Thursday, February 28, 2008

रहीम के दोहे: बुरे दिनों में बडे लोगों ने भी छोटे काम किए

रहिमन दुरदिन के परे, बडे न किए घटि काज
पांच रूप पांडव भए, रथवाहक नल राज

कविवर रहीम कहते हैं कि बुरे दिनों में भी छोटे कार्य किये। अज्ञातवास में पांडवों ने पांच स्वरूप धारण किए, इसी तरह राजा नल को भी विपत्ति में छोटा कार्य करना पडा। उन्हें भी सारथी बनना पडा था।

रहिमन दानि दरिद्र तर, तऊ जांचबे योग
ज्यों सरितां सूखा परे, कुआं खनावत लोग

कविवर रहीम कहते हैं कि दानी और निर्धन की तभी परीक्षा तभी होती हैं जब उनके पास धन समाप्त हो जाता जैसे नदियों का जल सूख जाने पर लोग कुआं खुदवातेहैं

Wednesday, February 27, 2008

रहीम के दोहे:अधर्म का धन जल्दी नष्ट होता है

रहिमन वित्त अधर्म को, जरत न लागै बार

चोरी करि होरी रचि, भई तनिक में छार

कविवर रहीम कहते हैं की पाप के धन को नष्ट होने में समय नहीं लगता। जैसे चोरी करके होली उत्सव के लिए लकडी जुटाई जाती है और वह पल भर में राख हो जाती है।

रहिमन वे नर मार चुके, जे कहूँ मांगन जाहिं

उनते पाहिले वे मुए, जिन मुख निकसत नाहिं

कविवर रहीम कहते हैं किवह लोग मृतक समान है जो कहीं मांगने जाते हैं पर उनसे पहले तो मृतक वह हैं जो मांगने पर मना कर देते हैं।

Saturday, February 16, 2008

विदुर नीति:छ: तलवारें ही काटती हैं मनुष्य की देह

१.जो मनुष्य जैसा व्यवहार करे उसके साथ भी वैसा भी वैसा ही करना चाहिए-यही नीति धर्म है। कपट का आचरण करने वाले के साथ कपटपूर्ण बर्ताव करें और सद्व्यवहार करने वाले के साथ साधुता का बर्ताब करें।

२.बुढापा रूप का, आशा धैर्य का, मृत्यु प्राणों का, असूया धर्माचरण का, काम लज्जा का, नीचता पूर्ण कर्म सदाचार का, क्रोध लक्ष्मी का और अंहकार सर्वस्व का ही नाश कर देता है।

३.अत्यंत अभिमान, अधिक बोलना, त्याग के भाव का न होना, अपना ही पेट पालने के प्रवृति और मित्र के साथ विश्वासघात-यह छ: तीखी तलवारे देहधारियों की आयु को काटती हैं। यह मनुष्य का वध करती हैं न की मृत्यु प्रदान करती हैं।

४.आपत्ति के लिए धन की रक्षा करें, धन के द्वारा भी स्त्री की रक्षा करें और स्त्री और धन दोनों के द्वारा सदा अपनी रक्षा करें।

Saturday, February 9, 2008

मनुस्मृति:बिना याचना के जो मिले उसे अमृत कहते हैं

१.इन्द्रियों के विषयों-रूप, रस, गंध, शब्द और स्पर्श-में विद्वानों को कभी आसक्त नहीं होना चाहिए. विषयों की आसक्ति से बचने के लिए मन को संयमित करना चाहिए।
२. विद्वानों को अपनी जीविका चलाने के लिए संसार के अन्य व्यक्तियों के समान छल-कपट नहीं करना चाहिए, अपितु सब प्रकार के पवित्र और शुद्ध जीविकोपार्जन के साधन ही अपनाना चाहिए।
३.संतोष और संयम से ही स्थाई सुख की प्राप्ति होती है, अत: विद्वान को सदैव संतोष और संयम धारण करना चाइये. उसे यह याद रखना चाहिए की संतोष ही सुखों का मूल है और असंत्सोह दु:खों का कारण होता है।
४.उंछ और शिल को ऋत कहते हैं, जो कुछ बिना याचना के मिल जाए उसे अमृत कहते हैं, भिक्षा मांगना मृत है और कृषि करना प्रमृत है।
*खेती करने से अनेक सूक्ष्म जीवों की हत्या अनजाने में हत्या होती है अत उसे 'प्रमृत' कहते हैं।
*कृषक द्वारा खेत में बोए अन्न को काटकर ले जाने के पश्चात उसके द्वारा छूट गए या मार्ग में गिर गए दानों को उंगली से चुनने को उंछ और धान्य यानी बालियों को चुनने को शिल कहते हैं।

