Friday, July 29, 2011

मनुस्मृति-प्रजा की रक्षा न करने वाला राजा दंड का भागी होता है

         भारतीय अध्यात्म में राजधर्म का बहुत ही व्यापक वर्णन है पर लगता है कि आधुनिक राजनीति विशारद उसकी इसलिये उपेक्षा करते हैं क्योंकि उनको लगता है कि आज के समय में सात्विक रूप से राज्य चलाना संभव नहीं है। उनकी यह सोच स्वभाविक भी है। दरअसल पहले राजतंत्र की प्रणाली थी जो कि पूरे विश्व में करीब करीब समाप्त हो चुकी है। अब या तो लोकतंत्र है या ताना शाही। राजकर्म से जुड़ने वाले लोगों से सात्विक होने की अपेक्षा करना अब संभव नहीं है। यही कारण है कि भारत में अपनी स्वदेशी सोच की बजाय विदेशी विचारधाराओं को अपनाया गया है। पहले कहा जाता था कि यथा राजा तथा प्रजा अब यह कहा जा सकता है कि यथा प्रजा तथा राजा।
     हमारे समाज में न्यायिक सिद्धांतों पर उल्लंघन की प्रवृत्ति बढ़ी है। छोटा हो या बड़ा आदमी धन, बल, और उच्च पद पाने के लिये हमेशा इसलिये संघर्षरत रहता है ताकि वह समाज पर अपना प्रभाव जमा सके। अपने प्रभाव से किसी का भला करें यह भाव तो केवल विरले ही लोगों में दिखाई देता है।
योऽरक्षन्बलिमादत्ते करं शुल्कं च पार्थिवः।
प्रतिभागं च दण्डं च से सद्यो नरकं व्रजेत्।।
            ‘‘यदि राजा प्रजा की रक्षा नहीं करता, लेकिन बलि, कर व शुल्क के रूप में प्रजा से आय का छठा हिस्सा प्राप्त करत है तो वह राजा दंड पाने का भागी है तथा उसे शीघ्र ही नरक प्राप्त होता है।
यदधीते यद्यजते यद्ददाति यदचैति।
तस्य षड्भागभाग्राजा सम्यग्भवति रक्षणात्।।
         ‘‘जो राजा प्रजा को निडर बनाता है उसे अपनी प्रजा के उन लोगों के समग्र पुण्य फल का छठा भाग प्राप्त होता है जो वेदाध्ययन और यज्ञ करने के साथ ही दान दक्षिणा देते हैं।
           ऐसी स्थिति में राजकर्म से परे लोग यह अपेक्षा करते हैं कि राज्य व्यवस्थायें सात्विक हों तो निरर्थक है। जब सात्विकता का प्रभाव समाज में ही नहीं है तो वहां से निकले आधुनिक राजाओं से अपेक्षा करना व्यर्थ नहीं तो और क्या है? एक तो भारतीय अध्यात्म दर्शन में वैसे ही राजधर्म का निर्वाह अत्यंत कठोर बताया गया है उस स्थिति यह है कि आज का समाज अपने प्राचीन ग्रंथों से दूर हो गया है। जिन वेदों में जीवन का सार है उनको कलंक बताया जाता है। जो श्रीमद्भागवत गीता जीवन रहस्य उजागर करते हुए मनुष्य को सत्कर्म में लिप्त रहने का उपदेश देती है उसे सन्यासियों के लिये उपयुक्त बताकर उपेक्षित कर दिया गया है। ऐसे में राजकर्म में श्रेष्ठ आचरण की आशा करना अजीब लगता है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Sunday, July 24, 2011

चाणक्य नीति-दुष्टों और मूर्खों को सुधारने का प्रयास व्यर्थ(dushton aur murkhon ko sudharne ka prayas vyarth)

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा "भारतदीप"
             हम अपने ज्ञान और विचार से किसी मूर्ख व्यक्ति को बुद्धिमान बना सकते हैं या दुष्ट में सज्जनता ला सकते हैं यह सोचना भी ठीक नहीं है। अनेक बार कुछ अल्पज्ञानी लोग अपने ज्ञान का बखान सार्वजनिक रूप से लोगों के बीच में बैठकर करते हैं यह सोचकर कि वह उनको सुधार लेंगे और समाज में बुद्धिमार का दर्जा पायेंगे। यह उनके अपूर्ण ज्ञान का परिचायक ही है क्योंकि वह पीठ पीछे लोगों की हंसी का पात्र बनते हैं। अनेक बार उनको ज्ञानी कहकर मजाक भी बनाया जाता है। सामान्यजन उनको केवल बकवादी समझते हैं।
         दरअसल इस संसार के विषय इतने व्यापक और आकर्षक हैं उनमें सभी लोग रमे हुए हैं। उनके लिये उनका मोह, लोभ और क्रोध ही सत्य है। अल्पज्ञानी लोग इसे नहीं जानते पर तत्व ज्ञानी श्रीमद्भागत गीता में वर्णित यह तथ्य नहीं भूलते जिसमें भगवान ने कहा है कि हजारों में भी कोई एक मुझे भजता है और उनमें भी हजारों में से कोई एक मुझे पाता है। स्पष्टतः यही कहा गया है कि सामान्य मनुष्यों में ज्ञानी उंगलियों पर गिनने लायक ही होंगे।
           नीति विशारद चाणक्य ने अपनी चाणक्य नीति में कहा है कि
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           अन्तःसारविहीनानामुपदेशो न जायते। 
          मलयाचलसंसर्गात् न वेणुश्चन्दनायते।।
            ‘‘जिसके अंदर योग्यता का अभाव है और जिसका हृदय अत्यंत मैला है उस पर किसी के उपदेश वैसे ही कोई प्रभाव नहीं होता जैसे मलयागिरी से आने वाली वायु के स्पर्श से भी बांस चंदन नहीं बनता।
                यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करीति किम्।
               लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणः किं करिष्यति।।
              ‘‘जिसके पास स्वयं ही बुद्धि नहीं है वेद शास्त्र उसे कोई लाभ नहीं कर सकते। वैसे ही जैसे जन्मांध व्यक्ति के दर्पण कोई कार्य नहीं कर सकता।
               दुर्जनं सज्जनं कर्तुमुपायो न हि भूतले।
             अपानं शतधा धौतं न श्रेष्ठमिन्द्रियं भवेत्।।
            ‘‘दुष्ट व्यक्ति को सज्जन बनाने के लिये भूमि पर कोई भी उपाय नहीं है जैसे मलत्याग करने वाली इंद्रिय को सौ प्रकार से धोने पर भी वह श्रेष्ठ नहीं हो पाती।
                ऐसे में तत्वाज्ञानी केवल उचित स्थानों पर ही अपनी चर्चा रखते हैं। अगर कोई अपना ज्ञान सार्वजनिक रूप से बघार रहा है तो समझें कि वह अल्पज्ञानी या केवल तोता रटंत वाला आदमी है। दूसरी बात यह कि ज्ञानी आदमी को चाहिए कि अपना कर्म करते रहें और दूसरी किसी आदमी से यह अपेक्षा न करें कि कोई अकारण सम्मान या सहायता करे। लोगों में काम, क्रोध, मोह और अज्ञान का ऐसा जाल छाया रहता है कि वह अपने स्वार्थों से प्रथक नहीं हो सकते। दुष्ट और मूर्ख लोगों के साथ तो यह अपेक्षा कभी करना भी नहीं चाहिए कि वह कभी सुधरेंगे। उनको सुधारने के प्रयास में अपनी समय और ऊर्जा नष्ट करना ही है।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Friday, July 22, 2011

भर्तृहरि नीति शतक से संदेश-संतों जैसे काम भी किये पर फल वैसा नहीं मिला

                      भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि
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                क्षान्तं न क्षमया गृहोचितसुखं त्यक्तं न संतोषतः,
                सोढो दुस्सहश्याीततापपवनक्लेशो न तप्तं तपः।
             ध्यातं वित्तमहर्निशं नियमितप्राणैर्न शंभोः पदं
            तत्तत्कर्म कृतं यदेव मुनिभिस्तैस्तैः फलैर्वञ्चिताः।।
        ‘‘हमने क्षमा दान किया, किन्तु धर्म के अनुसार नहीं, हमने सुखों का त्याग किया पर संतोषी होकर नहीं, कष्ट तो सहे पर तप के लिये नहीं, ध्यान तो किया परंतु परमात्मा के स्मरण में नहीं। काम तो सभी संतों जैसे किये पर फल वैसे नहीं मिले।
        वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य के मन में अहंकार रहता है इसलिये वह कभी आत्मंथन नहीं करता। लोग एक दूसरे से झगड़ा करते हैं। एक दूसरे पर अभद्र टिप्पणियां करते हैं फिर अपनी कही बात भूल जाते हैं। दूसरे ने गलत बात कही तो अनेक लोग उसे भी हमेशा याद नहीं रखते हैं। एक तरह से यह क्षमा करना है पर चूंकि धर्म का आभास नहीं है इसलिये कान से सुनी गयी कटु बात का प्रभाव मन में रहता है जबकि क्षमा कर देने से विष खत्म हो जाता है। किसी को क्षमा करना है तो मन से करें। मन में दोहरायें कि मैंने उसे क्षमा किया। इस तरह हमारे प्रति किसी का अपराध उसे शांति प्रदान करता है तो हम भी चैन पाते हैं। वरना अपने साथ किया गया दूर्व्यवहार भले ही भूल जायें पर क्षमा न करने से उसका प्रभाव कभी न कभी परिलक्षित होता है।
         पंच तत्वों से बनी इस देह के हाथों से अनेक शुभ काम भी हो जाते हैं पर उनका लाभ मनुष्य मन को नहीं मिलता। यह संभव नहीं है कि कोई व्यक्ति हमेशा बुरा हो। क्रूर से क्रूर व्यक्ति भी कभी न कभी पसीज कर दूसरे का भला करता है मगर धर्म का ज्ञान न होने से वह सुखानुभूति नहीं कर पाता। हमारे यहां ध्यान की महिमा कही जाती है। कहा जाता है कि ध्यान परमात्मा में लगाया जाये तो लाभ होता है। मनोविज्ञानिक भी मानते हैं कि दिनचर्या से प्रथक होकर कहंी ध्यान लगाने से मनुष्य दृढ़ प्रवृत्ति का बनता है। इसी कारण श्रीमद्भागवत गीता में निष्काम कर्म का संदेश दिया गया है। देखा जाये तो ध्यान सभी व्यक्ति लगाते हैं पर कोई कोई परमात्मा में लगाकर बुरी प्रवृत्तियों से मुक्त होते हैं पर अधिकतर तो सांसरिक विषयों में ध्यान लगाकर जीवन नष्ट करते हैं।
       कहने का अभिप्राय यह है कि अध्यात्म ज्ञान के अभाव में जो सुख की वास्तविक अनुभूति नहीं की जा सकती। इस देह से अच्छे और बुरे दोनों ही काम होते हैं। दुःख और सुख भी आते हैं। तत्वज्ञान होने पर आदमी कभी तनाव नहीं पालता। सहज भाव से जीवन जीना एक कला है और वह भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान होने पर ही संभव है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Sunday, July 17, 2011

