Saturday, November 1, 2014

मन चंगा हो तो फिर जीवन में भटकाव नहीं होता-हिन्दी चिंत्तन लेख(man changa hot jivan mein bhatkav nahin hota-hindi thought article)



           
            भक्ति से मन का भटकाव दूर होता है यह पहला सच है। दूसरा सच यह है कि अनियंत्रित मन हमेशा ही भटकता है। वह एक विषय से ऊबता है तो दूसरे की तरफ भागता है। फिर दूसरे से तीसरा और तीसरे से चौथा विषय उसे अपनी तरफ खींचता है। ऐसे में कोई सर्वशक्तिमान की भक्ति की राय देता है तो भटकता मन वहां भी उसी तरह जाता है जैसे कि वह एक नया सांसरिक विषय है। ऐसी क्षणिक भक्ति से मन को तात्कालिक रूप से आंनद मिलता है।  लगभग वैसा नष्टप्राय होता है जैसे एक विषय से दूसरे विषय की तरफ जाने पर मिलता है।
            नवीन विषय, नई अनुभूति, नया रोमांच फिर वही उकताहट! मानव इंद्रियां बाहर सहजता से सक्रिय रहती हैं।  इसलिये ही साकार भक्ति सहज लगती है।  मन के लिये बाहर इष्ट का कोई रूप चाहिये यह बेबसी सकाम भक्तों के लिये सदैव रहती है।
            निरंकार भक्ति सहज बनाती है पर सहजता से नहीं होती। इंद्रियां देह के पिंजरे के बाहर ही झांकना चाहती हैं। अंदर की अस्वच्छता उन्हें बाहर के विषयों में देखने, सुनने, कहने, सूंघने और के लिये विवश करती हैं।  जहां उन्हें मौन रहना चाहिये वहां चीखती हैं और जहां बोलना चाहिये वहां डर कर मौन हो जाती हैं।
            इसका उपाय यही है कि योग साधना कर अपनी देह, मन और विचारों को नई स्फूर्ति प्रदान की जाये।  योग साधना के दौरान आसनों से देह, प्राणायाम से मन और ध्यान से विचार शक्ति प्रखर होती है।
            एक योग साधक की अपने ही एक पुराने धार्मिक गुरु से मुलाकात हुई।
            गुरु ने कहा-‘‘क्या बात है? आजकल तुमने हमारे आश्रम पर आना ही बंद कर दिया है। लगता है तुम्हें हमारी जरूरत नहीं है?
            उस योग साधक ने जवाब दिया-तृप्त मन लेकर आपके पास कैसे आंऊ? आपकी कृपा से अब मन तृप्त रहने लगा है।’’
            गुरु ने कहा-बताओ तो सही हमारी कृपा से तुम्हारा मन तृप्त कैसे रहने लगा है?’’
            योग साधक ने कहा-अब मैं योग साधना में जो समय प्रातःकाल गुजारता हूं उससे मेरा मन पूरी तरह से तृप्त हो जाता है। अक्सर में इधर उधर जाने की सोचता हूं पर जब मन की तरफ देखता हूं तो उसे मौन पाता हूं।’’
            गुरु जी ने कहा-‘‘योग साधना की सलाह तो मैंने कभी नहीं दी थी।  मैं तो भक्ति की बात करता हूं।’’
            योग साधक ने जवाब दिया-‘‘आपने सलाह नहीं दी, पर आपके पास आते आते कहीं से यह प्रेरणा आ ही गयी। फिर संगत भी मिली।  जहां तक भक्ति का प्रश्न है वह तो मंत्र जाप से हो ही जाती है। मुख्य बात यह कि अब अतृप्त मन नहीं जो अपनी अध्यात्मिक प्यास बुझाने इधर उधर जांऊ।
            आत्मा मनुष्य का स्वामिनी हैं पर मन उसका प्रबंधक है। जिस तरह किसी उद्यम का स्वामी अपने प्रबंधकों की सहायता से चलता है वैसे ही यह देह भी है।  यह मन प्रबंधक अगर योग्य है तो देह का स्वामी ज्ञान से संपन्न होता है और अकुशल हो तो भटका देता है।  अकुशल मन प्रबंधक देह का समय और शक्ति इधर उधर विनिवेश कराता है पर कहीं से लाभ प्राप्त नहीं करता। इसलिये मन को  कुशल प्रबंधक का प्रशिक्षण देना चाहिये जो कि योग साधना से ही संभव है। त कवि रैदास ने कहा भी है कि ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’। इसका तात्पर्य यही है कि अगर मन में शांति और ंसतोष तो फिर भटकाव नहीं होता।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Thursday, October 23, 2014

विश्व योग दिवस मनाया जाना चाहिये-हिन्दी चिंत्तन लेख(vishwa yoga diwas manaya jana chahiye-hindi thought article)



