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Sunday, May 7, 2017

देश में सार्वजनिक विमर्श के लिये वातावरण का शुद्ध होना जरूरी-हिन्दी लेख (Neccesary Envirment for Public Discussion-HindiArticle)

                                हम यह तो नहीं कहेंगे कि देश में असहिष्णुता की वजह से अभिव्यक्ति का संकट है पर इतना जरूर मानते हैं कि अन्मयस्कता की वजह से सार्वजनिक विमर्श बाधित जरूरी हुआ है। पहले प्रगतिशील और जनवादी बुद्धिजीवी हाशिये पर आये तो अब राष्ट्रवादी भी अपने आपको ठगा हुआ अनुभव करते हैं। इसका कारण यह है कि इन विचाराधारा के बुद्धिजीवियों ने अपने दृष्टिकोण से राजनीति क्षेत्र में सक्रिय समाजवादी, वामपंथी और हिन्दूवादी दलों के आसरे अपनी वैचारिक यात्रा की। प्रगतिशील और जनवादी तो राज्यप्रबंध में इस तरह घुसे हैं कि आज भी उनको सम्मान मिल जाता है पर राष्ट्रवादियों को जैसे भुला ही दिया गया है। हम अगर मूल भारतीय साहित्य लेखन की बात करें तो वह अब असंगठित क्षेत्र के लेखकों की जिम्मेदारी बन गया है। वैसे हमारा प्राचीन साहित्य और हिन्दी का  भक्तिकाल हमारे साहित्य की ऐसी धरोहर है जिसके सहारे हम सदियों तक असंगठित साहित्य के चल सकते हैं। अलबत्ता आपसी विचार विमर्श का जो वातवरण प्रगतिशील व जनवादियों ने जो बनाया था वह प्रदूषित हो गया है। हम दोनों से सहमत नहीं होते पर यह सच हम मानते हैं कि इनकी रचनाओं से हमें अपने अंदर एक अध्यात्मिक लेखक ढूंढने में सहायता मिलती है। हम अध्यात्मिक वादी लेखक हैं इसलिये राष्ट्रवादी विचाराधारा से थोड़ा लगाव है-हालांकि समाज पर राज्य प्रबंध से पूर्ण नियंत्रण की उनकी शैली हमें पसंद नहीं है। हमारा मानना है कि भारतीय समाज एक वैज्ञानिक आधार पर चलता रहा है जिस पर राज्य का अधिक दबाव ठीक नहीं है।  इधर राष्ट्रवादी लेखकों में भी निराशा का माहौल दिख रहा है। 
प्रगतिशील और जनवादी अनुभवी हैं और उन्हें पता है कि वह जनमानस को विमर्श के माध्यम से व्यस्त रखते हैं और राज्प प्रबंध को अपनी नाकामी के प्रचार से बचने के लिये यह अच्छा लगता है। वह सहविचारक राज्य प्रबंध के अनुयायी होते हैं पर जानते हैं कि वह उनके विचार के सहारे नहीं चलता पर जनमानस को व्यस्त रखने के लिये उन्हें जो मिलता है वही पर्याप्त है। इनके विषय व्यापक हैं इसलिये वह सदैव सक्रिय रहते हैं। इसके विपरीत राष्ट्रवादियों के पास सीमित विषय हैं। उन्हें अब अनुभव होने लगा है कि वह राज्य प्रबंध के लिये उतने ही अवांछनीय है जितने पहले थे। ऐसे में हमें तीनों विचाराधारा के लेखकों से हमदर्दी है। हमारी सलाह है कि सभी विचाराधाराओं के इंटरनेट पर सक्रिय ऐसे लेखक जो असंगठित हैं पर सक्षम हैं आपस में मिलें । कोई समागम करें जिसमें सभी अपने खर्चे पर आयें। दिल्ली में बैठे लोग किसी ऐसे उद्यान या मैदान का चयन करें जहां बैठने की व्यवस्था भर हो। संगठित क्षेत्र के बुद्धिजीवियों की तरह कोई बड़ा आयोजन तो संभव नहीं है पर एक पर्यटननुमा आयोजन किया जा सकता है जिसमें लेखक दिल्ली घूमने भी आयें और लेखक मित्रों से मिलकर कोई योजना बनायें। अभी टीवी चैनल, अखबार और इंटरनेट पर देश की मनमोहक प्रतिमओं के दम पर जनमानस को प्रायोजित रूप से व्यस्त रखा जा रहा है पर आगे एक वैचारिक शून्यता का संकट आने वाला है। सत्तर साल पुरानी राजकीय प्रबंध शैली में जरा भी सुधार न है न भविष्य में होने की संभावना है।
हमसे जो बन पड़ेगा करेंगे। मूल रूप से अध्यात्मिकवादी हैं इसलिये तो एकांतवास में ही रहना चाहिये पर स्वभाव ऐसा है कि कुछ नया करने को ढूंढता है।  हमने थोड़ा सोचा है आप ज्यादा सोचो। हम हमेशा ही तैयार हैं। 


Wednesday, January 27, 2016

ट्विटर पर शनि शिंगणापुर में मंदिर में नारी प्रवेश आंदोलन-गर्व से कहो हम लोकतांत्रिक भी हैं-ट्विटर पर वाक्यांश (subject of women Entry in ShaniShingnapur)


             शनि शिंगणापुर मंदिर में महिलाओं को प्रवेश मिलना चाहिये पर अगर वहां के पुजारी यह नहीं चाहते तो उसके विरुद्ध सार्वजनिक आंदोलन करना भी ठीक नहीं हैं। मूलतः हिन्दू अध्यात्मिक ज्ञान स्त्री पुरुष की किसी प्रकार की पूजा निषेध नहीं करता पर ज्ञानी का यह काम नहीं है कि वह दूसरे के कर्मकांडों पर प्रतिकूल टिप्पणी करे। वैसे शनिशिंगणापुर मंदिर में प्रवेश के लिये हो रहे महिला आंदोलन से हिन्दू धर्म की प्रतिष्ठा बढ़ ही रही है।  यह इस बात का प्रमाण है कि हमारे समुदाय में नारियों के लिये भी स्वाभाविक लोकतंत्र है। शनिशिंगणापुर  में नारी प्रवेश के लिये आंदोलन से हिन्दू को विचलित न हों। खुश हों कि हमारे समुदाय में दूसरों की अपेक्षा ज्यादा जागरुकता है। हिन्दू समुदाय में नारियां अपने धार्मिक भेदभाव के विरुद्ध आंदोलन भी कर सकती हैं। अन्य समुदायों से श्रेष्ठ होने का यह एक बड़ा प्रमाण है। अध्यात्मिक योग व ज्ञान साधक के रूप में हमारी राय है कि शनिशिंगणापुर में हेलीकाप्टर से प्रवेश का नाटक रोके नहीं। हमारी धार्मिक सहिष्णुता का प्रमाण होगा। हिन्दू धर्म अपने प्राचीन तत्वज्ञान के कारण इतना शक्तिशाली है कि वह मंदिर में प्रवेश करने या न करने के नाटकों से खतरे में नहीं आता।