स्वार्थी लोग ही सम्मान और प्रशंसा करते हैं-संत कबीर वाणी (sarth,samman aur man-sant kabir wani)


    अपनी प्रशंसा सुनना आम आमदी की कमजोरी है। यही कारण है कि चालाक लोग अपना काम करने के लिये किसी आदमी के ऐसे गुणों का भी बखान करते हैं जो उनमें होते नहीं है। यही कारण है कि आत्ममुग्ध लोग उनके जाल में फंस जाते हैं। आजकल प्रचार का ज़माना है, कई बार लोग अपने काम के प्रचार के लिए ऐसे व्यावसायिक संगठनो का सहारा लेते है जो उनसे पैसा लेकर प्रशंसा अभियान चलते हैं। इसके अलावा कई बार ऐसा भी होता है की कोई दूसरे के काम की प्रशंसा इसलिए करता है कि समय आने पर वह उसका बदला उसी तरह चुकाए। यह अलग बात है कि यह दिखावा होता है वरना तो कोई किसी कि मन से प्रशंसा नहीं करता है।
         सामने झूठी प्रशंसा करने और पीठपीछे निंदा करने वालों के लिये क्या कहा जाय? आजकल लोग आपस में तपाक से मिलते हैं पर मन में किसी के प्रति कोई स्नेह नहीं है। सब स्वार्थ के कारण मिलते हैं। जिसमें स्वार्थ न हो तो उसे जानते हुए भी मुंह फेर लेते हैं। अगर आदमी के पस धन, पद और बाहूबल है तो उसके दस प्रशंसक हो जाते हैं-‘आप जैसा कोई नहीं’, ‘आपके पहले तो यहां कुछ नहीं था’, ‘आप आये तो बहार आयी’, और ‘आप बहुत स्मार्ट हैं’ जैसे वाक्य सुनकर जो लोग फूल जाते हैं उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि वह चाटुकारों से घिरे हैं। इस हाड़मांस के पुतले में ऐसा कुछ भी नहीं होता जो किसी अन्य से अलग हो सिवाय दिमागी ज्ञान के। निष्काम प्रेम पाना तो आज एक दिवास्वप्न हो गया है जो मिल रहा है उसे सच समझना मूर्खता है। चाटुकारिता का जमाना है। जिनके पास आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक शक्ति है उन तक हर कोई पहुंचना चाहता है। उन पर हर कोई लिखना चाहता है। ऐसे कथित बड़े लोगों को मिलने वाली प्रशंसा से जो लोग अपने को उपेक्षित अनुभव करते हैं उन्हें अपने अंदर कोई मलाल नहीं करना चाहिए। उन बड़े लोगों को मिलने वाला प्रेम और सम्मान झूठा है। ऐसे सम्मान और प्रेम के मिलने से तो न मिलना अच्छा। कितना बड़ा भ्रम है यह लोगों का। वास्तव में वह सम्मान तो धन, पद और अनैतिक बल का है उसके धारक का नहीं। adhyatm, darshan, dharm, kabir ke dohe, दर्शन, धर्म, सत्संग, सन्देश, समाज, हिन्दू
     इस विषय पर संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि
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        स्वारथ कुं स्वारथ मिले, पडि पडि लूंबा खूंब।
           निस्प्रेही निरधार को, कोय न राखै झूंब।।
         "सभी लोग अपने स्वार्थ को लेकर एकदूसरे से मिलते हैं तो एक दूसरे की मुंहदेखी प्रशंसा करते हैं परंतु निष्कामी और निर्लिप्त भाव से रहने वाले सज्जन लोगों का इसीलिये सम्मान नहीं करते क्योंकि उनमें कोई स्वार्थ नहीं होता।"
           जिन लोगों को सत्संग मिलता है और वहां उनको अपने जैसे निष्काम भक्त मिलते हैं उनको अपने आपको धन्य समझना चाहिए। हालांकि यह सत्संग ढूंढना भी कठिन काम है पर अगर हम ढूंढे तो कहीं न कहीं तो मिल ही जाता है। हालांकि ज्ञानी लोग कभी इन चीजों की परवाह नहीं करते पर देह में मन है तो कभी न कभी विचलित तो होता है तब उन्हें यह समझना चाहिए कि उनमें किसी का सांसरिक स्वार्थ नहीं फंसता इसलिये लोग उनके प्रति प्रेम और सम्मान प्रदर्शित करने नहीं आते पर जब कहीं चर्चा होती है तो उनका नाम लेकर प्रशंसा करते हैं। फर्क यही है कि स्वार्थ की वजह से लोग सामने झूठी प्रशंसा करते हैं पर उसके न होने पर पीठ पीछे ही करते हैं। इसलिए ज्ञानी लोगों को मान सम्मान और प्रशंसा के लोभ से बचना चाहिए।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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मनुस्मृति-साम, दाम एवं भेद नीति सफल न हो तो युद्ध करें (manu smruti-rashtra raksha ke liye yuddh karen)

             समाज हित के लिये राज्य और राजा की व्यवस्था पूरे विश्व में स्वीकार की गयी है। किसी भी राज्य के कार्य का दायरा अत्यंत विस्तृत होता है। केवल एक राजा या उसके कुछ अनुचर मिलकर पूरे राज्य की व्यवस्था नहीं चला सकते इसलिये राजा और प्रजा के बीच एक बहुत बड़ा संगठन होता है जिसमें प्रथक प्रथक विभाग होते हैं जिनमें कार्य करने वाले व्यक्तियों के लिये पदों का सृजन किया जाता है। राज्य प्रमुख या राजा तो एक ही होता है पर उसके अंतर्गत अनेक राजकीय कर्मी अनुचर पदों के नाम से शासन करते हैं। यही कारण है कि प्रजा में से अनेक लोग राजकीय पदों पर भी सुशोभित होते हैं पर राजकीय पद के अहंकार में वह प्रजाजनों से ही राजा की तरह बर्ताब करते हैं। यह बुरा नहीं है पर अगर ऐसे राजकीय पदधारी लोग राजनीति नहीं जानते तो वह समाज का संकट बन जाते हैं। इतना ही नहीं अगर वह सक्षम न हों तो राजा के शत्रुओं के लिये हमले करना आसान हो जाता है। इसलिये यह आवश्यक है कि राजकीय पदों पर राज्य प्रमुख के अनुचर पदों वाले लोग भी राजनीति शास्त्र का ज्ञान रखें।
                साम्ना दोनेन भेदेन समस्तैरथवा पृथक।
                 विजेतुः प्रयतेतनारीन्न युद्धेन कदाचन्।।
           ‘‘जिस राज्य प्रमुख को जीत की इच्छा हो वह साम, दाम तथा भेद नीति के माध्यम से किसी भी शत्रु को अपने अनुकूल बनाने का प्रयास करे। अगर उसमें असफल हो तो फिर उसे दंडात्मक कार्यवाही यानि युद्ध करना ही चाहिए।’’
               त्रयाणामप्युपायानां पूर्वोक्त्तानामसम्भवे।
                 ततो युध्येत संपन्नो विजयेत रिपून्यथा।।
             ‘‘साम, दाम तथा भेद नीतियों में सफलता न मिले तो फिर राजा को अपने शत्रु के विरुद्ध पूरी तैयारी के बाद युद्ध छेड़ना चाहिए ताकि निश्चित रूप से विजय मिल सके।
                आधुनिक लोकतंत्र में राज्य प्रमुख की शक्तियों का विकेंद्रीकरण हो गया है इसलिये अनेक स्थानीय, प्रादेशिक तथा केंद्रीय स्तर के पद भी राज्य प्रमुख की तरह आकर्षक प्रभाव रखने वाले हो गये हैं। उनके आकर्षण के शिकार लोग उनको पाना चाहते हैं। उनको लगता है कि यह पद समाज पर प्रभाव दिखाने के लिये सबसे आसान मार्ग हैं। वह कभी यह नहीं सोचते कि इन पदों से राज्य का उपभोग तो किया जाता है पर अपने कौशल से प्रजा की रक्षा भी की जाती है। इसके लिये राजनीति शास्त्र का ज्ञान होन आवश्यक है। खासतौर से राज्य के शत्रुओं से निपटने की कला आना चाहिए। जिसमें वीरता के साथ प्रबंध कौशल भी होना चाहिए। यही कारण है कि हम देख रहे हैं कि विश्व राजनीति में ऐसे लोग भी शीर्ष पदों पर पहुंच रहे हैं जो प्रत्यक्ष शासन करते दिखते हैं पर उनकी डोर धनपतियों, बाहुबलियों तथा चालाक लोगों के हाथ में होती है। हिटलर जैसे लोग भी इतिहास में हुए हैं पर शक्ति के बल पर हासिल सत्ता अपने राज्य का भला करने की बजाय उसे हानि पहुंचाते हैं। शक्ति के मद में चूर अनावश्यक रूप से युद्ध करते हैं और बाद में मारे जाते हैं। फिर गद्दाफी जैसे लोग भी हुए हैं जो शक्ति के दम पर सत्ता प्राप्त करने के बाद भ्रष्ट हो जाते हैं और प्रजा के शत्रु हो जाते हैं।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Wednesday, July 13, 2011

मनुस्मृति-राजकर्मियों के काम पर दृष्टि रखने के लिये विद्वान नियुक्त करना चाहिए (manu smriti-imadnar vidvan aur rajya)

             भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों के ज्ञान से सुसज्जित ज्ञान और सात्विक पुरुष राजनीति नहीं करते क्योंकि राजकर्म हमेशा राजस भाव के लोगों का शौक रहा है। हमारे देश में समाज की निज गतिविधियों पर भी राज्य का हस्तक्षेप हो गया है इससे राजनीति में रुचि रखने वाले लोगों की संख्या बहुत अधिक होती जा रही है। यह अलग बात है कि अब राजनीति एक व्यवसाय हो गयी है इसलिये अनेक युवक युवतियां इससे विमुख भी रहे हैं। हालांकि आधुनिक लोकतंत्र में आम लोगों की भागीदारी बढ़नी चाहिए थी पर हो उल्टा रहा है। लोग राजनीति में सक्रिय लोगों को संदेह से देखने लगे हैं। खर्चीली चुनाव पद्धति के कारण आम आदमी चुनाव लड़ने की सोच भी नहीं सकता। यही कारण है कि जिसके धन, पद और बाहुबल है वह समाज पर नियंत्रण करने के लिये राजनीति में सक्रिय हो जाता है। राजनीति केवल व्यक्तिगत हित साधना का साधन बन गयी है। बहुत कम लोग जानते हैं कि राजनीति के अर्थ और उद्देश्य अत्यंत व्यापक हैं।
   मनु महाराज कहते हैं कि
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              अध्यक्षान्विविधानकुर्यात्तत्र त़ विपश्चितः।
            तैऽस्य सर्वाण्यवेक्षेरनृणां कार्याणि कृर्वाताम्।।
        ‘‘राज्य प्रमुख को जनता की भलाई से संबंधित कार्यों को करने वाले कर्मचारियों पर दृष्टि रखने के लिये विद्वानो को नियुक्त करना चाहिए। उनको यह आदेश देना चाहिए कि वह राज्य कर्मियों के कार्यों पर हमेशा दृष्टि रखें।’’
        सांवत्सरिकमाप्तैश्च राष्ट्रादाहारववेद् बलिम्।
          स्वयाच्याययम्नाय परो लोके वर्तत पितृवन्नृषु।।
   ‘‘राज्य प्रमुख को चाहिए कि वह करों की उगाही के लिये ऐसे कर्मचारियों को नियुक्त करे जिनकी ईमानदारी प्रमाणिक हो। राजा को अपनी प्रजा का पालन संतान की तरह करना चाहिए।’’
              राजनीति से समाज हित किया जाता है न कि उस पर नियंत्रण कर अपना घर भरा जाता है। हमारे अध्यात्मिक ग्रंथों में राजनीति की विशद व्याख्या है पर उसे शायद ही कोई समझना चाहता है। समझना भी क्यों चाहे क्योंकि भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथ जनता को अपनी संतान की तरह समझने की बात कहते हैं और स्थिति यह है कि व्यवसायिक राजनीतिज्ञ अपनी संतान को ही प्रजा समझते है। इसी कारण राजकर्मियों पर उनका नियंत्रण नहीं रहता और उनमें से कुछ लोग चाहे जैसा काम करते हैं। जनहित हो या न हो वह राजनीतिज्ञों को भ्रमित कर उनका तथा अपना घर भर भरते हैं। हालांकि अनेक राजनीतिज्ञ विशारद होते हैें पर कुछ लोग तो केवल पद पर इसलिये बैठते हैं कि उनका रुतवा समाज पर बना रहे। ऐसे राजनीतिज्ञों से जनता को कोई लाभ नहीं होता। वह ईमानदार राजकर्मियों का उपयोग न कर चालाक तथा भ्रष्ट कर्मचारियों को ऐसे पदों पर नियुक्त कर देते हैं जो जनहित करने के लिये सृजित किये जाते है। कार्यकुशलता तथा राजनीतिक ज्ञान का अभाव उनकी स्वयं की ईमानदारी भी संदेह उत्पन्न कर देता है। जिन लोगों को राजनीति में आना है या सक्रिय हैं उनको राजनीति के सिद्धांतों का अध्ययन अवश्य करना चाहिए।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Friday, July 8, 2011

चाणक्य नीति-अपने विकास में नाकाम लोग दूसरे की निंदा करते हैं (chankya neeti-nakam log bante hain nindak)

         मनुष्य का धर्म है कि वह अपना कर्म निरंतर करता रहे। अपनी वाणी और विचार पर नियंत्रण रखे। भगवान का स्मरण करते हुए अपनी जीवन यात्रा सहजता से पूर्ण करे। जहां तक हो सके अपने ही काम से काम रखे न कि दूसरों को देखकर ईर्ष्या करे। आमतौर से इस विश्व में लोग शांति प्रिय ही होते हैं इसलिये ही मानव सभ्यता बची हुई। यह अलग बात है कि शांत और निष्कर्मी मनुष्य की सक्रियता अधिक दिखती नहीं है इसलिये उसकी चर्चा सार्वजनिक रूप से नहीं होती जबकि अशांति, दुष्टता और परनिंदा में लगे लोगों की सक्रियता अधिक दिखती है इसलिये आमजन उस पर चर्चा करते हैं।
     हम लोग परनिंदकों की बातें सुनकर मजे लेते हैं जबकि दूसरों की तरक्की से ईर्ष्या के साथ उसकी निंदा करने वालों की बातें सुनना भी अपराध है। ऐसे लोग पीठ पीछे किसी आदमी की निंदा कर सामने मौजूद आदमी को प्रसन्न अवश्य करते हैं पर सुनने वाले को यह भी सोचना चाहिए कि उसके पीछे वही आदमी उसकी भी निंदा कर सकता है।
       आचार्य चाणक्य कहते हैं कि
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       दह्यमानाः सुतीत्रेण नीचा पर-यशोऽगिना।
           अशक्तास्तत्पदं गन्तुं ततो निन्दां प्रकृर्वते।।
     ‘‘दुर्जन आदमी दूसरों की कीर्ति देखकर उससे ईर्ष्या करता है और जक स्वयं उन्नति नहीं कर पाता तो प्रगतिशील आदमी की निंदा करने लगता है।’’
       यदीच्छसि वशीकर्तु जगदकेन कर्मणा।
            परापवादस्सयेभ्यो गां चरंतीं निवारथ।।
       ‘‘यदि कोई व्यक्ति चाहता है कि वह समस्त संसार को अपने वश में करे तो उसे दूसरों की निंदा करना बंद कर देना चाहिए। अपनी जीभ को वश में करने वाला ही अपना प्रभाव समाज पर रखता है।
           इस संसार में कुछ लोग ऐसे भी दिखते हैं जिनका उद्देश्य अपना काम करने अधिक दूसरे का काम बिगाड़ना होता है। सकारात्मक विचाराधारा से अधिक उनको नकारात्मक कार्य में संलिप्त होना अधिक अच्छा लगता है। रचना से अधिक विध्वंस में उनको आनंद आता है। अंततः वह अपने लिये हानिदायक तो होते हैं कालांतर में अपने सहयेागी की भी लुटिया डुबो देते हैं।
        जो लोग सोचते हैं कि उनको समाज में सम्मान प्राप्त हो उनके लिये यह जरूरी है कि वह अपनी ऐसी संगत बदल दें जिसके साथ रहने पर लोग उनसे भी हानि होने की आशंका से ग्रस्त रहते हैं। यह भय सम्मान दिलाने में सबसे अधिक बाधक है। इसके अलावा किसी की निंदा तो बिल्कुल न करें क्योंकि अगर किसी आदमी के सामने आप अन्य की पीठ पीछे निंदा करते हैं तो सामने वाले के मन में यह संशय भी आ सकता है कि बाद में आप उसकी भी निंदा करे। इससे विश्वास कम होता है।
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Saturday, July 2, 2011

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-मद्यपान के आदी लोग सभी जगह प्रवृत्त होते हैं (kuatilya ka artshastra-sharab aur aadmi)

            यह प्रकृति की महिमा है कि मनुष्य का ध्यान व्यसनों की तरफ बहुत आसानी से चला जाता है। इसमें मद्यपान तथा जुआ दो ऐसे व्यसन हैं जो आदमी के तन, मन और धन की क्षति करते हैं पर फिर भी वह इसे अपनाता है। यह सही है कि सारे संसार में लोग एक जैसे नहीं होते पर प्रवृत्ति तो सभी की एक जैसी है। जिनके पास धन आता है उनका ऐसी राह पर चले जाना सहज होता है। जिनके पास धनाभाव है वह ऐसी प्रवृत्तियों में लिप्त इसलिये नहीं होते क्योंकि उनके पास अवसर नहीं होता।
          आर्थिक विशेषज्ञ अपने आंकड़े बताते हैं कि भारत में धनिकों की संख्या बढ़ी है तो सामाजिक विशेषज्ञ भी यह रेखांकित करते हैं कि देश में खतरनाक प्रवृत्तियों वाले लोग भी बढ़ते जा रहे हैं। शराब और जुआ के प्रति लोगों का रूझान बढ़ रहा है। स्थिति यह है कि धनिकों की संगत वाले युवा अपनी जरूरतों के लिये अपराध की तरफ अपने कदम बढ़ाते जा रहे हैं।
पानझिप्तो हि पुरुषो यत्र तत्र प्रवर्तते।
वात्यसंव्यवहारर्यत्वै यत्र तत्र प्रवर्त्तनात्।।
                ‘‘मद्यपान का आदी पुरुष हर जगह अपना मुंह डालते हैं। मद्यपान के आदी पुरुष व्यवहार के योग्य नहीं रह जाते।’’
कामं स्त्रियं निषेवेत पानं वा साधुमात्रया।
न युतमृगये विद्वान्नात्यंव्यसने हि ते।।
             ‘‘भले ही कोई पुरुष स्त्रियों से अधिक संपर्क रखता हो और थोड़ी मात्रा में मद्यपान भी करे पर द्युतक्रीड़ा और शिकार में लिप्त होना तो बहुत बुरा व्यसन है।’’
          भारतीय समाज में अनेक विरोधाभास हैं जिनमें एक यह भी है कि जहां धर्म कर्म के नाम पर शोरशराबा बढ़ रहा है वही शराब और जुआ को सामाजिक शिष्टाचार माना जाने लगा है। अब तो यह संभव ही नहीं है कि कोई व्यक्ति यह कहे कि मैं शराबी से अपने संपर्क नहीं रखूंगा। पहले जिन रिश्तों के सामने शराब की बात तक कहना भी कठिन था उनके पास बैठक बड़े मजे से सेवन किया जाता है।
              इस तरह विचार परिवर्तन से सत्य नहीं बदल जायेगा। शराब शनै शनै मनुष्य की मानसिकता को प्रभावित करती है। उसके व्यवहार में विश्वास की कमी आने लगती है। इस बात को केवल तत्वज्ञानी ही अनुभव कर सकते हैं। वैसे आज तो यह स्थिति है कि मित्रता और व्यवहार के समूह बनते ही ऐसी आदतों पर हैं जिनको वर्जित माना जाता है। जुआ या सट्टा तो इस तरह आम हो गया है कि प्रसिद्ध खेल, धारावाहिक और चुनावों में इसका प्रभाव देखा जाता है। ऐसे में समाज के बिगड़ने की शिकायत करना बेमानी लगता है। यहां तो पूरी दाल ही काली है और जब हम समाज के बिगड़ने की बात कहते हैं तो अपनी मान्यताओं का भी विचार करना चाहिए। स्वयं तथा निकटस्थ लोगों को शराब और जुआ जैसे व्यवसनों से दूर रहने के लिये प्रेरित करना चाहिए।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
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Wednesday, June 29, 2011

भर्तृहरि नीति शतक-तृष्णा की नदी में आदमी जीवन भर भटकता रहता है(hindu dharmik vichar,trishna ki nadi mein aadmi ka jivan)

         मनुष्य मन में आशायें पालता है और उनकी पूर्ति करना ही उसका लक्ष्य रह जाता हैं पूरा जीवन इसमें वह व्यय करता है पर कभी संतुष्ट नहीं रह पाता। एक आशा पूरी होती है तो दूसरी मन में प्रज्जवलित हो जाती है। इस तरह मनुष्य निरंतर भागता रहता है। उसे यही नहीं पता रहता कि सुख क्या है और उसकी अनुभूति कैसे होती है।
            महाराज भर्तृहरि कहते हैं
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         आशा नाम नदी मनोरथजला तृष्णातरङगाकुला
           रामग्राहवती वितर्कविहगा धैर्यद्रुमध्वंसिनी
            मोहावर्तसुदुस्तराऽतिगहना प्रोत्तुङगचिन्तातटी
             तस्याः पारगता विशुद्धमनसो नन्दन्ति योगश्वराः
            "आशा एक नदी की भांति इसमे हमारी कामनाओं के रूप में जल भरा रहता है और तृष्णा रूपी लहरें ऊपर उठतीं है। यह नदी राग और अनुराग जैसे भयावह मगरमच्छों से भरी हुई हैं। तर्क वितर्क रूपी पंछी इस पर डेरा डाले रहते हैं। इसकी एक ही लहर मनुष्य के धैर्य रूपी वृक्ष को उखाड़ फैंकती है। मोह माया व्यक्ति को अज्ञान के रसातल में खींच ले जाती हैं, जहा चिंता रूपी चट्टानों से टकराता हैं। इस जीवन रूपी नदी को कोई शुद्ध हृदय वाला योगी तपस्या, साधना और ध्यान से शक्ति अर्जित कर परमात्मा से संपर्क जोड़कर ही सहजता से पार कर पाता है।