            प्रधानमत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र संघ में अपने संबोधन में सारे विश्व में योग दिवस मनाने का प्रस्ताव दिया है। इस तरह की बात विश्व के सबसे बड़े राजनीतिक मंच पर अधिकारिक रूप से पहली बार कही गयी है इसलिये इसका महत्व निश्चित रूप से बहुत है।  इसकी भारत में स्वाभाविक रूप से प्रतिकूल प्रतिक्रिया हुई।  हम जैसे अध्यात्मिक और ज्ञान साधकों के लिये इस तरह के घटनाक्रम न केवल रुचिकर होते हैं बल्कि शोध का अवसर भी प्रदान करते हैं।
            देश में अनेक प्रतिक्रियायें आयीं। उनमें एक योग शिक्षक ने एक  महत्वपूर्ण बात कही कि योग के विषय पर जब कोई साधना करने वाला बोलता है तब उसका महत्व बहुत होता है।  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं योग साधना करते हैं इसलिये उनके पास इस विषय पर बोलने का अधिकार है।  उन्होंने एक तरह से अपना अनुभव बांटा है।  इसकी हमारे जैसे लोगों पर सुखद प्रतिक्रिया होती है पर जब हम अन्य लोगों को योग विषय बोलते और लिखते हुए देखते हैं तो यह यकीन करना कठिन होता है कि उनके पास योग का कोई ज्ञान भी है। मोदी जी को योग साहित्य का ज्ञान भी है यह देखकर प्रसन्नता होती है पर उनके संबोधन पर प्रसन्न होने वालों में ऐसे लोग भी हैं जो केवल भारतीय विचाराधारा के प्रचार पर ही उछलते हैं पर उसके मूल सिद्धांतों को नहीं समझते।
            जिस योग साधना की बात होती है वह अनेक लोगों के लिये इसलिये कठिन नहीं है क्योंकि   उसमें समय और श्रम का व्यय होता है जिससे आज के भौतिक प्रभाव में फंसे समाज के अनेक लोग बचना चाहते हैं।  योग साधना मनुष्य को शक्तिशाली, आकर्षक व्यक्तित्व का स्वामी सहज वाणी का प्रवाहक बनाती है। इसके प्रभाव को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसे योग साधना में निरंतर सक्रिय रहने वाले  लोग ही अनुभव कर सकते हैं।
            योग के आठ भाग हैं।  आमतौर से लोग प्राणायाम और आसनों को ही योग साधना समझते हैं।  एक तरह से समाज इसे  व्यायाम समझता है जबकि मोदी ने अपने संबोधन में यह स्पष्ट रूप से बताया कि यह एक व्यापक सिद्धि प्रदान करने वाली साधना है। हम यहां बता दें कि इस सिद्धि का यह आशय कतई नहीं समझना चाहिये कि इससे कोई आकाश से तारे जमीन पर उतार कर ला सकता है। योग साधना मनुष्य के व्यवहार, विचार तथा व्यक्तित्व में ऐसे तत्व स्थापित कर देती है कि वह इस जीवन सागर में बिना थपेड़ों के तैरता है-हमारा अभिप्राय यही है।
            मुख्य बात संकल्प की है।  श्रीमद्भागवत गीता के अनुसार परमात्मा के संकल्प के आधार पर संसार के सारे भूत स्थित हैं पर वह किसी में स्थित नहीं है।  उससे यह समझना चाहिये कि जिस तरह का हमारा संकल्प होगा उसी तरह का संसार हमारे सामने होगा पर हम उसमें नहीं समा सकते।  हमारी समस्या यह है कि  परमात्मा के इस संसार का भाग अपने ही अपने ही संकल्प के कारण सामने आता है हम उसमें समाना चाहते हैं या सोचते हैं कि वह हमारे अंदर समा जाये।  मकान मिला तो उसमें हम समाना चाहते हैं या चाहते हैं कि वह हमारे अंदर समाज जाये। इसी तरह का दृष्टिकोण संतान, धन, वाहन तथा अन्य भौतिक उपलब्धियों के बारे में रहता है। ऐसा हो नहीं सकता पर हमारा पूरा जीवन इसी प्रयास में नष्ट हो जाता है। देखा जाये तो हर इंसान योग करता ही है।  अज्ञानी लोग  भौतिकता से जुड़ने का प्रयास करते हैं। इसे हम असहज योग भी कह सकते हैं क्योंकि अंतत इससे तनाव ही पैदा होता है। उनका मन उन्हें अपना बंधुआ बना लेता है। सहज योगी स्वयं से जुड़कर संसार के विषयों से अपनी आवश्यकतानुसार संबंध रखते हैं।  वह कभी मन से कभी किसी भी विषय से संयोग करने के लिये बाध्य नहीं किये जाते।
            विश्व में योग दिवस मनाये जाने के प्रस्ताव पर भी अनेक लोग विश्व का अध्यात्मिक गुरु बनने का सपना देखकर प्रसन्न हो रहे हैं। हमारा मानना है कि भारत की यह पहले से बनी बनायी छवि है जिसके लिये प्रथक प्रयास करने की आवश्यकता नहीं है। पतंजलि योग साहित्य के अलावा हमारी श्रीमद्भावगत गीता भी एक ऐसा स्वर्णिम ज्ञान ग्रंथ है जिससे पूरा विश्व परिचित है।
            हम तो यह चाहते हैं कि विश्व समुदाय से पहले हमारे ही देश का अपना रुग्ण मानसिकता से बाहर आये। योग की बातें बहुत होती हैं पर साधना करने वालों की संख्या अभी भी नगण्य है। विश्व में क्रांति आने की हमारी कल्पना तभी सफल होगी जब हम पहले अपने देश में योग साधना को दिन चर्या का एक अभिन्न भाग बनायेंगे।  हम जैसे अप्रचारित योग साधकों के पास ऐसे साधन नहीं होते कि अपने इस प्राचीन विज्ञान पर जनसामान्य में अपनी बात कह सकें, इसलिये प्रधानमंत्री श्रीनरेंद्र मोदी जैसे प्रतिष्ठित लोग जब योग विषय का प्रचार करते हैं तो मन प्रसन्न कर लेते हैं। इसके लिये हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आभारी भी है कि उन्होंने योग प्रचार के लिये वह भूमिका निभाई जिसकी हम प्रतिष्ठित लोगों से अपेक्षा करते हैं।


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
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Monday, October 6, 2014

