Saturday, December 3, 2011

मलूकदास के दोहे-सुदंर शरीर देखकर बहको मत (malukdas ke dohe-sundar sharir dekhkar bahako mat)

           हमारे अध्यात्मिक ज्ञान के अनुसार इस संसार में समस्त दृश्यव्य वस्तुऐं नश्वर हैं। बाकी की बात क्या करें यह प्रथ्वी, सूर्य, चंद्रमा और अन्य ग्रह भी नश्वर माने गये हैं। आधुनिक विज्ञान भी यह मानता है कि प्रथ्वी और इस पर विचरण करने वाले समस्त जीवों के साथ ही अन्य ग्रहों का भी एक जीवन है जो अंततः नष्ट होता है। अमेरिकन वैज्ञानिकों ने तो एक ब्लैकहोल का पता भी लगाया है जो प्रतिदिन सैंकड़ों तारों को लील जाता है। कहने का अभिप्राय यह है कि यहां कुछ भी स्थिर नहीं है।
            इस संसार में विचरण करने वाले समस्त प्राणियों की देह भले ही बाहर से आकर्षण लगती है पर अगर उसे आधुनिक सूक्ष्म यंत्रों से देखा जाये तो अंदर का ढांचा अत्यंत गंदगी भरा रहता है। वहां हड्डियां, रक्त, कीचड, और मांस के टुकड़ों के साथ कीड़े मकौड़े रैंगते दिखाई देते हैं। कम से कम अंदर का दृश्य दर्शनीय नहीं होता। इतना ही नहीं समय के अनुसार सभी की देह पतन की तरफ बढ़ती जाती है। इसके बावजूद अनेक लोग सुंदर देह के अनेक दीवाने हैं। कुछ मनुष्यों को अपनी सुंदर देह पर अत्यंत अहंकार भी रहता है। हमारे अध्यात्मिक महर्षि सदैव इस तरफ ध्यान दिलाते रहे हैं कि यह मनुष्य देह जहां नश्वर है वहीं आत्मा अमर है अतः मनुष्य को योग ध्यान तथा जाप से स्वयं पर नियंत्रण करना चाहिए।
मलूकदास कहते हैं कि
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सुंदर देही देखि कै, उपजत है अनुराग।
मढ़ी न होती चाम की, तो जीवन खाते काम।।
          ‘‘मनुष्य का स्वभाव है कि वह किसी भी सुंदर शरीर को देखकर उससे प्रीति करने को लालाचित होने लगता है जबकि इसमें मांस, खून और हड्डी भरे हुए हैं। अगर इस कचड़े के ऊपर यह देह न हों तो कौऐ इसे जीते जी खाने लगें।
सुंदर देही पाइ कै, मत कोइ करै गुमान।
काल दरेरा खायगा, क्या बूढ़ा क्या जवान।।
            ‘‘सुंदर शरीर पाकर किसी को इतरना नहीं चाहिए। आदमी बूढ़ा हो या जवान काल किसी को भी खा सकता है।’’
         हम देख रहे हैं कि हमारे देश में आधुनिक शिक्षा तथा मनोरंजन के साधनों की वजह से पूरा समाज अपने अध्यात्मिक ज्ञान को भूलकर माया तथा सौंदर्य के पीछे भाग रहा है। ऐसा लगता है कि लोगों ने अक्ल के द्वारा बंद कर दिये हैं। ऐसे में भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान पर दृष्टिपात करते है तो लगता है कि अज्ञानियों का झुंड चहुं ओर फैला है। स्थिति यह है कि स्त्रियों के नग्न चित्रों को देखने के लिये लोग मरे जा रहे हैं। जिन लोगों को तत्वज्ञान है वह ऐसी स्थिति में हंसते हैं।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Wednesday, November 30, 2011

तुलसी दर्शन-वाणी और वेश से किसी को जानना संभव नहीं (tulsi darshan-vani aur vesh aur aadmi)

                  आधुनिक समाज में लोगों की नज़रों में सौंदर्य, चतुराई तथा बुद्धिमानी के मायने ही बदल गये हैं। रसायनिक पदार्थों से व्यक्तियों तथा वस्तुओं का सौंदर्य निखारा जा रहा है। बाज़ार के सौदागर तथा उनके प्रचारक मिलकर समाज की बुद्धि का हरण करते जा रहे हैं। किसी वस्तु के उपभोग को विज्ञापनो से प्रेरित करने के प्रयास में उनको आकर्षक शाब्दिक शोर तथा संगीत से इस तरह भरा जाता है कि उसके माध्यम से आम जनमानस का विवेक तथा बुद्धि का हरण किया जा सके। यही कारण है कि उपभोग की वस्तुओं के उपयोग को चतुराई माना जाता है। लोहे लकड़ी और प्लास्टिक की चीजों के रंगे होने से उनमें जो सौंदर्य उभरकर इस तरह आता है कि लोग उस पर मोहित हो जाते हैं।
संत कवि तुलसी दास जी कहते हैं कि
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बचन बेष क्या जानिए, मनमलीन नर नारि।
सूपनखा मृग पूतना, दस मुख प्रमुख विचारि।।
         ‘‘वाणी और वेश से किसी मन के मैले स्त्री या पुरुष को जानना संभव नहीं है। सूपनखा, मारीचि, रावण और पूतना ने सुंदर वेश धरे पर उनकी नीचत खराब ही थी।’’
मार खोज लै सौंह करि, करि मत लाज न ग्रास।
मुए नीच ते मीच बिनु, जे इन के बिस्वास।।
          ‘‘वह निबुर्द्धि मनुष्य ही कपटियों और ढोंगियों का शिकार होते हैं। ऐसे कपटी लोग शपथ लेकर मित्र बनते हैं और फिर मौका मिलते ही वार करते हैं। ऐसे लोगों भगवान का न भगवान का भय न समाज का, अतः उनसे बचना चाहिए।
          आधुनिक शिक्षा पद्धति में रचाबसा समाज आपनी बुद्धि तथा विवेक का इस्तेमाल करना फालतू तनाव मोल लेना समझता है। यही कारण है कि हमारे यहां दैहिक विकारों के साथ मानसिक रोगों का भी विस्तार हो रहा है। हम जब देश की जनंसख्या 121 करोड़ होने के दावे पर इतराते हैं तब इस बात की जानकारी एकत्रित नहीं करते कि उसमें शारीरिक तथा मानसिक विकारों से रहित कितने लोग हैं? मानसिक तथा दैहिक स्वास्थ्यय विशेषज्ञ देश में बढ़ रहे रोगियो की संख्या अब चालीस और पचास प्रतिशत से ऊपर बताने लगे हैं। इसका कारण यह है कि हम लोग अपने अध्यात्मिक दर्शन को प्राचीन मानकर उसकी अवहेलना करते हैं जबकि वह प्रकृत्ति तत्वों के सत्य पर आधारित है जो कभी नहीं बदलते भले ही हमारी नज़र में कथित रूप से जमाना बदल जाये।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday, November 26, 2011

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-जहां मित्र पहुंच सकते हैं वह भ्राता नहीं (kautilya ka arthshastra-friend and brother or father,mitra, pita aur bhai)

           इस संसार में सभी प्रकार के पारिवारिक तथा सामाजिक संबंधों की सीमा है। पारिवारिक संबंध जन्म के आधार पर बनते हैं तो सामाजिक लोगों के साथ बनाये जाते हैं, पर मित्रता या आत्मीय रिश्ता मनुष्य के व्यवहार, कार्य तथा विचारों से प्रकृति के अनुसार बनता है। आत्मीय या मित्रता संबंध न बनते हैं न बनाये जाते हैं बल्कि प्रकृति ही मनुष्य के सामने उनको उपस्थित करती है। जहां पारिवारिक संबंध सामाजिक आधारों पर कभी इच्छा से तो कभी मन की बाध्यता की वजह से निभाये जाते हैं वही प्रकृति निर्मित मित्रता तथा आत्मीय संबंध निभाने की कोई अनिवार्यता नहीं होती। इसके बावजूद आदमी जिससे मित्रता करता है उसके प्रति बिना किसी फल के मित्रता का निर्वाह करने को तैयार रहता है। कई बार स्थिति यह होती है कि विपत्ति आने या विशेष काम उपस्थित होने पर जहां परिवार के सदस्य या रिश्तेदार सहयोग करने नहीं पहुंच सकते वहां मित्र अपनी भूमिका निभाने के लिये तत्पर हो जाते हैं।
           फिर आज के समय जब भौतिकता का बोलबाला है और लोग अपनी रोटी रोटी कमाने के लिये अपने शहरों से पलायन कर दूसरी जगह बस रहे हैं। इससे उनके पारिवारिक तथा सामाजिक संबंधों से दूरी बन जाती है। कहा भी जाता है कि जो देह से दूर है वह दिल से भी दूर है। इसके अलावा महिलाओं के विवाह भी अपने शहरों से दूर दूसरे शहरों में काम कर रहे पुरुषों होते हैं, तब परिवार और रिश्तेदार उनसे दूर हो जाते हैं। इसलिये  उनको प्रकृत्ति निर्मित बाह्य संबंधों पर निर्भर होना पड़ता है। जब किसी खास अवसर पर पारिवारिक लोग उनको महत्व अधिक मिलते देखते हैं तो दुःखी हो जाते हैं। कुछ लोग ताने भी देते हैं पर वह इस सत्य को नहीं समझते कि आदमी अपनी देह की आवश्यकताओं के कारण उन मैत्री और आत्मीय संबंधों पर निर्भर रहता है जहां पारिवारिक तथा सामाजिक रिश्तेदार काम नहीं करते।
कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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न तत्र विष्ठति भ्राता न पितोऽयोऽपि वा जनः।
पुंसामापत्प्रत्तीकार सन्मित्रं यत्र तिष्ठति।।
          ‘‘जहां किसी आदमी पर आपत्ति आने पर मित्र पास आकर उसे दूर कर सकता है वहां भ्राता, पिता तथा अन्य आत्मीय जन पहुंच भी नहीं सकता।
प्रकाशपक्षग्रहणं न कुर्यात्सहृदां स्वयंम्।
अन्योन्यमत्सरंवषा स्वयमेवाशं धारवेत्।।
           ‘‘अपने प्रियजनों का पक्ष कहीं भी स्वयं प्रकट रूप से न लें बल्कि गुप्त रूप से किसी को इसके लिये प्रेरित कर इस कार्य को संपन्न करें।’’
            वैसे संबंध चाहे पारिवारि हो या सामजिक हों या मैत्री वाले उनका कहीं अगर पक्ष रखना हो तो स्वयं यह काम न करें बल्कि किन्हीं अन्य लोगों से परस्पर सहयोग के आधार पर उनसे यह काम करवायें। बदल में आप उनका ऐसा ही काम करें। कहीं वाद विवाद या किसी अनुबंध के अवसर पर आप अपने आदमी का पक्ष रखेंगे तो यह माना जायेगा कि आप तो उसका पक्ष लेंगे ही इसलिये उसका महत्व कम हो जाता है।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Tuesday, November 22, 2011