      कहते हैं कि ‘उम्मीद पर आसमान टिका है’। यह उम्मीद और आशा यानि क्या? सांसरिक स्वार्थों की पूर्ति होने ही हमारी आशाओं का केंद्र है। भक्ति, सत्संग तथा तत्वज्ञान से दूर भटकता मनुष्य अपना पेट भरते भरते थक जाता है पर वह है कि भरता नहीं। कभी कभी जीभ स्वाद बदलने के लालायित हो जाती है। सच तो यह है कि मन की तृष्णायें ही आशा का निर्माण करती हैं। भारत जो कभी एक शांत और प्राकृतिक रूप से संपन्न क्षेत्र था आज पर्यावरण से प्रदूषित हो गया है। हमेशा यहां आक्रांता आये और साथ में लाये नयी रौशनी की कल्पित आशायें। सिवाय ढोंग के और क्या रहा होगा? कुछ मूर्ख लोग तो कहते हैं कि इन आक्रांताओं ने यहां नयी सभ्यता का निर्माण किया। इस पर हंसा ही जा सकता है। यह नयी सभ्यता कभी अपना पेट नहीं भर पाती। जीभ के स्वाद के लिये अपना धर्म तक छोड़ देती है। रोज नये भौतिक साधनों के उपयोग की तरफ बढ़ चुकी यह सभ्यता जड़ हो चुकी है। आशायें हैं कि पूर्ण नहीं होती। होती है तो दूसरी जन्म लेती है। यह क्रम कभी थमता नहीं।

           इस सभ्यता में हर मनुष्य का सम्मान की बात कही जाती है। यह एक नारा है। योग्यता, चरित्र और वैचारिक स्तर के आधार पर ही मनुष्य को सम्मान की आशा करना चाहिये मगर नयी सभ्यता के प्रतिपादक यहां जातीय और भाषाई भेदों का लाभ उठाकर यहां संघर्ष पैदा कर मायावी दुनियां स्थापित करते रहे। भारतीय अध्यात्म ज्ञान में जहां मान सम्मान से परे रहकर अपनी तृष्णाओं पर नियंत्रण करने के लिये संदेश दिया जाता है। सभी के प्रति समदर्शिता का भाव रखने का आदेश दिया जाता है। वही नयी सभ्यता के प्रतिपादक अगड़ा पिछड़ा का भेद यहां खड़ा करते हुए बतलाते हैं कि जिन तबकों को पहले सम्मान नहीं मिला अब उनकी पीढ़ियों को विशेष सम्मान दिया जाना चाहिए। कथित पिछड़े तबकों को विशेष सम्मान की तृष्णा जगाकर वह दावा करते हैं कि हम यहां समाज में बदलाव ला रहे हैं। कितने आश्चर्य की बात है कि जिन जातियों में अनेक महापुरुष और वीर योद्धा पैदा हुए उनको ही पिछड़ा बताकर सामाजिक वैमनस्य पैदा केवल इसी ‘विशेष सम्मान’ की आड़ में पैदा किया गया है। आज हालत यह है कि पहले से अधिक जातिपाति का फैल गया है।
            विकास, सम्मान और आर्थिक समृद्धि की आशाऐं जगाकर भारतीय अध्यात्म ज्ञान को ढंकने का प्रयास किया गया। ऐसी आशायें जो कभी पूरी नहीं होती और अगर हो भी जायें तो उनसे किसी मनुष्य को तत्वज्ञान नहीं मिलता जिसके परिणाम स्वरूप समाज में आज रोगों का प्रकोप और तनाव का वातावरण बन गया है।
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Saturday, June 25, 2011

पतंजलि योग साहित्य-आत्मा शुद्ध पर बुद्धि के अनुरूप देखने वाला है (patanjali yoga sahitya-atma aur buddhi)

            पतंजलि योग साहित्य में कहा गया है कि
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            द्रष्टा दृशिमात्रः शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः।।
          ‘‘चेतनमात्र दृष्ट (आत्मा) यद्यपि स्वभाव से एकदम शुद्ध यानि निर्विकार तो बुद्धिवृति के अनुरूप देखने वाला है।
           तदर्थ एवं दृश्यस्यात्मा।।
         ‘‘दृश्य का स्वरूप उस द्रष्टा यानि आत्मा के लिये ही है।’’
                    संपादकीय व्याख्या-पंचतत्वों से बनी इस देह का संचालन आत्मा से ही है मगर उसे इसी देह में स्थित इंद्रियों की सहायता चाहिए। आत्मा और देह के संयोग की प्रक्रिया का ही नाम योग है। मूलतः आत्मा शुद्ध है क्योंकि वह त्रिगुणमयी माया से बंधा नहीं है पर पंचेंद्रियों के गुणों से ही वह संसार से संपर्क करता है और बाह्य प्रभावों का उस पर प्रभाव पड़ता है।
           आखिर इसका आशय क्या है? पतंजलि विज्ञान के इस सूत्र का उपयोग क्या है? इन प्रश्नों का उत्तर तभी जाना जा सकता है जब हम इसका अध्ययन करें। अक्सर ज्ञानी लोग कहते हैं कि ‘किसी बेबस, गरीब, लाचार, तथा बीमार या बेजुबान पर अनाचार मत करो’ तथा ‘किसी असहाय की हाय मत लो’ क्योंकि उनकी बद्दुआओं का बुरा प्रभाव पड़ता है। यह सत्य है क्योंकि किसी लाचार, गरीब, बीमार और बेजुबान पशु पक्षी पर अनाचार किया जाये तो उसका आत्मा त्रस्त हो जाता है। भले ही वह स्वयं दानी या महात्मा न हो चाहे उसे ज्ञान न हो या वह भक्ति न करता हो पर उसका आत्मा उसके इंद्रिय गुणों से ही सक्रिय है यह नहीं भूलना चाहिए। अंततः वह उस परमात्मा का अंश है और अपनी देह और मन के प्रति किये गये अपराध का दंड देता है।
         कुछ अल्पज्ञानी अक्सर कहते है कि देह और आत्म अलग है तो किसी को हानि पहुंचाकर उसका प्रायश्चित मन में ही किया जा सकता है इसलिये किसी काम से डरना नहीं चाहिए। । इसके अलावा पशु पक्षियों के वध को भी उचित ठहराते हैं। यह अनुचित विचार है। इतना ही नहीं मनुष्य जब बुद्धि और मन के अनुसार अनुचित कर्म करता है तो भी उसका आत्मा त्रस्त हो जाता है। भले ही जिस बुद्धि या मन ने मनुष्य को किसी बुरे कर्म के लिये प्रेरित किया हो पर अंततः वही दोनों आत्मा के भी सहायक है जो शुद्ध है। जब बुद्धि और मन का आत्मा से संयोग होता है तो वह जहां अपने गुण प्रदान करते हैं तो आत्मा उनको अपनी शुद्धता प्रदान करता है। इससे अनेक बार मनुष्य को अपने बुरे कर्म का पश्चाताप होता है। यह अलग बात है कि ज्ञानी पहले ही यह संयोग करते हुए बुरे काम मे लिप्त नहीं होते पर अज्ञानी बाद में करके पछताते हैं। नहीं पछताते तो भी विकार और दंड उनका पीछा नहीं छोड़ते।
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Wednesday, June 22, 2011

चाणक्य नीति-ध्यान की महिमा जानना आवश्यक (dhyan ki mahima samjhana avshyak-chankya neeti in hindi)

          श्रीमद्भागवत में श्री कृष्ण कहते हैं कि यह संसार मेरे संकल्प के आधार पर ही स्थित है। इसका सीधा तात्पर्य यह है कि इस संसार में समस्त देहधारियों के जीवन का स्वरूप और आधार ही ध्यान है। हमारे जीवन में अक्सर उतार चढ़ाव आते हैं। जब अच्छा समय होता है तब हमें कुछ आभास नहीं होता पर बुरा समय आता है तो उस समय विलाप करते हैं। उस समय कभी भाग्य को दोष देते हैं तो कभी दूसरे मनुष्य या स्थिति को दोष देते हैं। यह सब भ्रम है। दरअसल जिस तरह परमात्मा का संसार उसके संकल्प के आधार पर बना है वैसे ही हमारा जीवन संसार भी हमारे संकल्प का आधार है। हम कभी अपने मन में चल रहे संकल्पों का अवलोकन नहीं करते पर उससे जो संसार बन रहा है उसे भोगना तो हमें ही होता है। इन संकल्पों में सदैव शुद्धता रहे इसके लिये ध्यान करने साथ ही ज्ञानी तथा विद्वान लोगों का दर्शन कर सत्संग का लाभ उठाना चाहिए।
           इस विषय में नीति विशारद चाणक्य नीति में कहा गया है कि
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             दर्शनध्यानसंस्पर्शे कूर्मी च पक्षिणी।
            शिशुं पालयते नित्यं तथा सज्जनसंगति।।
          ‘मछली, कछवी और मादा पक्षी चिडिया जिस प्रकार दर्शन, ध्यान और स्पर्श से अपने शिशुओं का पालन करती हैं उसी प्रकार उत्तम पुरुष की तरफ ध्यान करने से मनुष्य को भी लाभ होता है।’’
         पतंजलि योग में भी ध्यान का महत्व अत्यंत व्यापक ढंग से प्रतिपादन किया गया है। वैसे भी कहा जाता है कि हमारे धर्म की शक्ति का मुख्य बिंदु ध्यान है। श्रीमद्भागवत गीता में भी ध्यान को महत्व दिया गया है। योगासन करने के बाद किया गया ध्यान उसे पूर्णता प्रदान करता है। अनेक पशु पक्षी तो अपने ध्यान और दर्शन से ही बच्चों का पालन करते हैं। उनसे प्रेरणा लेना चाहिए।
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Saturday, June 18, 2011

