Saturday, March 22, 2014

गलत लोगों को मशहूर करने की आदत से बचेें-विदुर नीति(galat logon ko mashahau kanre ki aadat se bachen-vidur neeti)



      योग साधक तथा ज्ञानार्थी लोग  इस बात के विरुद्ध  होते  है कि कोई ज्ञानी अपने धर्म पर किसी दूसरे विचाराधारा के व्यक्ति की टिप्पणी पर उत्तेजित होकर अपना संयम गंवायें। साथ ही किसी ज्ञानी को दूसरे धार्मिक विचाराधारा पर टिप्पणी करने की बजाय अपनी मान्यता के श्रेष्ठ तत्वों का प्रचार करना चाहिये। जबकि देखा जा रहा है कि लोग एक दूसरे की धार्मिक विचाराधारा का मजाक उड़ाकर सामाजिक संघर्ष की स्थिति निर्मित करते हैं।
      अभी हाल ही में एक गैर हिन्दू विचाराधारा की लेखिका के भारतीय धर्म का मजाक उड़ाती हुए एक पुस्तक पर विवाद हुआ। यह पुस्तक छपे चार साल हो गये हैं और इसे भारत में पुरस्कृत भी किया गया।  किसी को यह खबर पता नहीं थी।  जब विवाद उठा तब पता चला कि ऐसी कोई पुस्तक छपी भी थी।  दरअसल इस पुस्तक की वापसी के लिये कहीं किसी अदालत में समझौता हुआ है।  तब जाकर प्रचार माध्यमों में इसकी चर्चा हुई। एक विद्वान ने इस पर चर्चा में कहा कि इस तरह उस लेखिका को प्रचार मिल रहा है। इतना ही नहीं अब तो वह लेखिका भी बेबाक बयान दे रही है। संभव है इस तरह उसकी पुस्तकों की बिक्री बढ़ गयी हो। ऐसे में सभव है कि कहीं उसी लेखिका या प्रकाशक ने उस पुस्तक की प्रसिद्धि तथा बिक्री बढ़ाने के लिये इस तरह का विवाद प्रायोजित किया हो।

विदुर नीति में कहा गया है कि

असन्तोऽभ्यर्थिताः सिद्भः क्वचित्कार्य कदाचन।

मन्यन्ते सन्तमात्मानमसन्तामपि विश्रुत्तम्।।

     हिन्दी में भावार्थ-यदि किसी दुष्ट मनुष्य सेे सज्जन किसी विषय पर प्रार्थना करते हैं तो वह दुष्ट प्रसिद्ध के भ्रम में स्वयं को भी सज्जन मानने लगता है।

      हमारा मानना है कि धर्म चर्चा का नहीं वरन् आचरण का विषय है। किसी भी धार्मिक विचाराधारा में चंद  ठेकेदार यह दावा करते हैं कि वह उसे पूरी तरह समझते हैं। चूंकि हमारे समाज ने भी यह मान रखा है कि ज्ञान का अर्जन तो केवल बौद्धिक रूप से संपन्न लोग ही कर सकते हैं इसलिये कोई अपने प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन नहीं करता जिससे  उसमें से रट्टा लगाकर ज्ञान बेचने वाले लोगों को अपनी श्रेष्ठ छवि बनाने का अवसर मिलता है। दूसरी बात यह भी है कि यह कथित रूप से प्रचार किया जाता है कि बिन गुरु के गति नहीं है।  जबकि हमारे महापुरुष कहते हैं कि अगर योग्य गुरु नहीं मिलता तो परमात्मा को ही सत्गुरु मानकर हृदय में धारण करें। इससे ज्ञान स्वतः ही  मस्तिष्क में स्थापित हो जाता है।  दूसरी बात यह कि धर्म की रक्षा विवाद से नहीं वरन् ज्ञान के आचरण से ही हो सकती है।  दूसरी बात यह कि कुछ लोगों को अपनी प्रसिद्धि पाने की इच्छा पथभ्रष्ट कर देती है और तब वह जनमानस को उत्तेजित करने का प्रयास करते हैं। जब सज्जन लोग उनसे शांति की याचना करते हैं तो उन्हेें लगता है कि वह समाज के श्रेष्ठ तथा अति सज्जन आदमी है। इसलिये अपनी आस्था तथा इष्ट पर की गयी प्रतिकूल टिप्पणियों पर अपना मन खराब नहीं करना चाहिये।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Friday, March 14, 2014

संत कबीर दर्शन-वार्तालाप में अभद्र शब्द प्रयोग करने से बचें (sant kabir darshan-abhadra shabd prayog karne se bachen)



      हमारे देश में समाज ने  शिक्षा, रहन सहन, तथा चल चलन में पाश्चात्य शैली अपनायी है पर वार्तालाप की शैली वही पुरानी रही है। उस दिन हमने देखा चार शिक्षित युवा कुछ अंग्रेजी और कुछ हिन्दी में बात कर रहे थे।  बीच बीच में अनावश्यक रूप से गालियां भी उपयोग कर वह यह साबित करने का प्रयास भी कर रहे थे कि उनकी बात दमदार है। हमने  देखे और सुने के आधार पर यही  समझा कि वहां वार्तालाप में अनुपस्थित किसी अन्य मित्र के लिये वह गालियां देकर उसकी निंदा कर रहे हैं।  उनके हाथ में मोबाइल भी थे जिस पर बातचीत करते हुए  वह गालियों का धड़ल्ले से उपयोग कर रहे थे। कभी कभी तो वह अपना वार्तालाप पूरी तरह अंग्रेजी में करते थे पर उसमें भी वही हिन्दी में गालियां देते जा रहे थे।  हमें यह जानकर हैरानी हुई कि अंग्रेजी और हिन्दी से मिश्रित बनी इस तोतली भाषा में गालियां इस तरह उपयोग हो रही थी जैसे कि यह सब वार्तालाप शैली का कोई नया रूप हो।

संत  कबीर कहते हैं कि

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गारी ही से ऊपजे कष्ट और मीच।

हारि चले सो सन्त है, लागि मरै सो नीच।।

      सामान्य हिन्दी में भावार्थ-गाली से कलह, कष्ट और झंगडे होते हैं। गाली देने पर जो उत्तेजित न हो वही संत है और जो पलट कर प्रहार करता है वह नीच ही कहा जा सकता है।