तुलसीदास के दोहे-दूसरे की अपकीर्ति करने वाले के मुख पर कालिख लगी नजर आती है (tulsidas ke dohe-doosre ke ninda karne valon ka munh kala)

           सामान्य मनुष्य अपनी प्रकृतियों के वशीभूत होकर काम करता है, जबकि ज्ञानी मनुष्य उनको पहचानते हुए अपने विवेक से किसी काम को करने या न करने का निर्णय लेता है। देखा जाये तो समाज में ज्ञानी मनुष्य अत्यंत कम होते हैं पर दूसरे की अपकीर्ति के माध्यम से स्वयं की कीर्ति अपने मुख से बखान करने वालों की संख्या बहुत होती है। उससे भी अधिक संख्या तो दूसरों की निंदा करने वालों की होती है जो यह मानकर चलते हैं कि दूसरे के दोष गिनाकर हम यह साबित कर सकते हैं कि हमारे पास गुण है।
          आपसी वार्तालाप में लोग एक दूसरे से कहते हैं कि ‘‘अमुक आदमी में वह दोष है’, ‘अमुक आदमी यह बुरा काम करता है’, अमुक आदमी इस तरह का गंदा विचार पालता है’, या फिर ‘अमुक आदमी गंदा भोजन खाता है या पानी पीता है’। इस तरह आदमी यह साबित करना चाहता है कि अमुक बुराई ये वह स्वयं दोषमुक्त है। ज्ञानी आदमी अपना आत्ममंथन करता है। वह दूसरों की बजाय अपनी कमियां ढूंढकर उनको दूर करने का प्रयास करता है।
महाकवि तुलसीदास कहते हैं कि
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‘तुलसी’ जे कीरति चहहिं, पर की कीरति खोइ।
तिनके मुंह मसि लागहैं, मिटिहि न मरिहै धोइ।।
         ‘‘दूसरों की निंदा कर स्वयं प्रतिष्ठा पाने का विचार ही मूर्खतापूर्ण है। दूसरे की अपकीर्ति कर अपनी कीर्ति गाने वालों के मुंह पर ऐसी कालिख लगेगी जो कितना भी धोई जाये मिट नहीं सकती।’’
तनु गुन धन महिमा धरम, तेहि बिनु जेहि अभियान।
तुलसी जिअत बिडम्बना, परिनामहु गत जान।।
        ‘‘सौंदर्य, सद्गुण, धन, प्रतिष्ठा और धर्म भाव न होने पर भी जिनको अहंकार है उनका जीवन ही बिडम्बना से भरा है। उनकी गत भी बुरी होती है।
          सच बात तो यह है कि आधुनिक समय में आदमी धन, प्रतिष्ठा और बाहुबल अर्जित करने के प्रयास में लगा रहता है। न उसके व्यक्तित्व में आकर्षण न व्यवहार में गुण दिखता हैं और न ही व्यसनों की वजह से प्रतिष्ठा और धन भी उसके स्थिर रहता है। इसके बावजूद अधिकतर लोगों के पास अहंकार होता है। जो लोग जुआ, शराब या यौन अपराधों में लिप्त होते हैं उनको अगर नैतिकता का उपदेश दिया जाये तो वह उत्तेजित होते हैं। इतना ही नहीं अनेक लोग तो ऐसे हैं जो अपने में ढेर सारे दोष होने के बावजूद दूसरों की निंदा में लगकर अपनी स्थिति हास्यास्पद बना देते हैं।
ज्ञानी आदमी इन सबसे परे होकर जीवन व्यतीत करता है। उसे मालुम होता है कि गुण और ज्ञान के संचय के लिये समय कम होता है तब परनिंदा में उसे नष्ट करना बेकार है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday, November 19, 2011

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-मद्यपान मनुष्य को पशु बना देता है

             शराब पीना एक ऐसा व्यसन है जिससे अनेक दोष पैदा हो जाते हैं। आजकल शादी तथा अन्य कार्यक्रमों पर शराब का फैशन आम हो गया है। अध्यात्मिक ज्ञान से परे समाज इसके दोषों को नहीं जानता। इससे जो मानसिक और शारीरिक विकार पैदा होते हैं इसकी तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता। वैसे तो हमारे देश में मद्यपान प्राचीनकाल से प्रचलित रहा है पर इस तरह कभी समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग इसकी चपेट में रहा होगा यह कल्पना करना कठिन है। हमारे यहां पाश्चात्य सभ्यता के आगमन के साथ ही इसका प्रचलन बढ़ता जा रहा है। अंग्रेजी शराब और दवाओं के बीच फंसे भारत के अधिकतर लोग अध्यात्मिक ज्ञान के बिना यह नहीं जान सकते कि इस शरीर में ही वह तत्व मौजूद हैं जो कोई विकार नहीं आने देते और आ भी जायें तो उनका निवारण भी वही करते हैं। इसके लिये आवश्यक है कि योग विज्ञान का अध्ययन किया जाये
कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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गमनं विह्वलत्बञ्व संज्ञानाशो विवस्त्रता।
असम्बंधप्रलापित्वकस्माद्वयसनं मुहुः।।
प्राणाग्लानि सहृदन्नाशः प्रजाश्रृतिमतिभ्रमः।
सद्धिर्वियोगोऽसद्धिश्व संगोऽनर्ष्टोन संगमः।।
स्खलनं वेपथुस्तन्द्र नितांतस्त्रीन्विेषणं।
इत्यादिपानव्यसनम्तयंतं सद्विगर्हितं।।
          ‘‘चलते और घूमते रहना, व्याकुलता,संज्ञानाश वस्त्ररहित होना, वृथा, बकवास या प्रलाप करना और अकस्मात् व्यसन में पड़ना’’
       ‘‘अपने मन में ग्लानि करना, मित्रों का नाश, बुद्धि, शास्त्र और मति में भ्रम होना, तत्पुरुषों से वियुक्त रहना, असत्पुरुषों की संगति करना, अनर्थो की संगत में पड़ना’’
         "पद
पद पर स्खलित होना, शरीर में कपंना होना, तन्द्रा तथा स्त्रियों के प्रति अत्यधिक आकर्षित होना, यह सब मद्यपान के व्यसन है। इनकी इसलिये निंदा की जाती है।
        अनेक लोग तो ऐसे हैं जो शराब पीना नहीं छोड़ना चाहते वह इससे उत्पन्न शारीरिक दोषों के निवारण के लिये ऐसे पदार्थों का सेवन करते है जो अधिक विषैले होते हैं। इससे जो मानसिक हानि होती हैं इसका आभास किसी को नहीं है। इतना ही नहीं जिस समाज को दिखाने के लिये वह शराब पीते हैं उसमें उनकी छवि कितनी खराब हो रही है यह भी नहीं जानते। हमारे अध्यात्म ग्रंथ इस बात की जानकारी देते हैं कि अंततः मद्यपान मनुष्य का मनुष्यत्व लीलकर उसे पशु बना देते हैं।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Wednesday, November 16, 2011

भर्तृहरि नीति शतक-चीजों का मोल गरीब और अमीर के लिए अलग अलग होता है

             इस संसार में अनेक वस्तुएं हैं और धनी और निर्धन दोनों ही उसे पाना चाहिते हैं पर समय और हालात के अनुसार उनका मोल के साथ महत्व में भी अंतर होता है। मनुष्य का यह स्वभाव है कि वह अगर धनार्जन करता है तो उसे व्यय के लिये भी तत्पर रहता है। जैसे जैसे उसके पास धन संपदा बढ़ती है अपना वैभव दिखाने के लिये वह उतना ही उतावला होता हैै। अगर कोई अल्पधनी अपनी मेहनत से धनवान हो जाता है तो उसे इस बात की प्रसन्नता कम होती है बल्कि वह इस चिंता को अधिक पाल लेता है कि वह अपने वैभव का प्रदर्शन समाज के सामने कर अपनी गरीब की छवि से मुक्ति पाये।
         नवधनाढ्य आदमी समाज के सामने अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने कें लिये अनेक पदार्थों का संचय करता है। अपनी चाल ढाल से वह यह सिद्ध करने का प्रयास करता है कि वह अब धनवान हो गया है। यही कारण है कि हमारे देश में धनवानों की बढ़ती संख्या के कारण भौतिक पदार्थों के संचय के साथ ही विलासिता का प्रदर्शन भी तेज हो गया है।
भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि
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परिक्षीणः कश्चित्स्पृहयति यवानां प्रसृतये स पश्चात्सम्पूर्णः कलयति धरित्रीं तृणसमाम्।
अतश्चानैकान्त्याद् गुरु लघुतयाऽर्थेषु धनिनामवस्था वस्तुनि प्रथयति च संकोचयति च।।
         ‘‘जब मनुष्य गरीब होता है तब वह अपने रहने के लिये एक गज जमीन की चाहत करता है पर जब अमीर होने पर वही पूरे भूमंडल की कामना करने लगता है। इस संसार में अनेक पदार्थ हैं और अमीरी गरीबी के अनुसार उनको पाने की कामना बदलती रहती है। वस्तुओं का महत्व भी मनुष्य की आर्थिक स्थिति के अनुसार बदलता रहता है।"
            जहां तक धन कम या ज्यादा होने का सवाल है तो यह त्रिगुणमयी माया अपने रंग रूप इंसान को इस तरह दिखाती है कि वह उसी को ही सत्य मानकर उसके इर्दगिर्द घूमता रहता है। अपनी आत्मा और परमात्मा विषयक अध्यात्म ज्ञान उसके लिये सन्यासियों का विषय होता है। धन न होने पर आदमी अपने सांसरिक संघर्ष में निरंतर व्यस्त रहता है इसलिये सत्संग तथा ज्ञान चर्चा उसके लिये दूर की कौड़ी हो जाती है तो धन आने पर आदमी ऐसे सात्विक स्थानों पर भी अपने राजस भाव का प्रदर्शन बहुत उत्तेजना के साथ करता है जहां अध्यात्मिक विषयक विचार हो रहा है। मजे की बात यह है कि धनवान लोगों को यह भ्रम रहता है कि उनके पास अध्यात्मिक ज्ञान है वह उसका बखान भी करते हैं। यह अलग बात है कि उनकी वाणी के पीछे ज्ञान का नहीं  वरन् धन का ओज होता है। उनके सामने प्रस्तुत लोग ज्ञान बघारते समय भले कुछ न कहें पर पीठ पीछे  उन पर हंसते हैं। वजह साफ है, ज्ञान का प्रमाण भौतिक पदार्थों की उपलिब्ध नहीं वरन! उनका त्याग है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Sunday, November 13, 2011

