Friday, April 22, 2011

सांयकाल वंदना अवश्य करना चाहिए-हिन्दू धार्मिक चिंत्तन (sanykal vandna avashya karna chahie-hindu dharmik chittan)

          हमारे अध्यात्मिक दर्शन में बहुत सारी बातें स्वास्थ्य विज्ञान से संबंधित हैं तो हमारे धर्म में मनुष्य के मनोविज्ञान को भी बहुत महत्व दिया गया है। इसे आधुनिक लोग शायद ही समझ पाते हैं। मनुष्य तो अन्य जीवों की तरह पंच तत्वों से बना प्राणी है पर उसके पास बुद्धि की वह शक्ति जिसकी शक्ति पर अपने मन की हर बात पूरी कर सकता है जो अन्य जीवों में नहीं होती। मजे की बात यह है कि यह मन अपनी बात तो पूरी करवा लेता है पर उस बुद्धि की शक्ति के ज्ञान से से परे ही रहता है जो कि मनुष्य की ही शक्ति है। यही कारण है कि मनुष्य सारी सुविधायें होते हुए भी मानसिक तनाव में रहता है।
          हम अपने अंदर मानसिक तनाव का अध्ययन करें तो पायेंगे कि सांसरिक कार्यो में निरंतर सक्रिय रहने से उपजी एकरसता उसका एक कारण होती है। कुछ देर उनसे विरक्ति जीवन को नवीनता प्रदान करती है। यही कारण है कि हमारे यहां परमात्मा की निष्काम भक्ति की बात कही जाती है ताकि कुछ देर अपना मन तथा बुद्धि को सांसरिक कर्म से हटाकल दूसरी राह पर ले जाया जाये। सच बात तो यह है कि महल में सारी सुविधायें रहते हुए भी वह तब जेल लगने लगता है जब वहां से कहीं जाने का अवसर न मिले। यही कारण है कि हमारे यहां प्रातः तथा सांयकाल ईश्वर वंदना के लिये नियत किये गये हैं। प्रातः वंदना से हम पवित्र मन लेकर सांसरिक कार्य के लिये तैयार होते हैं तो सांयकाल प्रतिदिन कर्ममंथन से प्राप्त विषय का विसर्जन करते हैं।
सांयकाल वंदना पर दक्षस्मृति में कहा गया है कि
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संध्याहीनोऽशुचिर्नित्यमनर्हः सर्वकर्मसु।।
यदन्यत् कुरुते कर्म न तस्य फलमश्नुते।।
               ‘‘संध्यावंदन अवश्य करना चाहिए। ऐसा न करने वाला हमेशा ही अपवित्र रहता है और किसी भी कार्य करने का अघिकार नहीं रखता। जो सायंकाल जपादि नहीं करता उसके सारे कर्म निष्फल हो जाते हैं।’’
         सुबह जल्दी नहाने और ईश्वरीय वंदना करने से शरीर और मन में नवीनता की अनुभूति होती है। सुबह गायत्री मंत्र का जाप करना अत्यंत श्रेष्ठ कर्म माना जाता है। शाम को शांति पाठ अवश्य करना चाहिए ताकि दिन भर में अपने जीवन कर्म मंथन से  अशांति रूपी विष एकत्रित किया है उससे मन मुक्त हो सके।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
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Wednesday, April 20, 2011

ज्ञानियों में बैठकर टूट जाता है भ्रम-हिन्दू धार्मिक चिंत्तन (gyan aur bhram-hindu dharmik chittan)

अगर हम शिक्षा या अध्यात्मिक ज्ञान से संबंधित किताबें पढ़कर यह सोचें कि कोई भारी ज्ञानी बन गये हैं तो यह हमारी ही मूर्खता का प्रमाण होता है। उसी तरह जब कोई कथित ज्ञानी इन्हीं किताबों से रटा रटाया ज्ञान हमारे सामने उसे बघारता है तो समझ लेना भी मूर्खता है कि वह कोई भारी ज्ञानी है। इसके अलावा अगर कोई तोता रटंत कथित ज्ञानी के पास ढेर सारे शिष्य हैं तो उसे भी कोई भारी सिद्ध नहीं समझ लेना चाहिए क्योंकि अपने नीरस जीवन से उकताये लोग लोग थोड़ा ज्ञान की बातें सुनकर प्रभावित हो जाते हैं पर आचरण कोई  नहीं  देखता। ज्ञान का प्रमाण तो व्यक्ति का आचरण है। ज्ञानी उसकी अनुभूति दूसरों को कराते हैं कि अपनी प्रशंसा करते हुए सुनाते हुए हैं। कोई भी ज्ञानी यह दावा नहीं कर सकता कि वह सिद्ध है क्योंकि वह जानता है कि ज्ञान की सीमा भी परमात्मा के रूप की तरह अनंत है।
इस विषय पर भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि
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यदा किंचिज्ज्ञोऽहं द्विप मदान्धः समभवम्
तदा सर्वज्ञोऽस्मीत्यभवदवहनश्प्तं मम मनः।
यदाकिंचत्किंचिद् बुधजनसकाशादवगतम्
तदामूर्खोऽस्मीति ज्वर इव मदो मे व्यपगतः।।
‘‘जब मुझे कुछ ज्ञान हुआ तो हाथी की तरह मस्त होकर अपने ज्ञानी होने का अहंकार पालने लगा। मुझे लगा कि मैं ‘सर्वज्ञ’ हूं। लेकिन जब विद्वानों के बीच बैठा तो यथार्थ का ज्ञान हुआ और मेरा मद कम हो गया है। तब लगा कि मैं तो निपट मूर्ख हूं।’
श्रीमद्भागवत गीता में ज्ञान का प्रमाण मनुष्य का ‘स्थिरप्रज्ञ’ होना है। जो माने अपमान से परे हो, समदर्शी हो तथा निष्काम भाव से कार्य करने के साथ निष्प्रयोजन दया करने वाला हो। ऐसे में कोई ज्ञानी है या नहीं या उसके आचरण से तय करना चाहिए। उसी तरह अपने ज्ञानी होने का भ्रम तो कभी पालना ही नहीं चाहिए क्योंकि तब हम कोई नई बात नहीं सीख सकते।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Saturday, April 16, 2011

परिणाम का कर्म से संबंध जानना जरूरी-पतंजलि योग सूत्र (parinam ka karma se sanbandh-patanjali yoga sootra)

क्रमान्यत्वं परिणामन्यत्वे हेतुः।
‘‘किसी कार्य करने के क्रम में भिन्नता से परिणाम भी भिन्न होता है।’’
परिणामन्नयसंयमादतीतानागतज्ञानम्।।
‘‘अतीत, वर्तमान तथा भविष्य का विचार करने से परिणाम का ज्ञान हो जाता है।’’
                   पतंजलि योग में न केवल भौतिक तथा दृश्यव्य संसार को जानने की विधा बताई गयी है बल्कि अभौतिक तथा अदृश्यव्य स्थितियों के आंकलन का भी ज्ञान दिया गया है। हमारे सामने जो भी दृश्य आता है वह तत्काल प्रकट नहीं होता बल्कि वह किसी के कार्य के परिणाम स्वरूप ही ऐसा होता है। कोई व्यक्ति हमारे घर आया तो इसका मतलब वह किसी राह से निकला होगा। वहां भी उसके संपर्क हुए होंगे। वह हमारे घर पर जो व्यवहार करता है वह उसके घर से निकलने से लेकर हमारे यहां पहुंचने तक आये संपर्क तत्वों से प्रभावित होता है। वह धूप में चलकर आया है तो दैहिक थकावट के साथ मानसिक तनाव से ग्रसित होकर व्यवहार करता है। कोई घर से लड़कर आया है तो उसका मन भी वहीं फंसा रह जाता है और भले ही वह उसे प्रकट न करे पर उसकी वाणी तथा व्यवहार अवश्य ही नकारात्मक रूप से परिलक्षित होती है।
               कहने का अभिप्राय यह है कि हम प्रतिदिन जो काम करते हैं या लोगों हमारे लिये काम करते हैं वह कहीं न कहीं अभौतिक तथा अदृश्यव्य क्रियाओं से प्रभावित होती हैं। इसलिये कोई दृश्य सामने आने पर त्वरित प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त करना चाहिए। हमें यह विचार करना चाहिए कि उस दृश्य के पीछे कौन कौन से तत्व हैं। व्यक्ति, वस्तु या स्थितियों से प्रभावित होकर ही कोई धटना हमारे सामने घटित होती है। जब हमें यह ज्ञान हो जायेगा तब हमारे व्यवहार में दृढ़ता आयेगी और हम अनावश्यक परिश्रम से बच सकते हैं। इतना ही नहीं किसी दृश्य के सामने होने पर जब हम उसका अध्ययन करते हैं तो उसके अतीत का स्वरूप भी हमारे अंतर्मन में प्रकट होता है। जब उसका अध्ययन करते हैं तो भविष्य का भी ज्ञान हो जाता है।
               हम अपने साथ रहने वाले अनेक लोगों का व्यवहार देखते हैं पर उसका गहराई से अध्ययन नहीं करते। किसी व्यक्ति के मन में अगर पूर्वकाल में से दोष रहे हैं और वर्तमान में दिख रहे हैं तो मानना चाहिए कि भविष्य में भी उसकी मुक्ति नहीं है। ऐसे में उससे व्यवहार करते समय यह आशा कतई नहीं करना चाहिए कि वह आगे सुधर जायेगा। योग साधना और ध्यान से ऐसी सिद्धियां प्राप्त होती हैं जिनसे व्यक्ति स्वचालित ढंग से परिणाम तथा दृश्यों का अवलोकन करता है। अतः वह ऐसे लोगों से दूर हो जाता है जिनके भविष्य में सुधरने की आशा नहीं होती।

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Sunday, April 10, 2011

नाखून चबाने वाला शीघ्र नष्ट होता है-मनु स्मृति के आधार पर चिंत्तन (thought according munu smriti

             हम अपनी छोटी छोटी आदतों की तरफ ध्यान नहीं देते जबकि वही हमारे लिये जबरदस्त कष्ट का कारण बनती हैं। कुछ लोगों की आदत होती है कि वह अपने नाखून चबाते हैं। वह अपनी इस आदत पर ध्यान नहीं देते जबकि इससे उनको देखने वालों की दृष्टि में छवि खराब होती है। उन लोगों को यह मालुम नहीं कि हमारे नाखूनों में मिट्टी के साथ विषैले कीटाणु भी होते हैं। चबाने से वह मुख से होते हुए पेट में जाकर बीमारी पैदा करते हैं। यह बात आधुनिक विज्ञान अब कह रहा है जबकि हमारं मनु महाराज यह बात बहुत पहले ही कह गये।
मनु महाराज कहते हैं कि
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न विगृह्य कथां कुर्याद् बहिर्माल्य न धारेवेत्।
गवां च यानं पुष्ठेन सर्वथैव विगर्हितम्।।
‘‘उच्छ्रंखलता से वार्तालाप करना, दूसरों को दिखाने के लिये सोने की चैन पहनकर दिखाना और बैल की पीठ पर सवारी करना निंदाजनक कार्य हैं।’’
लोष्ठमर्दी तृपाच्छेदी नखखादी च यो नरः।
स विनाशं व्रजत्याशु सूचकोऽशुचिरेव सः।।
‘‘ऐसा व्यक्ति शीघ्र नाश को प्राप्त होता है, जो मिट्टी के बरतन पर मिट्टी के ढेले को साफ करता है, तिनकों को उखाड़ता है, अपने नाखूनों को चबाता है तथा चुगलखोरी करता है और अस्वच्छ रहता है।’’
              इसी तरह चाहे जब हम दूसरों की निंदा या चुगली करने लगते हैं। झूठे आरोप लगाकर दूसरे को बदनाम करते हैं। ऐसे एक नहीं अनेक कारनामे हैं जो दिखते बहुत छोटे हैं पर उनका दुष्प्रभाव व्यापक होता है।
अतः हमें अपने उठने बैठने, चलने फिरने तथा खाने पीने की आदतों पर ध्यान देना चाहिए। इसके लिये आवश्यक है कि योग तथा ध्यान कर अंतर्मुखी बना जाये। हमेशा बहिर्मुखी रहने से हम आत्ममंथन नहीं कर पाते और छोटी मोटी बुरी आदतों के बुरे प्रभाव का शिकार बने रहते हैं।
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Thursday, April 7, 2011

योग में ‘संयोग’ भी होता है-हिन्दू धार्मिक चिंत्तन (yog aur sanyog-patanjali yoga sahitya)