जहां मेंढक बोलें वहाँ कोयल खामोश हो जाती है-रहीम संदेश


             जहां बकवासी, अहंकारी लोगों का का जमावड़ा हो वहाँ ज्ञानियों का उपहास ही हो सकता है इसलिए उनको सम्मान की आशा नहीं करना चाहिए। वैसे भी आजकल नैतिकता, ईमानदारी और आदर्श की बातें खूब होती हैं पर व्यवहार में अमल कम ही लोग करते हैं। अक्सर हमस लोग अपने  देश में संगीत, साहित्य, खेल और अन्य कला क्षेत्रों में प्रतिभाओं की कमी की शिकायत करते हैं। यह केवल हमारा भ्रम है। 105 करोड़ लोगों के इस देश में एक से एक प्रतिभाशाली लोग हैं। एक से एक ऊर्जावान और ज्ञानवान लोग हैं। भारतभूमि तो सदैव अलौकिक और आसाधारण लोगों की जननी रही है। हां, आजकल हर क्षेत्र व्यवसायिकता का बोलबाला हो गया है। जो बिकता है वही दिखता है। इसलिये जो चाटुकारिता के साथ व्यवसायिक कौशल में दक्ष हैं या जिनका कोई गाडफादर होता है वही चमकते हैं और यकीनन वह अपने क्षेत्र में मेंढक की तरह टर्राने वाले होते हैं। थोड़ा सीख लिया और चल पड़े उसे बाजार में बेचने जहां माया की बरसात हो। जो अपने क्षेत्रों में प्रतिभाशाली हैं और जिन्होंने अपनी विधा हासिल करने के लिये अपनी पूरी शक्ति और बुद्धि झोंक दी और उनकी प्रतिभा निर्विवाद है वह कोयल की तरह माया की वर्षा में आवाज नहीं देते-मतलब वह किसी के घर जाकर रोजगार की याचना नहीं करते और आजकल तो मायावी लोग किसी को अपने सामने कुछ समझते ही नहीं और उनको तो मेंढक की टर्राने वाले लोग ही भाते हैं। यही कारण है की प्रतिभाशाली लोगों का सभी क्षेत्रों में अभाव दिखाई देता है।
इस विषय पर  कविवर रहीम कहते है कि
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पावस देखि रहीम मन, कोइल साधे मौन।
अब दादुर वक्ता भए, हमको पूछत कोय।।
 "वर्षा ऋतु आते ही मेंढको की आवाज चारों तरफ गूंजने लगती है तब कोयल यह सोचकर खामोश हो जाती है कि उसकी आवाज कौन सुनेगा।"
         कई बार देखा होगा आपने कि फिल्म और संगीत के क्षेत्र में देश में प्रतिभाओं की कमी की बात कुछ उसके कथित अनुभवी और समझदार लोग करते हैं पर उनको यह पता ही नहीं कि कोयल और मेंढक की आवाज में अंतर होता है। एक बार उनको माया के जाल से दूर खड़े होकर देखना चाहिए कि देश में कहां कहां प्रतिभाएं और उनका उपयोग कैसा है तब समझ में आयेगा। मगर बात फिर वही होती है कि वह भी स्वयं मेंढक की तरह टर्रटर्राने वाले लोग हैं वह क्या जाने कि प्रतिभाएं किस मेहनत और मशक्कत से बनती हैं। वैसे बेहतर भी यही है कि अपने अंदर कोई गुण हो तो उसे गाने से कोई लाभ नहीं है। एक दिन सबके पास समय आता है। आखिर बरसात बंद होती है और फिर कोयल के गुनगनाने का समय भी आता है। उसी तरह प्रकृति का नियम है कि वह सभी को एक बार अवसर अवश्य देती है और इसीलिये कोई कोयल की तरह प्रतिभाशाली है तो उसे मेंढक की तरह टर्रटर्राने की आवश्यकता नहीं है और वह ऐसा कर भी नहीं सकते। हमें प्रतिभाशालियों का इसलिये सम्मान और प्रशंसा करना चाहिए कि स्वभावगतः रूप से दूसरे की चाटुकारिता करने का अवगुण नहीं होता। 
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Wednesday, June 15, 2011

कबीर वाणी-अपने मुख से तोलकर शब्द व्यक्त करें (kabir wani-apne mukh se tolakar shabd bolen)

        देखा जाये तो संसार में ज्ञानी लोगों  की संख्या अत्यंत कम है। उसके बाद ऐसे लोगों की संख्या है जो ज्ञान की तलाश के लिये प्रयासरत रहते हैं यह अलग बात है कि योग्य गुरु के अभाव में उनको सफलता नहीं मिलती। मगर ऐसे लोगों की संख्या कम नहीं है जो न तो जिनके पास ज्ञान है न उनको पाने की जिज्ञासा है। देहाभिमान से युक्त ऐसे लोग हर समय अपने आपको श्रेष्ठ प्रमाणित करने के लिये बकवाद करते हैं। दूसरों का मजाक बनाते हैं। ऐसे मूर्ख लोग अपने आपको बुद्धिमान साबित करने के लिये किसी भी हद तक चले जाते हैं। न तो वह समय देखते हैं न व्यक्ति। अपने शब्दों का अर्थ वह स्वयं नहीं समझते। उनको तो बस बोलने के लिये बोलना है। ऐसे लोग न बल्कि दूसरों को दुःख देते हैं बल्कि कालांतर में अपने लिये संकट का निर्माण भी करते हैं।
संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं कि
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सहज तराजू आनि के, सब रस देखा तोल
सब रस माहीं जीभ रस, जू कोय जाने बोल
"संसार में विभिन्न प्रकार के रस हैं और हमने सब रसों को सहज स्वभाव की ज्ञान -तुला पर तौलकर देख-परख लिया है। सब रसों में जीभ का रस सर्वोत्तम एव अधिक वजन वाला है। उसे वही जान सकता है जो अपने शब्द और वाणी का सही उपयोग करना जानता है।"
मुख आवै सोई कहै, बोलै नहीं विचार
हटे पराई आतमा, जीभ बाँधि तलवार
"कुछ नासमझ लोग ऐसे हैं जो कभी भी सोच समझकर नहीं बोलते और मुहँ में जो आता है बक देते हैं। ऐसे लोगों की वाणी और शब्द तलवार की तरह दूसरों को कष्ट पहुँचाते हैं।"
         इसके विपरीत ज्ञानी लोग हर शब्द के रस का अध्ययन करते हैं। उनके प्रभाव पर दृष्टिपात करते हैं। उनका अभ्यास इतना अधिक हो जाता है कि उनके मुख से निकला एक एक शब्द न केवल दूसरों का सुख देता है बल्कि वह स्वयं भी उसका आनंद उठाते हैं। एक बात निश्चित है कि किसी भी मनुष्य के मुख से निकले शब्द उसके अंतर्मन का प्रमाण होते हैं। दुष्ट लोग जहां हमेशा अभिमान और कठोरता से भरे भरे शब्द उपयोग करते है जबकि सज्जन कठोर बात भी मीठे शब्दों में कहते हैं। इसलिये जब कहीं वार्तालाप करते हैं तो इस बात का विचार करें कि हमारे शब्द का बाहर प्रभाव क्या होगा? इससे न केवल हम दूसरे को सुख दे सकते हैं बल्कि अपने लिये आने वाले संकटों से भी बच सकते हैं। कहा भी जाता है कि यही वाणी आपको धूप में बैठने का दुःख और छांव में बैठने के सुख का कारण बनती है।
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Monday, June 13, 2011

पतंजलि योग विज्ञान-योग साधना की चरम सीमा है समाधि (patanjali yog vigyan-yaga sadhana ki charam seema samadhi)

        भारतीय योग विधा में वही पारंगत समझा जाता है जो समाधि का चरम पद प्राप्त कर लेता है। आमतौर से अनेक योग शिक्षक योगासन और प्राणायाम तक की शिक्षा देकर यह समझते हैं कि उन्होंने अपना काम पूरा कर लिया। दरसअल ऐसे पेशेवर शिक्षक पतंजलि योग साहित्य का कखग भी नहीं जानते। चूंकि प्राणायाम तथा योगासन में दैहिक क्रियाओं का आभास होता है इसलिये लोग उसे सहजता से कर लेते हैं। इससे उनको परिश्रम से आने वाली थकावट सुख प्रदान करती है पर वह क्षणिक ही होता है । वैसे सच बात तो यह है कि अगर ध्यान न लगाया जाये तो योगासन और प्राणायाम सामान्य व्यायाम से अधिक लाभ नहीं देते। योगासन और प्राणायाम के बाद ध्यान देह और मन में विषयों की निवृत्ति कर विचारों को शुद्ध करता है यह जानना भी जरूरी है।
    पतंजलि योग साहित्य में बताया गया है कि 
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      देशबंधश्चित्तस्य धारण।।
    ‘‘किसी एक स्थान पर चित्त को ठहराना धारणा है।’’
     तत्र प्रत्ययेकतानता ध्यानम्।।
       ‘‘उसी में चित्त का एकग्रतापूर्वक चलना ध्यान है।’’
        तर्दवार्थमात्रनिर्भासयं स्वरूपशून्यमिव समाधिः।।
        ‘‘जब ध्यान में केवल ध्येय की पूर्ति होती है और चित्त का स्वरूप शून्य हो जाता है वही ध्यान समाधि हो जाती है।’’
        त्रयमेकत्र संयम्।।
          ‘‘किसी एक विषय में तीनों का होना संयम् है।’’
           आमतौर से लोग धारणा, ध्यान और समाधि का अर्थ, ध्येय और लाभ नहीं समझते जबकि इनके बिना योग साधना में पूर्णता नहीं होती। धारणा से आशय यह है कि किसी एक वस्तु, विषय या व्यक्ति पर अपना चित्त स्थिर करना। यह क्रिया धारणा है। चित्त स्थिर होने के बाद जब वहां निरंतर बना रहता है उसे ध्यान कहा जाता है। इसके पश्चात जब चित्त वहां से हटकर शून्यता में आता है तब वह स्थिति समाधि की है। समाधि होने पर हम उस विषय, विचार, वस्तु और व्यक्ति के चिंत्तन से निवृत्त हो जाते हैं और उससे जब पुनः संपर्क होता है तो नवीनता का आभास होता है। इन क्रियाओं से हम अपने अंदर मानसिक संतापों से होने वाली होनी को खत्म कर सकते हैं। मान लीजिये किसी विषय, वस्तु या व्यक्ति को लेकर हमारे अंदर तनाव है और हम उससे निवृत्त होना चाहते हैं तो धारणा, ध्यान, और समाधि की प्रक्रिया अपनाई जा सकती है। संभव है कि वस्तु,, व्यक्ति और विषय से संबंधित समस्या का समाधाना त्वरित न हो पर उससे होने वाले संताप से होने वाली दैहिक तथा मानसिक हानि से तो बचा ही जा सकता है।
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Thursday, June 9, 2011

अथर्ववेद से संदेश-ज्ञानी लोग बहसों के निष्कर्ष में सत्य की रक्षा करते है (athavaved se sandesh-gyani aur satya)