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-घमंड या मजाक में भी प्रकृति व्यसन की उपेक्षा नहीं करना चाहिए

कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
प्रकृतिव्यसनानि भूतिकामः समुपेक्षेत नहि प्रमाददर्पात।
प्रकृतिव्यसनान्युपेक्षते यो न चिरातं रिपवःपराभतवन्ति।।
           ‘‘भौतिक वस्तुओं की प्राप्ति से आने मस्तिष्क में आने वाले प्रमाद या अपनी स्थिति से उत्पन्न होने वाले दर्प के कारण प्रकृति के व्यसनों की उपेक्षा नहीं करना चाहिए। प्रकृति के व्यसनों की अपेक्षा करने वालों की स्थिति खराब हो जाती है।
राजा स्वयव्यसनी राज्यव्यसनापीह्न्क्षमः।
न राज्यव्यसनापोहसमर्थ राज्यपूर्जितम्।।
"जो राज्य प्रमुख स्वयं व्यसनों से रहित हो वही प्रजा के व्यसनों को दूर कर सकता है अन्यथा वह अपने अपने विशाल राज्य को विपत्तियों और व्यसनों से बचा नहीं सकता।"
                वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-कौटिल्य का अर्थशास्त्र एक बृहद राजनीतिक सिद्धांतों का भंडार है। हम में से अधिकतर लोग राजनीति को केवल राजकाज से जुड़ा विषय मानते हैं जबकि राजनीति का अर्थ है राजस कर्म की प्रक्रिया से जुड़ना। देखा जाये तो इस संसार में फल की इच्छा से किया गया हर कर्म राजस प्रवृत्ति से जुड़ा है इसलिये शायद पहले के अनेक महान ऋषियों ने राजस बुद्धि के उपयोग तथा उस पर नियंत्रण के सिद्धांतों का प्रतिपादन करते हुए इस बात का ध्यान रखा कि उसका राजा और प्रजा दोनों ही पालन करें। जिस तरह राज अपनी प्रजा को अपनी प्रजा पर नियंत्रण करना होता है उसी तरह परिवार के मुखिया को भी अपने आश्रित सदस्यों को भी पालना होता है। ऐसे में दोनों को ऐसे सिद्धांतों का पालन करना पड़ता है जो राजस कर्म को भली प्रकार संपन्न करने में सहायक होते हैं। उनके अनुसार राज्य या परिवार प्रमुख को अपनी आदतों, विचारों तथा बुद्धि पर नियंत्रण करना चाहिए तभी वह अपने अंतर्गत रहने वाले लोगों पर नियंत्रण कर सकते हैं।
           देखा यह गया है कि शक्ति के मद में आदमी अनियंत्रित होकर मदमस्त होकर चलता है। ऐसे में हादसें होने की संभावना बढ़ जाती है पर इस विषय पर कोई नहीं सोचता। इतना ही नहीं धन, बल और प्रतिष्ठा अधिक होने पर आदमी पागल तक हो जाते हैं और अपनी बकवास को ब्रह्म वाक्य की तरह व्यक्त करते हैं। धन संग्रह तथा मनोरंजन की चाहत से आजकल लोगों ने अपनी निद्रा तक का त्याग कर दिया है। प्रातः उठना तो एक तरह से पुराना फैशन हो गया है। परिणाम यह हुआ है कि हमारे देश का अभिजात्य वर्ग राजरोगों का शिकार हो गया है। ऐसे में मनुष्य दिखने में भले ही मनुष्य लगता है पर उसका जीवन पालतु पशुओं की तरह हो गया है। जिस तरह पशु पालतु अपने मालिक की मर्जी से चलते हैं वैसे ही आजकल लोग उपभोग की वस्तुओं के दास हो गये हैं। राजा हो या प्रजा, पिता हो या पुत्र या मात हो या पुत्री सभी अनियंत्रित हो गये हैं। फिर भी सभी को ऐसा नहीं माना जा सकता। ऐसे ज्ञानी लोग जिनको पता है कि किसी वस्तु का उपभोग करना और उसे व्यसन की तरह उपयोग में लाने की प्रक्रिया में अंतर है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Tuesday, November 8, 2011

यजुर्वेद से संदेश-नारी को पुरुष से न डरना चाहिए न कांपना (yajurved se sandesh-nari ko purush se darana nahin chahiye

             कहा जाता है कि हमारे वेदों में नारी को हेय समझा गया है। इतना ही नहीं कुछ लोग तो इसी कारण वेदों को पठनीय मानकर उनका तिरस्कार करते हैं।  जबकि इस बात ज्ञानी ही जानते हैं कि वेदों में ही स्त्री के बिना पुरुष और पुरुष के बिना स्त्री का संसार नीरस होने की बात बताई गयी है। वेदों में स्त्री को छुईमुई बने रहने की बजाय शक्तिशाली और पराक्रमी बनने की बात कहीं जाती है। धर्म का आधार स्त्री और पुरुष दोनों एक ही समान है इसलिये किसी भी पुरुष के साथ योग्य स्त्री होने पर उसे जीवन संघर्ष में पार लगा देती है। जो पुरुष अपनी स्त्री को हेय मानकर उनको पराक्रमी या शक्तिशाली नहीं बनने देते वह स्वयं ही कष्ट उठाते हैं।
यजुर्वेद में कहा गया है कि
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मां भेर्मा सं विवस्था उर्ज हात्स्व धिषणे वीड्वी सती वीऽयेथासूर्ज दधाधाम्।
पाम्पा हतो न सोमः।।
            ‘‘हे नारी, तुम दैहिक शक्ति से युक्त हो जाओ, पति से न डरो न कांपो बल्कि पराक्रम धारण कर। तुम दोनों स्त्री पुरुष पराक्रमी होकर बल धारण करो। उत्तम व्यवहार से दोनों अपने दोष दूर कर चंद्रमा के समान गुणी बनकर अपना जीवन आनंदित करो।’’    
          आजकल हम नारी जाति में आये बदलाव के लिये पश्चिमी संस्कृति को श्रेय देते नहीं थकते जबकि सच यह है कि यह हमारे खून में ही है कि समय के अनुसार हमारा समाज विकास के पथ पर चलता है।  यह अलग बात है कि हमारे देश के समाज पर नियंत्रित करने वाले समूह चाहते हैं कि भारतीय समाज वेदों, उपनिषदों तथा अन्य महाग्रंथों से दूर रहे ताकि वह पश्चिम का ज्ञान यहां बघारकर अपने आधुनिक होने के साथ ही शक्ति केंद्रों पर अपना नियंत्रण बनाये रखें।  कहा जाता है कि इन वेदों की रचनाऐं ऋषियों ने की तो पर यह भी  कहा जाता है कि इसमें स्त्रियों का भी योगदान रहा है। इसी कारण इसमें लिखे गये श्लोंको ऋचायें कहा जाता है। ऋषि शब्द पुरुष के लिये तो ऋचायें शब्द स्त्रियों के लिये प्रयुक्त हुआ है। महर्षियों के कथनों को ऋचाओं ने लिखा इसी कारण संस्कृत में रचे गये इन रचनाओं को ऋचायें भी कहा जाता है। कहने का अभिप्राय यह है कि वेदों में कही गयी बातों का गूढ़ अर्थ है पर इसे सहजता से ज्ञानी लोग ही समझ पाते हैं। अज्ञानियों के लिये तो यह काला अक्षर भैंस बराबर है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Sunday, November 6, 2011

वेदांत दर्शन-परमात्मा के स्वरूप पर कोई विरोध नहीं (vedant darshan-parmatma ke swaroop ka virodh nahin)

              विश्व में अनेक धर्म हैं। इनसे जुड़े धर्म समुदायों में भी विभाजन हो चुका है। विदेशों में प्रवर्तित धर्म और उसके समुदाय को वर्तमान में अध्ययन करें तो पायेंगे कि वह दो तीन तो कहीं चार भागों में बंट गये हैं। उनके धर्मगुरु अपने अनुयायियों को दूसरे धर्म के लोगों का भय दिखाकर भले ही अपने पाले में रखते हैं पर फिर भी उनके आपसी हिंसक संघर्ष होते रहते हैं। एक ही धर्म का एक समुदाय अपने को असली एवं शुद्ध बताता है तो दूसरे समुदाय को दुष्ट कहता है। इसके विपरीत भारतीय धर्मों में विभिन्न समुदाय होने के बावजूद कहीं आपसी संघर्ष का इतिहास नहीं है। सभी धर्म और उनके प्रवर्तक यह मानते हैं कि परमात्मा अनंत है। उसको साकार रूप से भले ही न देखा जाये पर ध्यान, योग तथा भक्ति के माध्यम से उसकी उपस्थिति की अनुभूति अपने हृदय में की जा सकती है। यह बात सही है कि लोग अपनी सुविधा के अनुसार साकार तथा निराकार भक्ति करते हैं पर एक दूसरे के प्रति उनमें आदरभाव रहता है। यहां तक कि एक ही परिवार में अनेक सदस्यों का अलग अलग इष्ट देव होता है पर मूल रूप से यह सभी मानते हैं कि परमात्मा एक है। इस पर कहीं कोई विवाद न होता है न होना चाहिए।
हमारे वेदांत दर्शन में कहा गया है कि
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साक्षादष्विरोधं जैमिनि।
            ‘‘शब्द को साक्षात् परब्रह्म मानने में भी कोई विरोध नहीं है ऐसा जैमिनि आचार्य मानते हैं।
अभिव्यक्तेरित्याश्मरथ्यः।
              ‘‘देश विशेष में ब्रह्म का प्रकट रूप होता है इसलिये इसमें कोई विरोध नहीं है।’’
‘‘अनुस्मृतेर्बादरिः।
             ‘‘ऐसा बादरि नामक आचार्य मानते हैं।
         कहने का अभिप्राय यह है कि भक्ति के स्वरूप या परमात्मा के अस्तित्व को लेकर भले ही आपस में मतभेद हों पर मनभेद नहीं होना चाहिए। इसके अलावा किसी की भक्ति की प्रक्रिया और परमात्मा के रूप पर भी प्रतिकूल टिप्पणियां न करना ही उचित है। हमारा अध्यात्मिक दर्शन मानव मन की व्यापकता का चिंतन करते हुए नित नये सिद्धांतों का प्रतिपादन करता है। हमारे यहां समय समय पर ऐसे महापुरुष भी इस धरती पर प्रकट होते हैं जो भले ही किसी धर्म या समुदाय के हों पर उनको सारा देश बाद में देवत्व का दर्जा प्रदान करता है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