                          स्वस्वामिशक्त्यो स्वरूपोपलब्धिहेतुः संयोगः।।
                 "जब स्व तथा स्वामी की शक्ति के स्वरूप का ज्ञान प्राप्त हो जाता है तो उसे संयोग कहा जाता है।"
           हमारी सृष्टि के दो रूप हैं एक तो भौतिक प्रकृति दूसरा अभौतिक जीवात्मा। प्रकृति स्वयं एक शक्ति है तो जीवात्मा भी अपना स्वामी स्वयं है। मनुष्य इस प्रथ्वी पर पंच तत्वों से बनी अपनी देह के साथ विचरण करते हुए सांसरिक पदार्थों का उपभोग करता है। यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। जब कोई मनुष्य तत्वज्ञान प्राप्त करता है तब वह दृष्टा की तरह अपना जीवन व्यतीत करता है। अपनी इंद्रियों के साथ कर्म करते हुए वह अपने कर्तापान का अहंकार नहीं पालता।
               यहां अज्ञानवश हर आदमी अपने इर्दगिर्द स्थित भौतिक संसार के स्वामी होने का भ्रम पाल लेता है। वह नहीं जान पाता कि उसकी देह में स्थित मन, बुद्धि और अहंकार ऐसी प्रकृतियां हैं जो उसे दैहिक स्वामित्व का बोध कराकर भ्रमित करते हुए इधर से उधर दौड़ाती हैं। यही कारण है कि भौतिक देह और अभौतिक जीवात्मा का कभी आपस में मेल नहीं  हो पाता। आदमी मन को ही आत्मा समझने लगता है।
           जब योग साधना, ध्यान, स्मरण तथा भक्ति से कोई मनुष्य इस सत्य को जान लेता है तब उसे संयोग कहा जाता है वरना तो सारा  संसार दुर्योग का शिकार होकर जीवन तबाह कर लेता है। दैहिक प्रेम क्षीण हों जाता है तब घृणा या उदासीनता पनपती है। उसी तरह स्वार्थ की मित्रता का क्षरण भी जल्दी होता है। सकाम भक्ति में कामना पूर्ण न होने पर मन संसार से विरक्त होने लगता है मगर जो तत्वज्ञान को जान लेते हैं वह कभी हताश नहीं होता। वह ऐसे संयोग देखकर मन  में  क्षणिक   प्रसन्नता होती  है जो अंततः दुर्योग का कारण बनती है। 
         यह संसार संकल्प  और बने संयोग और दुर्योग का खेल है। मन में जैसा संकल्प होगा वैसी ही हमारी दुनियां होगी।  सीधी मत कहें तो मन का योग ही हमारे सामने दुर्योंग और संयोग बनाता है। हम अपने विचार और आचरण पवित्र रखेंगे तो हमारे संकल्प भी पवित्र होंगे और वैसे ही हमारे सामने दृश्य उपस्थित होंगे और वैस ही लोग हमारे संपर्क में आयेंगे।
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Saturday, April 2, 2011

इस धरती के तीन रत्नों की पहचान करें-हिन्दू धार्मिक लेख (dharti ke teen ratna-hindu dharmik lekh)

आधुनिक प्रचार माध्यमों के विज्ञापनों से पूरा भारतीय समाज दिग्भ्रमित हो रहा है। क्रिकेट खिलाड़ियांे, फिल्म अभिनेता तथा अभिनेत्रियों के अभिनीत विज्ञापन उपभोग की ऐसी खतरनाक प्रवृत्ति को जाग्रत करते हैं कि लोगों की अध्यात्मिक चेतना लुप्त हो गयी है। फिर हमारी शिक्षा व्यवस्था में ऐसी प्रणाली अपनाई गयी है जो केवल गुलाम बनाती है। ऐसे में अगर किसी में रचनात्मक प्रवृत्ति जाग्रत हो जाये तो वह पूर्व जन्म का ही प्रभाव समझे तो अच्छा है वरना तो अब व्यक्ति में चरित्र निर्माण की बजाय उसे प्रयोक्ता और सेवक बनने के लिये प्रेरित किया जा रहा है।
वैसे समाज की हालत तो कोई पहले भी अच्छी नहीं थी। सोना, चांदी, हीरा और रत्नों की चाहत हमारे समाज में हमेशा रही है। शायद यही कारण है कि हमारे मनीषी मनुष्य के अंदर मौजूद उस रत्न का परिचय कराते रहे हैं जिसे आत्मा कहा जाता है। इसके बावजूद लोग भौतिक संसार की चकाचौंध में खो जाते हैं और सोना, चांदी और हीरे की चाहत में ऐसे दौड़ते हैं कि पूरा जीवन ही अध्यात्मिक ज्ञान के बिना गुजार देते हैं। जिस अन्न और जल से जीवन मिलता है उसे तुच्छ समझते हैं एक पल का चैन न दे वही सोना गले लगा देते हैं। उसी तरह देहाभिमान से युक्त होने के कारण अधिक वाचाल होकर क्रूरतम शब्दों का प्रयोग करते हैं। जिससे समाज में वैमनस्य बढ़ता है।
महान नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि
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पृथिव्यां त्रीणी रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम्।
मूर्खे पाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा विधीयते।।
‘‘इस प्रथ्वी पर तीन ही रत्न हैं-अन्न, जल और मधुर वाणी, किन्तु मूर्ख लोग पत्थर के टुकड़ों को ही रत्न कहते हैं।’’

अक्सर लोग कहते हैं कि भारतीय लोगों के पास दुनियां के अन्य देशों के मुकाबले बहुत अधिक सोना है, मगर बहुत कम लोग जानते हैं कि उससे अधिक तो हम पर परमात्मा की यह कृपा है कि दुनियां के अन्य देशों से अधिक हमारे यहां भूगर्भ जलस्तर है। वैसे आजकल बाज़ार के सौदागर यह प्रयास भी कर रहे हैं कि यहां जल सूख जाये और उसे बेचकर अपने बैंक खाते बढ़ायें। अनेक तरह के ठंडे पेयों के कारखाने यहां स्थापित हो गये हैं जो अपने इलाके का पूरा जल पी जाते हैं। वहां का जलस्तर कम हो गया है पर भारतीय जनमानस ऐसी चकाचौंध में खो गया है कि उसे इसका आभास ही नहीं होता। जल जैसा रत्न हम खोते जा रहे हैं पर आर्थिक विकास का मोह ऐसा अंधा किये जा रहा है कि उसकी परवाह नहीं है।
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Saturday, March 26, 2011

अपने काम के मंत्र दिल में ही रखें-हिन्दू धार्मिक विचार (apna mantra dil mein hakehn-hindu dharmik vichar)

राजा राज्य का और गृहस्थ परिवार का मुखिया होता है। राज्य और परिवार के मुखिया के पास अपने प्रभाव के अंतर्गत रहने वाले सदस्यों के अनेक रहस्य होते हैं। उसी तरह राजकाज और परिवार चलाने के वैसे ही मंत्र या तरीके होते हैं जिस तरह अध्यात्म अनुष्ठानों के होते हैं। राज्य प्रमुख और परिवार के मुखिया को अपने राजकाज का मंत्र तथा रहस्य अपने मन में रखना चाहिए। अगर वह अपने मंत्र बाहर बता देगा तो वह उनका सार्वजनिकीकरण हो जाने पर संकट खड़ा हो सकता है।
इस विषय पर कौटिल्य महाराज कहते हैं कि
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संरक्षेन्मंत्रबीजं हि तद्वीजं हि महीभुजाम।
यस्मिन्न पिन्ने ध्रुवं भेदो गुप्ते युप्तिनुतरा।।
‘मंत्र के रहस्य की रक्षा करना चाहिए। राजा का यही बीज है जिसके प्रगट होने से भेद खुल जाता है और उसके सारे प्रयास निष्प्रभावी हो जाते हैं। गुप्त रहस्य की रक्षा करने की नीति अपनानी चाहिऐ।’
हमने देखा है कि कुछ लोग अतिउत्साह या दूसरे पर विश्वास करने के कारण अपने कामकाज का मंत्र बता देते हैं। उनको लगता है कि जैसे वह कोई बहादुरी का काम रहे हैं। उनको यह भी अहंकार होता है कि इस तरह वह अपनी बुद्धिमानी प्रमाणित कर रहे हैं। कुछ समय बाद जब उनकी कहंी पोल खुल जाती है तो न वह स्वयं ही हंसी के पात्र बनते हैं बल्कि अपमानित भी अनुभव करते हैं। अपने कामकाज के मंत्र दूसरे को बताना आदमी के हल्केपन का प्रमाण है। ऐसे लोगों की संगत करना दूसरे के लिये भी असहजता का कारण बनती । कोई भी मनुष्य तभी तक ताकतवर रहता है जब तक वह अपने कामकाज जिनको गुरुमंत्र दूसरे से छिपाये रहता है।
कोई व्यक्ति कितना मानसिक रूप से दृढ़ है इसका अनुमान तभी लग सकता है जब वह अपने राज अपने मन में ही रखने का प्रमाण देता है। कहा जाता है कि जब तक कोई बात हमारे मन में है तभी तक वह रहस्य है, अगर वह दूसरे को बताई तो इसका मतलब यह है कि वह अब तीसरे कान तक जायेगी। तीसरे से फिर चौथे तक पहुंचेगी और अंततः ऐसी बात सब जान जायेंगे जो संबद्ध व्यक्ति को केवल अपने पास रखनी थी। अंततः उसे अपने काम में परेशानी आनी ही है।
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Sunday, March 20, 2011

मान पाने की चाहत में आदमी पूरी जिंदगी खराब कर देता है-हिन्दी धार्मिक विचार (samman pane ki chahat aur admi ki zindagi-hindi dharmik vichar)

मनुष्य में अहंकार का भाव हमेशा ही रहता है। इस देह को ही सत्य समझने वाले लोग मान और अपमान की परवाह चिंता में मरे जाते हैं। खासतौर से गृहस्थ जीवन में सामाजिक परंपराओं के निर्वाह अपने जातीय, धार्मिक, भाषाई तथा क्षेत्रीय समूहों के लोगों में सम्मान पाने के लिये किया जाता है। शादी और गमी के अवसर पर भोजन खिलाने की परंपरा इसी सम्मान पाने का मोह पालने का ही परिणाम है। जब हमारा अध्यात्मिक दर्शन कहता है कि यह देह नश्वर है और उसमें विराजमान आत्मा अजन्मा होने के साथ अमर है, तब हमारे कथित धर्म प्रेमी लोग देह के जन्म लेने और मरने के बाद भी इसे लेकर जो नाटक करते हैं उसे अज्ञान ही कहा जा सकता है न कि धर्म का प्रमाण। हमारे भारतीय धर्म में जन्म और मरण के दिनों को मनाने की परंपरा नहीं है पर विदेशी दर्शनों के आधार पर अब जन्म दिन और पुण्यतिथि मनाने का फैशन चल पड़ा है। मतलब यह कि समाज में सम्मान पाने के मोह से उपजी परंपराओं की संख्या कम तो नहीं हुई बल्कि बढ़ती जा रही है। अपने तथा परिवार के सम्मान के लिये आदमी अपना पूरा जीवन दाव पर लगा देता है।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं
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दुनिया के धोखे मुआ, चल कुटुंब की कानि
तब कुल की क्या लाज है, जब ले धरा पसानि
"यह दुनियां एक धोखा है जिसमें आदमी केवल अपने परिवार के पालन पोषण के लिये हर समय जुटा रहता है। वह इस बात का विचार नहीं करता कि जब उसका शरीर निर्जीव होकर इस धरती पर पड़ा रहेगा तब उसके कुल शान का क्या होगा?"
कुल करनी के कारनै, हंसा गया बिगोय
तब कुल काको लाजि, चारि पांव का होय
"अपने परिवार की मर्यादा के लिये आदमी ने अपने आपको बिगाड़ लिया वरना वह तो हंस था। उस कुल की मर्यादा का तब क्या होगा जब परमार्थ और सत्संग के बिना जब भविष्य में उसे पशु बनना पड़ेगा।"
दरअसल समाज के खुश करने के लिये दिखावा करने के लिये कार्यक्रम करने पर पैसा खर्च होता है जिसके संचय करने की भावना मनुष्य को पथभ्रष्ट कर देती है। फिर जिसके पास पैसा आ गया वह अपने वैभव का प्रदर्शन करने के लिये अपने कार्यक्रमों पर ढेर सारा खर्च करते हैं। उनको लगता है कि लोग ऐसा प्रदर्शन याद रखेंगे जोकि भ्रम ही है। उनकी देखा देखी दूसरे धनपति उनसे अधिक धन खर्च करते हुए उनके कथित एतिहासिक प्रदर्शन पर अपना पानी चढ़ा देते हैं।
कहने का अभिप्राय यह है कि संसार में माया के खेल में आदमी इस तरह उलझा रहता है कि उसे भक्ति और अध्यात्मिक ज्ञान संग्रह का अवसर ही नहीं मिल पाता। सृष्टि में अन्य जीवों से श्रेष्ठ माना जाने वाला मनुष्य पशुओं की तरह अपना तथा परिवार पेट पालने के साथ ही सम्मान को मोह मन में रखते हुए नष्ट कर देता है।
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Thursday, March 17, 2011

दहेज प्रथा सभ्यता को ही नष्ट कर डालेगी-हिन्दू धार्मिक चिंत्तन (dowri system in india is denger for society-hindu religion thought)

