Friday, June 3, 2011

अथर्ववेद से संदेश-समाज की रक्षा करे वहीं देवराज इंद्र (atharved se sandesh-samaj ki raksha kare vahi devraj indra)

         सभी मनुष्य को अपने लिये नियत तथा स्वाभाव के अनुकूल कार्य करना चाहिए। इतना ही नहीं अगर सार्वजनिक हित के लिये कोई कार्य आवश्यक करने की अपने अंदर क्षमता लगे तो उसमें भी प्राणप्रण से जुट जाना चाहिए। अगर हम इतिहास और धर्म पुस्तकों पर दृष्टिपात करें तो सामान्य लोग तो अपना जीवन स्वयं और परिवार के लिये व्यय कर देते हैं पर जो ज्ञानी, त्यागी और सच्चे भक्त हैं पर सार्वजनिक हित के कार्य न केवल प्रारंभ करते हैं बल्कि समय आने पर बड़े बड़े अभियानों का नेतृत्व कर समाज को सम्मान और परिवर्तन की राह पर ले जाते हैं। ऐसे लोग न केवल इतिहास में अपना नाम दर्ज करते हैं वरन् अपने भग्वत्स्वरूप हो जाते हैं।
भारतीय अध्यात्म ग्रंथ अथर्ववेद में कहा गया है कि
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यः शर्धते नानुददाति शुध्यां दस्योर्हन्ता स जनास इन्द्रः।
‘‘जो मनुष्य अहंकारी के अहंकार को दमन करता है और जो दस्युओं को मारता है वही इन्द्र है।’’
यो जाभ्या अमेथ्यस्तधत्सखायं दुधूर्षति।
ज्योष्ठो पदप्रचेतास्तदाहु रद्यतिगति।
‘‘जो मनुष्य दूसरी स्त्री को गिराता है, जो मित्र की हानि पहुंचाता है जो वरिष्ठ होकर भी अज्ञानी है उसको पतित कहते हैं।’’
       एक बात निश्चित है कि जैसा आदमी अपना संकल्प धारण करता है उतनी ही उसकी देह और और मन में शक्ति का निर्माण होता है। जब कोई आदमी केवल अपने परिवार तथा स्वयं के पालन पोषण तक ही अपने जीवन का ध्येय रखता है तब उसकी क्षमता सीमित रह जाती है पर जब आदमी सामूहिक हित में चिंत्तन करता है तब उसकी शक्ति का विस्तार भी होता है। शक्तिशाली व्यक्ति वह है जो दूसरे के अहंकार को सहन न कर उसकी उपेक्षा करने के साथ दमन भी करता है। समाज को कष्ट देने वालों का दंडित कर व्यवस्था कायम करता है। ऐसी मनुष्य स्वयं ही देवराज इंद्र की तरह है जो समाज के लिये काम करता है। शक्तिशाली मनुष्य होने का प्रमाण यही है कि आप दूसरे की रक्षा किस हद तक कर सकते हैं।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
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Sunday, May 29, 2011

सामवेद से संदेश-मनुष्य को प्रतिदिन युद्ध करना चाहिए (man must always reddy for war in his life)

         अपनी प्रकृति के अनुसार हर जीव संघर्ष कर जिंदा रहता है। संघर्ष का आशय स्वाभाविक कर्म से ही है। जब श्रीमद्भागवत गीता की बात आती है तो अक्सर लोग यह सोचते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को युद्ध करने का उपदेश दिया है जिसका सामान्य कर्म से कोई संबंध नहीं है। यह सोच अज्ञान का प्रमाण है। दरअसल अर्जुन का उस समय स्वाभाविक कर्म ही युद्ध करना था। उन्होंने द्रोणाचार्य से युद्ध कौशल की ही शिक्षा प्राप्त की थी। श्रीकृष्ण ने अर्जुन से स्पष्ट कहा था कि ‘तू अभी अज्ञानवश विरक्त होकर युद्ध छोड़ देगा पर बाद में तेरा स्वभाव तुझे इसके लिये प्रेरित करेगा।’’
          सामवेद में कहा गया है कि
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         दिवे दिवे वाजं सरिनः।
        ‘‘प्रतिदिन युद्ध करों।’’
         मो घु ब्रह्मोव तन्द्रर्भवो।
         ‘‘आत्म ज्ञानी होकर आलसी न होना।’’
        अधा हिन्वान इंद्रिय ज्यायो महित्वमानशे।
          अभिष्टकृद्विचर्षणि।
         ‘‘विशेष ज्ञान धारण करने वाला इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर अपना लक्ष्य प्राप्त करता है।
             आज के आधुनिक युग में प्राचीन इतिहास की तरह युद्ध नहीं लड़े जाते पर मनुष्य के स्वाभाविक कर्म भी अब युद्ध की तरह संपन्न करने पड़ते हैं। इसके विपरीत मनुष्य स्वभाव आलस्य की तरफ बहुत आसानी से प्रवृत्त होता है। आज नहीं कल नहीं कल नहंी परसों तक काम टालने की बात उसके दिमाग में आ ही जाती है। आलस्य की वजह से लोग अपने हाथ से ऐसा अवसर खो देते हैं जिसका लाभ उठाने से उनके जीवन का धारा बदल सकती है।
         अगर हम अपने जीवनकाल के सफल लोगों की तरफ देखकर उनके कर्म का विश्लेषण करें तो यह बात सामने आयेगी कि उन्होंने अपने पास आये अवसरों का जमकर लाभ उठाया। हमें प्रतिदिन अपने कर्म के लिये ऐसे ही तैयार होना चाहिए जैसे युद्ध के लिये योद्धा तैयार होता है। अपने विषय से संबंधित हर सामग्री का अवलोकन उसें पारंगत होना चाहिए। जीवन में सफलता मूलमंत्र सतत युद्ध करना ही है। इसके लिये हमेशा तत्पर रहना चाहिए।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Saturday, May 28, 2011

अथर्ववेद से संदेश-संसार में अभयतापूर्वक विचरण करें (atharvaved se sandesh-sansar mein bhayrahit rahen-live without tension))

         अगर देखा जाये तो मनुष्य पर शासन उसका भय ही करता है इसी कारण सभी मनुष्य हिंसक नहीं होते। यह भय आत्मसंयम के रूप में होना चाहिए न कि अपने कर्म के फल की आशंकाओं के कारण मन में बैठना चाहिए। राजकर्म में लोग पूरे मानव समाज पर नियंत्रण करने के लिये भय पैदा करते हैं। आज के आधुनिक लोकतंत्र में तो भय आम आदमी के सामने खड़ा किया जाता है ताकि लोगों को समूबबद्ध कर उन पर शासन किया जा सके। राजकर्म में लगे अनेक लोग समाज को निर्भय पूर्वक रहने की व्यवस्था प्रदान करने का दाव करते हैं पर इसके लिये पद पाने के लिये वह अव्यवस्था का भय पैदा करते है। अनेक बुद्धिमान लोग आतंक और भ्रष्टाचार से समाज के बिखरने का भय पैदा कर एकता के लिये प्रयास करते हैं। दरअसल यह उनका व्यवसाय है कि किसी भी तरह समाज पर नियंत्रण करें ताकि सामाजिक तथा असामाजिक व्यवसायिक की गतिविधियां चलती रहें। ऐसे लोग जानते हैं कि आदमी पर केवल भय ही शासन कर सकता है इसलिये नित्य नये भयों का निर्माण कर उनका प्रचार किया जाता है।
         भय और अभय के विषय पर अथर्ववेद में कहा गया है कि
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           अभयं मित्रादभयममित्रदभयं ज्ञातादभवं पुरो यः।
            अभयं तक्तमभयं दिवा नः सर्वा आशा मम् मित्रम्।।
               ‘‘मित्र और शत्रु से हम अभय हो, जाने हुए से अभय हों, भविष्य से अभय हों, रात और दिन के साथ ही सारी दिशायें हमारे लिये अभय हों। सब आशायें हमारी मित्र बनें।
               अगर हम आत्ममंथन करें तो हम भय के कारण ही शांत रहते हुए कई ऐसे कर्मों से विमुख हो जाते हैं जो कि करना चाहिए। इतना ही नहीं कई बार भयग्र्रस्त होकर ऐसे लोगों से संपर्क बनाते हैं जिनसे हानि की आशंका होती है। हम विचार करें तो इतने  संकट  जिंदगी में नहीं आते जितने की आशंका हम करते हैं। ज्ञान के अभाव में कई बार ऐसे काम भी करते हैं जो वाकई भय पैदा करने वाले होते हैं। इसलिये किसी काम को न करने से पहले उसके गुण दोषों पर विचार अवश्य करना चाहिए। साथ ही अगर कोई सात्विक और सार्थक कार्य हो तो उसे निर्भयतापूर्व संपन्न करना चाहिए।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Sunday, May 22, 2011

चाणक्य नीति से संदेश-एकता में होती है भारी शक्ति (chankya neeti-ekta mein shakti)

                 पाश्चात्य संस्कृति के प्रवाह तले हमारे देश की अध्यात्मिक संस्कृति मान्यताऐं रौंदी जा रही हैं। अंग्रेजी शिक्षा से ओतप्रोत देश की शिक्षा और नियम बनाने वाले विधाता कुछ विदेशी तो कुछ देशी मान्यताओं के मिक्चर से समाज को नमकीन की तरह सजा रहे हैं। ऐसे में संयुक्त परिवार को विघटन हुआ है। सभी लोगों ने स्वयं के विकास को ही आत्मनिर्भरता का प्रमाण मान लिया है। दूसरे के साथ संयुक्त उपक्रम सभी को गुलामी जैसा लगता है। परिवार की परिभाषा या सीमा माता पिता और बच्चे तक ही सिमट गयी है। दादा, दादी और चाचा चाची अब परिवार के बाहर हो गये हैं। भाई और भाई का संयुक्त उपक्रम में काम करना अब उस पुरानी परंपरा का हिस्सा मान लिया गया है जिसकी आवश्यकता अब अनुभव नहीं की जाती। उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह कि पिता के साथ पुत्र का संयुक्त उपक्रम होना उसके कमजोर व्यक्तित्व का प्रमाण माना जाता है। हर कोई यह चाहता है कि उसका दामाद स्वतंत्र उपक्रम वाला हो। भाई या पिता के साथ संयुक्त उपक्रम होने पर उसे गुलाम की तरह देखा जाता है।
           यही स्थिति आधुनिक महिलाओं की भी है। वह पति को स्वतंत्र उपक्रम का स्वामी या फिर किसी कार्यालय में अधिकारी के रूप में देखना चाहती हैं। इसके अलावा भी ढेर सारे कारण है जिससे हमारा समाज और राष्ट्र कमजोर हो रहा है।
          एकता के विषय पर चाणक्य नीति में कहा गया है कि 
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             बहुनां चैव सत्वानां समवायो रिपुंजयः।
             वर्षधाराधरो मेधस्तृणैरपि निवार्यते।।
           ‘‘बहुत लोगों के समूह में एकता होने की वजह अपने शत्रुओं को परास्त करने की शक्ति होती है। उसी तरह जैसे वर्षा की धारा प्रवाहित करने वाला बादल को तिनकों का समूह झौंपड़ी में प्रवेश से रोक लेता है।
                एक बात निश्चित रूप से तय है कि व्यक्ति अपने परिवार या समाज से मिलकर ही शक्तिशाली होता है और साथ ही यह भी सच है कि व्यक्ति के मजबूत होने से परिवार, परिवार से समाज, और समाज से राष्ट्र मजबूत होता है। कहने का अभिप्राय यह है कि व्यक्ति से राष्ट्र और राष्ट्र से व्यक्ति शक्तिशाली होता है पर इसके लिये जरूरी है कि लोगों की आपस में एकता है जो कि निज स्वार्थ पूर्ति के भाव तथा अहंकार के चलते नहीं हो पाती। यही कारण है कि आज हम अपने राष्ट्र में लोगों में अकेलेपन का तनाव बढ़ता देख रहे हैं।
            अगर हम चाहते हैं कि राष्ट्र शक्तिशाली हो तो व्यक्तियों को मजबूत होना पड़ेगा जिसके लिये यह जरूरी है कि लोग स्वयं में एकता के साथ काम करे।
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Saturday, May 21, 2011

ऋग्वेद से संदेश-दृष्ट और मूर्ख ही समाज की हानि करते हैं (rigved se sandesh-dusht aur moorkh log karte hain samaj ki hani)