         पूरे विश्व के अनेक विषयों पर बहसें होती हैं। सांसरिक विषयों पर पक्ष और विपक्ष में वैचारिक योद्धा युद्धरत रहकर समाज को बौद्धिक मनोरंजन प्रदान करते हैं। हमारा देश तो बहसों और चर्चाओं में बहुत पारंगत है। अब यह अलग बात है कि सार्थक विषयों पर बहस कितनी होती है और निरर्थक विषय समाज में कितने लोकप्रिय हैं, इस पर दृष्टिपात कोई नहीं करता। अध्यात्मिक विषयों पर बहस तो शायद ही कभी होती है जबकि सांसरिक विषयों को इस तरह प्रस्तुत किया जाता है जैसे कि वह अध्यात्मिकता से जुड़े हैं। ऐसा मान लिया गया है कि आज के भौतिक युग में भारतीय अध्यात्मिक दर्शन का कोई महत्व नहीं है। इतना जरूर है कि जब सांसरिक विषयों में अपनी बुद्धि लगाये रखने से उकताये लोगों का मन कभी न कभी अध्यात्मिक विषय में लिप्त होने का करता है। ऐसे में उनको सत्य और असत्य पर बहसों में भाग लेना अच्छा लगता है मगर उनके निष्कर्ष निकालना केवल ज्ञानी लोगों के लिये ही संभव है।
          अथर्ववेंद में कहा गया है कि
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            सुविज्ञानं चिकितेषुजनायसच्चासच्च वयसी पस्पृधाते
             तर्योर्यत्सत्यं यतरह जीयस्तदित्सोमोऽहन्त्यासतु।
       ‘‘ज्ञानी मनुष्य के विशिष्ट ज्ञान की यह पहचान है वह सत्य और असत्य भाषणों में जो स्पर्धा रहती है उसमें सरलता और सत्य की रक्षा करते हुए असत्य को विलोपित करता है।
        ‘‘इंद्र मित्रं वरुणमाग्नियाहुरथो दिव्यः स सुपर्णों गुरुत्मान्।      
          एकं साद्विप्रा बहुधा वदन्त्यानि वमं मातरिश्वानमाहुः।
         ‘‘सत्य एक ऐसा विषय है जिसका ज्ञानी अनेक प्रकार से वर्णन करते हैं। उसी तरह एक इंद्र को मित्र, वरुण, अग्नि, दिव्य, सुवर्ण, गुरुत्भानु, यम और माता शिखा कहते हैं।’’
        ज्ञानी लोग कभी अपने ज्ञान का प्रदर्शन नहीं करते। जब तक कोई पूछे नहीं तब तक तत्वज्ञान का उपदेश नहीं करते। यह जरूर है कि वह जिज्ञासावश दूसरों की बहसें सुनते हुए उनमें सत्य और सरल भाव के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाते हैं। निष्कर्ष निकालते हुए निरर्थक तर्कों से अधिक वह सार्थक तत्वों पर अपनी दृष्टि रखते हैं। वैसे देखा जाये तो तत्वज्ञान कोई व्यापक नहीं है पर अधिकतर विद्वान उस पर अपने अपने अनुसार व्याख्यायें प्रस्तुत करते हैं। उनकी व्याख्यायें से अल्पज्ञानियों को ऐसा लगता हे कि सत्य कोई अद्भुत तथा रहस्यमय विषय है पर ज्ञानी लोग ऐसा नहीं सोचते। ज्ञानी लोगों में विनम्रता होती है इसलिये वह सत्य पर की गयी अलग अलग व्याख्याओं का सार समझ लेते हैं।
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Sunday, June 5, 2011

धनपति लोग कांटों की तरह राज्य में व्यवहार करते हैं-कौटिल्य का अर्थशास्त्र (rich man always tension creat for comman public-kautilaya ka artshastra)

      राजनीति एक बहुत महत्वपूर्ण विषय है। आधुनिक राजनीतिक शास्त्रों का तो पता नहीं पर ऐसा लगता है कि उनमें राजनीति के विषय में इतना सबकुछ लिखा गया होगा जितना कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है। मूलतः कौटिल्य का अर्थशास्त्र केवल आर्थिक विषय पर ही नहीं बल्कि राजधर्म की भी स्पष्ट व्याख्या करता है। पूरे विश्व में आज एक ऐसे प्रकार का लोकतंत्र है जो चुनावों पर आधारित है। भारत में पुराने समय में यह प्रथा नहीं थी जिसका आज पालन किया गया जा रहा है। यह प्रणाली बुरी नहीं है पर ऐसा लगता है कि इससे जहां आम लोगों को राजनीति में आने का अवसर मिला वहीं है ऐसे लोगों भी राजनीति करने लगे हैं जो केवल पद पाकर उसकी सुविधाओं का उपयोग करने तथा समाज में प्रतिष्ठित रहने के लिये प्रयत्नशील रहते हैं। इसके अलावा विश्व के समस्त देशों में-ऐसे देश भी जहां तानाशाही या राजशाही हो-व्यवस्था में नौकरशाही की एक स्वचालित मशीनरी का निर्माण किया गया है।
       ऐसे में राजनीति के माध्यम से उच्च पदों पर रहने वाले लोगों के लिये करने को कुछ नहीं रहता। सभी को राजनीति विषय का ज्ञान हो यह जरूरी नहीं है और अगर किसी ने पढ़ा हो तो उसे धारण करता हो यह भी आवश्यक नहीं है। ऐसे में राजनीति के सिद्धांतों के अनुरूप कितने चलते हैं यह अलग चर्चा का विषय है। अलबत्ता ऐसे में अब यह दिखने लगा है कि पूरे विश्व में पूंजीपतियों, बाहूबलियों तथा प्रतिष्ठित लोगों का अनेक देशों की सरकारों पर प्रभाव हो गया है यही कारण है कि अनेक देश असंतोष की आग में झुलस रहे हैं। इसके लिये जिम्मेदार सामान्य लोग भी कम नहीं है क्योंकि न वह स्वयं राजनीति के विषय का अध्ययन करते हैं न बच्चों को कराते हैं। यही कारण है कि जहां कुछ शुद्ध विचार से लोग राजनीति में आते हैं उससे अधिक तो संख्या उन लोगों की है जो इसे उपभोग के लिये अपनाते हैं।
                    कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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                आयुक्तकेभ्यश्चौरेभ्यः परेभ्यो राजवल्भात्ै
               पृवितवीपतिलोभाच्व प्रजानां पंवधा भयम्।।
         ‘‘राज कर्मचारी, चोर, शत्रु, राजा के प्रियजनों और लोभी राजा इन पांचों से जनता को हमेशा भय रहता है।’’
            आस्रावयेदुपचितान् साधु दुष्टत्रणनिव।
            आमुक्तास्ते च वतेंरन् वाह्य् महीपती।।
          ‘‘दुष्टव्रणों या कांटों के समान धन से पके हुए समृद्ध दुष्ट लोगों को राज्य निचोड़ ले तो ठीक है अन्यथा वह आग के समान राज्य में अपने व्यवहार का प्रदर्शन करते हैं।
           अगर देखा जाये तो राजनीति का कार्य ही राजस भाव से किया जाता है। उसमें सात्विकता या निष्कर्मता को बोध तो रह ही नहीं जाता। भारत में कौटिल्य का अर्थशास्त्र चर्चित बहुत है पर इसे पढ़ते कम ही लोग हैं। राजधर्म का सबसे बड़ा कर्तव्य है समाज, धर्म, व्यापार तथा अपने अनुचरों की रक्षा करना। जिन नये लोगों को राजनीति में आना है उन्हें यह समझना चाहिए कि जिस तरह जल में बड़ी मछली हमेशा ही छोटी मछली का शिकार करती है वैसे ही समाज में शक्तिशाली वर्ग हमेशा ही कमजोर वर्ग को कुचला रहता है। यहीं से राजधर्म निभाने वालों की भूमिका प्रारंभ होती है। प्रजा को हमेशा ही राज्य के लिये काम करने वालों कर्मचारियों, अपराधियों, शत्रुओं और राज्य प्रमुख के करीबी लोगों से भय रहता है। जो राज्य प्रमुख जनता को भयमुक्त रखता है वही श्रेष्ठ कहलाता है। जो अपने कर्तव्य को निर्वाह नहीं करता उसकी निंदा होती है। इसलिये राजधर्म का अध्ययन करने के बाद ही राजनीति में कदम रखना चाहिए।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
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Friday, June 3, 2011

अथर्ववेद से संदेश-समाज की रक्षा करे वहीं देवराज इंद्र (atharved se sandesh-samaj ki raksha kare vahi devraj indra)

         सभी मनुष्य को अपने लिये नियत तथा स्वाभाव के अनुकूल कार्य करना चाहिए। इतना ही नहीं अगर सार्वजनिक हित के लिये कोई कार्य आवश्यक करने की अपने अंदर क्षमता लगे तो उसमें भी प्राणप्रण से जुट जाना चाहिए। अगर हम इतिहास और धर्म पुस्तकों पर दृष्टिपात करें तो सामान्य लोग तो अपना जीवन स्वयं और परिवार के लिये व्यय कर देते हैं पर जो ज्ञानी, त्यागी और सच्चे भक्त हैं पर सार्वजनिक हित के कार्य न केवल प्रारंभ करते हैं बल्कि समय आने पर बड़े बड़े अभियानों का नेतृत्व कर समाज को सम्मान और परिवर्तन की राह पर ले जाते हैं। ऐसे लोग न केवल इतिहास में अपना नाम दर्ज करते हैं वरन् अपने भग्वत्स्वरूप हो जाते हैं।
भारतीय अध्यात्म ग्रंथ अथर्ववेद में कहा गया है कि
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यः शर्धते नानुददाति शुध्यां दस्योर्हन्ता स जनास इन्द्रः।
‘‘जो मनुष्य अहंकारी के अहंकार को दमन करता है और जो दस्युओं को मारता है वही इन्द्र है।’’
यो जाभ्या अमेथ्यस्तधत्सखायं दुधूर्षति।
ज्योष्ठो पदप्रचेतास्तदाहु रद्यतिगति।
‘‘जो मनुष्य दूसरी स्त्री को गिराता है, जो मित्र की हानि पहुंचाता है जो वरिष्ठ होकर भी अज्ञानी है उसको पतित कहते हैं।’’
       एक बात निश्चित है कि जैसा आदमी अपना संकल्प धारण करता है उतनी ही उसकी देह और और मन में शक्ति का निर्माण होता है। जब कोई आदमी केवल अपने परिवार तथा स्वयं के पालन पोषण तक ही अपने जीवन का ध्येय रखता है तब उसकी क्षमता सीमित रह जाती है पर जब आदमी सामूहिक हित में चिंत्तन करता है तब उसकी शक्ति का विस्तार भी होता है। शक्तिशाली व्यक्ति वह है जो दूसरे के अहंकार को सहन न कर उसकी उपेक्षा करने के साथ दमन भी करता है। समाज को कष्ट देने वालों का दंडित कर व्यवस्था कायम करता है। ऐसी मनुष्य स्वयं ही देवराज इंद्र की तरह है जो समाज के लिये काम करता है। शक्तिशाली मनुष्य होने का प्रमाण यही है कि आप दूसरे की रक्षा किस हद तक कर सकते हैं।
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Sunday, May 29, 2011

सामवेद से संदेश-मनुष्य को प्रतिदिन युद्ध करना चाहिए (man must always reddy for war in his life)

