Sunday, September 14, 2008

रहीम के दोहे:कलश का गुण प्रशंसनीय

रहिमन रीति सराहिए, जो घाट सुन सम होय
भांति आप पै डारी के, सबै पियावै तोय

कविवर रहीम कहते हैं कि कलश के सदगुण के समान परोपकार की प्रशंसा करनी चाहिए घडा अपने पर पर्दा डालकर सबको मीठा जल पिलाता है.

रहिमन लाख भली करो, अगुनी अगुन न जाय
राग सुनत पथ पिअत हूँ, सांप सहज धरि खाय

कविवर रहीम कहते हैं कि असंख्य भलाई करे, परन्तु गुणहीन व्यक्ति का अवगुण नष्ट नहीं होता. जैसे--संगीत सुनते हुए और दूध पीते हुए भी सर्प सहज भाव से व्यक्ति को काट लेता है.
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-कहा जाता है कि दान हमेशा नीची आंखें कर देना चाहिये ताकि अपने दातार होने का अहंकार मन में न आये। मिट्टी का घड़े को कपड़े से ढका जाता है और लोग उससे पानी पीते हैं। इसी तरह आदमी को अपने दान और परमार्थ का काम छिप कर करना चाहिये। हांलांकि आजकल तो लोग अपने परमार्थ के काम का प्रचार अधिक करते हैं या केवल प्रचार के लिये परमार्थ करते देखते हैं।
यही कारण है कि अब समाज में जल कल्याण का भाव दिखावे के लिये रह गया है।
अनेक जगह तो यह स्थिति भी बन गयी है कि लोग अपने व्यवसाय को भी परमार्थ से जोड़ते हैं। कहींं भाषा तो कहीं लोगों के स्वास्थ्य तो कहीं महिलाओं के लिये कल्याण के कार्यक्रम चलाने वाले अपने स्वार्थ के कारण जुटे हैं पर नाम परमार्थ का लेते हैं। ऐसे ढोंगी यह सोचते हैं कि कोई उनको देख नहीं रहा जो कि उनका भ्रम है।


सच्चा परमार्थी तो केवल अपना काम करता है और उसके लिये वह कोई ढोंग नहीं करता। जो ढोंग करते हैं उनको भी समझाना कठिन है क्योंकि यही उनका व्यवसाय है।

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