Tuesday, April 21, 2009

मनुस्मृतिः लोगों को मूर्ख बनाने वालों को पानी तक न पिलायें

यथा प्लवेनौपलेन निमज्जत्युदके तरन्।
तथा निमज्जतोऽधस्तादज्ञौ दातृप्रतीच्छकौ।।

हिंदी में भावार्थ-जैसे को मनुष्य जल में प्रस्तर की नाव बनाकर डूब जाता है उसी तरह दूसरों को मूर्ख मनाकर दान लेने वाला तथा देना वाला दोनों ही नष्ट हो जाते हैं।

न वार्यपि प्रयच्छेत्तु बैडालव्रति के द्विजे।
न बकव्रतिके विप्रे नावेदविदि धर्मवित्।।

हिंदी में भावार्थ-धर्म की जानकारी रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को चाहिये कि वह ऐसे किसी पुरुष को पानी तक नहीं पिलाये जो ऊपर से साधु बनते हैं पर उनका वास्तविक काम दूसरों को अपनी बातों से मूर्ख बनाना होता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या -हमारे देश में दान देने की बहुत पुरानी परंपरा है। चाहे सतयुग हो या कलियुग दान देने का भाव हमारे देश के लोगों में सतत प्रवाहित है। इसी भाव का देाहन करने के लिये दान लेने वालों ने भी एक तरह से अपना धंधा बना लिया है। यह केवल आज ही नहीं वरन् मनु महाराज के समय से चल रहा है इसलिये वह अपने संदेश में सचेत करते हैं कि अपनी वाणी या कर्म से दूसरे को मोहित कर ठगने वाले को पानी भी न पिलायें। ऐसे ठगों को भोजन खिलाने या पानी पिलाने से कोई पुण्य नहीं मिलने वाला। ऐसे ठगों को दान देने से कोई पुण्य लाभ की बजाय पाप होने की आशंका रहती है। वह स्वयं तो नष्ट होते ही हैं बल्कि दान देने वाला भी नष्ट होता है-उसे इस बात का भ्रम होता है कि वह पुण्य कमा रहा है पर ऐसा होता नहीं है और वह निरंतर पाप का भागी बनता चला जाता है। अतः दान देते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि वह सुपात्र है कि नहीं। देखा जाये तो इस तरह के ठग मनुमहाराज के समय में भी सक्रिय रहे हैं तभी तो उन्होंने ऐसा संदेश दिया है।
...........................
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

2 comments:

मोहिन्दर कुमार said...

क्या करें भारतीय परम्परा हमें कहती है.. दुश्मन से भी प्यार करो... जो एक गाल पर चांटा मारे उसे दूसरा गाल भी पेश करो... क्षमा से बडा कोई दान नहीं.. सो बहक ही जाते हैं

Anil said...

पाश्चात्य संस्कृति का अनुसरण कर रहे करोड़ों भारतीय युवाओं को १ अप्रैल को "महामूर्ख दिवस" मनाते देखा है। उनके बारे में मनु के विचार जानकर अच्छा लगा। मैंने महामूर्ख दिवस आज तक न मनाया है, न मनाउंगा!

समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढ़ें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका


इस लेखक की लोकप्रिय पत्रिकायें

आप इस ब्लॉग की कापी नहीं कर सकते

Text selection Lock by Hindi Blog Tips

हिंदी मित्र पत्रिका

यह ब्लाग/पत्रिका हिंदी मित्र पत्रिका अनेक ब्लाग का संकलक/संग्रहक है। जिन पाठकों को एक साथ अनेक विषयों पर पढ़ने की इच्छा है, वह यहां क्लिक करें। इसके अलावा जिन मित्रों को अपने ब्लाग यहां दिखाने हैं वह अपने ब्लाग यहां जोड़ सकते हैं। लेखक संपादक दीपक भारतदीप, ग्वालियर

विशिष्ट पत्रिकायें

Blog Archive

stat counter

Labels