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Sunday, July 4, 2010

हिन्दू धर्म संदेश-अधम पुरुषों से परे रहना ही अच्छा (adhma purushon se pare rahna hi shreshth-hindu dharma sandesh)

हमारे साथ व्यापार अथवा नौकरी के कारण अनेक लोग संपर्क में आते हैं। उनसे संबंध बनाना मज़बूरी होती है पर जहां किसी व्यक्ति के चाल चलन या आदतों में बुराई का आभास हो उससे औपाचारिकतावश ही संबंध रखना ही अच्छा है न कि उससे आत्मीयता या एकता दिखाकर अपने लिये संकट को आमंत्रण देना। एक बात तय है कि आदमी अपना स्वभाव आसानी से नहीं बदलता इसलिये अपने साथ संपर्क में रहने वाला व्यक्ति अगर अन्य लोगों के लिये संकट खड़ा करता है या दूसरों की निंदा करता है तो समझ लीजिये कि वह किसी दिन अपने मित्र को भी नहीं बख्शने वाला। अतः मनुस्मृति वर्णित इस संदेश का भाव का रहस्य समझते हुए ही अपने संबंध श्रेष्ठ मनुष्यों के साथ विकसित करना चाहिए।
उत्तमैरुत्तमैर्नित्यं संबंधनाचरेत्सह।
निनीषुः कुलमुत्कर्षमधमानधर्मास्त्यजेत्।
हिन्दी में भावार्थ-
अपने परिवार की रक्षा तथा सम्मान में वृद्धि के लिये अच्छे परिवारों के साथ अपनी कन्या और पुत्र के संबंध बनाने चाहिए। खराब आचरण तथा धर्म विरोधी पुरुषों के परिवारों के साथ किसी प्रकार का संबंध स्थापित करना ठीक नहीं है।
उत्तमानुत्तमान्गच्छन्हीनाश्च वर्जवन्।
ब्राम्हण श्रेष्ठतामेति प्रत्यावयेन शूद्रताम्।।
हिन्दी में भावार्थ-
श्रेष्ठ पुरुषों से संबंध जोड़ने और नीच तथा अधम पुरुषों से परे रहने वाले विद्वान की प्रतिष्ठा बढ़ जाती है। इसके विपरीत श्रेष्ठ लोगों की बजाय नीच पुरुषों से संबंध बनाने वाला मनुष्य और उसका कुल कलंकित हो जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-श्रेष्ठ व्यक्ति या परिवार के उच्च आचरण का पैमाना जाति, वर्ण, धन या भाषा नहीं वरन् चरित्र और व्यवहार है। आजकल तो मनुष्य जाति में जिस तरह पाखंड तथा ढोंग की प्रवृत्ति बढ़ गयी है ऐसे में किसी भी प्रकार के मैत्री या वैवाहिक संबंध सोच समझकर जोड़ना चाहिए। युवक युवतियां शैक्षणिक, व्यवसायिक तथा अन्य सार्वजनिक स्थानों पर एक दूसरे से मिलते हैं। लच्छेदार बातों से एक दूसरे पर प्रभाव डालकर संबंध बना देते हैं। कोई यह देखने का विचार भी नहीं करता कि सामने वाले का बौद्धिक, वैचारिक तथा चारित्रिक स्तर क्या है? इसलिये ही आजकल अधिकतर लोग मैत्री और प्यार में धोखे की शिकायत करते नज़र आते हैं। इतना ही नहीं माता पिता की उपेक्षा कर वैवाहिक जीवन साथी चुनने को लालायित युवक युवतियां जब बाद में निराश होते हैं तो आत्महत्या तक कर बैठते हैं। यौवन की अग्नि उनकी बौद्धिक सोच को कुंठित कर देते हैं और समझते हैं कि जैसे जीवन का पूरा अनुभव उनको हो गया है। वह माता पिता के अनुभव को पुराना समझकर उनकी उपेक्षा तो करते हैं पर उसके परिणाम कोई अच्छे नहीं रहते।
एक बात दूसरी भी है कि हमारे समाज के अनेक लोगों ने श्रेष्ठता का प्रमाण जाति, भाषा और आर्थिक स्तर मान लिया है जो कि गलत हैं। दरअसल जिस परिवार में उच्च विचार वाले लोग हैं वही श्रेष्ठ है। जिनका आचरण धार्मिक प्रवृत्ति का है वही श्रेष्ठ लोग हैं। मनोरंजन, विलासिता तथा श्रम बचाने वाले सुविधाभोगी साधनों का संचय करना ही उच्च कुल या व्यक्ति होने का प्रमाण नहीं है। न ही किसी जाति, भाषा या समूह का श्रेष्ठता पर एकाधिकार है। मुख्य विषय यह है कि वैवाहिक तथा मैत्री संबंध स्थापित करने से पहले अपने सामने वाली की बौद्धिक, वैचारिक, सामाजिक तथा चारित्रिक दृढ़ता को प्रमाणित कर लेना चाहिए। केवल चेहरा और पहनावा देखकर किसी को श्र्रेष्ठ मानकर उससे संबंध जोड़ना खतरनाक भी हो सकता है।
संकलक,लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Sunday, May 30, 2010

विदुर नीति-दुष्टों को अनदेखा करने से जनता नाराज होती है

साहसे वर्तमानं तु यो मर्षयति पार्थिवः।
सः विनाशं व्रजत्याशु विद्वेषं चाधिगच्छति।।
हिन्दी में भावार्थ-
यदि राज्य प्रमुख  दुस्साहस करने वाले व्यक्ति को क्षमा या उसे अनदेखा करता है तो उसका अतिशीघ्र विनाश हो जाता है क्योंकि तब प्रजा में उसके विद्वेष की भावना पैदा होती है।


न मित्रकारणाद्राजा विपुलाद्वाधनागमात्।
समुत्सुजोत्साहसिकान्सर्वभुतभयावहान्।।
हिन्दी में भावार्थ-
राज्य प्रमुख को चाहिये कि वह स्नेह या लालच मिलने पर भी प्रजा में भय उत्पन्न करने वाले अपराधियों को क्षमा न करे। 


वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-क्षमा जीवन का मूलमंत्र है पर एक परिवार, समाज और राज्य के मुखिया को कहीं न कहीं अपने आश्रितों को बचाने के लिये दंड का उपयोग करना ही पड़ता है।  अगर वह इस दंड का उपयोग नहीं करेगा तो उसके आश्रित या प्रजाजन उसे कायर मानकर घृणा करने लगते हैं।  कहा जाता है कि योगियों को क्षमाक्षील होना चाहिये पर हमारी प्राचीन कथायें इस बात का प्रमाण हैं कि समय आने पर वही कोमल भाव वाले योगी अपने भक्तों और शिष्यों के लिये उग्र रूप धारण करते हुए अपराधियों को दंडित करते हैं। 
जिस परिवार, समाज या राज्य का मुखिया  अपराधियों और हिंसक तत्वों को क्षमा करता है या उनकी अनदेखी में भलाई समझता है वह शीघ्र नष्ट हो जाता है। उसके समूह या राज्य के विरोधी उसके आश्रित या प्रजा को लक्ष्य नहीं करते बल्कि उनका लक्ष्य मुखिया ही होता है।  फिर उसके विरोधी आंतरिक विरोधियों को सबसे पहले मैदान में उतारते हैं इसलिये समझदार मुखिया को चाहिये कि वह अंतर्विरोधियों का समूल नाश करे।
ऐसे आंतरिक शत्रु जो प्रजा में भय करते हुए विचरते हैं उनकी अनदेखी करना खतरे से खाली नहीं है।  जिस परिवार, समाज, या राज्य का प्रमुख अपने आंतरिक खतरों की अनदेखी करता है वह कायर मान लिया जाता है और उसके आश्रित प्रजाजन ही उसका सम्मान नहीं करते। अहिंसा का सिद्धात केवल अपने निजी जीवन में लागू किया जा सकता है पर जहां सार्वजनिक विषय हो वहां दंड का उपयोग करना चाहिये अन्यथा परिवार, समाज तथा राज्य में असंतोष का परिणाम मुखिया को भोगना पड़ता है। राज्य या परिवार में उत्पाती तत्वों से सख्ती से निपटना ही एक सर्वश्रेष्ठ उपाय है। 