           इस भौतिकवादी युग ने लोगों को अंधा कर दिया है। वह अपनी संपत्ति संचय के लिये अनेक लोग किसी भी हद तक चले जाते हैं। वह यह नहीं सोचते कि कालांतर में न केवल समाज बल्कि उनकी आने वाली पीढ़ियों को भी हानि होगी। हम देख रहे हैं कि देश के अनेक धनपति लोग अपने ही देश से कमाकर विदेशों में भेज रहे हैं तो अनेक उच्च पदस्थ लोग भ्रष्टाचार में लिप्त होकर देश की व्यवस्था को छिन्न भिन्न कर देते हैं। ऐसे लोग अपने परिवार की वर्तमान पीढ़ी का ही विचार करते हैं। उनको यह ज्ञान नहीं है कि समय एक जैसा कभी नहीं रहता और लक्ष्मी अत्यंत चंचल है और एक दिन उनके परिवार का पतन होना ही है और अंततः उनकी भावी पीढ़ी को भी बिगड़ी व्यवस्था के दुष्परिणाम भोगने होंगे। इसके बावजूद वह समाज का आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक शोषण करने के लिये किसी भी हद तक चले जाते हैं चाहे भले ही भविष्य में वह सब स्त्रोत सूख जायें जिससे वह धन कमा रहे हैं।
         यह अनैतिकता इस हद तक हो गयी है कि लोग अपने पद के अभिमान के साथ ही धर्म को भी बेच देते हैं। अपनी सात पीढ़ियों के लिये कमाने वाले लोग यह विचार नहीं करते कि जब यह भी तय है कि उनकी भावी पीढ़ी तक उनकी संपत्ति पहुंचेगी कि नहीं। संचय की प्रवृत्ति नें लोगों को हिंसक और दृष्ट प्रवृत्ति बना दिया है।
             ऋग्वेद में कहा गया है कि 
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               दुराध्यो अदिति स्त्रेवयन्तोऽचेतसो विजगृभे परुणीम्।।
               ‘‘दुष्ट बुद्धि वाले मूढ़ लोग अन्नदायी परुष्णी नदी के तट को तोड़ते रहे।
दुष्ट व्यक्ति मूर्ख भी होते हैं और सदैव विनाश के लिये प्रयत्नशील रहते हुए सभी के हित में आने वाली वस्तुओं को नष्ट करते हैं। 
              ऐसे दुष्ट, हिंसक और मूर्ख लोग समाज की बजाय अपने स्वार्थ को ही सर्वोपरि मानते हैं। अनेक लोग अंततः वह समाज के विद्रोह का शिकार भी हो जाते हैं। इसी कारण कहा जाता है कि धनवान को दानी भी होना चाहिए। यह दान पुण्य देने के साथ ही सुरक्षा देता है। उसी तरह बड़े आदमी को उदार तथा सदाचारी होना चाहिए। ऐसा होने पर उसके विराट व्यक्तित्व की रक्षा होती है। सदाचार और उदारता एक तरह किले की दीवार है जिसमें आदमी आराम से रह सकता है।
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Tuesday, May 17, 2011

तृष्णाओं का त्याग करना ही श्रेयस्कर-हिन्दू धार्मिक विचार (trishna ka tyag hi shreyaskar-hindu religion thought)

                     मनुष्य की देह का विकास स्वाभाविक रूप से होता है, उसे अपने मानसिक विकास के लिये स्वयं प्रयास करने होते हैं। उसका मन हमेशा ही तृष्णा की गोद में सोया रहता है। उनकी पूर्ति करने में ही मनुष्य अपना पूरा जीवन नष्ट कर देता है। फिर भी न तो कभी उसके मन की तृष्णायें मरती हैं न मनुष्य को कभी चैन आता है। एक वस्तु आती है तो दूसरे की तृष्णा पैदा होती है। परमात्मा के कृपा से इस संसार में विचर रहे देहधारियों की बजाय मनुष्य में स्वाजातीय बंधुओं के हाथ से निर्मित प्राणहीन वस्तुओं को पाने और संजोने की इच्छा रहती है।
                इस विषय पर हमारे धर्मग्रंथो में कहा गया है कि
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               तृष्णा हि सर्वपापिष्ठा नित्योद्वेगकरी स्मृता।
               अधर्मबहुला चैव घोरा पापानुबंधिनी।।
               ‘‘मनुष्य मन में विचरने वाली तृष्णाऐं ही पाप की जन्मदात्री हैं। वही आदमी को अधर्म के लिये प्रेरित करती हैं। अतः उनका त्याग ही श्रेयस्कर है।’’
             या दुस्यतजा दुर्मतिभियां न जीर्यति जीर्यतः।
            योऽसि प्राणान्तिको रोगस्तां तृष्णां त्यजतः सुखम्।।
            ‘‘जो बुद्धिहीन के लिये त्याग योग्य नहीं है और जो देह के जीर्ण शीर्ण होने पर ही खत्म नहीं होती वह तृष्णायें न केवल आदमी को बीमार बनाती हैं बल्कि उसके सुख का भी हरण कर लेती है। ऐसी तृष्णाओं का त्याग ही श्रेयस्कर है।
             मनुष्य देह और मन के संयोग को नहीं जानता। मन कही भीं बिना लगाम होने पर भटक सकता है पर देह की कार्य करने की अपनी सीमाऐं हैं। अनेक लोग अपने सामर्थ्य से अधिक तृष्णाऐं पाल लेते हैं। उनको पाने के लिये वह अधिक से अधिक श्रम करते हैं पर मन कहीं भी चला जाय पर सामर्थ्य से बाहर भला किसकी देह जाकर काम सकती है। नतीजा यह होता है कि देहधारी को अंततः बीमारियों और दुर्घटनाओं का शिकार बनना पड़ता है। ऐसी तृष्णाओं का त्याग ही श्रेयस्कर है जिनकी वजह से मनुष्य स्वतंत्र होते हुए भी भौतिक वस्तुओं का दास बन जाता है। जिनसे विकार उत्पन्न होने के साथ ही जीवन का अतिशीध्र क्षय होता है।

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Thursday, May 12, 2011

तनाव से जीवन में विकृति आती है-हिन्दू धार्मिक विचार (tanav se jeevan mein vikruti aatee hai-hindu dharmik vichar)

               हम अपने जीवन में तनाव इतना अपने सिर पर लेते हैं कि इसका आभास ही नहीं रहता कि शांति पूर्ण जीवन होता क्या है? अनेक लोग तो तनावरहित जीवन को अरुचिकर मानते हैं। उनका कहना होता है कि ‘अगर जीवन में तनाव नहीं है तो फिर मजा ही किस बात का?’
              यह एक खोखला विचार है। दरअसल जीवन का आनंद कर्म है और उसका आशय यह कतई नहीं है कि हर कर्म तनाव का कारण हो। कर्म हमारी देह और मन को व्यस्त रखता है पर उसे तनाव का प्रतीक मानना ठीक नहीं है। तनाव हर स्थिति में शरीर के नाश का कारण बनता है। यह तनाव जब हम अनिच्छा से कोई काम करते हैं या फिर हमारा काम किसी दूसरे पर निर्भर होता है तब बढ़ जाता है। यह स्थितियां कभी सुखद नहीं मानी जाती हैं।
              इस विषय पर मनुस्मृति में कहा गया है कि
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                    यद्यत्परवशं कर्म तत्तद्यलेन वर्जयेत्।
                    यद्यदात्मवशं तु स्यात्तत्तत्सेवेत यत्नतः।
                    "जिस काम के लिये दूसरे पर निर्भर रहना पड़ता है उनका त्याग कर देना चाहिये तथा अपने हाथ से ही संपन्न होने वाले अनुष्ठान करना चाहिए।"
                   यत्कर्मकुर्वतोऽस्य स्यात्परितोषोऽन्तरात्म्न्ः।
                    तत्प्रयत्नेन कुर्वीत विपरीतं तु वर्जयेत्।।
                  "जिस कार्य से मन को शांति तथा अंतरात्मा को खुशी हो वही करना चाहिये। जिस काम से मन को अशांति हो उसे न ही करें तो अच्छा।"
                   जीवन का आनंद सहजता के साथ उठना ही ठीक है। तनाव अंततः हमारी मानसिकता तथा स्वास्थ्य में विकार पैदा करता है। वर्तमान भौतिक जीवन ने लोगों की सुख सुविधाओं में वृद्धि की है जिससे लोग विलासी जीवन को अधिक महत्व देने लगे हैं। दैहिक सक्रियता के अभाव में शरीर स्थूल हो जाते हैं जिससे विकार पैदा होते हैं। उनसे मानसिक तनाव बढ़ता है जो कि अब हमारे जीवन का एक नकारात्मक पक्ष बन रहा है। लोगों ने अपनी आवश्यकतायें इतनी बढ़ा ली हैं कि उनकी पूर्णता दूसरे पर निर्भर हो गयी है। अगर दूसरा काम न करे तो हम लाचार हो जाते हैं। ऐसे में खिसियाहट तो आती है। इसके अलावा लोग अपनी ताकत से अधिक का लक्ष्य तय कर उसके पीछे लग जाते हैं जिसके न मिलने से उनमें हताशा आती है।
               इस प्रकार के तनाव से बचने का एकमात्र उपाय यही है कि हम अपनी आवश्यकतायें सीमित रखें। इसके अलावा अपने जीवन का आधार अपने ऊपर ही बनायें जिससे दूसरे की निष्क्रितयता हमारे संकट और तनाव का कारण न बने।

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Sunday, May 1, 2011

साकार भक्ति भी निष्काम भाव से करना चाहिए-हिन्दू धार्मिक चिंतन (sakar,nirakar bhakti aur nishkam bhakti-hindu dharmik chittan)

               हमारे अध्यात्मिक दर्शन मे भक्ति के प्रकारों को लेकर कोई विवाद नहीं है यह अलग बात है कि कुछ लोग अनावश्यक रूप से इस पर विवाद होता दिखाते हैं। हमारे वेदशास्त्रों में अस्सी फीसदी से ज्यादा सकाम भक्ति पर लिखा गया है तो बीस फीसदी निष्काम भक्ति पर चर्चा की गयी है। श्रीगीता चूंकि समस्त वेदों का सार माना जाता है इसलिये उसका महत्व बहुत है। उसमें स्पष्ट रूप से निराकार तथा निष्काम भक्ति को श्रेष्ठ बताया गया है पर सकाम और साकार भक्ति की महत्ता को भी स्वीकार किया गया है। यही कारण है कि हमारे यहां भक्तों में परमात्मा के स्परूप को लेकर विवाद नहीं होता। अनेक इतिहासकारों के साथ विदेशी संस्कृति और धर्म के देशी समर्थक भारतीय अध्यात्मिक दर्शन का मखौल उड़ाते हुए कहते हैं कि उनका कोई एक ग्रंथ या भगवान नहीं है। उनकी इस आलोचना का भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान समर्थक अधिक प्रतिकार नहीं करते हुए समाज में एकरसता लाने की वकालत करते हैं। दरअसल ऐसे लोगों ने श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन नहीं किया होता। यदि अध्ययन किया होता है तो समझा नहीं होता।
            हमारे अध्यात्मिक दर्शन में सकाम तथा सगुण भक्ति का महत्व स्वीकार किया गया है पर भाव निष्काम होने की बात कही गयी है। इस विषय पर हमारे ग्रंथो में कहा गया है कि--
सम्प्रीतिभोज्यान्यन्ननि आपभ्दोन्यानि वा पुनः।
न च सम्प्रीयस राजन् न चैवायद्गता वयम्।।
                    पूर्णकाम होने के कारण भगवान किसी भी वस्तु की चाहत नहीं रखते। वह तो प्रेम के भूख हैं। भगवान कहते हैं कि पत्र, पुष्प, फल अथवा जल जैसी वस्तुऐं मनुष्यों को बिना परिश्रम के बड़ी सरलता से मिल जाती हैं इसलिये उनको मुझे अर्पण करना कोई बड़ी बात नहीं है। इस अर्पण में प्रेम का भाव होना चाहिए। जो भक्त प्रेम से यह वस्तुऐं अर्पण करता है उसके निष्काम भाव को देखकर में सगुण रूप में प्रकट होकर खाता हूं।
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो में भक्तया प्रयच्छति।
तदहं भवत्युपतमनश्नामि प्रयतात्मनः।।
                 जिस मनुष्य का हृदय शुद्ध न हो तो वह चाहे बाहर से कितना भी शिष्टाचार दिखाते हुए पत्र, पुष्प, फल तथा जल जैसे वस्तुऐं प्रदान करे उसे भगवान स्वीकार नहीं करते।
                   श्रीमद्भागवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण योगासन, प्राणयाम तथा मंत्र जाप करने वाले भक्त को ंसर्वश्रेष्ठ बताते हैं पर साथ ही सकाम भक्ति को राजस भाव से उत्पन्न होने के कारण स्वभाविक भी मानते हैं। निष्काम तथा निर्गुण भक्ति में व्यक्ति को अंतर्मुखी होना पड़ता है जो कि कठिन होता है क्योंकि उससे बाहर प्रतिक्रिया दिखाई नहीं देती जबकि सकाम तथा सगुण भक्ति में लोगों को उसका बाहरी प्रदर्शन बहुत अच्छा लगता है। इसलिये सामान्य लोग उसी तरफ आकर्षित होते है। यह भी बुरा नहीं है पर उसमें भाव निष्काम होना चाहिये यही हमारे धर्मग्रंथों का कहना है।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Thursday, April 28, 2011

