Monday, August 5, 2013

चाणक्य नीति दर्शन-भोग विलासी के विचार कभी शुद्ध नहीं रहते (chankya neeti darshan-bhog vilasi ke vichar kabhee shuddh nahin hote-chankya neeti darshan))



           हमारे समाज में परनिंदा की प्रवृत्ति बहुत देखी जाती है। जहां चार लोग मिलेंगे वहां किसी अन्य की निंदा करते हुए अपनी चर्चा करेंगे।  इसके अलावा अपने गुणों तथा कल्पित परोपकार की बात सुनाते हुए अपनी प्रशंसा करते हुए कहीं भी लोगों को देखा जा सकता है। उससे भी बड़ी बात यह कि ज्ञान की बातें बखान करने वाले कदम कदम पर मिल जायेंगे।  जहां तक उस ज्ञान को धारण करने वालों की संख्या की बात है वह नगण्य ही नज़र आती है। ज्ञान और योग साधना में लिप्त लोगों के लिये भारतीय समाज में व्याप्त अंतर्विरोध हमेशा ही शोध का विषय रहा है।  यही कारण है कि हमारे देश में  अध्यात्मिक विषय में नित्य नये नये सृजन होते रहते हैं।  यह अलग बात है कि अध्यात्मिक सिद्धों की रचनाऐं लोग पढ़ते हैं और फिर उनको रटकर एक दूसरे को सुनाते हैं।  उस ज्ञान को धारण करने की कला किसी किसी को ही आती है जबकि सामान्य मनुष्य ज्ञान का बखान तो करता है पर अपना पूरा पंाव  अज्ञान की राह पर ही रखता है। 
     सच बात यह है कि श्रीमद्भगवत्गीता में कहा गया है कि गुण ही गुणों को बरतते हैं। इंद्रियां ही विषयों में लिप्त हैं।  त्रिगुणमयी माया में फंसा मनुष्य अपनी स्थिति के अनुसार ही विचार करते हुए व्यवहार करता है।  इसलिये ज्ञान साधकों को कभी किसी की निंदा नहीं करते हुए इस बात का विचार अवश्य करना चाहिये कि जिस व्यक्ति का खान पान, रहन सहन तथा संगत जिस तरह की होगी वैसा ही वह काम तथा आचरण करेगा।
चाणक्य नीति में कहा गया है कि
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गृह्यऽसक्तस्य नो विद्या नो दया मासंभोजिनः।
द्रव्यनुलुब्धस्य नो सत्यं स्त्रेणाभ्य न पवित्रता।।
       हिन्दी में भावार्थ-घर में आसक्ति रखने वालों को कभी  विद्या प्राप्त नहीं होती, मांस खाने वालों में दया नहीं होती, धन के लोभी में कभी सच्चाई नहीं होती और भोग विलासी में विचारों की पवित्रता नहीं होती
            हमारे समाज में एक बात दूसरी भी देखी जाती है कि अर्थ, राज्य तथा धर्म के शिखर पर स्थिति पुरुषों की तरफ आशा भरी नज़रों से देखता है। वह सोचता है कि उनमें शायद समाज भक्ति पैदा हो और वह उस पर कृपा करें।  वह उनके विचार, व्यवहार और व्यक्तित्व की तरफ नहीं देखता। जिन शिखर पुरुषों में समाज के प्रति दया, सद्भावना तथा प्रेम का भाव है वह बिना प्रचार ही अपना काम करते है। जिनके मन में संवेदना नहीं है वह पाखंड बहुत करते हैं। इतना ही नहीं अनेक शिखर पुरुष तो दिखावे के लिये समाज सेवा करते हैं।  उनका मुख्य उद्देश्य अपने परिवार तथा कुल को प्रतिष्ठा दिलाकर अधिक शक्ति प्राप्त करना ही होता है।  समाज से दूर होने के कारण उनके घर के सत्य बाहर नहीं आ पाते पर फिर अपने सामान्य व्यवहार में उनका चरित्र सामने आ ही जाता है। वह प्रचार के लिये समाज के साथ सहानुभूति अवश्य जताते हैं उनके किसी कर्म से ऐसा नहीं लगता कि वह आशाओं पर खरे उतरेंगे। उनसे किसी भी प्रकार समाज हित की आशा करना व्यर्थ है।


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


Sunday, July 28, 2013

रहीम दर्शन-सुख के समय कौन भगवान को याद करता है (rahim ke darshan-sukh ke samaya kaun bhagwan kaun yaad karta hai)



        जीवन में सुख दूख आते जाते हैं।  यह अलग बात है कि सुख का समय लंबा होने से आदमी आत्ममुग्ध हो जाता है।  जऐ  जब दुःख के पल कम होने पर भी निकल जाने तक अत्यंत मुश्किल लगते हैं। कहीं वह अधिक लंबे हुए तो आदमी टूट जाता है।  दूसरी बात यह भी है कि सुख के समय आदमी धन का संचय तो करता है पर मित्र संग्रह पर उसका ध्यान नहीं होता। भौतिक उपलब्धियां उसे इतना आत्ममुग्ध कर देती हैं उसे लगता है कि मायावी संसार में बिना मांगे मित्र ही उसके पास आ जायेंगे।  सच बात तो यह है कि धन की खुशबु पाकर कोई भी मित्र बन जाता है पर ऐसे लोगों की विपत्ति में सहायता नहीं मिलती। धन, बाहुबल, और पद की श्रेष्ठता के कारण कोई भी दरबार लगा सकता है। ढेर सारे दरबारी भी मिल जायेंगे पर ऐसा मित्र जो विपत्ति में सहायता करे, समय पड़ने पर  मुश्किल है।
कविवर रहीम कहते हैं कि

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धन दारा अस सुतन सों, लगो रहे नित चित्त।।

नहिं रहीमकोऊ लख्या, गाढ़े दिन को मिल।

         सामान्य हिन्दी में भावार्थ-जब मनुष्य के पास धन, पत्नी और पुत्र का सुख होता है तब उसी में ही सारा ध्यान लगाये रहता है। जब कोई विपत्ति आती है तब वह सहायता के लिये इधर उधर ताकता है। उसी समय उसे भगवान की याद आती है।

       कहने का अभिप्राय यह है कि जब हमारा समय ठीक चल रहा हो तब भी भविष्य में बुरे समय की आशंकाओं का अनुमान अवश्य करते रहना चाहिये। उसके अनुसार ही ऐसा प्रबंध भी करें ताकि कोई प्रतिकूल परिस्थितियां आयें तो उनका सामना किया जा सके।  साथ ही जब अपने पास भौतिक सुख हो तब भी अपनी अध्यात्मिक चेतना को जाग्रत रखते हुए अहंकार तथा मद से दूर रहते हुए सभी से अपना व्यवहार बनाये रखना चाहिये। समय पड़ने पर कौन काम आ जाये यह कोई नहीं जानता।      