हिन्दू समुदाय की महिलायें अपने दायरे में ही तो आंदोलन करेंगी उन्हें दूसरे समुदायों के अंधविश्वासों के विरुद्ध लड़ने के लिये कहना ठीक नहीं। हमें दूसरे समुदायों के अंधविश्वासों पर टिप्पणी करने की बजाय स्वयं अपने ज्ञान के प्रति विश्वास जगाना चाहिये। शनिशिंगणापुर में नारी प्रवेश के लिये आंदोलन करने वालों को दूसरे समुदायों के उदाहरण बताकर मौन रहने के लिये कहना गलत। दिलचस्प! शनिशिंगणपुर में  नयी व पुरानी विचाराधारा की हिन्दू समुदाय की महिलाओं के बीच वाक्युद्ध! गर्व से कहो हम लोकतांत्रिक भी हैं। शनिशिंगणापुर में नारी प्रवेश के आंदोलन को धर्म पर हमला नहीं वरन् अपने लोकतांत्रिक होने का प्रमाण समझकर गर्व करें। प्रगतिशील व जनवादी विद्वान शनिशिंगणापुर में नारी प्रवेश आंदोलन पर न फुदकें क्योंकि उनके प्रिय  धर्म के प्रमुख स्थान में तो महिलायें जाने की सोचती भी नहीं।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
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Wednesday, November 11, 2015

अनुपम खेर के सहिष्णुता मार्च पर ट्विटर (Twitter on Subject march of Anupam Kher) MarchForIndia


            अनुपमखेर के नेतृत्व में देश की प्रतिष्ठा खराब करने वालों के प्रतिकूल  किये गये प्रदर्शन को सहिष्णुता मार्च कहना चाहिये। अनुपमखेर में नेतृत्व में निकलने वाले भारत के लिये मार्च पर सकारात्मक रुख अपनाते हुए उनकी प्रशंसा करना चाहिये। अब यह सवाल तो पूछा ही जायेगा कि एक अभिनेता को देश में असहिष्णु माहौल कैसे दिखेगा जबकि दूसरा उसे नकार रहा है। देश के असहिष्णु माहौल के प्रचार का उत्तर भारत के लिये मार्च से दिया जाना इस बात का प्रमाण है कि देश लोकतांत्रिक रूप से सहिष्णु व परिपक्व है। असहिष्णु वातावरण के प्रचार का भारत के लिये मार्च से जवाब! अनुपम खेरजी की बौद्धिक योजना का जवाब नहीं! इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत के लिये मार्च में एकत्रित भीड़ ने भारत की सहिष्णुता की मर्यादित सीमा भी बता दी है। समस्या यह है कि प्रगतिशील और जनवादी शैली की रचनाओं को राज्य प्रबंध से समर्थन नहीं मिलने वाला। यह कुछ रचनाकार सहन नहीं कर पा रहे।
                                   अनुपमखेर के नेतृत्व में बुद्धिजीवियों के  सहिष्णुता मार्च से भारत की अंतर्राष्ट्रीय पटल पर प्रतिष्ठा बढ़ती है तो अच्छी बात होगी। अनुपम मार्च से  एक बात तय हो गयी कि बौद्धिक दृष्टि से भी सुविधानुसार घटनाओं पर राय कायम की जा सकती है। आपकीबात अनुपम मार्च यह ट्विटर  दिखाई दिया।

भारत में सहिष्णुता के प्रश्न उठाकर कथित बुद्धिमानों ने प्रचार में नाम जरूर पाया पर उनकी छवि देशविरोधी बन रही है। अब तो यह सवाल दिमाग में आता है कि सहिष्णुता का मसला उठाने के पीछे असली वजह क्या है? पर्दे के पीछे का राज बाहर आना चाहिये। आप जोर से चिल्लायें तो यह अभिव्यक्ति का अधिकार है, पर लोग सुनने से इंकार कर दें तो मानना पड़ेगा कि समाज सहिष्णु है। आप चिल्लाकर बोलें यह अभिव्यक्ति का अधिकार है, उसे कोई न सुने यह यह समाज की असहिष्णुता का प्रमाण नहीं हो सकता। समाज में जागरुकता बढ़ी पर चेतना कम हुई है अब कोई कहे तो कहता रहे कि  असहिष्णुता बढ़ी है।
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Monday, November 2, 2015

दक्षिणपंथी और राष्ट्रवादी लेखकों को सम्मान देना आवश्यक(Rashtrawadi Dakishinpanthi Lekhkon ko Samman Dena Awashyak)


                                   इंटरनेट पर अनेक दक्षिणंपथी राष्ट्रवादी लेखक सक्रिय हैं, इस दीपावली पर सम्मानित कर जनमानस के हृदय पटल पर स्थापित किया जाये। हम जैसे अध्यात्मिकवादी लेखक मानते हैं कि इससे सम्मान वापसी कर रहे कथित बुद्धिजीवियों के प्रचार को चुनौती दी सजा सकती है।  इनमें से अनेक तो ऐसे हैं जिनके ब्लॉग है जिनमें किसी सामान्य पुस्तक से अधिक रचनायें हैं। यह लोग निष्काम भाव से काम करते हैं। सबसे बड़ी बात यह कि उन्हें अब वैसे ही प्रोत्साहन की आवश्यकता है जैसा कि उनके अनुसार ही जनवादियों और प्रगतिशीलों को मिलता है। इनमें से कुछ लोग सम्मान मिलने पर राष्ट्रीय प्रचार पटल पर आ जायेंगे तो उन्हें अपनी बात कहने के लिये व्यापक क्षेत्र मिलेगा। इससे परंपरागत प्रकाशन जगत का महत्व भी कम होगा और वहां लिख कर सम्मानित लोगों का महत्व भी अधिक नहीं रहेगा।
                                   हम अध्यात्मिकवादी लेखक है अंतप्रेरणा से लिख लेते हैं पर दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी लेखकों राजसी समर्थन की आवश्यकता प्रतीत हो।  प्रचार माध्यमों में जो सार्वजनिक  बहस होती है वह राजसी कर्म की श्रेणी के होते हैं।  हमारा मानना है कि राजसी कर्म राजसी बुद्धि और साधनों से संपन्न होते हैं। वहां सात्विक तत्व ढूंढना या रखते हुए दिखना स्वयं को धोखा देना है। राजसी कर्म में जस की तस नीति अपनाना ही श्रेयस्कर है। इन दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी लेखकों को अपना अभियान जारी रखने के लिये राजसी समर्थन की आवश्यकता है-यह हमारा विचार है। यहां यह भी स्पष्ट कर दें कि हमारा इसमें कोई निजी स्वार्थ नहीं है। न ही हमारा सम्मान पाने के लिये कोई ऐसा लिख रहे हैं।  हां, यह सही है कि दक्षिणपंथी  राष्ट्रवादी लेखकों से अपनी रचनाओं की वजह से करीबी रही है पर इसका मतलब यह नहीं है कि हमारा  उनमें स्वार्थ है।
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Sunday, October 11, 2015

