Sunday, April 20, 2008

वाल्मीकि रामायण से-शस्त्रों का संयोग ह्रदय में विकार का उत्पादक

अपने वन प्रवास के दौरान सुतीक्षण के आश्रम से निकलकर जब श्री राम अपनी धर्म पत्नी सीताजी और भ्राता लक्ष्मण में साथ आगे चले। अपने पति द्वारा राक्षसों के वध करने के प्रतिज्ञा से वह दुखी थीं इसलिए उन्होने इससे हटने के लिए उनसे हिंसा छोड़ने का आग्रह किया और निम्नलिखित कथा सुनाई

पूर्वकाल की बात है किसी पवित्र वन में जहाँ मृग और पक्षी बडे आनंद से रहते एक सत्यवादी एवं पवित्र तपस्वी निवास करते थे। उन्हीं की तपस्या में विघ्न डालने के लिए शचिपति इन्द्र किसी योद्धा का रूप धारण कर हाथ में तलवार एक दिन उनके आश्रम पर आये। उन्होने मुनि के आश्रम में अपना उतम खड्ग रख दिया। पवित्र तपस्या में लगे हुए मुनि को धरोहर के रूप में वह खड्ग दे दिया। उस शस्त्र को पाकर मुनि उस धरोहर की रक्षा में लग गए, वे अपने विश्वास की रक्षा के लिए वन में विचरते समय भी उसे अपने साथ रखते थे। धरोहर की रक्षा में तत्पर रहने वाले वे मुनि फल-मूल लेने के लिए जहाँ-कहीं भी जाते, उस खड्ग की साथ लिए बिना नहीं जाते। तप ही जिनका धन था उस मुनि ने प्रतिदिन शस्त्र ढोते रहने के कारण क्रमश: तपस्या का निश्चय छोड़कर अपनी बुद्धि को क्रूरतापूर्ण बना लिया। फिर तो अधर्म ने उन्हें आकृष्ट कर लिया। वे मुनि प्रमादवश रोद्र कर्म में तत्पर हो गये और उस शस्त्र के सहवास से नरक जाना पडा।

इस प्रकार शास्त्र का संयोग होने के कारण पूर्वकाल में उन तपस्वी मुनि को ऐसी दुर्दशा भोगनी पडी। जैसे आग का संयोग ईंधन के जलाने का कारण होता है उसी प्रकार शस्त्रों का संयोग शस्त्रधारी के हृदय में विकार का उत्पादक कहा गया है।

आगे सीता जी कहतीं हैं कि-'मेरे मन में आपके प्रति जो स्नेह और विशेष आदर है उसके कारण मैं आपको उस प्राचीन घटना की याद दिलाती हूँ तथा यह शिक्षा भी देती हूँ कि आपको धनुष लेकर किसी तरह बिना बिः के ही वन में रहने वाले राक्षसों के वध का विचार नहीं करना चाहिए। आपका बिना किसी अपराध के किसी को मारना संसार के लोग अच्छा नहीं समझेंगे। अपने मन और इन्दिर्यों को वश में रखने वाले वीरों के लिए वन में धनुष धारण करने का इतना प्रयोजन है कि वे संकट में पड़े हुए प्राणियों की रक्षा करें।''

अरण्यकाण्ड के नौवें सर्ग से लिए गया यह वृतांत इस उद्देश्य से प्रस्तुत किया गया है कि लोग अस्त्रों-शस्त्रों को शौक के लिए अपने पास भी रखते है और उसके जो परिणाम आते हैं वह बहुत भयावह होते हैं ।

Saturday, April 19, 2008

रहीम के दोहे:इस देह में है हर संकट झेलने की क्षमता

जसी परै सो सहि रहै, कहि रहीम यह देह
धरती पर ही परत है, शीत घाम और मेह

कविवर रहीम कहते हैं कि इस मानव काया पर किसी परिस्थिति आती है वैसा ही वह सहन भी करती है। इस धरती पर ही सर्दी, गर्मी और वर्षा ऋतु आती है और वह सहन करती है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-पश्चिमी चिकित्सा विशेषज्ञों तमाम तरह के शोधों के बाद यह कह पाये कि हमारी देह बहुत लोचदार है उसमें हालतों से निपटने की बहुत क्षमता है। इसके लिये पता नहीं कितने मेंढकों और चूहों को काटा होगा-फिर इस निष्कर्ष पर पहुंचे । हमारे मनीषियों ने अपनी योग साधना और भक्ति से अर्जित ज्ञान से बहुत पहले यह जान लिया कि इस देह में बहुत शक्ति है और वह परिस्थितियों के अनुसार अपने को ढाल लेती है। ज्ञान या तो योग साधना से प्राप्त होता है या भक्ति से। रहीम तो भक्ति के शिखर पुरुष थे और अपनी देह पर कतई ध्यान नहीं देते थे पर फिर भी उनको इस मनुष्य देह के बारे में यह ज्ञान हो गया पर आजकल अगर आप किसी सत्संग में जाकर बैठें तो लोग अपनी दैहिक तकलीफों की चर्चा करते हैं, और वहां ज्ञान कम आत्मप्रवंचना अधिक करते हैं। कोई कहेगा ‘मुझे मधुमेह हो गया है’ तो कोई कहेगा कि मुझे ‘उच्च रक्तचाप’ है। जिन संत लोगों का काम केवल अध्यात्मिक प्रवचन करना है वह उनकी चिकित्सा का ठेका भी लेते हैं। यह अज्ञान और भ्रम की चरम परकाष्ठा है।

मैने अपने संक्षिप्त योग साधना के अनुभव से यह सीखा है कि देह में भारी शक्ति होती है। मुझे योगसाधना का अधिक ज्ञान नहीं है पर उसमें मुझे अपने शरीर के सारे विकार दिखाई देते हैं तब जो लोग बहुत अधिक करते हैं उनको तो कितना अधिक ज्ञान होगा। पहले तो मैं दो घंटे योगसाधना करता था पर थोड़ा स्वस्थ होने और ब्लाग लिखने के बाद कुछ कम करता हूं (वह भी एक घंटे की होती है)तो भी सप्ताह में कम से कम दो बार तो पूरा करता हीं हूं। पहले मुझे अपना शरीर ऐसा लगता था कि मैं उसे ढो रहा हूं पर अब ऐसा लगता है कि हम दोनों साथ चलते हैं। मेरे जीवन का आत्मविश्वास इसी देह के लड़खड़ाने के कारण टूटा था आज मुझे आत्मविश्वास लगता है। आखिर ऐसा क्या हो गया?

इस देह को लेकर हम बहुत चिंतित रहते हैं। गर्मी, सर्दी और वर्षा से इसके त्रस्त होने की हम व्यर्थ ही आशंका करते हैं। सच तो यह है कि यह आशंकाएं ही फिर वैसी ही बीमारियां लातीं हैं। हम अपनी इस देह के बारे में यह मानकर चलें यह हम नहीं है बल्कि आत्मा है तो ही इसे समझ पायेंगे। इसलिये दैहिक तकलीफों की न तो चिंता करें और न ही लोगों से चर्चा करें। ऐसा नहीं है कि योगसाधना करने से आदमी कभी बीमार नहीं होता पर वह अपने आसनों से या घरेलू चिकित्सा से उसका हल कर लेता है। यह बात मैने अपने अनुभव से सीखी है और वही बता रहा हूं। योगसाधना कोई किसी कंपनी का प्राडक्ट नहीं है जो मैं बेच रहा हूं बल्कि अपना सत्य रहीम के दोहे के बहाने आपको बता रहा हूं।

Friday, April 18, 2008

रहीम के दोहे:समुद्र में मिलने से गंगा का महत्व हो जाता है कम

कौन बड़ाई जलधि मिलि, गंग नाम भो धीम
केहि की प्रभुता नहिं घटी, पर घर गये रहीम


कविवर रहीम कहते है कि पवित्र नदी गंगा जब समुद्र में मिलती है तो उसका महत्व नहीं रह जाता। उसी तरह किसी दूसरे के घर जाने पर अपना भी महत्व कम हो जाता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-हमें अपने काम के सिलसिले में दूसरों के घर जाना ही पड़ता है और वहां अगर हमें सम्मान नहीं मिलता तो उसे हृदय में नहीं रखना चाहिए। यह स्वाभाविक बात है कि हर कोई अपने घर, क्षेत्र और देश में ही राजा होता है। जब काम या रोजगार के सिलसिल में अपना मूल स्थान या घर छोड़ना पड़े तो आत्म सम्मान का मोह भी छोड़ देना चाहिए। अक्सर अपना क्षेत्र या देश छोड़कर गये कुछ लोग वहां बराबरी का सम्मान न मिलने की शिकायत करते हैं उन्हें यह समझना चाहिए कि यह स्वाभाविक मनोवृति है कि अपने क्षेत्र में बाहर से आये आदमी का बहुत कम लोग सम्मान करते हैं क्योंकि उनको लगता है कि हम तो निस्वार्थ भाव से रहते हैं और बाहर से आया आदमी तो अपनी रोजी-रोटी कमाने के उद्देश्य से आया है।

विदेशों में गये कई भारतीयों ने ऊंचे ओहदों के साथ बहुत सारा धन और प्रतिष्ठा अर्जित की है पर उनका वैसा सम्मान नहीं है जैसा कि यहां अपने लोग करते हैं। कुछ तो सत्य स्वीकारते हैं पर कुछ लोग इस तरह यहां प्रचारित करते हैं कि जैसे उनको विदेश में लोगों का बहुत सम्मान प्राप्त है जो कि उनका स्वयं का ही भ्रम होता है। उनका वहां वही लोग सम्मान करते हैं जो उनसे अपना स्वार्थ निकालते हैं। विदेशों में कई देश ऐसे हैं जो धर्म पर आधारित हैं और वहां इस देश के किसी भी धर्म के पालन की अनुमति नहीं है। जहां यह अनुमति नहीं है वहां के लोग भी अपने स्वार्थ की खातिर अपने खुश होने का प्रमाण पत्र देते हैं पर अगर उनका वहां सम्मान होता तो भला उनको सार्वजनिक रूप से अपने धर्म पालन की अनुमति होती कि नहीं। हम यह नहीं कह रहे कि यह अनुमति मिलना चाहिए। हां यह वास्तविकता उनको स्वीकार कर लेना चाहिए कि वहां वह अपने काम और रोजगार के सिलसिले में हैं और उनको किसी भी मान सम्मान की चाहत नहीं है। जब आप अपना घर या देश छोड़कर दूसरी जगह जाते हैं तो सम्मान का मोह छोड़ना ही सत्य के साथ चलना है।

Thursday, April 17, 2008

संत कबीर वाणी:सम्मान पाने की इच्छा श्वान का लक्षण

मान बढ़ाई जगत में, कुकर की पहचान
प्यार किए मुख चाटई, बैर किए तन हान


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि सम्मान पाने की इच्छा तो श्वान के लक्षण है। प्यार करने पर वह मुख चाटने लगता है और फटकारने पर काट लेता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-आधुनिक स्वास्थ्य विज्ञान के अनुसार तो श्वान का चाटना भी रैबीज पैदा कर देता है और अधिकतर लोगों को रैबीज होता ही उन लोगों को है जो कुता पालते हैं। कबीर दास जी न यह दोहा व्यंजना विधा में कहा है जिसका आशय यह है कि आदमी में अपना सम्मान पाने का मोह उसकी तरह ही होता है। संसार में सभी लोग आत्मप्रवंचना में लगे हैं। मैने कई जगह देखा है कि जैसे मैं अपने भाई की बात करूं तो सामने वाला भी अपने भाई की बात शुरू कर देता है। मैं अपने किसी व्यापारी दोस्त की बात करूं तो सामने वाला अपने किसी व्यापारी दोस्त की बात शुरू कर देता है। मैं किसी अधिकारी दोस्त की बात करूं तो वह भी अपने अधिकारी दोस्त की बात कर देता है।