आवत गारी एक है, उलटत होय अनेक।

कहें कबीर नहि उलटियो, वही एक की एक।।

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-जब कोई गाली देता है तो वह एक ही रहती है पर जब उसे जवाब में गाली दी जाये तो वह अनेक हो जाती हैं। इसलिये गाली देने पर किसी का उत्तर न दें यही अच्छा है।

      कई बार हमने यह भी देखा है कि युवाओं के बीच केवल इस तरह की गालियों के कारण ही भारी विवाद हो जाता है। अनेक जगह हिंसक वारदातें केवल इसलिये हो जाती हैं क्योंकि उनके बीच बातचीत के दौरान गालियों का उपयोग होता है। जहां आपसी विवादों का निपटारा सामान्य वार्तालाप से हो सकता है वह गालियों का संबोधन अनेक बार दर्दनाक दृश्य उपस्थित कर देता है।
      एक महत्वपूर्ण बात यह कि अनेक बार कुछ युवा वार्तालाप में गालियों का उपयोग अनावश्यक रूप से यह सोचकर करते हैं कि उनकी बात दमदार हो जायेगी।  यह उनका भ्रम है। बल्कि इसका विपरीत परिणाम यह होता है कि जब किसी का ध्यान गाली से ध्वस्त हो तब वह बाकी बात धारण नहीं कर पाता।  यह भी एक मनोवैज्ञानिक सत्य है वार्तालाप क्रम टूटने से बातचीत का विषय अपना महत्व खो देता है और गालियों के उपयोग से यही होता है। इसलिये जहां अपनी बात प्रभावशाली रूप से कहनी हो वहां शब्दिक सौंदर्य और उसके प्रभाव का अध्ययन कर बोलना चाहिये। अच्छे वक्ता हमेशा वही कहलाते हैं जो अपनी बात निर्बाध रूप से कहते हैं तो श्रोता भी उनकी सुनते हैं। गालियों का उपयोग वार्तालाप का ने केवल सौंदर्य समाप्त करता है वरन उसे निष्प्रभावी बना देता है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday, March 8, 2014

संत कबीर दर्शन-गालियाँ देने से बचना ही ठीक(gaaliyan dene se bachana hee theek-sant kabir darshan)



      हमारे देश में समाज ने  शिक्षा, रहन सहन, तथा चल चलन में पाश्चात्य शैली अपनायी है पर वार्तालाप की शैली वही पुरानी रही है। उस दिन हमने देखा चार शिक्षित युवा कुछ अंग्रेजी और कुछ हिन्दी में बात कर रहे थे।  बीच बीच में अनावश्यक रूप से गालियां भी उपयोग कर वह यह साबित करने का प्रयास भी कर रहे थे कि उनकी बात दमदार है। हमने  देखे और सुने के आधार पर यही  समझा कि वहां वार्तालाप में अनुपस्थित किसी अन्य मित्र के लिये वह गालियां देकर उसकी निंदा कर रहे हैं।  उनके हाथ में मोबाइल भी थे जिस पर बातचीत करते हुए  वह गालियों का धड़ल्ले से उपयोग कर रहे थे। कभी कभी तो वह अपना वार्तालाप पूरी तरह अंग्रेजी में करते थे पर उसमें भी वही हिन्दी में गालियां देते जा रहे थे।  हमें यह जानकर हैरानी हुई कि अंग्रेजी और हिन्दी से मिश्रित बनी इस तोतली भाषा में गालियां इस तरह उपयोग हो रही थी जैसे कि यह सब वार्तालाप शैली का कोई नया रूप हो।
संत  कबीर कहते हैं कि

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गारी ही से ऊपजे कष्ट और मीच।

हारि चले सो सन्त है, लागि मरै सो नीच।।

      सामान्य हिन्दी में भावार्थ-गाली से कलह, कष्ट और झंगडे होते हैं। गाली देने पर जो उत्तेजित न हो वही संत है और जो पलट कर प्रहार करता है वह नीच ही कहा जा सकता है।

आवत गारी एक है, उलटत होय अनेक।

कहें कबीर नहि उलटियो, वही एक की एक।।

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-जब कोई गाली देता है तो वह एक ही रहती है पर जब उसे जवाब में गाली दी जाये तो वह अनेक हो जाती हैं। इसलिये गाली देने पर किसी का उत्तर न दें यही अच्छा है।

      कई बार हमने यह भी देखा है कि युवाओं के बीच केवल इस तरह की गालियों के कारण ही भारी विवाद हो जाता है। अनेक जगह हिंसक वारदातें केवल इसलिये हो जाती हैं क्योंकि उनके बीच बातचीत के दौरान गालियों का उपयोग होता है। जहां आपसी विवादों का निपटारा सामान्य वार्तालाप से हो सकता है वह गालियों का संबोधन अनेक बार दर्दनाक दृश्य उपस्थित कर देता है।
      एक महत्वपूर्ण बात यह कि अनेक बार कुछ युवा वार्तालाप में गालियों का उपयोग अनावश्यक रूप से यह सोचकर करते हैं कि उनकी बात दमदार हो जायेगी।  यह उनका भ्रम है। बल्कि इसका विपरीत परिणाम यह होता है कि जब किसी का ध्यान गाली से ध्वस्त हो तब वह बाकी बात धारण नहीं कर पाता।  यह भी एक मनोवैज्ञानिक सत्य है वार्तालाप क्रम टूटने से बातचीत का विषय अपना महत्व खो देता है और गालियों के उपयोग से यही होता है। इसलिये जहां अपनी बात प्रभावशाली रूप से कहनी हो वहां शब्दिक सौंदर्य और उसके प्रभाव का अध्ययन कर बोलना चाहिये। अच्छे वक्ता हमेशा वही कहलाते हैं जो अपनी बात निर्बाध रूप से कहते हैं तो श्रोता भी उनकी सुनते हैं। गालियों का उपयोग वार्तालाप का ने केवल सौंदर्य समाप्त करता है वरन उसे निष्प्रभावी बना देता है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Sunday, March 2, 2014

रहीम दर्शन-अपनी सच्चाई के साथ जीना चाहिए(rahim darshan-apne sachchai sa sath jeena chahiye)