विशेष रविवारीय दीपकबापू वाणी (Super Sundya Deepak Bapu Wani)


तरक्की के पहिये बड़े भारी, रास्ते जाम हो ही जाते हैं।
दीपकबापूभूख से बड़ी लालच, सस्ते काम हो ही जाते हैं।।
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भ्रष्ट इंसान की खोज जारी है, बेफिक्र हैं जिनकी नहीं बारी है।
दीपकबापूविकास की चमक में, काली माया का खेल जारी है।।
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राजसी कर्म में शुद्ध भाव की आस, जैसे बिना इक्के की तास।
दीपकबापू चले पवित्रता की राह, विरले ही करते जगत में वास।।
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Friday, September 25, 2015

ट्विटर पर भारतीय दर्शन पर लिखी गयी सामग्री (Twitter on bhartiya darshan-New post


                                   भारतीय प्राचीन ज्ञान की प्रशंसा व उसके अनुयायी होने का दावा करना तब तक व्यर्थ है जब तक हम पाश्चात्य राज्य प्रबंध नीति अपनाते हैं। जब हम यह कहते हैं कि हमारे प्राचीन ग्रंथ ज्ञान का भंडार है तब प्रगतिशील विद्वान देश के राज्यप्रबंध की कमियां दिखाकर सवाल करते हैं। हमारा अध्यात्मिक दर्शन व्यक्ति में सहजभाव के निर्माण के साथ राज्य प्रबंध के वैज्ञानिक सिद्धांतों से भरा है पर उस पर नहीं चलते। अगर हम भारतीय अध्यात्मिकवादी होने का दावा करते हैं तो यह भी आवश्यक है कि हम उसमें राज्य प्रबंध की बतायी गयी नीतियों भी पर चलें।  हम बात तो अपने प्राचीद दर्शन की करते हैं जबकि जबकि हमारा राज्य  पाश्चात विचार तथा नीतियों  पर आधारित है। यह विरोधाभास ही सबसे बड़ी समस्या है। अंतर्जाल पर भी भारतीय धार्मिक नीतियों से सहमत लोग लिखते हैं पर कोई सम्मानजनक स्थिति न होने से उन्हें निराश भी होना पड़ता है। हां, इतना जरूर है कि इंटरनेट पर जो लोग अपने पाठ लिखने का पूरा आनंद उठाते हैं वह किसी की परवाह नहीं करते।  जिन लोगों को परवाह होती है वह पसंद कम होने या टिप्पणियां कम मिलने से निराश होते हैं। उन्हें इससे बचना चाहिये।
                                   उत्तर प्रदेश में गंगा तथा यमुना में गणेश जी की प्रतिमा  विसर्जित करने पर विवाद चल रहा है। इन दोनों नदियों के प्रदूषित होने की चर्चा से दशकों से चर्चा में है और लग अब इनकी स्वच्छता को लेकर गंभीर हो गये हैं। ऐसे में गंगा तथा यमुना  में गणेश प्रतिमा विसर्जन करने की जिद्द कर प्रशासन से भिड़ने वाले समझ लें कि उन्हें सामान्य हिन्दू का समर्थन नहीं मिल सकता। गणेशजी की भक्ति करना पवित्र काम है पर इससे उनकी प्रतिमा गंगा  और यमुना नदियों  में विसर्जित कर जल प्रदूषित करने का अधिकार नहीं मिल जाता। अगर प्रशासन कहता है कि गणेशजी की प्रतिमा गंगा और यमुना नदी में विसर्जित करना ठीक नहीं तो उसे न मानना अधर्म ही है। गणेशजी विवेक का प्रतीक हैं और उनकी प्रतिमा का गंगा और यमुना  में विसर्जित करने की जिद्द कर प्रशासन से भिड़ना अविवेक का प्रमाण है। वैसे एक प्रश्न तो उठेगा कि सन्यासी रंग के वस्त्र धारण कर गणेशी जी की प्रतिमा गंगा में विसर्जित करने की जिद्द कर कौनसे नियम का पालन कर रहे हैं।
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Monday, September 14, 2015

हिन्दी दिवस पर दीपकबापूवाणी (DeepakBapuWani-Kavita On HindiDiwas)


हृदय धड़के मातृभाषा में, भाव परायी बाज़ार में मत खोलो।
कहें दीपकबापू खुशी हो या गम, निज शब्द हिन्दी में बोलो।।
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दिल के जज़्बात अपने हैं, अपनी जुबां हिन्दी में बोलो।
दीपकबापू हमदर्दी के रास्ते अब अंग्रेजी से मत खोलो।।
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अंग्रेजी में सम्मान कमाया नहीं, आत्मसम्मान भी समाया नहीं।
दीपकबापूअब भी गरीब, खुद की जुबां का भी साया नहीं।
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गोरी जुबां अर्थ की काली, कैसे दिल में अपने डाली।
दीपकबापू हिन्दी में लेते अर्थ, अंग्रेजी में बजाते ताली।
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राजाओं की स्तुति रोज करते, हिन्दीदिवस पर भी पेट में भोज भरते।
दीपकबापूमातृभाषा के नाम पर, कभी हिंग्लिश के शोज भी करते।।
..........................
हिन्दी के शब्द महंगे नहीं बिकते, इसलिये बाज़ार में कम दिखते।
दीपकबापू अंग्रेजी के सेवक, छद्मरूप में हिंदी की दम दिखते।।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
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Sunday, September 6, 2015

आपसी संबंधों में प्रतिकारसंधि का महत्व न भूलें-कौटिल्य का अर्थशास्त्र(apsi sambandhon mein paropkarsandhi ka mahtva-economocs of kautilya)