अधर्मियों को न रोकना भी पाप का प्रमाण-हिन्दू धार्मिक चिंत्तन (adharam ko na rokana bhee paap ka praman-hindu dharmik chinttan)

         स्वयं पाप न करना ही धर्म का परिचायक नहीं है वरन् जिस पाप को रोकना संभव है उसका प्रतिकार न करना भी अधर्म है। हम अपने मित्रों, रिश्तेदारों या परिवार के सदस्यों के पाप में स्वयं लिप्त न हों पर उनको दुष्कर्म करते देख मौन रहना या उनको न रोकना भी अधर्म की श्रेणी में आता है। चूंकि मनुष्य को प्रकृति ने हाथ पांव, वाणी, तथा आंखें दी हैं और उसके साथ ही बुद्धि भी प्रदान की है तब यह उसके लिये आवश्यक है कि वह अपने समूहों को पाप कर्म से रोके। अगर कोई ऐसा सोचता है कि वह स्वयं पाप नहीं कर रहा है इसलिये वह धर्मभीरु है तो गलती पर है। यह उदासीनता अधर्म का ही एक बहुत बड़ा भाग है।
           हमारे वेद शस्त्रों में कहा गया है कि
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          धर्मादयेतं यत्कर्म यद्यपि स्यान्महाफलम्।
            न तत् सेवत मेधावी न तद्धिमिहोच्यते।।
               ‘‘इस धर्म का अर्थ बहुत व्यापक है। जहां विद्वान लोग न्याय का समर्थन नहीं करते वह अधर्मी ही कहे जाते हैं।
           यत्र धर्मोह्य्मेंण सत्यं यत्रानृतेन च।
          हन्यते प्रेक्षामाणानां हतास्तत्र सभासदः।।
       ‘‘जहां अधर्म को देखते हुए भी सभासद चुप रहते हैं और उसका प्रतिकार नहीं करते वह भी पाप के भागी हैं।’’
                 कहते हैं भी अन्याय करने से अधिक पाप अन्याय पाप सहना है। उतना ही पाप है अपने सामने अन्याय, व्याभिचार, भ्रष्टाचार और बेईमानी होते देखना। वैसे धर्म साधना एकाकी होती है पर उसका निर्वहन करना सामूहिक गतिविधियों में ही होता है। परमार्थ, दान तथा धर्म की रक्षा का दायित्व बोध बाहरी गतिविधियों से प्रमाणित होता है। जब कोई आदमी अपनी जाति, परिवार और मित्र समुदाय के पथभ्रष्ट होने पर यह सोचकर चुप रहता है कि वह अपना धर्म निभा रहा है तो उसे बताना चाहिए कि यह भी अधर्म का ही एक भाग है। धर्म का आशय यह है कि आप स्वयं पाप न करें तो दूसरे को भी करने से रोकें।
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Tuesday, April 26, 2011

योग शक्ति के बिना संसार का ज्ञान होना संभव नहीं-हिन्दू धार्मिक चिंत्तन (yog sadhana ki shakti-hindu dharmik chittan)

       अनेक योग प्रचारक अपने शिष्यों को तात्कालिक दैहिक प्रभाव दिखाने वाले आसनों तथा प्राणायामों के बारे में सिखाते हैं जबकि योग विधा के आठ अंग होते हैं जिनका ज्ञान होने पर आदमी ज्ञानी हो जाता है।
      इसमें कोई संशय नहीं है कि योगासन तथा प्राणायाम का बहुत महत्व है पर यह भी जरूरी है कि पतंजलि योग के मूल तत्वों का भी ज्ञान प्राप्त किया जाये। योगासन और प्राणायाम से शरीर में स्फूर्ति और स्थिरता आती है तब मानव मन कोई अच्छा विचार करना चाहता है। मन में बेहतर विषयों के अध्ययन के प्रति रुचि उत्पन्न होती है। ऐसे में भारतीय अध्यात्म ग्रंथों का अध्ययन करना एक महत्वपूर्ण कार्य साबित हो सकता है। पतंजलि योग में वर्णित आठों भागों का ज्ञान प्राप्त होने पर हमारे अंदर योग शक्ति का निर्माण होता है। मन के उतार चढ़ाव, इंद्रियों की गतिविधियों तथा देह के अंदर चल रही प्रक्रिया को हम अपनी अंतदृष्टि से देखते हैं। इससे हमारे अंदर संसार के व्यवहार का ज्ञान आता है।
                दक्षस्मृति में कहा गया है कि
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         लोको वशीकृतों येन यन चात्मा वशीकृतः।
         इन्द्रियार्थो जितोयने ते योग प्रब्रवीम्यहम्।।
               ‘‘योग से मनुष्य सारे संसार को वश में कर सकता है। बिना योग शक्ति के किसी को भी वश में करना संभव नहीं है। बिना योग के व्यवहार का भी ज्ञान नहीं होता न ही इंद्रियों की गतिविधियों को नियंत्रित किया जा सकता है।’’
                सच बात तो यह है कि बोलते, सुनते, स्पर्श करते, सूंघते और देखते हुए केवल एक प्रयोक्ता की तरह हो जाते हैं। अपने अंदर के स्वामित्व का आभास तनिक भी नहीं रहता। हमारी इंद्रियां कार्यरत हैं पर उन पर हमारी नज़र नहीं रहती। हमें लगता है कि सारे काम हम कर रहे हैं पर यह भूल जाते हैं कि यह सब इंद्रियों की गतिविधियों का परिणाम है। हम इंद्रियों के प्रयोक्ता हैं पर यह अहसास नहीं होता। यही अहसास अपने स्वामित्व होने का परिचय देता है और आदमी दृष्टा की तरह हो जाता है। तब वह संसार के व्यवहार के सिद्धांतों को अच्छी तरह समझता है। इसी कारण योग साधना तथा ध्यान में हमेशा तत्पर रहना चाहिए। इससे जो ज्ञान प्राप्त होता है वह आदमी को विश्व विजयी बना सकता है।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Friday, April 22, 2011

सांयकाल वंदना अवश्य करना चाहिए-हिन्दू धार्मिक चिंत्तन (sanykal vandna avashya karna chahie-hindu dharmik chittan)

          हमारे अध्यात्मिक दर्शन में बहुत सारी बातें स्वास्थ्य विज्ञान से संबंधित हैं तो हमारे धर्म में मनुष्य के मनोविज्ञान को भी बहुत महत्व दिया गया है। इसे आधुनिक लोग शायद ही समझ पाते हैं। मनुष्य तो अन्य जीवों की तरह पंच तत्वों से बना प्राणी है पर उसके पास बुद्धि की वह शक्ति जिसकी शक्ति पर अपने मन की हर बात पूरी कर सकता है जो अन्य जीवों में नहीं होती। मजे की बात यह है कि यह मन अपनी बात तो पूरी करवा लेता है पर उस बुद्धि की शक्ति के ज्ञान से से परे ही रहता है जो कि मनुष्य की ही शक्ति है। यही कारण है कि मनुष्य सारी सुविधायें होते हुए भी मानसिक तनाव में रहता है।
          हम अपने अंदर मानसिक तनाव का अध्ययन करें तो पायेंगे कि सांसरिक कार्यो में निरंतर सक्रिय रहने से उपजी एकरसता उसका एक कारण होती है। कुछ देर उनसे विरक्ति जीवन को नवीनता प्रदान करती है। यही कारण है कि हमारे यहां परमात्मा की निष्काम भक्ति की बात कही जाती है ताकि कुछ देर अपना मन तथा बुद्धि को सांसरिक कर्म से हटाकल दूसरी राह पर ले जाया जाये। सच बात तो यह है कि महल में सारी सुविधायें रहते हुए भी वह तब जेल लगने लगता है जब वहां से कहीं जाने का अवसर न मिले। यही कारण है कि हमारे यहां प्रातः तथा सांयकाल ईश्वर वंदना के लिये नियत किये गये हैं। प्रातः वंदना से हम पवित्र मन लेकर सांसरिक कार्य के लिये तैयार होते हैं तो सांयकाल प्रतिदिन कर्ममंथन से प्राप्त विषय का विसर्जन करते हैं।
सांयकाल वंदना पर दक्षस्मृति में कहा गया है कि
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संध्याहीनोऽशुचिर्नित्यमनर्हः सर्वकर्मसु।।
यदन्यत् कुरुते कर्म न तस्य फलमश्नुते।।
               ‘‘संध्यावंदन अवश्य करना चाहिए। ऐसा न करने वाला हमेशा ही अपवित्र रहता है और किसी भी कार्य करने का अघिकार नहीं रखता। जो सायंकाल जपादि नहीं करता उसके सारे कर्म निष्फल हो जाते हैं।’’
         सुबह जल्दी नहाने और ईश्वरीय वंदना करने से शरीर और मन में नवीनता की अनुभूति होती है। सुबह गायत्री मंत्र का जाप करना अत्यंत श्रेष्ठ कर्म माना जाता है। शाम को शांति पाठ अवश्य करना चाहिए ताकि दिन भर में अपने जीवन कर्म मंथन से  अशांति रूपी विष एकत्रित किया है उससे मन मुक्त हो सके।
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Wednesday, April 20, 2011

ज्ञानियों में बैठकर टूट जाता है भ्रम-हिन्दू धार्मिक चिंत्तन (gyan aur bhram-hindu dharmik chittan)

अगर हम शिक्षा या अध्यात्मिक ज्ञान से संबंधित किताबें पढ़कर यह सोचें कि कोई भारी ज्ञानी बन गये हैं तो यह हमारी ही मूर्खता का प्रमाण होता है। उसी तरह जब कोई कथित ज्ञानी इन्हीं किताबों से रटा रटाया ज्ञान हमारे सामने उसे बघारता है तो समझ लेना भी मूर्खता है कि वह कोई भारी ज्ञानी है। इसके अलावा अगर कोई तोता रटंत कथित ज्ञानी के पास ढेर सारे शिष्य हैं तो उसे भी कोई भारी सिद्ध नहीं समझ लेना चाहिए क्योंकि अपने नीरस जीवन से उकताये लोग लोग थोड़ा ज्ञान की बातें सुनकर प्रभावित हो जाते हैं पर आचरण कोई  नहीं  देखता। ज्ञान का प्रमाण तो व्यक्ति का आचरण है। ज्ञानी उसकी अनुभूति दूसरों को कराते हैं कि अपनी प्रशंसा करते हुए सुनाते हुए हैं। कोई भी ज्ञानी यह दावा नहीं कर सकता कि वह सिद्ध है क्योंकि वह जानता है कि ज्ञान की सीमा भी परमात्मा के रूप की तरह अनंत है।
इस विषय पर भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि
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यदा किंचिज्ज्ञोऽहं द्विप मदान्धः समभवम्
तदा सर्वज्ञोऽस्मीत्यभवदवहनश्प्तं मम मनः।
यदाकिंचत्किंचिद् बुधजनसकाशादवगतम्
तदामूर्खोऽस्मीति ज्वर इव मदो मे व्यपगतः।।
‘‘जब मुझे कुछ ज्ञान हुआ तो हाथी की तरह मस्त होकर अपने ज्ञानी होने का अहंकार पालने लगा। मुझे लगा कि मैं ‘सर्वज्ञ’ हूं। लेकिन जब विद्वानों के बीच बैठा तो यथार्थ का ज्ञान हुआ और मेरा मद कम हो गया है। तब लगा कि मैं तो निपट मूर्ख हूं।’
श्रीमद्भागवत गीता में ज्ञान का प्रमाण मनुष्य का ‘स्थिरप्रज्ञ’ होना है। जो माने अपमान से परे हो, समदर्शी हो तथा निष्काम भाव से कार्य करने के साथ निष्प्रयोजन दया करने वाला हो। ऐसे में कोई ज्ञानी है या नहीं या उसके आचरण से तय करना चाहिए। उसी तरह अपने ज्ञानी होने का भ्रम तो कभी पालना ही नहीं चाहिए क्योंकि तब हम कोई नई बात नहीं सीख सकते।
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Saturday, April 16, 2011