Sunday, January 20, 2008

रहीम के दोहे:अक्षर हैं कम पर अर्थ है गहरा

दीरघ दोहा अरथ के, आखर थोरे आहिं
ज्यों रहीम नट कुंडली, सिमिट कूदि चढिं

कविवर रहीम कहते हैं की जैसे खेल दिखाते हुए नत कूद-कूदकर अपने आपको सावधानी से संभालता हुआ शीघ्रता से ऊपर की नोंक पर कूद-कूदकर अपने आपको सावधानी से संभालता हुआ शीघ्रता से ऊपर बांस की नोंक पर कुंडली मारकर चढ़ जाता है, उसी प्रकार रहीम के दोहों में शब्द तो कम हैं परन्तु अर्थ बहुत गहरा है.

Saturday, January 19, 2008

संत कबीर वाणी:माया के होते हैं नौ-नौ लंबे हाथ सींग

देखा देखी भक्ति का, कबहूँ न चढ़सी रंग
<विपत्ति पडे यों छाड्सी, केचुली तजत भुजंग

देखा-देखी की हुई भक्ति का रंग कभी भी आदमी पर नहीं चढ़ता और कभी उसके मन में स्थायी भाव नहीं बन पाता। जैसे ही कोई संकट या बाधा उत्पन्न होती है आदमी अपनी उस दिखावटी भक्ति को छोड़ देता है। वैसे ही जैसे समय आने पर सांप अपने शरीर से केंचुली का त्याग कर देता है।


कोटि करम लगे रहै, एक क्रोध की लार
किया कराया सब गया, जब आया हँकार


रेशम के कीडे द्वारा जैसे अत्यंत लंबा रेशम का धागा बँटा जाता है, उसी प्रकार एक क्रोध ही करोडों पाप कर्मों को उत्पन्न करता है। जब मनुष्य को अंहकार आ जाता है तो उसके पुण्य, तप, ज्ञान, गुण आदि सभी नष्ट हो जाते हैं।

माया माथै सींगड़ा, लम्बे नौ-नौ हाथ
आगे भारे सींगड़ा, पाछै मारै लात


माया के माथे पर मद और अंहकार रुपी, लोभ और अज्ञान रूपी सींग होते हैं जो नौ-नौ हाथ लम्बे होते हैं। आते समय वह सींग मारती और जाते समय लात मारती है।

Tuesday, January 15, 2008

संत कबीर वाणी: जो शूरवीर प्रेम में घायल होते हैं

घायल की गति और है, औरन की गति और
प्रेम बाण हिरदै लगा, रहा कबीर ठौर


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं जो शूरवीर प्रेम में घायल होते हैं उनके तन-मन की गति अन्य लोगों से अलग होती है। हृदय में प्रेम-बाण लग जाने पर प्रेमी अपने स्थान पर ठहर जाता है।
भावार्थ- यहाँ आशय यह है कि जिसको भगवान से प्रेम होता है उसकी दशा सामान्य लोगों से अलग हो जाती है वह तो केवल भगवान की भक्ति में लीन हो जाते हैं। उन्हें तो बस सत्संग और स्मरण में ही मजा आता है।

चित चेतन ताज़ी करै, लौ की करै लगाम
शब्द गुरु का ताजना, पहुचाई संत सुठाम


अपनी चित्त वृत्ति को घोड़ी बनाएं, उस पर ध्यान लगाएं और सदगुरू के शब्द-ज्ञान का कोडा लें। इस प्रकार कुशल संत और साधक भगवान की भक्ति कर अपना लक्ष्य प्राप्त कर लेते हैं।

भावार्थ-आदमी अगर अपने चित्त पर नियंत्रण करना सीख ले तो उसके लिए कोई काम कठिन नहीं है बस इसके लिए भगवान में मन लगा चाहिए। उनका नाम स्मरण अपने आप में बहुत बड़ी शक्ति है और उससे भक्त में बहुत बड़ी शक्ति आती है।