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Wednesday, July 17, 2013

रहीम के दोहे-सुख में कौन किसे पूछता है (sukh mein kuan kise poochhta hai-rahim ke dohe in hindi)



        जीवन में सुख दूख आते जाते हैं।  यह अलग बात है कि सुख का समय लंबा होने से आदमी आत्ममुग्ध हो जाता है।  जऐ  जब दुःख के पल कम होने पर भी निकल जाने तक अत्यंत मुश्किल लगते हैं। कहीं वह अधिक लंबे हुए तो आदमी टूट जाता है।  दूसरी बात यह भी है कि सुख के समय आदमी धन का संचय तो करता है पर मित्र संग्रह पर उसका ध्यान नहीं होता। भौतिक उपलब्धियां उसे इतना आत्ममुग्ध कर देती हैं उसे लगता है कि मायावी संसार में बिना मांगे मित्र ही उसके पास आ जायेंगे।  सच बात तो यह है कि धन की खुशबु पाकर कोई भी मित्र बन जाता है पर ऐसे लोगों की विपत्ति में सहायता नहीं मिलती। धन, बाहुबल, और पद की श्रेष्ठता के कारण कोई भी दरबार लगा सकता है। ढेर सारे दरबारी भी मिल जायेंगे पर ऐसा मित्र जो विपत्ति में सहायता करे, समय पड़ने पर  मुश्किल है।
कविवर रहीम कहते हैं कि

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धन दारा अस सुतन सों, लगो रहे नित चित्त।।

नहिं रहीमकोऊ लख्या, गाढ़े दिन को मिल।

         सामान्य हिन्दी में भावार्थ-जब मनुष्य के पास धन, पत्नी और पुत्र का सुख होता है तब उसी में ही सारा ध्यान लगाये रहता है। जब कोई विपत्ति आती है तब वह सहायता के लिये इधर उधर ताकता है। उसी समय उसे भगवान की याद आती है।

       कहने का अभिप्राय यह है कि जब हमारा समय ठीक चल रहा हो तब भी भविष्य में बुरे समय की आशंकाओं का अनुमान अवश्य करते रहना चाहिये। उसके अनुसार ही ऐसा प्रबंध भी करें ताकि कोई प्रतिकूल परिस्थितियां आयें तो उनका सामना किया जा सके।  साथ ही जब अपने पास भौतिक सुख हो तब भी अपनी अध्यात्मिक चेतना को जाग्रत रखते हुए अहंकार तथा मद से दूर रहते हुए सभी से अपना व्यवहार बनाये रखना चाहिये। समय पड़ने पर कौन काम आ जाये यह कोई नहीं जानता।      

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday, July 6, 2013

मनुस्मृति से सन्देश-धर्म के विषय में नियमों से अधिक यम महत्वपूर्ण (manu smriti se sandesh-dharm ke vishay mein niynon se adhik yam mahatvapoorn)



    हमारे देश में धर्म के नाम पर जितना भ्रम है अन्यत्र कहीं है।  श्रीमद्भागवत गीता में यज्ञों के दो प्रकार बताये गये हैं-एक द्रव्यमय यज्ञ दूसरा ज्ञान यज्ञ!  द्रव्यमय यज्ञ का आशय यही है कि भौतिक पदार्थों के माध्यम से परमात्मा का स्मरण किया जाये। ज्ञान यज्ञ का आशय यह है कि परमात्मा को तत्व से जानकर उसका स्मरण किया जाये।  देखा यह गया है कि हमारे देश के कथित घार्मिक ठेकेदारों ने धर्म के नाम पर अपने व्यवसाय चमकाने के लिये द्रव्यमय यज्ञ का ही प्रचार किया करते है।  स्थिति यह है कि अनेक जगह कथित रूप से ज्ञानयज्ञ भी होते हैं पर उसमें लोगों को दान दक्षिणा देकर पैसे की उगाही की जाती है। उनसे द्रव्य का दान करने के लिये कहा जाता है।  स्पष्टतः ज्ञान का यह एक तरह से व्यापार है।
      धर्म के निर्वाह के दो रूप हैं- यम और नियम।  यमों का पालन किया जाये तो धर्म स्वतः ही फल प्रदान करने लगता है।  यम में अहिंसा,सत्य अस्तेय ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह का पालन करना होता है।  यमों को धारण करना बाहर दिखता नहीं है इसलिये उसके आधार पर पाखंड करना कठिन है।  जबकि नियमों का पालन बाहर नजर आता है और उससे दूसरे की प्रशंसा पाने का मोह पूरा हो सकता है इसलिये लोग उनका पालन करते दिखना चाहते हैं।
मनुस्मृति में कहा गया है कि

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यमान्स्सेवेत सततं न नित्यं नियमानबुधः।

यमान्यतन्यकुर्वाणो नियमान्केवलान्भजन्।।

         हिन्दी में भावार्थ-मनुष्य का  नियमों की उपेक्षा कर यमो का पालन करना ही वास्तविक धर्म है। यमों की बजाय   जो मनुष्य  नियमों के  पालन की तरफ जो ध्यान देता है वह अधिक समय तक सफलता प्राप्त न करते हुए  शीघ्र पतन को प्राप्त होता है।
      हमारे यहां धर्म के नाम पर इधर उधर जाकर परमात्मा के विभिन्न स्वरूपों के मंदिरों पर उनके दर्शन करने की प्रवृत्ति अधिक देखी जाती है। दरअसल जिनके पास पैसा और समय होता है वह उसे व्यय करने को मार्ग ढूंढते हैं।  ऐसे लोग धर्म का मतलब नहीं जानते पर धार्मिक दिखना चाहते हैं।  इसलिये पर्यटन के नाम पर रमणीक स्थलों पर मंदिरों के दर्शन करने जाते हैं।  इनमें ऐसे भी शामिल लोग हैं जो अपने ही शहरों के मंदिरों पर जाना तो दूर घर में ही परमात्मा के स्वरूपों की मूर्तियों पर मत्था तक नहीं टेकते। मत्था टेकने की बात तो छोड़िये, अनेक लोग  मूर्ति बाज़ार से खरीदकर अपने घर की दीवार पर टांगते हैं या फिर अलमारी में रखते हैं पर फिर उसे देखते तक भी नहीं है। ऐसे लोग दूर शहरों  में मंदिरों में भगवान के दर्शन करने का दावा इस तरह करते हैं कि वह प्रथ्वी के अकेले ऐसे वासी हैं जिनको साक्षात भगवान ने दर्शन दिये।  यह धर्म के नाम पर पाखंड के अलावा कुछ नहीं है। ऐसा करके दूसरों के सामने आत्मप्रवंचना करना धर्म नहीं होता। धर्म वह विषय है जिसमें संलिप्त होने से स्वयं को प्रसन्नता का आभास हो। 