परिणाम का कर्म से संबंध जानना जरूरी-पतंजलि योग सूत्र (parinam ka karma se sanbandh-patanjali yoga sootra)

क्रमान्यत्वं परिणामन्यत्वे हेतुः।
‘‘किसी कार्य करने के क्रम में भिन्नता से परिणाम भी भिन्न होता है।’’
परिणामन्नयसंयमादतीतानागतज्ञानम्।।
‘‘अतीत, वर्तमान तथा भविष्य का विचार करने से परिणाम का ज्ञान हो जाता है।’’
                   पतंजलि योग में न केवल भौतिक तथा दृश्यव्य संसार को जानने की विधा बताई गयी है बल्कि अभौतिक तथा अदृश्यव्य स्थितियों के आंकलन का भी ज्ञान दिया गया है। हमारे सामने जो भी दृश्य आता है वह तत्काल प्रकट नहीं होता बल्कि वह किसी के कार्य के परिणाम स्वरूप ही ऐसा होता है। कोई व्यक्ति हमारे घर आया तो इसका मतलब वह किसी राह से निकला होगा। वहां भी उसके संपर्क हुए होंगे। वह हमारे घर पर जो व्यवहार करता है वह उसके घर से निकलने से लेकर हमारे यहां पहुंचने तक आये संपर्क तत्वों से प्रभावित होता है। वह धूप में चलकर आया है तो दैहिक थकावट के साथ मानसिक तनाव से ग्रसित होकर व्यवहार करता है। कोई घर से लड़कर आया है तो उसका मन भी वहीं फंसा रह जाता है और भले ही वह उसे प्रकट न करे पर उसकी वाणी तथा व्यवहार अवश्य ही नकारात्मक रूप से परिलक्षित होती है।
               कहने का अभिप्राय यह है कि हम प्रतिदिन जो काम करते हैं या लोगों हमारे लिये काम करते हैं वह कहीं न कहीं अभौतिक तथा अदृश्यव्य क्रियाओं से प्रभावित होती हैं। इसलिये कोई दृश्य सामने आने पर त्वरित प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त करना चाहिए। हमें यह विचार करना चाहिए कि उस दृश्य के पीछे कौन कौन से तत्व हैं। व्यक्ति, वस्तु या स्थितियों से प्रभावित होकर ही कोई धटना हमारे सामने घटित होती है। जब हमें यह ज्ञान हो जायेगा तब हमारे व्यवहार में दृढ़ता आयेगी और हम अनावश्यक परिश्रम से बच सकते हैं। इतना ही नहीं किसी दृश्य के सामने होने पर जब हम उसका अध्ययन करते हैं तो उसके अतीत का स्वरूप भी हमारे अंतर्मन में प्रकट होता है। जब उसका अध्ययन करते हैं तो भविष्य का भी ज्ञान हो जाता है।
               हम अपने साथ रहने वाले अनेक लोगों का व्यवहार देखते हैं पर उसका गहराई से अध्ययन नहीं करते। किसी व्यक्ति के मन में अगर पूर्वकाल में से दोष रहे हैं और वर्तमान में दिख रहे हैं तो मानना चाहिए कि भविष्य में भी उसकी मुक्ति नहीं है। ऐसे में उससे व्यवहार करते समय यह आशा कतई नहीं करना चाहिए कि वह आगे सुधर जायेगा। योग साधना और ध्यान से ऐसी सिद्धियां प्राप्त होती हैं जिनसे व्यक्ति स्वचालित ढंग से परिणाम तथा दृश्यों का अवलोकन करता है। अतः वह ऐसे लोगों से दूर हो जाता है जिनके भविष्य में सुधरने की आशा नहीं होती।

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Sunday, April 10, 2011

नाखून चबाने वाला शीघ्र नष्ट होता है-मनु स्मृति के आधार पर चिंत्तन (thought according munu smriti

             हम अपनी छोटी छोटी आदतों की तरफ ध्यान नहीं देते जबकि वही हमारे लिये जबरदस्त कष्ट का कारण बनती हैं। कुछ लोगों की आदत होती है कि वह अपने नाखून चबाते हैं। वह अपनी इस आदत पर ध्यान नहीं देते जबकि इससे उनको देखने वालों की दृष्टि में छवि खराब होती है। उन लोगों को यह मालुम नहीं कि हमारे नाखूनों में मिट्टी के साथ विषैले कीटाणु भी होते हैं। चबाने से वह मुख से होते हुए पेट में जाकर बीमारी पैदा करते हैं। यह बात आधुनिक विज्ञान अब कह रहा है जबकि हमारं मनु महाराज यह बात बहुत पहले ही कह गये।
मनु महाराज कहते हैं कि
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न विगृह्य कथां कुर्याद् बहिर्माल्य न धारेवेत्।
गवां च यानं पुष्ठेन सर्वथैव विगर्हितम्।।
‘‘उच्छ्रंखलता से वार्तालाप करना, दूसरों को दिखाने के लिये सोने की चैन पहनकर दिखाना और बैल की पीठ पर सवारी करना निंदाजनक कार्य हैं।’’
लोष्ठमर्दी तृपाच्छेदी नखखादी च यो नरः।
स विनाशं व्रजत्याशु सूचकोऽशुचिरेव सः।।
‘‘ऐसा व्यक्ति शीघ्र नाश को प्राप्त होता है, जो मिट्टी के बरतन पर मिट्टी के ढेले को साफ करता है, तिनकों को उखाड़ता है, अपने नाखूनों को चबाता है तथा चुगलखोरी करता है और अस्वच्छ रहता है।’’
              इसी तरह चाहे जब हम दूसरों की निंदा या चुगली करने लगते हैं। झूठे आरोप लगाकर दूसरे को बदनाम करते हैं। ऐसे एक नहीं अनेक कारनामे हैं जो दिखते बहुत छोटे हैं पर उनका दुष्प्रभाव व्यापक होता है।
अतः हमें अपने उठने बैठने, चलने फिरने तथा खाने पीने की आदतों पर ध्यान देना चाहिए। इसके लिये आवश्यक है कि योग तथा ध्यान कर अंतर्मुखी बना जाये। हमेशा बहिर्मुखी रहने से हम आत्ममंथन नहीं कर पाते और छोटी मोटी बुरी आदतों के बुरे प्रभाव का शिकार बने रहते हैं।
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Thursday, April 7, 2011

योग में ‘संयोग’ भी होता है-हिन्दू धार्मिक चिंत्तन (yog aur sanyog-patanjali yoga sahitya)

                          स्वस्वामिशक्त्यो स्वरूपोपलब्धिहेतुः संयोगः।।
                 "जब स्व तथा स्वामी की शक्ति के स्वरूप का ज्ञान प्राप्त हो जाता है तो उसे संयोग कहा जाता है।"
           हमारी सृष्टि के दो रूप हैं एक तो भौतिक प्रकृति दूसरा अभौतिक जीवात्मा। प्रकृति स्वयं एक शक्ति है तो जीवात्मा भी अपना स्वामी स्वयं है। मनुष्य इस प्रथ्वी पर पंच तत्वों से बनी अपनी देह के साथ विचरण करते हुए सांसरिक पदार्थों का उपभोग करता है। यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। जब कोई मनुष्य तत्वज्ञान प्राप्त करता है तब वह दृष्टा की तरह अपना जीवन व्यतीत करता है। अपनी इंद्रियों के साथ कर्म करते हुए वह अपने कर्तापान का अहंकार नहीं पालता।
               यहां अज्ञानवश हर आदमी अपने इर्दगिर्द स्थित भौतिक संसार के स्वामी होने का भ्रम पाल लेता है। वह नहीं जान पाता कि उसकी देह में स्थित मन, बुद्धि और अहंकार ऐसी प्रकृतियां हैं जो उसे दैहिक स्वामित्व का बोध कराकर भ्रमित करते हुए इधर से उधर दौड़ाती हैं। यही कारण है कि भौतिक देह और अभौतिक जीवात्मा का कभी आपस में मेल नहीं  हो पाता। आदमी मन को ही आत्मा समझने लगता है।
           जब योग साधना, ध्यान, स्मरण तथा भक्ति से कोई मनुष्य इस सत्य को जान लेता है तब उसे संयोग कहा जाता है वरना तो सारा  संसार दुर्योग का शिकार होकर जीवन तबाह कर लेता है। दैहिक प्रेम क्षीण हों जाता है तब घृणा या उदासीनता पनपती है। उसी तरह स्वार्थ की मित्रता का क्षरण भी जल्दी होता है। सकाम भक्ति में कामना पूर्ण न होने पर मन संसार से विरक्त होने लगता है मगर जो तत्वज्ञान को जान लेते हैं वह कभी हताश नहीं होता। वह ऐसे संयोग देखकर मन  में  क्षणिक   प्रसन्नता होती  है जो अंततः दुर्योग का कारण बनती है। 
         यह संसार संकल्प  और बने संयोग और दुर्योग का खेल है। मन में जैसा संकल्प होगा वैसी ही हमारी दुनियां होगी।  सीधी मत कहें तो मन का योग ही हमारे सामने दुर्योंग और संयोग बनाता है। हम अपने विचार और आचरण पवित्र रखेंगे तो हमारे संकल्प भी पवित्र होंगे और वैसे ही हमारे सामने दृश्य उपस्थित होंगे और वैस ही लोग हमारे संपर्क में आयेंगे।
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Saturday, April 2, 2011

इस धरती के तीन रत्नों की पहचान करें-हिन्दू धार्मिक लेख (dharti ke teen ratna-hindu dharmik lekh)

आधुनिक प्रचार माध्यमों के विज्ञापनों से पूरा भारतीय समाज दिग्भ्रमित हो रहा है। क्रिकेट खिलाड़ियांे, फिल्म अभिनेता तथा अभिनेत्रियों के अभिनीत विज्ञापन उपभोग की ऐसी खतरनाक प्रवृत्ति को जाग्रत करते हैं कि लोगों की अध्यात्मिक चेतना लुप्त हो गयी है। फिर हमारी शिक्षा व्यवस्था में ऐसी प्रणाली अपनाई गयी है जो केवल गुलाम बनाती है। ऐसे में अगर किसी में रचनात्मक प्रवृत्ति जाग्रत हो जाये तो वह पूर्व जन्म का ही प्रभाव समझे तो अच्छा है वरना तो अब व्यक्ति में चरित्र निर्माण की बजाय उसे प्रयोक्ता और सेवक बनने के लिये प्रेरित किया जा रहा है।
वैसे समाज की हालत तो कोई पहले भी अच्छी नहीं थी। सोना, चांदी, हीरा और रत्नों की चाहत हमारे समाज में हमेशा रही है। शायद यही कारण है कि हमारे मनीषी मनुष्य के अंदर मौजूद उस रत्न का परिचय कराते रहे हैं जिसे आत्मा कहा जाता है। इसके बावजूद लोग भौतिक संसार की चकाचौंध में खो जाते हैं और सोना, चांदी और हीरे की चाहत में ऐसे दौड़ते हैं कि पूरा जीवन ही अध्यात्मिक ज्ञान के बिना गुजार देते हैं। जिस अन्न और जल से जीवन मिलता है उसे तुच्छ समझते हैं एक पल का चैन न दे वही सोना गले लगा देते हैं। उसी तरह देहाभिमान से युक्त होने के कारण अधिक वाचाल होकर क्रूरतम शब्दों का प्रयोग करते हैं। जिससे समाज में वैमनस्य बढ़ता है।
महान नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि
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पृथिव्यां त्रीणी रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम्।
मूर्खे पाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा विधीयते।।
‘‘इस प्रथ्वी पर तीन ही रत्न हैं-अन्न, जल और मधुर वाणी, किन्तु मूर्ख लोग पत्थर के टुकड़ों को ही रत्न कहते हैं।’’