Thursday, November 3, 2011

यजुर्वेद से संदेश-अज्ञानी लोग ज्ञान अधिक बघारते हैं (yajurved se sandesh-agyani log gayn gagharte hain)

         हमारे देश का अध्यात्म ज्ञान अनेक ग्रंथों में वर्णित है। इन ग्रंथों में सकाम तथा निष्काम दोनों प्रकार की भक्ति के सिद्धांतों का प्रतिपादन किया गया है। कर्म और फल के नियमों का उल्लेख किया गया है। यह अंतिम सत्य है कि हर मनुष्य को अपने ही कर्म का फल स्वयं भोगना पड़ता है। कोई व्यक्ति भी किसी की नियति और फल को बदल नहीं सकता। यह अलग बात है कि समस्त ग्रंथों का अध्ययन करने के बावजूद अनेक लोग उसका ज्ञान धारण नहंी कर पाते पर सुनाने में सभी माहिर हैं।
        हमारे देश का तत्वज्ञान प्रकृत्ति और जीवन के मूल सिद्धांतों पर आधारित एक विज्ञान है। इस संबंध में हमारे अनेक प्राचीन ग्रंथ पठनीय है। यह अलग बात है कि उनका रटा लगाने वाले अनेक लोग अपने आपको महान संत कहलाते हुए मायापति बन जाते हैं। उनके आश्रम घास फूस के होने की बजाय पत्थर और सीमेंट से बने होते हैं। उसमें फाइव स्टार होटलों जैसी सुविधायें होती हैं। गुरु लोग एक तरह से अपने महल में महाराज की तरह विराजमान होते हैं और भक्तों की दरबार को सत्संग कहते हैं। तत्वज्ञान का रट्टा लगाना उसे दूसरों को सुनाना एक अलग विषय है और उसे धारण करना एक अलग पक्रिया है।
               इस विषय पर यजुर्वेद में कहा गया है कि
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            नीहारेण प्रवृत्त जल्प्या चासुतृप उम्थ्शासरचरन्ति
‘‘जिन पर अज्ञान की छाया है जो केवल बातें बनाने के साथ ही अपनी देह की रक्षा के लिये तत्पर हैं वह तत्वज्ञान का प्रवचन बकवाद की तरह करते हैं।’’
        तत्वज्ञानी वह नहीं है जो दूसरे को सुनाता है बल्कि वह है जो उसे धारण करता है। किसी ने तत्वज्ञान धारण किया है या नहीं यह उसके आचरण, विचार तथा व्यवहार से पता चल जाता है। जो कभी प्रमाद नहीं करते, जो कभी किसी की बात पर उत्तेजित नहीं होते और सबसे बड़ी बात हमेशा ही दूसरे के काम के लिये तत्पर रहते हैं वही तत्वाज्ञानी हैं। सार्वजनिक कार्य के लिये वह बिना आमंत्रण के पहुंच कहीं भी मान सम्मान की परवाह किये बिना पहंच जाते हैं और अगर कहीं स्वयं कोई अभियान प्रारंभ करना है तो बिना किसी शोरशराबे के प्रारंभ कर देते हैं। लोग उनके सत्कर्म से प्रभावित होकर स्वयं ही उनके अनुयायी हो जाते हैं।
        इसके विपरीत अज्ञानी और स्वार्थी लोग तत्वज्ञान बघारते हैं पर उसे धारण करना तो दूर ऐसा सोचते भी नहीं है। किसी तरह अपने प्रवचन करते हुए आम लोगों को भ्रम में रखते हैं। वह उन कर्मकांडों को प्रोत्साहित करते हैं जो सकाम भक्ति का प्रमाण माने जाने के साथ ही फलहीन माने जाते हैं। अतः जिन लोगों को अध्यात्म में रुचि है उनको अज्ञानी और अज्ञानी की पहचान उस समय अवश्य करना चाहिए जब वह किसी को अपना गुरु बनाते हैं।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Thursday, October 27, 2011

अथर्ववेद से संदेश-ॐ (ओम) शब्द अनिष्टों को दूर करता है (ॐ -om)- shabd good for life-atharvaved se sandesh

             श्रीमद्भागवत गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि अक्षरों में परम अक्षर ओम है। अनेक अध्यात्मिक विद्वान भी यह मानते हैं कि ओम शब्द के जाप से देह के समस्त अंग सक्रिय होने के साथ उत्साहित हो उठते हैं। यही कारण है कि अनेक योग साधक आसन, ध्यान और प्राणायाम के बाद ओम शब्द का जाप करते हैं। यह योग साधना के दौरान देह के विकार रहित होने के साथ ही मन की पवित्रता और विचारों की जो शुद्धि प्राप्त होती है उसे आत्मिक स्थिरता प्रदान करता है। ओम अत्यंत सूक्ष्म शब्द है पर जाप करने पर देह के स्वास्थ्य, मन की पवितत्रता और विचारों की शुद्धता कर उनको व्यापक रूप प्रदान कर यह मनुष्य के व्यक्तित्व को बाह्य रूप से तेजस्वी बनाता है।
अथर्ववेद में कहा गया है कि
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त्रयः सुवर्णासिवृत यदायत्रेकाक्षरमभि-संभूय शका शका।
प्रत्योहन्मृत्युमृतेन साकसन्तदंधाना दुरितानी विश्वा।।
     ‘‘जब समर्थ तीन स्वर्ण एक अक्षर में तिहरे होकर मिल रहे हें तब वह अमृत के साथ सब अनिष्टों को मिटाकर मृत्यु को दूर करते हैं।’’
            अध्यात्म के साथ स्वास्थ्य के विशेषज्ञों का मानना है कि मौन होकर सुखपूर्वक बैठने के बाद अपनी वाणी ने ॐ (ओम)शब्द का जाप करना अत्यंत श्रेयस्कर है क्योंकि इस दौरान मनुष्य का ध्यान शनैः शनै अपनी नियमित दिनचर्या से हटकर निरंकार परमात्मा में लग जाता है। इससे मनुष्य में मनोविज्ञानिक रूप से दृढ़ता आती है। ओम दो नहीं तीन शब्द हैं-अ उ म। इस तरह प्रत्येक शब्द को एक एक करके वाणी से इस तरह उच्चारित करना चाहिए कि पहले शब्द अ और तीसरे शब्द म में जितना समय लगे उससे आधा दूसरे शब्द उ में लगे। इस तरह ध्यान की शक्ति का संचार होता है जो कि आत्मिक रूप से पुष्ट होने में सहायक होती है। यही कारण है कि भारतीय अध्यात्मिक साधक ओम शब्द के उच्चारण को अत्यंत सावधानी और ध्यान से उच्चारित करते हैं। जितनी गहराई से ओम शब्द उच्चारित किया जाता है उतना ही तेज शनैः शनैः मनुष्य की वाणी, विचार, और व्यवहार में उसका तेज प्रकट होता है।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Sunday, October 23, 2011

पतंजलि योग सूत्र-अहिंसा के भाव के समक्ष सभी प्राणी वैर त्याग देते हैं (patanjali yoga sootra-ahinsa ke bhav ke samne sabhi parani tyag dete hain)

              श्रीमद्भागवत गीता में बताया गया है कि इस संसार के सारे पदार्थ परमात्मा के संकल्प के आधार पर स्थित पर वह उनमें नहीं है। यहां इस बात को स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है कि इस संसार के देहधारी जीव के संकल्प से गहरा संबंध है क्योंकि वह अंततः उसी परमात्मा का अंश हैं। इसलिये जीव भले ही इस संसार और भौतिक पदार्थों को धारण करे वह उसमें अपना भाव लिप्त न करे। हम अगर योग साधना और ध्यान करने के साथ श्रीमद्भावगत गीता का अध्ययन करें तो धीरे धीरे यह बात समझ में आने लगेगी कि यह संसार की प्रकृति और इसमें स्थित समस्त पदार्थ न बुरे हैं न अच्छे, बल्कि वह हमारे संकल्प के अनुसार कभी प्रतिकूल तो कभी अनुकूल होते हैं। इसलिये हम अपने हृदय के अंदर अहिंसा, त्याग, तथा परोपकार के संकल्प धारण करें तो यह सारा संसार और पदार्थ हमारे अनुकूल हो जायेंगे। 
पतंजलि योग साहित्य में कहा गया है कि
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अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः।
           ‘‘हृदय में अहिंसा का भाव जब स्थिर रूप से प्रतिष्ठ हो जाता है तब उस योगी के निकट सब प्राणी वैर का त्याग कर देते हैं।
अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम्।
‘‘हृदय जब चोरी के भाव से पूरी तरह रहित हो जाता है तब उस योगी के समक्ष सब प्रकार के रत्न प्रकट हो जाता है।’’
          अधिकतर लोग यह तर्क देते हैं कि यह संसार बिना चालफरेब के चल नहीं सकता। यह लोगों की मानसिक विलासिता और बौद्धिक आलस्य को दर्शाता है। एक तरह से यह मानसिक विकारों से ग्रसित लोगों का अध्यात्मिक दर्शन से परे एक बेहूदा तर्क है। हम यह तो नहीं कहेंगे कि सारा समाज ही मानसिक विकारों से ग्रसित है पर अधिकतर लोग इस मत के अनुयायी हैं कि जैसे दूसरे लोग चल रहे हैं वैसे ही हम भी चलें। कुछ लोग ऐसे जरूर हैं जो इस सत्य को जानते हैं और अपने देह, हृदय तथा मस्तिष्क से विकारों की निकासी कर अपना संकल्प शुद्ध रखते हुए अपना जीवन शंाति से जीते हैं। ऐसे लोगों संख्या में नगण्य होते हैं पर समाज के लिये वही प्रेरणास्त्रोत होते हैं।
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Sunday, October 16, 2011

ऋग्वेद से संदेश-ज्ञानी लोग मन प्रसन्न रखने वाले ही काम करते हैं (rigved se sandesh-gyani log man ko prasanna rakhne vale kam karte hain)

