।
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फेर पड़ा नहिं अंग में, नहिं इन्द्रियन के मांहि।
फेर पड़ा कछु बूझ में, सो निरुवरि नांहि।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि सभी मनुष्यों के अंग एक तरह के हैं और सभी की इंद्रियों का काम भी एक जैसा है बस समझ का फेर है। इसलिये अपनी बुद्धि को शुद्ध रखने का प्रयास करना चाहिए।
या मोती कछु और है, वा मोती कछु और।
या मोती है शब्द का, व्यापि रहा सब ठौर।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि यह मोती कुछ और है और वह मोती कुछ और। शब्द ज्ञान वाला मोती सभी जगह व्याप्त है पर पर एक एक मोती वह है जो केवल सागर में ही प्राप्त होता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-सभी मनुष्य एक समान है क्योंकि सभी के अंग एक जैसे हैं-भले ही रहने की धरती और खान पान की विविधता के कारण उनका रंग अलग होता है। सभी मनुष्यों की जरूरतें भी एक जैसी होती हैं क्योंकि उनकी इंद्रियों के विषय सुख भी एक जैसे हैं। इसके बावजूद मनुष्य के आचार विचार और चाल चलन में अंतर पाया जाता है। यह अंतर बुद्धि के कारण होता है। जिनकी बुद्धि शुद्ध होती है वह हमेशा सकारात्मक रूप से जीवन व्यतीत करते हैं और जिनकी अशुद्ध होती है वह नकारात्मक रूप से काम करते हुए दूसरों को कष्ट देते हैं। बुद्धि की शुद्धता के लिये समय मिलने पर अध्यात्मिक साधना करना चाहिये। सत्संग, भक्ति और साधना के अलावा अन्य कोई मार्ग बुद्धि शुद्ध करने का नहीं है।

एक मोती तो वह है जो समुद्र से प्राप्त होते हैं। वह निर्जीव मोती केवल दिखने में ही आकर्षित होते हैं। एक शब्द भी मोती की तरह होते हैं जो सभी ओर व्याप्त हैं। यह शब्द ज्ञान मोती अध्यात्मिक ज्ञान के समुद्र में गोता लगाकर ही प्राप्त किये जा सकते हैं। इनका प्रभाव दीर्घकाल तक रहता है। यह शब्द ज्ञान मोती जिसने चुन लिये वही श्रेष्ठ इंसान कहलाता है। समुद्र से प्राप्त मोतियों की माला धारण करने से आदमी की बाह्य शोभा बढ़ती है पर शब्द ज्ञान मोती से उसमें अंदर भी चमक भी आ जाती है।
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Wednesday, July 8, 2009

चाणक्य नीति-पुत्र और शिष्य को डांटना भी चाहिये (chankya niti)

लालनाद् बहवो दोषस्ताहृनादफ बहवो गुणाः।
तस्मापुत्रं च शिष्यं च ताडयेन्न लालयेत्।।
हिंदी में भावार्थ-
नीति विशारद चाणक्य कहते हैं अधिक प्यार करने से पुत्र और शिष्य में अनेक दोष आ जाते हैं जबकि उनको ताड़ना देने से विकास होता है। अतः पुत्र शिष्य को डांटते रहना चाहिये।
माता शत्रुः पिता वैसे येन बालो न पाछितः।
न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा।।
हिंदी में भावार्थ-
ऐसे माता पिता अपनी संतान के लिये शत्रु समान है जो उसे शिक्षित नहीं करते। अशिक्षित व्यक्ति का बुद्धिमानों की सभा में भारी अपमान होता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-आजकल बच्चों को शिक्षा दिलाना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि उनके समक्ष अपने नैतिक आचरण और व्यवहार का प्रमाण भी प्रस्तंुत करना चाहिये। बच्चों का प्यार करना चाहिये पर इस वजह से उनके मन में उद्दंडता की प्रवृत्ति न आये इस पर ध्यान करना जरूरी है। इसलिये उनके द्वारा गलती किये जाने पर उनको डांटने के साथ समझाना चाहिये। इसके अलावा शैक्षणिक जीवन के दौरान ही उनमें यह प्रवृत्ति भी भरना चाहिये कि जिससे वह घर और बाहर की जिम्मेदारी उठा सकें। पढ़ने के अलावा उनके अंदर परिश्रम करने का भाव भरना चाहिये। अगर सारी सुविधायें शिक्षा के दौरान दी जायेंगी और परिश्रम से परे रखा जायेगा तो फिर बाद में उसे परेशानी आ सकती है।
यह भाव मन में नहीं लाना चाहिये कि अभी तो बच्चा पढ़ रहा है बाद में समझ जायेगा बल्कि उसके हृदय में जीवन के ं नैतिक और अध्यात्मिक भाव की भी स्थापना करने का प्रयास करना चाहिये।
आपने देखा होगा कि अधिकतर बड़े बूढ़े यह शिकायत करते हैं कि उन्होंने अपने लड़के को खूब पढ़ाया पर अब वह उनको पूछ नहीं रहा। अगर आप उन्हें यह बतायें कि यह संस्कार ही आपने उसके मन में नहीं भरे तो आप फिर यह आशा क्यों कर रहे हैं तो वह उत्तर नहीं दे पायेंगे। एक तो वह लोग होते हैं जो आम पाने की चाह में बबूल का पेड़ बोते हैं। हम ऐसे लोगों को मूर्ख कहते हैं पर उन लोगों के बारे में क्या कहा जाये जो पेड़ ही नहीं बोते पर फल की आकांक्षा करने लगते हैं।
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Tuesday, July 7, 2009