स्वार्थी फल न मिलने पर अपनी भक्ति से निराश हो जाते हैं-संत कबीर दर्शन पर आधारित चिंत्तन लेख(swarthi fal n milne se apni bhakti se nirash hote hain-A Hindu hindi religion messege based on sant kabir dashan)



            मानव स्वभाव है कि वह दूसरे पर अपनी श्रेष्ठता दिखाना चाहता है।  इसके लिये वह कई उपाय करता है। इनमें एक है सर्वशक्तिमान के प्रति भक्ति के स्वरूप के आधार पर स्वयं को श्रेष्ठ साबित करना। विश्व के करीब करीब सभी धर्मों में धरती के बाहर स्वर्ग की कल्पना की चर्चा की जाती है हालांकि भारतीय धर्मों में भी कहीं कहीं इस तरह की चर्चा है पर श्रीमद्भागवत गीता में यह स्पष्ट कर दिया गया है कि इस तरह का विचार अज्ञान का प्रमाण है।  यही कारण है कि  हमारे तत्वज्ञानी मानते हैं कि अगर आदमी संयम के साथ जीवन बिताये तो वह इसी धरती पर ही सुख के साथ जीवन बिता सकता है जो कि स्वर्ग भोगने के समान है।  मगर कुछ लोगों को इस बात की बेचैनी रहती है कि वह समाज में श्रेष्ठता साबित करें। वही दूसरों के सामने अपनी भक्ति का प्रचार करते हैं।

संत कबीर दास कहते हैं कि

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मान बड़ाई देखि कर, भक्ति करै संसार।
जब देखैं कछु हीनता, अवगुन धरै गंवार।

            हिंदी में भावार्थ-संत कबीरदास जी कहते हैं कि दूसरों की देखादेखी कुछ लोग सम्मान पाने के लिये परमात्मा की भक्ति करने लगते हैं पर जब वह नहीं मिलता  मूर्खों की तरह इस संसार में ही दोष निकालने लगते हैं।

मान बड़ाई ऊरमी, ये जग का व्यवहार।
दीन गरीबी बन्दगी, सतगुरु का उपकार।।

      हिंदी में भावार्थ-संत शिरोमणि कबीरदास का कहना है कि जिस तरह दुनियां का व्यवहार है उससे देखकर तो यही आभास होता है कि मान और बड़ाई दुःख का कारण है। सतगुरु की शरण लेकर उनकी कृपा से जो गरीब असहाय की सहायता करता है, वही सुखी है।

     वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संसार में ऐसे अनेक लोग हैं जो अपनी धार्मिक छबि बनाये रखने के लिये भक्ति का दिखावा करते हैं। इनमें से कुछ तो ऐसे हैं जो गुरु बनकर अपने लिये शिष्य समुदाय का निर्माण कर अपनी रोजी रोटी चलाते हैं। ऐसे दिखावे की भक्ति करने वाले अनेक लोग हैं। इसके विपरीत जो भगवान की वास्तव में भक्ति करते हैं वह उसका प्रयार नहीं करते न ही अपना ज्ञान बघारते हैं।
     भक्त और ज्ञानी की पहचान यह है कि वह कभी अपनी भक्ति और ज्ञान शक्ति का बखान नहीं करते बल्कि निर्लिप्त भाव से समाज सेवा करते हुए अपना जीवन यापन करते हैं। अपनी सच्ची भक्ति और ज्ञान के कारण कुछ लोग महापुरुषों की श्रेणी में आ जाते हैं उनको देखकर अन्य लोग भी यही प्रयास करते हैं कि उनकी पूजा हो। यह केवल अज्ञान का प्रमाण है अलबत्ता अपने देश में धार्मिक प्रवचन एक व्यवसाय के रूप में चलता रहा है। इस कारण तोते की तरह किताबों को रटकर लोगों को सुनाते हुए खूब कमाते हैं। उनको देखकर कुछ लोग यह सोचते हुए भक्ति का दिखावा करते हैं कि शायद उनको भी ऐसा ही स्वरूप प्राप्त हो। अनेक लोग संतों की सेवा में इसलिये जाते हैं कि हो सकता है कि इससे उनको किसी दिन उनकी गद्दी प्राप्त हो जाये। ऐसे में भक्ति और ज्ञान तो एक अलग विषय हो जाता है और वह मठाधीशी के चक्कर में राजनीति करने लगते हैं। किताबों को रटने की वजह से उनको शब्द ज्ञान याद तो रहता है ऐसे में वह थोड़ा बहुत प्रवचन भी कर लेते हैं पर उनकी भक्ति और ज्ञान प्रमाणिक नहीं है। वैसे भी अपने पौराणिक ग्रंथों का अध्ययन हर आदमी इतना तो कर ही लेता है कि उसे सारी कथायें याद रहती हैं। नहीं भी अध्ययन करे तो इधर उधर सुनकर उसे बहुत सारी कथायें याद आ ही जाती हैं। । किसी आदमी ने वह भी नहीं किया हो तो अपने अध्यात्मिक दर्शन के कुछ सूक्ष्म सत्य-निष्काम कर्म करो, परोपकार करो, दया करो और माता पिता की सेवा करे जैसे जुमले- सुनाते हुए श्रोताओं और दर्शकों की कल्पित कहानियों से मनोरंजन करता है। उनको सम्मानित होते देख अन्य लोग भक्ति में जुट जाते हैं यह अलग बात है कि कामना सहित यह भक्ति किसी को भौतिक फल दिलाती है किसी को नहीं।
      फिर भक्ति हो या ज्ञानार्जन अगर कामना सहित किया जाये और सफलता न मिले तो आदमी संसार में दोष ढूंढने लगता है। यह केवल भक्ति या ज्ञान के विषय में नहीं है बल्कि साहित्य और कला के विषयों में भी यही होता है। आदमी आत्ममुग्ध होकर अपना काम शुरु करता है पर जब उसे सफलता नहीं मिलती तो वह निराश हो जाता है। निष्कर्ष यह है कि सम्मान पाने का मोह आदमी के लिये दुःख का कारण बनता है। एक बात याद रखें सम्मान पाने की चाह पूरी नहीं हुई तो दुःख तो होगा और अगर पूरी भी हो गयी तो अपमान भी हो सकता है। जहां सुख है वहां दुःख भी है। जहां आशा है वहां निराशा भी है। जहां सम्मान है वहां अपमान भी है। अगर सम्मान मिल गया तो चार लोग आपके दोष निकालकर अपमान भी कर सकते हैं।
      इसलिये अच्छा यही है कि अपने कर्म निष्काम भाव से करें। इस संसार में निर्विवाद सम्मान पाने का बस एक ही तरीका है कि आप गरीब को धन और अशिक्षित को शिक्षा प्रदान करें। प्रयोजन रहित दया करें। ऐसे काम बहुत कम लोग करते हैं। जो सभी कर रहे हैं उसे आप भी करें तो कैसा सम्मान होगा? सम्मान तो उसी में ही संभव है जो दूसरे लोग न करते हों। 
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday, September 27, 2014