             सामान्य मनुष्य अनेक बार परिवार, मित्र तथा समाज के दबाव में अनेक बार ऐसे कार्य करते हैं जिससे उनका स्वयं का मन उद्विग्न हो उठता है। इसके विपरीत ज्ञानी हमेशा ही अपने मन को प्रसन्न करने वाले ही कर्म करते हैं। यह बात हम धार्मिक कर्मकांडों अवसर पर देख सकते हैं जब परिवार, समाज तथा मित्रों के दबाव में आदमी उनका निर्वाह करता है यह जानते हुए भी यह ढकोसला है। खासतौर से विवाह, गमी तथा अन्य कार्यक्रमों के समय दिखावे के लिये ऐसे अनेक कर्मकांड रचे गये हैं जिनको केवल दिखावे के लिये ही धर्म का प्रतीक माना जाता है। हमारे अनेक महान विद्वानों ने धार्मिक कर्मकांडों तथा अध्यात्मिक ज्ञान के अंतर को स्पष्ट किया है। यह अलग बात है कि समाज में उनका नाम को सम्मान दिया जाता है पर उनके संदेश कोई नहीं मानता। यही कारण है कि जब किसी के घर में शादी या गमी का अवसर आता है तो वह अपना सुख दुःख भूलकर केवल अपनी जिम्मेदारी निभाने का तनाव झेलता है। उसके मन में यही ख्याल आता है कि ‘अगर मैंने यह नहीं किया तो लोग क्या कहेंगे’।
ऋग्वेद में कहा गया है कि
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श्रिय मनांसि देवासो अक्रन्
‘‘ज्ञानी निज अपने हृदय को प्रसन्न करने वाले कर्म करते हैं।’’
सुवीर्यस्य पतयः स्याम।
‘‘हम उत्तम बल के स्वामी बनें।’’
अगर मनुष्य चाहे तो स्वयं को योगसाधना तथा अध्यात्मिक ग्रंथों के अध्ययन से मानसिक रूप से दृढ़ होने के साथ ही दैहिक रूप से बलवान भी बना सकता है। हमारे हिन्दू धर्म की पहचान उसके कर्मकांडों से नहीं वरन् उसमें वर्णित तत्वज्ञान से है जिसका लोह आज पूरा विश्व मानता है। अगर हम अपने अंदर कर्मकांडों के निर्वहन का तनाव पालेंगे तो कभी शक्तिशाली नहीं बन सकते। जहां धर्म से कुछ पाने का मोह है वहां सिवाय तनाव के कुछ नहीं आता। मन में धर्म के प्रति त्याग का भाव हो तो स्वतः मन स्फूर्त हो जाता है। इस त्याग को भाव को तभी समझा जा सकता है जब हम परोपकार, ज्ञान संग्रह तथा हृदय से भगवान की भक्ति करेंगे।
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Friday, October 14, 2011

अथर्ववेद से संदेश-ब्रह्मज्ञानी कभी आलस्य नहीं करते (atharvaved se sandesh-brahmagyani ko alsya nahin karna chahiey)

             हमारे देश में धर्मभीरु व्यक्तियों की कमी नहीं है मगर अध्यात्मिक ज्ञान को समझने वालों का टोटा है। अक्सर कुछ लोग ऐसे हैं जो अध्यात्मिक ज्ञान की बात करने वाले से कहते हैं कि ‘तू सन्यासी हो जा‘ या फिर कहते हैं कि ‘तुम्हें तो सब छोड़कर सन्यासी होना चाहिए अगर तुम्हारे पास ज्ञान है तो फिर संसार का काम क्यों करते हो’। इतना ही नहीं अगर कोई मनुष्य शांत भाव से नैतिकता के आधार पर काम करता है तो उससे यह तक कह दिया जाता है कि तुम इस संसार को नहीं जानते जिसमें केवल दुष्टता और चालाकी से ही काम चल सकता है।
कहने का अभिप्राय यह है कि आम लोगों के लिये धर्म का आशय केवल कर्मकांडों तक ही सीमित है। लोग मनोरंजन के लिये सत्संग में जाते हैं और वहां ज्ञान की बात सुंनकर दूसरे लोगों को भी सुनाते हैं पर जब व्यवहार में नैतिकता स्थापित करने की बात आये तो लोग कहते हैं कि सामान्य जीवन में सात्विकता का कोई स्थान नहीं है। शायद यही कारण है कि जिन लोगों को समाज में संत की तरह स्थापित होना है वह गेरुए या सफेद वस्त्र पहनकर शिष्य का समुदाय बनाने लगते हैं। सांसरिक काम को करना वह अपनी व्यवसायिक छवि के विरुद्ध समझते हैं क्योंकि उनको पता है कि अगर वह सामान्य जन की तरह काम करेंगे तो समाज का कोई भी आदमी कभी उनको सिद्ध स्वीकार नहीं करेगा।
अथर्ववेद में कहा गया है कि
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मो षु ब्रह्मोव तन्द्रयुर्भवो।
            ‘‘ब्रह्मज्ञान पा्रप्त करने को बाद ज्ञानी को कभी आलस्य नहीं करना चाहिए।’’
अधा हिन्वान इन्द्रियं ज्यायो महित्वमानशे।
अभिष्टकृद्विर्षणिः।
           ‘तत्वज्ञानी अपनी शक्ति के सदुपयोग से परम लक्ष्य प्राप्त करके सर्वश्रेष्ठ स्थिति में पहुंच जाता है।’’
             यही कारण है कि हमारे देश में पेशेवर संतों की भरमार है। यह अलग बात है कि समय के साथ उनकी चमक खत्म हो जाती है पर जिन लोगों ने सामान्य जीवन बिताते हुए समाज का मार्गदर्शन किया वह अमरत्व प्राप्त कर गये। कविवर रहीम, संत शिरोमणि कबीरदास और रविदास को आज कौन नहीं जानता? दरअसल सच्चा ज्ञानी वह है जो तत्वज्ञान जाने लेने के बाद अपने कर्म के फल से विरक्त होकर काम करता है। भेदरहित होकर सारे समाज को अपना परिवार मानता है। सबसे बड़ी बात यह है कि ज्ञानी संसार से विरक्त होने की बजाय अधिक सक्रिय हो जाते हैं। वह जानते हैं कि यह देह नश्वर है और इससे पहले कि वह साथ छोड़े उससे पूरा काम लेना चाहिए।
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Saturday, October 8, 2011

चाणक्य नीति-छात्र छात्राओं को अपने पाठ्यक्रंम पर ही ध्यान देना चाहिए (students and disciplen during aducation-chankya neeti in hindi)

                 भारतीय दर्शन में विद्याध्ययन के समय शिष्य के शिक्षा के अलावा अन्य किसी गतिविधि पर ध्यान देने वर्जित माना जाता है। आधुनिक शिक्षा पद्धति में इस बात को भुला दिया गया है। हमने देखा है कि अक्सर आजकल के  शिक्षक अपने छात्रों को शिक्षा के दौरान अन्य गतिविधियों पर ध्यान देने के लिये उकसाते हैं। इतना ही नहीं अनेक शिक्षण संस्थान तो अपने यहां शैक्षणिकोत्तर सुविधायें देने के विज्ञापन तक देते हैं। इतना ही नहीं माता पिता भी यह चाहते हैं कि उनका बालक शिक्षा के दौरान अन्य ऐसी गतिविधियों में भी भाग ले जिससे उसे अगर कहीं नौकरी न मिले तो दूसरा काम ही वह कर सके। नृत्य, खेल, तथा अभिनय का प्रशिक्षण देने के दावे के साथ ही चुनाव संघों के चुनाव के माध्यम से हर छात्र को एक संपूर्ण व्यक्ति बनाने का यह प्रयास भले ही आकर्षक लगता हो पर कालांतर में उसे अन्मयस्क भाव का बना देता है। एक दृढ़ व्यक्त्तिव का स्वामी बनने की बजाय छात्र छात्राऐं मानसिक रूप से डांवाडोल हो जाते हैं। इतना ही नहीं महाविद्यालायों में एक गणवेश का नियम होने पर उसका विरोध किया जाता है जिस कारण छात्र छात्रायें फिल्मों में दिखाये जाने वाले परिधान पहनकर शिक्षा प्राप्त करने जाते हैं। इससे उनका ध्यान शिक्षा की बजाय दैहिक आकर्षण पर केंद्रित हो जाता है।
इस विषय में चाणक्य नीति में कहा गया है कि
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कामं क्रोधं तथा लोभं स्वादं श्रृंगारकौतुके।
अतिनिद्राऽतिसेवे च विद्यार्थी ह्यष्ट वर्जयेत्।।
         ‘‘विद्यार्थी को चाहिए कि वह कामुकता, क्रोध, लोभ, स्वाद, श्रृंगार, कौतुक, चाटुकारिता तथा अतिनिद्रा जैसे इन आठ व्यसनों और दोषों से दूर रहना चाहिए।’’
             हम यहां किसी पर अपने विचार लादना नहीं चाहते। जिसे जो करना है वह करे पर यह जरूर कहना चाहेंगे कि भारतीय अध्यात्मिक दर्शन इस बात को स्पष्ट करता है कि शिक्षा के समय छात्र छात्राओं को अपनी किताबों की विषय सामग्री का ही अध्ययन करना चाहिए। हमने यह भी देखा है कि प्रायः वही छात्र छात्रायें ही अपनी शिक्षा का पूर्ण लाभ उठा पाते हैं जिन्होंने अपनी किताबों का अध्ययन किया है। आज के फैशन, फिल्मों तथा फैस्टीवलों पर फिदा छात्र अंततः शिक्षा समाप्त करने के बाद कहीं के नहंी रह जाते। इसलिये छात्र छात्राओं को जहां तक हो सके अपनी पाठ्यक्रम सामग्री पर ही ध्यान केंद्रित करना चाहिए ताकि उसमें उनको विशेषज्ञता मिल सके।
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Sunday, October 2, 2011

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-अपने सुख के लिये आमजन को दुःख देने वाला राजा अधम होता है (janta aur sarkar,public and government-kautilya ka arthshastra)