      आधुनिक युग में मनुष्य की जीवन को न केवल अस्थिर किया है बल्कि उसकी मानसिकता को भी अन्मयस्क कर दिया है। लोग अपने खानपान, रहनसहन तथा विचारों को लेकर इतने अस्थिर तथा अन्मयस्क हो गये हैं कि उन्हें यह समझ में ही नहीं आता कि क्या रें या क्या न करें? इसलिये प्रकृत्ति से दूर हटकर जीवन जी रहे लोगों को दैहिक तथा मानसिक रोग घेर लेते हैं।
      अपने लिये उत्कृष्ट रोजगार की लालसा में शहर और प्रदेश ही नहीं लोग देश भी छोड़ने को तैयार है। हम अक्सर यह शिकायत करते हैं कि हमारे यहां से प्रतिभाशाली लोग पलायन कर विदेश चले जाते हैं।  हम यह भी देख रहे हैं कि अनेक लोगों ने विदेश में जाकर भारी सम्मान पाया है। वैसे भी कहा जाता है कि अपने व्यक्तिगत विकास के लिये मूल स्थान से बिछड़ना ही पड़ता है। हालांकि अपने मूल शहर, प्रदेश अथवा देश को छोड़कर गये लोगों के हृदय में कहीं न कहीं इस बात का अफसोस होता है कि उन्हें अपने जन्मस्थान से दूर जाना पड़ा। यह स्वाभाविक भी है क्योंकि आप अपने मूल स्थान से जाकर कितना भी विकास करें आपको अपने कार्यस्थल पर बाहरी ही माना जाता है।  उसी तरह मूल स्थान में रहने वाले लोग भी पराया मानने लगते हैं। कहा जाता है कि जो चूल के निकट है वही दिल के भी निकट है।

कविवर रहीम कहते हैं कि

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धनि रहीमगति मीन की, जल बिछुरत जिय जाय।

जिअत कंज तलि अनत बसि, कहा भौंर को भाय।।

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-मछली का जीवन धन्य है जो जल से बिछड़ते ही जीवन त्याग देती है। कमल अगर कीचड़ से प्रथक कहीं दूसरे स्थान पर जीना चाहता है तो भौंरे को उसकी यह बात पसंद नहीं आती।

      एक बात निश्चित है कि मनुष्य अगर संतोषी भाव का हो तो वह  अपने मूल स्थान पर ही बना रहता है यह अलग बात है कि उसे तब वह शनैः शनैः ही विकास की धारा में शामिल हो पाता है। भौतिक विकास को धन्य मानने वाले अपने जीवन का अर्थ तथा प्रकृति को नहीं समझते।  मनुष्य में कमाने वाले को उसके निकटस्थ  लोगों का दिमागी रूप से सम्मान मिलता है पर त्याग करने वाले को पूरा समाज हार्दिक प्रेम करता है।  इस संसार में हर जीव अपना पेट भर लेता है और कोई मनुष्य अगर पेट से ज्यादा कमाकर धन जमा करता है तो कोई तीर नहीं मार  लेता।  मनुष्य की पहचान कमजोर पर परोपकार और बेबस पर दया करने से ही होती है। अगर मनुष्य इन गुणों से हटकर अगर स्वार्थी जीवन जाता है तो उसे यह समझ लेना चाहिये कि उसे हार्दिक सम्मान कभी नहीं मिल सकता है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Sunday, February 23, 2014

पद और पैसे के मद से बचना कठिन-हिंदू चिन्तन लेख -pad aur paise ke mad se bachna kathin-hindu chinntan lekh)



      हमारे अध्यात्मिक महापुरुषों की शिक्षा को भले ही प्राचीन मानकर भुला दिया गया हो पर वह उसके सूत्र आज भी प्रासंगिक है।  हम नये वातावरण में नये सूत्र ढूंढते हैं पर इस बात को भूल जाते हैं प्रकृत्ति तथा जीव का मूल जीवन जिन तत्वों पर आधारित है वह कभी बदल नहीं सकते। हमने सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक तथा धार्मिक स्तर पर अनेक परिवर्तन देखे हैं और कहते हैं कि संसार बदल गया है।  अध्यात्मिक ज्ञान साधक ऐसा भ्रम कभी नहीं पालते। उन्हें पता होता है कि आजकल आधुनिकता के नाम पर पाखंड बढ़ गया है। स्थिति यह हो गयी है कि आर्थिक, राजनीतिक साहित्यक, धार्मिक, सामाजिक तथा कला संस्थाओं में ऐसे लोग शिखर पुरुष स्थापित हो गये हैं जो समाज के सामान्य मनुष्य को भेड़ों की तरह समझकर उनको अपना अहंकार दिखाते हैं।  ऐसे लोग बात तो समाज  के हित की करते हैं पर उनका मुख्य लक्ष्य अपने लिये पद, पैसा तथा प्रतिष्ठा जुटाना  होता है। स्थिति यह है कि मजदूर, गरीब तथा बेबस को भगवान मानकर उसकी सेवा का बीड़ा उठाते हैं और उनका यही पाखंड उन्हें शिखर पर भी पहुंचा देता है।  एक बार वहां पहुंचने के बाद ऐसे लोग अहंकारी हो जाते हैं। फिर तो वह अपने से छोटे लोगों से सम्मान करवाने के लिये कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं।
संत कबीर कहते हैं कि

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जग में भक्त कहावई, चुकट चून नहिं देय।

सिष जोरू का ह्वै रहा, नाम गुरु का लेय।।

     सामान्य हिन्दी भाषा में भावार्थ-कुछ मनुष्य संसार में भला तो  दिखना चाहते हैं पर वह किसी थोड़ा चूना भी नहीं देसकते।  ऐसे लोगों के मस्तिष्क में तो परिवार के हित का ही भाव रहता पर अपने मुख से केवल परमात्मा का नाम लेते रहते हैं।

विद्यामद अरु गुनहूं मद, राजमद्द उनमद्द।

इतने मद कौ रद करै, लब पावे अनहद्द

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-विद्या के साथ  गुण का अहंकार तथा राजमद मनुष्य के अंदर उन्माद पैदा कर देता है।  इस तरह के मद से मुक्त होकर ही परमात्मा का मार्ग मिल सकता है।