मनु स्मृति-पवित्र स्थान पर ही गुरू और शिष्य विद्याध्यन करें (manu smruti)

पशुमण्डुकमर्जारश्वसर्पनकुलाखुभिः।
अंतरागमने विद्यादनाध्यायमहर्निशमम्।।
हिंदी में भावार्थ-
चूहा, बिल्ली,श्वान,गाय,मेढक,नेवला और सांप अगर गुरु और शिष्य के बीच उस समय निकल जायें जब विद्याध्ययन चल रहा हो तो उसे उस दिन बंद कर देना चाहिये।
द्वावेव वर्णयेन्नित्यमनध्यायो प्रयत्नतः।
स्वाध्यायभूमिंचाशुद्धामात्मानं चाशुचिंतद्विजः।।
हिंदी में भावार्थ-
जो स्थान पवित्र और शुद्ध नहीं है वहां अध्ययन नहीं करना चाहिये। उसी तरह स्वयं शुद्ध हुए बिना भी व्यक्ति को अध्ययन नहंी करना चाहिये। शुद्ध और पवित्र स्थान पर स्वयं शुद्ध भाव से संपन्न व्यक्ति ही विद्या सही तरह से प्राप्त कर सकता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हमारे देश में विद्यालयों की जो दशा है उसे सभी जानते है। देश में बहुत कम विद्यालय ऐसे होंगे जो अपने यहां साफ सफाई का का ध्यान रखते होंगे। सरकारी क्षेत्र के हों या निजी क्षेत्र के विद्यालय उनके साफ सफाई का ख्याल बहुत ही कम रखा जाता है। आज की वर्तमान पीढ़ी पर उसकी शिक्षा को लेकर तमाम तरह के कटाक्ष किये जाते हैं पर इस बात पर कितने लोग ध्यान दे रहे हैं कि उनको शिक्षा दिये जाने वाले स्थान कितने साफ सुथरे हैं। गांवों मेें चले जाईये तो विद्यालयों के नाम बड़े आकर्षक होते हैं पर उनके जर्जर भवनों की हालत और वहां व्याप्त गंदगी को देखें तो अपनी व्यवस्था को कोसना पड़ता है पर उसकी जिम्मेदारी लेने वाले लोग भी हमारे बीच में से ही होते है। वह नन्हें नन्हें मासूम बालक बालिकायें शिक्षा प्राप्त करते हैं पर पास ही व्याप्त गंदगी का उन पर क्या मानसिक दुष्प्रभाव पड़ता है इस पर कोई विचार नहीं करता।
निजी क्षेत्र के विद्यालय भी कम अव्यवस्था वाले नहीं है। उनके विद्यालयों के नाम भले ही आकर्षक हों पर उनका लक्ष्य केवल पैसा कमाना होता है। यह मानसिक अपवित्रता किस तरह बालक बालिकाओं को शिक्षित कर पायेगी यह भी विचार का विषय है? वह किताबों का अध्ययन कर अक्षरज्ञान तो प्राप्त कर लेते हैं पर नैतिक ज्ञान-जो कि पढ़ाने से अधिक शिक्षकों तथा प्रबंधकों के आचरण से आता है-उनमें नहीं स्थापित हो पाता। यही बालक-बालिकायें जब समाज और राष्ट्र के उच्च पद पर पहुंचते हैं तो फिर उनका लक्ष्य भी केवल धनार्जन करना ही रह जाता है।
अगर देश के विद्यालयों और महाविद्यालयों में ही पवित्रता और साफ सफाई की व्यवस्था रखी जाये तो शायद अपने देश को उस नैतिक संकट से मुक्त किया जा सकता है जिसके लिये विश्व भर में बदनामी हो रही है। देशभक्ति और समाज सेवा के गीत सुनाने से व्यक्ति कर्तव्यनिष्ठ नहीं हो जाता बल्कि बचपन से उसे अपने आचरण और व्यवहार से सिखाना पड़ता है। यह नैतिक दायित्व माता पिता के साथ ही गुरुजन और शिक्षा प्रबंधकों का है जिसे पूरा करना आवश्यक है।
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Saturday, July 4, 2009

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-कुलीन लोग अपने से कमजोर को नहीं सताते (kautilya ka arthshastra)

कोहि नाम कुले जातः सुखलेखेन लोभितः।
अल्पसाराणि भूतानि पीडयेदविचारयन्।।
हिंदी में भावार्थ-
अपने थोड़े से सुख के लिये कोई अपने से कमजोर व्यक्ति को पीड़ित करे वह कुलीन परिवार का नहीं हो सकता। ऐसा अपराध करने वाला निश्चित रूप से अधम होता है।
महावाताहृतभ्त्रान्ति मेधमालातिपेलवैः।
कथं नाम महत्मानो हियन्ते विषयारिभिः।।
हिंदी में भावार्थ-
जब जलराशि से भरे बादल तीव्रगामी वायु के प्रभाव से इधर उधर डोलने लग जाते हैं तब विषय रूपी शत्रुओं से साधु या महात्मा विचलित हुए बिना कैसे रह सकते है? विषयों का प्रभाव कभी न कभी उन पर पड़ता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अपने धन, पद और बाहुबल का अभिमान पालते हुए अपने से कमजोर व्यक्ति को सताना अपराध है। ऐसे लोग नीच ही कहे जा सकते हैं। यह संदेश आज के संदर्भ में बहुत प्रासंगिक हो गया है। जिस तरह कथित रूप से कुलीन-धनाढ्य, उच्च पदस्थ तथा बाहुबली-परिवारों के लोगों में अपनी शक्ति की अनुभूति दूसरे लोगों को कराने की प्रवृत्ति बढ़ रही है उससे सभी समाजों में भारी तनाव व्याप्त है। पहले कुलीन परिवारों के युवक युवतियां अपने से कमजोर परिवारों के सदस्यों से सदाशयता का व्यवहार करते हुए अपना बड़प्पन दिखाते थे पर अब यह काम दादागिरी से किया जाने लगा है। ‘हम बड़े हैं इसलिये दूसरे की सहायता करेंगे’ की प्रवृत्ति की बजाय ‘हम बड़े हैं इसलिये किसी को भी हानि पहुंचाये पर हमारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता‘ इस प्रमाण के लिये अपराध किया जाते हैं। इसी कारण समाज में वैमनस्य बढ़ रहा है।

