Tuesday, December 9, 2008

भृतहरि शतक:कुपात्र को दान देने से धन नष्ट हो जाता है

दौर्मन्त्र्यान्नृपतिर्विनष्यति यतिः सङगात्सुतालालनात् विप्रोऽन्ध्ययनात्कुलं कुतनयाच्छीलं खलोपासनात्
ह्यीर्मद्यादनवेक्षणादपि कृषिः स्नेहः प्रवासाश्रयान्मैत्री चाप्रणयात्सृद्धिरनयात् त्यागपमादाद्धनम्


हिंदी में भावार्थ-कुमित्रता से राजा, विषयासक्ति और कामना योगी, अधिक स्नेह से पुत्र, स्वाध्याय के अभाव से विद्वान, दुष्टों की संगत से सदाचार, मद्यपान से लज्जा, रक्षा के अभाव से कृषि, परदेस में मित्रता, अनैतिक आचरण से ऐश्वर्य, कुपात्र को दान देने वह प्रमाद से धन नष्ट हो जाता है।
वर्तमान संदर्भ संक्षिप्त व्याख्या-आशय यह है कि जीवन में मनुष्य जब कोई कर्म करता है तो उसका अच्छा और बुरा परिणाम यथानुसार प्राप्त होता है। कोई मनुष्य ऐसा नहीं है जो हमेशा बुरा काम करे या कोई हमेशा अच्छा काम करे। कर्म के अनुसार फल प्राप्त होता है। अच्छे कर्म से अर्थ और सम्मान की प्राप्ति होती है। ऐसे में अपनी उपलब्ध्यिों से जब आदमी में अहंकार या लापरवाही का भाव पैदा होता है तब अपनी छबि गंवाने लगता है। अतः सदैव अपने कर्म संलिप्त रहते हुए अहंकार रहित जीवन बिताना चाहिये।
यह मानकर चलना चहिये कि हमें मान, सम्मान तथा लोगों का विश्वास प्राप्त हो रहा है वह अच्छे कर्मों की देन है और उनमें निरंतरता बनी रहे उसके लिये कार्य करना चाहिये। अगर अपनी उपलब्धियों से बौखला कर जीवन पथ से हट गये तो फिर वह मान सम्मान और लोगों का विश्वास दूर होने लगता है।

निरंतर स्वाध्याय करते रहने के साथ ही प्रात: भगवान् का स्मरण करना चाहिए. यह कभी नहीं सोचना चाहिए के हम बहुत बड़े ज्ञानी हो गए हैं और हमारा कोई अब मुकाबला नहीं कर सकता. क्योंकि यहाँ निरंतर परिवर्तन होते हैं और इसलिए सतत अध्ययन,चिंतन और मनन करते रहना चाहिए. साथ ही भक्ति भी नियमित करते रहना चाहिए.
अक्सर कुछ लोगों में अपनी भक्ति को लेकर भी अंहकार आ जाता है जो कि उनके लिए लाभ दायक नहीं होता। इस कारण वह उसमे लापरवाही करने लगते हैं। सच बात तो यह है कि भक्ति और ज्ञान का आनंद तभी है जब उनको नियमित रूप से किया जाए।
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2 comments:

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

कुमित्रता से राजा, विषयासक्ति और कामना योगी, अधिक स्नेह से पुत्र, स्वाध्याय के अभाव से विद्वान, दुष्टों की संगत से सदाचार, मद्यपान से लज्जा, रक्षा के अभाव से कृषि, परदेस में मित्रता, अनैतिक आचरण से ऐश्वर्य, कुपात्र को दान देने वह प्रमाद से धन नष्ट हो जाता है।
इस सच्ची सीख के लिए धन्यवाद!

रंजना said...

आपको नमन ! बहुत ही सही और सुंदर बात कही आपने.यदि इसे गाँठ में बाँध लिया जाए तो जीवन सफल हो जाए..

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