      अनेक बुद्धिमान  यह देखकर दुःखी होते हैं कि पहले समाज का भले करने का वादा तथा दावा कर शिखर पर पहुंचने के बाद लोग उसे भूल जाते हैं। इतना ही नहीं समाज के सामान्य लोगों की दम पर पहुंचे ऐसे लोग विकट अहंकार भी दिखाते हैं।  ज्ञान साधकों के लिये यह दुःख विषय नहीं होता। पद, पैसे और प्रतिष्ठा के शिखर पर पहुंचा व्यक्ति उन्मादी हो ही जायगा यह वह जानते हैं। ऐसे विरले ही होते हैं जिनको यह अहंकार नहीं आता।  जिनको अर्थ, राजनीति, समाजसेवा, धर्म तथा कला के क्षेत्र में पहली बार शिखर मिलता है तो उनके भ्रम का तो कोई अंत नहीं होता। उन्हें लगता है कि उनका पद तो उनके जन्म के साथ ही जमीन पर आया था। उनमें यह विचार तक नहीं आता कि जिस पद पर वह आज आयें हैं उस पर पहले कोई दूसरा बैठा था।  ऐसे लोग समाज सेवा और भगवान भक्ति का जमकर पाखंड करते हैं पर उनका लक्ष्य केवल अपने लिये पद, पैसा और प्रतिष्ठा जुटाना ही होता है।
      सामान्य लोगों को यह बात समझ लेना चाहिये कि उनके लिये दाल रोटी खाओ, प्रभु के गुण गाओजैसी नीति का पालन करने के  अलावा कोई अन्य मार्ग नहीं होता। उन्हें पाखंडियों पर अपनी दृष्टि रखने और उन पर चर्चा कर अपना समय बर्बाद करने से बचना चाहिये।



दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday, February 15, 2014

संत चरण दास दर्शन-संसार में सुख पाने के लिये बेपरवाह रहें(sansar mein sukh pane ke liye beparvah rahe-sant charandas darshan)



      इस संसार की माया की महिमा भी विचित्र है। जिसके पास धन कम है वह उसे पाने के लिये भटकता हुआ तकलीफ उठाता है तो जो धनवान है भी अधिक धन के लिये जूझता दिखता है।  माया के इस खेल में मनुष्य यह तय नहीं कर पाता कि उसे चाहिए क्या?  इस संसार में सबसे सरल काम है धन कमाने में लगे रहना।  अनेक लोग शासकीय सेवा से निवृत होने के बाद भी दूसरी जगह जाकर कमाना चाहते हैं भले ही उनका काम पेंशन से चल सकता है।  सच बात तो यह है कि अध्यात्मिक संस्कार और ज्ञान बचपन से नहीं मिले तो बड़ी आयु में सत्संग या भगवान भजन की प्रवृत्ति जाग ही नहीं सकती।  यही कारण है कि बड़ी आयु में भी मनुष्य सांसरिक विषयों में लिप्त रहकर समय काटना चाहता है।  यह अलग बात है कि प्रकृति तथा सामाजिक नियमों में चलते सांसरिक विषय उसे स्वतः छोड़ने लगते हैं तब अध्यात्मिक ज्ञान तथा संस्कारों से रहित मनुष्य चिढ़चिढ़ा हो जाता है।

संत चरणदास कहते हैं कि

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काहू से नहि राखिये, काहू विधि की चाह।

परम संतोषी हूजिये, रहिये बेपरवाह।।

        सामान्य हिन्दी में भावार्थ-किसी भी अन्य मनुष्य से किसी प्रकार की चाहत नहीं करना ही चाहिए।  अपने अंदर संतोष का भाव पालकर बेपरवाह मनुष्य ही इस संसार में सुखी रह सकता है।

चाह जगत की दास है, हरि अपना न करै।

चरनदासयों कहत हैं, व्याधा नाहि टरै।।

      सामान्य हिन्दी मे भावार्थ-मनुष्य के अंदर विचर रही इच्छायें उसे संसार का दास बना देती हैं और वह परमात्मा से दूर हो जाता है। इच्छायें पालने वाला मनुष्य हमेशा ही संकट में घिरा रहता है।

      हमारे यहां स्वतंत्रता का मतलब केवल भौतिक क्रियाओं में अपनायी  जाने वाली स्वैच्छिक प्रवृत्ति से है। कभी कोई नया रचनात्मक विचार करने की बजाय दूसरे के निर्मित पथ पर आगे बढ़ना सहज लगता है पर इससे मस्तिष्क में व्याप्त दासता के भाव का ही बोध होता है। जो जग कर रहा है वही हम कर रहे हैं तो फिर हमारे काम में नयापन क्या है? यह विचार करना ही मनुष्य को डरा देता है।  माया और विषयों का दास मनुष्य संपत्ति संग्रह के बाद भी प्रसन्न नहीं रह पाता।
      अतः जिन लोगों को प्रसन्नता चाहिये उन्हें अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति से अधिक संचय करने की प्रवृत्ति से बचना चाहिये। जीवन में सुख प्राप्त करने का सबसे अच्छा उपाय यही है कि माया के अधिक प्रभाव से बचते हुए लापरवाह हुआ जाये।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

यह ब्लाग/पत्रिका विश्व में आठवीं वरीयता प्राप्त ब्लाग पत्रिका ‘अनंत शब्दयोग’ का सहयोगी ब्लाग/पत्रिका है। ‘अनंत शब्दयोग’ को यह वरीयता 12 जुलाई 2009 को प्राप्त हुई थी। किसी हिंदी ब्लाग को इतनी गौरवपूर्ण उपलब्धि पहली बार मिली थी। ------------------------

Saturday, February 1, 2014

पैसा, पद और प्रतिष्ठा पाकर मद आ ही जाता है-हिंदू आध्यात्मिक चिंत्तन लेख (paisa, pad aur pratishtha paakar sabhi ko mad aa hee jaataa hai-hindu adhyatmik chinntan)