 

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Sunday, May 16, 2010

मनु स्मृति-दिल में बैठे देवता की अनदेखी न करें (dil ka devata-hindu dharma sandesh)

साक्ष्येऽनृतं वदन्याशैर्बध्यते वारुणैर्भृशम्।
विवशः शमाजातीस्तरस्मात्साक्ष्यं वदेदृतम्।।
हिन्दी में भावार्थ-
झूठी गवाही देने वाले मनुष्य, वरुण देवता के पाशों से बंधकर सैंकड़ों वर्षों तक जलोदर बीमारियों से ग्रसित जीवन गुजारता है। अतः हमेशा किसी के पक्ष में सच्ची गवाही ही देना चाहिये।
द्यौर्भूमिरापो हृदयं चंद्रर्काग्नि यमानिलाः।
रात्रिः सन्ध्ये च धर्मख्च वृत्तजाः सर्वदेहिनाम्।।
हिन्दी में भावार्थ-
मनु महाराज के अनुसार आकाश, पृथ्वी, पानी, हृदय, चंद्र, सूर्य, अग्नि, यम, वायु, रात संध्या और धर्म सभी प्राणियों के सत् असत् कर्मों को देखते हैं। इनको देवता ही समझना चाहिये।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-क्या हम सोचते हैं कि हम कोई भी काम कर रहे हैं तो दूसरा कोई उसे नहीं देख रहा? ऐसी गलती कभी न पालें। इस धरा पर ऐसे कई जीव विचरण कर रहे हैं जिनको हम नहीं देख पाते पर वह हमें देख रहे हैं। दूसरों की छोड़िये अपने अंदर के हृदय को ही कहां देख पाते हैं। यह हृदय भी देवता है पर उसे कहां समझ पाते हैं? वह लालायित रहता है धर्म और परोपकार का कार्य करने के लिये पर मनुष्य मन तो हमेशा अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर विचरण करता है। एक नहीं अनेक बार झूठ बोलते हैं। दूसरों की निंदा करने के लिये प्रवृत्त होने पर उसके लिये ऐसे किस्से गढ़ते हैं कि जो हम स्वयं जानते हैं कि वह सरासर झूठ है। मगर बोलते हैं यह मानते हुए कि कोई देख नहीं रहा है। उस समय हम अपने अन्दर बैठे आत्मा रुपी देवता को धोखा देते हैं।
आदमी एक के बाद एक झूठ बोलकर किसी के न देख पाने का भ्रम पालकर स्वयं को धोखा देता है। इस संसार  मने  चंद्रमा, सूर्य नारायण, प्रथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश के साथ हमारा हृदय देवता सब देख रहा है। समय आने पर यह देवता दंड भी देते हैं। अतः कोई भी अच्छा काम करते हुए इस बात की चिंता नहीं करना चाहिये कि कोई उसे देख नहीं रहा तो क्या?  उसका सुफल मिलेगा। उसी तरह  बुरा कर्म करते हुए इस बात से लापरवाह भी न हों कि कौन देख रहा है जो सजा मिलेगी?
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Wednesday, May 12, 2010

चाणक्य दर्शन-धैये हो तो धनाभाव संकट नहीं बनता (dhiraj hi dhan hai-chankya neeti)

दरिद्रता श्रीरतया विराजते कुवस्त्रता शुभ्रतया विराजते।
कदन्नता चोष्णतया विराजते कुरूपता शीतया विराजते।।
हिंदी में भावार्थ-
अगर मनुष्य में धीरज हो तो गरीबी की पीड़ा नहीं होती। घटिया वस्त्र धोया जाये तो वह भी पहनने योग्य हो जाता है। बुरा अन्न भी गरम होने पर स्वादिष्ट लगता है। शील स्वभाव हो तो कुरूप व्यक्ति भी सुंदर लगता है।
अधमा धनमिच्छन्ति मानं च मध्यमाः।
उत्तमा मानमिच्छन्ति मानो हि महतां धनम्।।
हिंदी में भावार्थ-
अधम प्रकृत्ति का मनुष्य केवल धन की कामना करता है जबकि मध्यम प्रकृत्ति के धन के साथ मान की तथा उत्तम पुरुष केवल मान की कामना करते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस विश्व में धन की बहुत महिमा दिखती है पर उसकी भी एक सीमा है। जिन लोगों के अपने चरित्र और व्यवहार में कमी है और उनको इसका आभास स्वयं ही होता है वही धन के पीछे भागते हैं क्योंकि उनको पता होता है कि वह स्वयं किसी के सहायक नहीं है इसलिये विपत्ति होने पर उनका भी कोई भी अन्य व्यक्ति धन के बिना सहायक नहीं होगा। कुछ लोग ऐसे होते हैं जो अपने ऊपर यकीन तो करते हैं पर फिर भी धन को शक्ति का एक बहुत बड़ा साधन मानते हैं। उत्तम और शक्तिशाली प्रकृत्ति के लोग जिन्हें अपने चरित्र और व्यवहार में विश्वास होता है वह कभी धन की परवाह नहीं करते।
धन होना न होना परिस्थितियों पर निर्भर होता है। यह लक्ष्मी तो चंचला है। जिनको तत्व ज्ञान है वह इसकी माया को जानते हैं। आज दूसरी जगह है तो कल हमारे पास भी आयेगी-यह सोचकर जो व्यक्ति धीरज धारण करते हैं उनके लिये धनाभाव कभी संकट का विषय नहीं रहता। जिस तरह पुराना और घटिया वस्त्र धोने के बाद भी स्वच्छ लगता है वैसे ही जिनका आचरण और व्यवहार शुद्ध है वह निर्धन होने पर भी सम्मान पाते हैं। पेट में भूख होने पर गरम खाना हमेशा ही स्वादिष्ट लगता है भले ही वह मनपसंद न हो। इसलिये मन और विचार की शीतलता होना आवश्यक है तभी समाज में सम्मान प्राप्त हो सकता है क्योंकि भले ही समाज अंधा होकर भौतिक उपलब्धियों की तरफ भाग रहा है पर अंततः उसे अपने लिये बुद्धिमानों, विद्वानों और चारित्रिक रूप से दृढ़ व्यक्तियों की सहायता आवश्यक लगती है। यह विचार करते हुए जो लोग धनाभाव होने के बावजूद अपने चरित्र, विचार और व्यवहार में कलुषिता नहीं आने देते वही उत्तम पुरुष हैं। ऐसे ही सज्जन पुरुष समाज में सभी लोगों द्वारा सम्मानित होते हैं।
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Tuesday, May 11, 2010