सच बात तो यह है कई बार तो ऐसा लगता है कि लोगों से बात करने की बजाय तो किसी रचनात्मक काम में लगा जाये। हम जो बात कहें उसे कोई सुने ही नहीं तो कहने से क्या फायदा? सब लोग केवल अपने मूंह से अपनी बड़ाई करते हैं। मैं अमुक को जानता हूं, अमुक मेरी इज्जत करता है। ऐसी बातें हास्यास्पद होती है। सब जानते हैं पर अपने बोलने को अवसर आने पर सब भूल जाते हैं। ऐसे में कबीर का यह दोहा जो पढ़ कर अपने मन में धारण कर लेगा वह अपने मूंह से कभी भी अपनी बड़ा ई नहीं करेगा।

अधिकतर लोगों का व्यवहार भी अजीब होता है कोई भी उनके मूंह पर झूठी तारीफ कर दे तो वह बहुत खुश हो जाते हैं और कोई उनका दुर्गुण बता दे तो उग्र हो जाते हैं। ऐसे व्यवहार से सब एक दूसरे पर हंसते हैं पर अपने पर नियंत्रण नहीं करते।

Wednesday, April 16, 2008

रहीम के दोहे:आदमी नाचता है कठपुतली की तरह

ज्यों नाचत कठपूतरी, करम नचावत गात
अपने हाथ रहीम ज्यों, नहीं आपुने हाथ


कविवर रहीम कहते हैं कि जैसे नट कठपुतली को नचाता है वैसे ही मनुष्य को उसके कर्म नाच करने के लिऐ बाध्य करते हैं। जिन्हें हम अपने हाथ समझते हैं वह भी अपने नियंत्रण में नही होते हैं।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-जब मैं रहीम के दोहे देखता हूं तो सोचता हूं कि इस संत ने जीभर कर जीवन का आनंद लिया होगा। किसी प्रकार के भ्रम में नहीं जीना ही मनुष्य की पहचान है और रहीम हमेशा सत्य के साथ जिये। सामान्य आदमी कितना भ्रम में जीता है यह उनके दोहे पढ़कर समझा जा सकता है। सभी लोग और आपको कर्ता समझते है जबकि सभी जीवों का शरीर पांच तत्वों से बना वह पुतला है जिसमें तीन प्रकृतियां-मन, बुद्धि और अहंकार -अपना काम करती हैं। आंख है तो देखेगी, कान है तो सुनेंगे, नाक है तो सूंघेगी, पांव है तो चलेंगे और हाथ हैं तो हिलेंगे। मन विचार करता है, बुद्धि योजना बनाती है और अहंकार उकसाता है। हम सोचते हैं कि हम करते हैं जबकि हम तो एक तरह से सोये हुए हैं। अपने आपको देखते ही नहीं। हमारी आत्मा तो परमार्थ से प्रसन्न होती है पर हम अपने कर्मों के अधीन होकर स्वार्थ में लगे रहते हैं जबकि यह काम तो हमारी इंद्रियां तब भी करेंगी जब इन पर नियंत्रण करेंगे। मतलब हम जो कर रहे हैं वह तो करेंगे ही पर जो हमें करना चाहिए परमार्थ वह करते नहीं। सत्संग और भक्ति केवल दिखावे की करते है। कुल मिलाकर कठपुतली की तरह नाचते रहते हैं।

Tuesday, April 15, 2008

संत कबीर वाणी:व्यवहार में अति से बचना जरूरी

अति को भला न बोलना, अति की भली न चुप
अति को भलो न बरसनो, अति की भली न धुप्प

संत शिरामणि कबीरदास जी कहते हैं कि न तो अधिक बोलना चाहिए न एकदम चुप रहना चाहिए। समयानुसार अपने अंदर बदलाव करना चाहिए। कभी न तो एकदम क्रोध करना चाहिए न ही एकदम घबड़ा कर बैठ जाना चाहिए। किसी काम में न तो उतावली दिखाना चाहिए और न ही विलंब करना चाहिए।

ज्ञानी को ज्ञानी मिले, रस की लूटम लूट
ज्ञानी अज्ञानी मिर्ल, होवे माथा फूट


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जब कोई एक ज्ञानी दूसरे को मिलता है तो दोनों को आनंद मिलता है और वह एक दूसरे के ज्ञान के रस को आनंद उठाते हैं। जब कहीं मूर्खों और अज्ञानियों को मेल होता है तो उनके जमकर वाद-विवाद होता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-आजकल लोग कामकाज के सिलसिले में अपने घरों से दूर रहते हैं तो अधिकतर को अपना जीवन अकेले ही दूसरों के साथ व्यतीत करना पड़ता है और नित नये लोगों से संपर्क होता है। ऐसे में अपने व्यवहार में अधिक सतर्कता बरतना चाहिए। न तो किसी से अधिक बोलना चाहिए क्योंकि वह आपकी कमी का लाभ उठाकर आपको हानि पहुंचा सकता है और न ही किसी से डरना चाहिए क्योंकि उसको देखकर कोई भी आपसे अधर्म का कार्य करा सकता है। जहां तक हो सके अपने से अधिक ज्ञानियों के बीच उठना-बैठना चाहिए ताकि उनसे ज्ञान रस प्राप्त किया जा सके अज्ञानियों के साथ संपर्क से तो वाद विवाद और मारपीट होने का भय रहता है।

Monday, April 14, 2008

रहीम के दोहे:भोग कर रोग बुलाने की बजाय राम का नाम लें

रहिमन राम न उर धरै, रहत विषय लपटाय
पसु खर खात सवाद सों, गुर बुलियाए खाय


कविवर रहीम कहते है कि भगवान राम को हृदय में धारण करने की बजाय भोग और विलास में डूबे रहते है। पहले तो अपनी जीभ के स्वाद के लिए जानवरों की टांग खाते हैं और फिर उनको दवा भी लेनी पड़ती है।

वर्तमान सदंर्भ में व्याख्या-वर्तमान समय में मनुष्य के लिये सुख सुविधाएं बहुत उपलब्ध हो गयी है इससे वह शारीरिक श्रम कम करने लगा हैं शारीरिक श्रम करने के कारण उसकी देह में विकार उत्पन्न होते है और वह तमाम तरह की बीमारियों की चपेट में आ जाता है। स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन भी रहता है। इसके अलावा जैसा भोजन आदमी करता है वैसा ही उसका मन भी होता है।

आज कई ऐसी बीमारिया हैं जो आदमी के मानसिक तनाव के कारण उत्पन्न होती है। इसके अलावा मांसाहार की प्रवृत्ति भी बढ़ी है। मुर्गे की टांग खाने के लिय लोग बेताब रहते हैं। शरीर से श्रम न करने के कारण वैसे ही सामान्य भोजन पचता नहीं है उस पर मांस खाकर अपने लिये विपत्ति बुलाना नहीं तो और क्या है? फिर लोगों का मन तो केवल माया के चक्कर में ही लगा रहता है। आधुनिक स्वास्थ्य विज्ञान कहता है कि अगर कोई आदमी एक ही तरफ ध्यान लगाता है तो उसे उच्च रक्तचाप और मधुमेह जैसे विकास घेर लेते हैं। माया के चक्कर से हटकर आदमी थोड़ा राम में मन लगाये तो उसका मानसिक व्यायाम भी हो, पर लोग हैं कि भगवान श्रीराम चरणों की शरण की बजाय मुर्गे के चरण खाना चाहते हैं। यह कारण है कि आजकल मंदिरों में कम अस्पतालों में अधिक लोग शरण लिये होते हैं। भगवान श्रीराम के नाम की जगह डाक्टर को दहाड़ें मारकर पुकार रहे होते है।

अगर लोग शुद्ध हृदय से राम का नाम लें तो उनके कई दर्दें का इलाज हो जाये पर माया ऐसा नहीं करने देती वह तो उन्हें डाक्टर की सेवा कराने ले जाती है जो कि उसके भी वैसे ही भक्त होते हैं जैसे मरीज।

Sunday, April 13, 2008

रहीम के दोहे: मनुष्य को आत्मसम्मान के साथ जीना चाहिए

मान सहित विष खाय के, संभु जगदीस
बिना मान अमृत पिये, राहु कटायी सीस

कविवर रहीम कहते हैं कि सम्मान के साथ शिव जी विष उदरस्थ किया तो जगदीश कहलाये पर बिना मान के राहु ने अमृत पिया तो अपना सिर कटवा लिया।
मान सरोवर ही मिले, हंसनि मुक्ता भोग
सफरनि भरे रहीम सर, बस-बालकनहिं जोग

कविवर रहीम कहते हैं कि हंस तो केवल मानसरोवर में ही मोती चुन कर खाता है और सीपियों से भरे हुए तालाब तो केवल बगुले उसके बालकों के लिये ही होते है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-आज के भौतिक प्रधान युग में कई लोगों के पास ढेर सारी सुखसुविधा है तो दूसरी तरफ लोगों के पास रोटी खाने के लाले भी है। ऐसे में हम अक्सर सुनते हैं कि अमुक आदमी अमुक किसी बड़े व्यक्ति का चमचा है। दरअसल आजकल लोग अपनी कुछ ऐसी सुविधाओं को उन लोगों से बांटते है जो उनके इर्द-गिर्द फिरते हैं। अगर कोई अमीर घर का लड़का है तो उसके साथ चार ऐसे भी होंगे जो उसकी मोटर सायकल या कार की वजह से उसके मित्र होंगे। हालांकि इस मित्रता की वजह से उनको अपना सम्मान खोना पड़ता है। इसी तरह अमीर और बड़े घर के स्त्री पुरुष भी अपने से छोटे और गरीब घरों के लोगों से मन बहलाने के लिये मित्रता कर लेते हैं। इसके लिये वह अपनी सुविधाओं का इस्तेमाल इस तरह करते हैं कि उसका थोड़ा लाभ लेकर गरीब और छोटे घरों के लोग उनकी मुफ्त में चाकरी करते रहे। कई बार हम में से ही कई लोग ऐसे इस्तेमाल होते हैं।

कई बार बड़े आदमी के घर-परिवार में किसी खास अवसर पर जाने पर वहां हम भोजन करते हैं पर ऐसा लगता है कि वहां हमारा कोई सम्मान नहीं है ऐसे में हम जो वस्तु खा रहे हैं वह रोटी विष लगती है। हां ऐसी जगहों पर हमें जाना नहीं चाहिए जहां लगे कि भोजन एक तरह से विष होगा। अपना आत्मसम्मान बचाना हर मनुष्य का कर्तव्य है और इसलिये उसे मनुष्य भी कहा जाता है।