भारत में कन्या शिशु की गर्भ में ही भ्रुण हत्या एक भारी चिंता का विषय बनने लगा है। इससे समाज में लिंग संतुलन बिगड़ गया है जिसके भयानक परिणाम सामने आ रहे हैं। सामाजिक विशेषज्ञ बरसों से इस बात की चेतावनी देते आ रहे हैं कि इससे समाज में स्त्रियों के विरुद्ध अपराध बढ़ेगा। अब यह चेतावनी साक्षात प्रकट होने लगी है। ऐसे अनेक प्रकरण सामने आ रहे हैं जिसमें लड़कियों के साथ सामूहिक बलात्कार कर उनकी हत्या कर दी जाती है। स्थिति इतनी बदतर हो गयी है कि बड़ी आयु की महिलायें भी अपने पुत्र या पुत्री की आयु वर्ग के अपराधियों का शिकार होने लगी है। हम अगर कन्या भ्रुण हत्या को अगर एक समस्या समझते हैं तो अपने आपको धोखा देते हैं। दरअसल यह सामाजिक समस्याओं का विस्तार है। इनमें दहेज प्रथा शामिल है। लोग दहेज प्रथा समस्या के दुष्परिणामों के बृहद स्वरूप को नहीं समझते। जहां अमीर आदमी अपनी लड़कियों को ढेर सारा दहेज देते हैं तो गरीब भी कन्या को दान करने के लिये लालायित रहता है। यह लालसा समाज में प्रतिष्ठा अर्जित करने के अहंकार भाव से उपजती है। दहेज के विषय पर हमारे अनेक विद्वान अपनी असहमति देते आये है। दरअसल एक समय अपनी औकात के अनुसार अपनी पुत्री को विवाह के समय भेंट आदि देकर माता पिता घर से विदा करते थे पर अब यह परंपरा पुत्रों के लिये विवाद के समय उनके माता पिता का अधिकार बन गयी है।
इस विषय पर गुरुवाणी में कहा गया है कि
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'होर मनमुख दाज जि रखि दिखलाहि,सु कूड़ि अहंकार कच पाजो'
"लड़की के विवाह में ऐसा दहेज दिया जाना चाहिए जिससे मन का सुख मिले और जो सभी को दिखलाया जा सके। ऐसा दहेज देने से क्या लाभ जिससे अहंकार और आडम्बर ही दिखाई दे।"
अब पुत्र के माता पिता उसकी शादी में खुल्लम खुला सौदेबाजी करते हैं। कथित प्राचीन संस्कारों के नाम पर आधुनिक सुविधा और साधन की मांग करते हैं। नतीजा यह है कि समाज अब अपने बच्चों की शादी करने तक ही लक्ष्य बनाकर सिमट गया है। यही कारण है कि संचय की प्रवृत्ति बढ़ी है और लोग अनाप शनाप ढंग से पैसा बनाकर शादी के अवसर उसका प्रदर्शन करते हैं। देखा जाये तो किसी की शादी स्मरणीय नहीं बन पाती पर उसे इस योग्य बनाने के लिये पूरा समाज जुट जाता है। शादी में दिया गया सामान एक दिन पुराना पड़ जाता है। भोजन में परोसे गये पकवान तो एक घंटे के अंदर ही पेट में कचड़े के रूप में परिवर्तित हो जाते हैं मगर पूरा समाज एक भ्रम को स्मरणीय सत्य बनाने के लिये अपना पूरा जीवन नष्ट कर डालता है। दहेज प्रथा एक ऐसा शाप बन गयी है जिससे भारतीय लोग वरदान की तरह ग्रहण करते हैं। जब पुत्र पैदा होता है तो माता पिता के भी माता पिता प्रसन्न होते हैं और लड़की के जन्म पर पूरा खानदान नाकभौ सिकोड़ लेता है। इसी कारण समाज में कन्या भ्रुण हत्या एक फैशन बन गयी है। अगर दहेज प्रथा समाज ने निजात नहीं पायी तो पूर्णता से संस्कृति नष्ट हो जायेगी। फिर किसी समय हमारी धार्मिक परंपरा तथा सभ्यता इतिहास का विषय होगी।
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Saturday, March 12, 2011

अच्छे लोगों से रिश्ते कायम करें-हिन्दू धार्मिक विचार (achche logon se rishta kayam karen-hindu dharmik vichar)

हम लोग सामाजिक तथा पारिवारिक नये संबंधों का निर्माण करते हुए अन्य व्यक्तियों के आचरण, विचार तथा व्यवहार के तौर तरीकों पर विचार नहीं करते। अब तो यह स्थिति यह हो गयी है कि लोग दादागिरी, गुंडागर्दी तथा बेईमान करने के लिये बदनाम लोगों को अपने साथ रखकर प्रसन्नता अनुभव करते हैं। अक्सर हमारे देश के लोग यह सवाल करते हैं कि देश में भ्रष्टाचार कम क्यों नहीं हो रहा? उत्तर में सरकार को दोष देकर चुप हो जाते हैं। सच बात तो यह है कि हमारे समाज में चेतना की कमी तथा वैचारिक आलस्य के परिणाम से ही देश में अपराध और भ्रष्टाचार बढ़ा है। इसके लिये सभी लोग जिम्मेदार है। सभी लोगों को एक दूसरे के बारे पता है कि कौन क्या करता है? कौन भ्रष्टाचारी है और कौन बेईमान? कौन तस्कर है कौन व्याभिचारी? मगर प्र्रेम, विवाह, सत्संग या नित्य कर्म के आधार पर संपर्क कायम करने वाले लोग यह देखने का प्रयास करते हैं कि किसका निज स्वरूप क्या है? यकीनन नहीं!
इस विषय पर मनु महाराज कहते हैं कि
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उत्तमैरुत्तमैर्नित्यं संबंधनाचरेत्सह।
निनीषुः कुलमुत्कर्षमधमानधर्मास्त्यजेत्।
"अपने परिवार की रक्षा तथा सम्मान में वृद्धि के लिये अच्छे परिवारों के साथ अपनी कन्या और पुत्र के संबंध बनाने चाहिए। खराब आचरण तथा धर्म विरोधी पुरुषों के परिवारों के साथ किसी प्रकार का संबंध स्थापित करना ठीक नहीं है।"
उत्तमानुत्तमान्गच्छन्हीनाश्च वर्जवन्।
ब्राम्हण श्रेष्ठतामेति प्रत्यावयेन शूद्रताम्।।
"श्रेष्ठ पुरुषों से संबंध जोड़ने और नीच तथा अधम पुरुषों से परे रहने वाले विद्वान की प्रतिष्ठा बढ़ जाती है। इसके विपरीत श्रेष्ठ लोगों की बजाय नीच पुरुषों से संबंध बनाने वाला मनुष्य और उसका कुल कलंकित हो जाता है।"
जब हम देश में नैतिक आचरण में आई गिरावट तथा संवेदनहीनता की बात करते हैं तो समाज या सरकार को कोसना सबसे आसान लगता है पर अगर हम अपना निज आचरण तथा वैचारिक दृढ़ता का अवलोकन करें तो यह साफ दिखाई देगा कि कहीं न कहीं हमारा स्वार्थपूर्ण जीवन तथा समाज के प्रति दायित्व बोध हीनता ही इसके लिये जिम्मेदार है। अगर हमने निजी रिश्ते बनाने में केवल किसी आदमी का धनपति, बाहूबली तथा उच्च पदस्था होन ही मान लिया है तब यह भी मान लेना चाहिए कि समाज में सम्मान पाने का मोह दूसरे लोगों को येनकेन प्रकरेण सफलता पाना रह जाना बुरा नहीं है। श्रेष्ठ और त्यागी पुरुषों के प्रति लोगों का उपेक्षा का भाव रहना इस बात के लिये सभी को प्रेरित करता है कि अधिक से अधिक उपलब्धि पाकर समाज में सम्मान प्राप्त किया जाये। ऐसे में देश में व्याप्त व्यवस्था में परिवर्तन की अपेक्षा तभी संभव है जब हम अपने विचारों में परिवर्तन किया जाये।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
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Sunday, March 6, 2011

कबीर के दोहे-साधुओं के निंदक की कभी मुक्ति नही होती (Kabir ke dohe-sadhu ke nindak ki mukti nahin)

          जिस तरह समाज में सभी तरह के लोग हैं उसी तरह साधु और संतों के बीच भी हैं। कुछ लोग तो साधु और संत का चोला इसलिये पहनते हैं जिससे उनको धन, सम्मान तथा शिष्यों की प्राप्ति होती रहे। एक तरह से धर्म उनका व्यापार हो जाता है। आजकल तो ऐसी खबरें भी आती हैं कि अमुक साधु संत दैहिक यौनाचार या अपराध करते हुए पकड़ा गया। हमारे समाज में अध्यात्मिक की जड़ें गहरी हैं जिसकी वजह से ऐसे लोग जिनको काम नहीं आता या वह करना नहीं चाहते वही साधु का वेश पहनते हैं। गेहुंआ या सफेद रंग का चोगा पहने अनेक साधुओं ने समाज को धोखा दिया है कई तो यौनाचार और बच्चों के अपहरण जैसे अपराध में लिप्त पाये गये हैं। इसका आशय यह कतई नहीं है कि सारे साधु या संत ऐसे हैं। कुछ लोग ऐसे भी संतों की आलोचना करते हैं जो शिष्यों का समुदाय बनाकर प्रवचन देते हैं। अनेक बुद्धिजीवियों को तो संतों पर कटाक्ष करने में मजा आता है। हमारा अध्यात्मिक दर्शन संतों या साधुओं को मानने या न मानने की पूरी छूट देता है मगर उनकी निंदा करने वालों को बुरी तरह फटकारता भी है।
          इस विषय पर कबीर कहते हैं कि
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        जो कोय निन्दै साधु को, संकट आवै सोय।
          नरक जाय जनमै भरे, मुक्ति कबहु नहिं होय।।
      ‘जो आदमी साधु और संतों की निंदा करता है वह अतिशीघ्र नष्ट हो जाता हे। वह नरक में जाता है और फिर उसे नारकीय यौनि में जन्म लेना पड़ता है। उसकी कभी मुक्ति नहीं होती।’’
            दरअसल हमारी वर्तमान शिक्षा पद्धति ऐसी है जिसमें नकारात्मक सोच का निर्माण होता है। दूसरे की निंदा या आलोचना करने वाले इस तरह प्रदर्शन करते हैं जैसे कि वह श्रेष्ठ हैं। हर कोई दूसरे के दोष गिनाकर यह प्रमाणित करता है कि वह उसमें नहीं है। अपने अंदर जो गुण है उसकी जानकारी कोई नहीं देता। फिर निंदा और आलोचना में अभ्यस्त लोगों के पास इतना समय भी कहां रहता है कि वह आत्ममंथन कर अपने गुणों की तलाश करें। ऐसे लोग न स्वयं सुखी रहते हैं न दूसरे को देख पाते हैं। अतः जिन लोगों को अपने अंदर सकारात्मक भाव बनाये रखना है वह किसी दूसरे की निंदा या आलोचना न करें, खासतौर से साधु और संतों की तो बिल्कुल नहीं। अगर कोई साधु ठीक नहीं लगता तो उसके पास न जायें। उसको अपना गुरु न माने पर सार्वजनिक रूप उसे उसकी निंदा न करे। वैसे भी हमारा भारतीय अध्यात्म दर्शन निरंकार की निष्काम भक्ति का संदेश देता है। परनिंदा से बचने पर मन में सकारात्मक विचार पैदा होते हैं उससे जीवन में स्वमेव प्रसन्नता आती है।
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Friday, March 4, 2011

अहंकार का भाव आदमी को मूर्ख बना देता है-हिन्दी लेख (ahankar aadmi ko moorkh banata hai-hindi lekh)

अहंकार का मनुष्य को मूर्खता के मार्ग पर ले जाता है। खासतौर से जब किसी आदमी को यह आभास होने लगता है कि उसके पास संसार का पूरा ज्ञान आ गया है तो वह विक्षिप्तता की स्थिति में आ जाता है। उससे भी बड़ी मूर्खता तब होती है जब कोई आदमी अल्पज्ञानी को अपना गुरु बना लेता है। अनेक बाद ऐसे लोगों को भी गुरु मान लिया जाता है क्योंकि वह ज्ञान का रटा लगाकर उपदेशक की भूमिका में आ जाते हैं। सच बात तो यह है कि ज्ञान का रटा लगाकर बने उपदेशक मूर्ख नहीं होते बल्कि अपने शिष्यों और श्रोताओं को बनाते हैं। ज्ञान के व्यापारियों के लिये भारतीय अध्यात्म का संदेश वैसा ही जैसे किताबें बेचने वालों के लिये किताबें। वह किताबें बेचते हैं पर उसका ज्ञान अपने पास नहीं रखते। जब लोग इन ज्ञान के व्यापारियों की संगत करते हैं तो उनको लगता है कि वह स्वयं भी ज्ञानी हो रहे हैं। उसके बाद वह उनके प्रचारक के रूप में दूसरों को भी शिष्य बनने के लिये उकसाते हैं जैसे कि स्वयं बहुत बड़े ज्ञानी हो रहे हैं।
इस विषय पर भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि
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यदा किंचिज्ज्ञोऽहं द्विप इव मदान्धः समभवम्
तदा सर्वज्ञोऽस्मीत्यभवदवलिपतं मम मनः।
यदा किञ्चित्किाञ्चिद् बुधजनसकाशादवगतम्
तदा मूर्खोऽस्मीति जवन इव मदो में व्यपगतः।।
"जब मुझे कुछ ज्ञान हुआ तो मैं हाथी की तरह मदांध होकर उस पर गर्व करने लगा और अपने को विद्वान समझने लगा पर जब विद्वानों की संगत में बैठा और यथार्थ का ज्ञान हुआ तो वह अहंकार ज्वर की तरह उतर गया तब अनुभव हुआ कि मेरे समान तो कोई मूर्ख ही नहीं है।"
मनुष्य का मन कभी संसार के कार्यों से उकता जाता है तब वह अध्यात्मिक शांति चाहता है। ऐसे में वह ज्ञानी लोगों की संगत ढूंढता है। सत्संग का व्यापार करने वाले लोग उसे सकाम और साकार भक्ति का संदेश देते हुए उसे गुरु पूजा और सेवा के लिये प्रेरित करते हैं ताकि उनकी स्वयं की सेवा हो जाये। ऐसे लोगों के इर्दगिर्द घूमता आदमी कभी ज्ञानी नहीं बन पाता। यह अलग बात है कि उसे लगता है कि वह अच्छा कर रहा है। ऐसे में जब उसकी संगत कहीं ज्ञानियों के बीच होती है तो पता लगता है कि वह अभी उस ज्ञान से दूर है जिसे भारतीय अध्यात्म भरा हुआ है। योग साधना, ध्यान तथा मंत्रजाप के साथ ही सत्संग से प्राप्त ज्ञान से ही यह जाना जा सकता है कि वास्तव में तत्वज्ञान क्या है? दूसरी बात यह है कि इस संसार में सर्वज्ञानी कोई नहंी बन सकता। इसलिये ज्ञानी लोगों की भूख कभी नहीं मिटती। वह निरंतर ज्ञान संग्रह में लगे रहते हैं और दूसरों के सामने व्यर्थ बघार कर न व्यापार करते हैं और न ही उनके अंदर इस बात का अहंकार आता है कि वह ज्ञानी हैं।
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Thursday, March 3, 2011