            हमारे देश में लोकतांत्रिक राज्य प्रणाली है जिसमें आमजनों के मत से चुने गये प्रतिनिधि राज्य कर्म पर नियंत्रण करते हैं।  इन्हें राजा या बादशाह अवश्य नहीं कहा जाता पर उनका काम उसी तरह का होता है। पदों के नाम अलग अलग होते हैं पर उन्हें राज्य कर्म में लगी व्यवस्था पर नियंत्रण का अधिकार प्राप्त होता है। पहले राजा की जिम्मेदारी होती थी कि वह प्रजा का पालन करे और वह इस जिम्मेदारी का अपनी योग्यता के अनुसार निभाते भी थे। उनमें कुछ योग्य थे तो कुछ आयोग्य। बहरहाल कम से कम उन पर प्रजा हित की प्रत्यक्ष जिम्मेदारी होती थी।
            लोकतांत्रिक प्रणाली में जनप्रतिनिधि के पास कोई प्रत्यक्ष काम करने का दायित्व नहीं होता वरन् संविधान के अनुसार राज्य व्यवस्था के लिये संस्थायें होती हैं जिनकी वह केवल देखभाल करता है। एक तो उस पर प्रजा हित का प्रत्यक्ष दायित्व नहीं होता दूसरे उनके पद पर कार्य करने की अवधि निश्चित होती है। उसके पूर्ण होने पर उनको फिर प्रजा के समक्ष जाना होता है।  जिन लोगों को राज्य कर्म में उच्च पद पर प्रतिष्ठित होना है उन्हें लोकतंत्र में जनमानस में अपनी छवि बनाये रखने के लिये तमाम तरह के स्वांग करने ही होते हैं। इससे प्रचार माध्यम उन्हें अपनी यहां स्थान देकर अपना व्यवसाय चलाने के लिये विज्ञापन भी जुटाते हैं। जनमानस में छवि बनाये रखने के प्रयास और जल कल्याण के लिये प्रत्यक्ष कार्य न करने की सुविधा का जो अच्छी तरह लाभ उठाये वही सर्वाधिक लोकप्रिय होता है। इस लोकतांत्रिक प्रणाली में  अगर जनहित का काम न हो या भ्रष्टाचार का प्रकरण हो तो दूसरे पर दोष डालना और अगर अच्छा हो जाये तो अपनी वाहवाही करना राज्य कर्म में उच्च पदों पर कार्यरत लोगों को सुविधाजनक लगता है।
            राज्य कर्म में लगे लोगों की प्रवृत्ति राजसी होती है।  जिसमें लोभ, क्रोध,  और अहंकार के साथ ही पद बचाये रखने का मोह और कामना गुण स्वयमेव उत्पन्न होते हैं।  हमारे यहां लोकतंत्र में आस्था रखने वाले राज्यकर्म में लोगों से सात्विक व्यवहार की आशा व्यर्थ ही करते हैं।  जिनके पास कोई राज्य कर्म करने के लिये नहीं है वह सात्विकता से यह काम करने का दावा करते है। जिनके पास है वह भी स्वयं को सात्विक प्रवृत्ति का साबित करने में लगे रहने हैं। इस तरह स्वांग लोकतंत्र में करना ही पड़ता है।  यह नहीं है कि राज्यकर्म में सात्विक लोग आते नहीं है पर वह ज्यादा समय तक अपना वास्तविक भाव नहीं बनाये रख पाते या फिर हट जाते हैं।

विदुर नीति में कहा गया है कि

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ऐश्वमदयापिष्ठा सदाः पानामदादयः।

ऐश्वर्यमदत्तो हि नापतित्वा विबुध्यते।।

            हिन्दी में भावार्थ-वैसे तो मादक पदार्थ के सेवन में नशा होता है पर उससे ज्यादा बुरा नशा वैभव का होता है। पद, पैसे तथा प्रतिष्ठा प्राप्त व्यक्ति भ्रष्ट हुए बिना नहीं रहता।

            अभी हाल ही में एक राज्य की विधानसभा के चुनावों में आम इंसानों को राजकीय कर्म में भागीदारी दिलाने का एक उच्च स्तरीय नाटक खेला गया। इस तरह के नाटक लोकतंत्र में जनमानस में अपनी छवि बनाने के लिये अत्यंत आवश्यक होते हैं इसलिये इन्हें गलत मानना भी नहीं चाहिये।  एक दल के लोगों को आमजन का प्रतीक माना गया। इस दल के लोगों ने चुनाव प्रचार के दौरान सत्ता में आने पर राजकीय भवन तथा वाहन न लेने की घोषणा की। दल अल्पमत में था और विधानसभा में अपना बहुमत साबित करना था।  उससे पूर्व तक इसके लोगों ने परिवहन के लिये आमजनों की सार्वजनिक सुविधाओं का उपयोग किया।  ऐसा प्रचार हुआ कि यह लोग आमजन के वास्तविक हितैषी है।  यह प्रचार  दूसरे दलों पर समर्थन देने के लिये दबाव बनाने के रूप में किया गया।  बहुमत मिला तो अगले दिन ही सभी का रूप बदल गया।  जिन प्रचार माध्यमों ने इनकी धवल छवि का प्रचार किया वही अब नाखुश दिख रहे हैं।
            हो सकता है कि इससे कुछ आम बुद्धिजीवी निराश हों पर ज्ञान साधकों के लिये इसमें कुछ नया नहीं है। राजसी कर्म की यही प्रवृत्ति है।  सच बात तो यह है कि जो राजसी कर्म श्रेष्ठता से संपन्न  करता है उसे उसका फल भी मिलता है। दूसरी बात यह कि राजसी कर्म हमेशा ही फल की कामना से किये भी जाते हैं। सात्विक प्रकृत्ति के लोग कभी भी राज्य कर्म करने का प्रयास नहीं करते इसका मतलब यह नही है कि वह राजसी कर्म करते ही नहीं है। राजसी प्रकृत्ति का राज्य कर्म एक हिस्सा भर है।  व्यापार, कला या साहित्य में भौतिक फल की कामना करना भी राजसी प्रकृत्ति का ही है।  सात्विक प्रकृत्ति के लोग अपनी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति की सीमा तक इनमें लिप्त रहते भी हैं पर वह कभी इस तरह का दावा नहीं करते कि निस्वार्थ भाव से व्यापार कर रहे हैं।
            कहने का अभिप्राय यह है कि प्रचार माध्यमों में लोकतंत्र के चलते अनेक प्रकार के नाटकीय दृश्य देखने को मिलते हैं।  एक तरह से यह दृश्य जीवंत फिल्मों की तरह होते हैं जिनमें अभिनय करने वाले स्वयं को सात्विक प्रकृत्ति का दिखाने का प्रयास करते हैं। ज्ञान साधकों को उनके अभिनय का अनुमान होता है पर आमजन अपना हृदय इन दृश्यों और पात्रों में लगा बैठते हैं जो कि बाद में उन्हें निराश करते हैं।  भारतीय अध्यात्म दर्शन के राजसी कर्म में लोगों का इस तरह कार्य करना और फल लेना कोई आश्चर्य की बात नही होती। राजसी कर्म करने वाले बुरे नहीं होते पर उनके सात्विक दावों पर कभी यकीन नहीं करना चाहिए।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


Saturday, January 25, 2014

भर्तृहरि नीति शतक-मनस्वी पुरुष कभी परेशान नहीं होते (bhartrihari neeti shatak-manswi purush kabhee pareshan nahin hote)