Saturday, April 12, 2008

रहीम के दोहे:बोलने पर ही कोयल और कौए के भेद का पता चलता है

दोनों रहिमन एक से, जौ बोलत नाहिं
जान परत हैं काक पिक ऋतु बसंत के माहिं


कविवर रहीम कहते हैं कि जब तक मुख से बोल नहीं निकलते तब तक कौआ और कोयल एक समान ही प्रतीत होते हैं। ऋतुराज बसंत के समय कोयल की मीठी और कौए की कर्कश वाणी के अंतर का अनुभव होता है।

वर्तमान के संदर्भ में व्याख्या-इसमें मनुष्य के भ्रम में पड़ जाने की प्रवृत्ति की ओर संकेत है। आजकल तो कुछ लोग होते तो कौए की प्रवृति के है पर कोयल जैसी मीठी वाणी बोलते हैं। उनके मन काले होते हैं और जब शिकार उनके जाल में फंस जाता है तो फिर कौए की तरह कर्कश वाणी बोलने लगते हैं। कौआ अगर मूंह न खोले तो उसके कोयल होने की अनुभूति होती है उसी तरह कुछ लोग अपनी वाणी से मधुर होने का अहसास दिलाते हैं परंतु अपना काम निकलते ही वह अपना औकात पर आ जाते हैं। कविवर रहीम ने अपने जीवन रहस्यों को व्यंजना विधा में प्रस्तुत किया है। यहां कोयल और कौए का उदाहरण देते हुए वह मनुष्यों को अपने जीवन में सतर्क रहने का संदेश देते है।

आजकल खासतौर से युवक-युवतियों को ऐसे संदेशों से प्रेरणा लेनी चाहिए। आपने देखा होगा कि इश्क और प्यार की आड़ में वासना के वशीभूत होकर कुछ युवक अपनी मीठी वाणी से युवतियों को अपने जाल में फंसा लेते हैं और फिर पहले तो शादी नहीं करते और शादी करते हैं तो फिर पता लगता है कि वह वैसे नहीं है जैसी युवतियां अपेक्षा करतीं हैं। फिर शुरू होता है उनके नारकीय जीवन का दौर।

उसी तरह युवकों को रोजगार का लालच देकर कुछ लोग पैसा वसूल कर देते हैं या फिर ऐसी जगहों पर भेज देते है जहां से उनकी वापसी होना मुश्किल हो जाती है। कुछ युवकों ऐसे गलत कामों में फंसा दिया जाता है जो उनको अपराध की दुनियां में ले जाता है। इसलिये कोयल और कौए के भेद को समझकर ही किसी पर विश्वास करना चाहिए। यहां वाणी से तात्पर्य हम नीयत से भी ले सकते हैं। कौऐ की नीयत रखने वाला कुछ देर तक कोयल होने का आभास दे सकता है पर समय आने पर उसकी असलियत खुल जाती है।

Thursday, April 10, 2008

संत कबीर वाणी:पत्थर और पानी पूजने से भक्ति नहीं होती

पाहन पानी पूजि से, पचि मुआ संसार
भेद अलहदा रहि गयो, भेदवंत सो पार


संत शिरोमणि कबीदासजी कहते हैं कि पत्थर और पानी को पूज कर सारे संसार के लोग नष्ट हो गये पर अपने तत्व ज्ञान को नहीं जान पाये। वह ज्ञान तो एकदम अलग है। अगर कोई ज्ञानी गुरु मिल जाये तो उसे प्राप्त कर इस दुनियां से पार हुआ जा सकता है।

पाहन ही का देहरा, पाहन ही का देव
पूजनहारा आंधरा, क्यौं करि मानै सेव


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मूर्ति पत्थर की होती है और उसको घर में रखा जाता है वह भी पत्थर का है और लोग उसकी पूजा कर रहे हैं। जिसे खुद कुछ नहीं दिखाई देता वह भला आदमी की सेवा और भक्ति को कैसे स्वीकार कर सकता है।
आज के संदर्भ में व्याख्या-सच तो यह है कि पत्थरों की प्रतिमाएं या मकान बनाकर उसमेें लोगों को अपनी आस्था और भक्ति व्यक्त करने के परंपरा इस संसार में शूरू हुई है तब से इस संसार में लोगों के मन में तत्वज्ञान के प्रति जिज्ञासा कम हो गयी है। लोग पत्थरों की प्रतिमाओं या स्थानों के जाकर अपने दिल को तसल्ली देते है कि हमने भक्ति कर ली और दुनियां के साथ भगवान ने भी देख लिया। मन में जो विकास है वह जस के तस रहते है जबकि सच्ची भक्ति के लिये उसका शुद्ध होना जरूरी है। इस तरह भक्ति या सेवा करने का कोई लाभ नहीं है। पत्थर की पूजा करते हुए मन भी पत्थर हो जाता है और उसकी मलिनता के कारण शुद्ध भक्ति और सेवा का भाव नहीं बन पाता और आध्यात्मिक शांति पाने के लिये किये गये प्रयास भी कोई लाभ नहीं देते।

Tuesday, April 8, 2008

रहीम के दोहे:देता तो परमात्मा है किसी अन्य का भ्रम मत पालो

देनदार कोउ और है, भेजत सा दिन रैन
लोग भरम पै धरे, वाते नीचे नैन

कविवर रहीम कहते हैं कि इस जीवन में कुछ देने वाला तो परमात्मा है पर लोग अपने द्वारा लेने-देने की भ्रम पाल लेते है। इसी कारण हमारे नेत्र झुके रहते है।

दुरदिन परे रहीम कहि, भूलत सब पहिचानि
सोच नहीं वित हानि को, जो न होय हित हानि


कविवर रहीम कहते हैं कि जीवन में बुरे दिन आने पर सब लोग पहचानना भी भूल जाते है। ऐसे समय में यदि अपने सहृदय लोगों से सम्मान ओर प्रेम मिलता रहे तो फिर धन की हानि की पीड़ा कम हो जाती है।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-इस संसार में कुछ लोग तो गरीब है और कुछ अमीर, पर मनुष्य का स्वभाव है कि वह माया के इस भ्रम का शिकार हो जाता है और उसे लगता है कि जो अमीर है वह कुछ अधिक योग्य है और जो गरीब है वह अयोग्य। आजकल तो यह भ्रम और बढ़ गया है लोग चर्चित और धनवान लोगों को देवता समझ लेते हैं जैसे कि उनमें इंसानों जैसे गुणों के साथ कोई दोष हो ही नहीं। चारों तरफ भ्रम का साम्राज्य है। इसलिये लोग छलकपट और अपराध करके अधिक से अधिक धन कमा कर समाज में प्रतिष्ठित होना चाहते है।

समझदार और ज्ञानी लोग कभी भी भ्रम का शिकार नहीं होते उनको पता होता है कि यह सब माया का खेल है। इसलिये वह अमीर गरीब का भेद नहीं करते। ऐसे सहृदय सज्जन ऐसे किसी अमीर मित्र या रिश्तेदार का साथ नहीं छोड़ते तो उस व्यक्ति को अपने आप को धनी ही समझना चाहिए। माया तो आनी जानी है पर अगर कोई अपने लोग फिर भी सम्मान देते हैं तो समझ लो कुछ नहीं गया।

Saturday, April 5, 2008

संत कबीर वाणी:स्वार्थ के कारण ही सब सगे बनते हैं

स्वारथ का सबको सगा, सारा ही जग जान
बिन स्वारथ आदर करै, सो नर चतुर सुजान


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि इस संसार में सभी स्वार्थ के कारण सगे बनते हैं। सारा संसार ही स्वार्थ के लिये अपना बनता है। परंतु चतुर व्यक्ति वही है जो बिना किसी स्वार्थ के गुणी आदमी का सम्मान करते हैं।

निज स्वारथ के कारनै, सेव करै संसार
बिन स्वारथ भक्ति करै, सो भावै करतार


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि इस संसार में जो भी लोग सेवा करते हैं वह स्वार्थ के कारण करते हैं पर परमात्मा को तो वही भक्त भाते हैं जो बिना किसी स्वार्थ के भक्ति करते हैं।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-जीवन का यह एक सत्य है कि जो भी संबंध आपस में बनते हैं वह कोई न कोई स्वार्थ के कारण होते हैं। हालांकि लोग कहते जरूर है कि हम तो निस्वार्थ सेवा करते हैं पर उनके यह वचन मिथ्या होते हैं। लोग तो भगवान की भक्ति में भी अनेक प्रकार के स्वार्थों की अपेक्षा रखते हैं। अगर कोई कहीं धर्म का काम कर रहा है तो उसमें उसके अपने और अपने परिवार का नाम या अपनी व्यवसाय के प्रचार का भाव रहता है। कई जगह लोग अपने नाम से मंदिर और प्याऊ बनवाकर वहां अपना नाम लगा देते हैं।

सेवा के नाम पर इतने पाखंड हो गये हैं। जिसे देखो वही समाज सेवा करने चला आ रहा है। हाथ में होती हैं बस अपने नाम की तख्तियां और मूंह में लोगों के कल्याण के नारे। इस आड़ में तो कई लोग धन कमा रहे हैं। आजकल तो अपने स्वार्थ की सेवा ही सच्ची सेवा बन गयी है।

इसके बावजूद सच्चे भक्तों को सच्ची सेवा का मार्ग अनुसरण करना चाहिए। कब तब कोई आदमी अपने को धोखा दे सकता है। धार्मिक स्थलों पर मन्नतें मांगना भक्ति नहीं हो सकती। कई मनोकामना पूरी होने के बावजूद लोगों को मन की शांति नहीं मिल रही। वजह निष्काम भक्ति ही एक ऐसी दवा है जो मन का इलाज कर सकती है। जो लोग हृदय में कोई स्वार्थ रखे बिना भगवान की भक्ति और लोगों की सेवा करते हैं वही अपने अंदर उसके सुख की अनुभूति कर पाते हैं। पाने को तो सब लोग कुछ न कुछ पाते हैं पर सुख की अनुभूति वही लोग करते हैं जो भौतिक उपलब्धियों को अधिक महत्व नहीं देते बल्कि मन की शांति को ही सर्वोपरि मानते हैं।

Friday, April 4, 2008

संत कबीर वाणी:शब्द के बराबर कोई धन नहीं

शब्द बराबर धन नहीं, जो कोय जानै बोल
हीरा तो दामों मिलै, सब्दहिं मोल न तोल

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अगर कोई अपनी वाणी से शब्द बोलना जानता हो तो वास्तव में उचित शब्द के बराबर कोई धन नहीं है। हीरा तो फिर भी पैसा खर्च करने पर मिल जाता है पर दूसरे को प्रभावित करने वाले शब्द हर कोई नहीं बोल पाता।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-आज के भौतिक युग में लोगों के संवेदनशीलता कम होती जा रही है। किसी से प्रेमपूर्वक बोलना चमचागिरी कहा जाता है। सच तो यह है कि लोग उसी से प्रेम से बोलते हैं जिससे कोई काम निकलता है या किसी से डरते हैं। अपने से छोटे या निम्न व्यक्ति के साथ तो हर कोई शुष्क और कठोर व्यवहार करता है। इसका एक पक्ष यह भी है कि अगर किसी से प्रेमपूर्वक बात की जाये तो वह सामने वाले को कमजोर और डरपोक समझने लगता है। कुछ लोग तो ऐसे भी है जो प्रेम ओर मित्रता से बात करने पर मखौल उड़ाने लगते हैं। इसके बावजूद विचलित होने की आवश्यकता नहीं है। हमें अपना व्यवहार साफ रखना चाहिए। जितना हो सके सुंदर और मधुर वाणी में बोलना चाहिए।