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday, June 29, 2013

संत नागरी दास का दर्शन-ज्यादा अक्ल मुसीबत का कारण (jyada akal musibat ka kaaran-sant nagri das ka darshan)


     अध्ययन की दृष्टि से अध्यात्म और सांसरिक विषय प्रथक प्रथक हैं।  अध्यात्म ज्ञान से संपन्न मनुष्य सहजता से आचरण करते हैं। यह उनकी स्वाभाविक चतुराई है।  जब किसी के पास अध्यात्म ज्ञान होता है उसका दृष्टिकोण सांसरिक विषयों के प्रति सीमित होता है। वह उन विषयों में रत होकर कर्म तो करते हैं पर उसमें अपने हृदय को लिप्त नहीं करते।  निष्काम करने के कारण उनकी बुद्धि में क्लेश का भाव नहीं होता जिससे वह कभी स्वयं को संकट में नहीं फंसने देते।   इसके विपरीत स्वयं को सांसरिक विषयों में चतुर समझने वाले लोग न केवल कामना के साथ कर्म करते हैं बल्कि उसका प्रचार अन्य लोगों को सामने करते हुए स्वयं के लिये चतुर होने को प्रमाण पत्र भी जुटाते हैं। दरअसल ऐसे आत्ममुग्ध लोगों की बुद्धि उनके संकट का कारण ही होती हैं। संसार के एक विषय से मुक्ति पाते हैं तो दूसरा उनके सामने आता है। दूसरे के बाद तीसरा आता है। यह क्रम अनवरत चलता है और केवल सांसरिक विषयों में लिप्त लोग कभी अपने मानसिक तनाव से मुक्ति नहीं पाते।  
संत नागरी दास कहते हैं कि
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अधिक सयानय है जहां, सोई बुधि दुख खानि।
सर्वोपरि आनंदमय, प्रेम बाय चौरानि।
            सामान्य हिन्दी भाषा में भावार्थ-जो मनुष्य अधिक चुतराई दिखाता है उसकी बुद्धि दुख की खान होती है। इसके विपरीत जो प्रेम का मार्ग लेता है वह सर्वोच्च आनंद पाता है।
अधिक भये तो कहा भयो, बुद्धिहीन दुख रास।
साहिब बिग नर बहुत ज्यौं, कीरे दीपक पास।।
            सामान्य हिन्दी भाषा में भावार्थ-अधिक संख्या होने पर भी कुछ नहीं होता यदि किसी मनुष्य समूह में बुद्धि का अभाव है तो उससे कोई आशा नहीं करना चाहिये। परमात्मा के पास अनेक नर है जैसे दीपक के पास अनेक कीड़े होते हैं।
       अनेक बार हम देखते हैं कि अपराधियों के नाम के साथ भी चतुर या बुद्धिमान होने की संज्ञायें सुशोभित की जाती हैं।  उनकी सफलताओं का बखान किया जाता है पर सच यह है कि यही अपराधी अपने साथ प्रतिशोध लेने की आशंकाओं अथवा कानून के  शिकंजे में फंसने से डरे रहते हैं।  देखा यह भी गया है कि अनेक मानव समूह अपने संख्याबाल पर इतराते हैं क्योंकि उनको लगता है कि इनके पास ढेर सारा बाहुबल है।  समय पड़ने पर जब उनके पास संकट आता है तो वह मिट भी जाते हैं।  कहने का अभिप्राय यह है कि अपराध, अत्याचार या किसी पर आक्रमण करने को बुद्धिमानी नहीं कहा जाता क्योंकि उसमें प्रतिरोध के खतरे भी होते हैं। बुद्धिमानी तो इसमें है कि जीवन में ऐसा मार्ग चुना जो कंटक रहित होने के साथ ही सहज भी हो।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Monday, June 24, 2013

संत कबीर दर्शन-धनवान गुरु को शिष्यों से ही रहता खतरा (sant kabir darshan-dhanwan guru ko shishyon se hi rahata hai khatra)



          अगर देखा जाये तो पैसे की औकात केवल जेब तक ही रहती है जबकि अज्ञानी लोग इसे सदैव अपने सिर पर धारण किए रहती है।। वह बात-बात में अपने धनी होने का प्रमाणपत्र लेकर आ जाते हैं। अपनी तमाम प्रकार डींगें  हांकते है। परमार्थ से तो उनका दूर  दूर तक नाता नहीं होता। जो लोग ज्ञानी हैं वह जेब मैं पैसा है यह बात अपने दिमाग में लेकर नहीं घूमते। आवश्यकतानुसार उसमें से पैसा खर्च करते हैं पर उसकी चर्चा अधिक नहीं करते। आजकल जिसके भी घर जाओं वह अपने घर के फर्नीचर, टीवी, फ्रिज, वीडियो और कंप्यूटर दिखाकर उनका मूल्य बताना नही भूलता और इस तरह प्रदर्शन करता है जैसे कि केवल उसी के पास है अन्य किसी के पास नहीं। कहने का अभिप्राय है कि लोगों के सिर पर माया अपना प्रभाव इस कदर जमाये हुए है कि उनको केवल अपनी भौतिक उपलब्धि ही दिखती है।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि

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माया दासी संत की साकट की शिर ताज
साकुट की सिर मानिनी, संतो सहेली लाज

               सामान्य हिंदी भाषा में भावार्थ- माया तो संतों के लिए दासी की तरह होती है पर अज्ञानियों का ताज बन जाती है। अज्ञानी लोग का माया संचालन करती है जबकि संतों के सामने उसका भाव विनम्र होता है।

गुरू का चेला बीष दे, जो गांठी होय दाम
पूत पिता को मारसी, ये माया के काम

                    सामान्य हिंदी भाषा में भावार्थ- शिष्य अगर गुरू के पास अधिक संपत्ति देखते हैं तो उसे विष देकर मार डालते है। और पुत्र पिता की हत्या तक कर देता है।