धन और विद्वता का अहंकार रखने वालों से दूरी भली-हिन्दी धार्मिक चिंत्तन (ghamand rakhane valon se door raheh-hindi dharmik lekh)

जैसे जैसे विश्व में विकास हो रहा है वैसे वैसे ही लोगों के पास शारीरिक सुख के भौतिक साधनों एकत्रित होते जा रहे हैं। लोगों के लिये विलासिता ही सुख का पर्याय बन गयी है। शारीरिक श्रम के अभाव में अनेक तरह की बीमारियां जन्म लेती हैं। रुग्णता से ही मानसिक विकृति पनपती है।
विश्व के अनेक स्वास्थ्य संगठन तथा विशेषज्ञ इस बात की ओर संकेत कर चुके हैं कि अनेक देशों में चालीस प्रतिशत से अधिक लोग मनोरोगों से ग्रसित हैं पर वह न स्वयं न जानते हैं न दूसरों को ही आभास होता है। हम लोग यह समझते हैं कि मनोरोग होने का मतलब पागलपन से है। दरअसल हम विक्षिप्ता की चरम स्थित जिसे पागलपन कहा जाता है मनोरोग मान लेते हैं। वैसे मनोरोग की चरमस्थिति विक्षिप्पता ही है पर इसके अलावा भी ऐसी स्थितियां हैं जब कोई आदमी विक्षिप्त न हो पर मानसिक रूप से उसका मस्तिष्क तनाव से ग्रस्त होता है पर सामान्य दैहिक व्यवहार के चलते न उसे आभास होता है न दूसरे ही इस बात को समझते हैं। वह भी मनोरोग का शिकार हैं भले ही उनके सामान्य दैहिक क्रियाओं से यह लगता न हो। खासतौर से वर्तमान काल में जो लोग शारीरिक श्रम से बच रहे हैं उनका व्यवहार तो अनेक बार बेतुका हो जाता है और बातचीत में इसका आभास वही लोग कर सकते हैं जो परिश्रम करते हुए अपना मानसिक स्तर सामान्य बनाये हुए हैं।
इस विषय पर भर्तृहरि महाराज कहते हैं
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पुण्यैर्मूलफलैस्तथा प्रणयिनीं वृत्तिं कुरुष्वाधुना
भूश्ययां नवपल्लवैरकृपणैरुत्तिष्ठ यावो वनम्।
क्षधद्राणामविवेकमूढ़मनसां यन्नश्वाराणां सदा
वित्तव्याधिविकार विह्व्लगिरां नामापि न श्रूयते।।
"भर्तृहरि महाराज अपने प्रजाजनों से कहते हैं कि अब तुम लोग पवित्र फल फूलों खाकर जीवन यापन करो। सजे हुए बिस्तर छोड़कर प्रकृति की बनाई शय्या यानि धरती पर ही शयन करो। वृक्ष की छाल को ही वस्त्र बना लो लो। अब यहां से चले चलो क्योंकि वहां उन मूर्ख और संकीर्ण मानसिकता वाले लोगों का नाम भी सुनाई नहीं देगा जो अपनी वाणी और संपत्ति से रोगी होने के कारण अपने वश में नहीं है।"
जहां अमीरों और सम्मानित लोगों की महफिल होती है वहां उपस्थित होने वाले सभी एक तरह के होते हैं। इसलिये उन्हें आभास नहीं हो सकता कि कौन मनोरोगी हैं और कौन नहीं। कोई छोटा आदमी वहां मौजूद हो तो वह सोचता है कि यह तो बड़े लोग हैं पर जो ज्ञानी और मानसिक रूप से स्वस्थ हैं वह जानते हैं कि ‘गुण ही गुणों को बरतते हैं’। मतलब यह कि देह जैसे कर्म में लिप्त है वैसे ही मन की स्थिति हो जाती है। देह अगर अधिक परिश्रम करने वाली नहीं है तो बुद्धि भी अधिक चिंतन नहीं कर सकती। आदमी भले ही अपने वाहनों से लंबी लंबी यात्रायें करता हो पर उसका मन, बुद्धि और अहंकार उसे संकीर्ण दायरों में कैद कर देता है। ऐसे लोग न स्वयं कष्ट भोगते हैं बल्कि दूसरे को भी अपनी वाणी और व्यवहार से कष्ट देते हैं। ऐसे लोगों की पहचान कर उनसे दूर रहना ही बेहतर है।
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Saturday, February 26, 2011

बुरी कमाई को छोड़ देना चाहिए-हिन्दी धार्मिक संदेश (buri kamai n karen-hindi dharmik sandesh)

हर मनुष्य में स्वाभाविक रूप से यह ज्ञान रहता है कि कौनसा धन धर्म की कमाई है और कौनसा पाप की! दूसरा कोई आदमी यह नही बता सकता है आप पाप की कमाई कर रहे हो या नहीं उसी तरह किसी दूसरे को कहना भी नहीं चाहिये कि उसकी कमाई पाप की है। धन या माया तो सभी के पास आती है पर अपने परिश्रम, ज्ञान तथा कार्य के अभ्यास से कमाने वाले लोग वास्तव में धर्म का निर्वाह करते हैं जबकि झूठ, बेईमानी तथा अनाधिकारिक प्रयासों से धन कमाने वाले पाप की खाते हैं।
कहा जाता है कि जैसा आदमी खाये अन्न वैसा ही होता है उसक मन। अगर हम इसका शब्दिक अर्थ लेें तो इसका आशय यह है कि हम भोजन में मांस और मदिरा का सेवन करेंगे तो धीरे धीरे हमारी प्रकृति तामसी हो जायेगी। इसका लाक्षणिक अर्थ लें तो हमारी सेवा और व्यवसाय के प्रकार से है। जो लोग ऐसी जगहों पर काम करते हैं जहां का वातावरण अत्यंत दुर्गंधपूर्ण तथा गंदगी से भरा है तो चाहे वहा भले ही एक नंबर की कमाई करें पर उनकी देह में भरे विकार उनके अंदर सात्विक प्रवृत्तियां नहीं आने देतें। अपने कर्मस्थल से मिली पीड़ा उनका पीछा नहीं छोड़ती। इसका अगर व्यंजना विधा में अर्थ देखें तो यह स्पष्ट है कि जो धन दूसरे के शोषण, भ्रष्टाचार या अपराध से प्राप्त करते हैं वह चाहे अच्छी जगह पर रहे और शाकाहारी भोजन भी करें तब भी आसुरी प्रवृत्ति के हो जाते हैं।
इस विषय पर कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है
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दुष्यस्यादूषणार्थंचच परित्यागो महीयसः।
अर्थस्य नीतितत्वज्ञरर्थदूषणमुच्यते।।
"दुष्य तथा दूषित अर्थ का अवश्य त्याग करना चाहिये। नीती विशारदों ने अर्थ की हानि को ही अर्थदूषण बताया है।"
अतः हमें इस अपने जीवन में सतत आत्ममंथन करना चाहिए। जिंदगी तो सभी जीते हैं पर कुछ लोग ऐसे हैं जो अपने पास कुछ न होते ही हुए भी प्रसन्न रहते हैं और कुछ सब कुछ होते हुए भी दुःखी रहते हैं। जीवन जीने की कला सभी को नहीं आती इसके लिये जरूरी है कि ध्यान, चिंतन और मनन करते हुए अपनी आय के साधन तथा कार्यस्थलों में पवित्रता लाने का प्रयास करें।
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Sunday, February 20, 2011

लोगों को अपमानित करने वालों का पतन शीघ्र होता है-हिन्दू धार्मिक चिंत्तन (logon ka apaman na karen-hindu dharmik chittan)

कुछ लोग ऐसे होते हैं कि दूसरों के दोषों का बयान करके खुश होते हैं। कुछ ऐसे भी होते हैं जो दूसरों का अपमान करके प्रसन्नता की अनुभूति करते हैं। ऐसे अज्ञानियों का समर्थन करना या उनसे व्यवहार रखना अपने लिये संकट को दावत देना है। आज समाज में तो स्थिति यह है कि लोग दूसरे का अपमान कर यह दिखाते हैं कि वह कितने शक्तिशाली हैं। उसी तरह निर्धन, मज़दूर तथा असहाय आदमी की मजाक उड़ाकर कुछ लोग अपनी शक्ति की पहचान कराते हैं। वह यही नहीं जानते कि गरीब की हाय कितनी ताकतवर होती है।
इस विषय पर मनु महाराज अपनी स्मृति में कहते हैं कि
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सुखं द्वावमतः शेते सुखं च प्रतिबुध्यते।
सुखं चरति लोकेऽस्मिनन्मन्ता विनश्तिं।
"अन्य व्यक्तियों द्वारा अपमान किये जाने पर उनको माफ करने वाला मनुष्य सुखी की नींद लेनें के साथ संसार में सहजता से विचरता है परंतु दूसरों का अपमान करने वाला मनुष्य स्वयं ही नष्ट होता है।"
सच तो यह है कि कुछ लोग अक्षम होने के साथ ही अहंकारी भी होते हैं। उनको पद, प्रतिष्ठा और पैसा विरासत में मिल जाता है। ऐसे लोग गरीब और मज़दूर का दर्द नहीं समझते। उन्होंने कभी परिश्रम किया नहीं होता इसलिये परिश्रमी लोगों को हेय समझकर उनका अपमान करते हैं। अंततः कहीं न कहीं वह अपने आपको ही मानसिक और शारीरिक रूप से कमजोर करते हैं और फिर समय आने से पहले ही तकलीफ भी झेलते हैं। इस तरह के पाप और उसके दंड से बचने का केवल यही उपाय है कि दूसरों के साथ मधुर व्यवहार करें। अपनी वाणी से दूसरों को प्रसन्न रखते अपने लिये दुआओं का भंडार जुटाते रहें। दूसरों को अपमानित कर या कटुवाणी बोलकर अपने लिये पाप ही जुटाया जा सकता है पर मीठी वाणी बोलकर सारे संसार का दिल जीतने के साथ ही अपने आपको हमेशा प्रसन्न रखने का लाभ प्राप्त होता है।
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Saturday, February 19, 2011

विष फैलाने वालों को अमृत सृजक न बतायें-हिन्दू धार्मिक विचार (vish aur amrit-hindu dharmik vichar)