एक सच यह भी है कि मधुर और प्रेमपूर्ण वाणी भी तभी बोली जा सकती है जब अपना मन साफ हो। अगर मन में कुविचार रखकर किसी से मधुर वाणी में बोलेंगे तो उसका कोई प्रभाव नहीं होता। किसी से डरकर भी जब उससे मधुर शब्द बोलते हैं तो वह समझ जाता है। कई लोग तो मधुर शब्द बोलकर ठगते हैं और यह सब लोग समझ जाते हैं। अतः मन में स्वच्छता रखकर हम किसी से बात करेंगे तो हमारी वाणी से सुंदर और मधुर शब्द जरूर निकलेगें और उसका प्रभाव भी होगा।

Tuesday, April 1, 2008

रहीम के दोहे:विपत्ति के समय पहचान वाले भी भूल जाते हैं

दुरनि परे रहीम कहिए भूलत सब पहिचानि
सोच नहीं वित हानि को, जो न होन हित हानि

कविवर रहीम कहते है कि जीवन में बुरे दिन आने पर सब लोग पहचानना भी भूल जाते हैं। ऐसे समय में अपने मित्रों और रिश्तदारों से सहानुभूति मिल जाये तो अच्छा लगता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या- वर्तमान समय में यही संभव नहीं है जब तक किसी के पास धन है लोगों का जमावड़ा उसके आसपास रहता है और जैसे ही उसके बुरे दिन आये तो सब मूंह फेर जाते हैं। कोई भी मित्र या रिश्तेदार आर्थिक दृष्टि के परेशान किसी भी आदमी के पास फटकने को तैयार नहीं होता। ऐसे में अगर कोई रिश्तेदार या मित्र थोड़ी ही सहानुभूति जताए तो मानसिक रूप के सुख मिलता है पर आजकल वह संभव नहीं हैं। क्योंकि जब पेसा होता है तो आदमी अपना अहंकार दिखाता है और लोग उससे नाराज हो जाते हैं और इसलिये बाद में उससे दूरी बना लेते हैं।

जो लोग संपन्नता और सुख के समय विनम्र रहते हैं उनको इस स्थिति का सामना नहीं करना पड़ता।

Saturday, March 29, 2008

रहीम के दोहे:बन्दर की तरह उछलकूद कर जनसेवा करने वालों से सावधान रहें

बड़े दीन को दुख, सुनो, लेत दया उर आनि
हरि हाथीं सौं कब हुतो, कहूं रहीम पहिचानि


कविवर रहीम कहते है इस संसार में बड़े लोग तो वह जो छोट आदमी की पीड़ा सुनकर उस पर दया करते हैं, परंतु बंदर कभी हाथी नहीं हो सकता-कुछ लोग बंदर की तरह उछलकूद कर दया दिखाते हैं पर करते कुछ नहीं। वह कभी हाथी नहीं हो सकते।

आज के संदर्भ में व्याख्या- आजकल बच्चों, विकलांगों, महिलाओं और तमाम के तरह की बीमारियों के मरीजों की सहायतार्थ संगीत कार्यक्रम, क्रिकेट मैच तथा अन्य मनोरंजक कार्यक्रम होते हैं-जो कि मदद के नाम पर दिखावे से अधिक कुछ नहीं है। यह तो केवल बंदर की तरह उछलकूद होती है। ऐसे व्यवसायिक कार्यक्रम तो तमाम तरह के आर्थिक लाभ के लिये किये जाते हैं। जो सच्चे समाज सेवी हैं वह बिना किसी उद्देश्य के लोगों की मदद करते है, और वह प्रचार से परे अपना काम वैसे ही किये जाते हैं जैसे हाथी अपनी राह पर बिना किसी की परवाह किये चलता जाता है।

समझदार लोग तो सब जानते हैं पर कुछ बंदर की तरह उछलकूद कर समाजसेवा का नाटक करने वालों को देखकर इस कटु सत्य को भूल जाते है। कई लोग ऐसे कार्यक्रमों की टिकिट यह सोचकर खरीद लेते हैं कि वह इस तरह दान भी करेंगे और मनोरंजन भी कर लेंगे। उन्हें यह भ्रम तोड़ लेना चाहिये कि वह दान कर रहे हैं क्योंकि सुपात्र को ही दिया दान फलीभूत होता है। अतः हमें अपने बीच एसे लोग की पहचान कर लेना चाहिए जो इस तरह समाज सेवा का नाटक करते है। इनसे तो दूर रहना ही बेहतर है।

Friday, March 28, 2008

संत कबीर वाणी:एक बूंद के नाश होने पर रोता है संसार

इक दिन ऐसा होयगा, कोय काहू का नाहिं

घर की नारी को कहै, तन की नारी जाहिं

संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं कि आदमी भ्रम में रहता है कि यह देह कभी नष्ट नहीं होगी। वास्तविकता यह है कि एक दिन इस देह का त्याग करना ही पड़ता है। उस समय घर की नारी तो छोडिये अपने शरीर की नाड़ी तक हमारी इस देह का साथ छोड़ देती ही।

एक बूँद के कारनैं, रोता सब संसार

अनेक बून्द खाली गए, तिनका नहीं विचार

संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं कि कोई मनुष्य देह त्याग देता है तो परिवार के रो-रोकर उसका शोक करते हैं वह इस बात का विचार नहीं करते कि अनेक लोग इस तरह जा चुके हैं वह भी खाली हाथ।

व्याख्या-यहाँ कबीर दास जीइस शाश्वत सत्य के और इशारा करते हैं कि यहाँ सब नश्वर है और जो आया है वह जायेगा इसलिए किसी की मृत्यु पर शोक करना व्यर्थ है।

Thursday, March 27, 2008

संत कबीर वाणी:जहाँ अहं वहाँ आफत, जहाँ अज्ञान वहाँ शोक होगा

जहाँ आपा तहं आपदा, जहाँ संसै तहां सोग

कहैं कबीर कैसे मिटै, चारों दीरघ रोग

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं किजहाँ मनुष्य में अहंकार हैं वहाँ विपत्ति जरूर आयेगी। जहाँ अज्ञान के कारण संशय होगा वहाँ निराशा और शोक प्रकट होगा। ऐसे में चार महारोग अहंकार, संकट, संशय और शोक मिट नहीं सकते।

आज के संदर्भ में व्याख्या-वैसे तो मनुष्य में अहंकार की प्रवृति स्वाभाविक रूप से रहती है और यह कबीर जी के समय में भी रही है, पर उस समय फिर भी लोग अपना समय आध्यात्म में बिताते होंगे पर आजकल तो आदमी की दिनचर्या इतनी व्यस्त है कि उसे भक्ति और ज्ञान प्राप्त करने का समय ही कहाँ मिल पाता है। कई माता-पिता अपने बच्चों को भी कुछ सिखाने का समय नहीं निकाल पाते, ऐसे में चारों तरफ अज्ञान फैलता जा रहा है। साधू संत जिन्होंने केवल ज्ञान की किताबें पढी होतीं हैं पर धारण नहीं किया होता और वह अहंकार में मनोरंजन कार्यक्रम की तरह अपने प्रवचन प्रस्तुत करते हैं तो उनको सुनने वाले भी सत्संगी होने का अहंकार पाल लेते हैं।

कई लोग तो इन संतों के पास से ऐसे लौटते हैं मानो स्वर्ग का टिकिट लेकर लौटे हों। आशय यह है कि आजकल लोगों में जो मानसिक तनाव बढ़ रहा है और उससे जो तन और मन में व्याधियां फ़ैल रही हैं उसका कारण अहंकार और अज्ञान है। हर कोई अपनी बात एक ज्ञानी की तरह कर रहा है पर सुन कोई किसी की नहीं रहा है। हर कोई दर्द बयान कर रहा है पर कोई किसी का हमदर्द नहीं बन रहा है। कई जगह यह अंहकार छोटी-छोटी बातों पर पैदा होता है जो बडे संकट का कारण बनता है। हमारे यहाँ संयुक्त परिवार की परंपरा विघटन का कारण भी यही है जिससे लोगों की संघर्ष करने की भावना कम हुई है। इसलिए जो लोग अपना अंहकार छोड़ कर निरंकार भाव से काम करेंगे वही सुखी रह पायेंगे।

Wednesday, March 26, 2008

रहीम के दोहे:अब वह छायादार वृक्ष कहाँ हैं?

रहिमन अब वे बिरछ कहं जिनकी छांह गंभीर

बागन बिच बिच देखिअत, सेंहुड, कुंज करीर

कवीवर रहीम कहते हैं की अब इस संसार रुपी बैग में अब वह वृक्ष कहाँ है जो घनी छाया देते हैं। अब तो इस बगीचे में सेमल और घास फूस के ढेर या करील के वृक्ष ही दिखाई देते हैं।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-हम कहते हैं कि ज़माना बहुत खराब हैं पर देखें तो यह केवल हमारा एक नजरिया है। इस कलियुग में तो झूठे और लघु चरित्र के लोगों का बोलबाला है। रहीम जी के समय तो फिर भी सात्विक भाव कुछ अधिक रहा होगा पर अब तो स्थिति बदतर है।

पहले तो लोग दान -पुण्यके द्वारा समाज के गरीब तबके पर दया करते थे और अन्य भी तमाम तरह की समाज सेवा करते थे। आपने देखा होगा कि अनेक धर्म स्थलों पर तीर्थ यात्रियों के लिए धर्मशालाएं बनीं हैं जो अनेक तरह के दानी सेठों और साहूकारों ने बनवाईं पर आज उन जगहों पर फाईव स्टारहोटल बन गए हैं। कहने का तात्पर्य अब वह लोग नहीं है जो समाज को अपने पैसे, पद और प्रतिष्ठा से छाया देते थे। अगर कुछ लोग दानवीर या दयालू बनने का दिखावा करते हैं तो उनके निज स्वार्थ होते हैं। ऐसे लोगों से सतर्क रहने की जरूरत है।

Tuesday, March 25, 2008

संत कबीर वाणी:गुरु के ज्ञान से एकाध ही उबरता है

माया दीपक नर पतंग, भ्रमि भ्रमि इवेन पड़ंत

कह कबीर गुरु ग्यान तैं एक आध उबरंत

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मनुष्य के पतंगे के सामान मायारूपी दीपक के प्रति आकर्षित होकर भ्रम में पडा रहता है। कोई भाग्यशाली मनुष्य होता है जिसे योग्य गुरु का ज्ञान मिल जाता है और वह इससे उबर पाता है।

आज के संदर्भ में व्याख्या- आजकल तो माया का ऐसा विस्तार है कि बडे साधू-संत उसके चक्कर में पड़े हैं। लंबे चौड़े व्याख्यान देते हैं, किताबे बेचते हैं, दवाईया बेचते हैं और उससे कमाए धन से अपने पांच सितारा आश्रम बनाते हैं। माजी की बात यह है भारी संख्या में लोग उनसे ज्ञान लेने जाते हैं जो केवल माया के आसपास ही अपना ज्ञान देते हैं। वैसे ही आम आदमी स्वाभाविक रूप से भ्रमित रहता है ऐसे में यह ज्ञान के मूलतत्व से परे हैं। अपने प्रवचनों में ही अपनी दवाईयों का बखान करते हैं। तिस पर इलेक्ट्रोनिक माध्यमों की प्रबलता और चकाचौंध में वह अधिक भ्रमित हो जाता है। ऐसे में मुक्ति की चाहे में घूम रहा आदमी और भ्रम पाल लेता है।