भगवानी श्रीकृष्ण ने श्रीगीता में एक तरह से सांख्यभाव को खारिज किया है। उनका कहना है कि आदमी अपनी दैहिक बाध्यताओं और इंद्रियों के वश में होने के कारण सांसरिक कार्य के लिये अवश्य प्रवृत्त होता है। इसलिये साधु सन्यासियों से यह अपेक्षा करना ही व्यर्थ है कि वह हमेशा विषयों से परे रह पायेंगे। इस संसार में विषय हर आदमी को आकर्षित करते हैं और अपनी दैहिक एवं सांसरिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये विषयों में वह कभी न कभी लिप्त होता है। मुख्य बात यह नहीं है कि कोई साधु या संत विषयों में लिप्त है बल्कि यह देखना चाहिये कि उसका आचरण कैसा है?
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Thursday, July 2, 2009

संत कबीर वाणी-परनिंदा और आत्मप्रवंचना का त्याग करें

दोष पराया देखि करि, चले हसन्त हसन्त।
अपना याद आवई, जाका आदि न अन्त।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि दूसरों के दोष देखकर सभी हंसते हैं पर उनको अपनी देह के स्थाई दोष न तो याद आते हैं न दिखाई देते हैं जिनका कभी अंत ही नहीं है।
आपन को न सराहिये, पर निन्दिये न नहिं कोय।
चढ़ना लम्बा धौहरा, ना जानै क्या होय।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपने मूंह से कभी आत्मप्रवंचना और दूसरे की निंदा न करें। क्योंकि कभी आचरण की ऊंचाई पर हमारे व्यकितत्व और कृतित्व को नापा गया तो तो पता नहीं क्या होगा?
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अपने मूंह से आत्मप्रवंचना और दूसरे की निंदा करना मानवीय स्वभाव है। अपने में कोई गुण न हो पर उसे प्रचारित करना और दूसरे के गुण की जगह उसके दुर्गुण की चर्चा करने में सभी को आनंद आता है पर किसी को अपने दोष नहीं दिखते। जितनी संख्या में लोग परमार्थ करने वाले नहीं है उससे अधिक तो उसका दावा करने वाले मिल जायेंगे। हम अपनी देह में अपने उपरी अंग ही देखते हैं पर नीचे के अंग नहीं दिखाई देते जो गंदगी से भरे रहते हैं चाणक्य महाराज के अनुसार उनको कभी पूरी तरह साफ भी नहीं रखा जा सकता। तात्पर्य यह है कि हम अपने दैहिक और मानसिक दुर्गंण भूल जाते हैं। संत कबीरदास जी कहते हैं कि अपने बारे में अधिक दावे मत करो अगर किसी ने उनका प्रमाण ढूंढना चाहा तो पूरी पोल खुल जायेगी।
उसी तरह दूसरे की निंदा करने की बजाय अपने गुणों की सहायता से भले काम करने का प्रयास करें यही अच्छा रहेगा। आत्मप्रवंचना कभी विकास नहीं करती और परनिंदा कभी पुरस्कार नहीं दिलाती। यह हमेशा याद रखना चाहिये।
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Tuesday, June 30, 2009