             दैहिक रूप से मनुष्य सभी एक जैसे होते हैं। उनमें भी कोई गेहुए तो कोई काले या कोई गोरे रंग का होता है। इससे उसकी पहचान नहीं होती वरन् उसका आचरण, व्यवहार और विचार ही उसके आंतरिक रूप का प्रमाण होते है। सभी गोरे अच्छे हों यह जरूरी नहीं उसी तरह सभी काले बुरे हों यह समझना भी बेकार है। गेहुए रंग के लोग भी सामान्य स्वभाव के हों यह भी आवश्यक नहीं है। कहने का अभिप्राय यह है कि मनुष्य की जाति, धर्म, क्षेत्र अथवा भाषा के आधार पर उसकी पहचान स्थाई नही होती। मनुष्यों में भी कुछ पशु हैं तो कुछ तामसी प्रवृत्ति के हैं। कुल, पद, धन और बाहुबल के दम पर अनेक लोग आमजन के साथ हिंसा कर अपनी शक्ति को प्रमाणित करते हैं। उन्हें इस बात से संतोष नहीं होता कि वह शक्तिशाली वर्ग के हैं वरन् कमजोर पर अनाचार कर वह संतोष प्राप्त करते हैं। ऐसे लोग नीच होते हैं।
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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नहि स्वसुखमन्विच्छन् पीडयेत् कृपणं नृपः।
कृषणः पीडयमानोहि मन्युना हन्ति पार्थिवम्।।
        ‘‘राज्य प्रमुख अथवा राजा को चाहिए कि वह अपने सुख के लिये कभी प्रजाजन को पीड़ा न दे। पीड़ित हुआ आम जन राजा को भी नष्ट कर सकता है।’’
कोहि नाम कुले जातः सुखलेशेन लोभितः।’’
अल्पसाराणि भूतानि पीडयेदिविचारम्।।
        बलशाली और कुलीन पुरुष कभी भी अपने से अल्प बलवान पुरुष को बिना विचारे कभी पीड़ित नहीं करते। ऐसा करने वाला निश्चय ही अधम होता है।’’
          जिन लोगों के पास राजपद, धन और शक्ति है उनको यह समझना चाहिए कि परमात्मा ने उनको यह वैभव आमजन की सेवा के लिये दिया है। प्राचीन समय में अनेक राजा लोगों ने प्रजाजनों के हित के लिये इसी विचार को ध्यान में रखकर काम किया। जहां तक हो सकता था अनेक महान राजा प्रजाजनों के हित के लिये काम किया और प्रसिद्धि पाई इसलिये भगवान के बाद दूसरा दर्जा दिया गया। इतिहास में अनेक महान राजाओं के नाम दर्ज हैं। मगर अब जिस तरह पूरे विश्व में हालात हैं उसे देखकर तो ऐसा लगता है कि आर्थिक, सामाजिक, राजनीति, तथा धार्मिक क्षेत्रों में तामस प्रवृत्तियों वाले लोग हावी हैं। यही कारण है कि प्रजाजनों का ख्याल कम रखा जाता है। सच बात तो यह है कि राजनीतिक कर्म ऐसा माना गया है जिसे करने के लिये उसके शास्त्र का अध्ययन करना अनिवार्य नहीं है। यही कारण है कि राजपद पाने का लक्ष्य रखकर अनेक लोग राजनीति में आते हैं पर प्रजाजनों के हित की बात सोचते नहीं है। उनको लगता है कि राजपद पाना ही राजनीति शास्त्र का लक्ष्य है तब क्यों उसका अध्ययन किया जाये।
           यही कारण है कि हम आज पूरे विश्व में जनअसंतोष के स्वर उठते देख रहे हैं। अनेक देशों हिंसा हो रही है। आतंकवाद बढ़ रहा है। अपराधियों और पूंजीपतियों का गठजोड राजपद पर बैठे लोगों पर हावी हो गया है। राजपद पर बैठे लोग भले ही प्रजाजनों के हित की सोचें पर कर नहीं सकते क्योंकि उनको राजनीति शास्त्र का ज्ञान नहीं होता जिससे कोई काम नहीं कर पाते। राजपदों पर बैठे लोग और उनके परिवार के सदस्य अपनी सुविधा के लिये प्रजाजनों को आहत करने के किसी भी हद तक चले जाते हैं। बात भले ही धर्म करें पर उनकी गति अधम की ही होती है। अतः वर्तमान युवा पीढ़ी के जो लोग राजनीति में सक्रिय होना चाहते हैं उनको कौटिल्य के अर्थशास्त्र का अध्ययन अवश्य करना चाहिए।
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Wednesday, September 28, 2011

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-अचानक क्रोध करने वालों से लोग खफा हो जाते हैं (achanak krodh karna theek nahin-kautilya ka artshastra)


            अनेक लोगों की आदत होती है कि जरा जरा बात पर उत्तेजित होकर क्रोध करते हैं। इसके अलावा अनेक लोगों की आदत होती है कि वह अचानक ही बिना किसी मतलब की बात पर ही क्रोध कर यह दिखाना चाहते हैं कि उनकी चिंत्तन और चेतन क्षमता दूसरों से अधिक है। देखने के लिये लोग भले ही उनके सामने कुछ न कहें पर अंदर ही अंदर उनसे चिढ़ने लगते हैं। इस व्यवहार के कारण समाज उनके प्रति तिरस्कार का भाव रखने लगता है। दरअसल वैसे तो क्रोध हमेशा ही विनाश और दुःख कारण बनता है पर निरंतर बातचीत में अपनी क्रोध शक्ति का प्रदर्शन करना अत्यंत ही बदनामी दिलाता है।
अकस्मादेव यः कोषादभष्णं बहु भाषते।
कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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तस्यमबुद्धिजते लोकः सस्फुतिंगंदिवानतात्।।
       ‘‘जिस मनुष्य अचानक ही क्रोध करने लगता है लोग उसके विपरीत हो जाते हैं, जैसे चिंगारी उड़ाने वाली अग्नि से लोग उतेजित हो जाते हैं।’’
           कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो आपसी वार्तालाप में दूसरों के प्रति गाली गलौच का प्रयोग करते हैं। जो व्यक्ति सामने नहीं है उसकी कमजोरियों  का बखान कर उस पर शक्ति प्रयोग करने की बात करते हैं। छोटे छोटे विषयों पर अपनी आक्रामक अभिव्यक्ति प्रदर्शित कर यह प्रमाणित करते हैं कि वह शक्तिशाली पुरुष हैं । ऐसे लोगों से कोई डरता नहीं है अलबत्ता कोई मुंह पर नहीं कहता यह अलग बात है। मगर जब ऐसे मनुष्य के बारे में समाज यह जान लेता है कि वह निरर्थक क्रोध दिखाने का प्रयास करते हैं पर वास्तव में शक्तिहीन है तो फिर उनका सार्वजनिक रूप से मजाक भी बनने लगता है। इसलिये जहां तक हो सके अपने व्यवहार में सहजता का प्रदर्शन करना चाहिए। कभी भी बड़े बोल नहीं बोलना चाहिए।
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Thursday, September 22, 2011

सामवेद से संदेश-जीवन में सदैव सक्रियता आवश्यक (samved se sandesh-jivan mein kam jarrori)

                  जीवन चलते रहने का नाम है। आलस्य करना मनुष्य का सहज भाव है। ऐसे में ज्ञानी, चतुर और सामर्थ्यशाली लोग हमेशा सक्रिय रहकर कुछ न कुछ करते रहते हैं। वह जानते हैं कि जहां हमने अपने जीवन में सक्रियता को विराम दिया वहीं दैहिक तथा मानसिक विकार उन पर हमला कर देंगे। स्वास्थ्य विज्ञानी कहते हैं कि सामान्य आदमी अपने जीवन का केवल पांच फीसदी उपयोग करता है जबकि बुद्धिमान भी उससे थोड़ा अधिक उपयोग कर पाता है। इसे हम मानव स्वभाव की विवशता ही कह सकते हैं कि वह थोड़ा काम करने के बाद आराम चाहता है। दैहिक आराम न भी करे तो भी दिमागी रूप से चिंतन या मनन करने से परे रहता है। हर कोई मनोरंजन चाहता है पर सृजन बहुत कम लोग करते हैं। टीवी के सामने बैठकर दृश्य देखने या हाथ में अखबार पढ़ने से क्षणिक सुख मिलता है पर उससे जो बाद में तनाव आता है उसकी कल्पना कोई नहीं कर सकता। दरअसल इस तरह हम निष्क्रियता के साथ जीते हैं।
सामवेद में कहा गया है कि
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उत्तो कृपन्त धीतयो देवानां नाम विभ्रतीः।
           ‘‘ज्ञानी लोगों की उंगलियां सदैव कर्मो में लिप्त रहकर सामर्थ्यवान होती है। यह बात समझ लें ज्ञानी हमेशा सक्रिय रहता है तथा निष्क्रयता उसे स्वीकार नहीं होती।।
विष्णोः कर्माणि पश्चत यतो व्रतानि पस्पर्श।
           ‘‘विष्णु के पुरुषार्थ को देखो और उनका विचार कर अनुसरण करो।’
              ज्ञानी लोग जानते हैं कि अपने जीवन में विश्राम शब्द केवल निष्क्रियता का पर्याय है। यही कारण है कि वह हाथ से कोई न कोई काम करते हैं। फल की चाहत कर वह कोई तनाव नहीं पालते। मुख्य बात यह है कि जिंदा रहने के लिये जिस तरह भोजन और पानी आवश्यक है उसी तरह देह को चलायमान रखना चाहिए। हमेशा ही दैहिक तथा मानसिक सक्रियता से सृजन के पथ पर चलना अच्छा है बनिस्बत के मनोरंजन या क्षणिक सुख की खातिर निष्क्रियता अपनाने के। यही जीवन का मूल मंत्र है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
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Monday, September 12, 2011

हिन्दी दिवस से पूर्व हिन्दी पत्रिका ने पार की तीन लाख की पाठक/पाठ पठन संख्या-हिन्दी संपादकीय (hindi divas or diwas ke poorva hindi patrika ki uplabdhi-hindi editorial)