अक्सर लोग कहते हैं कि भारतीय लोगों के पास दुनियां के अन्य देशों के मुकाबले बहुत अधिक सोना है, मगर बहुत कम लोग जानते हैं कि उससे अधिक तो हम पर परमात्मा की यह कृपा है कि दुनियां के अन्य देशों से अधिक हमारे यहां भूगर्भ जलस्तर है। वैसे आजकल बाज़ार के सौदागर यह प्रयास भी कर रहे हैं कि यहां जल सूख जाये और उसे बेचकर अपने बैंक खाते बढ़ायें। अनेक तरह के ठंडे पेयों के कारखाने यहां स्थापित हो गये हैं जो अपने इलाके का पूरा जल पी जाते हैं। वहां का जलस्तर कम हो गया है पर भारतीय जनमानस ऐसी चकाचौंध में खो गया है कि उसे इसका आभास ही नहीं होता। जल जैसा रत्न हम खोते जा रहे हैं पर आर्थिक विकास का मोह ऐसा अंधा किये जा रहा है कि उसकी परवाह नहीं है।
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Saturday, March 26, 2011

अपने काम के मंत्र दिल में ही रखें-हिन्दू धार्मिक विचार (apna mantra dil mein hakehn-hindu dharmik vichar)

राजा राज्य का और गृहस्थ परिवार का मुखिया होता है। राज्य और परिवार के मुखिया के पास अपने प्रभाव के अंतर्गत रहने वाले सदस्यों के अनेक रहस्य होते हैं। उसी तरह राजकाज और परिवार चलाने के वैसे ही मंत्र या तरीके होते हैं जिस तरह अध्यात्म अनुष्ठानों के होते हैं। राज्य प्रमुख और परिवार के मुखिया को अपने राजकाज का मंत्र तथा रहस्य अपने मन में रखना चाहिए। अगर वह अपने मंत्र बाहर बता देगा तो वह उनका सार्वजनिकीकरण हो जाने पर संकट खड़ा हो सकता है।
इस विषय पर कौटिल्य महाराज कहते हैं कि
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संरक्षेन्मंत्रबीजं हि तद्वीजं हि महीभुजाम।
यस्मिन्न पिन्ने ध्रुवं भेदो गुप्ते युप्तिनुतरा।।
‘मंत्र के रहस्य की रक्षा करना चाहिए। राजा का यही बीज है जिसके प्रगट होने से भेद खुल जाता है और उसके सारे प्रयास निष्प्रभावी हो जाते हैं। गुप्त रहस्य की रक्षा करने की नीति अपनानी चाहिऐ।’
हमने देखा है कि कुछ लोग अतिउत्साह या दूसरे पर विश्वास करने के कारण अपने कामकाज का मंत्र बता देते हैं। उनको लगता है कि जैसे वह कोई बहादुरी का काम रहे हैं। उनको यह भी अहंकार होता है कि इस तरह वह अपनी बुद्धिमानी प्रमाणित कर रहे हैं। कुछ समय बाद जब उनकी कहंी पोल खुल जाती है तो न वह स्वयं ही हंसी के पात्र बनते हैं बल्कि अपमानित भी अनुभव करते हैं। अपने कामकाज के मंत्र दूसरे को बताना आदमी के हल्केपन का प्रमाण है। ऐसे लोगों की संगत करना दूसरे के लिये भी असहजता का कारण बनती । कोई भी मनुष्य तभी तक ताकतवर रहता है जब तक वह अपने कामकाज जिनको गुरुमंत्र दूसरे से छिपाये रहता है।
कोई व्यक्ति कितना मानसिक रूप से दृढ़ है इसका अनुमान तभी लग सकता है जब वह अपने राज अपने मन में ही रखने का प्रमाण देता है। कहा जाता है कि जब तक कोई बात हमारे मन में है तभी तक वह रहस्य है, अगर वह दूसरे को बताई तो इसका मतलब यह है कि वह अब तीसरे कान तक जायेगी। तीसरे से फिर चौथे तक पहुंचेगी और अंततः ऐसी बात सब जान जायेंगे जो संबद्ध व्यक्ति को केवल अपने पास रखनी थी। अंततः उसे अपने काम में परेशानी आनी ही है।
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Sunday, March 20, 2011

मान पाने की चाहत में आदमी पूरी जिंदगी खराब कर देता है-हिन्दी धार्मिक विचार (samman pane ki chahat aur admi ki zindagi-hindi dharmik vichar)

मनुष्य में अहंकार का भाव हमेशा ही रहता है। इस देह को ही सत्य समझने वाले लोग मान और अपमान की परवाह चिंता में मरे जाते हैं। खासतौर से गृहस्थ जीवन में सामाजिक परंपराओं के निर्वाह अपने जातीय, धार्मिक, भाषाई तथा क्षेत्रीय समूहों के लोगों में सम्मान पाने के लिये किया जाता है। शादी और गमी के अवसर पर भोजन खिलाने की परंपरा इसी सम्मान पाने का मोह पालने का ही परिणाम है। जब हमारा अध्यात्मिक दर्शन कहता है कि यह देह नश्वर है और उसमें विराजमान आत्मा अजन्मा होने के साथ अमर है, तब हमारे कथित धर्म प्रेमी लोग देह के जन्म लेने और मरने के बाद भी इसे लेकर जो नाटक करते हैं उसे अज्ञान ही कहा जा सकता है न कि धर्म का प्रमाण। हमारे भारतीय धर्म में जन्म और मरण के दिनों को मनाने की परंपरा नहीं है पर विदेशी दर्शनों के आधार पर अब जन्म दिन और पुण्यतिथि मनाने का फैशन चल पड़ा है। मतलब यह कि समाज में सम्मान पाने के मोह से उपजी परंपराओं की संख्या कम तो नहीं हुई बल्कि बढ़ती जा रही है। अपने तथा परिवार के सम्मान के लिये आदमी अपना पूरा जीवन दाव पर लगा देता है।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं
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दुनिया के धोखे मुआ, चल कुटुंब की कानि
तब कुल की क्या लाज है, जब ले धरा पसानि
"यह दुनियां एक धोखा है जिसमें आदमी केवल अपने परिवार के पालन पोषण के लिये हर समय जुटा रहता है। वह इस बात का विचार नहीं करता कि जब उसका शरीर निर्जीव होकर इस धरती पर पड़ा रहेगा तब उसके कुल शान का क्या होगा?"
कुल करनी के कारनै, हंसा गया बिगोय
तब कुल काको लाजि, चारि पांव का होय
"अपने परिवार की मर्यादा के लिये आदमी ने अपने आपको बिगाड़ लिया वरना वह तो हंस था। उस कुल की मर्यादा का तब क्या होगा जब परमार्थ और सत्संग के बिना जब भविष्य में उसे पशु बनना पड़ेगा।"
दरअसल समाज के खुश करने के लिये दिखावा करने के लिये कार्यक्रम करने पर पैसा खर्च होता है जिसके संचय करने की भावना मनुष्य को पथभ्रष्ट कर देती है। फिर जिसके पास पैसा आ गया वह अपने वैभव का प्रदर्शन करने के लिये अपने कार्यक्रमों पर ढेर सारा खर्च करते हैं। उनको लगता है कि लोग ऐसा प्रदर्शन याद रखेंगे जोकि भ्रम ही है। उनकी देखा देखी दूसरे धनपति उनसे अधिक धन खर्च करते हुए उनके कथित एतिहासिक प्रदर्शन पर अपना पानी चढ़ा देते हैं।
कहने का अभिप्राय यह है कि संसार में माया के खेल में आदमी इस तरह उलझा रहता है कि उसे भक्ति और अध्यात्मिक ज्ञान संग्रह का अवसर ही नहीं मिल पाता। सृष्टि में अन्य जीवों से श्रेष्ठ माना जाने वाला मनुष्य पशुओं की तरह अपना तथा परिवार पेट पालने के साथ ही सम्मान को मोह मन में रखते हुए नष्ट कर देता है।
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Thursday, March 17, 2011

दहेज प्रथा सभ्यता को ही नष्ट कर डालेगी-हिन्दू धार्मिक चिंत्तन (dowri system in india is denger for society-hindu religion thought)

भारत में कन्या शिशु की गर्भ में ही भ्रुण हत्या एक भारी चिंता का विषय बनने लगा है। इससे समाज में लिंग संतुलन बिगड़ गया है जिसके भयानक परिणाम सामने आ रहे हैं। सामाजिक विशेषज्ञ बरसों से इस बात की चेतावनी देते आ रहे हैं कि इससे समाज में स्त्रियों के विरुद्ध अपराध बढ़ेगा। अब यह चेतावनी साक्षात प्रकट होने लगी है। ऐसे अनेक प्रकरण सामने आ रहे हैं जिसमें लड़कियों के साथ सामूहिक बलात्कार कर उनकी हत्या कर दी जाती है। स्थिति इतनी बदतर हो गयी है कि बड़ी आयु की महिलायें भी अपने पुत्र या पुत्री की आयु वर्ग के अपराधियों का शिकार होने लगी है। हम अगर कन्या भ्रुण हत्या को अगर एक समस्या समझते हैं तो अपने आपको धोखा देते हैं। दरअसल यह सामाजिक समस्याओं का विस्तार है। इनमें दहेज प्रथा शामिल है। लोग दहेज प्रथा समस्या के दुष्परिणामों के बृहद स्वरूप को नहीं समझते। जहां अमीर आदमी अपनी लड़कियों को ढेर सारा दहेज देते हैं तो गरीब भी कन्या को दान करने के लिये लालायित रहता है। यह लालसा समाज में प्रतिष्ठा अर्जित करने के अहंकार भाव से उपजती है। दहेज के विषय पर हमारे अनेक विद्वान अपनी असहमति देते आये है। दरअसल एक समय अपनी औकात के अनुसार अपनी पुत्री को विवाह के समय भेंट आदि देकर माता पिता घर से विदा करते थे पर अब यह परंपरा पुत्रों के लिये विवाद के समय उनके माता पिता का अधिकार बन गयी है।
इस विषय पर गुरुवाणी में कहा गया है कि
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'होर मनमुख दाज जि रखि दिखलाहि,सु कूड़ि अहंकार कच पाजो'
"लड़की के विवाह में ऐसा दहेज दिया जाना चाहिए जिससे मन का सुख मिले और जो सभी को दिखलाया जा सके। ऐसा दहेज देने से क्या लाभ जिससे अहंकार और आडम्बर ही दिखाई दे।"
अब पुत्र के माता पिता उसकी शादी में खुल्लम खुला सौदेबाजी करते हैं। कथित प्राचीन संस्कारों के नाम पर आधुनिक सुविधा और साधन की मांग करते हैं। नतीजा यह है कि समाज अब अपने बच्चों की शादी करने तक ही लक्ष्य बनाकर सिमट गया है। यही कारण है कि संचय की प्रवृत्ति बढ़ी है और लोग अनाप शनाप ढंग से पैसा बनाकर शादी के अवसर उसका प्रदर्शन करते हैं। देखा जाये तो किसी की शादी स्मरणीय नहीं बन पाती पर उसे इस योग्य बनाने के लिये पूरा समाज जुट जाता है। शादी में दिया गया सामान एक दिन पुराना पड़ जाता है। भोजन में परोसे गये पकवान तो एक घंटे के अंदर ही पेट में कचड़े के रूप में परिवर्तित हो जाते हैं मगर पूरा समाज एक भ्रम को स्मरणीय सत्य बनाने के लिये अपना पूरा जीवन नष्ट कर डालता है। दहेज प्रथा एक ऐसा शाप बन गयी है जिससे भारतीय लोग वरदान की तरह ग्रहण करते हैं। जब पुत्र पैदा होता है तो माता पिता के भी माता पिता प्रसन्न होते हैं और लड़की के जन्म पर पूरा खानदान नाकभौ सिकोड़ लेता है। इसी कारण समाज में कन्या भ्रुण हत्या एक फैशन बन गयी है। अगर दहेज प्रथा समाज ने निजात नहीं पायी तो पूर्णता से संस्कृति नष्ट हो जायेगी। फिर किसी समय हमारी धार्मिक परंपरा तथा सभ्यता इतिहास का विषय होगी।
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Saturday, March 12, 2011