Sunday, January 13, 2008

संत कबीर वाणी:गुरु के बिना भवसागर से मुक्ति नहीं

साबुन बिचारा क्या के, गांठे राखे मोय
जल सो अरसां नहिं, क्यों कर ऊजल होय


संत कबीर दास कहते हैं कि साबुन क्या करे बेचारा, जब उसको गाँठ अपने हाथ में बाँध रखा है. जल के स्पर्श करता ही नहीं फिर कपडा कैसे उज्जवल हो सकता है.
भाव-ज्ञान की बात तो कंठस्थ कर लेते हैं पर जब समय आता है तो सब भूल जाता है इसमें ज्ञान का कोई दोष नहीं हैं.

भौ सागर की त्रास तेक गुरु की पकडो बाँहि
गुरु बिन कौन उबारसी, भी जल धारा माहिं

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि इस संसार सागर के दुखों से बचने के लिए गुरु का हाथ पकडो. गुरु के बिना इस भाव सागर से मुक्ति नहीं हो सकती.

Saturday, January 12, 2008

सब करो चिट्ठे की चर्चा, उसमें नहीं बुद्धि का खर्चा

अपरिहार्य कारणों से यह पोस्ट वापस ली गयी है, इसे कुछ समय बाद जारी करने पर विचार किया जा सकता है
दीपक भारतदीप

Friday, January 11, 2008

दीपक भारतदीप का मूल्यांकन करने वाले अपनी काबलियत बताएं

दिलचस्प बात यह है कल से मैंने जो पोस्ट डालीं हैं उनमें जो विवाद हैं उसे लोग पढ़ खूब रहे हैं पर कमेन्ट कोई नहीं दे रहा है. मतलब लोग रट्टा कौन मोल ले यही सोचकर चुप हैं-चौपालों पर डर का माहौल बनाकर रखा है.. अगर मेरी जगह कोई और होता तो उसकी तो हालात पतली कर देते पर मुझे देखकर उनकी आवाज बंद है, वैसे भी डरना क्या? कौन वह इसे पढ़ रहे हैं, पढ़ते होते तो मेरा सबसे हल्का ब्लॉग ले जाते. मालुम है कि इसके ब्लॉग सब भारी-भरकम हैं नहीं झेल पायेंगे. ले जाना भी जरूरी है आख़िर भारत का सबसे तेज ब्लोगर है पुरस्कार में वजन कहाँ से आयेगा?

मेरे इस सवाल का जवाब कोई नहीं दे रहा कि चाहे वह मेरा हल्का ब्लॉग था पर तुम्हें पता है उसमें गणेश जी पर एक पोस्ट है और उसे तुमने पढा? तुम्हें मेरा कोई ब्लॉग शामिल करना ही नहीं था. उसमें धर्म-कर्म से संबधित बहुत सामग्री है. तुम में अपने लिखने के अहंकार के साथ इसमें तमाम तरह के ग़लत फायदे उठाने का भाव है और दिखते किसी भी धर्म के हो पर उसका कोई सम्मान नहीं है. नहीं तो बताते तो क्यों नहीं कि तुम्हारी काबलियत क्या है कि तुम दीपक भारतदीप का मूल्यांकन करोगे? अब तुम मुश्किल में हो. चुपचाप एक पोस्ट डालकर माफ़ी मांग लो नहीं तो झेलते रहो. रोज तो तुम पर लिखूंगा नहीं पर चाहे जब आयेगा तुम पर लिख कर नए ब्लोगरों का मनोबल बढ़ाने का प्रयास करूंगा जिसे तुमने गिराने की कोशिश की हैं और मैं यह होने नहीं दूँगा. तुम यह तो बताओं कि क्या लिखते हों जो मेरे लिखे का मूल्यांकन करोगे. चाहे जिसे और जैसे पुरस्कार दो पर मेरा नाम क्यों जोडा. मुझसे पूछा. क्या तुमने ब्लॉग बना लिया तो क्या समझ लिया कि सब ब्लॉग तुम्हारी जागीर हो गए और उनका मूल्यांकन करोगे और पोस्ट पर छापोगे. मैं जानता हू कि ऐसे पुरस्कार कैसे दिए जाते हैं. इतने सारे पुरस्कार के लिए आवेदन मांगे जाते हैं पर मैं कभी नहीं करता, और तुम मेरा ब्लॉग मुझसे लिए बगैर उसका मूल्यांकन करने लगे. यार अपनी काबलियत बताओ कि आख़िर भारत के सबसे तेज ब्लोगर का मूल्यांकन कैसे किया ?