         अपनी प्रकृति के अनुसार हर जीव संघर्ष कर जिंदा रहता है। संघर्ष का आशय स्वाभाविक कर्म से ही है। जब श्रीमद्भागवत गीता की बात आती है तो अक्सर लोग यह सोचते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को युद्ध करने का उपदेश दिया है जिसका सामान्य कर्म से कोई संबंध नहीं है। यह सोच अज्ञान का प्रमाण है। दरअसल अर्जुन का उस समय स्वाभाविक कर्म ही युद्ध करना था। उन्होंने द्रोणाचार्य से युद्ध कौशल की ही शिक्षा प्राप्त की थी। श्रीकृष्ण ने अर्जुन से स्पष्ट कहा था कि ‘तू अभी अज्ञानवश विरक्त होकर युद्ध छोड़ देगा पर बाद में तेरा स्वभाव तुझे इसके लिये प्रेरित करेगा।’’
          सामवेद में कहा गया है कि
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         दिवे दिवे वाजं सरिनः।
        ‘‘प्रतिदिन युद्ध करों।’’
         मो घु ब्रह्मोव तन्द्रर्भवो।
         ‘‘आत्म ज्ञानी होकर आलसी न होना।’’
        अधा हिन्वान इंद्रिय ज्यायो महित्वमानशे।
          अभिष्टकृद्विचर्षणि।
         ‘‘विशेष ज्ञान धारण करने वाला इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर अपना लक्ष्य प्राप्त करता है।
             आज के आधुनिक युग में प्राचीन इतिहास की तरह युद्ध नहीं लड़े जाते पर मनुष्य के स्वाभाविक कर्म भी अब युद्ध की तरह संपन्न करने पड़ते हैं। इसके विपरीत मनुष्य स्वभाव आलस्य की तरफ बहुत आसानी से प्रवृत्त होता है। आज नहीं कल नहीं कल नहंी परसों तक काम टालने की बात उसके दिमाग में आ ही जाती है। आलस्य की वजह से लोग अपने हाथ से ऐसा अवसर खो देते हैं जिसका लाभ उठाने से उनके जीवन का धारा बदल सकती है।
         अगर हम अपने जीवनकाल के सफल लोगों की तरफ देखकर उनके कर्म का विश्लेषण करें तो यह बात सामने आयेगी कि उन्होंने अपने पास आये अवसरों का जमकर लाभ उठाया। हमें प्रतिदिन अपने कर्म के लिये ऐसे ही तैयार होना चाहिए जैसे युद्ध के लिये योद्धा तैयार होता है। अपने विषय से संबंधित हर सामग्री का अवलोकन उसें पारंगत होना चाहिए। जीवन में सफलता मूलमंत्र सतत युद्ध करना ही है। इसके लिये हमेशा तत्पर रहना चाहिए।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Saturday, May 28, 2011

अथर्ववेद से संदेश-संसार में अभयतापूर्वक विचरण करें (atharvaved se sandesh-sansar mein bhayrahit rahen-live without tension))

         अगर देखा जाये तो मनुष्य पर शासन उसका भय ही करता है इसी कारण सभी मनुष्य हिंसक नहीं होते। यह भय आत्मसंयम के रूप में होना चाहिए न कि अपने कर्म के फल की आशंकाओं के कारण मन में बैठना चाहिए। राजकर्म में लोग पूरे मानव समाज पर नियंत्रण करने के लिये भय पैदा करते हैं। आज के आधुनिक लोकतंत्र में तो भय आम आदमी के सामने खड़ा किया जाता है ताकि लोगों को समूबबद्ध कर उन पर शासन किया जा सके। राजकर्म में लगे अनेक लोग समाज को निर्भय पूर्वक रहने की व्यवस्था प्रदान करने का दाव करते हैं पर इसके लिये पद पाने के लिये वह अव्यवस्था का भय पैदा करते है। अनेक बुद्धिमान लोग आतंक और भ्रष्टाचार से समाज के बिखरने का भय पैदा कर एकता के लिये प्रयास करते हैं। दरअसल यह उनका व्यवसाय है कि किसी भी तरह समाज पर नियंत्रण करें ताकि सामाजिक तथा असामाजिक व्यवसायिक की गतिविधियां चलती रहें। ऐसे लोग जानते हैं कि आदमी पर केवल भय ही शासन कर सकता है इसलिये नित्य नये भयों का निर्माण कर उनका प्रचार किया जाता है।
         भय और अभय के विषय पर अथर्ववेद में कहा गया है कि
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           अभयं मित्रादभयममित्रदभयं ज्ञातादभवं पुरो यः।
            अभयं तक्तमभयं दिवा नः सर्वा आशा मम् मित्रम्।।
               ‘‘मित्र और शत्रु से हम अभय हो, जाने हुए से अभय हों, भविष्य से अभय हों, रात और दिन के साथ ही सारी दिशायें हमारे लिये अभय हों। सब आशायें हमारी मित्र बनें।
               अगर हम आत्ममंथन करें तो हम भय के कारण ही शांत रहते हुए कई ऐसे कर्मों से विमुख हो जाते हैं जो कि करना चाहिए। इतना ही नहीं कई बार भयग्र्रस्त होकर ऐसे लोगों से संपर्क बनाते हैं जिनसे हानि की आशंका होती है। हम विचार करें तो इतने  संकट  जिंदगी में नहीं आते जितने की आशंका हम करते हैं। ज्ञान के अभाव में कई बार ऐसे काम भी करते हैं जो वाकई भय पैदा करने वाले होते हैं। इसलिये किसी काम को न करने से पहले उसके गुण दोषों पर विचार अवश्य करना चाहिए। साथ ही अगर कोई सात्विक और सार्थक कार्य हो तो उसे निर्भयतापूर्व संपन्न करना चाहिए।
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Sunday, May 22, 2011

चाणक्य नीति से संदेश-एकता में होती है भारी शक्ति (chankya neeti-ekta mein shakti)

                 पाश्चात्य संस्कृति के प्रवाह तले हमारे देश की अध्यात्मिक संस्कृति मान्यताऐं रौंदी जा रही हैं। अंग्रेजी शिक्षा से ओतप्रोत देश की शिक्षा और नियम बनाने वाले विधाता कुछ विदेशी तो कुछ देशी मान्यताओं के मिक्चर से समाज को नमकीन की तरह सजा रहे हैं। ऐसे में संयुक्त परिवार को विघटन हुआ है। सभी लोगों ने स्वयं के विकास को ही आत्मनिर्भरता का प्रमाण मान लिया है। दूसरे के साथ संयुक्त उपक्रम सभी को गुलामी जैसा लगता है। परिवार की परिभाषा या सीमा माता पिता और बच्चे तक ही सिमट गयी है। दादा, दादी और चाचा चाची अब परिवार के बाहर हो गये हैं। भाई और भाई का संयुक्त उपक्रम में काम करना अब उस पुरानी परंपरा का हिस्सा मान लिया गया है जिसकी आवश्यकता अब अनुभव नहीं की जाती। उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह कि पिता के साथ पुत्र का संयुक्त उपक्रम होना उसके कमजोर व्यक्तित्व का प्रमाण माना जाता है। हर कोई यह चाहता है कि उसका दामाद स्वतंत्र उपक्रम वाला हो। भाई या पिता के साथ संयुक्त उपक्रम होने पर उसे गुलाम की तरह देखा जाता है।
           यही स्थिति आधुनिक महिलाओं की भी है। वह पति को स्वतंत्र उपक्रम का स्वामी या फिर किसी कार्यालय में अधिकारी के रूप में देखना चाहती हैं। इसके अलावा भी ढेर सारे कारण है जिससे हमारा समाज और राष्ट्र कमजोर हो रहा है।
          एकता के विषय पर चाणक्य नीति में कहा गया है कि 
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             बहुनां चैव सत्वानां समवायो रिपुंजयः।
             वर्षधाराधरो मेधस्तृणैरपि निवार्यते।।
           ‘‘बहुत लोगों के समूह में एकता होने की वजह अपने शत्रुओं को परास्त करने की शक्ति होती है। उसी तरह जैसे वर्षा की धारा प्रवाहित करने वाला बादल को तिनकों का समूह झौंपड़ी में प्रवेश से रोक लेता है।
                एक बात निश्चित रूप से तय है कि व्यक्ति अपने परिवार या समाज से मिलकर ही शक्तिशाली होता है और साथ ही यह भी सच है कि व्यक्ति के मजबूत होने से परिवार, परिवार से समाज, और समाज से राष्ट्र मजबूत होता है। कहने का अभिप्राय यह है कि व्यक्ति से राष्ट्र और राष्ट्र से व्यक्ति शक्तिशाली होता है पर इसके लिये जरूरी है कि लोगों की आपस में एकता है जो कि निज स्वार्थ पूर्ति के भाव तथा अहंकार के चलते नहीं हो पाती। यही कारण है कि आज हम अपने राष्ट्र में लोगों में अकेलेपन का तनाव बढ़ता देख रहे हैं।
            अगर हम चाहते हैं कि राष्ट्र शक्तिशाली हो तो व्यक्तियों को मजबूत होना पड़ेगा जिसके लिये यह जरूरी है कि लोग स्वयं में एकता के साथ काम करे।
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Saturday, May 21, 2011

ऋग्वेद से संदेश-दृष्ट और मूर्ख ही समाज की हानि करते हैं (rigved se sandesh-dusht aur moorkh log karte hain samaj ki hani)

           इस भौतिकवादी युग ने लोगों को अंधा कर दिया है। वह अपनी संपत्ति संचय के लिये अनेक लोग किसी भी हद तक चले जाते हैं। वह यह नहीं सोचते कि कालांतर में न केवल समाज बल्कि उनकी आने वाली पीढ़ियों को भी हानि होगी। हम देख रहे हैं कि देश के अनेक धनपति लोग अपने ही देश से कमाकर विदेशों में भेज रहे हैं तो अनेक उच्च पदस्थ लोग भ्रष्टाचार में लिप्त होकर देश की व्यवस्था को छिन्न भिन्न कर देते हैं। ऐसे लोग अपने परिवार की वर्तमान पीढ़ी का ही विचार करते हैं। उनको यह ज्ञान नहीं है कि समय एक जैसा कभी नहीं रहता और लक्ष्मी अत्यंत चंचल है और एक दिन उनके परिवार का पतन होना ही है और अंततः उनकी भावी पीढ़ी को भी बिगड़ी व्यवस्था के दुष्परिणाम भोगने होंगे। इसके बावजूद वह समाज का आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक शोषण करने के लिये किसी भी हद तक चले जाते हैं चाहे भले ही भविष्य में वह सब स्त्रोत सूख जायें जिससे वह धन कमा रहे हैं।
         यह अनैतिकता इस हद तक हो गयी है कि लोग अपने पद के अभिमान के साथ ही धर्म को भी बेच देते हैं। अपनी सात पीढ़ियों के लिये कमाने वाले लोग यह विचार नहीं करते कि जब यह भी तय है कि उनकी भावी पीढ़ी तक उनकी संपत्ति पहुंचेगी कि नहीं। संचय की प्रवृत्ति नें लोगों को हिंसक और दृष्ट प्रवृत्ति बना दिया है।
             ऋग्वेद में कहा गया है कि 
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               दुराध्यो अदिति स्त्रेवयन्तोऽचेतसो विजगृभे परुणीम्।।
               ‘‘दुष्ट बुद्धि वाले मूढ़ लोग अन्नदायी परुष्णी नदी के तट को तोड़ते रहे।
दुष्ट व्यक्ति मूर्ख भी होते हैं और सदैव विनाश के लिये प्रयत्नशील रहते हुए सभी के हित में आने वाली वस्तुओं को नष्ट करते हैं। 
              ऐसे दुष्ट, हिंसक और मूर्ख लोग समाज की बजाय अपने स्वार्थ को ही सर्वोपरि मानते हैं। अनेक लोग अंततः वह समाज के विद्रोह का शिकार भी हो जाते हैं। इसी कारण कहा जाता है कि धनवान को दानी भी होना चाहिए। यह दान पुण्य देने के साथ ही सुरक्षा देता है। उसी तरह बड़े आदमी को उदार तथा सदाचारी होना चाहिए। ऐसा होने पर उसके विराट व्यक्तित्व की रक्षा होती है। सदाचार और उदारता एक तरह किले की दीवार है जिसमें आदमी आराम से रह सकता है।
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Tuesday, May 17, 2011