       14 सितंबर को हिन्दी दिवस है इसलिये इस दौरान इंटरनेट पर हिन्दी लेखन को चर्चा जरूरी होगी ऐसे में यह खबर अच्छी लगती है कि इस लेखक का वर्डप्रेस पर लिखा जाने वाला ‘हिन्दी पत्रिका’ ब्लाग आज तीन लाख पाठक/पाठ पठन संख्या पार कर गया। इतना बड़ा देश और इतने सारे हिन्दी भाषी हैं, जिसे देखते हुए पांच साल में यह संख्या कोई बड़ी बात नहीं होना चाहिए, मगर अपने एकल प्रयासों को देखते हुए यह कोई संख्या कम भी नहीं लगती। जब बाज़ार से समर्थन न हो, पाठक कोई अधिक महत्व न देते हों और फिर विचारों का उपयोग करते हुए बाज़ार के लेखक ब्लाग का नाम देकर अपने आपको बड़ा चिंतक साबित करने में लगे हों या फिर पूरा पाठ ही चुराने लगे हों तब अपनी स्वप्रेरणा से यह अकेला सफर दुःखदायी होने के बावजूद मजेदार अधिक लगता है। आतंकवाद को व्यापार बताने का प्रयास इस लेखक ने अपने ही ब्लागों पर शुरु किया जिसे आजकल अनेक बुद्धिमान दूसरों को बताते फिर रहे हैं। सीधी बात यह है कि आम पाठक भले ही अंतर्जाल पर सक्रिय न हों पर उनकी बुद्धि को नियंत्रित करने वाले बुद्धिजीवी यहां सक्रिय हैं और हमारे जैसे लेखकों के चिंतन को अपनी रचनाओं का हिस्सा बना रहे हैं। बाज़ार के होने के कारण उनको ‘क्रीम’ टाईप का माना जाता है।
      आज ही यह ब्लाग एक ही दिन में एक हजार की पाठक संख्या भी पार करने का कीर्तिमान बना रहा है तो एक अन्य ब्लाग दीपक बापू कहिन दो हजार के पास है। अन्य अनेक ब्लाग अपने पुराने कीर्तिमानों को तोड़ने वाले हैं। यह सब 14 सितंबर को हिन्दी दिवस के कारण है। हमने पहले ही यह साफ कर दिया है कि आम पाठक नहीं बल्कि देश की बौद्धिक क्रीम की छवि वाले लोग कुछ ढूंढ रहे हैं। यहां अगर हमारी कोई बात जंची तो वह अपने नाम से उपयोग करेंगे। उनकी नज़र में इंटरनेट लेखक आम आदमी है जिसकी बात वह बुद्धिजीवी होकर पढ़ रहे हैं। फिर जनता की आवाज को बाज़ार के प्रचार माध्यमों में इस तरह स्थान देंगे जैसे वह स्वयं उनका चिंत्तन हो। अपने पैसे से प्रकाशन करने वाला इंटरनेट  का प्रयोक्ता उनकी नज़र में लेखक नहीं है बल्कि बाज़ार के सौदागरों तथा प्रचार प्रबंधकों के पांवों के पास बैठकर लिखने वाला ही वास्तविक लेखक है। मतलब लेखक वह है जो बाज़ार में बिकता दिखे।
बाज़ार स्वामियों के वरदहस्त से इन बौद्धिक कर्मियों में इतना जबरदस्त आत्मविश्वास है कि वह इंटरनेट पर लिखी हर रचना को अपनी संपत्ति समझते हैं। यही कारण है कि इंटरनेट पर आज कोई भी समझदार लेखक लिखना नहीं चाहता। इस तरह हिन्दी के कर्णधार ही अंतर्जाल पर हिन्दी को उबरने से रोकने का काम कर रहे हैं। उससे भी बुरा यह कि बाज़ार के प्रचार माध्यमों में स्वयं के विचार व्यक्त करने वालों के पास तो शुद्ध हिन्दी का अभ्यास भी नहीं है इसलिये अंग्रेजी शब्दों का मिश्रण करते हैं।
            इस बहाने हिन्दी दिवस की चर्चा कर लें। आम आदमी को ऐसे दिवस से मतलब नहीं है। अलबत्ता जिनको प्रचार सामग्री सजानी है उनके लिये यह जरूरी है कि वह घिसे पिटे सोच से अलग होकर लिखें। अब जो बाज़ार से बाहर अलग सोच रखते हैं उनको तो यह प्रचार कर्मी ढूंढ नहीं सकते। इसलिये इंटरनेट पर वह नयी सोच ढूंढ रहे हैं। एक लेखक के रूप में हमारे लिये प्रयोग का समय है। इसलिये तुकी और बेतुकी कवितायें हिन्दी दिवस पर डाल दीं यह जानते हुए कि अभी वह तीन दिन दूर है। आज देखा कि जबरदस्त हिट हो रही हैं। यही कारण है कि आज सभी बीस ब्लाग मिलकर छह हजार पाठकं/पाठ पठन संख्या पार कर जायेंगे। इसी बीच कुछ बेतुकी रचनायें डालकर हम यह भी प्रयास करेंगे कि कम से कम 13 सितंबर तक सात हजार की संख्या पार हो जाये। 14 सितंबर को कोई नहीं पूछेगा क्योंकि उस दिन तक प्रचार माध्यम अपना काम कर चुके होते हैं। आम पाठक आयेगा नहीं इसलिये यह संख्या गिरने लगेगी। वैसे यह संख्या नियमित रूप से 35 सौ हो गयी है। उसमें भी अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के कारण सर्च इंजिनों में उनसे संबंधित विषयों की खोज बढ़ना एक कारण है।
             चूंकि लिखना हमारा शौक रहा है। अगर व्यवसायिक लेखक करते तो शायद बड़े लेखक बन जाते पर स्वतंत्र रूप से लिखने की चाहत के कारण प्रबंध कौशल के अभाव में हमेशा ही एक आम आदमी बने रहे। फिर बड़े लेखक बनने के लिये यह आवश्यक है कि बाज़ार के सौदागरों और प्रचार प्रबंधकों की चाटुकारिता की जाये यह हमारे जैसे ंिचंतक के लिये कठिन था।
          बहरहाल आत्मीय जनों और मित्रों से ऐसे पाठ लिखकर अपनी बात कहने का अवसर मिलता है। इससे वह मन की बात समझ पाते हैं। अंतर्जाल पर किया जाने वाला व्यवहार कितना छद्म है कितना सत्य है, इस बात को लेकर हम अधिक विचार नहीं करते। मगर इतना तय है कि हमें चाहने वाले कुछ लोग हैंे जिनके बारे में हमारा मानना है कि उनकी वाद, संवाद और विचार का संप्रेषण कौशल हमसे अधिक प्रबल है और कहीं न कहीं हमसे पढ़कर प्रभावित होते हैं। उनकी संख्या कितनी है नहीं मालुम है पर इतना अनुमान है कि वह उंगलियों पर गिनने लायक हैं। यह लेख पाठकों तथा ब्लाग लेखक मित्रों को ही समर्पित है। यह उनसे प्रशंसा पाने के लिये नहीं बल्कि सूचनार्थ लिखा गया है उनका आभार जताने के लिये।
इस ब्लाग पर टिप्पणियां देने वाले प्रमुख लोगों के नाम नीचे   लिखे हैं।
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अशोक बजाज    322
समीर लाल 'उड़न तश्तरी वाले'    37
paramjitbali    28
दीपक भारतदीप    15
mehhekk    13
Brijmohan shrivastava    13
SHAILENDRA CHAUDHARY    10
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ravindra.prabhat    9
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sameerlal

हिन्दी पत्रिका पर हिन्दी दिवस पर लिखा गया लोकप्रिय लेख

       सुना है अब इंटरनेट में लैटिन के साथ ही देवनागरी में भी खोज सुगम होने वाली है। यह एक अच्छी खबर है मगर इससे हिंदी भाषा के पढ़ने और लिखने वालों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ जायेगी, यह आशा करना एकदम गलत होगा। सच तो यह है कि अगर देवनागरी में खोज सुगम हुई भी तो भी इसी मंथर गति से ही हिंदी लेखन और पठन में बढ़ोतरी होगी जैसे अब हो रही है। हिंदी को लेकर जितनी उछलकूल दिखती है उतनी वास्तविकता जमीन पर नहीं है। सच कहें तो कभी कभी तो लगता है कि हम हिंदी में इसलिये लिख पढ़े रहे हैं क्योंकि अंग्रेजी हमारे समझ में नहीं आती। हम हिंदी में लिख पढ़ते भी इसलिये भी है ताकि जैसा लेखक ने लिखा है वैसा ही समझ में आये। वरना तो जिनको थोड़ी बहुत अंग्रेजी आती है उनको तो हिंदी में लिखा दोयम दर्जे का लगता है। वैसे अंतर्जाल पर हम लोगों की अंग्रेजी देखने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचे है कि लोगों की अंग्रेजी भी कोई परिपक्व है इस पर विश्वास नहीं करना चाहिए-क्योंकि बात समझ में आ गयी तो फिर कौन उसका व्याकरण देखता है और अगर दूसरे ढंग से भी समझा तो कौन परख सकता है कि उसने वैसा ही पढ़ा जैसा लिखा गया था। बहरहाल अंग्रेजी के प्रति मोह लोगों का इसलिये अधिक नहीं है कि उसमें बहुत कुछ लिखा गया है बल्कि वह दिखाते हैं ताकि लोग उनको पढ़ालिखा इंसान समझें।
       ‘आप इतना पढ़ें लिखें हैं फिर भी आपको अंग्रेजी नहीं आती-‘’हिंदी में पढ़े लिखे एक सज्जन से उनके पहचान वाले लड़के ने कहा’‘-हमें तो आती है, क्योंकि अंग्रेजी माध्यम से पढ़े हैं न!’
          मध्यम वर्ग की यह नयी पीढ़ी हिंदी के प्रति रुझान दिखाने की बजाय उसकी उपेक्षा में आधुनिकता का बोध इस तरह कराती है जैसे कि ‘नयी भारतीय सभ्यता’ का यह एक  प्रतीक हो। इनमें तो कई ऐसे हैं जिनकी हिंदी तो  गड़बड़ है साथ  ही  इंग्लिश भी कोई बहुत अच्छी  नहीं है।
       जैसे जैसे हिंदी भाषी क्षेत्रों में सरकारी क्षेत्र के विद्यालयों और महाविद्यालयों के प्रति लोगों का रुझान कम हुआ है-निजी क्षेत्र में अंग्रेजी की शिक्षा का प्रसार बढ़ा है। एक दौर था जब सरकारी विद्यालयों में प्रवेश पाना ही एक विजय समझा जाता था-उस समय निजी क्षेत्र के छात्रों को फुरसतिया समझा जाता था। उस समय के दौर के विद्यार्थियों ने हिंदी का अध्ययन अच्छी तरह किया। शायद उनमें से ही अब ऐसे लोग हैं जो हिंदी में लेखन बेहतर ढंग से करते हैं। अब अगर हिंदी अच्छे लिखेंगे तो वही लोग जिनके माता पिता फीस के कारण अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के निजी विद्यालयों में नहीं पढ़ा सकते और सरकारी विद्यालयों में ही जो अपना भविष्य बनाने जाते हैं।
       एक समय इस लेखक ने अंग्रेजी के एक प्रसिद्ध स्तंभकार श्री खुशवंत सिंह के इस बयान पर विरोध करते हुए एक अखबार में पत्र तक लिख डाला‘जिसमें उन्होंने कहा था कि हिंदी गरीब भाषा है।’
       बाद में पता लगा कि उन्होंने ऐसा नहीं कहा बल्कि उनका आशय था कि ‘हिन्दुस्तान में हिंदी गरीबों की भाषा है’। तब अखबार वालों पर भरोसा था इसलिये मानते थे कि उन्होंने ऐसा कहा होगा पर अब जब अपनी आंखों के सामने बयानों की तोड़मोड़ देख रहे हैं तो मानना पड़ता है कि ऐसा ही हुआ होगा। बहरहाल यह लेखक उनकी आलोचना के लिये अब क्षमाप्रार्थी है क्योंकि अब यह लगने लगा है कि वाकई हिंदी गरीबों की भाषा है। इन्हीं अल्पधनी परिवारों में ही हिंदी का अब भविष्य निर्भर है इसमें संदेह नहीं और यह आशा करना भी बुरा नहीं कि आगे इसका प्रसार अंतर्जाल पर बढ़ेगा, क्योंकि यही वर्ग हमारे देश में सबसे बड़ा है।