उच्च पदस्थ, धनवानों तथा बलिष्ठ लोगों को समाज में सम्मान से देखा जाता है और इसलिये उनसे मित्रता करने की होड़ लगी रहती है। जब समाज में सब कुछ सहज ढंग से चलता था तो जीवन के उतार चढ़ाव के साथ लोगों का स्तर ऊपर और नीचे होता था फिर भी अपने व्यवहार से लोगों का दिल जीतने वाले लोग अपने भौतिक पतन के बावजूद सम्मान पाते थे। बढ़ती आबादी के साथ राज्य करने के तौर तरीके बदले। समाज में राज्य का हस्तक्षेप इतना बढ़ा गया कि अर्थ, राजनीति तथा सांस्कृतिक क्षेत्र में राजनीति का दबाव काम करने लगा है। इससे समाज में लोकप्रियता दिलाने वाले क्षेत्रों में राज्य के माध्यम से सफलता पाने के संक्षिप्त मार्ग चुनने की प्रक्रिया लोग अपनाने लगे। स्थिति यह हो गयी है कि योग्यता न होने के बावजूद केवल जुगाड़ के दम पर समाज में लोकप्रियता प्राप्त कर लेते हैं। दुष्ट लोग जनकल्याण का कार्य करने लगे है। हालत यह हो गयी है कि दुष्टता और सज्जनता के बीच पतला अंतर रह गया है जिसे समझना कठिन है। व्यक्तिगत जीवन में झांकना निजी स्वतंत्रा में हस्तक्षेप माना जाता है पर सच यही है कि जिनका आचरण भ्रष्ट है वही आजकल उत्कृष्ट स्थानों पर विराजमान हो गये है। उनसे समाज का भला हो सकने की आशा करना स्वयं को ही धोखा देना है।
इस विषय में भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि
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आरंभगुर्वी क्षयिणी क्रमेण लघ्वी पुरा वृद्धिमति च पश्चात्।
दिनस्य पूर्वाद्र्धपराद्र्ध-भिन्ना छायेव मैत्री खलसज्जनानाम्।।
"जिस तरह दिन की शुरूआत में छाया बढ़ती हुई जाती है और फिर उत्तरार्द्ध में धीरे-धीरे कम होती जाती है। ठीक उसी तरह सज्जन और दुष्ट की मित्रता होती है।"
दुर्जनः परिहर्तवयो विद्ययाऽलङ्कृतोऽपि सन्।
मणिनाः भूषितः सर्पः किमसौ न भयंकर।।
"इसका आशय यह है कि कोई दुर्जन व्यक्ति विद्वान भी हो तो उसका साथ छोड़ देना चाहिए। विषधर में मणि होती है पर इससे उससे उसका भयंकर रूप प्रिय नहीं हो जाता।"
कभी कभी तो ऐसा लगता है कि विद्वता के शिखर पर भी वही लोग विराजमान हो गये हैें जो इधर उधर के विचार पढ़कर अपनी जुबां से सभाओं में सुनाते हैं। कुछ तो विदेशी किताबों के अनुवाद कर अपने विचार इस तरह व्यक्त करते हैं जैसे कि उनका अनुवादक होना ही उनकी विद्वता का प्रमाण है। उनके चाटुकार वाह वाह करते हैं। परिणाम यह हुआ है कि अब लोग कहने लगे हैं कि शैक्षणिक, साहित्यक तथा धार्मिक क्षेत्रों में अब नया चिंतन तो हो नहीं रहा उल्टे लोग अध्ययन और मनन की प्रक्रिया से ही परे हो रहे हैं। जैसे गुरु होंगे वैसे ही तो उनके शिष्य होंगे। शिक्षा देने वालों के पास अपना चिंतन नहीं है और जो उनकी संगत करते हैं उनको भी रटने की आदत हो जाती है। ज्ञान की बात सभी करते हैं पर व्यवहार में लाना तो विरलों के लिऐ ही संभव हो गया है।
अब तो यह हालत हो गयी है की अनेक लोगों को मिलने वाले पुरस्कारों पर ही लोग हंसते हैं। जिनको समाज के लिये अमृतमय बताया जाता है उनके व्यवसाय ही विष बेचना है। सम्मानित होने से वह कोई अमृत सृजक नहीं बन जाते। इससे हमारे समाज की विश्व में स्थिति तो खराब होती है युवाओं में गलत संदेश जाता है। फिल्मों में ऐसे गीतों को नंबर बताकर उनको इनाम दिये जाते हैं जिनका घर में गाना ही अपराध जैसा लगता है। फिल्म और टीवी में माध्यम से समाज में विष अमृत कर बेचा जा रहा है। ऐसे में भारतीय अध्यात्म दर्शन से ही यह आशा रह जाती है क्योंकि वह समाज में ज्ञान का प्रकाश फैलाये रहता है।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Wednesday, February 16, 2011

अपने मुंह मियां मिट्ठु न बने-हिन्दी चिंत्तन आलेख (apni tarif khud na karen-hindi chittan aalekh)

सम्मान पाने की चाह हर मनुष्य में होती है पर परोपकार करने का भाव तो विरले ही लोगों के होता है। सच तो यह है कि हृदय से ईश्वर भक्ति करने वाले ही परोपकार का काम करते हैं पर मान पाने का विचार तक नहीं करते। इसके विपरीत अपने स्वार्थ पूर्ति में ही जीवन गुज़ारने वाले कुछ लोग अपने मुंह से ही अपनी प्रशंसा करते हैं। अपनी व्यक्तिगत उपलब्धियों का बिना पूछे ही गुणगान करने लगते हैं भले ही उससे कोई दूसरा प्रभावित नहीं होता। एक बात निश्चित है कि अपनी प्रशंसा स्वयं तो कदापि नहीं करना चाहिए और कोई अन्य व्यक्ति करता है तो समझ लीजिए उसने ऐसा कोई काम नहीं किया जिसकी सराहना दूसरे लोग करें।
नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि
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पर-प्रोक्तगुणो वस्तु निर्गृणऽपि गुणी भवेत्।
इन्द्रोऽ लघुतां याति स्वयं प्रख्यापितैर्गृणैः।।
"चाहे कोई मनुष्य कम ज्ञानी हो पर अगर दूसरे उसके गुणों की प्रशंसा करते हैं तो वह गुणवान माना जायेगा किन्तु जो पूर्ण ज्ञानी है और स्वयं अपना गुणगान करता है तो भी वह प्रशंसनीय नहीं माना जा सकता चाहे भले ही स्वयं देवराज इंद्र हो।"
अपने मुंह से अपनी प्रशंसा करने की बजाय बेहतर यह है कि हम स्वयं भी कोई अच्छा काम करें। जिंदगी के फुरसत के क्षणों अध्यात्मिक ज्ञान संग्रह तथा परमार्थ में लगायें। अपनी स्वार्थपूर्ति के लिये जीवन गुजारना सहज तो है पर कहीं न कहीं  आत्मिक शांति का अभाव सभी को खलता है। वह तभी संभव है जब परमार्थ करने के साथ ही ईश्वर की भक्ति की जाये।
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Saturday, February 12, 2011

आयु के छोटे शिक्षक का भी सम्मान करना चाहिए-हिन्दू धार्मिक लेख (age,teachar and computer education-hindu dharmik article)

मनुष्य को विनम्रता का भाव हमेशा अपना चाहिए पर इसका मतलब यह नहीं है कि अक्षम, नकारा, भ्रष्ट तथा अहंकारी लोगों की संगत में जाने की सामाजिक शर्त का पालन भी करें। अंततः संगत का प्रभाव पड़ता है। जैसे लोगों के बीच बैठेंगे उनकी वाणी तथा सक्रियता के प्रभाव से बचना संभव नहीं है चाहे कितना कोई आम इंसान ज्ञानी क्यों न हो।
पैसा, पद तथा प्रतिष्ठा अर्जित करने वाले अनेक लोग मदांध हो जाते हैं और अपने साथ अभिवादन करने की प्रक्रिया को वह अपनी चाटुकारिता समझकर इठलाते हैं। वह अभिवादन का उत्तर देते नहीं है और देते हैं तो उनका अहंकार भाव प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होता है। ऐसे लोग सम्मान के योग्य नहीं होते। उनकी तरफ से मुंह फेरना ही एक श्रेष्ठ उपाय है।
इस विषय में मनुमहाराज मनुस्मृति में कहते हैं-
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यो न वेत्यभिवादस्य विप्रः प्रत्यभिवादनम्।
नाभिवाद्य स विदुषा यथा शूर्दस्तथैव सः।।
"जो अभिवादन का उत्तर देना नहीं जानता उसे प्रणाम नहीं करना क्योंकि वह इस सम्मान के अयोग्य होता है।"
अवाच्यो तु या स्त्री स्वादसम्बद्धा य योनितः।
भोभवत्पूर्वकं त्वनेमभिभाषेत धर्मवित्।।
"धर्म का ज्ञान रखने वाले को चाहिए कि वह दूसरे ज्ञानी को कभी भी नाम से संबोधित न करे भले ही वह उससे छोटी आयु का क्यों न हो। उसको हमेशा सम्मान से संबोधित करना चाहिए।"
उसी तरह अगर कोई ज्ञानी है और आयु में छोटा हो भी उसका सम्मान किया जाना चाहिये। इसका उदाहरण आज के कंप्यूटर युग में लिया जा सकता है। जब कंप्यूटर का उपयोग आम लोगों ने शुरु किया तो उसे सीखने के लिये अपने से छोटी आयु के लड़कों से सीखना प्रारंभ करना पड़ा। वह एक छात्र के रूप में अपने शिक्षक को सम्मानीय संबोधन देने लगे। यह हमारी महान सांस्कृतिक परंपराओं का ही प्रमाण है। फिर कंप्यूटर की शिक्षा ऐसी है कि संभव है कुछ बच्चे पहले शिक्षा या अधिक अभ्यास से अपने से बड़े बच्चों से पहले दक्ष हो जाते हैं। इतना ही नहीं वह शिक्षक भी बन अपने दायित्व निभाते हैं। ऐसे में उनको सर या श्रीमान् का संबोधन देने से अपने अंदर कभी कुंठा अनुभव नहीं करना चाहिए।
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Sunday, February 6, 2011

वैचारिक योग की स्थिति-हिन्दी धार्मिक लेख (vaicharik yog ki sthati-hindi dharmik lekh)

वैचारिक योग की भी एक स्थिति है।  जब हमें लगे कि क्रोध का हमला हम पर हो गया है तब शांति की कल्पना करें, जब किसी वस्तु के प्रति लालच का भाव आ गया है तब त्याग का विचार करें।  इससे हमें अपने अंतर्मन में चल विचार की प्रतिपक्ष में स्थिति क्या है, यह समझ मे आयेगा।  हम सामने खड़े होकर अपने व्यक्त्तिव को निहारें तब पता लगेगा कि हम दूसरों को कैसे दिख रहे हैं। 
आधुनिक सभ्यता के विशेषज्ञ अक्सर सकारात्मक भाव को जीवन की सफलता का मूल मंत्र बताते हैं। अनेक अनुभवी लोग भी सभी को सकारात्मक विचाराधारा रखने की सलाह देते हैं पर यह भाव आये कैसे इसे कोई नहीं बता सकता क्योंकि इसके लिये मनुष्य मन के रहस्य को समझना जरूरी है जिसे कोई विरले ही समझ पाते हैं। पतंजलि योग सूत्र को विज्ञान इसलिये भी कहा जाता है क्योंकि वह मनुष्य की देह, मन तथा विचारों में शुद्धता लाने का मार्ग भी बताता है।
इस विषय में पतंजलि योगा साहित्य में कहा गया है कि 
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वितर्का हिंसादयः कृतकारितानुमोदिता लोभक्रोधमोहपूर्वका मृदुमध्याधिमात्रा।
दुःखज्ञानान्तफला इतिप्रतिक्षभावनम्।।
"हिंसा आदि का भाव वितर्क कहलाते हैं जिन पर आधारित बुरे कर्म स्वयं या दूसरों से करवाये जाते हैं या उनका अनुमोदन किया जाता है। यह वितर्क वाला भाव लोभ, क्रोध और मोह के कारण पैदा होता है। यह भाव दुःख और अज्ञान के रूप में फल प्रदान करते हैं अतः उनके लिये प्रतिपक्षी विचार करना चाहिए।"
वितर्कबाधने प्रतिपक्षभावनाम्।
"जब वितर्क और यम नियम में बाधा पहुंचाये तब उनके प्रतिपक्षी विचारों का ध्यान करना चाहिए।"
मनुष्य का मन चंचल और बुद्धि में कुटिलता का भाव स्वाभाविक रूप से रहता है। इसलिये ही अज्ञानी मनुष्य व्यसनों की तरफ आकर्षित होता है जो कि उसके लिये देह के लिये हानिकारक हैं और वह जरा जरा बात पर क्रोध का शिकार होता है जो कि उसके लिये मानसिक तनाव का कारण बनता है। इन पर नियंत्रण करने के लिये राय देना आसान है पर इसका मार्ग जाने बिना कोई भी आत्मनियंत्रण नहीं कर सकता। इसके लिये अभ्यास की आवश्यकता है। इस अभ्यास का तरीका यह है कि जब हमारे अंदर आवेश, निराशा या अस्थिरिता का भाव आता है तब हमें अपने समक्ष उपस्थित प्रसंग पर विपरीत दृष्टिकोण पर भी विचार करना चाहिए। जब किसी की बात पर गुस्सा आता है तब हमें यह भी देखना चाहिए कि कहीं सामने वाले की बात सही तो नहीं है, अगर वह गलत है तो यह भी जानने का प्रयास करना चाहिए कि वह किसी अन्य की प्रेरणा से तो यह नहीं कह रहा। इसके बाद उस बात को अनसुना करने का प्रयास भी करना अच्छा रहता है। उसी समय यह भी विचार करना चाहिये कि आखिर क्रोध करने के परिणाम क्या होंगे। उसके बाद इस बात पर भी चिंतन करना चाहिये कि इस जीवन में प्रसन्नता लाने के लिये अन्य विषय भी हैं जिससे ध्यान अच्छी बात की तरफ चला जाये। कोई गाली दे तब अपने अंदर ओम शब्द का ध्यान करें और जब कोई लड़ने आये तो विनम्रता और मौन का मार्ग अपनायें जिससे तत्काल न केवल तनाव समाप्त होता है बल्कि एक प्रकार से अलौकिक प्रसन्नता भी प्राप्त होती है।

हमारे जीवन में अनेक लोग संपर्क में आते हैं। कई लोग दुःख देते हैं तो कोई प्रसन्नता देते हैं। जो दुःख का हेतु हैं उनका स्मरण होने पर अपना ध्यान प्रसन्न करने वाले लोगों की तरफ लाना चाहिये। इसके कष्ट आने पर आनंद के गुजरे पलों का स्मरण कर अपने अंदर यह दृढ़ भाव स्थापित हो जाता है कि समय की बलिहारी है वह अच्छा समय नहीं रहा तो यह बुरा भी नहीं रहेगा। इसी तरह अभ्यास करने से ही सकारात्मक भाव पैदा किया जा सकता है।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Saturday, February 5, 2011

शांत आसन का अभ्यास करें-हिन्दी अध्यात्मिक लेख (hindi adhyatmik aaelkh)