         सामूहिक स्थानों पर लोग आपस में बैठकर अपने धन और आर्थिक उपलब्धियों पर ही चर्चा करते हैं। अगर कोई गौर करे और सही विश्लेषण करे तो लोग नब्बे फीसदी से अधिक केवल पैसे के मामलों पर ही चर्चा करते हैं। अध्यात्म चर्चा और सत्संग तो लोगों के लिए फ़ालतू का विषय  है । इसके विपरीत जो ज्ञानी और सत्संगी हैं वह कभी भी अपनी आर्थिक और भौतिक उपलब्धियों पर अहंकार नहीं करते। न ही अपने अमीर होने का अहसास सभी को कराते हैं।
                वैसे जिस तरह आजकल धार्मिक संस्थानों में संपतियों को लेकर विवाद  और मारामारी मची है उसे देखते हुए यह आश्चर्य ही मानना चाहिये कि कबीरदास जी ने भी बहुत पहले ही ऐसा कोई  घटनाक्रम देखा होगा इसलिए ही चेताते हैं कि गुरुओं को अधिक संपति नहीं रखना चाहिये।  आजकल अनेक संत इस सन्देश कि उपेक्षा कर संपति संग्रह में लगे हुए हैं इसलिए ही विवादों में  भी घिरे रहते हैं। इतना ही नहीं अनेक धार्मिक स्थानों पर तो आथिक कारणों से खून खराबा तक हो जाता है| देखा जाए तो आध्यात्मिक सस्थान एकांत में होना चाहिए पर लोग उसे सामूहिक स्थानों पर करना चाहते है जिसका लाभ धार्मिक ठेकेदार उठाना चाहते है, जिसके कारण उनके आपस में ही विवाद होते हैं|


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Sunday, June 9, 2013

दादू दयाल के दोहे-जिन का दिल मक्खन की तरह है माया उनके सामने पत्थर हो जाती है (dadu dayal ke dohe-jin ka dil makkhan ke tarah hai maya unke samne pattha ho jaatee hai)



  अनेक मासूम दिल वाले लोग धनी, उच्च पदस्थ तथा बाहुबली लोगों से दया की आशा से निहारते हैं। कुछ लोग बड़े होने पर भी विनम्र हो सकते हैं पर सभी के अंदर सहृदयता का भाव होना  संभव नहीं है। माया के फेर में फंसे लोगों से दया, परोपकार और अपने से कमजोर व्यक्ति के प्रति सहृदयता दिखाने की उम्मीद करना निरर्थक है।  खासतौर से आजकल अंग्रेजी शिक्षा तथा जीवन पद्धति के साथ जीने के आदी हो चुके समाज में तो यह आशा करना ही मूर्खता है कि धनी, उच्च पदस्थ तथा शक्तिशाली लोग समाज के प्रति उत्तरदायित्व निभायेंगे।  अंग्रेजी शिक्षा उपभोग के लिये गुलाम तक बनने के लिये प्रेरित करती है तो जीवन शैली अपना पूरा ध्यान सांसरिक विषयों की तरफ ले जाती है।  ऐसे में सामान्य मनुष्य से आशा करना कि वह भारतीय अध्यात्मिक दर्शन का अध्ययन करेगा, बेकार है |
कविवर दादू दयाल कहते हैं कि
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दादूमाया का खेल देखि करि, आया अति अहंकार।
अंध भया सूझे नहीं, का करिहै सिरजनहार ।।
        सामान्य हिन्दी भाषा में भावार्थ-माया का खेल अत्यंत विकट है। यह संभव ही नहीं है कि जिस मनुष्य के  पास धन, पद और प्रतिष्ठा का अंबार हो वह अहंकार का समंदर में न डूबे। जिसके पास माया है उसे कभी भी परमात्मा की भक्ति हो ही नहीं सकती।
माखन मन पांहण भया, माया रस पीया।
पाहण मन मांखण भया, राम रस लीया।।
      सामान्य हिन्दी भाषा में भावार्थ-जिनका मन मक्खन की तरह है उनके पास धन, पद और प्रतिष्ठा यान माया के प्रभाव में वह भी पत्थर हो जाता है। राम का रस पी ले तो पत्थर मन भी मक्खन हो जाता है।
       सच बात तो यह है कि भारत ने हर क्षेत्र में पाश्चात्य व्यवस्था का अनुकरण किया है। एक अंग्रेजी विद्वान ने बहुत पहले कहा था कि इस संसार में बिना बेईमानी या दो नंबर के धन के बिना कोई धनपति बन ही नहीं सकता।  जब हम अपनी प्राचीन पद्धतियों  से दूर हो गये हैं और  भारतीय अध्यात्म दर्शन की बात नहीं भी करें तो  पश्चिमी विद्वानों का सिद्धांत भी यही कहता है कि बिना बेईमानी के किसी के पास अधिक धन आ ही नहीं सकता।  हम यह भी देखें कि जब किसी के पास बेईमानी से काला धन आता है तो यकीनन उसके साथ अनेक प्रकार के संकट भी जुउ़ते हैं।  ऐसे में ऐसे काले धन के स्वामियों की रात की नींद हराम हो जाती है तो दिन का चैन भी साथ छोड़ देता है। अपने संकटों से दो चार हो रहे बड़े लोग  अपनी रक्षा करेंगे या दूसरों पर दया करने का समय निकालेंगे? इसलिये जहां तक हो सके अपने ही पवित्र साधनों से जीवन बिताना चाहिये और धनी, उच्च पदस्थ तथा प्रतिष्ठावान लोगों से कोई सरोकार न रखते हुए उनसे आशा करना त्याग देना चाहिये।
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Thursday, May 30, 2013

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-जहां राज्य कमजोर हो वहां अनाचार बढ़ते हैं (kautilya ka arthshastra-jahan rajya kamjor ho vahan anachar badhte hain



      पिछले कई दिनों से भारतीय प्रचार माध्यम स्त्रियों के प्रति बढ़ते अपराधों की घटनाऐं प्रचारित कर समाज की स्थिति का रोना रोते हुए  अपने विज्ञापन का समय पास कर रहे हैं।  अनेक प्रकार की बहस होती  है पर निष्कर्ष के रूप में नतीजा शून्य ही रहा है।  सच बात तो यह है कि हमारे देश की  ही नहीं वरन् पूरे विश्व की दंडप्रणालियां अत्यंत अपराधों के अन्वेषण तथा  विलंब से निर्णय करने का कारक बन गयी हैं।  दूसरी बात यह है कि अपराध अन्वेषण तथा न्यायिक प्रणाली के सदुपयोग की योग्यता जिन लोगों में अधिक नहीं  है वह भी राज्य कर्म में लिप्त होकर समाज की रक्षा का जिम्मा ले लेते हैं।  पुरातन सभ्यताओं में अपराध की प्रकृत्ति के अनुसार दंड की व्यवस्था थी। इनमें कई सजायें क्रूर थी जिनको पश्चिमी सभ्यता के लोग पशुवत मानते थे।  अपने को सभ्य समाज साबित करने के लिये पश्चिम के लोगों ने पशुवत अपराधों के प्रति भी मानवीय दृष्टिकोण अपनाने का सिद्धांत स्थापित किया जिससे समाज में अपराध बढ़े ही हैं।

कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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यदि प्रणयेराजा दण्डं उण्ड्येष्वतन्द्रितः।
शले मत्स्यानिवापक्ष्यन्दुर्बलान्बलवत्तराः।
           हिन्दी में भावार्थ-जब राज्य अपनी प्रजा की रक्षा करने के लिये अपराधियों को दंड देने में सावधानी से काम नहीं करता तब अव्यवस्था फैलती है। शक्तिशाली मनुष्य कमजोर लोगों पर भारी अनाचार करने लगते हैं।
अद्यात्काकः परोडाशं श्वा लिह्याद्धविस्तथा।
स्वाम्यं च न स्यात्कस्मिंश्चित्प्रवर्तेताधरोत्तरम्
          हिन्दी में भावार्थ-जब राज्य अपराधियों को दंड नहीं देता तो कौआ पुरोडाश खाने लगेगा, कुत्ता हवि खाकर स्वामी की बात नहीं मानेगा और समाज उच्च से निम्न स्थिति में चला जायेगा।
        भारत में भी कथित रूप से पश्चिमी व्यवस्था को अपनााया गया है। जिस भारतीय संविधान के आधार पर हमारे देश का वर्तमान स्वरूप विद्यमान है वह भी अंग्रेजों से विरासत में मिला है। हमने अपना संविधान बनाया पर उसके साथ ऐसे अनेक नियम हैं जो अंग्रेजों के काल से ही बने हैं।  अंग्रेज आधुनिक सभ्यता के प्रवर्तक होने का दावा करते हैं जो अपराधियों के प्रति मानवीय दृष्टिकोण अपनाने की बात करती है।  इसके विपरीत हमारा दर्शन मानता है कि क्रूरतम अपराधों की सजा भी क्रूर होना चाहिये।  चूंकि हमारे देश में पश्मिमी सभ्यता के समर्थकों के पास सारी शक्ति है इसलिये यह संभव नहीं है कि यहां अपराध के अन्वेषण तथा दंड के लिये अपने ही देश के अनुरूप कोई नयी प्रणाली बनायी जाये।
       हमारा दर्शन मानता है कि कुत्ते की पूंछ कभी सीधी नहीं हेाती जबकि पश्चिमी दर्शन अपराधियों के सुधरने की कल्पनातीत आशा पालता है।  उहापोह फंसे हमारे देश की स्थिति दिन ब दिन इसलिये बिगड़ती जा रही है क्योंकि हमारे यह अपराध तथा  अन्वेषण तथा न्यायालय में उनके प्रमाणीकरण में विलंब होता है।  अनेक अपराधी तो अपने पुराने अपराध के लिये क्षमा तक की आशा करते हैं।  कुछ तो बिना सजा के ही देह छोड़ जाते हैं।  जब तक हम अपने देश के मूल स्वभाव के अनुसार अपराध के अन्वेषण तथा उनके दंड देने की कोई तीव्र प्रणाली नहीं अपनायेंगे तब तक भयमुक्त समाज की आशा करना व्यर्थ है।         

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday, May 25, 2013

मनुस्मृति के आधार पर चिंत्तन-पाखंडी को दान देने वाला भी डूबता है (pakahandi ko dan dene wala bhee doobta hai

       
       वैसे तो हमारे देश में पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव के कारण खान पान, रहन सहन तथा कार्यपद्धति में अनेक परिवर्तन आये हैं।  इतना ही नहीं देश के पेशेवर धार्मिक स्वयंभूओं तथा संगठनों ने भी पश्चिमी देशों की व्यवसायिक कंपनियों की तरह अपने कामकाज का विस्तार किया है।  वह भक्ति के साथ भगवान का नाम अवश्य लें  पर उनका लक्ष्य माया पाना ही होता है। यह सच है कि इन्हीं धार्मिक ठेकेदारों ने अपने शिष्यों को दान तथा दया के आधुनिक प्रयासों के लिये प्रेरित नहीं किया ताकि पुरानी दान परंपरा के नाम पर उनके घर भरत रहें। दान देने के मामले में यही लोग गुरु बनकर दक्षिणा का  मुख अपनी तरफ किये रहते हैं।  तब वह कभी नहीं कहते कि यह दान दक्षिणा गरीब बच्चों की शिक्षा या असहायों की मदद के लिये व्यय करो। यह अलग बात है कि ऐसे साधन संपन्न धार्मिक व्यवसायी लोगों को दिखाने के लिये कथित रूप से गरीबों को खाना खिलाने और बच्चों को किताबें बांटने का काम स्वयं करते हैं। कभी अपने शिष्यों को अपने घर के आसपास स्थित जरूरतमंदों को मदद करने की प्रेरणा नहीं देते।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
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यथा प्लवेनौपलेन निमज्जत्युदके तरन्।
तथा निमज्जतोऽधस्तदजो दातृप्रतीच्छकौ।।
         हिन्दी में भावार्थ-जिस तरह पानी में पत्थर की नाव पर सवार होने वाला व्यक्ति डूब जाता है उसी तरह पाखंडी विद्वान तथा उसका सहायक दानदाता दोनों ही पाप के भागी बनते हैं
तस्मादविद्वान्विद्यस्मात्तस्मात्प्रतिग्रहात्।
स्वल्पकेनाप्यविद्वान्हि पङ्के गौरवि सीदति।।
    हिन्दी में भावार्थ-पाखंडी विद्वान को दान देने से कोई लाभ नहीं होता। बल्कि उसे धन तथा पुण्य दोनों की हानि होती है। मूर्ख बनाकर दान लेने वाला विद्वान भी शीर्घ नष्ट होता है।
          सच बात यह है कि आधुनिक समय में समाज हित के लिये जिस व्यापक दृष्टिकोण की आवश्यकता है उसकी प्रेरणा कथित गुरु देना ही नहीं चाहते।  गरीबों को खाना खिलाना बुरी बात नहीं है पर प्रयास इस बात के होने चाहिये कि गरीबों को  अपने परिश्रम का उचित पारिश्रमिक मिले।  भीख मांगने वाले  को दान देते समय पुण्य का फल की कामना मन में रहती है तो लोग खुलकर देते हैं पर जब किसी मजदूर या सेवक को उचित पारिश्रमिक या वेतन देने की बात हो तो तब अमीर आदमी अपनी चतुराई पर उतर आता है।  उस समय वह मजदूर या सेवक के परिवार का पेट भरने में अपना पुण्य नहीं देखता।  यही कारण है कि अनेक भिखारी परिश्रम कर कमाने की बात कहने पर कहते हैं कि हमें तो अपने ही इस धंधे में ही इतनी कमाई है कि परिश्रम करने पर उसका दसवां हिस्सा भी नहीं मिल सकता।  यह हमारे समाज की बौद्धिक मूर्खता है कि वह मेहनतकश को उचित या अधिक पारिश्रमिक देने को दान नहीं मान पाता। यही कारण है कि हमारे देश में धनिक अधिक संख्या में पैदा रहे हैं पर समाज में उनके प्रति वैमनस्य भी उतनी तेजी से बढ़ रहा है।  सच बात तो यह कि हमारा आधुनिक समाज का संपन्न पहले की अपेक्षा अधिक मेहनतकशों पर निर्भर हो गया है पर उनका सम्मान नहीं करना चाहता जबकि अमीर गरीब के बीच स्थित तनाव से बचने का एक ही मार्ग है कि पूंजीगत शक्तियां मानव श्रम का उचित ढंग से लालन पालन करें।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 