भर्तृहरि नीति शतक-राजाओं को कब तक प्रसन्न रखा जा सकता है

भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि
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दुरारध्याश्चामी तुरचलचित्ताः क्षितिभुजो वयं
तु स्थूलेच्छाः सुमहति बद्धमनसः
जरा देहं मृत्युरति दयितं जीवितमिदं
सखे नानयच्छ्रेयो जगति विदुषेऽन्यत्र तपसः।।
     हिंदी में भावार्थ- जिन राजाओं का मन घोड़े की तरह दौड़ता है उनको कोई कब तक प्रसन्न रख सकता है? हमारी अभिलाषाओं  और आकांक्षाओं  की तो कोई सीमा ही नहीं है। सभी के मन में अधिक धन, बड़ा पद तथा प्रतिष्ठत छवि  पाने की लालसा स्वाभाविक रूप से होती  है। इधर शरीर बुढ़ापे की तरह बढ़ रहा होता है। मृत्यु पीछे पड़ी हुई होती  है। इन सभी को देखते हुए तो यही कहा जा सकता है कि भक्ति और तप के अलावा को अन्य मार्ग ऐसा नहीं है जो हमारा कल्याण कर सके।
     वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-लोगों के मन में धन पाने की लालसा बहुत होती है और इसलिये वह धनिकों, उच्च पदस्थ एवं बाहुबली लोगों की और आशा भरी दृष्टि स ताकते हुए  उनकी चमचागिरी करने के लिये तैयार रहते हैं। उनकी चाटुकारिता में कोई कमी नहीं करते। चाटुकार लोगों  को यह आशा रहती है कि कथित ऊंचा आदमी उन पर रहम कर उनका कल्याण करेगा। यह केवल भ्रम है। जिनके पास वैभव है उनका मन भी हमारी तरह चंचल होता है और वह अपना काम निकालकर भूल जाते हैं या अगर कुछ देते हैं तो केवल चाटुकारिता  के कारण नहीं बल्कि कोई सेवा करा कर। वह भी जो प्रतिफल देते हैं तो वह भी न के बराबर। इस संसार में बहुत कम ऐसे लोग हैं जो धन, पद और प्रतिष्ठा प्राप्त कर उसके मद में डूबने से बच पाते हैं।  अधिकतर लोग तो अपनी शक्ति के अहंकार में अपने से छोटे आदमी को कीड़े मकौड़े जैसा समझने लगते हैं और उनकी चमचागिरी करने पर भी कोई लाभ नहीं होता।  अगर ऐसे लोगों की निंरतर सेवा की जाये तो भी सामान्य से कम प्रतिफल मिलता है।
      सच तो यह है कि आदमी का जीवन इसी तरह गुलामी करते हुए व्यर्थ चला जाता हैं। जो धनी है वह अहंकार में है और जो गरीब है वह केवल बड़े लोगों की ओर ताकता हुआ जीवन गुंजारता है। जिन लोगों का इस बात का ज्ञान है वह भक्ति और तप के पथ पर चलते हैं क्योंकि वही कल्याण का मार्ग है।इस संसार में प्रसन्नता से जीने का एक ही उपाय है कि अपने स्वाभिमान की रक्षा करते हुए ही जीवन भर चलते रहें।  अपने से बड़े आदमी की चाटुकारिता से लाभ की आशा करना अपने लिये निराशा पैदा करना है।
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Monday, May 10, 2010

संत कबीर के दोहे-कपटी कभी साधु नहीं बनते (kapti kabhi sadhu nahin hote-kabir ke dohe)

चाल बकुल की चलत हैं, बहुरि कहावैं हंस
ते मुक्ता कैसे चुंगे, पडे काल के फंस
संत शिरोमणि कबीरदास जीं कहते हैं कि जो लोग चाल तो बगुले की चलते हैं और अपने आपको हंस कहलाते हैं, भला ज्ञान के मोती कैसे चुन सकते हैं? वह तो काल के फंदे में ही फंसे रह जायेंगे। जो छल-कपट में लगे रहते हैं और जिनका खान-पान और रहन-सहन सात्विक नहीं है वह भला साधू रूपी हंस कैसे हो सकते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संसार में कुछ लोग अपनी बौद्धिक चालाकियों से दौलत, शौहरत और ऊंचे ओहदे का लक्ष्य प्राप्त करते हैं। ऐसे लोग तमाम तरह की किताबें पढ़कर उसमें लिखी बातें रट लेते हैं। उसके बाद सामान्य लोगों में उनका बखान करते हैं गोया कि कोई बहुत बड़े ज्ञानी हों पर सच तो यह है कि ऐसे लालची, लोभी तथा ढोंगी लोगा सम्मान लायक नहीं होते। मगर आज यह स्थिति है कि आधुनिक शिक्षा से गुलामी की मानसिकता प्राप्त कर चुका समाज अपने अध्यात्मिक ज्ञान के बारे में जानता नहीं है और वह ऐसे कथित ज्ञानियों के जाल में फंस जाता है। भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान अध्ययन, पठन तथा श्रवण में अत्यंत मधुर है पर पाश्चात्य जीवन शैली में लिप्त समाज के पास इतना समय नहीं है कि वह अपने पुराने ग्रंथों का अध्ययन करे जिसमें ज्ञान और विज्ञान का भारी खजाना भरा हुआ है। अतः सामान्य लोग कथित ज्ञानियों के मुख से श्रवण कर ही अपना काम चलाते हैं। कथित ज्ञानी केवल मधुर वाणी में उस ज्ञान का बखान करते हैं पर न तो उसका मर्म जानते हैं न उसे धारण करते हैं। समय आने पर उनकी पोल खुलती है पर फिर भी ढोंगियों का रथ नहीं रुकता। ऐसे लोग चाहे कितना भी प्रयास करें पर समाज में वह अधिक समय तक सम्मान प्राप्त नहंी करते। अगर करते भी हैं तो उनके बाद कोई याद यहां नहीं रह जाती।
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Thursday, May 6, 2010

संत कबीर दास के दोहे-गुरु के लिए अधिक संपत्ति जोड़ना खतरनाक (kabir ke dohe-sant aur sanpatti)

माया दासी संत की साकट की शिर ताज
साकुट की सिर मानिनी, संतो सहेली लाज
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि माया तो संतों के लिए दासी की तरह होती है पर अज्ञानियों का ताज बन जाती है। अज्ञानी लोग का माया संचालन करती है जबकि संतों के सामने उसका भाव विनम्र होता है।
गुरू का चेला बीष दे, जो गांठी होय दाम
पूत पिता को मारसी, ये माया के काम
संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते है। कि शिष्य अगर गुरू के पास अधिक संपत्ति देखते हैं तो उसे विष देकर मार डालते है। और पुत्र पिता की हत्या तक कर देता है।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-अगर देखा जाये तो पैसे की औकात केवल जेब तक ही रहती है जबकि अज्ञानी लोग इसे सदैव अपने सिर पर धारण किए रहती है।। वह बात-बात में अपने धनी होने का प्रमाणपत्र लेकर आ जाते हैं। अपनी तमाम प्रकार डींगें  हांकते है। परमार्थ से तो उनका दूर  दूर तक नाता नहीं होता। जो लोग ज्ञानी हैं वह जेब मैं पैसा है यह बात अपने दिमाग में लेकर नहीं घूमते। आवश्यकतानुसार उसमें से पैसा खर्च करते हैं पर उसकी चर्चा अधिक नहीं करते। आजकल जिसके भी घर जाओं वह अपने घर के फर्नीचर, टीवी, फ्रिज, वीडियो और कंप्यूटर दिखाकर उनका मूल्य बताना नही भूलता और इस तरह प्रदर्शन करता है जैसे कि केवल उसी के पास है अन्य किसी के पास नहीं। कहने का अभिप्राय है कि लोगों के सिर पर माया अपना प्रभाव इस कदर जमाये हुए है कि उनको केवल अपनी भौतिक उपलब्धि ही दिखती है।
लोग आपस में बैठकर अपने धन और आर्थिक उपलब्धियों पर ही चर्चा करते हैं। अगर कोई गौर करे और सही विश्लेषण करे तो लोग नब्बे फीसदी से अधिक केवल पैसे के मामलों पर ही चर्चा करते हैं। अध्यात्म चर्चा और सत्संग तो लोगों के लिए फ़ालतू कि चीज है । इसके विपरीत जो ज्ञानी और सत्संगी हैं वह कभी भी अपनी आर्थिक और भौतिक उपलब्धियों पर अहंकार नहीं करते। न ही अपने अमीर होने का अहसास सभी को कराते हैं।
वैसे जिस तरह आजकल धार्मिक संस्थानों में संपतियों को लेकर विवाद  और मारामारी मची है उसे देखते हुए यह आश्चर्य ही मानना चाहिये कि कबीरदास जी ने भी बहुत पहले ही ऐसा कोई  घटनाक्रम देखा होगा इसलिए ही चेताते हैं कि गुरुओं को अधिक संपति नहीं रखना चाहिये।  आजकल अनेक संत इस सन्देश कि उपेक्षा कर संपति संग्रह में लगे हुए हैं इसलिए ही विवादों में  भी घिरे रहते हैं।
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Tuesday, May 4, 2010