                                   हम अपने दैनिक जीवन में अनेक लोगों के संपर्क में आते हैं।  किन्हीं लोगों का हम उपकार करते हैं तो कोई हमारा करता है पर इसका प्रतिकार कहीं होता है कहंी नहीं।  सामान्य मनुष्य का स्वभाव होता है कि वह किसी संकट में पड़े साथी, रिश्तेदार या अन्य व्यक्ति की मदद को तत्पर हो जाता है। हम जब समाज की व्यवस्था की बात करते हैं तो वह बनता ही इसलिये है कि लोग एक दूसरे के साथ संबंध सहजता से निभायें।  इसी समाज में कई लोगों की ऐसी प्रवृत्ति भी देखी जाती है कि वह काम निकल जाने के बाद साथी, मित्र और रिश्तेदार से दूध   में से  मक्खी निकालने की भांति संपर्क तोड़ देते हैं। प्रतिकार भाव से रहित ऐसे व्यक्ति अंततः समाज में अविश्वसनीय हो जाते हैं।
कौटिल्य अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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उपकारं करोम्यस्यं ममाप्येष करिष्यति।
अयञ्वापि प्रतीकारो रामसुग्रीवयोरिव।।
                                   हिन्दी में भावार्थ-मैंने उसका उपकार किया तो  वह भी करेगा-राम सुग्रीव के बीच इसी तरह हुइ संधि प्रतिकार संधि कहलाती है।
मयास्योपकृतं पूर्वे ममाप्येष करिष्यति।
इतिः या क्र्रियते सन्धिः प्रतीकारः स उच्यते।।
                                   हिन्दी में भावार्थ-मैंने पहले उसका उपकार किया तो वह भी मेरा करेगा-इसे प्रतिकार संधि कहा जाता है।
                                   प्रतिकार संधि मैत्री का भी रूप है जिसके बारे में कहा जाता है कि वह की नहीं जाती वरन् स्वतः भाववश हो जाती है। यह ठीक है कि भाववश लोग एक दूसरे जुड़े रहते हैं पर इसका आशय यह कतई नहीं है कि वह परोपकार कर प्रतिकार की अपेक्षा न करें।  निष्काम कर्म या नेकी कर दरिया में डाल का सिद्धांत ज्ञानी अपनाते हैं पर इस संसार में सभी ऐसे नहीं होते। अतः जिन लोगों को अपनी समाज मेें गरिमा बनाये रखना र्है वह परोपकार कर कोई भले ही याचना न करे पर लाभ लेने वाले को उसका प्रतिकार करने के लिये तत्पर होना चाहिये।  अगर वह ऐसा नहीं करता तो परोपकार करने वाला निराश हो जाता है और कालांतर में काम करने पर मुंह भी फेर सकता है।
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Saturday, August 29, 2015

अंतर्जाल पर प्रहारात्मक रूप से अंग्रेजी की अपेक्षा हिन्दी अधिक प्रभावी-हिन्दी दिवस पर विशेष लेख(hindi batter than inglish on internet-special hindi article on hindi diwas)

                                   ट्विटर, फेसबुक और ब्लॉग से आठ वषौं के सतत संपर्क से यह अनुभव हुआ है कि भले ही आपकी बात अंग्रेजी में अधिक पढ़ी जाती है पर भारत में समझने के लिये आपका पाठ हिन्दी में होना आवश्यक है।  महत्वपूर्ण बात यह है कि अगर आक्रामक शैली में शब्द लिखने हों तो अंग्रेजी से अधिक हिन्दी ज्यादा बेहतर भाषा है।  कटु  बात कहने के लिये मधुर शब्द का उपयोग भी व्यंजना भाषा में इस तरह किया जा सकता है कि  ंइसका अनुभव एक ऐसे ट्विटर प्रयोक्ता के खाते से संपर्क होने पर हुआ जो अपनी अंग्रेजी भाषा में लिखी गयी बात से प्रसिद्ध हो रहा है।  उसके अंग्रेजी शब्दों के जवाब में अंग्रेजी टिप्पणियां आती हैं पर जितना आक्रामक शब्द अंग्रेजी की अपेक्षा हिन्दी टिप्पणियों के होते हैं।  एक टिप्पणीकर्ता ने तो लिख ही दिया कि अगर अपनी बात ज्यादा प्रभावी बनाना चाहते हो तो हिन्दी में लिखो। वह ट्विटर प्रयोक्ता अंग्रेजी में लिख रहा है पर उसकी आशा के अनुरूप हवा नहीं बन पाती। अगर वह हिन्दी में लिखता तो शायद ज्यादा चर्चित होता। इसलिये हमारी सलाह तो यही है कि जहां तक हो सके अपना हार्दिक प्रभाव बनाने के लिये अधिक से अधिक देवनागरी हिन्दी में लिखे।

140 शब्दों की सीमा से अधिक ट्विटरलौंगर पर लिखना भी दिलचस्प
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इधर ट्विटर ने भी 140 शब्दों से अधिक शब्द लिखने वाले प्रयोक्ताओं  ट्विटलोंगर की सुविधा प्रदान की है। हिन्दी के प्रयोक्ता शायद इसलिये उसका अधिक उपयोग नहीं कर पा रहे क्योंकि उसका प्रचार अधिक नहीं है। हमने जब एक प्रयोक्ता के खाते का भ्रमण किया तब पता लगा कि यह सुविधा मौजूद है। हालांकि हम जैसे ब्लॉग लेखक के लिये यह सुविधा अधिक उपयोगी नहीं है पर जब किसी विशेष विषय पर ट्विटर लिखना हो तो उसका उपयोग कर ही लेते हैं। वैसे ट्विटर पर अधिक लिखना ज्यादा अच्छा नहीं लगता क्योंकि वह लोग लिंक कम ही क्लिक करते हैं।  बहरहाल जो केवल ट्विटर पर अधिक सक्रिय हैं उनके लिये यह लिंक तब अधिक उपयोग हो सकता है जब वह अधिक लिखना चाहते हैं।
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Monday, August 3, 2015

हर हर महादेव-सावन का माह भक्ति की चाह-हिन्दी लेख(har har mahadev-sawan ka mahin bhakti ka nageena-hindi article

                              सावन के माह  में हर सोमवार  शिवलिंग पर जलाभिषेक करने के लिये बड़ी संख्या में भक्त मंदिरामें जाते हैं।  अनेक पाश्चात्य हिन्दी भाषी ही ज्ञानी इसका मजाक बनाते हैं।  जानते हैं क्यों? इन लोगों को लगता है कि इनके प्रचार पर्दे और पत्रों के लिये दर्शक या पाठक कम हो जाते हैं। मूर्ति पूजा या जलाभिषेक का मजाक बनाने वाले भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के बारे में नहीं जानते। खाते हिन्दी से हैं पर माता अंग्रेजी को बताते हैं। पैंट पहनने वालों को सभी कुर्ते पायजामे और धोती वाले गंवार नज़र आते हैं। सबसे बड़ी बात यह कि मनुष्य के मन का खेल केवल भारतीय अध्यात्मिक दर्शन में समझा जाता है। इसे अंग्रेजी भक्त कतई नहीं समझ सकते।ं
                              मूर्तियों में भगवान नहीं होता। शिवलिंग पर चढ़ा जल गंगा नहीं होता, यह भी सभी जानते है। मगर जब मूर्ति के आगे कोई मत्थ ठेकता है तो वह अपने मन का शुद्धिकरण कर रहा होता है। शिवलिंग पर जल चढ़ाते हुए उसे मन में गंगा जैसी पवित्रता बहने की अनूभूति होती है।  यही अनूभूति मन को दृढ़ और पवित्र बनाती है। विश्व में धर्म के नाम पर अनेक विचाराधारायें प्रचलित हैं-यह अलग बात है कि सभी को धर्म कहा जाता है जबकि हमारे यहां इसका आशय केवल आचरण, व्यवहार तथा कर्म से ही लिया जाता है। इन विचाराधाराओं में भारतीय अध्यात्मिक विचाराधारा पर दृढ़ता पूर्वक चलने वाले ही सबसे अधिक बुद्धिमान और परिश्रमी माने जाते हैं-आज पूरा विश्व भारतीय साफ्टवेयर इंजीनियरों का लोहा मानता है जो कि इसका प्रमाण है।
                              इस विषय पर हमने कोई शोध तो नहीं किया योग तथा ज्ञान साधना के अभ्यास से अनेक ऐसी अनुभूतियां हुईं हैं जो अध्यात्मिक विषय पर लिखते हुए हमें आनंद आता है। निरंकार के उपासक होने के बावजूद मंदिरों में जाने पर भी आनंद मिलता है।  मूल बात है मन की जिसे समझने वाले इस बात को जानते हैं कि सांसरिक विषयों में निरंतर सक्रियता के बाद उससे कुछ समय के लिये-ध्यान और पूजा जैसी क्रियाओं से- प्रथक होने पर एक आनंद की अनूभूति होती है। करो तो जानो।
हर हर हर महादेव, जय शिव शंकर
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
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Thursday, July 23, 2015