अच्छे लोगों से रिश्ते कायम करें-हिन्दू धार्मिक विचार (achche logon se rishta kayam karen-hindu dharmik vichar)

हम लोग सामाजिक तथा पारिवारिक नये संबंधों का निर्माण करते हुए अन्य व्यक्तियों के आचरण, विचार तथा व्यवहार के तौर तरीकों पर विचार नहीं करते। अब तो यह स्थिति यह हो गयी है कि लोग दादागिरी, गुंडागर्दी तथा बेईमान करने के लिये बदनाम लोगों को अपने साथ रखकर प्रसन्नता अनुभव करते हैं। अक्सर हमारे देश के लोग यह सवाल करते हैं कि देश में भ्रष्टाचार कम क्यों नहीं हो रहा? उत्तर में सरकार को दोष देकर चुप हो जाते हैं। सच बात तो यह है कि हमारे समाज में चेतना की कमी तथा वैचारिक आलस्य के परिणाम से ही देश में अपराध और भ्रष्टाचार बढ़ा है। इसके लिये सभी लोग जिम्मेदार है। सभी लोगों को एक दूसरे के बारे पता है कि कौन क्या करता है? कौन भ्रष्टाचारी है और कौन बेईमान? कौन तस्कर है कौन व्याभिचारी? मगर प्र्रेम, विवाह, सत्संग या नित्य कर्म के आधार पर संपर्क कायम करने वाले लोग यह देखने का प्रयास करते हैं कि किसका निज स्वरूप क्या है? यकीनन नहीं!
इस विषय पर मनु महाराज कहते हैं कि
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उत्तमैरुत्तमैर्नित्यं संबंधनाचरेत्सह।
निनीषुः कुलमुत्कर्षमधमानधर्मास्त्यजेत्।
"अपने परिवार की रक्षा तथा सम्मान में वृद्धि के लिये अच्छे परिवारों के साथ अपनी कन्या और पुत्र के संबंध बनाने चाहिए। खराब आचरण तथा धर्म विरोधी पुरुषों के परिवारों के साथ किसी प्रकार का संबंध स्थापित करना ठीक नहीं है।"
उत्तमानुत्तमान्गच्छन्हीनाश्च वर्जवन्।
ब्राम्हण श्रेष्ठतामेति प्रत्यावयेन शूद्रताम्।।
"श्रेष्ठ पुरुषों से संबंध जोड़ने और नीच तथा अधम पुरुषों से परे रहने वाले विद्वान की प्रतिष्ठा बढ़ जाती है। इसके विपरीत श्रेष्ठ लोगों की बजाय नीच पुरुषों से संबंध बनाने वाला मनुष्य और उसका कुल कलंकित हो जाता है।"
जब हम देश में नैतिक आचरण में आई गिरावट तथा संवेदनहीनता की बात करते हैं तो समाज या सरकार को कोसना सबसे आसान लगता है पर अगर हम अपना निज आचरण तथा वैचारिक दृढ़ता का अवलोकन करें तो यह साफ दिखाई देगा कि कहीं न कहीं हमारा स्वार्थपूर्ण जीवन तथा समाज के प्रति दायित्व बोध हीनता ही इसके लिये जिम्मेदार है। अगर हमने निजी रिश्ते बनाने में केवल किसी आदमी का धनपति, बाहूबली तथा उच्च पदस्था होन ही मान लिया है तब यह भी मान लेना चाहिए कि समाज में सम्मान पाने का मोह दूसरे लोगों को येनकेन प्रकरेण सफलता पाना रह जाना बुरा नहीं है। श्रेष्ठ और त्यागी पुरुषों के प्रति लोगों का उपेक्षा का भाव रहना इस बात के लिये सभी को प्रेरित करता है कि अधिक से अधिक उपलब्धि पाकर समाज में सम्मान प्राप्त किया जाये। ऐसे में देश में व्याप्त व्यवस्था में परिवर्तन की अपेक्षा तभी संभव है जब हम अपने विचारों में परिवर्तन किया जाये।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
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Sunday, March 6, 2011

कबीर के दोहे-साधुओं के निंदक की कभी मुक्ति नही होती (Kabir ke dohe-sadhu ke nindak ki mukti nahin)

          जिस तरह समाज में सभी तरह के लोग हैं उसी तरह साधु और संतों के बीच भी हैं। कुछ लोग तो साधु और संत का चोला इसलिये पहनते हैं जिससे उनको धन, सम्मान तथा शिष्यों की प्राप्ति होती रहे। एक तरह से धर्म उनका व्यापार हो जाता है। आजकल तो ऐसी खबरें भी आती हैं कि अमुक साधु संत दैहिक यौनाचार या अपराध करते हुए पकड़ा गया। हमारे समाज में अध्यात्मिक की जड़ें गहरी हैं जिसकी वजह से ऐसे लोग जिनको काम नहीं आता या वह करना नहीं चाहते वही साधु का वेश पहनते हैं। गेहुंआ या सफेद रंग का चोगा पहने अनेक साधुओं ने समाज को धोखा दिया है कई तो यौनाचार और बच्चों के अपहरण जैसे अपराध में लिप्त पाये गये हैं। इसका आशय यह कतई नहीं है कि सारे साधु या संत ऐसे हैं। कुछ लोग ऐसे भी संतों की आलोचना करते हैं जो शिष्यों का समुदाय बनाकर प्रवचन देते हैं। अनेक बुद्धिजीवियों को तो संतों पर कटाक्ष करने में मजा आता है। हमारा अध्यात्मिक दर्शन संतों या साधुओं को मानने या न मानने की पूरी छूट देता है मगर उनकी निंदा करने वालों को बुरी तरह फटकारता भी है।
          इस विषय पर कबीर कहते हैं कि
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        जो कोय निन्दै साधु को, संकट आवै सोय।
          नरक जाय जनमै भरे, मुक्ति कबहु नहिं होय।।
      ‘जो आदमी साधु और संतों की निंदा करता है वह अतिशीघ्र नष्ट हो जाता हे। वह नरक में जाता है और फिर उसे नारकीय यौनि में जन्म लेना पड़ता है। उसकी कभी मुक्ति नहीं होती।’’
            दरअसल हमारी वर्तमान शिक्षा पद्धति ऐसी है जिसमें नकारात्मक सोच का निर्माण होता है। दूसरे की निंदा या आलोचना करने वाले इस तरह प्रदर्शन करते हैं जैसे कि वह श्रेष्ठ हैं। हर कोई दूसरे के दोष गिनाकर यह प्रमाणित करता है कि वह उसमें नहीं है। अपने अंदर जो गुण है उसकी जानकारी कोई नहीं देता। फिर निंदा और आलोचना में अभ्यस्त लोगों के पास इतना समय भी कहां रहता है कि वह आत्ममंथन कर अपने गुणों की तलाश करें। ऐसे लोग न स्वयं सुखी रहते हैं न दूसरे को देख पाते हैं। अतः जिन लोगों को अपने अंदर सकारात्मक भाव बनाये रखना है वह किसी दूसरे की निंदा या आलोचना न करें, खासतौर से साधु और संतों की तो बिल्कुल नहीं। अगर कोई साधु ठीक नहीं लगता तो उसके पास न जायें। उसको अपना गुरु न माने पर सार्वजनिक रूप उसे उसकी निंदा न करे। वैसे भी हमारा भारतीय अध्यात्म दर्शन निरंकार की निष्काम भक्ति का संदेश देता है। परनिंदा से बचने पर मन में सकारात्मक विचार पैदा होते हैं उससे जीवन में स्वमेव प्रसन्नता आती है।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Friday, March 4, 2011

अहंकार का भाव आदमी को मूर्ख बना देता है-हिन्दी लेख (ahankar aadmi ko moorkh banata hai-hindi lekh)

अहंकार का मनुष्य को मूर्खता के मार्ग पर ले जाता है। खासतौर से जब किसी आदमी को यह आभास होने लगता है कि उसके पास संसार का पूरा ज्ञान आ गया है तो वह विक्षिप्तता की स्थिति में आ जाता है। उससे भी बड़ी मूर्खता तब होती है जब कोई आदमी अल्पज्ञानी को अपना गुरु बना लेता है। अनेक बाद ऐसे लोगों को भी गुरु मान लिया जाता है क्योंकि वह ज्ञान का रटा लगाकर उपदेशक की भूमिका में आ जाते हैं। सच बात तो यह है कि ज्ञान का रटा लगाकर बने उपदेशक मूर्ख नहीं होते बल्कि अपने शिष्यों और श्रोताओं को बनाते हैं। ज्ञान के व्यापारियों के लिये भारतीय अध्यात्म का संदेश वैसा ही जैसे किताबें बेचने वालों के लिये किताबें। वह किताबें बेचते हैं पर उसका ज्ञान अपने पास नहीं रखते। जब लोग इन ज्ञान के व्यापारियों की संगत करते हैं तो उनको लगता है कि वह स्वयं भी ज्ञानी हो रहे हैं। उसके बाद वह उनके प्रचारक के रूप में दूसरों को भी शिष्य बनने के लिये उकसाते हैं जैसे कि स्वयं बहुत बड़े ज्ञानी हो रहे हैं।
इस विषय पर भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि
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यदा किंचिज्ज्ञोऽहं द्विप इव मदान्धः समभवम्
तदा सर्वज्ञोऽस्मीत्यभवदवलिपतं मम मनः।
यदा किञ्चित्किाञ्चिद् बुधजनसकाशादवगतम्
तदा मूर्खोऽस्मीति जवन इव मदो में व्यपगतः।।
"जब मुझे कुछ ज्ञान हुआ तो मैं हाथी की तरह मदांध होकर उस पर गर्व करने लगा और अपने को विद्वान समझने लगा पर जब विद्वानों की संगत में बैठा और यथार्थ का ज्ञान हुआ तो वह अहंकार ज्वर की तरह उतर गया तब अनुभव हुआ कि मेरे समान तो कोई मूर्ख ही नहीं है।"
मनुष्य का मन कभी संसार के कार्यों से उकता जाता है तब वह अध्यात्मिक शांति चाहता है। ऐसे में वह ज्ञानी लोगों की संगत ढूंढता है। सत्संग का व्यापार करने वाले लोग उसे सकाम और साकार भक्ति का संदेश देते हुए उसे गुरु पूजा और सेवा के लिये प्रेरित करते हैं ताकि उनकी स्वयं की सेवा हो जाये। ऐसे लोगों के इर्दगिर्द घूमता आदमी कभी ज्ञानी नहीं बन पाता। यह अलग बात है कि उसे लगता है कि वह अच्छा कर रहा है। ऐसे में जब उसकी संगत कहीं ज्ञानियों के बीच होती है तो पता लगता है कि वह अभी उस ज्ञान से दूर है जिसे भारतीय अध्यात्म भरा हुआ है। योग साधना, ध्यान तथा मंत्रजाप के साथ ही सत्संग से प्राप्त ज्ञान से ही यह जाना जा सकता है कि वास्तव में तत्वज्ञान क्या है? दूसरी बात यह है कि इस संसार में सर्वज्ञानी कोई नहंी बन सकता। इसलिये ज्ञानी लोगों की भूख कभी नहीं मिटती। वह निरंतर ज्ञान संग्रह में लगे रहते हैं और दूसरों के सामने व्यर्थ बघार कर न व्यापार करते हैं और न ही उनके अंदर इस बात का अहंकार आता है कि वह ज्ञानी हैं।
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Thursday, March 3, 2011

धन और विद्वता का अहंकार रखने वालों से दूरी भली-हिन्दी धार्मिक चिंत्तन (ghamand rakhane valon se door raheh-hindi dharmik lekh)

