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Wednesday, April 20, 2011

ज्ञानियों में बैठकर टूट जाता है भ्रम-हिन्दू धार्मिक चिंत्तन (gyan aur bhram-hindu dharmik chittan)

अगर हम शिक्षा या अध्यात्मिक ज्ञान से संबंधित किताबें पढ़कर यह सोचें कि कोई भारी ज्ञानी बन गये हैं तो यह हमारी ही मूर्खता का प्रमाण होता है। उसी तरह जब कोई कथित ज्ञानी इन्हीं किताबों से रटा रटाया ज्ञान हमारे सामने उसे बघारता है तो समझ लेना भी मूर्खता है कि वह कोई भारी ज्ञानी है। इसके अलावा अगर कोई तोता रटंत कथित ज्ञानी के पास ढेर सारे शिष्य हैं तो उसे भी कोई भारी सिद्ध नहीं समझ लेना चाहिए क्योंकि अपने नीरस जीवन से उकताये लोग लोग थोड़ा ज्ञान की बातें सुनकर प्रभावित हो जाते हैं पर आचरण कोई  नहीं  देखता। ज्ञान का प्रमाण तो व्यक्ति का आचरण है। ज्ञानी उसकी अनुभूति दूसरों को कराते हैं कि अपनी प्रशंसा करते हुए सुनाते हुए हैं। कोई भी ज्ञानी यह दावा नहीं कर सकता कि वह सिद्ध है क्योंकि वह जानता है कि ज्ञान की सीमा भी परमात्मा के रूप की तरह अनंत है।
इस विषय पर भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि
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यदा किंचिज्ज्ञोऽहं द्विप मदान्धः समभवम्
तदा सर्वज्ञोऽस्मीत्यभवदवहनश्प्तं मम मनः।
यदाकिंचत्किंचिद् बुधजनसकाशादवगतम्
तदामूर्खोऽस्मीति ज्वर इव मदो मे व्यपगतः।।
‘‘जब मुझे कुछ ज्ञान हुआ तो हाथी की तरह मस्त होकर अपने ज्ञानी होने का अहंकार पालने लगा। मुझे लगा कि मैं ‘सर्वज्ञ’ हूं। लेकिन जब विद्वानों के बीच बैठा तो यथार्थ का ज्ञान हुआ और मेरा मद कम हो गया है। तब लगा कि मैं तो निपट मूर्ख हूं।’
श्रीमद्भागवत गीता में ज्ञान का प्रमाण मनुष्य का ‘स्थिरप्रज्ञ’ होना है। जो माने अपमान से परे हो, समदर्शी हो तथा निष्काम भाव से कार्य करने के साथ निष्प्रयोजन दया करने वाला हो। ऐसे में कोई ज्ञानी है या नहीं या उसके आचरण से तय करना चाहिए। उसी तरह अपने ज्ञानी होने का भ्रम तो कभी पालना ही नहीं चाहिए क्योंकि तब हम कोई नई बात नहीं सीख सकते।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

Friday, March 4, 2011

अहंकार का भाव आदमी को मूर्ख बना देता है-हिन्दी लेख (ahankar aadmi ko moorkh banata hai-hindi lekh)

अहंकार का मनुष्य को मूर्खता के मार्ग पर ले जाता है। खासतौर से जब किसी आदमी को यह आभास होने लगता है कि उसके पास संसार का पूरा ज्ञान आ गया है तो वह विक्षिप्तता की स्थिति में आ जाता है। उससे भी बड़ी मूर्खता तब होती है जब कोई आदमी अल्पज्ञानी को अपना गुरु बना लेता है। अनेक बाद ऐसे लोगों को भी गुरु मान लिया जाता है क्योंकि वह ज्ञान का रटा लगाकर उपदेशक की भूमिका में आ जाते हैं। सच बात तो यह है कि ज्ञान का रटा लगाकर बने उपदेशक मूर्ख नहीं होते बल्कि अपने शिष्यों और श्रोताओं को बनाते हैं। ज्ञान के व्यापारियों के लिये भारतीय अध्यात्म का संदेश वैसा ही जैसे किताबें बेचने वालों के लिये किताबें। वह किताबें बेचते हैं पर उसका ज्ञान अपने पास नहीं रखते। जब लोग इन ज्ञान के व्यापारियों की संगत करते हैं तो उनको लगता है कि वह स्वयं भी ज्ञानी हो रहे हैं। उसके बाद वह उनके प्रचारक के रूप में दूसरों को भी शिष्य बनने के लिये उकसाते हैं जैसे कि स्वयं बहुत बड़े ज्ञानी हो रहे हैं।
इस विषय पर भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि
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यदा किंचिज्ज्ञोऽहं द्विप इव मदान्धः समभवम्
तदा सर्वज्ञोऽस्मीत्यभवदवलिपतं मम मनः।
यदा किञ्चित्किाञ्चिद् बुधजनसकाशादवगतम्
तदा मूर्खोऽस्मीति जवन इव मदो में व्यपगतः।।
"जब मुझे कुछ ज्ञान हुआ तो मैं हाथी की तरह मदांध होकर उस पर गर्व करने लगा और अपने को विद्वान समझने लगा पर जब विद्वानों की संगत में बैठा और यथार्थ का ज्ञान हुआ तो वह अहंकार ज्वर की तरह उतर गया तब अनुभव हुआ कि मेरे समान तो कोई मूर्ख ही नहीं है।"
मनुष्य का मन कभी संसार के कार्यों से उकता जाता है तब वह अध्यात्मिक शांति चाहता है। ऐसे में वह ज्ञानी लोगों की संगत ढूंढता है। सत्संग का व्यापार करने वाले लोग उसे सकाम और साकार भक्ति का संदेश देते हुए उसे गुरु पूजा और सेवा के लिये प्रेरित करते हैं ताकि उनकी स्वयं की सेवा हो जाये। ऐसे लोगों के इर्दगिर्द घूमता आदमी कभी ज्ञानी नहीं बन पाता। यह अलग बात है कि उसे लगता है कि वह अच्छा कर रहा है। ऐसे में जब उसकी संगत कहीं ज्ञानियों के बीच होती है तो पता लगता है कि वह अभी उस ज्ञान से दूर है जिसे भारतीय अध्यात्म भरा हुआ है। योग साधना, ध्यान तथा मंत्रजाप के साथ ही सत्संग से प्राप्त ज्ञान से ही यह जाना जा सकता है कि वास्तव में तत्वज्ञान क्या है? दूसरी बात यह है कि इस संसार में सर्वज्ञानी कोई नहंी बन सकता। इसलिये ज्ञानी लोगों की भूख कभी नहीं मिटती। वह निरंतर ज्ञान संग्रह में लगे रहते हैं और दूसरों के सामने व्यर्थ बघार कर न व्यापार करते हैं और न ही उनके अंदर इस बात का अहंकार आता है कि वह ज्ञानी हैं।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
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