मनु दर्शन-आत्म नियंत्रित कार्य ही करें (atmanilantri kam karen-manu darshan in hindi)

सर्वे परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम्।
एतद्विद्यात्समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः।।
हिन्दी में भावार्थ-
जो कार्य दूसरे के अधीन है वह दुःखदायी होता है। जिस काम पर अपना पूरी तरह से नियंत्रण हो उसी से ही सुख मिलता है। यही सुख और दुःख का लक्षण है।
यत्कर्मकुर्वतोऽस्य स्यात्परितोषोऽन्तरात्मनः।
तत्प्रयतनेन कुर्वीत विपरीतं तु वर्जयेत्।
हिन्दी में भावार्थ-
जिस काम को करने से मन और अंतरात्मा को शांति मिलती हो वही करना चाहिए। जिससे इसके विपरीत स्थिति हो तो उस काम को त्याग देना चाहिए।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जब भी हमारे सामने कोई कार्य उपस्थित होता है तो उसके परिणामों, प्रकृति तथा स्वरूप पर अवश्य विचार करना चाहिए। कभी कोई कार्य दबाव या परप्रेरणा से नहीं करना चाहिऐ। इसके अलावा जो कार्य पूरे या आंशिक रूप से दूसरे पर निर्भर हो उसे अपने हाथ में न लें तो ही अच्छा। क्योंकि तब लक्ष्य की प्राप्ति दूसरे की गतिविधि पर निर्भर हो जाती है। अनेक बार ऐसा भी होता है कि दूसरा आदमी अगर अंदर ही अंदर द्वेष रखता है तो वह जानबूझकर उस काम का अपना पूरा या आंशिक दायित्व नहीं निभाता तब अपना लक्ष्य या अभियान संकट में पड़ जाता है।
इसके अलावा किसी भी कार्य को करते हुए इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि उससे अपने मन और अंतरात्मा को संतोष मिलेगा या नहीं। जिस काम को करने से मन और अंतरात्मा में क्लेश होता हो उससे करने का विचार ही छोड़ दें तो ही अच्छा होगा। कहने का अभिप्राय यह है कि अपने हाथ से किये जाने वाले कार्यों पर विचार करना चाहिए ताकि उनके परिणामों को लेकर बाद में पछताना न पड़े। बुद्धिमान व्यक्ति किसी भी काम को करने से पहले उसके हर पहलू पर विचार कर लेते हैं। बिना विचारे काम करने से उसका परिणाम प्राप्त नहीं होता कहीं कहीं वह बुरा भी निकलता है।
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संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Friday, April 30, 2010

रहीम संदेश-मनुष्य नाचता है कठपुतली की तरह (manushya kathputli hai-rahim sandesh)

ज्यों नाचत कठपूतरी, करम नचावत गात
अपने हाथ रहीम ज्यों, नहीं आपुने हाथ
कविवर रहीम कहते हैं कि जैसे नट कठपुतली को नचाता है वैसे ही मनुष्य को उसके कर्म नाच करने के लिऐ बाध्य करते हैं। जिन्हें हम अपने हाथ समझते हैं वह भी अपने नियंत्रण में नही होते हैं।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-जब हम  रहीम के दोहे देखते हैं तो सोचते हैं  कि इस संत ने जीभर कर जीवन का आनंद लिया होगा क्योंकि उन्होंने जीवन के रहस्यों को समझ लिया और भ्रमों से परे रही । किसी प्रकार के भ्रम में नहीं जीना ही मनुष्य की पहचान है और रहीम हमेशा सत्य के साथ जिये।  अज्ञानी लोग किस तरह भ्रम में जीवन गुजरते हैं   यह उनके दोहे पढ़कर समझा जा सकता है। सभी लोग और आपको कर्ता समझते है जबकि सभी जीवों का शरीर पांच तत्वों से बना वह पुतला है जिसमें तीन प्रकृतियां-मन, बुद्धि और अहंकार -अपना काम करती हैं। आंख है तो देखेगी, कान है तो सुनेंगे, नाक है तो सूंघेगी, पांव है तो चलेंगे और हाथ हैं तो हिलेंगे। मन विचार करता है, बुद्धि योजना बनाती है और अहंकार उकसाता है। हम सोचते हैं कि हम करते हैं जबकि हम तो एक तरह से सोये हुए हैं। अपने आपको देखते ही नहीं। हमारी आत्मा तो परमार्थ से प्रसन्न होती है पर हम अपने कर्मों के अधीन होकर स्वार्थ में लगे रहते हैं जबकि यह काम तो हमारी इंद्रियां तब भी करेंगी जब इन पर नियंत्रण करेंगे। मतलब हम जो कर रहे हैं वह तो करेंगे ही पर जो हमें करना चाहिए परमार्थ वह करते नहीं। सत्संग और भक्ति केवल दिखावे की करते है। कुल मिलाकर कठपुतली की तरह नाचते रहते हैं।
हमने काम, क्रोध,.मोह, लोभ, तथा अहंकार का भाव नाचता है पर हम सोचते हैं कि हम अपने विवेक से चल रहे हैं। आवश्यकताओं की पूर्ति तथा भौतिक संपन्नता को जीवन का ध्येय बना लेते  हैं।
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Tuesday, April 27, 2010

रहीम संदेश-समय कभी एक जैसा नहीं रहता (samay ms saman nahit rahta-rahim ke dohe)

समय पाय फल होत है, समय पाय झरि जाय
सदा रहे नहिं एक सौ, का रहीम पछिताय
कविवर रहीम कहते हैं कि समय आने पर अपने अच्छे कर्मों के फल की प्राप्ति अवश्य होती है। वह सदा कभी एक जैसा नहीं रहता इसीलिये कभी बुरा समय आता है तो भयभीत या परेशान होने की आवश्यकता नहीं है।
समय परे ओछे बचन, सब के सहे रहीम
सभा दुसासन पट गहे, गदा लिए रहे भीम
कविवर रहीम कहते हैं कि बुरा समय आने पर तुच्छ और नीच वचनों का सहना करना पड़ा। जैसे भरी सभा में देशासन ने द्रोपदी का चीर हरण किया और शक्तिशाली भीम अपनी गदा हाथ में लिए रहे पर द्रोपदी की रक्षा नहीं कर सके।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-जीवन में सभी के पास कभी न कभी अच्छा समय आता है ऐसे में अपना काम करते रहने के अलावा और कोई चारा नहीं है। आजकल लोग जीवन में बहुत जल्दी सफलता हासिल करने को बहुत आतुर रहते हैं और कुछ को मिल भी जाती है पर सभी के लिये यह संभव नहीं है।
कई लोग जल्दी सफलता हासिल करने के लिये ऐसे मार्ग पर चले जाते हैं वहां उन्हें शुरूआत में बहुत अच्छा लगता है पर बाद में वह पछताते है।
यह सही है कि कुछ लोगों के लिये जीवन का संघर्ष बहुत लंबा होता है पर उन्हें अपना धीरज नहीं खोना चाहिए। कई बार ऐसा लगता है कि हमें जीवन में किसी क्षेत्र मे सफलता नहीं मिलेगी पर सत्य तो यह है कि आदमी को अपने अच्छे कर्मों का फल एक दिन अवश्य मिलता है।
जिस तरह दिन रात हैं और धूप छांव है वैसे ही जीवन में समय का फेर आता है। कभी दुःख तो कभी सुख की अनुभूति के साथ ही जीवन आगे बढ़ता है। जब आदमी तकलीफ में होता है तो संसार वाले उसका मजाक बनाते हुए कटु वचन तक कहते हैं। जब आदमी शक्तिशाली होता है तब सभी उसके सामने नतमस्तक होते हैं। ऐसे में जीवन में आये हर पल को सहजता से स्वीकार करना चाहिए।
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Saturday, April 24, 2010