ऐसे में मेरा विचार है कि लोगों को आजकल गुरु बनाने की बजाय अपने अध्यात्मिक ग्रंथों को ही अपना गुरु मान कर उनको पढ़ना चाहिऐ, क्योंकि शाश्वत सत्य और ज्ञान उन्हीं में भरा पडा है। आजकल के गुरु उसमें से केवल उतना ही ज्ञान लोगों को सुनाते हैं जिनसे उनका खुद का व्यवसाय चल सके।

Monday, March 24, 2008

विदुर नीति:जैसे लोगों में रहता है वैसे ही हो जाता है आदमी

  1. बोलने से न बोलना अच्छा बताया गया है, किन्तु सत्य बोलना भी एक गुण है। चुप या मौन रहने से सत्य बोलना दो गुना लाभप्रद है। सत्य मीठी वाणी में बोलना तीसरा गुण है और धर्म के अनुसार बोला जाये यह उसका चौथा गुण है।
  2. मनुष्य जैसे लोगों के साथ रहता है और जिन लोगों की सेवा में रहता है और जैसी उसकी कामनाएं होतीं है वैसा ही वह हो भी जाता है।
  3. मनुष्य जिन विषयों से मन हटाता है उससे उसकी मुक्ति हो जाती है। इस प्रकार यदि सब और से निवृत हो जाये तो उसे कभी भी दुख प्राप्त नहीं होगा।
  4. जो न तो स्वयं किसी से जीता जाता है न दूसरों को जीतने के इच्छा करता है न किसी से बैर करता और न दूसरे को हानि पहुंचाता है और अपनी निंदा और प्रशंसा में भी सहज रहता है वह दुख और सुख के भाव से परे हो जाता है।

Monday, March 17, 2008

विदुर नीति:आकर्षक वाणी बोलना भी कठिन

  1. दुष्ट पुरुषों का बल हिंसा, राजाओं का बल दंड देना, स्त्रियों का बल सेवा और गुणवानोंका बल है क्षमा कर देना।
  2. वाणी का पूर्ण संयम तो बहुत कठिन माना ही गया है, परन्तु सार्थक तथा दूसरे आदमी को प्रभावित कर सके ऐसी आकर्षक वाणी बोलना भी कम कठिन नहीं है।
  3. मधुर शब्दों से युक्त बात अनेक प्रकार से लाभदायक होती है किन्तु कटु वाणी तो महान अनर्थकारी होती है और उससे तो हर हाल में बचना चाहिए।
  4. शरीर में घुसे बाण तो निकाले जा सकते हैं परन्तु कटु शब्द अगर किसी के मन में घर कर जाएं तो उसे निकालना कठिन होता है।
  5. जिसने स्वयं अपने आत्मा को ही जीत लिया है, वही उसका बंधू बन जाता है। आत्मा ही सच्चा बंधू है और वही नियत शत्रु भी है।
  6. जो धर्म और अर्थ का परित्याग कर अपनी इन्द्रियों के वश में हो जाता है वह जल्द ही अपने ऐश्वर्य, प्राण, धन-संपदा और स्त्री से वंचित हो जाता है।

Sunday, March 16, 2008

विदुर नीति:संतुलित भोजन से होते हैं अनेक लाभ

  1. नित्य स्नान करने वाले मनुष्य को बल, रूप, मधुर स्वर, आकर्षक वर्ण,, कोमलता, सुगंध, पवित्रता, शोभा, सुकुमारता और सौन्दर्य प्राप्त होता है।
  2. संतुलित भोजन करने वाले को आरोग्य, आयु, बल, सुख, सुन्दर संतान और समाज में सम्मान प्राप्त होता है। लोग उस पर अधिक खाने का आक्षेप नहीं करते।
  3. अकर्मण्य, अधिक खाने वाले और सबसे लड़ने वाले, मायावी, क्रूर, देश-काल न रखने वाले और खराब वेशभूषा धारण करने वाले को अपने घर में न ठहरने दें
  4. बहुत कष्ट झेलने पर भी कमजोर, अभद्र शब्द बोलने वाले,निर्बुद्धि, जंगल में रहने वाले, धूर्त, निर्दयी और कृतघ्न से कभी सहायता नहीं मांगनी चाहिए।

Saturday, March 15, 2008

मनुस्मृति:विद्यादान का है सर्वाधिक महत्व

1.किसी प्यासे को पानी पिलाने से स्वयं को भी तृप्ति मिलती है। इसी प्रकार अन्न का दानकरने पर दीर्घकाल का सुख, तिल का दान करने वाले को प्रिय संतान, दीपक का दान करने से उत्तम दृष्टि, भूमि का दान करने वाले को धरती, सोने का दान करने वाले को दीर्घायु , मकान दान करने वाले को महल और चांदी दान करने वाले को सुन्दर रूप की प्राप्ति होती है।

2.जल, अन्न, गाय, भूमि, वस्त्र तिल, सोना, और घी आदि समस्त दानों में विद्या और ज्ञान का दान सबसे अधिक महत्वपूर्ण है।

3.दान देने वाला जिस भाव से दान देता है उसी भाव से उसका फल भी उसे प्राप्त होता है।
4.जो व्यक्ति सम्मान के साथ दान देता है और लेने वाला भी उसी तरह लेता है तो उनको स्वर्ग की प्राप्ति होती है और श्रद्धा से रहित होकर दान देने और लेने वाला नरक में जाते हैं।

5.यदि दान मांगने वाला दान का उचित पात्र न लगता हो फिर भी उसे श्रद्धा के साथ दान देना चाहिए क्योंकि अगर दान देने की प्रवृति बनी रहती है तो कभी तो दान लेने वला योग्य पात्र मिल ही जायेगा जो दादा का उद्धार कर देगा।

Friday, March 14, 2008

विदुर नीति:मित्र की परीक्षा कभी न लें

१.जो मित्रों से सत्कार और सहायता पाकर कृतार्थ होकर भी उनका साथ नहीं निभाते ऐसे कृत्घ्नों के मरने पर उनका मांस तो मांसाहारी पशु भी नहीं खाते।
२.धनवान हो धनहीन मित्र का सम्मान करें। मित्रों से न तो किसी प्रकार की याचना करें और न ही उनकी परीक्षा लें।
३.दुष्ट पुरुषों का स्वभाव मेघ के समान चंचल होता है, वे सहसा क्रोध कर बैठते हैं और अकारण ही प्रसन्न हो जाते हैं।
४.हंस जिस प्रकार सूखे सरोवर के पास मंडरा कर रह जाते हैं उनके अन्दर प्रवेश नहीं करते उसी प्रकार जिसके ह्रदय में चंचलता का भाव विद्यमान है और अज्ञानी हैं वह भी इन्द्रियों के वश में रहता है अरु उसे अर्थ की प्राप्ति नहीं होती।

Saturday, March 8, 2008

रहीम के दोहे:मूर्ख को करनी का दंड देना जरूरी

खीरा सिर तें काटिए, मलियत नमक बनाय

रहिमन करुए मुखन को , चाहिअत इहै सजाय

कविवर रहीम कहते हैं कि जिस तरह खीरे का मुख काटकर उस पर नमक घिसा जाता है तभी वह खाने में स्वाद देता है वैसे ही मूर्खों को अपनी करनी की सजा देना चाहिऐ ताकि वह अनुकूल व्यवहार करें।

नये संदर्भ में व्याख्या-यह सही है कि बडों को छोटों के अपराध क्षमा करना चाहिए, पर कुछ लोग ऐसे होते हैं जो नित्य मूर्खताएं करते रहते हैं। कभी किसी की मजाक उडाएंगेतो कभी किसी को अपमानित करेंगे। कुछ तो ऐसी भी मूर्ख होते हैं जो दूसरे व्यक्ति को शारीरिक, आर्थिक और मानसिक हानि पहुँचने के लिए नित्य तत्पर रहते हैं। ऐसे लोगों को बर्दाश्त करना अपने लिए तनाव मोल लेना है। ऐसे में अपने क्रोध का प्रदर्शन कर उनको दण्डित करना चाहिए। अगर ऐसा नहीं करेंगे तो उनका साहस बढ़ता जायेगा।

व्याख्याकार स्वयं कई बार ऐसा देख चुका है कि कई लोग तो इतने नालायक होते हैं कि उनको प्यार से समझाओ तो और अधिक तंग करने लगते हैं और जब क्रोध का प्रदर्शन कर उन्हें धमकाया जाये तो वह फिर दोबारा वह बदतमीजी करने का साहस नहीं कर पाते। हालांकि इसमें अपनी सीमाओं का ध्यान अवश्य रखना चाहिऐ और क्रोध का बहाव बाहर से बाहर होना चाहिए न कि उसकी पीडा हमारे अन्दर जाये।

Friday, March 7, 2008

रहीम के दोहे: जहाँ दान और सम्मान का भाव न हो वहाँ से चले जाएं

रहिमन तब लगि ठहरिये, दान मान सनमान

घटत मान देखिय जबहिं तुरतहिं करिय पयान

कविवर रहीम कहते हैं कि उसी स्थान पर ठहरें जहाँ लोगों में दान और मान-सम्मान का भाव रहता है। जहाँ अपना सम्मान काम होते देखें वहाँ से पलायन कर जाना चाहिए।

संक्षिप्त व्याख्या- आजकल के महंगाई के युग में तो रहीम के यह वाक्य और अधिक प्रासंगिक है। वैसे भी हमें कई जगह अपने काम से जाना पड़ता है। आजकल रिश्तेदारी भी बहुत दूर-दूर होने लगी है इसलिए लोगों को दूसरे शहर जाना पड़ता है। पहले गावों में शादी-विवाह पर बहुत दिन तक रिश्तेदार रहते थे पर अब यह संभव नहीं। मनु स्मृति में तो लिखा है कि 'एक दिन से अधिक जो ठहरे अतिथि नहीं'। अत: लोग वैसे ही दूरी के कारण एक दिन से अधिक नहीं ठहरते। इसके अलावा भी हम किसी समूह में नित-प्रतिदिन रहते हैं और लग रहा हो कि अब उनके मन में सम्मान काम हो रहा है तो उनसे दूरी बना लेना चाहिए। स्थान से यहाँ आशय केवल भौतिक नहीं है बल्कि व्यवहार और संबंध से भी है। अगर हमसे व्यवहार करने वाले लोगों में जब हमारे लिए मान काम हो रहा है उनसे दूरी बनाना चाहिए। अगर हम किसी से रोज मिलेंगे तो वह वैसा सम्मान नहीं करेगा जिसकी हम आशा करते हैं।

इसके अलावा उन लोगों से भी दूरी बनाना चाहिऐ जो किसी का काम नहीं करते। यहाँ दान से आशय देने से है और इसे व्यापक अर्थों में लेना चाहिऐ। जिस्मने दान देने की प्रुवृति नहीं होती उसमें किसी का काम करने के भावना भी नहीं होती। अत: उनसे संपर्क रखने का कोई मतलब भी नहीं है।