उज्जैन में महाकाल में जनदेवता का प्रवेश-हिन्दी चिंत्तन लेख(Ujjain mein mahakal mein jandevata ka pravesh-hindi thought article)

          उज्जैन में महाकाल मंदिर में क्षिप्रा का पानी घुस गया है। भारतीय धार्मिक विचाराधाराओं के विरोधी यह कह सकते हैं कि जो महाकाल अपनी रक्षा नहीं कर सका वह अपने भक्तों की रक्षा क्या करेगा? विदेशी विचाराधारा के प्रचारकों ने अनेक पत्थर की मूर्तियों को तालाब मे डुबोकर इस तरह के तर्क ही दिये।  भारतीय बुद्धिमानों ने भी लकड़ी की मूर्तियां जलाकर यह तर्क दिये कि जो अपने को जलने से नहीं बचा सका वह अपने भक्तों को इस सांसरिक आग से क्या बचायेगा? बहरहाल इस तरह की बहसें धर्म से अधिक अधर्म को ही जन्म देती हैं।
                              भारत की प्राचीन नगरी में स्थित महाकाल के गर्भ में बाढ़ आयी फिर भी वहां प्रतिमायें बची रहीं-उनकी शक्ति का प्रमाण तर्क के रूप में आस्थावान  दे सकते हैं।  इस तरह के विवाद और उनका प्रतिकार करना अज्ञान तथा अहंकार का ही प्रमाण होता है।
                              अध्यात्मिक साधकों के लिये महाकाल के गर्भ गृह में जल देवता के प्रवेश करना पूरे विश्व में भौतिकता के नाम पर प्रकृत्ति से छेड़छाड़ के दुष्परिणाम के अलावा कुछ नहंी है । महाकाल जैसे स्थान अध्यात्मिक साधकों के लिये ध्यान आदि के लिये महत्वपूर्ण स्थान होते हैं।  उनकी आस्था में ज्ञान का पुट भी होता है इसलिये वह मूर्तियों के जल में डूबने से विचलित नहीं होते न ही जलदेवता के चुंगुल से  मुक्त होने पर प्रसन्न होते हैं।
                              उज्जैन भारत की सबसे प्राचीन अध्यात्मिक नगरी है।  महान ग्रंथ श्रीमद्भागवत्  गीता के प्रवर्तक भगवान श्रीकृष्ण के गुरु संदीपनि ऋषि यही निवास करते थे।  यहीं विक्रमादित्य नाम के उस राजा ने राज्य किया जिसे राजधर्म का प्रतीक माना जाता है।  हमारी कामना है कि जल्द ही उज्जैन में सामान्य स्थिति वापस हो। मन में इच्छा तो है कि जल्द ही महाकाल के दरबार में ध्यान कर हम अपनी योग साधना का परीक्षण करें।
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Tuesday, July 14, 2015

क्रिकेट के काले पन्नों पर न्याय की मुहर लगी-हिन्दी चिंत्तन लेख(cricket ke kala panno par nyay ki muhar lagi-hindi thoght article)


                             प्रचार माध्यमों के अनुसार न्यायाधीश मुदगल की क्रिकेट के संबंध में जारी रिपोर्ट से नये क्रिकेट प्रेमियों को चौंका सकती है पर पुराने लोग जानते हैं कि इस खेल की आड़ में बहुत सारे काले कारनामे चलते रहे हैं। स्थिति यह है कि हम तो भारत की क्रिकेट टीम को देश की बजाय भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड यानि बीसीसीआई की टीम मानते हैं।  अनेक बार अपने व्यंग्यों में यह बात लिख चुके हैं कि जीती तो हमारी टीम हारी तो बीसीसीआई मानते हैं। हम जैसे दर्शक देश के प्रति संवेदनशील होने के कारण बीसीसीआई टीम के जीतने पर प्रसन्न होते थे हारती थी तो मन उदास हो जाता था।
                              करीब बारह वर्ष पूर्व जब पहली बार इसमें सट्टेबाजी की बात सामने आयी तब दुःख जरूर हुआ पर हैरानी नहीं हुई। हमने देखा था कि अनेक मैच देश के नाम से खेल रही टीम जीतते हुए हार जाती थी।  उसके बाद मन ऐसा टूटा कि फिर कभी क्रिकेट को कभी देशप्रेम से नहीं जोड़ा।  फिर भी कभी कभी देख ही लेते हैं। अभी हाल ही में विश्व कप प्रतियोगिता आस्ट्रेलिया में हुई थी।  अंतर्जाल पर कुछ लोगों ने स्पष्ट कह दिया था कि यह टीम सेमीफायनल से आगे नहीं जायेगी।   बीसीसीआई की टीम सेमीफायनल तक ठीकठाक चली।  जिस दिन सेमीफायनल था उस दिन भारत के हिन्दी टीवी चैनल ने संकेत दिया कि सट्टेबाजों की फायनल में जगह बनाने वाली टीमों में बीसीसीआई पंसदीदा नहीं है। हमारा दिल बैठ गया।  मैच देखने फिर भी बैठे रहे। एक समय लगा कि बीसीसीआई की टीम सट्टेबाजों की पंसद तोड़कर रहेगी।  फिर लड़खड़ाई और फिर डटकर खेलती दिखी। अंततः ऐसी लड़खड़ाई कि हार ही गयी।  यह जरूर कहा जाता है कि भारत के समाचार टीवी चैनल क्रिकेट से कमाते हैं इसलिये इसमें हो रही काली करतूतों को छिपाते हैं पर उनकी इस बात की प्रशंसा करना चाहिये कि अप्रत्यक्ष रूप से सच कह भी देते हैं। यही कारण है कि हमारा मन इतना कड़ा था कि जैसे ही बीसीसीआई की टीम को हार की तरफ बढ़ते देखा टीवी में चैनल बदल दिया।  उस दिन कोई समाचार चैनल न देखकर टीम की हार के विश्लेषण देखने से बचते रहे। इस बात का अफसोस था कि काहे फिर क्रिकेट से दिल लगाया था।
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Saturday, June 27, 2015