Thursday, January 10, 2008

संत कबीर वाणी:जहाँ कपट हो वहाँ न जाएं

जीव हनेँ हिंसा करेँ, प्रगट पाप सिर होय
पाप सबन जो देखिया, पुन्न न देखा कोय


संत शिरोमणि कबीरदास जे कहते हैं कि जो जीव को मारता है उसके पाप का भार प्रत्यक्ष रुप से उसके सिर पर दिखाई देता है पर उनके जो पुण्य कर्म हैं वह किसी को दिखाई नहीं देते क्योंकि हिंसा करने वाले पापी होते हैं और उन्हें किसी भी तरह पुण्यात्मा नहीं माना जा सकता।

कबीर तहां न जाइए, जहाँ कपट का हेत
जानो काले अनार के, तन राता मन सेत


इसका आशय यह है कि वहां कदापि न जाइए जहाँ कपट का प्रेम हो। उस प्रेम को ऐसे ही समझो जैसे अनार की कली, जो ऊपरी भाग से लाल परंतु भीतर से सफ़ेद होती है। वैसे हे कपटी लोग मुहँ पर प्रेम दिखाते हैं पारु उनके भीतर कपट की सफेदी पुती रहती है ।

कबीर तहां न जाइए, जहाँ कपट को हेत
नौ मन बीज जू बोय के, खालि रहिगा खेत


इसका आशय यह है कि वहाँ कतई न जाएँ जहां कपट भरे प्रेम मिलने की संभावना हो। जैसे ऊसर वाले खेत में नौ मन बीज बोने पर भी खेत खाली रह जाता है, वैसे ही कपटी से कितना भी प्रेम कीजिये परन्तु उसका हृदय प्रेम-शून्य ही रहता है।

Wednesday, January 9, 2008

जब सस्ती कार सड़क पर आयेगी

सुना है अब सस्ती कर सड़क पर आयेगी
जब महंगी ही थी तब भी
कोई कम कहर बरपातीं थीं
जो सस्तीं में रहम दिखाएंगी
मोटर साइकिल के झुंड ही
रास्ते पर पैदल चलना मुश्किल कर देते
कारों के हार्न ही कान बहरा कर देते
सस्ते होने से कारों के संख्या जो बढेगी
सांस लेना होता जायेगा मुश्किल
महंगाई के इस युग में
जिन्दगी हो गयी है सस्ती आदमी
सस्ती कारो से मुफ्त की हो जायेगी
पहिये तो कार में चार ही होंगे
पर कोई सड़क तो चौड़ी नही हो पायेगी
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रहीम के दोहे:स्त्री को दीपक की तरह आवरण में रखो

जो रहीम दीपक दसा, तीय राखत पट ओट
समय परे ते होत है, वही पट की चोट

कविवर रहीम कहते हैं कि अपनी स्त्री को दीपक की तरह आवरण में रखो। जैसे हवा लगने से दीपक बुझ जाता है उसी प्रकार पुरुष द्वारा किये गए बुरे व्यवहार से स्त्री का मन आहत हो जाता है।

जो रहीम पगतर परो, रगरि नाक अरु सीस
निठुर आगे रोयबो, अंस गारिबो खीस


कविवर रहीम कहते हैं कि मैं उसके चरणों में गिर पडा। अपना मस्तक और नाक भी रगड़ दी परन्तु निष्ठुर व्यक्ति के समक्ष रोने से अश्रुधारा प्रवाहित करना भी व्यर्थ हो गया।

भावार्थ-अगर किसी व्यक्ति का यह पता लग जाये कि वह निष्ठुर स्वभाव का है तो उसके पास जाकर किसी भी प्रकार की याचना और प्रार्थना करना व्यर्थ है।