चाणक्य नीति-तत्वज्ञानी के लिये देव हर जगह व्याप्त

अग्निर्देवो द्विजातीनां मुनीनां हृदि दैवतम्।
प्रतिभा स्वल्पबुद्धीनां सर्वत्र समदर्शिनाम्
हिंदी में भावार्थ
-द्विजातियां अपना देव अग्नि, मुनियों का देव उनके हृदय और अल्प बुद्धिमानों के लिये देव मूर्ति में होता है किन्तु जो समदर्शी तत्वज्ञानी हैं उनका देव हर स्थान में व्याप्त है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-सकाम भक्ति करने वाले हवन, यज्ञ तथा भोजन दान करते हैं। उनके लिये देवता अग्नि है। जो सात्विक भक्ति करता हैं उनके लिये सभी के दिल में भगवान है। जो लोग एकदम अज्ञानी है वह केवल मूर्तियों में ही भगवान मानकर उनकी पूजा करते है। उनको किसी अन्य प्रकार के काम से कोई मतलब नही होता-न वह किसी का परोपकार करते हैं न ही सत्संग के माध्यम से ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा उनके मन में आती है। सच्चा ज्ञानी और योगी वही है जो हर जगह उस ईश्वर का वास देखता है।
इस विश्व में अज्ञानी और स्वार्थी लोगों की भरमार है। लोगों ने धर्म से ही भाषा, ज्ञान, विचार, और व्यापार को जोड़ दिया है। आपने देखा होगा कि कुछ लोग धर्म परिवर्तन करते हैं तो अपना नाम भी बदल देते हैं। वह लोग अपने इष्ट के स्वरूप में बदलाव कर उसे पूजने लगते हैं। कहने को भले ही उनका धर्म निरंकार का उपासक हो पर कर्म के आधार पर मूर्तिमान को भजते दिखते हैं-उनका देव भले ही निरंकार हो पर धर्म एक तरह से मूर्तिमान होता है। कहने को सभी धर्माचार्य यही कहते हैं कि इस विश्व में एक ही परमात्मा है पर इसके पीछे उनकी चालाकी यह होती है कि वह केवल अपने वाले ही स्वरूप को इकलौता सत्य बताते हुए प्रचार करते हैं-कभी किसी दूसरे धर्म के स्वरूप पर बोलते कोई धर्माचार्य दिखाई नहीं देता। अलबत्ता भारत धर्मों से जुड़े के कुछ तत्वज्ञानी संत कभी अपने अंदर ऐसे पूर्वाग्रह के साथ सत्संग नहीं करते। वैसे भी भारतीय धर्म की यह खूबी है कि वह इस संसार में व्यापक दृष्टिकोण रखते हैं और केवल मनुष्य की बजाय सभी जीवों-यथा पशु पक्षी, जलचर, नभचर और थलचर-के कल्याण जोर दिया जाता है।
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Sunday, June 28, 2009

भर्तृहरि नीति शतक-तन पर पहना कपड़ा फटा हैं या सुंदर क्या फर्क पड़ता है

भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि
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जीर्णाः कन्था ततः किं सितमलपटं पट्टसूत्रं ततः किं
एका भार्या ततः किं हयकरिसुगणैरावृतो वा ततः किं
भक्तं भुक्तं ततः किं कदशनमथवा वासरान्ते ततः किं
व्यक्तज्योतिर्नवांतर्मथितभवभयं वैभवं वा ततः किम्

हिंदी में भावार्थ-तन पर फटा कपड़ा पहना या चमकदार इससे कोई अंतर नहीं पड़ता। घर में एक पत्नी हो या अनेक, हाथी घोड़े हों या न हों, भोजन रूखा-सूखा मिले या पकवान खायें-इन बातों से कोई अंतर नहीं पड़ता। सबसे बड़ा है ब्रह्मज्ञान जो मोक्ष दिलाता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव ने हमारे देश में भौतिकवाद को प्रोत्साहन दिया है और अब तो पढ़े लिखे हों या नहीं सभी सुख सुविधाओं को जाल में फंसते जा रहे हैं। भारतीय अध्यात्म ज्ञान के बारे में जानते सभी हैं पर उसे धारण करना लोगों को अब पिछड़ापन दिखाई देता है। नतीजा यह है कि समाज में आपसी रिश्ते एक औपचारिकता बनकर रहे गये हैं। अमीर गरीब की के बीच में अगर भौतिक रूप से दूरी होती तो कोई बात नहीं पर यहां तो मानसिक रूप से सभी एक दूसरे से परे हो जा रहे हैं। जिसके पास सुख साधन हैं वह अहंकार में झूलकर गरीब रिश्तेदार को हेय दृष्टि से देखता है तो फिर गरीब भी अब किसी अमीर पर संकट देखकर उसके प्रति सहानुभूति नहीं दिखाता। हम जिस कथित संस्कृति और संस्कार की दुहाई देते नहीं अघाते वह केवल नारे बनकर रहे गये हैं और धरातल पर उनका अस्तित्व नहीं रह गया है।

जिसके पास धन है वह इस बात से संतुष्ट नहीं होता कि लोग उसका सम्मान इसकी वजह से करते हैं बल्कि वह उसका समाज में प्रदर्शन करता है। धनी लोग अपने इसी प्रदर्शन से समाज में जिस वैमनस्य की धारा प्रवाहित करते हैं उसके परिणाम स्वरूप सभी समाज और समूह नाम भर के रहे गये हैं और उसके सदस्यों की एकता केवल दिखावा बनकर रह गयी है।

जिस तत्वज्ञान की वजह से हमें विश्व में अध्यात्म गुरु माना जाता है उसे स्वयं ही विस्मृत कर हम भारी भूल कर रहे हैं। शरीर पर कपड़े कितने चमकदार हों पर अगर हमारी वाणी में ओज और चेहरे पर तेज नहीं हो तो उसका कोई प्रभाव नहीं होता। काम चलने को तो दो रोटी से भी चल जाये पर जीभ का स्वाद ऐसा है कि अभक्ष्य और अपच भोजन को ग्रहण कर अपने शरीर में बीमारियों को आमंत्रित करना होता है। सोचने वाली बात यह है कि अपना पेट तो पशु भी भर लेते हैं फिर अगर हम ऐसा करते हैं तो कौनासा तीर मार लेते हैं। मनुष्य जीवन में भक्ति और ज्ञान प्राप्त करने की सुविधा मिलती है पर उसका उपयोग नहीं कर हम उसे ऐसे ही नष्ट कर डालते हैं। ऐसे में वह ज्ञानी धन्य है जो दाल रोटी खाकर पेट भरते हुए भगवान भजन और ज्ञान प्राप्त करने के लिये समय निकालते हैं।
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Saturday, June 27, 2009