      इस संसार में दो प्रकार के लोग होते हैं-एक भोगी तथा दूसरे योगी। भोगी लोग जीवन में विषयों में लिप्तता को ही सर्वोपरि मानते हैं। भोगी  लोगउपभोग के सामानों का संग्रह ही अपना लक्ष्य मानते हुए अपना जीवन उन्हीं को समर्पित कर देते हैं जबकि योगी लोग भौतिक सामानों का जीवन में आनंद उठाने का साधन मानकर समाज के लिये आदर्श स्थितियों का निर्माण करने में लगे रहते हैं। ज्ञानियों की दृष्टि में बिना सामानों के भी जीवन में उठाया जा सकता है। उल्टे अधिक सामानों का संग्रह चिंता तथा तनाव का कारण होता है। कुछ लोग स्वादिष्ट भोजन के चक्कर में अनेक प्रकार स्वांग रचते हैं जबकि योगी तथा ज्ञानी भोजन को देह पालने की दृष्टि से दवा के रूप में ग्रहण करते हैं। 
भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि

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क्वचित् पृथ्वीशय्यः क्वचिदपि च पर्वङ्कशयनः क्वच्छिाकाहारः क्वचिदपि च शाल्योदनरुचिः।

क्वचित्कन्धाधारी क्वचिदपि च दिव्याभवरधरोः मनस्वी कार्यार्थी न गपयति दुःखः न च सुखम्।।

     हिन्दी में भावार्थ-कभी प्रथ्वी पर सोना पड़े कभी पलंग पर मखमली बिछोने पर शयन का सौभाग्य मिले, कभी बढ़िया तो कभी सादा खाना मिले, जिनकी रुचि अपने लक्ष्य में रहती है वह कभी इन बातों की परवाह नहीं करते।  मनस्वी पुरुष दुःख सुख की चिंता में न पड़कर कभी सामान्य तो कभी दिव्य वस्त्र पहनकर  अपने जीवन मार्ग पर दृढ़ता पूर्वक बढ़ते हुए दूसरों के सामने अपना आदर्श प्रस्तुत करते हैं।
      सच बात तो यह है कि उपभोग की प्रवृत्ति मनुष्य को कायर बना देती है। वह किसी बड़े सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक अथवा सांस्कृतिक अभियान में लंबे समय तक सक्रिय नहीं रह पाता। इतना ही अधिक उपभोग मानसिक, वैचारिक तथा अध्यात्मिक से कमजोर भी बनाता है। हम इसे अपने देश में अनेक सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक तथा साहित्यक अभियानों का नेतृत्व करने वाले कथित  शीर्ष पुरुषों की क्षीण वैचारिक, मानसिक तथा अध्यात्मिक स्थिति को देखकर समझ सकते है। यह सभी कथित शीर्ष पुरुष बातें बड़ी बड़ी करते हैं पर किसी का अभियान लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाता।  इसका कारण यह है कि जिनका जीवन सुविधाओं के साथ व्यतीत होता है वह अपने कथित अभियानों की वजह से लोकप्रियता भले ही प्राप्त कर लें पर उनमें इतनी क्षमता नहीं होती कि वह अपने सिद्धांतों या वादों को धरातल पर उतार सकें।  इसके लिये जिस त्याग भाव की आवश्यकता होती है वह केवल उन्हीं लोगों में हो सकता है जो सुविधायें मिलने की परवाह न करते हुए मनस्वी हो जाते हैं। 

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday, January 18, 2014

संत कबीर दर्शन के आधार पर चिंत्तन लेख-पेशेवर गुरुओं का ज्ञान लोग धारण नहीं कर पाते (peshewar guruon ka gyan log dharan nahin kar pate-hindi thought article on sant kabir darshan)



            हमारे देश में प्रचलित अध्यात्मिक धारा के अनुसार  जिस तरह साकार और निराकार दोनों ही प्रकार की पूजा पद्धतियों को सहज मान्यता प्राप्त है वह विश्व में किसी अन्यत्र विचाराधारा में नहीं है। इसका लाभ यह होता है कि समाज में कभी पूजा पद्धति को लेकर आपस वैमनस्य नहीं फैलता पर इससे हानि यह हुई कि साकार और सकाम भक्ति की आड़ में हमारे यह व्यवसायिक धार्मिक गुरुओं का प्रभाव इस तरह कायम हो गया कि तत्वज्ञान एक अगेय विषय बन गया। इसकी चर्चा सभी करते हैं पर ग्रहण करने का सामार्थ्य बहुत कम लोगों में होता है। 
            सामान्य मनुष्य बहिर्मुखी होता है और इंद्रियों का भी यह स्वभाव होता है कि वह बाहर के विषयों की तरफ आकर्षित होती हैं।  यही कारण है कि आकर्षक आश्रम, मनोरंजन की दृष्टि से कथायें कहने वाले गुरु तथा सांसरिक फल जल्दी दिलाने के लिये प्रसिद्ध धार्मिक स्थान समाज में सदैव लोकप्रिय रहे हैं।  यह कोई आजकल की बात नहीं वरन् कबीर के समय से ही इस तरह का प्रचलन  रहा है इसलिये उन्होंने  व्यास पीठ पर बैठकर कथा करने वालों की तरफ स्पष्ट ऐसा संकेत दिया जिनसे मन में मनोरंजन का भाव तो आ सकता है पर तत्वज्ञान धारण करना कठिन होता है।  यह सभी को पता है कि कथा के सार्वजनिक प्रदर्शन में लगे लोग धन लेते हैं। उनका कथा करना तथा पैसे लेना कोई बुरा काम नहीं  पर उसका अध्यात्मिक ज्ञान की दृष्टि से कितना महत्व है यह भी समझा जाना चाहिये।
संत कबीर दास कहते हैं कि
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कबीर व्यास कथा कहैं, भीतर भेदे नाहिं।
औरों कूं परमोधर्ता, गये मुहर का माहिं।।
            सामान्य हिन्दी में भावार्थ-व्यास पीठ  पर बैठकर कुछ विद्वान कथा करते हैं पर उनकी बातें श्रोताओं का हृदय भेदकर अंदर नहीं जातीं। ऐसे विद्वान दूसरों का उद्धार क्या करेंगे स्वयं ही पैसे की लालच में आकर यह कथा का व्यवसाय अपनाते हैं।
कबीर कहहिं पीर को, समझावै सब कोय।
संसय पड़ेगा आपकूं, और कहें का होय।।
            सामान्य हिन्दी में भावार्थ-दूसरों की पीड़ा को देखकर उनके हरण का उपाय अनेक समझाते हैं पर स्वयं अपनी समस्याओं के हल को लेकर वह स्वयं ही सशंकित रहते हैं।  जिन्होंने ज्ञान का रटा लगाया है पर धारण नहीं किया वही दूसरों को ज्ञान बांटते हैं।
            इस देश में अनेक लोगों ने धार्मिक प्रवचन करते करते इतना धन कमा लिया है कि अनेक उद्योगपति तथा व्यवसायी भी उन जैसी समृद्धि प्राप्त नहीं कर पाते हैं।  देखा जाये तो भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान के नाम पर जितना व्यवसाय होता है उतना शायद ही किसी अन्य विषय या वस्तु का होता हो।  कुछ विद्वान कहते हैं कि भारतीय अध्यात्मिक दर्शन से संबंधित ग्रंथों में  कि भारतीय वेदों में अस्सी फीसदी सकाम तथा बीस फीसदी वाक्य निष्काम भक्ति से सबंधित है। दूसरी बात यह भी त्यागी को बड़ा माना गया है भोगी को नहीं।  मजे की बात यह है कि जो लोग सकाम भक्ति के मंच पर होते हैं वही निष्काम रहने का उपदेश देते हैं।  निराकार की बात करते करते साकार भक्ति की बात करने लगते हैं।  इतना ही नहीं भोग की सामग्री का संचय करने वाले ही अपने शिष्यों को त्याग कर धर्म निर्वाह करने का संदेश देते हैं।  दान के नाम अपनी कथाओं का दाम लेकर अपने शिष्यों को  धन्य करते हैं।
            इन व्यवसायिक कथाकारों पर किसी प्रकार की दोषदृष्टि रखना व्यर्थ है क्योंकि अपनी समस्याओं से परेशान लोगों के मन को को यह कुछ समय तक उसे संसारिक विषयों से परे रख थोड़ी राहत अवश्य देते हैं। हमारे कहने का अभिप्राय तो यह है कि मन में स्थाई रूप से शांति रहे उसके लिये योग तथा ज्ञान की साधना करते रहना चाहिये।



दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


Wednesday, January 8, 2014

प्रजा हित केवल स्वस्थ व्यक्ति ही कर सकता है-हिंदी धार्मिक चिन्तन (prajahit kewal swawsth hi kar sakta hai-hindi dharmik chinntan)



                        हमारे दर्शन के अनुसार पूर्णतः स्वस्थ होने पर ही किसी मनुष्य को राजसी कर्म करना चाहिये। ऐसे में जिन लोगों पर राज्य का भार है उनको प्रजा हित के लिये अधिक ही परिश्रम करना होता है इसलिये उनका पूर्णतः स्वस्थ होना आवश्यक है।  आधुनिक लोकतंत्र ने पूरे विश्व में राज्य व्यवस्थाओं में इस नीति का पालन नहीं किया जा रहा है। आज तो सभी देशों में यही देखा जाता है कि चुनाव में कौन जीत सकता है? चुनाव जीतने की योग्यता और क्षमता ही राज्यपद पाने का एक आधार बन गयी है।  ऐसे में अनेक देशों के राज्य प्रमुख शासन में आने के बाद जनता में अपनी लोकप्रियता खो देते हैं। दूसरी बात यह भी है कि पद की अवधि पांच या छह साल होती है उसमें राज्य पद पर प्रतिष्ठित होने पर व्यक्ति की चिंतायें प्रजा हित से अधिक अपने चुनाव के लिये चंदा देने वालों का उधार चुकाने या फिर अगले चुनाव में फिर अपना पद बरबकरार रहने की होती है।  कुछ समय विपक्षियों का सामना करने तो बाकी समय जनता के सामने नये वादे करते रहने में लग जाता है।
                        अनेक देशों के राज्य प्रमुख शारीरिक, मानसिक तथा वैचारिक दृष्टि से अस्वस्थ होने के बावजूद सत्ता रस पीते रहते हैं। राज्य के अधिकारी भी अपनी नौकरी चलाते हुए केवल राज्य प्रमुख की कुर्सी बचाये रखने में अपना हित समझते हैं। विश्व प्रसिद्ध चिंत्तक कार्लमार्क्स ने अपने पूंजी नामक पुस्तक में इन पूंजीपतियों के हाथ लग चुकी व्यवस्थाओं की चर्चा बहुत की है।  यह अलग बात है कि उसके अनुयायियों ने भी अपने शासित राष्ट्रों में शारीरिक, मानसिक तथा वैचारिक दृष्टि से बीमार लोगों को उच्च पदों पर बैठाये रखा और बेबस जनता तानाशाही की वजह से उनको ढोती रही।  वामपंथी व्यवस्था में बौद्धिकों को वैचारिक मध्यस्थ बन कर मजे लूटने की सुविधा मिलती है इसलिये वह जनहित की बातें बहुत करते हैं पर अपने शिखर पुरुषों की शारीरिक, मानसिक तथा वैचारिक अस्वस्थता को निजी विषय बताते हैं।  मजे की बात यही है कि यही वामपंथी बौद्धिक मध्यस्था मनुस्मृति का जमकर विरोध करते हैं।
मनुस्मृति में कहा गया है कि

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अमात्यंमुख्यं धर्मज्ञं प्राज्ञं दान्तं कुलोद्भवम्।

स्थापयेदासने तस्मिन् खिन्नः कार्येक्षणे नृणाम्।।

                        हिन्दी में भावार्थ-जब राज्य प्रमुख अपने खराब स्वास्थ्य की वजह से प्रजाहित के कार्यों का निरीक्षण करने में असमर्थ हो तब उसे अपना कार्यभार किसी बुद्धिमान, जितेन्द्रिय, सभ्य तथा शिष्ट पुरुष को सौंप देना चाहिये।