खुश लोग अक्सर खामोश दिखते हैं पर खुश भी वही रहते हैं। जिन लोगों को बहस सुनने या करने की आदत है वह हमेशा तकलीफ उठाते हैं। अनेक बार तो हम देखते हैं कि लोगों के बीच अनावश्यक विषयों पर वाद विवाद होने पर खूनखराबा हो जाता है। ऐसे वाद विवाद अक्सर अपने लोगों के बीच ही होते हैं। कई बार रिश्ते और मित्रता शत्रुता में परिवर्तित हो जाती है।
मनुष्य का स्वभाव कुछ ऐसा होता है कि वह बचपन से लेकर बुढ़ापे तक एक जैसा ही रहता है। युवावस्था में तो यह सब पता नहीं चलता पर बुढ़ापे में शक्ति क्षीण होने पर मनुष्य के लिये ज्यादा बोलना अत्यंत दुःखदायी हो जाता है। उस समय उसे मौन रहना चाहिए पर कामकाज न करने तथा हाथ पांव न चलाने की वजह से उसे बोलकर ही अपना दिल बहलाना पड़ता है और परिणाम यह होता है कि उसे अपमानित होने के साथ ही मानसिक तकलीफ झेलनी पड़ती है। दरअसल शांत बैठने की प्रवृत्ति का विकास युवावस्था में ही करना चाहिए जिससे उस समय भी व्यर्थ के वार्तालाप में ऊर्जा के क्षीण होने के दोष से बचा जा सकता है और बुढ़ापे में भी शांति मिलती है। शांत बैठना भी एक तरह से आसन है। 
इस विषय  पर मनु महाराज कहते हैं कि 
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क्षीणस्य चैव क्रमशो दैवात् पूर्वकृतेन वा।
मित्रस्य चानुरोधेन द्विविधं स्मृतमासनम्।।
"जब शक्ति क्षीण हो जाने पर या अपनी गलतियों के कारण चुप बैठना तथा मित्रों की बात का सम्मान करते हुए उनसे विवाद न करना यह दो प्रकार के शांत आसन हैं।"

उसी तरह मित्रों से भी जरा जरा बात पर विवाद नहीं करना श्रेयस्कर है। आपसी वार्तालाप में मित्र ऐसी टिप्पणियां भी करते हैं जो नागवार लगती हैं पर उस पर इतना गुस्सा जाहिर नहीं करना चाहिए कि मित्रता में बाधा आये। घर परिवार के सदस्यों को उनकी गल्तियों पर समझाना चाहिये कि अगर कोई न माने तो शांत ही बैठ जायें क्योंकि यह जीवन हरेक की स्वयं की संपदा है और जिसका मन जहां जाने के लिये प्रेरित करेगा उसकी देह वहीं जायेगी। यह अलग बात है कि परिणाम बुरा होने पर लोग रोते हैं पर यहां कोई किसी की बात नहीं मानता। ऐसे में शांत आसन का अभ्यास बुरा नहीं है।
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Sunday, January 30, 2011

व्यसनों से कल्याण दूर होता है-हिन्दी चिंत्तन आलेख (vyasn aur kalyan-hindi chitan lekh)

मनुष्य अगर योगसाधना, अध्यात्मिक अध्ययन तथा दान आदि करे तो उसके व्यक्तित्व में चार चांद लग जाते हैं पर इसके लिये आवश्यक है कि वह सहज भाव के मार्ग का अनुसरण करे। सहज भाव मार्ग दिखने में बड़ा कठिन तथा अनाकर्षक है क्योंकि इसके लिये अच्छी आदतों का होना जरूरी है जो अपने अंदर डालने में कठिनाई आती है। सहज मार्ग में त्याग के भाव की प्रधानता है जबकि मनुष्य कुछ पाकर सुख चाहता है। त्याग के भाव के विपरीत यह मनुष्य का स्वभाव है कि वह व्यसनों की तरफ आकर्षित होता है क्योंकि वह त्वरित रूप से सुख देते हैं। शराब, तंबाकु, जुआ तथा मनोरंजक दृश्य देखकर मनुष्य बहुत जल्दी सुख पा लेता है यह अलग बात है कि कालांतर में वह तकलीफदेह होने के साथ ही उकताने वाले भी होते हैं, मगर तब तक मनुष्य अपनी शारीरिक तथा मानसिक शक्ति गंवा चुका होता है और तब अध्यात्मिक मार्ग अपनाना उसके लिये कठिन होता है।
व्यसनों के विषय पर महाराज कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में कहा है कि
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यस्माद्धि व्यसति श्रेयस्तस्माद्धयसमुच्यते।
व्यसन्योऽयो व्रजति तस्मात्तपरिवर्जयेत्।।
‘‘जिसका नाम व्यसन है उससे सारे कल्याण दूर हो जाते हैं। व्यसन से पुरुष का पतन होता है इस कारण उसे त्याग दे।’’
आजकल तंबाकु के पाउचों का सेवन जिस तरह हो रहा है उसे देखकर यह कहना कठिन है कि युवाओं में कितने युवा हैं। विभिन्न विषैले रसायनों से बने यह पाउच युवावस्था में ही फेफड़ों, दिल तथा शरीर के अंगों में विकृतियां लाते हैं। यह सब चिकित्सकों का कहना है न कि कोई अनुमान! शराब तो अब सांस्कृतिक कार्यक्रमों का एक भाग हो गयी है। उससे भी बड़ी बात यह कि अब तो मंदिर आदि के निर्माण के लिये पैसा जुटाने के लिये नृत्य और गीत के कार्यक्रम आयोेजित किये जाते हैं। इस तरह पूरा समाज ही व्यसनों में जाल में फंसा है। ऐसे में यह आशा करना कि धर्म का राज्य होगा एक तरह से मूर्खता है।
ऐसे में सात्विक पुरुषों को चाहिए कि वह अपनी योगसाधना, ध्यान तथा पूजा पाठ एकांत में करके ही इस बात पर संतोष करें कि वह अपना धर्म निर्वाह कर रहे हैं। इसके लिये संगत मिलने की अपेक्षा तो कतई न करें।
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Saturday, January 29, 2011

हमेशा बोलो और लिखो ‘बहुत बढ़िया’-हिन्दी चिंत्तन आलेख (hahesha bolo aur likho bahut badhiya or very nice-hindi chitan)

खुश रहना भी एक कला है जो हमारे अंतर्मन में विराजमान रहती है। हम अक्सर आपनी आखों से दूसरों के दोष देखने, कानों से दूसरे का अहित सुनने और वाणी से दूसरे के लिए निंदात्मक वाक्य कहने के आदी हो जाते हैं। यह आदत भले ही हमें अच्छी लगती है पर कालांतर में यह हमारे लिये मानसिक तनाव का ऐसा कारण बनर जाती है कि हमें कोई अच्छी चीज दिखाई नहीं देती। यहां तक सुखद वस्तुओं से स्वतः घृणा होने लगती है। हमारा स्वभाव नकारात्मक हो जाता है और इससे हम स्वयं ही नकारा हो जाते हैं।
आपने देखा होगा कि कुछ लोग हमेशा ही दूसरों से विनम्रता से पेश आते हैं और हमेशा ही अन्य लोगों को ‘बहुत अच्छा’ या ‘बहुत बढ़िया’ उनको प्रेरित करते हैं। भले ही लोग उनको चाटुकार या झूठा कहें पर सच यह है कि ऐसे लोग सकारात्मक विचाराधारा के होते हैं और अपनी जिंदगी आनंद से जीते हैं।
इस विषय पर मनु महाराज कहते हैं कि
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भद्र भद्रमिति ब्रूयाद् भ्रदमित्येव वा वदेत्।
शुष्कवैरं विवादं च न कुर्यात्केनचित्साह।।
‘‘सभ्य आदमी को हमेशा दूसरे के काम पर ‘बहुत बढ़िया‘ ‘बढ़िया’ ‘बहुत अच्छा’ या अच्छा जरूर बोलना चाहिये। किसी से व्यर्थ विवाद और शत्रुता नहीं करना चाहिये। न ही रूखा व्यवहार कर दूसरे को हतोत्तासहित करना चाहिये।’’
इस संसार में सभी लोग लोकप्रिय नहीं होते। कुछ तो अपने दृष्कृत्यों की वजह से निंदा का पात्र बनते हैं। अपने स्वार्थ में मस्त रहने वाले लोगों को कौन सम्मान देता है? समाज में वही मनुष्य लोकप्रिय होता है जो दूसरों को भी अच्छे काम के लिये प्रेरित करता है। इसलिये हमेशा ही हर पल दूसरे के काम पर उसकी प्रशंसा में बहुत अच्छा या अच्छा जरूर बोलना चाहिये। कहीं लिखकर किसी के कार्य की प्रशंसा करनी हो तो उसके लिये बहुत बढ़िया या बढ़िया शब्दों के उपयोग  की आदत डालना चाहिये। इससे न हमारा स्वभाव सकारात्मक होगा बल्कि दूसरों के बीच लोकप्रियता भी मिलेगी।
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Wednesday, January 26, 2011

बड़े आदमी की वजह से छोटे की उपेक्षा न करें-हिन्दी धार्मिक लेख (chhota aur badm aadmi-hindi dharmik lekh)

आजकल बड़े तथा पहुंचे हुए लोगों से संपर्क बनने की कुछ प्रवृत्ति ही अधिक हो गयी है। पुलिस, प्रशासन, राजनीति से जुड़े तथा अर्थजगत के शिखर पुरुषों के साथ मेल कर लोग बहुत खुश होते हैं। सामान्य आदमी से मित्रता या व्यवहार करना अब लोगों के लिये बोझ बन गया है। अनेक लोग तो केवल पुलिस अधिकरियों, प्रशासन में उच्च पदस्थ तथा राजनीति में सक्रिय लोगों से एक दो बार मिल क्या लेते हैं सभी जगह उनसे अपने संपर्क होने की गाथा गाते हुए थकते नहीं है।
हर आदमी सामान्य स्तर के मित्रों, रिश्तेदारों और साथियों को हेय दृष्टि से देखता है क्योंकि उसको लगता है कि यह किसी काम के नहीं है। जबकि सच यह है कि अपने जीवन की दिनचर्या से जुड़े यही लोग बहुत काम के होते हैं यह अलग बात है कि वह समस्यायें सहजता से दूर करते हैं इसलिये इसका आभास नहीं होता।
कविवर रहीम कहते हैं कि
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रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिये डारि।
जहां काम आवे सुई, कहा करे तलवारि।।
‘‘बड़े लोगों को देखकर छोटे लोगों की उपेक्षा नहीं करना चाहिए। जहां सुई काम आती है वहां तलवार कुछ नहीं कर पाती।’’
हमारे साथ कुछ सामान्य लोग ऐसे होते हैं जिनके पास रहते हुए उनकी उपयोगिता का अनुभव नहीं होता इसलिये बड़ी हस्तियों से संपर्क बनाने लगते हैं। जबकि सच यह है कि बड़े तथा अमीर लोग केवल स्वार्थ की वजह से छोटे लोगों से संपर्क रखते हैं ताकि समय आने पर उनकी मदद मिल जाये न कि उनकी मदद करें। ऐसी अनेक घटनायें हुई हैं जिनमें लोग बड़े बड़े संपर्क होने का दावा करते हैं पर संकट आने पर उनको अपने आसपास के सामान्य लोगों की सहायता पर ही आश्रित रहना पड़ा है। साथ ही यह भी देखा गया है कि विपत्ति आने पर छोटे लोग फिर भी सहारा देते हैं जबकि बड़े लोग मुंह फेर लेते हैं।
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Saturday, January 22, 2011

जहां अपनी योग्यता की परवाह न हो वहां न जायें-हिन्दी अध्यात्मिक लेख (apni yogyta aur gun-hindi adhyatmik lekh)

सामान्यतः हर आदमी में यही चाहत होती है कि जहां चार लोग मिलें उसकी झूठी या सच्ची चाहे जैसी भी हो पर प्रशंसा जरूर हो। इसके लिये वह तमाम तरह के स्वांग रचता है। अनेक बार कुछ लोग आत्मप्रवंचना कर दूसरों को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं। ऐसा कर सभी लोग अपने आपको धोखा देते हैं। प्रचार माध्यमों में क्रिकेट खिलाड़ियों तथा फिल्म अभिनेताओं का प्रचार देखकर अनेक लोग बौरा जाते हैं। लोग स्वयं या अपने बच्चों को नेता, क्रिकेट खिलाड़ी या अभिनेता बनाकर प्रतिष्ठा अर्जित करना  चाहते हैं। चंद चेहरों को पर्दे पर देखकर सारे देश के लोग ऐसी चकाचौंध में खो जाते हैं कि वैसा ही बनने की चाहते में हाथपांव मारते हैं।
इधर अध्यात्मिक चैनलों पर संतों के प्रवचनों की चकाचौंध देखकर अनेक लोग ऐसे भी हो गये हैं जो प्राचीन ग्रंथों का थोड़ा बहुत अध्ययन कर वैसे ही बनना चाहते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि लोग योग्यता संचय या प्रतिभा निर्माण की बजाय प्रतिष्ठा अर्जन के लिये मरे जा रहे हैं। ज्ञान को रटना चाहते हैं धारण करना कोई नहीं चाहता। प्रबंध कौशल हो तो अल्पज्ञानी महाज्ञानी कहलाते हैं और अक्षम या नकारा लोग बड़े पदों पर भी सुशोभित हो जाते हैं। मगर सभी के लिये यह संभव नहीं है। सच तो यह है कि योग्य, प्रतिभाशाली, ज्ञानी तथा कुशल आदमी के लिये यही बेहतर है कि वह समय की प्रतीक्षा करे। वह ऐसे लोगों के बीच जाकर अपना गुणगान करने में अपना समय नष्ट न करे जो केवल अर्थ की उपलब्धि को ही सफलता का पैमाना मानते हैं।
संत कबीरदास जी कहते हैं कि
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जहां न जाको गुन लहै, तहां न ताको ठांव।
धोबी बसके क्या करे, दीगम्बर के गांव।।
‘‘जहां पर अपने गुण की पहचान न हो वहां अपना ठिकाना न बनायें। जहां वस्त्रहीन लोग रहते हैं वह कपड़े धोने के व्यवसायी का कोई काम नहीं है।’’
आजकल तो अंधों के हाथ बटेर लग गयी है। नकारा लोगों के पास पद, यश और धन आ गया है। ऐसे में वह योग्य आदमी की योग्यता से चिढ़ते हैं। उसकी गरीबी का मजाक बनाते हैं। इतना ही नहीं उनके चमचे और चेले भी उनका साथ निभाते हैं। ऐसे में अगर आप अपनी योग्यता, ज्ञान तथा भक्ति पर विश्वास करते हैं तो कभी दूसरे के कहने में न आयें न किसी दूसरी राह पर चलें। ऐसे अक्षम और नकारा लोगों का साथ छोड़ दें तो यही अच्छा है।
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Sunday, January 9, 2011