तन मन के साथ ही साधना और कर्म के स्थान की शुद्धि आवश्यक-2 अक्टूबर गांधी जयंती पर स्वच्छता अभियान के लिये विशेष लेख(tan man ke sath he sadhan aur karma ke sathan ke shuddhi awashayak- 2 october gandhi jayanti par swachchhata abhiyan ke liye vishesh hindi lekh, clean and green city nececary-A Special hindi religion thought article on gandhiji's birth day)




                    देश में 2 अक्टूबर महात्मा गांधी की जयंती दिवस से स्वच्छता अभियान प्रारंभ होने वाला है। हमारी आधुनिक शिक्षा पद्धति में भारतीय अध्यात्मिक दर्शन नहीं पढ़ाया जाता इसलिये लोग अपनी प्राचीन मान्यताओं का ज्ञान नहीं रखते।  हमारे अधिकतर प्राचीन ग्रंथों ने दैहिक तथा मानसिक स्वच्छता के साथ ही कर्म के स्थान की स्वच्छता पर भी जोर दिया है। यह अलग बात है कि हमारे प्रचार माध्यमों में अक्सर हमारे देश में सार्वजनिक स्थानों, मार्गों तथा उद्यानों में भारी गदंगी होने के समाचार आते हैं। अनेक पुराने लोग यह शिकायत करते मिलते हैं जो राजतंत्र के समय शहर के साफ होने की बात कहते हुए आधुनिक लोकतंत्र में व्यवस्था चौपट होने का दावा करते हैं पर सच यह है कि उस समय उपभोग की ऐसी प्रवृत्ति नहीं थी जैसी कि आज है।  लोगों का खान पान अब घर से अधिक बाहर हो गया है।  अंडे, मांस, सिगरेट, शराब, तथा तैयार  खान पान के सामानों का उपभोग बाजारों में धड़ल्ले से होने लगा है जिससे कचरे का भंडार कहीं भी देखा जा सकता है।  ऐसा नहीं है कि बाजारों में ऐसी वस्तुओं का उपभोग बढ़ा हो वरन् लोग घरों में मंगवाकर भी इन्हें सड़क पर ही फेंकते हैं।
            वर्षा ऋतु में पिकनिक मनाने की परंपरा बन गयी है, यह अलग बात है कि यही ऋतु भोजन के पाचन की दृष्टि से संकटमय मानी जाती है।  आजकल पंचसितारा निजी चिकित्सालयों में इसी ऋतु में भीड़ लगती है।  हर जगह कचरा कीचड़ में तब्दील हो जाता है और इससे महत्वपूर्ण जलस्थल तथा उद्यान सामान्य पर्यटकों के सामने बुरे दृश्य लेकर उपस्थित रहते हैं।  कहा जाता है कि प्लास्टिक कभी नष्ट नहीं होती मगर सभी वस्तुओं को इसी में बांधकर उपभोक्ता को दिया जाता है। अनेक शहरों में  इस प्लास्टिक ने सीवर लाईनों को अवरुद्ध करने के साथ ही नदियों और नालों को प्रदूषित कर दिया है।  हमारे यहां पर्वतों तथा नदियों को पूज्यनीय बताया जाता है पर हिमालय और उससे निकलने वाली नदियों पर जाने वाले कथित भक्तों ने किस तरह वहां अपनी उपभोग प्रवृत्तियों से प्रदूषण फैलाया है उस पर अनेक पर्यावरण विशेषज्ञ नाखुशी जताते रहते हैं।
मनुस्मृति में कहा गया है कि

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समुत्सृजेद्राजमार्गे यस्त्वऽमध्यमनापदि।

स द्वौ कार्यापर्णे दद्यादमेध्यं चाशुशेधयत्।।

            हिन्दी में भावार्थ-सार्वजनिक मार्ग पर कूड़ा फेंकने वाले ऐसे नागरिक जो अस्वस्थ न हों उन पर अर्थ दंड देने के साथ ही उसकी सफाई भी करवाना चाहिये।