Saturday, May 18, 2013

चाणक्य के दर्शन में भी है समाजवाद का सिद्धांत-हिन्दी लेख (chankya ke darshan mein bhee samajwan ka siddhant-hindi lekh)

          हमारे देश में भारतीय अध्यात्म से प्रथक अनेक विदेशी विचारधाराओं ने लोगों के मनमस्तिष्क में घर कर लिया है। माना जाता है कि भारतीय अध्यात्म का दर्शन केवल बघारने के लिये है और उसके सिद्धांतों का अब कोई व्यवाहारिक महत्व नहीं है।  अनेक बुद्धिमानों ने  योजनाबद्ध ढंग से  साम्यवादी, प्रगतिवादी तथा समाजवादी विचाराधाराओं को  क्रम से यह कहकर स्थापित करने का प्रयास किया है कि उनके अनुसार गरीबों और असहायों को मदद मिलनी चाहिये।  जब यह बुद्धिमान इन विदेशी विचाराधाराओं का गुणगान करते हैं तो उनका संबोधन समाज नहीं वरन् राज्य व्यवस्था की तरफ होता है। उनका मानना है कि मनुष्य समाज तो एक दम संवदेनहीन होता और उसे राज्य के दंड से ही नियंत्रित किया जा सकता है।
           इसके विपरीत भारतीय अध्यात्म दर्शन समाज को संबोधित करता है। उसका मानना है कि अगर समाज स्वतः नियंत्रित होगा ता अधिक शक्तिशाली होगा। यही कारण है कि भारतीय अध्यात्म दर्शन ने ही हमेशा दान की प्रवृत्ति का संदेश दिया हैं। हमारे देश के बुद्धिमान लोग उसका आशय केवल मुफ्त में किसी गरीब को देना मानते हैं। इतना ही नहीं  यह समाज के धनी लोगों के विवेक पर ही निर्भर है जबकि हमारे बुद्धिमान मानते हैं कि जिसके पास राज्य दंड नहं है वह संवेदनशील हो ही नहीं सकता।  दरअसल इस दान की महिमा के लिये पुण्य का लाभ मिलने की बात अवश्य हमारा दर्शन कहता है पर उसका कोई रूप स्पष्ट नहीं किया है।  यह पुण्य केवल  अगले जन्म या इस जन्म में प्रत्यक्ष मिलता हो ऐसा दावा हमारा दर्शन नहीं करता।  इस दान की प्रवृत्ति को उकसाने के पीछे हमारे विद्वान मनीषियों का आशय यही रहा है कि इससे समाज में समरसता और शंाति रहे। जिनके पास धन है वह अपने से कमतर व्यक्ति को उसकी सेवा या वस्तु प्रतिफल या दान में देते रहें ताकि वह कभी भूखे न रहें। अगर वह भूखे या निराश होंगे तो समाज को कहीं न कहीं उनके विद्रोह का सामना करना पड़ता है। इससे अशांति फैलती है। अगर धनी मनुष्य अपने समाज के गरीब लोगों का ख्याल रखता है तो उसके धन देने की प्रक्रिया को भले ही दान कहें पर इससे जो शांति बनी रहती है वह उसके लिये पुण्य के रूप  में प्रतिफल ही होता है।
चाणक्य नीति में कहा गया है कि
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उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणाम्।
लडागोदसंस्थानां परीवाह इवाऽम्भासाम्।।
       हिन्दी में भावार्थ-अर्जित धन का त्याग करने से ही उसकी रक्षा हो सकती है। जैसे तालाब में जमा जल को बाहर निकालने पर उसकी रक्षा होती है।
      चाणक्य महाराज के इस संदेश का विस्तार से अर्थ समझें तो यह स्पष्ट है कि जिन लोगों को पास अधिक धन है वह इस गुमान में कतई नहीं रहें कि वह उसका केवल संग्रह कर अपनी तथा परिवार की रक्षा कर सकते हैं।  उनको अपने आसपास रह रहे लोगों को खुश रखने के लिये भी कुछ व्यय करते रहना चाहिये।  ताकि वह निराशा और हताशा से उनकी तरफ वक्र दृष्टि न डालें।  इतना ही नहीं जब वह धनिकों पर निर्भर रहेंगे तो उनकी रक्षा के लिये भी तैयार रहेंगे।  अगर धनी ऐसा नहीं करेंगे तो निश्चित रूप से न उनका धन और नही परिवार सुरक्षित रह सकता है। एक तरह से यह चाणक्य का समाजवादी सिद्धांत है जिसके लिये अधिक लिखने की आवश्यकता नहीं है।
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 



Saturday, May 11, 2013

मनुस्मृति-सन्यासी को त्यागी भी होना चाहिये(sanyasi ko tyagi bhi hana chahiye-manu smriti)