स्वर्ग प्राप्ति का मोह अज्ञान का प्रमाण-भर्तृहरि नीति शतक के आधार पर चिंत्तन लेख(swarga prapti ka moh agyan ka praman-A Hindu hindi religion thought based on bhartrihari neeti shatak)

                              भगवान श्रीकृष्ण से श्रीमद्भागवत गीता में वेद वाक्यों में स्वर्ग दिलाने वाले वाक्यों से प्रीति रखने वाले लोगों को अज्ञानी बताया है। हमारे यहां से धार्मिक सत्संग तथा अन्य सामूहिक कार्यक्रमों की परंपरा रही है जिसमें अनेक पेशेवर विद्वान लोगों को स्वर्ग का मोह दिखाते हैं।  उन्हें कथित रूप से स्वर्ग प्राप्ति के लिये काम, क्रोध, लोभ, मोह तथा अहंकार से मुक्त होकर कार्य करने के लिये प्रेरणा देते हैं। ऐसे कथित विद्वान स्वयं सारी जिंदगी संपति, शिष्य तथा प्रतिष्ठा अर्जित करने में बिताते हैं पर दूसरों को भ्रम में डालते हैं।
भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि
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स्वपरप्रतारकोऽसौ निन्दति योऽलीपण्डितो युवतीः।
यस्मामात्तपसोऽपि फलं स्वर्गस्तस्यापि फलं तथाप्सरसः।।
                              हिन्दी में भावार्थ-शास्त्रों के ज्ञान का अधकचरा ज्ञान रखने वाले अनेक कथित विद्वान अपने तथा पराये सभी को धोखा देते हैं क्योंकि वह जिस तप की बात करते हैं वह स्वर्ग की प्राप्ति के लिये होता है जहां अप्सरायें और भोग विलास की प्रधानता है।
                              हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार हर मनुष्य अपने कर्म का फल स्वयं ही भोगता है। वह अपने संकल्प के अनुसार ही अपने जीवन में स्वर्ग और नरक का वातावरण बनाता है। यह संभव नहीं है कि  मनुष्य का कर्म दूसरा भोगे।  मनुष्य स्वयं ही अपने को संकट में डालता है या उद्धार करता है।  कितना भी सत्संग, भजन और शास्त्र पढ़ ले जब तक उसके कर्म, विचार और बुद्धि शुद्धि नहीं होगी तब तक कष्ट ही भेागेगा।  योग साधना से अपनी देह, मन और विचारों को शुद्ध रखने वाले इस संसार में स्वर्ग न भोगें पर कम से कम नारकीय स्थिति से दूर रहते हैं।
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Saturday, June 20, 2015

योग साधना से दृष्टिकोण बदलता है-विश्व योग दिवस 21 जून पर विशेष संपादकीय लेख(yoga sadhana se drishtikon badalata hai-A Hindu hindi thoughta article on world yoga day, internation yoga day21 june 2015)

                                                        ’‘योग हमारे जीवन की स्थितियां नहीं बदलता पर उन्हें देखने को दृष्टिकोण बदलता है।’’योगाचार्य आंयगार की एक शिष्या ने अपने गुरु का संदेश सुनाते हुए कहा।  टीवी पर उनका यह विचार देखकर खुशी हुई।  इसे सुनकर एक विचार हमारे मन में आया कि योग से जुड़े लोगों का चिंत्तन एक ही दिशा में इसलिये होता है क्योंकि उनके कदम एक ही धरातल पर होते हैं।  योग साधक सहज होते हैं इसलिये उनका चिंत्तन सीमित दायरे में होने के बावजूद व्यापक दृष्टिकोण वाला होता है जबकि सामान्य मनुष्य अनेक धरातलों पर कदम रखते हुए असीमित दायरों में सोचते हैं इसके बावजूद उनका दृष्टिकोण संकुचित हो जाता है।
                              योग से साधक के चिंत्तन को वायु जैसी गति, अग्नि जैसी शक्ति और जल जैसी निर्मल भक्ति प्राप्त होती है और वह जीवन में वैचारिक रूप से स्वतंत्र होकर आकाश में विचरते हुए  विषयों में प्रवेश करता है जबकि सामान्य मनुष्य विषयों की बोतल में सदैव बंद रहता है-एक तरह से कूंऐं का मेंढक हो जाता है।  लगातार योग तथा ज्ञान साधना करते हुए इस लेखक ने भी यह निष्कर्ष निकाला कि योग साधना से कोई सिद्ध नहीं बनता वरन् साधक का दृष्टिकोण सबसे अलग और सटीक हो जाता है इसलिये वह सिद्ध दिखता है।  एक योग साधक की हमेशा ही सत्संग चर्चा में रहती है। दूसरों के विचार सुनने पर यह पता लगता है कि हम अकेले ऐसा सोचने वाले नहीं है। साथ ही यह भ्रम भी दूर होता है कि हमने ही ऐसा सोचा था।
21 जून को विश्व योग दिवस पर टीवी पर अनेक ऐसे कार्यक्रम देखने को मिले जो रुचिकर थे। कुछ चैनल तो इस योग दिवस में भारत से बाहर उत्पन्न वैचारिक धाराओं के विद्वानों को इसके विरोध में लाकर अपने कार्यक्रमों में निष्पक्षता का रस विष की तरह घोलते रहे-यह अलग बात है कि दृढ़ संकल्पित योग साधकों में विष पचाने की क्षमता होती है- पर कुछ ने वाकई ऐसे कार्यक्रम प्रसारित किये जिससे लगा कि योग साधना का वैश्वीकरण तो बहुत पहले ही चुका है जबकि अब जाकर उसे स्वीकार किया गया है। अनेक विदेशी योग शिक्षकों को योग कराते देखकर अच्छा लगा।  योग के अनेक नाम सुनने को मिले-जैसे नृत्य और मुक्केबाजी योग आदि। योग के प्रति अंग्रेज तथा अमेरिकन लोगों की निष्ठा ने हृदय को इतना प्रभावित किया कि लगने लगा कि हम भारतीय योग की नहीं वरन् विश्व योग की बात कर रहे हैं।
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Wednesday, June 3, 2015

सर्वशक्तिमान पर निरर्थक बहस-हिन्दी चिंत्तन लेख(discussion on God(men or women-A hindu hindi thought article)