मनुस्मृति-शरीर को पवित्र एवं शुद्ध रखने के प्रयास जरूरी

वसाशुक्रमसृंमज्जामूत्रविंघ्राणकर्णविट्।
श्नेष्माश्रुदूषिकास्वेदा द्वादशैते नृणां मलाः।।
हिंदी में भावार्थ-
मनुष्य की देह में बारह प्रकार का मल होता है-1.चर्बी, 2.वीर्य, 3.रक्त, 4.मज्जा, 5.मूत्र, 6.विष्ठा, 7.आंखों का कीचड़, 8.नाक की गंदगी, 9.कान का मैल, 10. आंसू, 11.कफ तथा 12. त्वचा से निकलने वाला पसीना।
कृत्वा मूत्रं पूरीषं वा खन्याचान्त उपस्मृशेत्।
वेदमश्येघ्यमाणश्च अन्नमश्नंश्च सर्वदा।।
हिंदी में भावार्थ-
मल मूत्र त्याग करने के बाद हमेशा हाथ धोकर आचमन करना के साथ ही दो बार मूंह भी धोना चाहिये। सदैव वेद पढ़ने तथा भोजन करने से पहले भी आचमन करना चाहिये।
एका लिंगे गुदे त्रिस्त्रस्तथैकत्र करे दश।
उभयोः सप्त दातव्याः मृदः शुद्धिमभीप्सता।।
हिंदी में भावार्थ-
जो लोग पूर्ण रूप से देह की शुद्धता चाहते हैं उनके लघुशंका पर लिंग पर एक बार मल त्याग करने पर गुदा पर तीन बार तथा बायें हाथ पर दस बार एवं दोनों हाथों की हथेलियों और उसके पृष्ठ भाग पर सात बार मिट्टी (वर्तमान में साबुन भी कह सकते हैं) लगाकर जल से धोना चाहिये।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-दरअसल जब शरीर की पवित्रता और अपवित्रता की बात कही जाती है तो आधुनिक ढंग से सोचने वाले उसे एक तरह से अंध विश्वास मानते हैं जबकि पश्चिम के वैज्ञानिक भी अब मानने लगे हैं कि शरीर को साफ रखने से उसे अस्वस्थ करने वाले अनेक प्रकार के सूक्ष्म कीटाणु दूर हो जाते हैं। जल न केवल जीवन है बल्कि औषधि भी है। यही बात वायु के संबंध में कही जाती है। प्रातः प्राणायम करने से आक्सीजन अधिक मात्रा में शरीर को प्राप्त होता है जिससे कि अनेक रोग स्वतः ही परे रहते हैं। वैसे अगर हम विचार करें तो देह अस्वस्थ हो और इलाज के लिये चिकित्सकों के घर जाकर नंबर लगायें उससे अच्छा तो यह है कि जल और वायु से अपने शरीर को स्वस्थ रखें।
भारतीय अध्यात्म के आलोचक आधुनिक विज्ञान की चकाचैंध में इस बात को भूल जाते हैं कि बीमारी के इलाज से अच्छा तो स्वस्थ रहने के लिये प्रयास करने की बात तो पश्चिमी वैज्ञानिक भी मानते हैं।
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Thursday, June 25, 2009

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-भोगी मित्र हितैषी होने पर भी दुःखदायी

अमित्राण्यपि कुर्वीत मित्रण्युपचयावहान्।
अहिते वत्र्त मानानि मित्राण्यपि परित्यजेत्।।
हिंदी में भावार्थ-
यदि अपना हित करने वाला शत्रु भी हो तो भी उसे मित्र बनाना चाहिये। यदि मित्र अहित करने वाला हो तो उसका त्याग करना ही अच्छा है।
भोगप्राप्तं विकुर्वाणं मित्रमप्युपपीडयेत्।
अत्यंतं विकृतं हन्यात्स पापीया् रिपुर्मतः।।
हिंदी में भावार्थ-
जो मित्र भोगों में लिप्त होते हुए भी उपकार करने वाला है तो भी वह पीड़ा देता है। अगर वह अपकार करने वाला है तो उसे अपना शत्रु ही समझते हुए उसे दंडित करें या उसका साथ ही छोड़ दें।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मित्र बनाने में हमेशा सतर्कता बरतना चाहिए। आधुनिक समय में युवक युवतियों को अपना मित्र बनाते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उनका मित्र हमेशा हित की सोचने वाला हो। युवक युवतियों छोटी छोटी बातों पर नाराज और प्रसन्न होते हैं, पर उन्हें यह ध्यान रखना चाहिए कि इससे जीवन में अधिक आनंद नहीं आता। आजकल विलासिता के सामान बहुत सस्ते आते हैं अतः वह तोहफे में देने वालों को अपना सच्चा मित्र नहीं मान लेना चाहिए। साथ ही यह भी देखना चाहिए कि मित्र का आचरण, चरित्र और विचार कैसे हैं? कुछ मित्र सामने बहुत मीठा बोलते हैं पर पीठ पीछे दूसरों के सामने निंदा करते हैं या मजाक बनाते हैं। खासतौर से युवतियों को अपने युवक मित्रों से अधिक सतर्क रहना चाहिये। कहने को तो कहा जाता है कि आजकल आधुनिक समय है पर कुछ यथार्थ विचार बदल नहीं सकते। कहा जाता है कि युवक की इज्जत को पीतल के लोटे की तरह होती है जो खराब होने पर फिर मिट्टी से भी साफ हो जाता है पर युवती की इज्जत तो मिट्टी के बर्तन की तरह है एक बार बिगड़ी तो फिर उसकी भरपाई नहीं होती। ऐसे मित्र जिनका आचरण, चरित्र और विचार संदिग्ध हों उनसे युवक युवतियों को बचना चाहिये।
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Wednesday, June 24, 2009