विक्रोशन्त्यो यस्य राष्ट्राद्धियन्ते दस्युभिः प्रजाः।

सम्पतश्यतः सभृत्यस्य मृतः स न तु जीवति।।

                        हिन्दी में भावार्थ-उस राजा या राज्य प्रमुख को जीवित रहते हुए भी मृत समझना चाहिये जिसके अधिकारियों के सामने ही डाकुओं से लूटी जाती प्रजा हाहाकर मदद मांगती है पर वह उसे बचाते ही नहंी है।
                        सामान्य सिद्धांत तो यही है कि अस्वथ्यता की स्थिति में राज्य प्रमुख किसी गुणी आदमी को अपना पदभार सौप दे पर होता यह है कि वामपंथी विचारक शिखर पर बैठे पुरुष को अपने अनुकूल पाते हैं तो वह उसकी जगह किसी दूसरे को स्वीकार नहंी करते। दूसरी बात यह है कि आजकल के राज्य प्रमुखों में इतनी मानवीय चतुराई तो होती है कि वह अपने बाद के दावेदारों को आपस में लड़ाये रखते है ताकि कोई उसकी जगह कोई दूसरा नहीं ले सके। अनेक जगह तो राज्य प्रमुख इस तरह की व्यवस्था कर देते हैं कि उनके बाद उनके परिवार के सदस्यों को ही जगह मिले। वामपंथियों के सबसे बड़े गढ़ चीन में भी अब शासन में परिवारवाद आ गया है।  वामपंथियों ने शायद इसलिये ही हमेशा मनुस्मृति का विरोध किया है ताकि उसकी सच्चाई से आम लोग अवगत न हों और उनका छद्म समाज सुधार का अभियान चलता रहे।
                        हम आजकल पूरी विश्व अर्थव्यवस्था चरमराने की बात करते हैं। उसका मुख्य कारण यही है कि अनेक महत्वपूर्ण देशों का शासन पुराने राजनीतिक सिद्धांतों की अनदेखी कर चलाया जा रहा है। स्थिति यह है कि तानाशाही व्यवस्था हो या लोकतांत्रिक सत्य कहने का अर्थ अपने लिये शत्रुओं का निर्माण करना होता है। अपनी आलोचना सहन करने के लिये पर्याप्त प्राणशक्ति बहुत कम लोगों में रह गयी है। इसका मुख्य कारण शारीरिक, मानसिक तथा वैचारिक अस्वस्थता ही है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


Saturday, January 4, 2014

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-शुभ लक्षणों वाले व्यक्ति से ही संपर्क करें(kautilya ka arthshastra-shubh lakshanon wale vyakti se hi sampark karen)



                        सांसरिक जीवन में उतार चढ़ाव आते ही रहते हैं। हम जब पैदल मार्ग पर चलते हैं तब कहीं सड़क अत्यंत सपाट होती है तो कहीं गड्ढे होते हैं। कहीं घास आती है तो कहंी पत्थर पांव के लिये संकट पैदा करते हैं।  हमारा जीवन भी इस तरह का है। अगर अपने प्राचीन ग्रंथों का हम निरंतर अभ्यास करते रहें तो मानसिक रूप से परिपक्वता आती है। इस संसार में सदैव कोई विषय अपने अनुकूल नहीं होता। इतना अवश्य है कि हम अगर अध्यात्मिक रूप से दृढ़ हैं तो उन विषयों के प्रतिकूल होने पर सहजता से अपने अनुकूल बना सकते हैं या फिर ऐसा होने तक हम अपने प्रयास जारी रख सकते हैं।  दूसरी बात यह भी है कि प्रकृति के अनुसार हर काम के पूरे होने का एक निश्चित समय होता है।  अज्ञानी मनुष्य उतावले रहते हैं और वह अपने काम को अपने अनुकूल समय पर पूरा करने के लिये तंत्र मंत्र तथा अनुष्ठानो के चक्कर पड़ जाते हैं।  यही कारण है कि हमारे देश में धर्म के नाम पर अनेक प्रकार के पाखंडी सिद्ध बन गये हैं। ऐसे कथित सिद्धों की संगत मनुष्य को डरपोक तथा लालची बना देती है जो कथित दैवीय प्रकोप के भय से ग्रसित रहते हैं।  इतना ही नहीं इन तांत्रिकों के चक्कर में आदमी इतना अज्ञानी हो जाता है कि वह तंत्र मंत्र तथा अनुष्ठान को अपना स्वाभाविक कर्म मानकर करता है।  उसके अंदर धर्म और अधर्म की पहचान ही नहीं रहती।
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया है कि

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अपां प्रवाहो गांङ्गो वा समुद्रं प्राप्य तद्रसः।

भवत्यपेयस्तद्विद्वान्न्श्रयेदशुभात्कम्।।

                        हिन्दी में भावार्थ-गंगाजल जब समुद्र में मिलता है तो वह पीने योग्य नहीं रह जाता। ज्ञानी को चाहिये कि वह अशुभ लक्षणों वाले लोगों का आश्रय न ले अन्यथा उसकी स्थिति भी समुद्र में मिले गंगाजल की तरह हो जायेगी।

किल्श्यन्नाप हि मेघावी शुद्ध जीवनमाचरेत्।

तेनेह श्लाध्यतामेति लोकेश्चयश्चन हीयते।।

                        हिन्दी में भावार्थ-बुद्धिमान को चाहे क्लेश में भी रहे पर अपना जीवन शुद्ध रखे इससे उसकी प्रशंसा होती है। लोकों में अपयश नहीं होता।
                        हमारे देश में अनेक ज्ञानी अपनी दुकान लगाये बैठे हैं। यह ज्ञानी चुटकुलों और कहानियों के सहारे भीड़ जुटाकर कमाई करते हैं। इतना ही नहीं उस धन से न केवल अपने लिये राजमहलनुमा आश्रम बनाते हैं बल्कि दूसरों को अपने काम स्वयं करने की सलाह देने वाले ये गुरु अपने यहां सारे कामों के लिये कर्मचारी भी रखते हैं।  एक तरह से वह धर्म के नाम पर कपंनियां चलाते हैं यह अलग बात है कि उन्हें धर्म की आड़ में अनेक प्रकार की कर रियायत मिलती है।  मूल बात यह है कि हमें अध्यात्मिक ज्ञान के लिये स्वयं पर ही निर्भर होना चाहिये। दूसरी बात यह भी है कि ज्ञान होना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि उसे धारण भी करना चाहिये।  यही बुद्धिमानी की निशानी है। बुद्धिमान व्यक्ति तनाव का समय होने पर भी अपनी मर्यादा नहीं छोड़ता।  यही कारण है कि बुरा समय निकल जाने के बाद वह प्रतिष्ठा प्राप्त करता है।  लोग उसके पराक्रम, प्रयास तथा प्रतिबद्धता देखकर उसकी प्रशंसा करते हैं।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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