काला दूषित धन देश के लिए खतरा-हिन्दी चिंत्तन लेख (black money in india danger for country-hindi chitan lekh)

हम जब अपने देश की स्थिति को देखते हैं तो ऐसा लगता है कि चारों तरफ जो विकास की चकाचौंध है वह केवल दूषित या कालेधन की वजह से ही है। अंग्रेजी का विद्वान जार्ज बर्नाड शॉ कहता है कि बिना बेईमानी के कोई भी अमीर नहीं बन सकता। वैसे उसने यह बात पाश्चात्य सभ्यता को देखकर कही थी पर चूंकि हमने भी राज्य, समाज तथा शिक्षा व्यवस्था में उसी पश्चिमी संस्कृति को स्वीकार कर लिया है इसलिये हमारे देश पर भी यही सिद्धांत या फार्मूला लागू होता है। ऐसे में हम जहां भी बड़े धन के लेनेदेन देखते हैं तो यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या वह दूषित धन का प्रताप नहीं है।
हमारे देश में कालाधन अब समस्या नहीं रही क्योंकि शायद ही कोई ऐसा अमीर हो जिसके पास सफेद धन अधिक हो। इसलिये यह कह सकते हैं कि यह तो हमारे समाज का एक भाग बन गया है। कालेधन में हमारी पूरी व्यवस्था के साथ ही समाज भी संास ले रहा है। एक तरह से आदत हो गयी है दूषित धन में सांस लेने की। जिस तरह हंस की आदत होती है कि वह मोती चुगता है और चिड़िया दाना उसी तरह हमारे समाज के कुछ लोगों को काला धन ही अपना सर्वस्व दिखता है। अब शिखर पुरुष हंस नहीं चिड़िया की तरह हो गये हैं। वह धन उनको दूषित नहीं बल्कि पवित्र दिखाई देता है। एक बात सच है कि मेहनत के दम पर केवल रोटी से पेट भरा जा सकता है पर ऐशोआराम केवल कालेधन या दूषित धन से ही अब संभव रह गया है। हम टीवी चैनलों पर विलासिता से भरी खबरों को देखते हैं जिनके पीछे केवल कालेधन का ही महिमा मंडन होता है। महान राजनीतिशास्त्री कौटिल्य महाराज ने अपने अर्थशास्त्र में कहा है कि-
दूष्यस्यादूषणर्द्यंव परित्यागो महयतः।
ऋते राज्यापह्यरातु युक्तदण्डा प्रशस्यते।।
‘‘दुष्य तथा दूषित अर्थ का अवश्य त्याग करना चाहिए। नीति ज्ञाताओं ने अर्थ हानि को ही अर्थ दूषण बताया है।’’
कितनी मज़ेदार बात है कि हम अक्सर यह सुनते हैं कि हमारे देश का बहुत अधिक धन स्विस बैंकों में पहुंच गया है। दरअसल यह हमारे देश की हानि है और इसी कारण हुई है कि वह पूरा धन काला या दूषित है। विश्व में अमीर देश की तरफ प्रतिष्ठित हो रहे देश की आम जनता महंगाई तथा अपराधों की मार से चीत्कार कर रही है। आज भी देश की जनता का एक बहुत बड़ा भाग गरीबी की रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहा है। नये वर्ष पर जब देश के टीवी चैनल देश में हो रही मस्ती दिखा रहे थे तब देश का एक बहुत बड़ा भाग सदी की ठिठुरन से लड़ते हुए अपनी सांसे बचा रहा था। यह विरोधाभास इसी दुषित धन का प्रमाण है। हम जब देश के खुशहाल होने की बात सोचते हैं तब इस दूषित धन के दुष्प्रभाव को नहीं भूला सकते। जिस पर विदेश मजे कर रहे हैं और देश गरीब झेल रहा है।
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Saturday, January 8, 2011

मणि का मूल्य कांच से अधिक ही रहता है-चिंत्तन आलेख (mani ka moolya kaanch se adhik rahega-hindi chinttan alekh)

मनुष्य का यह स्वभाव है कि वह दूसरों से मान और बढ़ाई पाना चाहता है। यही कारण है कि वह अपने अंतर्मन में ज्ञान उसी सीमा तक धारण करता है जिससे दूसरों के सामने अपने को ज्ञानी सिद्ध कर सके। मान पाने की इच्छा श्वान प्रवृत्ति का प्रमाण भी मानी जाती है। जिस तरह श्वान अपने मालिक को खुश करने की इच्छा से उसके आगे पीछे घूमा करता है उसी तरह मनुष्य अपने समुदाय में सम्मान के लिये उसके इर्दगिर्द अपना कर्म संसार बना लेता है जिससे उसकी मानसिकता संकीर्ण हो जाती है। इस प्रयास में न केवल वह ज्ञान के अभ्यास से विरक्त हो जाता है बल्कि अपने नियमित काम में सदाचार नहीं ला पाता। जीवन से लड़ने की उसकी शक्ति का भी हृास होता है। उसे लगता है कि अपने अंदर योग्यता या प्रतिभा का भंडार एकत्रित करने की बजाय सीमित मात्रा की क्षमताओं के माध्यम से ही अपना आत्मप्रचार कर किसी तरह सम्मान पाया जाये।
यह ज्ञान की कमी मनुष्य में आत्मविश्वास की कमी का प्रमाण है। इसके विपरीत कुछ असाधारण लोग सम्मान की परवाह किये बिना ही अपने नियमित कर्म करने के साथ ही भक्ति तथा सत्संग में व्यस्त रहने के साथ ही ज्ञान संचय भी किया करते हैं। उनको पता होता है कि अगर अपने अंदर ही प्रतिभा है तो उसका सम्मान होगा और न ही भी होगा तो वह उसका स्वयं आनंद उठायेंगे। वैसे इस बारे में नीति विशारद चाणक्य का कहना है कि
मकणिर्लुण्ठति पादाग्रे काचः शिरसि धार्यते।
क्रयविक्रयवेलायां काचः काचो मणिमेणिः।।
‘‘मणि यदि पैरों में भी लुढ़कती रहे और कांच को सिर पर धारण कर लिया जाए तब भी बाज़ार में सौदे के दौरान मणि की कीमत कांच से बहुत अधिक ही रहेगी।’’
जिन लोगों को अपने जीवन में सफलता प्राप्त करनी है उनको समय रहते ही अपने अंदर गुणों का संचय करना चाहिये। यह बात सही है कि चाटुकारिता के कारण अनेक लोग कम योग्यता के कारण ही पुज रहे हैं। इतना ही नहीं कला, साहित्य, तथा अन्य क्षेत्रों में गिरोह बन गये हैं जहां सामान्य योग्यता के दम पर ही प्रचार मिल जाता है पर जिससे अपने मन को संतुष्टि मिले तथा जिस काम की इतिहास में जगह दिखे वह केवल प्रतिभाशाली लोगों के हिस्से में ही आता है। इतना ही नहीं योग्य तथा प्रतिभाशाली अपने दम पर हमेशा ही अपना स्थान बनाये रखते हैं उनको किसी पितृपुरुष या मातृमहिला की आवश्यकता नहीं होती।
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Saturday, December 11, 2010

मनुस्मृति-प्रजा को डराने वाले अपराधियों को क्षमा नहीं करना चाहिए (manu smriti-praja aur apradhi)

साहसे वर्तमानं तु यो मर्थयति पार्थिवः।
सः विनाशं व्रजत्याशु विद्वेषं चाधिगच्छति।।
हिन्दी में भावार्थ-
जो राज्य प्रमुख दुस्साहस करने वाले व्यक्ति को क्षमा कर देता है वह स्वयं ही अतिशीघ्र नाश को प्राप्त होता है क्योंकि इससे राज्य की प्रजा में विद्रोह का भाव पैदा होता है।
न मित्रकारणांद्राजा विपुलाद्वाधनायामात्।
समुत्सृजेत्साहसिकान्सर्वभूतभयावहान्।।
हिन्दी में भावार्थ-
राज्य प्रमुख को चाहिए वह स्नेह अथवा लालचवश भी प्रजा में डर उत्पन्न करने वालो चोरों और अपराधियों को क्षमा न प्रदान करे।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुस्मृति का विरोध करते करते अनेक लोगों ने राजकाज में भागीदारी प्राप्त की मगर प्रजा को क्या दिया? सभी मुखौटों की तरह काम करते रहे। पूंजीपतियों और अपराध समूहों का आजकल इतना घालमेल हो गया है कि पता ही नहीं चलता कि राज्य वास्तव में उन लोगों से संचालित है जिनका चेहरा दिख रहा है या वह पुतले हैं जिनकी डोर कोई पीछे से खींच रहा है। दुस्साहस करने वाले अपराध्सियों पर हाथ डालना आसान नहीं रहा। प्रचार माध्यमों में घोटालों की चर्चा पर अगर विचार करें तो ऐसा लगता है कि राज्य का राजस्व लुट रहा है और जिम्मेदार लोग लाचार दिख रहे हैं। जो अनाज राज्य गरीबों के लिये सस्ते दामों पर बेचने के लिये भेजता है उसे राज्य के अधिकारी, कर्मचारी तथा व्यापारी मिलकर अपने कब्जे में ले लेते हैं। इधर ऐसे एक राज्य का गरीबों को बेचा जाने वा अनाज विदेशों में भेज दिया गया-इस घटना पर प्रचार माध्मयों के बहुत चर्चा है।
मनुस्मृति में केवल अपराधियों के लिये हीं कड़े दंड का प्रावधान नहीं वरन् उनकी अनदेखी करने वाले राज्य कर्मियों के लिये भी ऐसी ही व्यवस्था है। ऐसा लगता है कि राज्य कर्म से जुड़े कुछ तत्व मनुस्मृति की व्यवस्था और संदेशों से भय खाते हैं इसलिये ही निम्न जाति तथा स्त्रियों के प्रति कुछ संदेशों को लेकर दुष्प्रचार करते हैं ताकि कोई उनकी निष्कर्मता तथा लालच की वजह की जा रही लापरवाही पर लोग टिप्पणियां न करें। यही कारण है कि आज देश की व्यवस्था एकदम बुरी और दर्दनाक हो गयी है।
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Sunday, December 5, 2010

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-प्रमाद और अहंकार करने वाला शीघ्र नष्ट हो जाता है (kautilya ka arthshastra-pramad aur ahankar)

प्रकृतिव्यसननि भूतिकामः समुपेक्षेत नहि प्रमाददर्पात्।
प्रकृतिव्यवसनान्युपेक्षते यो चिरातं रिपवःपराभवन्ति।।
हिन्दी में भावार्थ-
विभूति की कामना से उत्पन्न प्रमाद और अहंकार की प्रकृति से उत्पन्न व्यसन की उपेक्षा न करें। प्रकृत्ति की व्यसनों की उपेक्षा करने वाला शीघ्र ही नष्ट हो जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-प्रकृति के पंच तत्वों से बनी इस देह में मन, बुद्धि और अहंकार की प्रवृत्ति स्वाभाविक रूप से विद्यमान रहती है। जिनके पास भौतिक उपलब्धि है वह उसके आकर्षण में बंधकर मतमस्त हो जाते हैं। दूसरे को गरीब या अल्पधनी मानकर उसका मज़ाक उड़ाते हैं। मज़ाक न उड़ाये तो भी शाब्दिक दया दिखाकर अपने मन को शांति देने का प्रयास करते हैं। दरअसल यह सब दूसरों से ही नहीं बल्कि अपने साथ भी प्रमाद करना ही है। इस संसार में भगवान की तरह माया का खेल भी निराला है। किसी के पास कम है तो किसी के पास ज्यादा है, इसमें मनुष्य की कोई भूमिका नहीं है। यह अलग बात है कि अज्ञानवश वह अपने को कर्ता मान लेता है। इसी कारण वह कभी प्रमाद तो कभी अहंकार के भाव से ग्रसित होकर व्यवहार करता है।
आज हम देश के हालात देखें तो यह बात समझ में आ जायेगी कि जिन लोगों के पास धन, प्रतिष्ठा और पद की उपलब्धि है वह दूसरे को अपने से हेय समझते हैं। नतीजा यह है कि आम इंसानों में उनके प्रति विद्रोह के बीज पड़ गये हैं। शिखर पुरुषों को यह भ्रम है कि आम आदमी उनसे जाति, धर्म, भाषा तथा क्षेत्र के बंटवारे के कारण उनसे जुड़े हैं जो कि उनके किराये के बुद्धिजीवी बनाकर रखते हैं। मगर सच तो यह है कि शिखर पुरुषों से अब किसी की सहानुभूति नहीं है। भले ही प्रचार माध्यम कितने भी दावा करें कि जनता प्रसिद्धि लोगों को देखना और सुनना चाहती है। अब तो हर आदमी यह जान गया है कि शिखर पर अब बिना ढोंग, पाखंड या बेईमानी के कोई नहीं पहुंच सकता। अगर ऐसा न होता तो देश के अनेक शिखर पुरुष अपने घरों के बाहर सुरक्षा उपाय नहीं करते। इतना ही नहीं अनेक तो राह चलते हुए भी सुरक्षा लेकर चलते हैं। इसका मतलब सीधा है कि अपने ही कारनामों को उनके अंदर भय व्याप्त है। गरीबों से भरे देश में सुरक्षा एक मुद्दा बन गयी है।
फिर अब शिखर पर भी झगड़े होने लगे हैं। एक जाता है तो दूसरा आ जाता है। यह अस्थिरता इसलिये हैं क्योंकि प्रमाद और अहंकार में लगे शिखर पुरुष जल्दी जल्दी अपना आकर्षण खो देते हैं। शिखर बैठकर वह अपने वैभव का प्रदर्शन कर वह एक दूसरे को प्रभावित तो कर सकते हैं पर आम आदमी को नहीं।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
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Saturday, December 4, 2010