आपद्गतोऽधवा वृद्धो गर्भिणो बाल एव वा।

परिभाषणमर्हन्ति तच्च शोध्यमिति स्थितिः।।

            हिन्दी में भावार्थ-यदि कोई संकट ग्रस्त, वृद्ध, गर्भवती महिला तथा बालक सड़क पर कचरा फैंके तो उसे धमकाकर सफाई कराना चाहिये।
            हमारे देश में मनस्मृति का विरोध एक बुद्धिमानों का समूह करता है। यह समूह कथित रूप से आम आदमी की आजादी को सर्वोपरि मानता है।  उस लगता है कि मनुस्मृति में जातिवादी व्यवस्था है जबकि सच यह है कि इसमें ऐसे अनेक महत्वपूर्ण संदेश है जो आज के समय भी अत्यंत प्रासांगिक हैं। एक तरफ समाज प्लास्टिक के रंग बिरंगे रूपों में बंधे सामानों को देखकर विकास पर आत्ममुग्ध हो रहा है  जबकि अनेक प्रकार के विषाक्त, मिलावटी तथा सड़े खानपान से जो बीमारियां पैदा हो रही हैं उस पर किसी का ध्यान नहीं है।  उससे अधिक यह महत्वपूर्ण बात है कि अनेक लोग सार्वजनिक स्थानों को स्वच्छ रखने की बजाय वहां कचरा डालकर न केवल अपने लिये वरन् दूसरों को भी कष्ट देते हैं।  इसलिये जागरुक लोगों को इस बात पर ध्यान देना चाहिये कि वह कचरा उचित स्थान पर डालकर पुण्य का काम करें।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday, September 20, 2014

राज्यकर्म में लगे लोगों में धूर्तता का भाव आ ही जाता है-मनुस्मृति के आधार पर चिंत्तन लेख(rajya karma mein logon mein dhoortata ka bhav aa hi jata hai-A Hindu hindi religion thought based o manu smriti)



      हमारे देश में लोकतांत्रिक प्रणाली अवश्य है पर यहां की राज्य प्रबंध व्यवस्था वही है जो अंग्रेजों ने प्रजा को गुलाम बनाये रखने की भावना से अपनायी थी। उन्होंने इस व्यवस्था को इस सिद्धांत पर अपनाया था कि राज्य कर्मीं ईमानदार होते हैं और प्रजा को दबाये रखने के लिये उन्हें निरंकुश व्यवहार करना ही  चाहिये।  राजनीतिक रूप से देश स्वतंत्र अवश्य हो गया पर जिस तरह की व्यवस्था रही उससे देश में राज्य प्रबंध को लेकर हमेशा ही एक निराशा का भाव व्याप्त  दिखता रहा है।  इसी भाव के कारण  देश में अनेक ऐसे आंदोलन चलते रहे हैं जिनके शीर्ष पुरुष देश में पूर्ण स्वाधीनताा न मिलने की शिकायत करतेे है।

मनुस्मृति में कहा गया है कि

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शरीकर्षात्प्राणाः क्षीयन्ते प्राणिनां यथा।

तथा राज्ञामपि प्राणाः क्षीयन्ते राष्ट्रकर्षणात्।।

     हिन्दी में भावार्थ-जिस प्रकर शरीर का अधिक शोषण करने से प्राणशक्ति कम होती उसी तरह जिस राज्य में प्रजा का अधिक शोषण होने वहां अशांति फैलती है।

राज्ञो हि रक्षाधिकृताः परस्वादयिनः शठाः।

भृत्याः भवन्ति प्रायेण तेभ्योरक्षेदियाः प्रजाः।।

     हिन्दी में भावार्थ-प्रजा के लिये नियुक्त कर्मचारियों में स्वाभाविक रूप से धूर्तता का भाव आ ही जाता है। उनसे निपटने का उपाय राज्य प्रमुख को करना ही चाहिए।
      देश की अर्थव्यवस्था को लेकर अनेक विवाद दिखाई देते हैं।  यहां ढेर सारे कर लगाये जाते हैं।  इतना ही नहीं करों की दरें जिस कथित समाजवादी सिद्धांत के आधार पर तय होती है वह कर चोरी को ही प्रोत्साहित करती है।  इसके साथ ही  कर जमा करने तथा उसका विवरण देते समय करदाता  इस तरह  अनुभव करते हैं जैसे कि उत्पादक नागरिक होना जैसे एक अपराध है।  देश के कमजोर, गरीब तथा अनुत्पादक लोगों की सहायता या कल्याण करने का सरकार को करना चाहिये पर इसका यह आशय कतई नहीं है कि उत्पादक नागरिकों पर बोझ डालकर उन्हें करचोरी के लिये प्रोत्साहित किया जाये।      यह हैरानी की बात है कि कल्याणकारी राज्य के नाम करसिद्धांत अपनाये गये कि गरीब लोगों की भर्लाइै के लिये उत्पादक नागरिकों पर इतना बोझ डाला जाये कि वह अमीर न हों पर इसका परिणाम विपरीत दिखाई दिया जिसके अनुसार  पुराने पूंजीपति जहां अधिक अमीर होते गये वहीं मध्यम और निम्न आय का व्यक्ति आय की दृष्टि से नीचे गिरता गया।  इतना ही नहीं  ऐसे नियम बने जिससे निजी व्यवसाय या लघु उद्यमों की स्थापना कठिन होती गयी।
            हालांकि अब अनेक विद्वान यह अनुभव करते हैं कि राज्य प्रबंध की नीति में बदलाव लाया जाये। इस पर अनेक बहसें होती हैं पर कोई निर्णायक कदम इस तरह उठाया नहीं जाता दिख रहा है जैसी कि अपेक्षा होती है।  हालांकि भविष्य में इसकी तरफ कदम उठायेंगे इसकी संभावना अब बढ़ने लगी है।  एक बात तय है कि कोई भी राज्य तभी श्रेष्ठ माना जाता है जहां प्रजा के अधिकतर वर्ग खुश रहते हैं।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday, September 6, 2014