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-भंवरा मरने के लिये ही हाथी के कान में ध्वनि करता है (hathi aur bhavra-kautilya darshan)

कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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स्निग्धदीपशिखालोकविलेभितक्लिचनः।
मृत्युमृच्छत्य सन्देहात् पतंगः सहसा पतन्।।

     हिन्दी में भावार्थ-दीपक की स्निग्ध शिखा के दर्शन से जिस पतंगे के नेत्र ललचा जाते हैं और वह उसमें जलकर जान देता है। यह रूप का विषय है इसमें संदेह नहीं है।

गन्धलुब्धो मधुकरो दानासवपिपासया।
अभ्येत्य सुखसंजवारां गजकर्णझनज्झनाम्||

     हिन्दी में भावार्थ-गंध की वजह से लोभी हो चुका दान मद रूपी आसव पीने की इच्छा करने वाला भंवरा सुख का अनुभव कराने वाली झनझन ध्वनि हाथी के कान के समीप जाकर मरने के लिये ही करता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संसार में रहकर विषयों से परे तो रहा नहीं जा सकता। देह तथा मन की क्षुधायें इस बात के लिये बाध्य करती हैं जीवन में निरंतर सक्रिय रहा जाये। विषयों से परे नहीं रहा जा सकता पर उनमें आसक्ति स्थापित करना अपने लिये ही कष्टकारक होता है। यही आसक्ति मतिभ्रष्ट कर देती है और मनुष्य गलत काम कर बैठता है।
सच बात यह है कि पेट देने वाले ने उसमें पड़ने वाले अन्न की रचना भी कर दी है पर मनुष्य का यह भ्रम है कि वह इस संसार के प्राणियों द्वारा ही दिया जा रहा है। जो ज्ञानी लोग दृष्टा की तरह इस जीवन को देखते हैं वह विषयों से लिपटे नहीं रहते। कथित रूप से अनेक संत मनुष्यों को विषयों से परे रहने का उपदेश जरूर देते हैं पर स्वयं भी उससे मुक्त नहीं हो पाते। दरअसल विषयों से दूर रहने की आवश्यकता नहंी बल्कि उनमें लिप्त नहीं होना चाहिये। अज्ञानी लोग आसक्ति वश ऐसे काम करते हैं जिनमें उनकी स्वयं की हानि होती है। धनी, बाहूबली, तथा उच्च पदारूढ़ लोगों के पास जाकर चाटुकारिता इस भाव से करते हैं जैसे कि कोई उन पर मुफ्त में कुपा करेगा। नतीजा यह होता है कि उनके हाथ निराशा हाथ लगती है और कभी कभी तो अपमानित भी होना पड़ता है।
      इस संसार में सुंदर दिखने वाली हर चीज एक दिन पुरानी पड़ जाती है। सुखसुविधाओं के साधन चाहे जितने जुटा लो एक दिन कबाड़ में बदल जाते हैं। अलबत्ता यह साधन मनुष्य को आलसी बना देते हैं जो समय आने पर मनुष्य को तब शत्रु लगता है जब विपत्ति आती है क्योंकि उनका सामना करने का सामर्थ्य नहीं रह जाता। अतः जीवन की इन सच्चाईयों को समझते हुए एक दृष्टा की तरह समय बिताना चाहिये।संकलक,लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior http://anant-shabd.blogspot.com
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Friday, April 16, 2010

मनुस्मृति-जुआ और सट्टा राष्ट्र में डकैती के समान (juaa aur satta desh ke liye bura-manu smruti)

प्रकाशमेतत्तास्कर्य यद्देवनसुराहृयौ।
तयोर्नित्यं प्रतीवाते नृपतिर्यत्नवान्भवेत्।।
हिन्दी में भावार्थ-
द्युत और समाहृय (जुआ और सट्टा)दिनदहाड़े डकैती के समान माने जाने चाहिए। यह देवता और असुर दोनों का विनाश कर देते हैं। अतः राज्य को इन पर रोक लगाने का प्रयास करना चाहिए।
एते राष्ट्रे वर्तमाना राज्ञः प्रच्छन्नतस्कराः।
विकर्म क्रियवानित्य वाधन्ते भद्रिकाः प्रजाः।
हिन्दी में भावार्थ-
जुआ तथा सट्टे में लोग राज्य के लिये एक तरह से प्रच्छन्न डाकू की तरह होते हैं। इससे खिलाड़ियों में शत्रुता बढ़ती है। अतः विवेकवान लोगो को ऐसे खेलों से दूर रहना चाहिए जिसमे जुआ या सट्टा खेला जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-पश्चिम की आधुनिक सभ्यता को शायद यहां लाया ही इसलिये आ गया है कि यहां की प्राचीन संस्कृति, संस्कार तथा राजकीय नीति को विलोपित कर असुरों का राज्य कायम किया जाये। पश्चिम के अनेक देशों में जुआ और सट्टा वैध माना जाता है। इतना ही नहीं अनेक शहर तो अपने जुआघरों के कारण ही विश्व में लोकप्रिय हैं। इससे पूंजीपति वर्ग आसानी से पैसा कमाता है। यही कारण है कि धीरे धीरे भारत के प्राचीन ग्रंथों के संदेशों को अप्रासंगिक कहकर उनको आम शिक्षा से बाहर कर दिया गया। विदेशों की विचारधारायें यह लायी गयी जो कि मनुष्य में आत्म नियंत्रण पैदा करने की बजाय उसे डंडे के जोर पर नियंत्रित करने की प्रवर्तक हैं। राज्य के लिये वैचारिक स्वरूप कैसा भी हो पर उसमें ईमानदारी का कोई स्थान नहीं रह गया है। ऐसा लगता है कि विदेशी आक्रांता यहां पहले चरित्र को तहस नहस कर यहां के लोगों का आर्थिक दोहन करने के लिये ऐसे विचारक लाये जो आम आदमी को केवल हाथ उठाकर भगवान की तरफ ताकने के लिये प्रेरित करे रहे और समाज सुधार और कल्याण का जिम्मा राज्य पर छोड़ दिया। कहने को तो कहते हैं कि मुगल और अंग्रेज यहां पर आधुनिक सभ्यता लाये पर सच यह है कि इनके आने के बाद इस देश में शोषण, जुआ तथा हिंसा की मनोवृत्ति बढ़ी है क्योंकि उसके बाद ही भारत के प्राचीन ग्रंथों से यहां के लोगों के विरक्त करने की योजनायें बनीं
आजकल तो हालत यह है कि अनेक खेलों में सट्टे का बोलाबाला हो गया है। टेनिस, फुटबाल, कार रेस, घुड़दौड़, कुश्ती तथा क्रिकेट में अनेक बार सट्टे की बात सुनाई देती है। अनेक विदेशी खिलाड़ी तो स्वयं ही सट्टा चलाने वाली कंपनियों से जुड़े हैं। हैरानी की बात यह है कि भारत में उनकी पैठ हो गयी है। जुआ और सटटे के लिये मनुस्मृति में कठोर प्रावधान है और शायद इसलिये ही इसके कुछ विवादास्पद श्लोक(कुछ लोग मानते हैं कि वह मनु द्वारा रचित नहीं है) रटकर सुनाये जाते हैं कि उसमें महिलाओं, दलितों तथा अन्य कमजोर वर्गों के लिये अपमान भरा पड़ा है ताकि लोग इसे पढ़कर यह न समझें कि जुआ और सट्टा कितने बड़े अपराध है। आधुनिक शिक्षा के बाद जिस तरह भारत में अपराध बढ़े हैं उससे तो यही लगता है कि उसको जारी रखने के लिये वह वर्ग प्रयत्नशील है जो बुरे धंधों में लिप्त रहकर आसानी से पैसा कमाना चाहता है। सट्टा और जुआ को डकैती जैसा जुर्म माना गया है पर पाश्चात्य सभ्यता को अंगीकार कर चुका हमारा समाज उसे एक फैशन मानकर उसके दुष्परिणामों से अनभिज्ञ हो गया है।
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Wednesday, April 14, 2010