       समस्या यह है कि इस समय कितने लोग हैं जो अब तक विलासिता की शय समझे जा रहे अंतर्जाल पर सक्रिय होंगे या उसका खर्च वहन कर सकते हैं। इस समय तो धनी, उच्च मध्यम, सामान्य मध्यम वर्ग तथा निम्न मध्यम वर्ग के लोगों के लिये ही यह एक ऐसी सुविधा है जिसका वह प्रयोग कर रहे हैं और इनमें अधिकतर की नयी पीढ़ी अंग्रेजी माध्यम से शिक्षित है। जब हम अंतर्जाल की बात करते हैं तो इन्हीं वर्गों में सक्रिय प्रयोक्ताओं से अभी वास्ता पड़ता है और उनके लिये अभी भी अंग्रेजी पढ़ना ही एक ‘फैशनेबल’ बात है। ऐसे में भले ही सर्च इंजिनों में भले ही देवनागरी करण हो जाये पर लोगों की आदत ऐसे नहीं जायेगी। अभी क्या गूगल हिंदी के लिये कम सुविधा दे रहा है। उसके ईमेल पर भी हिंदी की सुविधा है। ब्लाग स्पाट पर हिंदी लिखने की सुविधा का उपयेाग करते हुए अनेक लोगों को तीन साल का समय हो गया है। अगर हिंदी में लिखने की इच्छा वाले पूरा समाज होता तो क्या इतने कम ब्लाग लेखक होते? पढ़ने वालों का आंकड़ा भी कोई गुणात्मक वुद्धि नहीं दर्शा रहा।
       गूगल के ईमेल पर हिंदी लिखने की सुविधा की चर्चा करने पर एक नवयौवना का जवाब बड़ा अच्छा था-‘अंकल हम उसका यूज (उपयोग) नहीं करते, हमारे मोस्टली (अधिकतर) फ्रैंड्स हिंदी नहीं समझते। हिंदी भी उनको इंग्लिश (रोमन लिपि) में लिखना पसंद है। सभी अंग्रेजी माध्यम से पढ़े हैं। जो हिंदी वाले भी हैं वह भी इससे नहीं लिखते।’
ऐसे लोगों को समझाना कठिन है। कहने का तात्पर्य यह है कि हिंदी की कितनी भी सुविधा अंतर्जाल पर आ जाये उसका लाभ तब तक नहीं है जब तक उसे सामान्य समाज की आदत नहीं बनाया जाता। इसका दूसरा मार्ग यह है कि इंटरनेट कनेक्शन सस्ते हो जायें तो अल्प धन वाला वर्ग भी इससे जुड़े  जिसके बच्चों को हिंदी माध्यम में शिक्षा मजबूरीवश लेनी पड़ रही है। यकीनन इसी वर्ग के हिंदी भाषा का भविष्य को समृद्ध करेगा। ऐसा नहीं कि उच्च वर्ग में हिंदी प्रेम करने वाले नहीं है-अगर ऐसा होता तो इस समय इतने लिखने वाले नहीं होते-पर उनकी संख्या कम है। ऐसा लिखने वाले निरंकार भाव से लिख रहे हैं पर उनके सामने जो समाज है वह अहंकार भाव से फैशन की राह पर चलकर अपने को श्रेष्ठ समझता है जिसमे हिंदी से मुंह   फेरना एक प्रतीक माना जाता है।
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Thursday, September 8, 2011

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-परशुराम की तरह प्रतापी ही सर्वत्र राज्य करते हैं (kautilya ka arthshastra-parshuram ki tarah pratapi raja hona cnahiye)

            कौटिल्य का अर्थशास्त्र न केवल राज्य की अर्थव्यवस्था बल्कि राजकाज संचालन के सिद्धांतों   का भी बयान करता है। राज्य प्रमुख के आचरण से ही प्रजा सुखी होती है, यह बात तो कौटिल्य महाराज कहते हैं पर साथ उनका यह भी मानना है कि वीर राजा के प्रताप से ही राज्य की सुरक्षा होती है। हमारे देश में राजनीति करने का विषय बन गयी है पर अध्ययन करना कोई नहीं चाहता। पद पाने की रणनीति सभी अपनाते हैं पर उस बैठकर प्रजा का हित कैसे हो इसका बहुत कम लोग विचार करते हैं। एक बात यहां यह भी बता दें कि प्रजा का हित सोचना या ऐसा दावा करना आसान है पर अपनी व्यवस्था के व्यवहारिक धरातल पर उसे उतारना कोई आसान काम नहीं है। सबसे बड़ी बात यह है कि युद्ध जीतकर प्रजा में अपने प्रति विश्वास पैदा करना आवश्यक है। शत्रु चाहे अंदर हों या बाहर उन पर कड़े प्रहार कर ही कोई राज्य प्रमुख प्रजा का विश्वास जीत सकता है। 
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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जमदग्नेः सृतस्येव सर्वः सर्वत्र संवदा।
अनेकवृद्धजविन प्रतापदेव भुज्यते।।
            ‘‘जमदग्नि के पुत्र परशुराम के समान सब ही सर्वत्र अनेक युद्ध जीत चुके राजा ही अपने प्रताप से ही शासन करते हैं।’’
अनेकयुद्धविजयी सन्मानं यस्यमच्छति।
तत्प्रतापेन तस्माशु वशं गच्छन्ति शत्रवः।।
          ‘‘अनेक युद्ध जीतने वाले के प्रताप से अनेक अन्य राजाओं से उसकी संधि हो जाती है और शत्रु तक उसका पक्ष स्वीकार करते हैं।’’
           जो राज्य प्रमुख राज्य और प्रजा के शत्रुओं को परास्त करता है वह न केवल प्रजा का विश्वास जीतता है वरन् दूसरे राजा भी उससे संधि करने लगते हैं। अगर कोई राज्य प्रमुख युद्ध नहीं करता और अपने आंतरिक शत्रुओं से नरमी बरतता है तो उसका पतन जल्दी होता है। इसलिये यह आवश्यक है कि राज्य की रक्षा तथा प्रजा का विश्वास बनाये रखने के लिये राज्य प्रमुख को अपनी मानसिक तथा वैचारिक दृढ़ता का परिचय देना चाहिए।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Thursday, September 1, 2011

वसिष्ठ स्मृति से-तृष्णा कभी वृद्ध नहीं होती (vashshtha smriti se-trishna kabhee bodhin nahin hotee)

          आधुनिक युग में भौतिकतावाद की चलते अधिकतर अध्यात्म से विरक्त हो गये है। सांसरिक विषयों में प्रवीणता और विशेषज्ञता प्राप्त करने वाले अनेक लोग मिल जायेंगे पर अध्यात्मिक ज्ञान में दक्ष लोगों की संख्या अत्यंत नगण्य है। यह अलग बात है कि हर मनुष्य एक आत्मा है जो देह में विराजमान मन को कचोटता है कि वह अध्यात्मिक रूप से कोई कार्य करे। चूंकि अध्यात्मिक ज्ञान का रूप नहीं समझा इसलिये अनेक लोग उन कथित गुरुओं के शिष्य बन जाते हैं जिन्होंने भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों का सतही अध्ययन केवल इसलिये किया होता है ताकि वह उनको सुनाकर अपना व्यवसाय कर सकें। ऐसे गुरु स्वयं ही तृष्णाओं के दास होते हैं।
        मनुष्य मन का यह स्वभाव है कि वह हमेशा ही तृष्णाओं के जाल में फंसा रहता है। उनसे ऊबता है पर फिर भी ऐसा कोई दूसरा मार्ग नहीं जानता जिस पर चलकर वह मुक्त भाव से जीवन व्यतीत कर सके। तत्वज्ञानी यह बात जानते हैं कि तृष्णाओं से कभी मुक्ति संभव नहीं है पर उनका दासत्व स्वीकार करने की बजाय वह उस पर शासन करते हैं। सांसरिक विषयों में उतना ही लिप्त रहते हैं जितना देह के लिये आवश्यक है।
वसिष्ठ स्मृति में कहा गया है कि
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जीर्यन्ति जीर्यतः केशा दन्ता जीर्यन्ति जीर्यतः।
जीवनाशा धनाशा च जीर्यतोऽपि न जीर्यति।।
       ‘‘मनुष्य जब बूढ़ा हो जाता है तब उसके केश, दांत और अन्य अंग में बूढ़े हो चुके होते हैं पर उसकी तृष्णाऐं बूढ़ी नहीं होती। तरूण पिशाचिनी की तरह यह तृृष्णाऐं नुष्य का खून चूसकर उसे पथभ्रष्ट करती हैं।’’
या दुस्त्य दुर्मतिभियां न जीर्यति जीर्यतः।
योऽसौ प्राणान्ति रोगस्तां तृष्णां त्यजतः सुखम्।।
           ‘‘दुषित बुद्धिवाले इस तृष्णा से चिढ़ते है किन्तु चाहकर भी उसे छोड़ नहीं पाते। मनुष्य कितना भी बूढ़ा हो जाये पर उसकी तृष्णा हमेशा ही युवा बनी रहती है। यह तृष्णा वह रोग है जो प्राण लेकर ही छोड़ती है।
      आधुनिक पश्चिमी शिक्षा पद्धति के कारण हमारे देश में लोेग अपने प्राचीन अध्यात्मिक ज्ञान से विरक्त हो गये हैं। फिर आजकल मायाजाल की विकटता के चलते उनकी व्यसततायें इतनी बढ़ गयी हैं कि अपनी नियमितता से परे हटकर नवीन आनंद की की दृष्टि से वह उन गुरुओं के शरण में चले जाते हैं जिनको यह नहीं पता कि तत्वज्ञान क्या है? उनकी वाणी में शब्द रटे हुए हैं, मन में अर्थ भी है पर हृदय में भाव नहीं है। शब्द तभी ज्ञान बनते हैं जब भाव हो। ऐसा न होने पर सारी सत्संग चर्चा व्यर्थ है। अतः जब किसी को अध्यात्मिक ज्ञान के लिये गुरु बनाना है तो पहले यह देखना चाहिए कि वह तृष्णा रूपी सुंदरी के जाल में फंसा हुआ तो नहीं है। इसकी सबसे बड़ी पहचान यह है कि अपने गुरु के जीवन और आचरण पर दृष्टि डालना चाहिए। यह नहीं देखना चाहिए कि उसने अध्यात्मिक ज्ञान के चलते पाया क्या? बल्कि इस तथ्य पर दृष्टिपात करना चाहिए कि उसने त्यागा क्या है? अगर वह भी अन्य सांसरिक मनुष्यों की तरह तृष्णाओं रूप मायाजाल में फंसा है तो उससे दूर रहना ही बेहतर है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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