विषयों में भाव का त्याग करने से ही सहज योग संभव-पतंजलि योग साहित्य के आधार पर चिंत्तन(vishayon mein bhav ka tyag karne se hee sahaj yog sambhav-A essay though based on patanjali yog scince or vighan)



            हमारा योग दर्शन अत्यंत पुराना है और उसका मूल स्वरूप आत्म नियंत्रण के लिये  आंतरिक क्रियाओं से जुड़ा है। उसमें आसनों साथ व्यायाम जुड़ा नहंी दिखता। हालांकि वर्तमान काल में जब लोगों का जीवन अत्यंधिक श्रमवान नहीं है तब इन व्यायामों की आवश्यकता है और नये योग शिक्षकों नेे इस विषय के  साथ सूर्यनमस्कार, वज्रासन और पद्मासन जैसी प्रभावशील क्रियाओं को जोड़ा है तो अच्छा ही किया है।  चूंकि देह की सक्रियता इन आसनों से दिखती है तो करने और देखने वाले को अच्छी लगती है।  यही कारण है कि प्राचीन योग के साथ नया स्वरूप उसे लोकप्रिय बना रहा है। यह अलग बात है कि लोग बाह्य रूप पर अधिक ध्यान दे रहे हैं पर उसके आंतरिक प्रभाव का ज्ञान उन्हें नहीं है। दरअसल योग का मूल आशय सांसरिक विषयों से परे होकर साधना करने से है। अभ्यास से ऐसी स्थिति हो जाती है कि आदमी संसार के विषयों में कार्यरत दिखता है पर उसमें आसक्ति नहीं रह जाती। यह कर्मयोगी का श्रेष्ठ रूप होता है।
पतंजलि योग साहित्य में कहा गया है कि

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बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थः।

ततः क्षीयते प्रकाशवरणाम्।।

धारणासु च योग्यता मनसः।।

स्वविषयास्प्रयोग चित्तस्वरूपानुकार इवेन्द्रियाणां प्रत्याहारः।

            हिन्दी में भावार्थ-बाहर और भीतर के विषयों के चिन्त्तन का त्याग कर देना अपने आप में चौथा प्राणायाम है। उससे सांसरिक प्रकाश का आवरण क्षीण हो जाता है। ज्ञान की धारणा से मन योग्य हो जाता है। अपने विषयों से रहित हो जाने पर इंद्रियों का चित्त से जो संपर्क होता है वही प्रत्याहार है।
            हमने देखा है कि अनेक लोग प्रचार माध्यमों में योग के बारे में पढ़ और सुनकर समूह बनाकर  साधना करते हैं। इस दौरान वह सांसरिक विषयों पर बातचीत करते हैं।  कहीं पार्क में बैठ गये और हाथ पैर हिलाने लगे।  दावा यह कि योग कर रहे हैं। वैसे प्रातः घर से बाहर निकलना ही अपने आप में एक अच्छी किया है जिसका लाभ अवश्य होता है पर इस दौरान वार्तालाप में अपनी ऊर्जा नष्ट करना ठीक नहीं है। उससे ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह कि जिन सांसरिक विषयों से बाद में जुड़ना उनका स्मरण करना प्रातःकाल सैर करने पर मिलने वाले मानसिक लाभ से वंचित करता है।  अनेक लोग समूह में बैठकर हाथ पैर हिलाकर योग कर का दावा अवश्य करें पर उनको यह मालुम नहीं है कि वह स्वयं को ही धोखा दे रहे हैं।
            भारतीय योग संस्थान योग साधना का अभ्यास कराने के लिये निशुल्क शिविर चलाता है। उसके शिविर में योग का जो अभ्यास कराया जाता है पर अभी तक विधियों में अत्यंत श्रेष्ठ है। श्रीमद्भागवत में त्रिस्तरीय आसन की चर्चा होती है। पहले कुश फिर उस पर मृगचर्म और फिर वस्त्र बिछाकर सुख से बैठना ही आसन बताया गया है।  भारतीय योग संस्थान के शिविरों  उसकी जगह प्लस्टिक की चादर, दरी और फिर कपड़े की चादर को आसन बनाकर योगाभ्यास कराया जाता है। इस तरह के अभ्यास से देह, मन और विचारों में शुद्धि आती है।
            इस तरह के अभ्यास के बाद श्रीमद्भागवत गीता के एक दो श्लोक का अध्ययन अवश्य करना चाहिये।  उससे यह बात समझ में आ जायेगी के वास्तव में विषयों का त्यागकर अभ्यास करना ही योग है। अगर आसन तथा प्राणायाम के समय भी विषयों के प्रति आसक्ति बनी रहे तो समझ लेना चाहिये कि हमें अधिक आंतरिक अभ्यास की जरूरत है।


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday, August 30, 2014

अपनी देह के अंदर स्थित गंदगी का अवलोकन करें-मनुस्मृति के आधार पर चिंत्तन लेख(apne deh ke andar sthit gandagi ka avlokan karen-A Hindu hindu religion thought or article)