तृष्णाओं का त्याग करना ही श्रेयस्कर-हिन्दू धार्मिक विचार (trishna ka tyag hi shreyaskar-hindu religion thought)

                     मनुष्य की देह का विकास स्वाभाविक रूप से होता है, उसे अपने मानसिक विकास के लिये स्वयं प्रयास करने होते हैं। उसका मन हमेशा ही तृष्णा की गोद में सोया रहता है। उनकी पूर्ति करने में ही मनुष्य अपना पूरा जीवन नष्ट कर देता है। फिर भी न तो कभी उसके मन की तृष्णायें मरती हैं न मनुष्य को कभी चैन आता है। एक वस्तु आती है तो दूसरे की तृष्णा पैदा होती है। परमात्मा के कृपा से इस संसार में विचर रहे देहधारियों की बजाय मनुष्य में स्वाजातीय बंधुओं के हाथ से निर्मित प्राणहीन वस्तुओं को पाने और संजोने की इच्छा रहती है।
                इस विषय पर हमारे धर्मग्रंथो में कहा गया है कि
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               तृष्णा हि सर्वपापिष्ठा नित्योद्वेगकरी स्मृता।
               अधर्मबहुला चैव घोरा पापानुबंधिनी।।
               ‘‘मनुष्य मन में विचरने वाली तृष्णाऐं ही पाप की जन्मदात्री हैं। वही आदमी को अधर्म के लिये प्रेरित करती हैं। अतः उनका त्याग ही श्रेयस्कर है।’’
             या दुस्यतजा दुर्मतिभियां न जीर्यति जीर्यतः।
            योऽसि प्राणान्तिको रोगस्तां तृष्णां त्यजतः सुखम्।।
            ‘‘जो बुद्धिहीन के लिये त्याग योग्य नहीं है और जो देह के जीर्ण शीर्ण होने पर ही खत्म नहीं होती वह तृष्णायें न केवल आदमी को बीमार बनाती हैं बल्कि उसके सुख का भी हरण कर लेती है। ऐसी तृष्णाओं का त्याग ही श्रेयस्कर है।
             मनुष्य देह और मन के संयोग को नहीं जानता। मन कही भीं बिना लगाम होने पर भटक सकता है पर देह की कार्य करने की अपनी सीमाऐं हैं। अनेक लोग अपने सामर्थ्य से अधिक तृष्णाऐं पाल लेते हैं। उनको पाने के लिये वह अधिक से अधिक श्रम करते हैं पर मन कहीं भी चला जाय पर सामर्थ्य से बाहर भला किसकी देह जाकर काम सकती है। नतीजा यह होता है कि देहधारी को अंततः बीमारियों और दुर्घटनाओं का शिकार बनना पड़ता है। ऐसी तृष्णाओं का त्याग ही श्रेयस्कर है जिनकी वजह से मनुष्य स्वतंत्र होते हुए भी भौतिक वस्तुओं का दास बन जाता है। जिनसे विकार उत्पन्न होने के साथ ही जीवन का अतिशीध्र क्षय होता है।

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Thursday, May 12, 2011

तनाव से जीवन में विकृति आती है-हिन्दू धार्मिक विचार (tanav se jeevan mein vikruti aatee hai-hindu dharmik vichar)

               हम अपने जीवन में तनाव इतना अपने सिर पर लेते हैं कि इसका आभास ही नहीं रहता कि शांति पूर्ण जीवन होता क्या है? अनेक लोग तो तनावरहित जीवन को अरुचिकर मानते हैं। उनका कहना होता है कि ‘अगर जीवन में तनाव नहीं है तो फिर मजा ही किस बात का?’
              यह एक खोखला विचार है। दरअसल जीवन का आनंद कर्म है और उसका आशय यह कतई नहीं है कि हर कर्म तनाव का कारण हो। कर्म हमारी देह और मन को व्यस्त रखता है पर उसे तनाव का प्रतीक मानना ठीक नहीं है। तनाव हर स्थिति में शरीर के नाश का कारण बनता है। यह तनाव जब हम अनिच्छा से कोई काम करते हैं या फिर हमारा काम किसी दूसरे पर निर्भर होता है तब बढ़ जाता है। यह स्थितियां कभी सुखद नहीं मानी जाती हैं।
              इस विषय पर मनुस्मृति में कहा गया है कि
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                    यद्यत्परवशं कर्म तत्तद्यलेन वर्जयेत्।
                    यद्यदात्मवशं तु स्यात्तत्तत्सेवेत यत्नतः।
                    "जिस काम के लिये दूसरे पर निर्भर रहना पड़ता है उनका त्याग कर देना चाहिये तथा अपने हाथ से ही संपन्न होने वाले अनुष्ठान करना चाहिए।"
                   यत्कर्मकुर्वतोऽस्य स्यात्परितोषोऽन्तरात्म्न्ः।
                    तत्प्रयत्नेन कुर्वीत विपरीतं तु वर्जयेत्।।
                  "जिस कार्य से मन को शांति तथा अंतरात्मा को खुशी हो वही करना चाहिये। जिस काम से मन को अशांति हो उसे न ही करें तो अच्छा।"
                   जीवन का आनंद सहजता के साथ उठना ही ठीक है। तनाव अंततः हमारी मानसिकता तथा स्वास्थ्य में विकार पैदा करता है। वर्तमान भौतिक जीवन ने लोगों की सुख सुविधाओं में वृद्धि की है जिससे लोग विलासी जीवन को अधिक महत्व देने लगे हैं। दैहिक सक्रियता के अभाव में शरीर स्थूल हो जाते हैं जिससे विकार पैदा होते हैं। उनसे मानसिक तनाव बढ़ता है जो कि अब हमारे जीवन का एक नकारात्मक पक्ष बन रहा है। लोगों ने अपनी आवश्यकतायें इतनी बढ़ा ली हैं कि उनकी पूर्णता दूसरे पर निर्भर हो गयी है। अगर दूसरा काम न करे तो हम लाचार हो जाते हैं। ऐसे में खिसियाहट तो आती है। इसके अलावा लोग अपनी ताकत से अधिक का लक्ष्य तय कर उसके पीछे लग जाते हैं जिसके न मिलने से उनमें हताशा आती है।
               इस प्रकार के तनाव से बचने का एकमात्र उपाय यही है कि हम अपनी आवश्यकतायें सीमित रखें। इसके अलावा अपने जीवन का आधार अपने ऊपर ही बनायें जिससे दूसरे की निष्क्रितयता हमारे संकट और तनाव का कारण न बने।

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Sunday, May 1, 2011

साकार भक्ति भी निष्काम भाव से करना चाहिए-हिन्दू धार्मिक चिंतन (sakar,nirakar bhakti aur nishkam bhakti-hindu dharmik chittan)

               हमारे अध्यात्मिक दर्शन मे भक्ति के प्रकारों को लेकर कोई विवाद नहीं है यह अलग बात है कि कुछ लोग अनावश्यक रूप से इस पर विवाद होता दिखाते हैं। हमारे वेदशास्त्रों में अस्सी फीसदी से ज्यादा सकाम भक्ति पर लिखा गया है तो बीस फीसदी निष्काम भक्ति पर चर्चा की गयी है। श्रीगीता चूंकि समस्त वेदों का सार माना जाता है इसलिये उसका महत्व बहुत है। उसमें स्पष्ट रूप से निराकार तथा निष्काम भक्ति को श्रेष्ठ बताया गया है पर सकाम और साकार भक्ति की महत्ता को भी स्वीकार किया गया है। यही कारण है कि हमारे यहां भक्तों में परमात्मा के स्परूप को लेकर विवाद नहीं होता। अनेक इतिहासकारों के साथ विदेशी संस्कृति और धर्म के देशी समर्थक भारतीय अध्यात्मिक दर्शन का मखौल उड़ाते हुए कहते हैं कि उनका कोई एक ग्रंथ या भगवान नहीं है। उनकी इस आलोचना का भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान समर्थक अधिक प्रतिकार नहीं करते हुए समाज में एकरसता लाने की वकालत करते हैं। दरअसल ऐसे लोगों ने श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन नहीं किया होता। यदि अध्ययन किया होता है तो समझा नहीं होता।
            हमारे अध्यात्मिक दर्शन में सकाम तथा सगुण भक्ति का महत्व स्वीकार किया गया है पर भाव निष्काम होने की बात कही गयी है। इस विषय पर हमारे ग्रंथो में कहा गया है कि--
सम्प्रीतिभोज्यान्यन्ननि आपभ्दोन्यानि वा पुनः।
न च सम्प्रीयस राजन् न चैवायद्गता वयम्।।
                    पूर्णकाम होने के कारण भगवान किसी भी वस्तु की चाहत नहीं रखते। वह तो प्रेम के भूख हैं। भगवान कहते हैं कि पत्र, पुष्प, फल अथवा जल जैसी वस्तुऐं मनुष्यों को बिना परिश्रम के बड़ी सरलता से मिल जाती हैं इसलिये उनको मुझे अर्पण करना कोई बड़ी बात नहीं है। इस अर्पण में प्रेम का भाव होना चाहिए। जो भक्त प्रेम से यह वस्तुऐं अर्पण करता है उसके निष्काम भाव को देखकर में सगुण रूप में प्रकट होकर खाता हूं।
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो में भक्तया प्रयच्छति।
तदहं भवत्युपतमनश्नामि प्रयतात्मनः।।
                 जिस मनुष्य का हृदय शुद्ध न हो तो वह चाहे बाहर से कितना भी शिष्टाचार दिखाते हुए पत्र, पुष्प, फल तथा जल जैसे वस्तुऐं प्रदान करे उसे भगवान स्वीकार नहीं करते।
                   श्रीमद्भागवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण योगासन, प्राणयाम तथा मंत्र जाप करने वाले भक्त को ंसर्वश्रेष्ठ बताते हैं पर साथ ही सकाम भक्ति को राजस भाव से उत्पन्न होने के कारण स्वभाविक भी मानते हैं। निष्काम तथा निर्गुण भक्ति में व्यक्ति को अंतर्मुखी होना पड़ता है जो कि कठिन होता है क्योंकि उससे बाहर प्रतिक्रिया दिखाई नहीं देती जबकि सकाम तथा सगुण भक्ति में लोगों को उसका बाहरी प्रदर्शन बहुत अच्छा लगता है। इसलिये सामान्य लोग उसी तरफ आकर्षित होते है। यह भी बुरा नहीं है पर उसमें भाव निष्काम होना चाहिये यही हमारे धर्मग्रंथों का कहना है।

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