    प्रचार माध्यमों के अनुसार ब्रिटेन में इस बात पर बहस छिड़ी है कि गॉड स्त्री है या पुरुष! हमारे हिसाब से उन्हें इस बात पर बहस करना ही नहीं चाहिये क्योंकि अंग्रेजी में स्त्री या पुरुष की क्रिया के वाचन शब्द का कोई विभाजन ही नहीं है। स्त्री कार्य कर रही है(Women is working) या पुरुष कार्य कर रहा है(Men is working) इसमें अंग्रेजी वर्किंग शब्द ही उपयोग होता है। यही कारण है कि अनेक कट्टर हिन्दी समर्थक अपनी भाषा को वैज्ञानिक और अंग्रेजी को भ्रामक मानते हैं। यह बहस देखकर उनके तर्क स्वाभाविक लगते हैं|
   सर्वशक्तिमान की स्थिति पर भारतीय दर्शन स्पष्ट है। हमारे यहां परब्रह्म शब्द  सर्वशक्तिमान के लिये ही उपयोग  किया जायेगा।  मुख्य बात यह कि वह अनंत माना जाता है-यह स्पष्ट किया गया है कि वह चित में धारण किया जा सकता है पर वह रूप, रस, गंध, स्वर और स्पर्श के गुणों से नहीं जाना जा सकता। वह चिंत्तन से परे है पर मनुष्य अपने चित्त में जिस गुण से उसका स्मरण करेगा वही उसका ब्रह्म है।
         हमारे यहां विदेशी विचाराधारा के प्रवर्तक सब का सर्वशक्तिमान एक है का नारा लगाते हुए यहां भ्रम पैदा करते हैं। सद्भाव के नाम पर यही नारा लगाते हैं पर सच यह है कि वह एक है कि अनेक, यह कहना या मानना संभव नहीं। अनेक विद्वान तो यह भी कहते हैं कि वह है भी कि नहीं इस पर भी कुछ नहीं कहा जा सकता क्योंकि वह अनंत है। इसलिये उस पर बहस करना ही नहीं चाहिये। वह वैसा ही है जैसा भक्त है। भक्त जिस रूप में चाहता है उसे धारण कर ले। हमारे यहां अनेक साकार स्वरूप माने जाते हैं। भक्ति को जीवन का अभिन्न भाग माना जाता है। यही कारण है कि निराकार परब्रह्म की कल्पना में असहजता अनुभव करने वाले साकार रूप में उसे स्थापित करते हैं पर उनमें यह ज्ञान रहता ही है कि वह अनंत है। अपने अपने स्वरूपों को लेकर बहस कहीं नहीं होती। यह तत्वज्ञान हर भारतीय विचारधारा में स्थापित है  इसलिये यहां ऐसी निरर्थक तथा भ्रामक चर्चा कभी नहीं होती।
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Thursday, May 28, 2015

भारतीय अध्यात्म दर्शन में जीवमात्र के बीच भेदभाव वर्जित-हिन्दी चिंत्तन लेख(bhartiya adhyatma darshan mein jeevmatra ke beech bhedbhav varjit-hindi thought article)

अज्ञानी मनुष्यों के दूसरों के प्रति भेदभाव की प्रवृत्ति स्वभाविक रूप से रहती है जबकि ज्ञानी लोग मनुष्य और मनुष्यों के बीच की बात तो छोड़िये इस प्रकृत्ति के जीवों में ही भेद नहीं करते। हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार जीवन की 84 लाख यौनियां होती हैं। अक्सर यह कहा भी जाता है कि जो जीव भगवान नाम का स्मरण करेगा वह 84 के चक्कर से बच जायेगा। भक्त के सच्ची पहचान भी यही बताई गयी है कि वह किसी भी जीव को हेय न समझे। सभी को सम्मान दे। यही कारण है कि भारत में वानर, सिंह, चूहे तथा सर्प को भी जनमानस में भगवतस्वरूप स्थापित किया गया है। एक सामान्य भारतीय कभी भी पशु और पक्षी तक को अपमान की दृष्टि से नहीं देखता।  यह अलग बात है कि पाश्चात्य शिक्षा के चलते हमारे देश में वहां प्रचलित भेदभाव आ गया है। लोगों की सोच अब पूरी तरह से देसी न होकर पश्चिमी हो गयी है। इसी कारण हमारे देश में भेदभाव बढ़ा है।
भारतीय अध्यात्मिक दर्शन में मूलतः जीव मात्र में ही भेदभाव की प्रेरणा नहीं दी जाती। मध्यकाल के दौर में जब भारतीय समाज पर विदेशी लोगों के हमले हुए और उस दौरान तत्कालीन समाज पर नियंत्रण के लिये उनके दलालों ने यहां पर बौद्धिक प्रकृत्ति बदलने का प्रयास किया।  उस दौरान अनेक भारतीय चिंत्तकों ने समाज को बचाने के लिये कुछ ऐसे मार्ग तलाश करने चाहे जो विदेशी तथा देसी सोच के साथ ही  लोगों के बीच भेद दिखाने वाले थे। उनके सिद्धांत अच्छे या बुरे थे यह अलग से बहस का विषय है पर चिंत्तकों की नीयत पवित्र थी यह तय है।
समय के साथ भारतीय समाज परिवर्तनशील रहा है।  वह केवल अपने दर्शन से तत्कालीन संदर्भों में बेहतर संदेश ही स्वीकार करता है। उस पर रूढ़ता का आरोप नहीं लगाया जा सकता है। विदेशी कू्रर लोगों के शासन तथा उनके बौद्धिक दलालों से संघर्ष के कारण भारतीय अध्यात्मिक विचाराधारा का प्रवाह अवरुद्ध हुआ पर इसे रूढ़ता नहीं माना जा सकता। बहरहाल हमारा यह मानना है कि मनुष्य ही नहीं वरन् जीव मात्र में ही भेद करना हमारे अध्यात्मिक के सिद्धांतों के विपरीत है।
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Sunday, May 10, 2015

संकल्प में सर्वजन हिताय की कामना स्थापित करें-हिन्दी चिंत्तन लेख(sankalp mein sarwjan hitay ki kamana sthaapit karen-hindi thought article)


जिस तरह यह संसार परमात्मा के संकल्प के आधार स्थित है वैसे ही हमारे हृदय  और मस्तिष्क के संकल्प के अनुसार ही हमारा जीवन चलता है। अगर हम दूसरे के कार्य में विघ्न आने की संभावना आने पर खुश होते हैं तो यह तय मानिये कि  कि हमारे काम में विघ्न आयेंगे हालांकि तब हमारे अंदर यह विचार नहीं आता कि हमारे किस संकल्प के कारण यह हुआ?
हमें अपने अंदर स्थित समस्त इंद्रियों में पवित्रता का संकल्प स्थापित करना ही चाहिये।  ऐसा नहीं हो सकता कि हम मन में घृणा रखें और वाणी में मीठे शब्द विष की तरह उपयोग करें। हम अपने कर्ण से अच्छे स्वर सुनना चाहें पर मन के वश ऐसे स्थानों पर जायें जहां दृश्य तो अनूकूल हो पर स्वर विपरीत मिलें। वहां चक्षु और वाणी का सुख तो मिले पर कर्णों को अप्रिय स्वर घेर लें।  कहने का अभिप्राय यह है कि हमें पवित्रता, शुद्धता और सहजता के भाव को पहले अपने मूल स्थान पर स्थापित करें। इससे हमारा संकल्प सौंद्रर्य भाव में स्थित हो जायेगा तो जीवन के धारा भी उसी में प्रवाहित होगी।