            कहा जाता है कि भौतिक विकास के कारण समाज में विभिन्न आयुवर्ग के लोगों में एक पीढ़ीगत अंतर स्वाभाविक रूप से होता है। आजकल तो यह भी कहा जाता है कि बच्चे अक्षर ज्ञान से पहले ही टीवी, मोबाइल और अन्य आधुनिक उपभोग के सामानों का चलाना सीख लेते हैं।  इस बहिर्मुखी जानकारी को अब बौद्धिक विकास का प्रतीक माना जाने लगा है जबकि आंतरिक ज्ञान से-जिसके बिना जीवन में हमेशा ही आनंद उठाने का अवसर मिलता है-सभी परे हो गये हैं। यही कारण है कि समाज में तनाव की प्रवृत्ति बढ़ रही है।  सबसे बड़ी बात यह कि जिस देह को धारण कर इस संसार में गुजारना है उसके बारे में कोई नहीं जानता।
            हमारे शरीर के विकार मन को प्रभावित करते हैं जिससे बुद्धि संचालित होती है।  अक्सर अनेक बुद्धिमान और विद्वान समाज के लोगों को नकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने का सुझाव देते हैं पर जिसकी देह और मन में विकार होंगे वह किस तरह सकारात्मक दृष्टिकोण अपना सकता है भारतीय अध्यात्म ज्ञान के अभाव में वह स्वयं भी नहीं जानते।


मनुस्मृति में कहा गया है कि

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वसाशुक्रमसृङ्मज्जरमूत्रविङ्घ्राणकर्णविट्।

श्लेषामाश्रृदूषिकास्वेदा द्वाशैते नृणां मलाः।।

            हिन्दी में भावार्थ-चर्बी, वीर्य, रक्त, मज्जा, मूत्र, मल, आंखों का कीचड़, नाक की गंदगी, कान का मैल, आंसू, कफ तथा पसीना यह बारह प्रकार के मल हैं।

ऊर्ध्व नाभेर्यानि खानि तानि मेध्यानि सर्वशः।

यान्यधस्तान्यमेध्यानि देहाच्चैव मलाश्चयुताः।।

            हिन्दी में भावार्थ-नाभि के ऊपर स्थित इंद्रियां-हाथ, कान, नाक, आंख तथा जीभ पवित्र मानी जाती हैं। नाभि के नीचे की इंद्रियां-गुदा, लिंग, तथा पैर एवं शरीर से निकलने वाले मल, मूत्र, विष्टा पसीना, खोट आदि अपवित्र हैं।

            महत्वपूर्ण बात यह है कि हम अपनी नाभि के ऊपर स्थित इंद्रियों के उपयोग करते समय यह नहीं जानते कि नीचे की इंद्रियों पर क्या प्रभाव पड़ेगा? उच्च इंद्रियां ग्रहण करती हैं और निम्न इंद्रियां उसके संपर्क से  मिले कचड़े का निवारण करती हैं। हमारी देह में सात चक्र हैं-सहस्त्रात, आज्ञा, विशुद्धि, अनहत, मणिपुर, स्वाधिष्ठान, मूलाधार-जो निरंतर घूमते रहते हैं। हम अपनी इंद्रियों से बाहरी विश्व का उपभोग करते हैं पर इसमें नियमितता तभी तक संभव रह पाती है जब तक यह सभी चक्र काम करते हैं।
            इसलिये हम उच्च इंद्रियों से केवल उन्हीं व्यक्तियों, वस्तुओं और विषयों से संपर्क करें जिनसे हमारी देह का कोई चक्र दृष्प्रभाव का शिकार न हो। हम इन्हीं इंद्रियों से अपने कर्म फल का निर्माण करते हैं यह नहीं भूलना चाहिये।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Friday, August 15, 2014

प्रजा से अधिक कर लेने पर राज्य मे अशांति की आंशका रहती है-मनुस्मृति के आधार पर चिंत्तन लेख(praja se adhik kar lene par rajya mein ashanti ki aashanka rahatee hai-A Hindu hindi religion thought based on manusmriti)



      हमारे देश में लोकतांत्रिक प्रणाली अवश्य है पर यहां की राज्य प्रबंध व्यवस्था वही है जो अंग्रेजों ने प्रजा को गुलाम बनाये रखने की भावना से अपनायी थी। उन्होंने इस व्यवस्था को इस सिद्धांत पर अपनाया था कि राज्य कर्मीं ईमानदार होते हैं और प्रजा को दबाये रखने के लिये उन्हें निरंकुश व्यवहार करना ही  चाहिये।  राजनीतिक रूप से देश स्वतंत्र अवश्य हो गया पर जिस तरह की व्यवस्था रही उससे देश में राज्य प्रबंध को लेकर हमेशा ही एक निराशा का भाव व्याप्त  दिखता रहा है।  इसी भाव के कारण  देश में अनेक ऐसे आंदोलन चलते रहे हैं जिनके शीर्ष पुरुष देश में पूर्ण स्वाधीनताा न मिलने की शिकायत करतेे है।



मनुस्मृति में कहा गया है कि

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शरीकर्षात्प्राणाः क्षीयन्ते प्राणिनां यथा।

तथा राज्ञामपि प्राणाः क्षीयन्ते राष्ट्रकर्षणात्।।

     हिन्दी में भावार्थ-जिस प्रकर शरीर का अधिक शोषण करने से प्राणशक्ति कम होती उसी तरह जिस राज्य में प्रजा का अधिक शोषण होने वहां अशांति फैलती है।

राज्ञो हि रक्षाधिकृताः परस्वादयिनः शठाः।

भृत्याः भवन्ति प्रायेण तेभ्योरक्षेदियाः प्रजाः।।

     हिन्दी में भावार्थ-प्रजा के लिये नियुक्त कर्मचारियों में स्वाभाविक रूप से धूर्तता का भाव आ ही जाता है। उनसे निपटने का उपाय राज्य प्रमुख को करना ही चाहिए।