Thursday, March 6, 2008

रहीम के दोहे:संसार को सूक्ष्म रूप में देखें

रूप, कथा, पद, चारु, पट, कंचन, दोहा, लाल

ज्यों ज्यों निरखत सूक्ष्मगति , मोल रहीम बिसाल

कविवर रहीम कहते हैं की सुन्दरता, कथा, काव्य, आकर्षक वस्त्र सोना, दोहा और अपने पुत्र का जब सूक्ष्म रूप में देखते हैं तो उनका महत्व बढ़ जाता है।

लेखकीय अभिमत- रहीम जी ने हर बात गूढ़ अर्थों में अपनी बात कही है। यह संसार बहुत सुन्दर हैं अगर हम उसका आनंद उठाएं पर यह तभी संभव है जब उसे निर्लिप्त भाव से देखें। अगर हम इसे गहराई और सूक्ष्म रूप से देखें तो इसमें परमात्मा की कला के दर्शन होते हैं। हम इसे भोगने के साथ निहारें तो इसमें परमात्मा के सुंदर स्वरूप के दर्शन होंगे। सुन्दर वस्त्रों को देखते हैं और फिर ध्यान कर पृथ्वी पर फ़ैली हरियाली को देखें तो वह उसी सुन्दर वस्त्रों की जननी है। कहीं कविता सुनते हैं तो उसमें छिपे गूढ़ अर्थों को समझें तभी आन्नद आता है। अक्सर कवियों का मजाक उडाया जाता है पर वह अपने अनुभव से जो सृजन करते हैं उसकी अनुभूति वही कर सकता है जो उसे ध्यान से पढता और सुनता है। सोना और अपनी संतान को सूक्ष्म रूप में देखना चाहिऐ किकिस तरह परमात्मा ने इस संसार का सृजन किया है। हम केवल बाह्य रूप देखते हैं और अपना समझकर उसमें तल्लीन हो जाते हैं और यही हमारे दुख का कारण बनता है। हमें इस तरह देखना चाहिए कि यह परमात्मा के ही देन और रचना है इसी को सूक्ष्म रूप से देखना कहते हैं। इससे मन में निर्लिप्ता और निष्काम भाव उत्पन्न होता है जीवन का आनंद वास्तविक रूप में तभी महसूस किया जा सकता है।

Wednesday, March 5, 2008

रहीम के दोहे:बेसन का आटा अच्छा, मैदा का नष्ट होना ठीक

रहिमन रहिला की भली, जो परसै चित लाय
परसत मन मैलो करे, सो मैदा जरि जाय


कविवर रहीम कहते हैं कि बेसन का आटा हितकर है क्योंकि उसको प्रेम से शरीर पर मला जाता है जबकि जो तन और मन को गंदा करता है उस मैदा का नष्ट होना ही अच्छा है।

भावार्थ- जिस प्रकार के आचरण, विचार और कार्य से हमारा स्वयं का मन शुद्ध होता हो, दूसरे का उपकार होता है और लोगों की बीच अच्छी छवि बनती है वह अच्छा है और उसी तरफ अपनी दृष्टि रखनी चाहिऐ। हमें मन में ऐसा कोई विचार नहीं लाना चाहिए जिससे अपने या दूसरे के प्रति वितृष्णा का भाव पैदा होता हो। अपने आचरण और कार्य से किसी को हानि पहुँचती है तो उसको नहीं करना चाहिऐ। बुरे विचार को नष्ट कर देना चाहिऐ।

जबकि आजकल हम देख रहे हैं कि किसी को अपमानित कर लोग अपने को सम्मानित समझते हैं और दूसरे को हानि पहुंचाने में अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हैं और इतना ही नहीं अपने बच्चो को भी ऐसे संस्कार भरते हैं जो बाद में उनके लिए ही भयावह सिद्ध होते हैं। जो अपने कुकर्मों और बाहुबल से प्रभाव बनाते हैं लोग उनको सम्मान देते हैं और उनके प्रति आदर भाव व्यक्त करते हैं। जबकि उनकी तरफ से मुहँ फेर लेना चाहिऐ। बुरा व्यक्ति, आचरण, विचार और सामान त्याग देना चाहिऐ।

Tuesday, March 4, 2008

रहीम के दोहे:सूर्य उल्लू को नहीं दिखाई देता

सीत हरत, तम हरत नित, भुवन भरत नहिं चूक
रहिमन तेहि रबि को कहा, जौ लखै उलूक


कविवर रहीम कहते हैं कि जो सूर्य समस्त प्राणियों की ठंड को दूर करता है और प्रतिदिन पृथ्वी के अंधकार को नष्ट करता है। सारे संसार में प्रकाश बिखेरने वाला सूर्य उल्लू को नहीं दिखाई देता।

भावार्थ- जिस तरह सूर्य के प्रकाश को उल्लू नहीं देख पाता वैसे ही बुद्धि से रहित व्यक्ति ज्ञान से परे रहते हुए जीवन भर कष्ट उठाता है। कई लोगों के लिए तो ज्ञान एक तरह से विष की तरह होता है क्योंकि भ्रम में जीने के आदी ऐसे लोग ज्ञान की बात सुनकर मानसिक रूप से विचलित हो जाते हैं और अपने अज्ञान को ही ज्ञान समझने लगते हैं। जैसे सूर्य की रौशनी को उल्लू नहीं देख पाता वैसे ही मूर्ख लोग ज्ञान की बात नहीं सुनना चाहते। अत: नित सत्संग करते रहना चाहिए और साधू-संतों के सन्देश सुनते रहना चाहिए और और उनके ज्ञान को ग्रहण करना चाहिए। हमें यह नही देखना चाहिए कि कौन क्या कर रहा है? कई लोग संतों के दोष देखने लगते हैं वह उल्लू की तरह हैं जिन्हें अँधेरा प्रिय हैं। जो इस बात के परवाह नहीं करते कि किसका आचरण कैसा है और उनसे ज्ञान ग्रहण करते हैं वह सही मायने में मनुष्य बुद्धि हैं। जैसे सूर्य की रौशनी को उल्लू नहीं देख पाता वैसे ही मूर्ख लोग ज्ञान की बात नहीं सुनना चाहते। अत: नित सत्संग करते रहना चाहिए और साधू-संतों के सन्देश सुनते रहना चाहिए और और उनके ज्ञान को ग्रहण करना चाहिए।

Monday, March 3, 2008

रहीम के दोहे: मुखिया की चुगली आचरण को भ्रष्ट कर देती है

रोल बिगाड़े राज ने, मोल बिगाड़े माल
सनै सनै सरदार की, चुगल बिगाड़े चाल


कविवर रहीम कहते हैं कि राज्य पानी के बहाव को बिगाड़ देता है. मोलभाव करने से माल का महत्व कम हो जाता है. धीरे धीरे मुखिया की चुगलखोरी आचरण को बिगाड़ देती है।

भावार्थ- राज्य के मद में आदमी अहंकारी हो जाता है और पथ भ्रष्ट हो जाता है. किसी वस्तु का मूल्य अधिक माँगा जाता है तो लोग उसे खरीदने से इनकार कर देते हैं और जब अपने समूह का मुखिया जब अनाप-शनाप बकने लगता है तो लोगों का आचरण भ्रष्ट हो जाता है। मुखिया अपने समूहों को इधर-उधर से ऐसी खबरें (शिकायतें) देता है जिससे लोग उतेजित होकर उसका साथ देते रहे और यह उतेजना पूरे समूह को बुद्धि से भ्रष्ट कर देती है और वह अनावश्यक रूप से ऐसी समस्याओं के लिए आक्रामक हो जाते हैं जो कभी आती ही नहीं।

Sunday, March 2, 2008

रहीम के दोहे:राम नाम की बजाय उपाधि को महत्व देने वालों का जीवन व्यर्थ

राम नाम जान्यो नहीं, जान्यो सदा उपाधि
कहि रहीम तिहिं आपुनो, जनम गंवायो वादि


कविवर रहीम कहते हैं कि जिन लोगों ने नाम का नाम धारण न कर अपने धन, पद और उपाधि को ही जाना और राम के नाम पर विवाद खडे किये उनका जन्म व्यर्थ है. वह केवल वाद-विवाद कर अपना जीवन नष्ट करते हैं।

राम नाम जान्यो नहीं, भइ पूजा में हानि
कहि रहीम क्यों मानिहै, जम के किंकर कानि


कविवर रही कहते हैं कि जिस मानव ने राम की महिमा नहीं समझी और अन्य देवों की ही पूजा की तो उसमें उसे हानि ही होती है। ऐसे में यमराज के सेवक किसी मर्यादा को नहीं मानेंगे।
भाव-राम का नाम ही सत्य है और बाक़ी अन्य देवों की पूजा से क्या लाभ. उससे तो मन इधर उधर भटकता है ऐसे में जब मृत्यु आती है तो बहुत तकलीफ होती है और पूरा जीवन भी राम का नाम लिए बिना बडे कष्ट से बीतता है।

Thursday, February 28, 2008

रहीम के दोहे: बुरे दिनों में बडे लोगों ने भी छोटे काम किए

रहिमन दुरदिन के परे, बडे न किए घटि काज
पांच रूप पांडव भए, रथवाहक नल राज

कविवर रहीम कहते हैं कि बुरे दिनों में भी छोटे कार्य किये। अज्ञातवास में पांडवों ने पांच स्वरूप धारण किए, इसी तरह राजा नल को भी विपत्ति में छोटा कार्य करना पडा। उन्हें भी सारथी बनना पडा था।

रहिमन दानि दरिद्र तर, तऊ जांचबे योग
ज्यों सरितां सूखा परे, कुआं खनावत लोग

कविवर रहीम कहते हैं कि दानी और निर्धन की तभी परीक्षा तभी होती हैं जब उनके पास धन समाप्त हो जाता जैसे नदियों का जल सूख जाने पर लोग कुआं खुदवातेहैं

Wednesday, February 27, 2008

रहीम के दोहे:अधर्म का धन जल्दी नष्ट होता है

रहिमन वित्त अधर्म को, जरत न लागै बार

चोरी करि होरी रचि, भई तनिक में छार

कविवर रहीम कहते हैं की पाप के धन को नष्ट होने में समय नहीं लगता। जैसे चोरी करके होली उत्सव के लिए लकडी जुटाई जाती है और वह पल भर में राख हो जाती है।

रहिमन वे नर मार चुके, जे कहूँ मांगन जाहिं

उनते पाहिले वे मुए, जिन मुख निकसत नाहिं

कविवर रहीम कहते हैं किवह लोग मृतक समान है जो कहीं मांगने जाते हैं पर उनसे पहले तो मृतक वह हैं जो मांगने पर मना कर देते हैं।

Saturday, February 16, 2008

विदुर नीति:छ: तलवारें ही काटती हैं मनुष्य की देह

१.जो मनुष्य जैसा व्यवहार करे उसके साथ भी वैसा भी वैसा ही करना चाहिए-यही नीति धर्म है। कपट का आचरण करने वाले के साथ कपटपूर्ण बर्ताव करें और सद्व्यवहार करने वाले के साथ साधुता का बर्ताब करें।

२.बुढापा रूप का, आशा धैर्य का, मृत्यु प्राणों का, असूया धर्माचरण का, काम लज्जा का, नीचता पूर्ण कर्म सदाचार का, क्रोध लक्ष्मी का और अंहकार सर्वस्व का ही नाश कर देता है।