श्री गुरु ग्रंथ साहिब-अहंकार से व्रत, दान और तीर्थ का फल नष्ट होता है

‘तीरथ व्रत अरु दान करु महि धरहि गुमान।
नानक निहफल जात तिह जिउ कुंचर इस्नान।’
हिंदी में भावार्थ-
गुरु ग्रंथ साहब के अनुसार तीर्थ, व्रत और दान अगर मन में भी अहंकार आया तो वह निष्फल हो जाता है जिस प्रकार हाथी नहाने के बाद शरीर पर धूल डालकर स्वयं गंदा कर देता है।
‘गुरु जिना का अंधुला सिख भी अंधे करम करेनि।’
हिंदी में भावार्थ-
गुरु ग्रंथ साहिब की वाणी के अनुसार जिनके गुरु अज्ञानी होंगे उनके शिष्य भी वैसे ही अंधकर्म उनसे सीखेंगे।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-श्री गुरुनानक देव जी ने जीवन भर भारतीय धर्म में व्याप्त अंधविश्वास तथा कुरीतियों का विरोध किया। भारतीय धर्म में दान, व्रत और तीर्थ की बहुत महिमा है। अपनी नियमित दिनचर्या से हटकर कुछ अन्य करने से व्यक्ति का मानसिक संताप कम होता है और इसलिये दान, व्रत और तीर्थ जैसे तरीके बनाये गये। लोग यह सब इस विचार से नहीं करते कि इससे उनकी देह और मन में शुद्धता आयेगी बल्कि वह यह सोचते हैं कि हमने अगर तीर्थ किया तो ईश्वर, दान किया तो ग्रहणकर्ता और व्रत किया तो अन्न पदार्थों पर अहसान किया। यह अहंकार करने से हमारी सारी अध्यात्मिक और धार्मिक गतिविधियां निष्फल हो जाती हैं। इसका कारण यह है कि इस देह से चाहे कोई भी अच्छा काम किया जाये पर उसके लिये हमारे मन में भी शुद्धता का भाव होना चाहिये तभी किसी भी अच्छे काम का परिणाम पूर्ण रूप से ग्रहण कर सकते हैं। जहां मन में अहंकार आया वहीं सब किया धरा रह जाता है। देह के साथ मन में भी पवित्रता को होना बहुत आवश्यक है।
कोई व्यक्ति कैसा है यह उसके गुरु को देखकर पता किया जा सकता है। उसी तरह कौन गुरु कैसा है उसके शिष्यों के व्यवहार से पता लगता है। श्रीगुरुनानक साहब जी धर्म के नाम पर पाखंड के बहुत विरोधी थे। अपने समकालीनों में वह इसी कारण लोकप्रिय भी हुए क्योकि समाज कथित ढोंगियों से तंग हो गया था। देखा जाये तो स्थितियां आज पहले से बदतर हैं। धार्मिक गुरु संख्या में बहुत हैं पर फिर देश में अधर्म का बोलबाला है। इससे यह तो जाहिर होता है कि देश में धर्म के नाम पर उपदेश वाले संतों की वाणी भले ही ओजपूर्ण हो पर प्रभावी नहीं है। एक कान में शोर के साथ घुसती है तो दूसरे से शांतिपूर्वक निकल जाती है। अतः हमेशा ही न स्वयं अच्छे और निष्कामी संतों की शरण लेकर उनको गुरु बनाना चाहिये बल्कि अपने बच्चों का भी इस संबंध में मार्ग दर्शन करना चाहिये।
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Tuesday, June 23, 2009

मनुस्मृति-व्यवहार में वस्तुओं का लेनदेन करना पड़ता है

आदानमप्रियकरं दानं च प्रियकारकम्।
अभीपिस्तानामर्थानां काले युक्तं प्रशस्यते।।
हिंदी में भावार्थ-
जब हमारी प्रिय वस्तुओं को कोई लेता है तब बहुत बुरा पर कोई दूसरा अपनी प्रिय वस्तु हमको देता है तो बहुत अच्छा लगता है। विशेष अवसरों पर इस प्रिय और अप्रिय लेनदेन का विचार छोड़कर व्यवहार करना ही पड़ता है।
हिरण्यभूम्रिसम्प्राप्त्या पार्थिवो न तथैश्वते।
यथा मित्र ध्रुवं लब्धवा कृशमप्यायाति क्षयम्।।
हिंदी में भावार्थ-
कोई भी आदमी किसी दूसरे से सोना या जमीन लेकर शक्तिशाली नहीं बन सकता जितना कि योग्य मित्र की संगत में होता है। मित्रता दुर्बल को भी शक्तिशाली बना देती है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हमारे पास ऐसी कुछ वस्तुऐं होती है जिनकी उपयोगिता के कारण हम उनसे बहुत प्यार करते हैं। वह पेन, किताब, गाड़ी या कोई अन्य वस्तु हो सकती है। अनेक ऐसी चीजें हैं जो समय पर पड़ने पर किसी अन्य द्वारा मांगे जाने पर बहुत बुरा लगता है हालांकि अपनी इच्छा के विरुद्ध उसे देते हैं पर दुःख होता है। इसके विपरीत जब कोई अन्य व्यक्ति अपनी प्रिय वस्तु हमारे मांगने पर देता है तब उसकी सदाशयता देखकर बहुत प्रसन्नता होती है। यह जीवन बहुत बड़ा है और यहां कोई चीज स्थिर नहीं है अतः भौतिक वस्तुओं के प्रति अधिक स्नेह न पालते हुए समय के अनुसार लेनदेन करने में संकोच नहीं करना चाहिये।