जैसे जैसे विश्व में विकास हो रहा है वैसे वैसे ही लोगों के पास शारीरिक सुख के भौतिक साधनों एकत्रित होते जा रहे हैं। लोगों के लिये विलासिता ही सुख का पर्याय बन गयी है। शारीरिक श्रम के अभाव में अनेक तरह की बीमारियां जन्म लेती हैं। रुग्णता से ही मानसिक विकृति पनपती है।
विश्व के अनेक स्वास्थ्य संगठन तथा विशेषज्ञ इस बात की ओर संकेत कर चुके हैं कि अनेक देशों में चालीस प्रतिशत से अधिक लोग मनोरोगों से ग्रसित हैं पर वह न स्वयं न जानते हैं न दूसरों को ही आभास होता है। हम लोग यह समझते हैं कि मनोरोग होने का मतलब पागलपन से है। दरअसल हम विक्षिप्ता की चरम स्थित जिसे पागलपन कहा जाता है मनोरोग मान लेते हैं। वैसे मनोरोग की चरमस्थिति विक्षिप्पता ही है पर इसके अलावा भी ऐसी स्थितियां हैं जब कोई आदमी विक्षिप्त न हो पर मानसिक रूप से उसका मस्तिष्क तनाव से ग्रस्त होता है पर सामान्य दैहिक व्यवहार के चलते न उसे आभास होता है न दूसरे ही इस बात को समझते हैं। वह भी मनोरोग का शिकार हैं भले ही उनके सामान्य दैहिक क्रियाओं से यह लगता न हो। खासतौर से वर्तमान काल में जो लोग शारीरिक श्रम से बच रहे हैं उनका व्यवहार तो अनेक बार बेतुका हो जाता है और बातचीत में इसका आभास वही लोग कर सकते हैं जो परिश्रम करते हुए अपना मानसिक स्तर सामान्य बनाये हुए हैं।
इस विषय पर भर्तृहरि महाराज कहते हैं
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पुण्यैर्मूलफलैस्तथा प्रणयिनीं वृत्तिं कुरुष्वाधुना
भूश्ययां नवपल्लवैरकृपणैरुत्तिष्ठ यावो वनम्।
क्षधद्राणामविवेकमूढ़मनसां यन्नश्वाराणां सदा
वित्तव्याधिविकार विह्व्लगिरां नामापि न श्रूयते।।
"भर्तृहरि महाराज अपने प्रजाजनों से कहते हैं कि अब तुम लोग पवित्र फल फूलों खाकर जीवन यापन करो। सजे हुए बिस्तर छोड़कर प्रकृति की बनाई शय्या यानि धरती पर ही शयन करो। वृक्ष की छाल को ही वस्त्र बना लो लो। अब यहां से चले चलो क्योंकि वहां उन मूर्ख और संकीर्ण मानसिकता वाले लोगों का नाम भी सुनाई नहीं देगा जो अपनी वाणी और संपत्ति से रोगी होने के कारण अपने वश में नहीं है।"
जहां अमीरों और सम्मानित लोगों की महफिल होती है वहां उपस्थित होने वाले सभी एक तरह के होते हैं। इसलिये उन्हें आभास नहीं हो सकता कि कौन मनोरोगी हैं और कौन नहीं। कोई छोटा आदमी वहां मौजूद हो तो वह सोचता है कि यह तो बड़े लोग हैं पर जो ज्ञानी और मानसिक रूप से स्वस्थ हैं वह जानते हैं कि ‘गुण ही गुणों को बरतते हैं’। मतलब यह कि देह जैसे कर्म में लिप्त है वैसे ही मन की स्थिति हो जाती है। देह अगर अधिक परिश्रम करने वाली नहीं है तो बुद्धि भी अधिक चिंतन नहीं कर सकती। आदमी भले ही अपने वाहनों से लंबी लंबी यात्रायें करता हो पर उसका मन, बुद्धि और अहंकार उसे संकीर्ण दायरों में कैद कर देता है। ऐसे लोग न स्वयं कष्ट भोगते हैं बल्कि दूसरे को भी अपनी वाणी और व्यवहार से कष्ट देते हैं। ऐसे लोगों की पहचान कर उनसे दूर रहना ही बेहतर है।
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Saturday, February 26, 2011

बुरी कमाई को छोड़ देना चाहिए-हिन्दी धार्मिक संदेश (buri kamai n karen-hindi dharmik sandesh)

हर मनुष्य में स्वाभाविक रूप से यह ज्ञान रहता है कि कौनसा धन धर्म की कमाई है और कौनसा पाप की! दूसरा कोई आदमी यह नही बता सकता है आप पाप की कमाई कर रहे हो या नहीं उसी तरह किसी दूसरे को कहना भी नहीं चाहिये कि उसकी कमाई पाप की है। धन या माया तो सभी के पास आती है पर अपने परिश्रम, ज्ञान तथा कार्य के अभ्यास से कमाने वाले लोग वास्तव में धर्म का निर्वाह करते हैं जबकि झूठ, बेईमानी तथा अनाधिकारिक प्रयासों से धन कमाने वाले पाप की खाते हैं।
कहा जाता है कि जैसा आदमी खाये अन्न वैसा ही होता है उसक मन। अगर हम इसका शब्दिक अर्थ लेें तो इसका आशय यह है कि हम भोजन में मांस और मदिरा का सेवन करेंगे तो धीरे धीरे हमारी प्रकृति तामसी हो जायेगी। इसका लाक्षणिक अर्थ लें तो हमारी सेवा और व्यवसाय के प्रकार से है। जो लोग ऐसी जगहों पर काम करते हैं जहां का वातावरण अत्यंत दुर्गंधपूर्ण तथा गंदगी से भरा है तो चाहे वहा भले ही एक नंबर की कमाई करें पर उनकी देह में भरे विकार उनके अंदर सात्विक प्रवृत्तियां नहीं आने देतें। अपने कर्मस्थल से मिली पीड़ा उनका पीछा नहीं छोड़ती। इसका अगर व्यंजना विधा में अर्थ देखें तो यह स्पष्ट है कि जो धन दूसरे के शोषण, भ्रष्टाचार या अपराध से प्राप्त करते हैं वह चाहे अच्छी जगह पर रहे और शाकाहारी भोजन भी करें तब भी आसुरी प्रवृत्ति के हो जाते हैं।
इस विषय पर कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है
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दुष्यस्यादूषणार्थंचच परित्यागो महीयसः।
अर्थस्य नीतितत्वज्ञरर्थदूषणमुच्यते।।
"दुष्य तथा दूषित अर्थ का अवश्य त्याग करना चाहिये। नीती विशारदों ने अर्थ की हानि को ही अर्थदूषण बताया है।"
अतः हमें इस अपने जीवन में सतत आत्ममंथन करना चाहिए। जिंदगी तो सभी जीते हैं पर कुछ लोग ऐसे हैं जो अपने पास कुछ न होते ही हुए भी प्रसन्न रहते हैं और कुछ सब कुछ होते हुए भी दुःखी रहते हैं। जीवन जीने की कला सभी को नहीं आती इसके लिये जरूरी है कि ध्यान, चिंतन और मनन करते हुए अपनी आय के साधन तथा कार्यस्थलों में पवित्रता लाने का प्रयास करें।
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Sunday, February 20, 2011

लोगों को अपमानित करने वालों का पतन शीघ्र होता है-हिन्दू धार्मिक चिंत्तन (logon ka apaman na karen-hindu dharmik chittan)

कुछ लोग ऐसे होते हैं कि दूसरों के दोषों का बयान करके खुश होते हैं। कुछ ऐसे भी होते हैं जो दूसरों का अपमान करके प्रसन्नता की अनुभूति करते हैं। ऐसे अज्ञानियों का समर्थन करना या उनसे व्यवहार रखना अपने लिये संकट को दावत देना है। आज समाज में तो स्थिति यह है कि लोग दूसरे का अपमान कर यह दिखाते हैं कि वह कितने शक्तिशाली हैं। उसी तरह निर्धन, मज़दूर तथा असहाय आदमी की मजाक उड़ाकर कुछ लोग अपनी शक्ति की पहचान कराते हैं। वह यही नहीं जानते कि गरीब की हाय कितनी ताकतवर होती है।
इस विषय पर मनु महाराज अपनी स्मृति में कहते हैं कि
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सुखं द्वावमतः शेते सुखं च प्रतिबुध्यते।
सुखं चरति लोकेऽस्मिनन्मन्ता विनश्तिं।
"अन्य व्यक्तियों द्वारा अपमान किये जाने पर उनको माफ करने वाला मनुष्य सुखी की नींद लेनें के साथ संसार में सहजता से विचरता है परंतु दूसरों का अपमान करने वाला मनुष्य स्वयं ही नष्ट होता है।"
सच तो यह है कि कुछ लोग अक्षम होने के साथ ही अहंकारी भी होते हैं। उनको पद, प्रतिष्ठा और पैसा विरासत में मिल जाता है। ऐसे लोग गरीब और मज़दूर का दर्द नहीं समझते। उन्होंने कभी परिश्रम किया नहीं होता इसलिये परिश्रमी लोगों को हेय समझकर उनका अपमान करते हैं। अंततः कहीं न कहीं वह अपने आपको ही मानसिक और शारीरिक रूप से कमजोर करते हैं और फिर समय आने से पहले ही तकलीफ भी झेलते हैं। इस तरह के पाप और उसके दंड से बचने का केवल यही उपाय है कि दूसरों के साथ मधुर व्यवहार करें। अपनी वाणी से दूसरों को प्रसन्न रखते अपने लिये दुआओं का भंडार जुटाते रहें। दूसरों को अपमानित कर या कटुवाणी बोलकर अपने लिये पाप ही जुटाया जा सकता है पर मीठी वाणी बोलकर सारे संसार का दिल जीतने के साथ ही अपने आपको हमेशा प्रसन्न रखने का लाभ प्राप्त होता है।
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Saturday, February 19, 2011

विष फैलाने वालों को अमृत सृजक न बतायें-हिन्दू धार्मिक विचार (vish aur amrit-hindu dharmik vichar)

उच्च पदस्थ, धनवानों तथा बलिष्ठ लोगों को समाज में सम्मान से देखा जाता है और इसलिये उनसे मित्रता करने की होड़ लगी रहती है। जब समाज में सब कुछ सहज ढंग से चलता था तो जीवन के उतार चढ़ाव के साथ लोगों का स्तर ऊपर और नीचे होता था फिर भी अपने व्यवहार से लोगों का दिल जीतने वाले लोग अपने भौतिक पतन के बावजूद सम्मान पाते थे। बढ़ती आबादी के साथ राज्य करने के तौर तरीके बदले। समाज में राज्य का हस्तक्षेप इतना बढ़ा गया कि अर्थ, राजनीति तथा सांस्कृतिक क्षेत्र में राजनीति का दबाव काम करने लगा है। इससे समाज में लोकप्रियता दिलाने वाले क्षेत्रों में राज्य के माध्यम से सफलता पाने के संक्षिप्त मार्ग चुनने की प्रक्रिया लोग अपनाने लगे। स्थिति यह हो गयी है कि योग्यता न होने के बावजूद केवल जुगाड़ के दम पर समाज में लोकप्रियता प्राप्त कर लेते हैं। दुष्ट लोग जनकल्याण का कार्य करने लगे है। हालत यह हो गयी है कि दुष्टता और सज्जनता के बीच पतला अंतर रह गया है जिसे समझना कठिन है। व्यक्तिगत जीवन में झांकना निजी स्वतंत्रा में हस्तक्षेप माना जाता है पर सच यही है कि जिनका आचरण भ्रष्ट है वही आजकल उत्कृष्ट स्थानों पर विराजमान हो गये है। उनसे समाज का भला हो सकने की आशा करना स्वयं को ही धोखा देना है।
इस विषय में भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि
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आरंभगुर्वी क्षयिणी क्रमेण लघ्वी पुरा वृद्धिमति च पश्चात्।
दिनस्य पूर्वाद्र्धपराद्र्ध-भिन्ना छायेव मैत्री खलसज्जनानाम्।।
"जिस तरह दिन की शुरूआत में छाया बढ़ती हुई जाती है और फिर उत्तरार्द्ध में धीरे-धीरे कम होती जाती है। ठीक उसी तरह सज्जन और दुष्ट की मित्रता होती है।"
दुर्जनः परिहर्तवयो विद्ययाऽलङ्कृतोऽपि सन्।
मणिनाः भूषितः सर्पः किमसौ न भयंकर।।
"इसका आशय यह है कि कोई दुर्जन व्यक्ति विद्वान भी हो तो उसका साथ छोड़ देना चाहिए। विषधर में मणि होती है पर इससे उससे उसका भयंकर रूप प्रिय नहीं हो जाता।"
कभी कभी तो ऐसा लगता है कि विद्वता के शिखर पर भी वही लोग विराजमान हो गये हैें जो इधर उधर के विचार पढ़कर अपनी जुबां से सभाओं में सुनाते हैं। कुछ तो विदेशी किताबों के अनुवाद कर अपने विचार इस तरह व्यक्त करते हैं जैसे कि उनका अनुवादक होना ही उनकी विद्वता का प्रमाण है। उनके चाटुकार वाह वाह करते हैं। परिणाम यह हुआ है कि अब लोग कहने लगे हैं कि शैक्षणिक, साहित्यक तथा धार्मिक क्षेत्रों में अब नया चिंतन तो हो नहीं रहा उल्टे लोग अध्ययन और मनन की प्रक्रिया से ही परे हो रहे हैं। जैसे गुरु होंगे वैसे ही तो उनके शिष्य होंगे। शिक्षा देने वालों के पास अपना चिंतन नहीं है और जो उनकी संगत करते हैं उनको भी रटने की आदत हो जाती है। ज्ञान की बात सभी करते हैं पर व्यवहार में लाना तो विरलों के लिऐ ही संभव हो गया है।
अब तो यह हालत हो गयी है की अनेक लोगों को मिलने वाले पुरस्कारों पर ही लोग हंसते हैं। जिनको समाज के लिये अमृतमय बताया जाता है उनके व्यवसाय ही विष बेचना है। सम्मानित होने से वह कोई अमृत सृजक नहीं बन जाते। इससे हमारे समाज की विश्व में स्थिति तो खराब होती है युवाओं में गलत संदेश जाता है। फिल्मों में ऐसे गीतों को नंबर बताकर उनको इनाम दिये जाते हैं जिनका घर में गाना ही अपराध जैसा लगता है। फिल्म और टीवी में माध्यम से समाज में विष अमृत कर बेचा जा रहा है। ऐसे में भारतीय अध्यात्म दर्शन से ही यह आशा रह जाती है क्योंकि वह समाज में ज्ञान का प्रकाश फैलाये रहता है।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Wednesday, February 16, 2011