समय समय  पर आत्ममंथन करें कि  कहीं हमारे अंदर किसी के प्रति विद्वेष या घृणा का भाव तो नहीं आ रहा? हम दूसरों के अनिष्ट पर प्रसन्न तो नहीं हो रहे? हम दूसरो के गुणों की बजाय उसमें दोषों पर तो ध्यान नहीं दे रहे?
नकारात्मक विचारों से हमें दूर रहने का अभ्यास इस तरह करना चाहिये कि कभी किसी के लिये विद्वेष, घृणा या निंदा का भाव नहीं आये। हमें दूसरों की उन्नति, उत्थान और सुख की कल्पना करना चाहिये। हम अकेले इस संसार का भाग नहीं होते। इतना ही नहीं हम जिन सुविधाओं का उपयोग करते हैं वह भी समूह में मिलती हैं। सूर्य की उष्मा, चंद्रमा की शीतलता और बादलों का अमृत सभी के लिये बरसता है। हम किसी दूसरे के खेत पर अकाल या बाढ़ की कामना नहीं कर सकते क्योंकि प्रकृति ने हमें समूह में बांधा है।  हम पड़ौसी के घर पर संकट की कामना नहीं कर सकते क्योंकि वह हमसे भी जुड़ा है। इसलिये हमें सर्वजन हिताय संकल्प रखन चाहिये। यही जीवन का अंतिम सत्य है। इसे हम तत्वज्ञान भी कह सकते हैं।
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Saturday, March 21, 2015

संतोषी मनुष्य किसी की परवाह नहीं करता-भर्तृहरि नीति शतक के आधार पर चिंत्तन लेख(santoshi manushya kisi ki parvah nahin karta-A Hindu hindu religion thought based on bhartrihari neeti shatak)



            कहा जाता है कि संतोष सबसे बड़ा धन है पर आज हम जब समाज में इस सिद्धांत के आधार पर दृष्टि डालते हैं तो आभास होता है कि लोग माया की दृष्टि से अधिक धनी जरूर हो गये पर मानसिक रूप से बहुत दरिद्र हैं।  स्थिति यह है कि धन, पद और प्रतिष्ठा के अभाव से त्रस्त अनेक लोग आत्महत्या कर स्वयं को जीवन से मुक्ति दिला देते हैं।  नश्वर देह को समय से पहले ही नष्ट करना अने लोगों को  अच्छा लगने लगा है।
            हमारे एक मित्र ने एक किस्सा सुनाया जो  हमें अत्यंत रुचिकर लगा । वह मित्र अपनी धर्मपत्नी के साथ मंडी गये थे।  वहां उनका एक परिचित दूधिया अपनी साइकिल छायादार स्थान पर खड़ी कर गर्मी में बटी खा रहा था।  उसके पास आठ दस बटियां थीं। सभी जानते हैं कि गर्मी में बटियां खाने से पानी की कमी नहीं होती।  हमारे मित्र ने उस दूधिया से कहा-अरे, इतनी सारी बटियां जमा कर रखी हैं। सभी खाओगे या बचाकर घर ले जाओगे?’’
            उस दूधिया ने कहा कि-‘‘सभी खाऊंगा। मेरा घर यहां से सात  किलोमीटर दूर है। इस गर्मी में साइकिल चलाते हुए यही बटियां मेरे पेट में कूलर का काम करेंगी।’’
            हमारे मित्र ने उसकी आंखों में जो आत्मविश्वास देखा उससे वह आत्मविभोर हो गये।  उन्होंने अपनी पत्नी से कहा-‘‘पता नहीं यह गलतफहमी अनेक समाज सेवकों  को क्यों है कि गरीब और परिश्रमी लोग जीवन में मुश्किलों से हार जाते हैं। ऐस लोगों को देखो तो लगता है कि गरीब होना ही दुःख का प्रमाण नहीं है।  इस लड़के की आंखों में जो आत्मविश्वास था वह हम जैसे सभ्रांत वर्ग के बच्चों के पास कहां होता है? सबसे बड़ी बात यह कि गरीबों को भिखारी मानकर विचार नहीं करना चाहिए।’’

भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि

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वयमिह परितृष्टा वल्कलैस्त्वं दुकूलैस्सभ इह परितोषे निर्विशेषो विशेषः।

स तु भवतु दरिद्रो यस्य तृष्णा विशाला मनसि च परितुष्टे कोऽर्थवान् को दरिद्रः।।

            हिन्दी में भावार्थ-हे राजन्! हम पेड़ की छाल के वस्त्र पहनकर संतुष्ट हैं तो तुम रेशमी परिधान पहनकर प्रसन्न हो। संतोष तो हम दोनों को ही है तब विरोध वाली बात कहां है? इसमें विशेष कुछ नहीं है। दोनों ही संतुष्ट है तब अंतर नहीं है। मगर जो दरिद्र है पर जिसकी इच्छायें अधिक है उसका अगर मगर संतोष से भर जाये तो धनिक और दरिद्र में अंतर कहां रह जाता है।

            आधुनिक राज्यव्यवस्थाओं में पूरे विश्व के शिखर पुरुष हमेशा ही गरीबों के मसीहा होने का दावा करते हैं यह अलग बात है कि उनके प्रशासनिक तंत्र की नीतियां और कार्यशैली इसके विपरीत दिखती हैं।  गरीब, बेसहारा, बूढ़े, कमजोर तथा विकलांग की सेवा के नारे पूरे विश्व में लगते हैं।  तब ऐसा लगता है कि बस इस धरती पर देवता प्रकट होने वाले ही है।  ऐसा होता नहीं क्योंकि इस तरह के नारे लगाने वालों का उद्देश्य केवल प्रचार के माध्यम से अपना अर्थ साधने का होता है।  सभी गरीब भीख नहीं मांगते और श्रम से जीने वाले सभी लोग धनिक होने का सपना देखकर अपना समय भी नष्ट नहीं करते।  अभावों में जीने वाले जिंदा हैं तो संपन्न लोगों को अपनी रक्षा की चिंता खाये जाती है।
            इसलिये किसी गरीब को देखकर उस पर हंसना नहीं चाहिये और न ही अपनी संपन्नता के मद में रहकर जीवन बिताना चाहिये। जिसके पास मन का संतोष है वही सबसे बड़ा धनी है। बढ़त राजरोगों के बढ़़ते प्रभाव से तो यही निष्कर्ष निकलता है।


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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