      देश की अर्थव्यवस्था को लेकर अनेक विवाद दिखाई देते हैं।  यहां ढेर सारे कर लगाये जाते हैं।  इतना ही नहीं करों की दरें जिस कथित समाजवादी सिद्धांत के आधार पर तय होती है वह कर चोरी को ही प्रोत्साहित करती है।  इसके साथ ही  कर जमा करने तथा उसका विवरण देते समय करदाता  इस तरह  अनुभव करते हैं जैसे कि उत्पादक नागरिक होना जैसे एक अपराध है।  देश के कमजोर, गरीब तथा अनुत्पादक लोगों की सहायता या कल्याण करने का सरकार को करना चाहिये पर इसका यह आशय कतई नहीं है कि उत्पादक नागरिकों पर बोझ डालकर उन्हें करचोरी के लिये प्रोत्साहित किया जाये।      यह हैरानी की बात है कि कल्याणकारी राज्य के नाम करसिद्धांत अपनाये गये कि गरीब लोगों की भर्लाइै के लिये उत्पादक नागरिकों पर इतना बोझ डाला जाये कि वह अमीर न हों पर इसका परिणाम विपरीत दिखाई दिया जिसके अनुसार  पुराने पूंजीपति जहां अधिक अमीर होते गये वहीं मध्यम और निम्न आय का व्यक्ति आय की दृष्टि से नीचे गिरता गया।  इतना ही नहीं  ऐसे नियम बने जिससे निजी व्यवसाय या लघु उद्यमों की स्थापना कठिन होती गयी।
            हालांकि अब अनेक विद्वान यह अनुभव करते हैं कि राज्य प्रबंध की नीति में बदलाव लाया जाये। इस पर अनेक बहसें होती हैं पर कोई निर्णायक कदम इस तरह उठाया नहीं जाता दिख रहा है जैसी कि अपेक्षा होती है।  हालांकि भविष्य में इसकी तरफ कदम उठायेंगे इसकी संभावना अब बढ़ने लगी है।  एक बात तय है कि कोई भी राज्य तभी श्रेष्ठ माना जाता है जहां प्रजा के अधिकतर वर्ग खुश रहते हैं।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Thursday, July 31, 2014

मनुस्मृति-जब लाचार हों शांत आसन करें(manua smriti-jab lachar hon shant aasna karen)




            म देख रहे हैं कि समाज में लोग एक भारी तनाव के बीच जीवन व्यतीत कर रहे हैं।  प्रदूषित वायु, अशुद्ध भोजन तथा आर्थिक संकट के कारण लोगों की मनस्थिति बिगड़ रही है।  जरा जरा सी बात पर हिंसा हो जाती है।  जब समस्याओं से जूझने के लिये मन को शांत रखने की आवश्यकता हो तब लोग आक्रामक होकर अपने तनाव के विसर्जन के दूसरों को पीड़ा देने के लिये तैयार रहते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि दूसरों को शांति और अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाले अनेक विद्वान भी आत्मसंयम रखने में असमर्थ दिखते हैं।  स्थिति यह है कि आजकल कोई भी आदमी अपनी बात धीरज से कहने की बजाय चीख कर इस तरह कहना चाहता है जैसे कि लोग बहरे या नासमझ हों।
मनु स्मृति में कहा गया है कि

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क्षीणस्य चैव क्रमशो दैवात् पूर्वकृतेन वा।
मित्रस्य चानुरोधेन द्विविधं स्मृतमासनम्।।


           
हिन्दी में भावार्थ-जब शक्ति क्षीण हो जाने पर या अपनी गलतियों के कारण चुप बैठना तथा मित्रों की बात का सम्मान करते हुए उनसे विवाद न करना यह दो प्रकार के शांत आसन हैं।

यदावगच्छेदायत्वयामाधिक्यं ध्रृवमात्मनः।
तदा त्वेचाल्पिकां पीर्डा तदा सन्धि समाश्चयेत्।।


           
हिन्दी में भावार्थ-भविष्य में अच्छी संभावना हो तो वर्तमान में विरोधियों और शत्रुओं से भी संधि कर लेना चाहिए।
            किसी भी मनुष्य के जीवन में दुःख, सुख, आशा और निराशा के दौर आते हैं। आवेश और आल्हाद के चरम भाव पर पहुंचने के बाद किसी भी मनुष्य का अपने पर से नियंत्रण समाप्त हो जाता है। भावावेश में आदमी कुछ नहीं सोच पाता। मनु महाराज के अनुसार मनुष्य को अपने विवेक पर सदैव नियंत्रण करना चाहिये। जब शक्ति क्षीण हो या अपने से कोई गलती हो जाये तब मन शांत होने लगता है और ऐसा करना श्रेयस्कर भी है। अनेक बार मित्रों से वाद विवाद हो जाने पर उनके गलत होने पर भी शांत बैठना एक तरह से आसन है। यह आसन विवेकपूर्ण मनुष्य स्वयं ही अपनाता है जबकि अज्ञानी आदमी मज़बूरीवश ऐसा करता है। जिनके पास ज्ञान है वह घटना से पहले ही अपने मन में शांति धारण करते हैं जिससे उनको सुख मिलता है जबकि अविवेकी मनुष्य बाध्यता वश ऐसा करते हुए दुःख पाते हैं।
            कहने का अभिप्राय यह है कि जीवन में ऐसे अनेक तनावपूर्ण क्षण आते हैं जब आक्रामक होने का मन करता है पर उस समय अपनी स्थिति पर विचार कना चाहिए। अगर ऐसा लगता है कि भविष्य में अच्छी आशा है तब बेहतर है कि शत्रु और विरोधी से संधि कर लें क्योंकि समय के साथ यहां सब बदलता है इसलिये अपने भाव में सकारात्मक भाव रखते स्थितियों में बदलाव की आशा रखना चाहिए।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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