चाणक्य नीति-शास्त्र तथा उत्तम पुरुषों का मजाक उड़ाना गलत (chankya neeti in hindi-shastra aur uttam purush)

अन्यथा वेदपाण्डित्यं शास्त्रमाचारमन्यथा।
अन्यथा कुवचः शान्तं लोकाः क्लिश्यन्ति चान्यथा।।
हिन्दी में भावार्थ-
वेदों के तत्वज्ञान, शास्त्रों के विधान तथा उत्तम पुरुषों के चरित्र को मिथ्या कहने वाले लोग लोक परलोक दोनों में कष्ट उठाते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-देश में घोटालों, भ्रष्टाचार तथा अपराधों की बाढ़ आयी हुई है। टीवी चैनल देखने तथा अखबार पढ़ने से तो यही लगता है कि देश में नरक बन गया है। हैरानी की बात है कि अनेक विद्वान तथा समाज सेवक भ्रष्टाचार के विरुद्ध अभियान छेड़े हुए हैं पर परिणाम शून्य दिखाई दे रहा है। इसका कारण यह है कि भारतीय अध्यात्म का वही लोग मज़ाक उड़ा रहे हैं जो आधुनिक शिक्षा से शिक्षित हैं और उनके पास ही समाज और राज्य संचालन का दायित्व भी है। वह अपने प्रति शिष्टाचार का भाव की अभिव्यक्ति के रूप में प्रस्तुत उपहारों का भ्रष्टाचार की परिधि में ही नहीं मानते।
कहीं राम पर तो कहीं कृष्ण के चरित्र पर आक्षेप होते हैं। वेदों का मज़ाक उड़ाया जाता है तो रामायण में भी अप्रमाणिक उत्तर रामायण के हिस्से लेकर समाज पर आक्षेप किये जाते हैं। पूरा भारतीय विद्वान जगत विचारधाराओं में बंटा हुआ है पर अपने ही अध्यात्म ज्ञान से अनभिज्ञ है। भारतीय अध्यात्म का मज़ाक उड़ाने वाले तो अज्ञानी है पर उनका प्रतिकार करने वाले भी तत्व ज्ञान नहीं जानते इसलिये बहस में कमजोर पड़ जाते हैं। यही कारण है कि कुछ अल्पज्ञानी गाहे बगाहे भारतीय अध्यात्म का मज़ाक उड़ाते हैं।
हालांकि हमारे देश में धर्म के प्रति जनमानस में गहरा लगाव है पर उनके कुछ कर्मकांड अंधविश्वास की परिधि में आते हैं, पर इसी आधार पर पूरे अध्यात्म दर्शन का मखौल उड़ाना भी कम अज्ञान का प्रमाण नहीं है। मनुस्मृति को लेकर अनेक लोग बवाल करते हैं पर वह कौन हैं? क्या उन्होंने राजकीय भ्रष्टाचार पर कभी मनु संदेशों का अध्ययन किया गया है। भ्रष्टाचारियों पर दंड के विधान का मनुस्मृति समर्थन करता है पर कभी उस पर नज़र नहीं डाली गयी। कहा जाता है कि मनुस्मृति में महिलाओं और निम्न जातियों के लिये अपमान जनक संदेश है
जबकि सच तो यह है कि मनु ने यह कहा है कि जिन घरों में महिलाओं का सम्मान नहीं होता उनका जल्दी विनाश हो जाता है। योग्यता के अनुसार सभी को सम्मान देने की बात भी उसमें कही गयी है। हम अगर आज के कथित आधुनिक समाज को देखें तो क्या पश्चिमी राह पर भी चलकर क्या औरतों और निम्न जातियों का सम्मान करने लायक बन पाया?
भ्रष्टाचार में डूबे लोग और उनकी अभिव्यक्ति को शाब्दिक रूप देने वाले लिपिक कभी भी भारतीय अध्यात्म का रहस्य नहीं समझ पाये। जिनका रोम रोम भ्र्रष्टाचार और अहंकार से भरा है वही भारतीय अध्यात्म पर प्रतिकूल टिप्पणियां करते हैं। वह नहीं जानते कि समय के अनुसार बदलने की प्रेरणा केवल भारतीय अध्यात्म दर्शन में ही मिलता है।
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Saturday, November 20, 2010

पतंजलि योग विज्ञान-दूसरे के चित्त का ज्ञान होना संभव (patanjali yoga vigyan-doosre ke chitta ka gyan sanbhav)

प्रत्ययस्य परचितज्ञानम्
हिन्दी में भावार्थ-
चित्त की वृत्ति का ज्ञान होने पर दूसरे के चित्त को भी जाना जा सकता है।
न च तत्सालब्बनं त्साविषयीभूतत्वात्।
हिन्दी में भावार्थ-
किन्तु वह ज्ञान आलम्बनसहित नहीं होता क्योंकि वह योगी के चित्त का विषय नहीं है। मतलब यह कि दूसरा किसी वस्तु पर चिंतन कर रहा है इसका आभास नहीं होता।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-योगी अपने योगासन, ध्यान, प्राणायाम तथा मंत्रजाप का अभ्यास करते हुए अपने चित्त का साक्षात्कार करने लगते हैं। इस साक्षात्कार से उनके दूसरों के चित्त की भी सारी वृत्तियों का स्वरूप उनकी समझ में आ जाता है। इसी आधार पर वह अपने व्यवहार और संपर्क में पास आने वाले लोगों के चित्त की भावनाओं का आभास करने लगते हैं पर वह उसके अंदर चल रही भौतिक विषय का आभास नहीं करते। कोई व्यक्ति अपने साथ व्यवहार में बेईमान करने वाला है यह तो समझ में आ जाता है पर इससे वह कौनसा भौतिक लक्ष्य वह प्राप्त करना चाहता है इसका आभास नहीं होता। किसी ने ठगी कि या भ्रष्टाचार किया इसका पता चल जाता है पर उसने अपने लिये कौनसा सामान जुटाया यह पता नहीं लगता। मतलब यह कि दूसरे के चित्त की अभौतिक वृत्ति जानने तक ही उस ज्ञान की एक सीमा है।
प्रसंगवश हम यहां धूर्त तांत्रिकों की भी बात कर लें जो कहीं बच्चा खो जाने या धन चोरी हो जाने पर उसका पता बताते हैं। यह उनके लिये संभव नहीं है। जब बड़े बड़े योग में पूर्णता प्राप्त करने वाले योगी भी इतना भौतिक आभास नहीं पा सकते तो वह ढोंगी तांत्रिक यह काम कैसे कर सकते हैं। हां, इतना अवश्य है कि योगी अन्य मनुष्य की वाणी, चाल चलन तथा विचारों से उसके व्यक्तित्व और भावना का मूल्यांकन आसानी से कर लेते हैं और उसके अनुसार ही उससे व्यवहार और संपर्क की सीमा तय करते हैं।
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Wednesday, November 17, 2010

पतंजलि योग दर्शन-स्वशक्ति तथा स्वामीशक्ति का संयोग (patanjali yog dershan-swashakti and swamishakti ka sanyog)

स्वस्वामिशक्त्योः स्वरूपपोपलब्धिहेतुः संयोगः।
हिन्दी में भावार्थ-
स्वशक्ति और स्वामीशक्ति के स्वरूप की प्राप्ति का जो कारण है वह संयोग है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-यह सृष्टि दो तरह के आधारों पर चलती है। एक तो उसकी स्वयं की शक्ति है दूसरा जीव का अस्तित्व। इस प्रथ्वी पर अन्न उत्पादन की क्षमता है पर वह तभी उपयोग हो सकता है जब कोई जीव परिश्रम कर उसका दोहन करे। खेती या बागवानी के माध्यम से मनुष्य अन्न, फल तथा अन्य भोज्य पदार्थों को उत्पादित करता है। यह खेती और बागवानी संयोग है क्योकि यह प्रकृति तथा जीव के परिश्रम के बीच में एक ऐसी क्रिया है जो उत्पादन का कारण है।
जब हम इस बात को योग साधना, प्राणायाम तथा ध्यान के विषय में विचार करते हैं तब इसका अनुभव होता है कि हमारी देह भी एक तरह से सृष्टि है जिसकी स्वशक्ति है । उसमें हमारा आत्मा या अध्यात्म की भी शक्ति है जिसे हम स्वामीशक्ति मानते हैं। देह और आत्मा के संयोग के लिये प्रयास की आवश्यकता है जिसे हम योग साधना भी कह सकते हैं। हमारी देह में मन, बुद्धि और अहंकार रूपी प्रकृति हैं जिनका दोहन करने के लिये आसन, प्राणायाम, ध्यान तथा मंत्रजाप एक ऐसी क्रियाविधि है जो संयोग का निमित बनती है। इनसे देह के विकार निकलने के बाद वह जीवन में वैसे ही परिणाममूलक बनती है जैसे कृषि या बागवानी करने के बाद प्रथ्वी फल, फूल तथा अन्न प्रदान करती है। हमारी देह की स्वशक्ति और आत्मा की स्वामीशक्ति के स्वरूप का आभास योगसाधना के माध्यम से ही संभव है। यही कारण है कि हमारे अध्यात्म में योगासन, प्राणायाम, ध्यान तथा मंत्र जाप के साथ ही तत्व ज्ञान को जानने के प्रयास को बहुत महत्व दिया गया है।
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Sunday, November 14, 2010

विवाद न करना भी एक तरह से आसन-धार्मिक विचार (vivad n karna bhee ek tarah se asan-dharmik vichar)

क्षीणस्य चैव क्रमशो दैवात् पूर्वकृतेन वा।
मित्रस्य चानुरोधेन द्विविधं स्मृतमासनम्।।
हिन्दी में भावार्थ-
जब शक्ति क्षीण हो जाने पर या अपनी गलतियों के कारण चुप बैठना तथा मित्रों की बात का सम्मान करते हुए उनसे विवाद न करना यह दो प्रकार के शांत आसन हैं।
यदावगच्छेदायत्वयामाधिक्यं ध्रृवमात्मनः।
तदा त्वेचाल्पिकां पीर्डा तदा सन्धि समाश्चयेत्।।
हिन्दी में भावार्थ-
भविष्य में अच्छी संभावना हो तो वर्तमान में विरोधियों और शत्रुओं से भी संधि कर लेना चाहिए।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-किसी भी मनुष्य के जीवन में दुःख, सुख, आशा और निराशा के दौर आते हैं। आवेश और आल्हाद के चरम भाव पर पहुंचने के बाद किसी भी मनुष्य का अपने पर से नियंत्रण समाप्त हो जाता है। भावावेश में आदमी कुछ नहीं सोच पाता। मनु महाराज के अनुसार मनुष्य को अपने विवेक पर सदैव नियंत्रण करना चाहिये। जब शक्ति क्षीण हो या अपने से कोई गलती हो जाये तब मन शांत होने लगता है और ऐसा करना श्रेयस्कर भी है। अनेक बार मित्रों से वाद विवाद हो जाने पर उनके गलत होने पर भी शांत बैठना एक तरह से आसन है। यह आसन विवेकपूर्ण मनुष्य स्वयं ही अपनाता है जबकि अज्ञानी आदमी मज़बूरीवश ऐसा करता है। जिनके पास ज्ञान है वह घटना से पहले ही अपने मन में शांति धारण करते हैं जिससे उनको सुख मिलता है जबकि अविवेकी मनुष्य बाध्यता वश ऐसा करते हुए दुःख पाते हैं।
जीवन में ऐसे अनेक तनावपूर्ण क्षण आते हैं जब आक्रामक होने का मन करता है पर उस समय अपनी स्थिति पर विचार करना  चाहिए। अगर ऐसा लगता है कि भविष्य में अच्छी आशा है तब बेहतर है कि शत्रु और विरोधी से संधि कर लें क्योंकि समय के साथ यहां सब बदलता है इसलिये अपने भाव में सकारात्मक भाव रखते स्थितियों में बदलाव की आशा रखना चाहिए। कहने का अभिप्राय यह है कि हमेशा ही शांत होकर अपना काम करना चाहिए। शांत रहना भी एक तरह से आसन है।
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