३.अत्यंत अभिमान, अधिक बोलना, त्याग के भाव का न होना, अपना ही पेट पालने के प्रवृति और मित्र के साथ विश्वासघात-यह छ: तीखी तलवारे देहधारियों की आयु को काटती हैं। यह मनुष्य का वध करती हैं न की मृत्यु प्रदान करती हैं।

४.आपत्ति के लिए धन की रक्षा करें, धन के द्वारा भी स्त्री की रक्षा करें और स्त्री और धन दोनों के द्वारा सदा अपनी रक्षा करें।

Saturday, February 9, 2008

मनुस्मृति:बिना याचना के जो मिले उसे अमृत कहते हैं

१.इन्द्रियों के विषयों-रूप, रस, गंध, शब्द और स्पर्श-में विद्वानों को कभी आसक्त नहीं होना चाहिए. विषयों की आसक्ति से बचने के लिए मन को संयमित करना चाहिए।
२. विद्वानों को अपनी जीविका चलाने के लिए संसार के अन्य व्यक्तियों के समान छल-कपट नहीं करना चाहिए, अपितु सब प्रकार के पवित्र और शुद्ध जीविकोपार्जन के साधन ही अपनाना चाहिए।
३.संतोष और संयम से ही स्थाई सुख की प्राप्ति होती है, अत: विद्वान को सदैव संतोष और संयम धारण करना चाइये. उसे यह याद रखना चाहिए की संतोष ही सुखों का मूल है और असंत्सोह दु:खों का कारण होता है।
४.उंछ और शिल को ऋत कहते हैं, जो कुछ बिना याचना के मिल जाए उसे अमृत कहते हैं, भिक्षा मांगना मृत है और कृषि करना प्रमृत है।
*खेती करने से अनेक सूक्ष्म जीवों की हत्या अनजाने में हत्या होती है अत उसे 'प्रमृत' कहते हैं।
*कृषक द्वारा खेत में बोए अन्न को काटकर ले जाने के पश्चात उसके द्वारा छूट गए या मार्ग में गिर गए दानों को उंगली से चुनने को उंछ और धान्य यानी बालियों को चुनने को शिल कहते हैं।

Sunday, January 20, 2008

रहीम के दोहे:अक्षर हैं कम पर अर्थ है गहरा

दीरघ दोहा अरथ के, आखर थोरे आहिं
ज्यों रहीम नट कुंडली, सिमिट कूदि चढिं

कविवर रहीम कहते हैं की जैसे खेल दिखाते हुए नत कूद-कूदकर अपने आपको सावधानी से संभालता हुआ शीघ्रता से ऊपर की नोंक पर कूद-कूदकर अपने आपको सावधानी से संभालता हुआ शीघ्रता से ऊपर बांस की नोंक पर कुंडली मारकर चढ़ जाता है, उसी प्रकार रहीम के दोहों में शब्द तो कम हैं परन्तु अर्थ बहुत गहरा है.

Saturday, January 19, 2008

संत कबीर वाणी:माया के होते हैं नौ-नौ लंबे हाथ सींग

देखा देखी भक्ति का, कबहूँ न चढ़सी रंग
<विपत्ति पडे यों छाड्सी, केचुली तजत भुजंग

देखा-देखी की हुई भक्ति का रंग कभी भी आदमी पर नहीं चढ़ता और कभी उसके मन में स्थायी भाव नहीं बन पाता। जैसे ही कोई संकट या बाधा उत्पन्न होती है आदमी अपनी उस दिखावटी भक्ति को छोड़ देता है। वैसे ही जैसे समय आने पर सांप अपने शरीर से केंचुली का त्याग कर देता है।


कोटि करम लगे रहै, एक क्रोध की लार
किया कराया सब गया, जब आया हँकार


रेशम के कीडे द्वारा जैसे अत्यंत लंबा रेशम का धागा बँटा जाता है, उसी प्रकार एक क्रोध ही करोडों पाप कर्मों को उत्पन्न करता है। जब मनुष्य को अंहकार आ जाता है तो उसके पुण्य, तप, ज्ञान, गुण आदि सभी नष्ट हो जाते हैं।

माया माथै सींगड़ा, लम्बे नौ-नौ हाथ
आगे भारे सींगड़ा, पाछै मारै लात


माया के माथे पर मद और अंहकार रुपी, लोभ और अज्ञान रूपी सींग होते हैं जो नौ-नौ हाथ लम्बे होते हैं। आते समय वह सींग मारती और जाते समय लात मारती है।

Tuesday, January 15, 2008

संत कबीर वाणी: जो शूरवीर प्रेम में घायल होते हैं

घायल की गति और है, औरन की गति और
प्रेम बाण हिरदै लगा, रहा कबीर ठौर


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं जो शूरवीर प्रेम में घायल होते हैं उनके तन-मन की गति अन्य लोगों से अलग होती है। हृदय में प्रेम-बाण लग जाने पर प्रेमी अपने स्थान पर ठहर जाता है।
भावार्थ- यहाँ आशय यह है कि जिसको भगवान से प्रेम होता है उसकी दशा सामान्य लोगों से अलग हो जाती है वह तो केवल भगवान की भक्ति में लीन हो जाते हैं। उन्हें तो बस सत्संग और स्मरण में ही मजा आता है।

चित चेतन ताज़ी करै, लौ की करै लगाम
शब्द गुरु का ताजना, पहुचाई संत सुठाम


अपनी चित्त वृत्ति को घोड़ी बनाएं, उस पर ध्यान लगाएं और सदगुरू के शब्द-ज्ञान का कोडा लें। इस प्रकार कुशल संत और साधक भगवान की भक्ति कर अपना लक्ष्य प्राप्त कर लेते हैं।

भावार्थ-आदमी अगर अपने चित्त पर नियंत्रण करना सीख ले तो उसके लिए कोई काम कठिन नहीं है बस इसके लिए भगवान में मन लगा चाहिए। उनका नाम स्मरण अपने आप में बहुत बड़ी शक्ति है और उससे भक्त में बहुत बड़ी शक्ति आती है।

Sunday, January 13, 2008

संत कबीर वाणी:गुरु के बिना भवसागर से मुक्ति नहीं

साबुन बिचारा क्या के, गांठे राखे मोय
जल सो अरसां नहिं, क्यों कर ऊजल होय


संत कबीर दास कहते हैं कि साबुन क्या करे बेचारा, जब उसको गाँठ अपने हाथ में बाँध रखा है. जल के स्पर्श करता ही नहीं फिर कपडा कैसे उज्जवल हो सकता है.
भाव-ज्ञान की बात तो कंठस्थ कर लेते हैं पर जब समय आता है तो सब भूल जाता है इसमें ज्ञान का कोई दोष नहीं हैं.

भौ सागर की त्रास तेक गुरु की पकडो बाँहि
गुरु बिन कौन उबारसी, भी जल धारा माहिं

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि इस संसार सागर के दुखों से बचने के लिए गुरु का हाथ पकडो. गुरु के बिना इस भाव सागर से मुक्ति नहीं हो सकती.

Saturday, January 12, 2008

सब करो चिट्ठे की चर्चा, उसमें नहीं बुद्धि का खर्चा

अपरिहार्य कारणों से यह पोस्ट वापस ली गयी है, इसे कुछ समय बाद जारी करने पर विचार किया जा सकता है
दीपक भारतदीप

Friday, January 11, 2008

दीपक भारतदीप का मूल्यांकन करने वाले अपनी काबलियत बताएं

दिलचस्प बात यह है कल से मैंने जो पोस्ट डालीं हैं उनमें जो विवाद हैं उसे लोग पढ़ खूब रहे हैं पर कमेन्ट कोई नहीं दे रहा है. मतलब लोग रट्टा कौन मोल ले यही सोचकर चुप हैं-चौपालों पर डर का माहौल बनाकर रखा है.. अगर मेरी जगह कोई और होता तो उसकी तो हालात पतली कर देते पर मुझे देखकर उनकी आवाज बंद है, वैसे भी डरना क्या? कौन वह इसे पढ़ रहे हैं, पढ़ते होते तो मेरा सबसे हल्का ब्लॉग ले जाते. मालुम है कि इसके ब्लॉग सब भारी-भरकम हैं नहीं झेल पायेंगे. ले जाना भी जरूरी है आख़िर भारत का सबसे तेज ब्लोगर है पुरस्कार में वजन कहाँ से आयेगा?

मेरे इस सवाल का जवाब कोई नहीं दे रहा कि चाहे वह मेरा हल्का ब्लॉग था पर तुम्हें पता है उसमें गणेश जी पर एक पोस्ट है और उसे तुमने पढा? तुम्हें मेरा कोई ब्लॉग शामिल करना ही नहीं था. उसमें धर्म-कर्म से संबधित बहुत सामग्री है. तुम में अपने लिखने के अहंकार के साथ इसमें तमाम तरह के ग़लत फायदे उठाने का भाव है और दिखते किसी भी धर्म के हो पर उसका कोई सम्मान नहीं है. नहीं तो बताते तो क्यों नहीं कि तुम्हारी काबलियत क्या है कि तुम दीपक भारतदीप का मूल्यांकन करोगे? अब तुम मुश्किल में हो. चुपचाप एक पोस्ट डालकर माफ़ी मांग लो नहीं तो झेलते रहो. रोज तो तुम पर लिखूंगा नहीं पर चाहे जब आयेगा तुम पर लिख कर नए ब्लोगरों का मनोबल बढ़ाने का प्रयास करूंगा जिसे तुमने गिराने की कोशिश की हैं और मैं यह होने नहीं दूँगा. तुम यह तो बताओं कि क्या लिखते हों जो मेरे लिखे का मूल्यांकन करोगे. चाहे जिसे और जैसे पुरस्कार दो पर मेरा नाम क्यों जोडा. मुझसे पूछा. क्या तुमने ब्लॉग बना लिया तो क्या समझ लिया कि सब ब्लॉग तुम्हारी जागीर हो गए और उनका मूल्यांकन करोगे और पोस्ट पर छापोगे. मैं जानता हू कि ऐसे पुरस्कार कैसे दिए जाते हैं. इतने सारे पुरस्कार के लिए आवेदन मांगे जाते हैं पर मैं कभी नहीं करता, और तुम मेरा ब्लॉग मुझसे लिए बगैर उसका मूल्यांकन करने लगे. यार अपनी काबलियत बताओ कि आख़िर भारत के सबसे तेज ब्लोगर का मूल्यांकन कैसे किया ?