मनुस्मृति-धर्म की हत्या करने वाले का नाश होता है

धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नोधर्मोहतोऽवधीत्।।
हिन्दी में भावार्थ-
जो मनुष्य धर्म की हत्या करता है, धर्म उसका नाश करता है। इसलिये धर्म की रक्षा करना चाहिए ताकि हमारी रक्षा हो सके।
यद्राष्टं शूद्रभूयिष्ठं नास्तिकाक्रान्मद्धजम्।
विनश्यत्याशु तत्कृत्प्नं दुर्भिक्षव्याधिपीडितम्।।
हिन्दी में भावार्थ-
जिस राज्य में आस्तिक विद्वानों के स्थान पर निम्न कोटि तथा नास्तिक लोगों की अधिकता के साथ उनका प्रभाव होता है वह शीघ्र ही भुखमरी तथा रोग आदि जैसी प्राकृतिक विपत्तियों का शिकार हो जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- धर्म की नाम से कोई पहचान नहीं है, बल्कि उसका आधार कर्म समूह है। अपना कर्म करते हुए परमात्मा की भक्ति निष्काम भाव से करना, गरीब, मजदूर तथा लाचार के प्रति सम्मान का भाव रखना, किसी भी काम को छोटा नहीं समझना, दूसरों पर निष्प्रयोजन दया करना तथा अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण करते हुए जीवन व्यतीत करना वह लक्षण है जो धर्म के कर्मसमूह का मुख्य भाग है।
जो मनुष्य लोभ, लालच, क्रोध तथा अहंकार वश दूसरे व्यक्ति को कष्ट पहुंचाता है उसे अंततः उसका दुष्परिणाम भोगना पड़ता है। कहने का अभिप्राय यह है कि अगर हम सत्कर्म करते हुए अपना धर्म निभायेंगे तो वह हमारी रक्षा करेगा। इसके विपरीत अधर्म का मार्ग पकड़ेंगे तो वह तबाही की तरफ ले जायेगा। कहा जाता है कि ‘जैसी करनी वैसी भरनी’ यह वाक्य धर्म का मूल मंत्र है तो अधर्म का भी। अगर सत्कर्म करेंगे तो वह धर्म होगा जिसका परिणाम अच्छा होगा और अगर दुष्कर्म करेंगे तो वह अधम्र है जिसकी सजा भी जरूर मिलेगी।
जिस समाज या राष्ट्र में धार्मिक विद्वानों को संरक्षण नहीं मिलता वहां लालची, लोभी तथा अहंकारी लोग अपना नियंत्रण कायम कर लेते हैं। नास्तिक लोग अपनी ताकत वहां दिखाते हैं। एक तरफ नास्तिक दुनियां में भगवान के न होने की बात करते हैं तो दूसरी तरफ वह कथित रूप से गरीब तथा बेबस लोगों के हित की बात करते हैं। उनका लक्ष्य इस आड़ में अपना प्रभाव करने के अलावा अन्य कुछ नहीं होता। जब वह भगवान को नहीं मानते तो फिर किसको खुश करने के लिये किसी भी प्रकार का सत्कर्म करते हैं। तय बात है कि उनका लक्ष्य केवल शक्ति प्राप्त कर उसका दुरुपयोग करना ही होता है। जहां धर्मज्ञ तथा सत्पुरुषों को हतोत्साहित कर अच्छे काम करने से उनको उन्मुख किया जाता है वहां नास्तिक लोग समाज हित का दिखावा करते हुए नियंत्रण कायम कर लेते हैं और फिर उनसे जीतना कठिन हो जाता है।
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Monday, April 12, 2010

भर्तृहरि शतक-जब तक काम का हमला न हो तभी तक रहती है सज्जनता (sex and religion-hindi sandesh)

संसार! तव पर्यन्तपदवी न दवीयसी।
अन्तरा दुस्तराः न स्युर्यदि ते मदिरेक्षणा।।
हिन्दी में भावार्थ-
यहां भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि ‘ओ संसार, तुझे पार पाना कोई कठिन काम नहीं था अगर मदिरा से भरी आखों में न देखा होता।
तावन्महत्तवं पाण्डितयं केलीनत्वं विवेकता।
यावज्जवलति नांगेषु हतः पंचेषु पावकः।।
हिन्दी में भावार्थ-
किसी भी मनुष्य में सज्जनता, कुलीनता, तथा विवेक का भाव तभी तक रहता है जब उसके हृदय में कामदेव की ज्वाला नहीं धधकी होती। कामदेव का हमला होने पर पर सारे अच्छे भाव नष्ट हो जाते है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-श्रीमद्भागवत गीता में लिखा हुआ है कि ‘गुण ही गुणों में बरतते है।’ इस सूत्र में बहुत बड़ा विज्ञान दर्शन अंतर्निहित हैं। इस संसार में जितने भी देहधारी जीव हैं सभी को रोटी और काम की भूख का भाव घेरे रहता है अलबत्ता पशु पक्षी कभी इसे छिपाते नहीं पर मनुष्यों में कुछ लोग अपने को सचरित्र दिखने के लिये अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण का झूठा दावा करते है। सच तो यह है कि पंचतत्वों से बनी इस देह मे तन और मन दोनों प्रकार की भूख लगती है। भूख चाहे रोटी की हो या कामवासना की चरम पर आने पर मनुष्य की बुद्धि और विवेक को नष्ट कर देती है। मनुष्य चाहे या नहीं उसे अपनी भूख को शांत रखने का प्रयास करना पड़ता है। जो लोग दिखावा नहंी करते वह तो सामान्य रूप से रहते हैं पर जिनको इंद्रिय विेजेता दिखना है वह ढेर सार नाटकबाजी करते हैं। देखा यह गया है कि ऐसे ही नाटकबाज धर्म के व्यापार में अधिक लिप्त हैं और उन पर ही यौन शोषण के आरोप लगते हैं क्योंकि वह स्वयं को सिद्ध दिखाने के लिये छिपकर अपनी भूख मिटाने का प्रयास करते हैं और अंतत: उनका रास्ता अपराध की ओर जाता है।
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Saturday, April 10, 2010

मनुस्मृति-क्रोध आने पर भी डंडा न उठायें (manu smriti-krodh par kabu rakhen)

परस्यं दण्डं नोद्यच्छेत्क्रुद्धोनैनं।
अन्यत्र पुत्राच्छिष्याद्वा शिष्टयर्थ ताडयेत्तु तौ।।
हिन्दी में भावार्थ-
कभी क्रोध भी आये तब भी किसी अन्य मनुष्य को मारने के लिये डंडा नहीं उठाना चाहिये। मनुष्य केवल अपने पुत्र या शिष्य को ही पीटने का हक रखता है।
ताडयित्त्वा तृपोनापि संरम्भान्मतिपूर्वकम्।
एकविंशतिमाजातोः पापयेनिषु जायसे।।
हिन्दी में भावार्थ-
अपनी जाग्रतावस्था में जो व्यक्ति अपने गुरु या आचार्य को तिनका भी मारता है तो वह इक्कीस बार पाप योनियों में जन्म लेता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-क्रोध मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। अनेक बार यह क्रोध इतना बढ़ जाता है कि मनुष्य स्वयं ही अपने अपराधी को दंड देने के लिये तैयार हो जाता है। यह अपराध है। किसी भी मनुष्य को दंड देने का अधिकार केवल राज्य के पास है। मनुष्य केवल अपने शिष्य या पुत्र को पीट सकता है। अन्य व्यक्ति को सजा दिलाने के लिये उसे राज्य या अदालत की शरण लेना चाहिए। दूसरी बात यह है कि किसी भी व्यक्ति से वाद विवाद होने पर अपने पास कोई अस्त्र या शस्त्र नहीं रखना चाहिये क्योंकि जब क्रोध आता है तब उसकी उपस्थिति के कारण वह अपना विवेक खो बैठता है। मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि जब आदमी के पास अन्य पर प्रहार करने वाली कोई वस्तु होती है तो वह क्रोध आने पर उसका उपयोग कर ही बैठता है। अगर वह अपने पास वैसी वस्तु ही न रखे तो वह स्वयं ही एक ऐसे अपराध से बच जाता है जिसके करने पर बाद में पछतावा होता है।
अगर हम अपने आसपास हो रही हिंसक घटनाओं को देखें तो वह होती इसी कारण है क्योंकि मनुष्यों के पास हथियार होता है और उनका उपयोग अनावश्यक रूप से हो जाता है जबकि मामला शांति से भी सुलझ सकता था। अतः दूसरे व्यक्ति पर क्रोध होने पर अपने पास डंडा या हथियार होने पर भी उसके उपयोग से बचना चाहिए।
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Friday, April 9, 2010