             हमारे देश में सन्यास और सन्यासी को लेकर कभी सार्वजनिक रूप से परिभाषित किया ही नहीं जाता। इसका कारण यह है कि जिन लोगों को सन्यास या वानप्रस्थ का सही अर्थ बताना चाहिये वही गेरुए या सफेद वस्त्र पहनकर इस तरह समाज के सामने प्रस्तुत होते हैं जैसे कि वह भारी भरकम आत्मज्ञानी हों।  इतना ही नहीं स्वयंभू गुरु बनकर वह अपने शिष्यों से धन संपदा संग्रह करने के साथ ही उनसे अपने पांव भी पुजवाते हैं।  भारतीय अध्यात्म ज्ञान में सिद्ध होने का दावा करने वाले यह पेशेवर महापुरुष समाज को भौतिक यज्ञ करने के लिये ही प्रेरित करते हैं।  इतना ही ज्ञान यज्ञ के नाम पर यह ऐसे कार्य करते हैं जिनका धार्मिक कर्मकांडों से संबंध तो होता है पर अध्यात्म के विषय से उनका कोई सरोकार नहीं माना जा सकता।  हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार तो सन्यास का सीधा अर्थ संसार के भौतिक साधनों का पूरी तरह से त्याग करना ही है। सन्यास ग्रहण करने के बाद केवल प्रकृति से निर्मित वस्तुओं का ही उपभोग करना आवश्यक है ।  पहनना, ओढ़ना और सोना हमेशा ही प्रकृति प्रधान वस्तुओं का ही जुड़ा  होना चाहिये । वस्त्रों के रूप में मृगचर्म या फिर पेड़ के पत्तों को ओढ़ना चाहिये। भोजन में फल और कंदमूल का सेवन करना ही श्रेयस्कर माना जाता है।  कहने का अभिप्राय यह है कि मानव निर्मित वस्तुओं का उपभोग एक तरह से निषिद्ध है। देखा जाये तो सन्यास के इस रूप में आज के अनेक गुरु खरे नहीं उतरते।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
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प्राजापत्यां निरुप्येर्ष्टिसर्ववेदसदक्षिणाम्।
आत्मन्यग्नीसमारोप्य ब्राह्म्णः प्रव्रजेद्गृहात्।
       हिन्दी में भावार्थ-वानप्रस्थ आश्रम में रहने वाले को चाहिये कि वह अपनी सारी संपत्ति दान देने के साथ ही परमात्मा के प्रति धन्यवाद ज्ञापित करने के लिये यज्ञ का आयोजन करे। इसके पश्चात् आत्मज्ञान की ज्योति को जलाकर सन्यास के लिये प्रस्थान करे।
यो दत्वा सर्वभूतेभ्यः प्रव्रजत्यभवं गृहात्।
तस्य तेजोमया लोक भवन्ति ब्रह्मवादिनः।
        हिन्दी में भावार्थ-सभी जीवों को अभयदान देकर वानप्रस्थ के लिये  सन्यास ग्रहण करने वालों को तेजपूर्ण लोकों की प्राप्ति होती है।
         सन्यासी को न तो किसी निंदा करना चाहिये न किसी के व्यक्ति के मन में भय पैदा कर उसका हृदय अपने अनुकूल बनाने के प्रयास करना चाहिये।  उसे किसी की मधुर वाणी पर मुग्ध और कटु वाणी पर क्रुद्ध होने के भाव से भ परे होना चाहिये।  जबकि इसके विपरीत हम देख रहे हैं कि जिन्होंने धर्म क्षेत्र में शिखर पर अपनी जगह बनाई है वह आम लोगों में उसका प्रभाव भी दिखाते हैं।  राजसी पुरुषों के अपने शिष्य होने के दावे के प्रचार   के लिये वह उनके साथ खिंचवाये गये फोटो की प्रदर्शनी भी लगाते हैं।  अनेक कथित धर्मगुरु यह कहते थकते नहीं कि वह तो सन्यासी हैं पर अपने पास आने वालों लोगों को वह उनके स्तर के अनुसार दर्शन देते हैं।  अनेक गुरु तो आम तथा विशिष्ट लोगों को दर्शन देने के लिये अलग अलग स्थान निर्धारित करते हैं।  हम उन लोगों की निंदा नहीं कर रहे। हमारा कहना तो यह है कि धर्म के क्षेत्र में उनका यह पेशा है और यह कोई बुराई नहीं है।  हमारा उद्देश्य तो यह बता कहना है कि किसी को वस्त्र, वाणी, या व्यक्तितत्व देखकर उसे सन्यासी मानकर उसके सामीप्य प्राप्त करने का प्रयास नहीं करना चाहिये।  ऐसे में हम अपने जीवन में आये भटकाव से बच नहीं सकते क्योंकि उन पेशेवर साधुओं के पास कोई ऐसी युक्ति नहंी है जिससे  मनुष्य तनाव से बच सकते।  इसके लिये सबसे बेहतर उपाय तो यही है कि अपने अध्यात्मिक ग्रंथों का स्वयं ही अध्ययन करें। उसके संदेशों को समझकर जीवन के प्रति अपना उचित दृष्टिकोण बनाये।  अध्यात्मिक चिंत्तन और मनन की यह प्रक्रिया स्वतः ही मस्तिष्क में वैचारिक स्फृर्ति पैदा करती है और हमें किसी अन्य से राय लेने से बचाती है ।
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 



यह ब्लाग/पत्रिका विश्व में आठवीं वरीयता प्राप्त ब्लाग पत्रिका ‘अनंत शब्दयोग’ का सहयोगी ब्लाग/पत्रिका है। ‘अनंत शब्दयोग’ को यह वरीयता 12 जुलाई 2009 को प्राप्त हुई थी। किसी हिंदी ब्लाग को इतनी गौरवपूर्ण उपलब्धि पहली बार मिली थी। ------------------------

Sunday, April 28, 2013

मजदूर दिवस-चाणक्य का धन के संबंध में दिया गया संदेश आज भी प्रासंगिक (mazdoor diwal or divas-chankya ka dhan ke sambandh mein diya gaya sandesh aaj bhee prasngik)

          हमारे देश में भारतीय अध्यात्म से प्रथक अनेक विदेशी विचारधाराओं ने लोगों के मनमस्तिष्क में घर कर लिया है। माना जाता है कि भारतीय अध्यात्म का दर्शन केवल बघारने के लिये है और उसके सिद्धांतों का अब कोई व्यवाहारिक महत्व नहीं है।  अनेक बुद्धिमानों ने  योजनाबद्ध ढंग से  साम्यवादी, प्रगतिवादी तथा समाजवादी विचाराधाराओं को  क्रम से यह कहकर स्थापित करने का प्रयास किया है कि उनके अनुसार गरीबों और असहायों को मदद मिलनी चाहिये।  जब यह बुद्धिमान इन विदेशी विचाराधाराओं का गुणगान करते हैं तो उनका संबोधन समाज नहीं वरन् राज्य व्यवस्था की तरफ होता है। उनका मानना है कि मनुष्य समाज तो एक दम संवदेनहीन होता और उसे राज्य के दंड से ही नियंत्रित किया जा सकता है।
           इसके विपरीत भारतीय अध्यात्म दर्शन समाज को संबोधित करता है। उसका मानना है कि अगर समाज स्वतः नियंत्रित होगा ता अधिक शक्तिशाली होगा। यही कारण है कि भारतीय अध्यात्म दर्शन ने ही हमेशा दान की प्रवृत्ति का संदेश दिया हैं। हमारे देश के बुद्धिमान लोग उसका आशय केवल मुफ्त में किसी गरीब को देना मानते हैं। इतना ही नहीं  यह समाज के धनी लोगों के विवेक पर ही निर्भर है जबकि हमारे बुद्धिमान मानते हैं कि जिसके पास राज्य दंड नहं है वह संवेदनशील हो ही नहीं सकता।  दरअसल इस दान की महिमा के लिये पुण्य का लाभ मिलने की बात अवश्य हमारा दर्शन कहता है पर उसका कोई रूप स्पष्ट नहीं किया है।  यह पुण्य केवल  अगले जन्म या इस जन्म में प्रत्यक्ष मिलता हो ऐसा दावा हमारा दर्शन नहीं करता।  इस दान की प्रवृत्ति को उकसाने के पीछे हमारे विद्वान मनीषियों का आशय यही रहा है कि इससे समाज में समरसता और शंाति रहे। जिनके पास धन है वह अपने से कमतर व्यक्ति को उसकी सेवा या वस्तु प्रतिफल या दान में देते रहें ताकि वह कभी भूखे न रहें। अगर वह भूखे या निराश होंगे तो समाज को कहीं न कहीं उनके विद्रोह का सामना करना पड़ता है। इससे अशांति फैलती है। अगर धनी मनुष्य अपने समाज के गरीब लोगों का ख्याल रखता है तो उसके धन देने की प्रक्रिया को भले ही दान कहें पर इससे जो शांति बनी रहती है वह उसके लिये पुण्य के रूप  में प्रतिफल ही होता है।
चाणक्य नीति में कहा गया है कि
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उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणाम्।
लडागोदसंस्थानां परीवाह इवाऽम्भासाम्।।
       हिन्दी में भावार्थ-अर्जित धन का त्याग करने से ही उसकी रक्षा हो सकती है। जैसे तालाब में जमा जल को बाहर निकालने पर उसकी रक्षा होती है।
      चाणक्य महाराज के इस संदेश का विस्तार से अर्थ समझें तो यह स्पष्ट है कि जिन लोगों को पास अधिक धन है वह इस गुमान में कतई नहीं रहें कि वह उसका केवल संग्रह कर अपनी तथा परिवार की रक्षा कर सकते हैं।  उनको अपने आसपास रह रहे लोगों को खुश रखने के लिये भी कुछ व्यय करते रहना चाहिये।  ताकि वह निराशा और हताशा से उनकी तरफ वक्र दृष्टि न डालें।  इतना ही नहीं जब वह धनिकों पर निर्भर रहेंगे तो उनकी रक्षा के लिये भी तैयार रहेंगे।  अगर धनी ऐसा नहीं करेंगे तो निश्चित रूप से न उनका धन और नही परिवार सुरक्षित रह सकता है। एक तरह से यह चाणक्य का समाजवादी सिद्धांत है जिसके लिये अधिक लिखने की आवश्यकता नहीं है।
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 