किसी से कोई वस्तु, सोना और जमीन उपहार में प्राप्त कर लेने से कोई ताकतवर नहीं हो जाता। उल्टे अधिक वस्तुओं के संग्रह से जहां घर में कबाड़ बढ़ता है वहीं सोने और जमीन की अधिक उपलब्धता से ठग और डकैतों की नजर आदमी पर पड़ी रहती है। लुटने या ठगने भय आदमी को मानसिक रूप कमजोर बना देता है। वह संकीर्ण दायरे में रहता है और समाज से उसका संपर्क कट जाता है।
जिस व्यक्ति का व्यवहार अच्छा है उसके मित्र अधिक होते हैं। यही मित्रता और व्यवहार आदमी को शक्तिशाली बनातर हैं। इसलिये भौतिक वस्तुओं, कीमती धातुओं और जमीन की बजाय समाज में अपने व्यवहार और मित्रता से सहृदय लोगों का संग्रह करना ही ठीक है क्योंकि उससे अपनी शक्ति और सम्मान बढ़ता है।
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Monday, June 22, 2009

भर्तृहरि शतक-ज्ञानी लोग विषयों से विचलित नहीं होते (bhartrihari niti shatak-gyani aur vishay)

सुधाशुभ्रं धाम स्फुरदमलरश्मिः शशधरः प्रियाववत्राभोजं मलयजरजश्चातिसुरभिः।
स्रजो हृद्यामोदास्तदिदमखिलं रागिणी जने करोतयन्तः क्षोभं न तु विषयसंसर्गविमुखे।।
हिंदी में भावार्थ-
सफेद रंग से पुता चमकता भवन, चंद्रमा की शीतल रौशनी, अपनी प्राणप्रिया का मुख कमल, चंदन की सुगंध, फूलों की माला जैसे विषय अनुरागियों के मन को तड़पाते हुए विचलित कर देते हैं लेकिन जिन्होंने अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त कर लिया है वह इनसे प्रभावित नहीं होते।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-जीवन में राग अनुराग के प्रति लगाव स्वाभाविक रूप से रहता है। मगर यही राग अनुराग कष्ट का कारण भी बनते हैं। एक अच्छा और बड़ा मकान रहने के लिये होना चाहिये। जिनके पास नहीं है वह ख्वाब देखते हैं पर जिनके पास महल जैसा आवास है वह भी खुश नहीं है। इतने बड़े मकान का रखरखाव नियमित रूप करना भी उनके लिये कष्टप्रद है। बड़े शहरों मे चले जाईये तो कई नई कालौनियां देखकर लगता है कि जैसे यहां स्वर्ग है। कुछ वर्ष बाद जाईये तो वही पुरानी लगती हैं। लोगों के पास धन है पर समय नहीं कि अपने मकानों की हर वर्ष पुताई करा सकें। हालांकि कहने के लिये ऐसे रंग आ गये हैं जो कई वर्ष तक चलें पर बरसात और धूप के सामने भला कौनसा रसायन टिक सकता है।

आदमी का मन है जो कभी न कभी ऊबता है और वह विश्राम चाहता है। देह को तो आराम मिल जाता है पर मन को नहीं। भौतिक जीवन की सत्यता को समझना ही अध्यात्म ज्ञान है और जो इसे जानता है वही सुख दुःख से परे होकर जीवन में आनंद उठा सकता है। कहते भी है कि इस समय विश्व में लोगों के दिमाग में तनाव बढ़ रहा है। आखिर यह सोचने का विषय है कि जब इतनी सारी सुविधायें हैं तो फिर इंसान विचलित क्यों हो जाता है? यह सब अध्यात्म ज्ञान की कमी की वजह से है।
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Sunday, June 21, 2009

संत कबीर वाणी-कवि बहुत हैं भक्त कम

ज्ञानी ज्ञाता बहु मिले, पण्डित कवी अनेक।
राम रता इंन्द्री जिता, कोटी मध्ये एक।।
संत कबीरदास जी कहते हैं कि ज्ञान, ज्ञाता, विद्वान और कवि तो बहुत सारे मिले पर भगवान श्रीराम के भजन में रत तथा इंद्रियां जीतने वाला तो कोई करोड़ो में कोई एक होता है।
पढ़ते-पढ़ते जनम गया, आसा लागी हेत।
बोया बीजहि कुमति ने, गया जू निर्मल खेत।।