मनुस्मृति-वेदों की निंदा न करें (ved ninda n karen-manu smruti in hindi)

नास्तिक्यं वेदनिंदा च देवतानां च कुत्सनम्।
द्वेषं दम्भं च मानं च क्रोधं तैक्ष्ण्यं च वर्जयेत्।
हिन्दी में भावार्थ-
भगवान के अस्तित्व पर अविश्वास, वेदों की निंदा, देवताओं का अपमान, अन्य लोगों से शत्रुता तथा विरोध रखना, पाखंड, अहंकार, क्रोध तथा स्वभाव में उग्रता होना ऐसे दोष हैं जिनका त्याग करना ही श्रेयस्कर है।
न पाणिपादचपलो नेत्रचपलोऽनृजुः।
न स्वाद्वाक्वंपलश्चैव न परद्रोहकर्मधीः।।
हिन्दी में भावार्थ-
अपने शरीर और आंखों को अकारण नहीं मटकाना चाहिये। स्वभाव से कुटिल तथा दूसरों की निंदा करने वाला भी नहीं बनना चाहिये।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हमारे देश में कुछ लोगों को केवल इसलिये ही प्रसिद्धि मिली है क्योंकि वह वेदों की निंदा करते हैं। इससे भी अधिक यह बात कि करते हो वह सभी धाार्मिक विचाराधाराओं के सम्मान की बात पर भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों-खासतौर से वेद-की आलोचना करने के अलावा उनको कोई काम नहीं है। विदेशों में पनपी धार्मिक विचाराधाराओं की आलोचना में उनको घबड़ाहट होती है और तब वह सभी धार्मिक विचाराधाराओं के सम्मान का नारा लगाकर बचकर निकल लेते हैं। यह हमारे समाज की कमजोरी है कि यहां निंदा और स्तुति में ही लोग अपना समय खराब करते हैं। एक तो वह है जो स्वयं करते हैं दूसरे वह लोग हैं जो स्वयं ही इन कार्यों में लिप्त हो जाते हैं।
मुख्य बात यह है कि आप किसी भी धार्मिक विचारा धारा को माने या सभी को अस्वीकार कर दें पर आपको किसी के ग्रंथ पर टीका टिप्पणियां नहीं  करना चाहिए। उसी तरह किसी के इष्ट का मजाक उड़ाना भी भारी पाप है। आप भगवान के किसी स्वरूप का न माने पर अपने आपको नास्तिक बताकर अपनी श्रेष्ठता न बघारें-यह पाखंड, अहंकार और मक्कारी की श्रेणी में आता है। संभव है कि किसी के सामने उसके इष्ट की आप निंदा करें तो उसे क्रोध में आकर अपमानित करे। तब आप भी क्रोध में आयेंगे।
सच बात तो यह है कि नास्तिकता तथा आस्तिकता का विचार अपने मन में रखने लायक है। दोनों ही स्थितियों में जब आप उसे बाहर व्यक्त करते हैं तो इसका आशय यह है कि आप अहंकार तथा पाखंड का शिकार हो रहे हैं। ऐसी बुराई को त्याग करना ही श्रेयस्कर है ताकि समाज में वैमनस्य न फैले। कहा भी जाता है कि धर्म एकदम निजी विषय है इसलिये उसके बारे में जो विचार है उनकी अभिव्यक्ति करना ढोंग करने जैसा ही है।
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Sunday, April 4, 2010

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-शत्रुओं पर दंड का प्रयोग अवश्य करें (kautilya darshan-shatru aur dand)

उत्साहदेशकालेस्तु संयुक्तः सुसहायवान्।
युधिष्ठिर इवात्यर्थ दण्डेनास्तन्रयेदरन्।।
हिन्दी में भावार्थ-
अपने अंदर उत्साह का निर्माण तथा देश काल का ज्ञान प्राप्त करते हुए बलवान युधिष्ठर के समान शत्रु को परास्त करें।
आत्मनः शक्तिमुदीक्ष्य दण्दमभ्यधिकं नयेत्।
एकाकी सत्वसंपन्नो रामः क्षत्रं पुराऽवधीत्।।
हिन्दी में भावार्थ-
अपनी शक्ति को देखते हुए दण्ड का प्रयोग अवश्य करना चाहिये। शक्ति संपन्न होने पर ही अकेले परशुराम ने इक्कीस बार क्षत्रियों को नष्ट किया था।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हर सामान्य मनुष्य शांति से जीवन बिताना चाहता है पर मनुष्यों मे भी कुछ तामस प्रवृत्ति के होते हैं जिनका दूसरे व्यक्ति को परेशान करने में मजा आता है। ऐसे दुष्टों का सामना जीवन में करना ही पड़ता है। आजकल पूरे विश्व में आतंकवाद और अन्य अपराध इसलिये फैल रहे हैं क्योंकि राजकाज से जुड़े व्यक्तियों में उनका सामना करने की इच्छा शक्ति नहीं है। अधिकतर देशों में आधुनिक लोकतंत्र है। राजशाही में कहा जाता था कि ‘यथा राजा तथा प्रजा’ पर आधुनिक लोकतंत्र में तो यह कहा जाना चाहिये कि ‘जैसी प्रजा वैसा ही राज्य’। एक तरफ हम कहते हैं कि भारत में अंग्रेजों की शिक्षा ऐसी रही जिससे यहां का आदमी कायर हो गया तो दूसरी तरफ हम देखते हैं कि इसी शिक्षा पद्धति को अपनाने वाले ब्रिटेन और अमेरिका में भी कोई अधिक अच्छी स्थिति नहीं है। सच बात तो यह है कि इस विश्व में खतरा दुष्टों की हिंसा से अधिक सज्जनों की कायरता के कारण बढ़ा है। लोग अपनी रक्षा के लिये न तो प्रारंभिक सतर्कता बरतते हैं और न ही चालाकी कर पाते हैं। दूसरी बात यह है कि दुष्टों के कमजोर होने के बावजूद उनके विरुद्ध कदम उठाने से घबड़ाते हैं।
यदि सभी यह चाहते हैं कि विश्व में शान्ति  का वर्चस्व रहे और लोग आजादी से सांस ले सकें तो दुष्टों का संहार तो करना ही पड़ेगा। उनके विरुद्ध कठोर कार्यवाही करना जरूरी है ताकि सज्जन लोगों में आत्म विश्वास आये। जो लोग राजकाज से जुड़े हैं उनको यह बात समझ लेना चाहिये कि दुष्ट व्यक्तियों या राष्ट्रों के विरुद्ध दंडात्मक कार्यवाही के बिना अपनी राज्य की प्रजा को सुखी नहीं रखा जा सकता और न ही उसका विश्वास मिल सकता है।
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Saturday, April 3, 2010

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-उपाय करने से सफलता मिलती है