Sunday, April 21, 2013

सर्वरक्षक आत्मा का स्मरण करें-यजुर्वेद (sarvarakshak aatma ka smaran kar-yajurved)

       पूरे विश्व समाज  में सोने  को अत्यंत महंगी धातु माना जाता है। हैरानी की बात यह है कि सोना किसी का पेट न भर सकता है न गले की प्यास  बुझा सकता है फिर भी  लोग उसे पाने को आतुर रहते है।  खासतौर से महिलाओं को सोने के आभूषण पहनने का शौक रहता है।  अपने आप में यह आश्चर्य की बात है कि जिस अन्न से मनुष्य का पेट भरता है उसे कोई सम्मान से नहीं देखता।  इतना ही नहीं जिस अन्न को प्रसाद मानकर खाना चाहिये लोग उसे मजबूरी समझ कर खाते हैं क्योंकि उसके बिना शरीर नहीं चल सकता।   अधिकतर मनुष्य भोजन कर शरीर इसलिये चलाना चाहते हैं कि अधिक से अधिक दैहिक रूप सक्रिय होकर धन संचय कर सकें। इस द्रव्य धन का सर्वश्रेष्ठ भौतिक रूप सोना ही है।  आज के विश्व समाज में सोने  का उपयोग कागजी मुद्रा को भौतिक रूप में स्थिर रखने के लिये किया जाता है।  इसी सोने के पात्र में जीवन का सच छिप जाता है।  यह संसार बिना अधिक धन संपदा, भूमि तथा अन्य भौतिक साधनों के भी स्वर्ग हो सकता है यह तथ कोई सिद्ध या ज्ञान साधक ही समझ सकता है।  
यजुर्वेद में कहा गया है कि
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हिरण्मपेन पवित्र सत्यस्थापिहितं सुखम्।
हिन्दी में भावार्थ-सोने के पात्र से सत्य ढका हुआ है।
वापुरनिलमृतथेदं भस्मान्थमशरीरम्।
क्रततो स्मद।।
क्लिवे स्मर।
कृथ्स्मर।।
हिन्दी
में भावार्थ-प्राण अपार्थिव अमृत हैं जबकि यह शरीर अंततः भस्म हो जाता है। अतः सर्वरक्षक आत्मा का स्मरण कर। अपनेअंदर स्थित कर्म करने वाला पुरुष का स्मरण कर।
       हमारी देह में विराजमान ही आत्म ही वास्तविक स्वर्ण है। यही वह अमृत है जिसका स्मरण करना चाहिये।  निरंतर बहिर्मुखी होने से मनुष्य बाह्य विषयों में सिद्धहस्त हो जाता है पर आंतरिक विषयों के बारे में उसका अज्ञान अंततः उसके लिये घातक होता है। आजकल लोगों के पास भौतिक साधनों का जमावड़ा तो हो गया है पर फिर भी कोई खुश नहीं दिखता। मानसिक तलाव के चलते लोग राजरोगों का शिकार होते जा रहे हैं।  समस्या यह भी है कि शारीरिक रूप से लोग अपने विकारों की चर्चा तो कर सभी को बता देते हैं पर उससे उनकी मानसिकता में  जिंदगी के प्रति उत्पन्न  नकारात्मक  भाव की  अनुभूति प्रत्यक्ष नहीं दिखती पर उनका आचरण तथा व्यवहार पर उसका दुष्प्रभाव अवश्व ही पड़ता है।  यही कारण है कि लोगों को दूसरों के द्वंद्व में मनोरंजन, पीड़ा में सनसनी और व्यसनों में ताजगी का अनुभव हेाता है।  आध्यात्कि विषय पर चर्चा उनके लिये केवल समय नष्ट करना ही होता है।  अपने मन के वेग से भौतिक संपदा के पीछे भाग रहे लोग अपनी आत्मा से साक्षात्कार तो दूर उसका विचार तक नहीं करते।
      जिन लोगों के हृदय में  शारीरिक तथा मानसिक रूप से स्वस्थ् रहने की इच्छा है उनको अंतमुखर््ी होकर योगासन, प्राणायाम, ध्यान और मंत्र जाप में अवश्य लगना चाहिये।  अंतमुर्खी  होकर अध्ययन करने से संसार के विषयों में स्वतः प्रवीणता आती हे पर बहिमुर्खी रहकर सांसकिर विषयों में लिप्त रहने से अध्याित्मक ज्ञान नहीं आ सकता।  जब भौतिकता से मोहभंग होता है तब अध्यात्मिक ज्ञान के अभाव  में मनुष्य निराशा, हताशा और मानसिक विकृतियों का शिकार होकर अपना जीवन दाव पर लगा देता है।
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 



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