अपने मुंह मियां मिट्ठु न बने-हिन्दी चिंत्तन आलेख (apni tarif khud na karen-hindi chittan aalekh)

सम्मान पाने की चाह हर मनुष्य में होती है पर परोपकार करने का भाव तो विरले ही लोगों के होता है। सच तो यह है कि हृदय से ईश्वर भक्ति करने वाले ही परोपकार का काम करते हैं पर मान पाने का विचार तक नहीं करते। इसके विपरीत अपने स्वार्थ पूर्ति में ही जीवन गुज़ारने वाले कुछ लोग अपने मुंह से ही अपनी प्रशंसा करते हैं। अपनी व्यक्तिगत उपलब्धियों का बिना पूछे ही गुणगान करने लगते हैं भले ही उससे कोई दूसरा प्रभावित नहीं होता। एक बात निश्चित है कि अपनी प्रशंसा स्वयं तो कदापि नहीं करना चाहिए और कोई अन्य व्यक्ति करता है तो समझ लीजिए उसने ऐसा कोई काम नहीं किया जिसकी सराहना दूसरे लोग करें।
नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि
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पर-प्रोक्तगुणो वस्तु निर्गृणऽपि गुणी भवेत्।
इन्द्रोऽ लघुतां याति स्वयं प्रख्यापितैर्गृणैः।।
"चाहे कोई मनुष्य कम ज्ञानी हो पर अगर दूसरे उसके गुणों की प्रशंसा करते हैं तो वह गुणवान माना जायेगा किन्तु जो पूर्ण ज्ञानी है और स्वयं अपना गुणगान करता है तो भी वह प्रशंसनीय नहीं माना जा सकता चाहे भले ही स्वयं देवराज इंद्र हो।"
अपने मुंह से अपनी प्रशंसा करने की बजाय बेहतर यह है कि हम स्वयं भी कोई अच्छा काम करें। जिंदगी के फुरसत के क्षणों अध्यात्मिक ज्ञान संग्रह तथा परमार्थ में लगायें। अपनी स्वार्थपूर्ति के लिये जीवन गुजारना सहज तो है पर कहीं न कहीं  आत्मिक शांति का अभाव सभी को खलता है। वह तभी संभव है जब परमार्थ करने के साथ ही ईश्वर की भक्ति की जाये।
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Saturday, February 12, 2011

आयु के छोटे शिक्षक का भी सम्मान करना चाहिए-हिन्दू धार्मिक लेख (age,teachar and computer education-hindu dharmik article)

मनुष्य को विनम्रता का भाव हमेशा अपना चाहिए पर इसका मतलब यह नहीं है कि अक्षम, नकारा, भ्रष्ट तथा अहंकारी लोगों की संगत में जाने की सामाजिक शर्त का पालन भी करें। अंततः संगत का प्रभाव पड़ता है। जैसे लोगों के बीच बैठेंगे उनकी वाणी तथा सक्रियता के प्रभाव से बचना संभव नहीं है चाहे कितना कोई आम इंसान ज्ञानी क्यों न हो।
पैसा, पद तथा प्रतिष्ठा अर्जित करने वाले अनेक लोग मदांध हो जाते हैं और अपने साथ अभिवादन करने की प्रक्रिया को वह अपनी चाटुकारिता समझकर इठलाते हैं। वह अभिवादन का उत्तर देते नहीं है और देते हैं तो उनका अहंकार भाव प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होता है। ऐसे लोग सम्मान के योग्य नहीं होते। उनकी तरफ से मुंह फेरना ही एक श्रेष्ठ उपाय है।
इस विषय में मनुमहाराज मनुस्मृति में कहते हैं-
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यो न वेत्यभिवादस्य विप्रः प्रत्यभिवादनम्।
नाभिवाद्य स विदुषा यथा शूर्दस्तथैव सः।।
"जो अभिवादन का उत्तर देना नहीं जानता उसे प्रणाम नहीं करना क्योंकि वह इस सम्मान के अयोग्य होता है।"
अवाच्यो तु या स्त्री स्वादसम्बद्धा य योनितः।
भोभवत्पूर्वकं त्वनेमभिभाषेत धर्मवित्।।
"धर्म का ज्ञान रखने वाले को चाहिए कि वह दूसरे ज्ञानी को कभी भी नाम से संबोधित न करे भले ही वह उससे छोटी आयु का क्यों न हो। उसको हमेशा सम्मान से संबोधित करना चाहिए।"
उसी तरह अगर कोई ज्ञानी है और आयु में छोटा हो भी उसका सम्मान किया जाना चाहिये। इसका उदाहरण आज के कंप्यूटर युग में लिया जा सकता है। जब कंप्यूटर का उपयोग आम लोगों ने शुरु किया तो उसे सीखने के लिये अपने से छोटी आयु के लड़कों से सीखना प्रारंभ करना पड़ा। वह एक छात्र के रूप में अपने शिक्षक को सम्मानीय संबोधन देने लगे। यह हमारी महान सांस्कृतिक परंपराओं का ही प्रमाण है। फिर कंप्यूटर की शिक्षा ऐसी है कि संभव है कुछ बच्चे पहले शिक्षा या अधिक अभ्यास से अपने से बड़े बच्चों से पहले दक्ष हो जाते हैं। इतना ही नहीं वह शिक्षक भी बन अपने दायित्व निभाते हैं। ऐसे में उनको सर या श्रीमान् का संबोधन देने से अपने अंदर कभी कुंठा अनुभव नहीं करना चाहिए।
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Sunday, February 6, 2011

वैचारिक योग की स्थिति-हिन्दी धार्मिक लेख (vaicharik yog ki sthati-hindi dharmik lekh)

वैचारिक योग की भी एक स्थिति है।  जब हमें लगे कि क्रोध का हमला हम पर हो गया है तब शांति की कल्पना करें, जब किसी वस्तु के प्रति लालच का भाव आ गया है तब त्याग का विचार करें।  इससे हमें अपने अंतर्मन में चल विचार की प्रतिपक्ष में स्थिति क्या है, यह समझ मे आयेगा।  हम सामने खड़े होकर अपने व्यक्त्तिव को निहारें तब पता लगेगा कि हम दूसरों को कैसे दिख रहे हैं। 
आधुनिक सभ्यता के विशेषज्ञ अक्सर सकारात्मक भाव को जीवन की सफलता का मूल मंत्र बताते हैं। अनेक अनुभवी लोग भी सभी को सकारात्मक विचाराधारा रखने की सलाह देते हैं पर यह भाव आये कैसे इसे कोई नहीं बता सकता क्योंकि इसके लिये मनुष्य मन के रहस्य को समझना जरूरी है जिसे कोई विरले ही समझ पाते हैं। पतंजलि योग सूत्र को विज्ञान इसलिये भी कहा जाता है क्योंकि वह मनुष्य की देह, मन तथा विचारों में शुद्धता लाने का मार्ग भी बताता है।
इस विषय में पतंजलि योगा साहित्य में कहा गया है कि 
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वितर्का हिंसादयः कृतकारितानुमोदिता लोभक्रोधमोहपूर्वका मृदुमध्याधिमात्रा।
दुःखज्ञानान्तफला इतिप्रतिक्षभावनम्।।
"हिंसा आदि का भाव वितर्क कहलाते हैं जिन पर आधारित बुरे कर्म स्वयं या दूसरों से करवाये जाते हैं या उनका अनुमोदन किया जाता है। यह वितर्क वाला भाव लोभ, क्रोध और मोह के कारण पैदा होता है। यह भाव दुःख और अज्ञान के रूप में फल प्रदान करते हैं अतः उनके लिये प्रतिपक्षी विचार करना चाहिए।"
वितर्कबाधने प्रतिपक्षभावनाम्।
"जब वितर्क और यम नियम में बाधा पहुंचाये तब उनके प्रतिपक्षी विचारों का ध्यान करना चाहिए।"
मनुष्य का मन चंचल और बुद्धि में कुटिलता का भाव स्वाभाविक रूप से रहता है। इसलिये ही अज्ञानी मनुष्य व्यसनों की तरफ आकर्षित होता है जो कि उसके लिये देह के लिये हानिकारक हैं और वह जरा जरा बात पर क्रोध का शिकार होता है जो कि उसके लिये मानसिक तनाव का कारण बनता है। इन पर नियंत्रण करने के लिये राय देना आसान है पर इसका मार्ग जाने बिना कोई भी आत्मनियंत्रण नहीं कर सकता। इसके लिये अभ्यास की आवश्यकता है। इस अभ्यास का तरीका यह है कि जब हमारे अंदर आवेश, निराशा या अस्थिरिता का भाव आता है तब हमें अपने समक्ष उपस्थित प्रसंग पर विपरीत दृष्टिकोण पर भी विचार करना चाहिए। जब किसी की बात पर गुस्सा आता है तब हमें यह भी देखना चाहिए कि कहीं सामने वाले की बात सही तो नहीं है, अगर वह गलत है तो यह भी जानने का प्रयास करना चाहिए कि वह किसी अन्य की प्रेरणा से तो यह नहीं कह रहा। इसके बाद उस बात को अनसुना करने का प्रयास भी करना अच्छा रहता है। उसी समय यह भी विचार करना चाहिये कि आखिर क्रोध करने के परिणाम क्या होंगे। उसके बाद इस बात पर भी चिंतन करना चाहिये कि इस जीवन में प्रसन्नता लाने के लिये अन्य विषय भी हैं जिससे ध्यान अच्छी बात की तरफ चला जाये। कोई गाली दे तब अपने अंदर ओम शब्द का ध्यान करें और जब कोई लड़ने आये तो विनम्रता और मौन का मार्ग अपनायें जिससे तत्काल न केवल तनाव समाप्त होता है बल्कि एक प्रकार से अलौकिक प्रसन्नता भी प्राप्त होती है।

हमारे जीवन में अनेक लोग संपर्क में आते हैं। कई लोग दुःख देते हैं तो कोई प्रसन्नता देते हैं। जो दुःख का हेतु हैं उनका स्मरण होने पर अपना ध्यान प्रसन्न करने वाले लोगों की तरफ लाना चाहिये। इसके कष्ट आने पर आनंद के गुजरे पलों का स्मरण कर अपने अंदर यह दृढ़ भाव स्थापित हो जाता है कि समय की बलिहारी है वह अच्छा समय नहीं रहा तो यह बुरा भी नहीं रहेगा। इसी तरह अभ्यास करने से ही सकारात्मक भाव पैदा किया जा सकता है।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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