Thursday, January 10, 2008

संत कबीर वाणी:जहाँ कपट हो वहाँ न जाएं

जीव हनेँ हिंसा करेँ, प्रगट पाप सिर होय
पाप सबन जो देखिया, पुन्न न देखा कोय


संत शिरोमणि कबीरदास जे कहते हैं कि जो जीव को मारता है उसके पाप का भार प्रत्यक्ष रुप से उसके सिर पर दिखाई देता है पर उनके जो पुण्य कर्म हैं वह किसी को दिखाई नहीं देते क्योंकि हिंसा करने वाले पापी होते हैं और उन्हें किसी भी तरह पुण्यात्मा नहीं माना जा सकता।

कबीर तहां न जाइए, जहाँ कपट का हेत
जानो काले अनार के, तन राता मन सेत


इसका आशय यह है कि वहां कदापि न जाइए जहाँ कपट का प्रेम हो। उस प्रेम को ऐसे ही समझो जैसे अनार की कली, जो ऊपरी भाग से लाल परंतु भीतर से सफ़ेद होती है। वैसे हे कपटी लोग मुहँ पर प्रेम दिखाते हैं पारु उनके भीतर कपट की सफेदी पुती रहती है ।

कबीर तहां न जाइए, जहाँ कपट को हेत
नौ मन बीज जू बोय के, खालि रहिगा खेत


इसका आशय यह है कि वहाँ कतई न जाएँ जहां कपट भरे प्रेम मिलने की संभावना हो। जैसे ऊसर वाले खेत में नौ मन बीज बोने पर भी खेत खाली रह जाता है, वैसे ही कपटी से कितना भी प्रेम कीजिये परन्तु उसका हृदय प्रेम-शून्य ही रहता है।

Wednesday, January 9, 2008

जब सस्ती कार सड़क पर आयेगी

सुना है अब सस्ती कर सड़क पर आयेगी
जब महंगी ही थी तब भी
कोई कम कहर बरपातीं थीं
जो सस्तीं में रहम दिखाएंगी
मोटर साइकिल के झुंड ही
रास्ते पर पैदल चलना मुश्किल कर देते
कारों के हार्न ही कान बहरा कर देते
सस्ते होने से कारों के संख्या जो बढेगी
सांस लेना होता जायेगा मुश्किल
महंगाई के इस युग में
जिन्दगी हो गयी है सस्ती आदमी
सस्ती कारो से मुफ्त की हो जायेगी
पहिये तो कार में चार ही होंगे
पर कोई सड़क तो चौड़ी नही हो पायेगी
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रहीम के दोहे:स्त्री को दीपक की तरह आवरण में रखो

जो रहीम दीपक दसा, तीय राखत पट ओट
समय परे ते होत है, वही पट की चोट

कविवर रहीम कहते हैं कि अपनी स्त्री को दीपक की तरह आवरण में रखो। जैसे हवा लगने से दीपक बुझ जाता है उसी प्रकार पुरुष द्वारा किये गए बुरे व्यवहार से स्त्री का मन आहत हो जाता है।

जो रहीम पगतर परो, रगरि नाक अरु सीस
निठुर आगे रोयबो, अंस गारिबो खीस


कविवर रहीम कहते हैं कि मैं उसके चरणों में गिर पडा। अपना मस्तक और नाक भी रगड़ दी परन्तु निष्ठुर व्यक्ति के समक्ष रोने से अश्रुधारा प्रवाहित करना भी व्यर्थ हो गया।

भावार्थ-अगर किसी व्यक्ति का यह पता लग जाये कि वह निष्ठुर स्वभाव का है तो उसके पास जाकर किसी भी प्रकार की याचना और प्रार्थना करना व्यर्थ है।

Tuesday, January 8, 2008

चाणक्य नीति:भोजन के तत्काल बाद मेजबान का घर छोड़ दें

१.मन का संयम अर्थात शांति और स्थिर भाव के समान कोई दूसरा तप नहीं है, संतोष जैसा कोई सुख नहीं, तृष्णा जैसा दु:ख देने वाला और भयंकर रोग नहीं तथा दया जैसा स्वच्छ और अच्छा दूसरा कोई धर्म नहीं । अत: सुख के इच्छुक व्यक्ति को तृष्णा से बचना चाहिए तथा सफलतम जीवन में शांति,संतोष और दया को अपनाना चाहिए। इसी में महानता है।
२.जिस प्रकार सोने की चार विधियों-घिसना, काटना, तपाना तथा पीटने-से जांच की जाती है, उसी प्रकार मनुष्य की श्रेष्ठता की जांच भी चार विधियों-त्यागवृति, शील, गुण तथा सतकर्मो -से की जाती है।
३.संसार के दुखों से दुखित पुरुष को तीन ही स्थान पर थोडा विश्राम मिलता है- वह हैं संतान, स्त्री और साधूराजा की आज्ञा, पंडितों का बोलना और कन्यादान एक ही बार होता है।एक व्यक्ति का तपस्या करना, दो का एक साथ मिलकर पढ़ना, तीन का गाना, चार का मिलकर राह काटना, पांच का खेती करना और बहुतों का मिलकर युद्ध करनापक्षियों में कोआ, पशुओं में कुत्ता और मुनियों में पापी चांडाल होता है पर निंदा करने वाला सबसे बड़ा चांडाल होता है।

4.जिस प्रकार कोई गायिका निर्धन प्रेमी को नहीं पूछती, पराजित राजा को जनता मान नहीं देती, उसी प्रकार से सूखे और टूटे वृक्ष को पक्षी छोड़ जाया करते हैं। अत: अतिथि को चाहिए कि वह भोजन के तुरन्त बाद मेजबान का घर छोड़ दे।
5.यजमान के घर सर पुरोहित दक्षिणा लेकर और विद्या अर्जन के बाद विद्यार्थी गुरू के द्वार से चला जाता है उसी प्रकार से वन के जल जाने पर पहु-पक्षी वन का त्याग कर अन्यत्र पलायन कर जाते हैं।
लेखकीय अभिमत-चाणक्य एक महान विद्धान थे और इन अन्तिम दोनों संदेशों में उनका यही आशय है कि आदमी को और परिस्थियों को ध्यान में रखते हुए अपनी शारीरिक सुरक्षा और मान-सम्मान के लिए सतर्कता बरतना चाहिए।

Monday, January 7, 2008

चाणक्य नीति:कार्य में स्थिरता बिना सम्मान नहीं मिलता

१.जिसके कार्य में स्थिरता नहीं है, वह समाज में सुख नहीं पाता न ही उसे जंगल में सुख मिलता है. समाज के बीच वह परेशान रहता है और किसी का साथ पाने के लिए तरस जाता है.
२.गंदे पड़ोस में रहना, नीच कुल की सेवा, खराब भोजन करना, और मूर्ख पुत्र बिना आग के ही जला देते हैं.
३.कांसे का बर्तन राख से, तांबे का बर्तन इमले से,स्त्री रजस्वला कृत्य से और नदी पानी की तेज धारा से पवित्र होती है.
४.मनुष्य में अंधापन कई प्रकार का होता है. एक तो जन्म के अंधे होते हैं और आंखों से बिलकुल नहीं देख पाते और कुछ आँख के रहते हुए भी हो जाते हैं जिनकी अक्ल को कुछ सूझता नहीं है.
५.काम वासना के अंधे के कुछ नहीं सूझता और मदौन्मत को भी कुछ नहीं सूझता. लोभी भी अपने दोष के कारण वस्तु में दोष नहीं देख पाता. कामांध और मदांध इसी श्रेणी में आते हैं.
६.कुछ लोगों की प्रवृतियों को ध्यान में रखते हुए उनको वश में किया जा सकता है, और उनको वश में किया जा सकता है, लोभी को धन से, अहंकारी को हाथ जोड़कर, मूर्ख को मनमानी करने देने से और सत्य बोलकर विद्वान को खुश किया जा सकता है.

Sunday, January 6, 2008

संत कबीर वाणी:सिर दक्षिणा में दे सके वही प्रेम योग्य

प्रेम पियाला सो पियो, शीश दच्छिना देय
लोभी शीश न दे सकै, नाम प्रेम का लेय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि प्रेम का प्याला वही प्रेमी पी सकता है जो अपना सिर दक्षिणा दे सकता है और जो भगवान का नाम केवल दिखाने के लिए लेता है वह लोभी कभी भी प्रेम नहीं कर सकता।

भावार्थ-यहाँ कबीरदास जी का अपना सिर दक्षिणा में दिने से आशय निष्काम भक्ति से है। हमारे दिमाग में भक्ति के समय भी अनेक बाते भरी होतीं है और अगर उन चिंताओं का बोझ सिर से उतार कर भक्ति में लीन हुआ जाये तभी सच्ची भक्ति प्राप्त हो सकती है।

कथन थोथी जगत में, करनी उत्तम सार
कह कबीर करनी भली, उतरै भौजल पार
संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं कि अपने मुहँ से बातें करना बहुत आसन होता है परन्तु करना मुश्किल है। वास्तविकता यह है कि जब कोई अच्छा काम करेंगे, तभी इस जीवन रुपी भवसागर से पार हो सकेंगे।

Friday, January 4, 2008

संत कबीर वाणी:मान पाने की लालसा कुत्ते का लक्षण

मान बढाई जगत में, कूकर की पहचान
प्यार किए मुख चाटई, बैर किये तन हान


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मान पाने की लालसा, बडाई सुनने की इच्छा तो कुत्ते के लक्षण है। कुता पुचकारे जाने पर पुँछ हिलाता हुआ अपने मालिक के प्रति सम्मान प्रकट करता है और जब उसे फटकारा जाता है तो काटने लगता है।

बड़ा बडाई ना करे, बड़ा न बोले बोल
हीरा मुख से ना कहै, लाख टका मेरो मोल


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते है कि जो व्यक्ति वास्तव में योग्य ज्_ंजानी, विद्वान और शक्तिशाली हैं वह कभी भी अपने मुहँ से अपनी बडाई नहीं करता जैसे कोई हीरा अपने मुहँ से अपने कीमती होने का बयान नहीं करता।

Thursday, January 3, 2008

चाणक्य नीति:सज्जन पुरुष अर्थाभाव में भी सज्जनता नहीं छोड़ते

1.दान, शक्ति, मीठा बोलना, धीरता और सम्यक ज्ञान यह चार प्रकार के गुण जन्म जात होते हैं, यह अभ्यास से नहीं आते।
2.जिसकी मन में पाप हैं, वह सौ बार तीर्थ स्नान करने के बाद भी पवित्र नहीं हो सकता, जिस प्रकार मदिरा जलाने पर भी शुद्ध नहीं होता।
3.जो वर्ष भर मौन रहकर भोजन करता है, वह हजार कोटी वर्ष तक स्वर्ग लोक में पूजित होता है।
4.पीछे-पीछे बुराई कर काम बिगाड़ने वाले और सामने मधुर बोलने वाले मित्र को अवश्य छोड़ देना चाहिए।
5.इस संसार में कट जाने पर भी चन्दन का वृक्ष अपनी सुगन्ध नहीं छोड़ता, हाथी बूढा हो जाने पर भी अपनी विलासिता नहीं छोड़ता, गन्ना कोल्हू में पिस जाने पर भी अपनी मिठास नहीं छोड़ता ऐसे ही सज्जन पुरूष अर्थाभाव में भी अपनी सज्जनता नहीं छोड़ते।

Wednesday, January 2, 2008

संत कबीर वाणी:साधू को वैरागी और गृहस्थ को उदार होना चाहिए

'कबीर' हरि कग नाव सूं , प्रीती रहे इकवार
तो मुख तैं मोती झडै , हीरे अंत न पार

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि यदि हरिनाम पर अविरल प्रीती बनी रहे तो उसके मुख से मोती ही मोती झाडेंगे और इतने हीरे कि उनकी गिनती नहीं हो सकती।

बैरागी बिरकत भला, गिरही चित्त उदार
दुहूँ चूका रीता पडै, वाकूं वार न पार


बैरागी वही अच्छा है जिसमें सच्ची विरक्ति हो और गृहस्थ वह अच्छा जिसका हृदय उदार हो। यदि बैरागी के मन में विरक्ति नहीं और गृहस्थ के मन में उदारता नहीं तो दोनों का ऐसा पतन होगा कि जिसकी हद नही है।

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