सहस्त्रात्पृलुत्य दुष्टेभ्यो दुष्करं सम्पदर्ज्जनम्।
उपायेन पदं मूघर्िल् न्यस्यते मतहस्तिनाम्।।
हिन्दी में भावार्थ-
हजार दुष्टों पर आक्रमण कर भी संपत्ति प्राप्त करना कठिन है पर उपाय किया जाये तो मतवाले हाथी पर भी अपना पैर रखा जा सकता है।
वाळ्मानमयः खण्डं स्कन्धनैवापि कृन्तति।
तदल्पमपि धारावभ्दवतीप्सितसिद्धये।।
हिन्दी में भावार्थ-
कोई मनुष्य कंधे पर बोझा ले जाता है पर वह उसे नहीं काटता पर अगर वह धारवाले लोहे को छू भी ले तो खरोंच आ जाती है। इतना ही नहीं धारवाले से किसी की भी गर्दन काटी जा सकती है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या--जीवन संघर्ष में बहुत बार मनुष्य को अपने धीरज का परिचय देना होता है। किसी व्यक्ति से विवाद होने पर या कोई संकट सामने आने पर अपनी धीरज कभी नहीं खोना चाहिए। उतावले पन से अपना कार्य या अन्य के साथ व्यवहार करने पर हमेशा आशंका रहती है। बांहों की शक्ति की बजाय वैचारिक अभ्यास के आधार पर अपने कार्य का उपाय ढूंढना चाहिये। अगर सही ढंग से लादा जाये तो आदमी अपने कंधे पर पेड़ खींचकर ले जाता है पर अगर उसी पर बैठकर डालियां काटी जाये तो अपने गिरने का खतरा भी रहता है। किसी एक पेड़ की लकड़ी से इंसान को मारा भी जा सकता है पर जबकि किसी एक पूरे पेड़ को युक्ति पूर्वक घसीटा भी जा सकता है। कहने का अभिप्राय यह है कि किसी लक्ष्य या अभियान को पूर्ण करने के लिये आर्थिक, दैहिक तथा बौद्धिक शक्ति होेते हुए भी उसका योजना पूर्वक उपयोग करने पर ही सफलता मिल सकती है। जहां अतिआत्मविश्वास में सीधे अपना काम शुरु कर दिया वहां सफलता का दावा नहीं किया जा सकता। अतः अपने शिक्षा, व्यवसाय तथा रचनाकर्म के दौरान उत्तेजना अथवा जल्दबाजी से काम करने की बजाय योजना के साथ आगे बढ़ना चाहिए।
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Friday, April 2, 2010

चाणक्य नीति-विद्वान एकाग्रता से अपना काम स्वयं करते हैं (kam aur dhyan-chankya neeti)

इन्द्रियाणि च संयम्य बकवत् पण्डितो नरः
देशकालबलं ज्ञात्वा सर्वकायणि साधयेत्।।
हिन्दी में भावार्थ-
ज्ञानी मनुष्य को बगुले की तरह एकाग्रता के साथ अपने मन और इंद्रियों पर नियंत्रण करते हुए अपनी शक्ति के अनुसार ही अपना काम करना चाहिये।
प्रभूतं कार्यमल्पं वा यन्नरः कर्तुमिच्छति।
सर्वारम्भेण तत्कार्य सिंहादकं प्रचक्षते।।
हिन्दी में भावार्थ-
मनुष्य को चाहिये कि वह सिंह की तरह किसी कार्य को छोटा या बड़ा न मानकर अपनी पूरी शक्ति से अपना दायित्व संपन्न करे।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-वैसे तो किसी भी चालाक या धूर्त व्यक्ति को बगुला भगत कहकर उसका अपमान किया जाता है। बगुले को धूर्तता का प्रतीक भी माना जा सकता है, पर लक्ष्य की प्राप्ति के लिये उसकी एकाग्रता और धीरज का गुण मनुष्य को अपनाना चाहिये। समय बलवान है इसलिये हर मनुष्य को अपने संक्रमण काल में भी पथभ्रष्ट न होते हुए अपना धैर्य बनाये रखना चाहिये। लक्ष्य पवित्र हो और उस पर से अपनी दृष्टि तब तक न हटायें जब तक वह प्राप्त न हो जाये। आजकल संक्षिप्त मार्ग अपनाने की जो प्रवृत्ति निर्मित होती है वह आत्मघाती है और उससे कोई बड़ी सफलता नहीं मिल पाती।
उसी तरह किसी काम को छोटा या निम्न कोटि का नहीं समझना चाहिये। इतना ही नहीं किसी भी प्रकार के श्रम करने वाले व्यक्ति को भी छोटा नहीं मानना चाहिये। सिंह तो सिंह है पर वह हर काम स्वयं ही करता है। किसी का झूठा नहीं खाता-उसके बारे में कहा जाता है कि वह अपना शिकार कर ही भोजन खाता है। उसी तरह हर मनुष्य को चाहिये कि वह अपना काम स्वयं करे। सच बात तो यह है कि स्वयं काम करने से जीवन में आत्मविश्वास बढ़ता है। जो व्यक्ति श्रम से बचते हैं वह धीरे धीरे भय तथा कुंठा का शिकार हो जाते हैं।
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Thursday, April 1, 2010

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-विष के प्रतिदिन दर्शन से मन कलुषित होता है (hindi adhyamik gyan sandesh-vish darshan)

चकोरस्य विरज्येत नयने विषदर्शनात्।
सुव्यक्तं माघति क्रोंचो प्रियते कोकिलः किल।
हिन्दी में भावार्थ-
विष को देखने मात्र से चकोर पक्षी की आंख लाल हो जाती है और कोकिल तो मृत्यु के गाल में ही समाज जाता है।
नित्यं जीवस्य च ग्लानिर्जायते विषदर्शनात्।
एषामन्यतमेनापि समश्नीयत्परीक्षितम्।
हिन्दी में भावार्थ-
प्रतिदिन विष को देखने से ही मन में ग्लानि हो जाती है इसलिये इनके सहयोग से भोजन की परीक्षा करें।
वर्तमानं संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-कौटिल्य का अर्थशास्त्र राजाओं के लिये लिखा गया है पर एक बात याद रखने लायक है कि हमारे प्राचीन ग्रंथों में व्यंजना विद्या में ही विषय प्रस्तुत किया जाता है जिससे हर वर्ग के मनुष्य के लिये उसका कोई न कोई अर्थ निकले। उनके राजा और प्रजा के लिये समान अर्थ हैं पर उनका भाव प्रथक हो सकता है। हर मनुष्य कहीं न कहीं राजा या प्रमुख पद पर प्रतिष्ठत होता है। आखिर परिवार भी तो राज्य की तरह चलते हैं। यहां कौटिल्य महाराज के विष को अन्य विषयों के साथ व्यापक रूप में लेना चाहिये।
यह विष खाने के साथ अन्य सांसरिक विषयों से संबंधित भी है। कुछ विषय विष प्रदान करते हैं-जैसे परनिंदा, ईर्ष्या तथा दूसरे का दुःख देकर मन में हंसना। कुछ ऐसे स्थान भी होते हैं जहां जाकर हमारा मन खराब होता है। उसी तरह कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिनसे मिलने पर हमारे अंदर विकार पैदा होते हैं जिससे दुष्कर्म करने की प्रेरणा आती है। कहने का अभिप्राय यह है कि मन में विष पैदा करने वाले विषयों से संपर्क नहीं रखना चाहिये।
इसलिये समय समय पर आत्म मंथन अवश्य करते हुए यह देखना चाहिये कि कौनसे व्यक्ति, विषय या स्थान हमारी मनस्थिति को डांवाडोल करते हैं। जहां तक हो सके उनसे दूर रहें। प्रतिदिन उनसे संपर्क रखने से न केवल अपना मन कलुषित होता है जिससे जीवन में आचरण में कलुषिता आती है और जो अंततः कर्ता के लिये ही संकट का कारण बनती है। जहां मन में प्रसन्नता रूपी अमृत मिलता हो वहीं जाना चाहिये। जिससे हृदय में पवित्रता, निर्मलता तथा दृढ़ता का भाव बना रहे उन्हीं विषयों की संगति करना ही उचित है। जिनसे विष का अनुभव हो उनसे दूर रहना ही अच्छा है।
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