संत कबीरदास जी कहते हैं कि पढ़ते और गुनते पूरा जन्म गुजर गया पर मन की कामनायें और इच्छायें पीछा करती रही। कुमति का बीज जो दिमाग के खेत में बोया उससे मनुष्य के मन का निर्मल खेत नष्ट हो गया।
वर्तमान संदर्भ में संपाकदीय व्याख्या-आधुनिक शिक्षा ने सांसरिक विषयों में जितना ज्ञान मनुष्य को लगा दिया उतना ही वह अध्यात्मिक ज्ञान से परे हो गया है। वैसे यह तो पुराने समय से चल रहा है पर आज जिस तरह देश में हिंसा और भ्रष्टाचार का बोलबाला है उससे देखकर कोई भी नहीं कह सकता है कि यह देश वही है जैसे विश्व में अध्यात्मिक गुरु कहा जाता है। आतंकवाद केवल विदेश से ही नहीं आ रहा बल्कि उसके लिये खादी पानी देने वाले इसी देश में है। इसी देश के अनेक लोग विदेश की कल्पित विचाराधारा के आधार पर देश में सुखमय समाज बनाने के लिये हिंसक संघर्ष में रत हैं। यह लोग पढ़े लिखे हैं पर अपने देश में वर्ग संघर्ष में समाज का कल्याण देखते हैं। अपने ही अध्यात्मिक शिक्षा को वह निंदनीय और अव्यवहारिक मानते हैं।
जहां हिंसा होगी वहां प्रतिहिंसा भी होगी। जहां आतंक होगा वहां राज्य को भी आक्रमक होकर कार्यवाही करनी पड़ती है। हिंसा से न तो राज्य चलते हैं न समाज सुधरते हैं। इतना ही नहीं इन हिंसक तत्वों ने साहित्य भी ऐसा ही रचा है और उनके लेखक-कवि भी ऐसे हैं जो हिंसा को प्रोत्साहन देते हैं।
सच बात तो यह है कि समाज पर नियंत्रण तभी रह सकता है जब व्यक्ति पर निंयत्रण हो। व्यक्ति पर निंयत्रण राज्य करे इससे अच्छा है कि व्यक्ति आत्मनियंत्रित होकर ही राज्य संचालन में सहायता करे। व्यक्ति को आत्मनिंयत्रण करने की कला भारतीय अध्यात्म ही सिखा सकता है। इसी कारण जिन लोगों के मन में तनाव और परेशानियां हैं वह भारतीय धर्मग्रंथों खासतौर से श्रीगीता का अध्ययन अवश्य करें तभी इस जीवन रहस्य को समझ पायेंगे।
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Friday, June 19, 2009

विदुर नीति-सुपाच्य भोजन करना ही बेहतर

नीति विशारद विदुर महाराज कहते हैं कि
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भक्ष्योत्तमप्रतिच्छन्नं मत्स्यो वङिशमायसम्।
लोभाभिपाती ग्रसते नानुबन्धमवेक्षते।।
यच्छक्यं ग्रसितुं ग्रस्यं ग्रस्तं परिणमेच्च यत्।
हितं च परिणामे यत् तदाद्यं भतिमिच्छता।।
हिंदी में भावार्थ
-मछली कांटे से लगे चारे को लोभ में पकड़ कर अपने अंदर ले जाती है उस समय वह उसके परिणाम पर विचार नहीं करती। उससे प्रेरणा ग्रहण कर उन्नति चाहने वाले पुरुष को ऐसा ही भोजन ग्रहण करना चाहिये जो खाने योग्य होने के साथ पेट में पचने वाला भी हो। जो भोजन पच सकता है वह ग्रहण करना ही उत्तम है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-हमारे देश में फास्ट फूड संस्कृति का प्रचार निरंतर बढ़ता जा रहा हैं। क्या जवान, क्या अधेड़ और बूढ़े और क्या स्त्री और पुरुष, बाजारों में बिकने वाले फास्ट फूड पदार्थों को खाने में आनंद अनुभव करते हैं। यह पश्चिम से आया फैशन है पर वहीं के स्वास्थ्य विशेषज्ञ उसे पेट के लिये खराब और अस्वास्थ्यकर मानते हैं। इसके अलावा मांस खाना भी पश्चिम के ही विशेषज्ञ गलत मानते हैं।
इन्हीं पश्चिमी स्वास्थ्य विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि मांस खाने से मनुष्य में अनावश्यक आक्रामकता आती है और वह जल्दी ही हिंसा पर उतारु हो जाता है। यह जरूरी नहीं है कि भोजन में विष मिला हो तभी वह बुरा प्रभाव डालता है। विष मिले भोजन को पता तो तत्काल चल जाता है क्योंकि उसकी देह पर तत्काल प्रतिक्रिया होती है पर असात्विक और बीमारी वाले भोजन का पता थोड़े समय बाद चलता है। खाने के बाद भोजन पचने से आशय केवल उसका भौतिक रूप नहीं है बल्कि भावनात्मक रूप से पचने से है। अगर मांस वाला भोजन किया तो लगता है कि वह पच गया पर उसके लिये जिस जीव की हत्या हुई उसकी भावनायें भी उसी मांस में मौजूद होती है और सभी जानते है कि भावनाओं का कोई भौतिक स्वरूप नहीं होता जो किसी को दिखाई दे। अतः मांस खाने वाले के पेट में वह कलुषित भावनायें भी चली जाती हैं जो उस समय उस जीव के अंदर मौजूद थी जब उसे काटा गया। यही हाल ऐसे भोजन का भी है जिसके बहुत से पदार्थ अपच्य है पर वह पेट में धीरे धीरे जमा होकर बड़ी बीमारी का स्वरूप लेते हैं। ऐसा अशुद्ध पेय पदार्थों के सेवन पर भी होता है।
श्रीमदभागवत गीता में ‘गुण ही गुणों के बरतते है’ का जो सिद्धांत बताया गया है उसका यह भी तात्पर्य है कि जैसे अन्न और जल का भोजन हम करते हैं वैसा ही उसका प्रभाव हम पर होता है और हम उससे बच नहीं सकते। अतः प्रयास यही करना चाहिये कि सात्विक भोजन करें ताकि हमारे विचार भी पवित्र रहेें जो कि आनंदपूर्ण जीवन के अति आवश्यक हैं।
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