Tuesday, January 8, 2008

चाणक्य नीति:भोजन के तत्काल बाद मेजबान का घर छोड़ दें

१.मन का संयम अर्थात शांति और स्थिर भाव के समान कोई दूसरा तप नहीं है, संतोष जैसा कोई सुख नहीं, तृष्णा जैसा दु:ख देने वाला और भयंकर रोग नहीं तथा दया जैसा स्वच्छ और अच्छा दूसरा कोई धर्म नहीं । अत: सुख के इच्छुक व्यक्ति को तृष्णा से बचना चाहिए तथा सफलतम जीवन में शांति,संतोष और दया को अपनाना चाहिए। इसी में महानता है।
२.जिस प्रकार सोने की चार विधियों-घिसना, काटना, तपाना तथा पीटने-से जांच की जाती है, उसी प्रकार मनुष्य की श्रेष्ठता की जांच भी चार विधियों-त्यागवृति, शील, गुण तथा सतकर्मो -से की जाती है।
३.संसार के दुखों से दुखित पुरुष को तीन ही स्थान पर थोडा विश्राम मिलता है- वह हैं संतान, स्त्री और साधूराजा की आज्ञा, पंडितों का बोलना और कन्यादान एक ही बार होता है।एक व्यक्ति का तपस्या करना, दो का एक साथ मिलकर पढ़ना, तीन का गाना, चार का मिलकर राह काटना, पांच का खेती करना और बहुतों का मिलकर युद्ध करनापक्षियों में कोआ, पशुओं में कुत्ता और मुनियों में पापी चांडाल होता है पर निंदा करने वाला सबसे बड़ा चांडाल होता है।

4.जिस प्रकार कोई गायिका निर्धन प्रेमी को नहीं पूछती, पराजित राजा को जनता मान नहीं देती, उसी प्रकार से सूखे और टूटे वृक्ष को पक्षी छोड़ जाया करते हैं। अत: अतिथि को चाहिए कि वह भोजन के तुरन्त बाद मेजबान का घर छोड़ दे।
5.यजमान के घर सर पुरोहित दक्षिणा लेकर और विद्या अर्जन के बाद विद्यार्थी गुरू के द्वार से चला जाता है उसी प्रकार से वन के जल जाने पर पहु-पक्षी वन का त्याग कर अन्यत्र पलायन कर जाते हैं।
लेखकीय अभिमत-चाणक्य एक महान विद्धान थे और इन अन्तिम दोनों संदेशों में उनका यही आशय है कि आदमी को और परिस्थियों को ध्यान में रखते हुए अपनी शारीरिक सुरक्षा और मान-सम्मान के लिए सतर्कता बरतना चाहिए।

Monday, January 7, 2008

चाणक्य नीति:कार्य में स्थिरता बिना सम्मान नहीं मिलता

१.जिसके कार्य में स्थिरता नहीं है, वह समाज में सुख नहीं पाता न ही उसे जंगल में सुख मिलता है. समाज के बीच वह परेशान रहता है और किसी का साथ पाने के लिए तरस जाता है.
२.गंदे पड़ोस में रहना, नीच कुल की सेवा, खराब भोजन करना, और मूर्ख पुत्र बिना आग के ही जला देते हैं.
३.कांसे का बर्तन राख से, तांबे का बर्तन इमले से,स्त्री रजस्वला कृत्य से और नदी पानी की तेज धारा से पवित्र होती है.
४.मनुष्य में अंधापन कई प्रकार का होता है. एक तो जन्म के अंधे होते हैं और आंखों से बिलकुल नहीं देख पाते और कुछ आँख के रहते हुए भी हो जाते हैं जिनकी अक्ल को कुछ सूझता नहीं है.
५.काम वासना के अंधे के कुछ नहीं सूझता और मदौन्मत को भी कुछ नहीं सूझता. लोभी भी अपने दोष के कारण वस्तु में दोष नहीं देख पाता. कामांध और मदांध इसी श्रेणी में आते हैं.
६.कुछ लोगों की प्रवृतियों को ध्यान में रखते हुए उनको वश में किया जा सकता है, और उनको वश में किया जा सकता है, लोभी को धन से, अहंकारी को हाथ जोड़कर, मूर्ख को मनमानी करने देने से और सत्य बोलकर विद्वान को खुश किया जा सकता है.

Sunday, January 6, 2008

संत कबीर वाणी:सिर दक्षिणा में दे सके वही प्रेम योग्य

प्रेम पियाला सो पियो, शीश दच्छिना देय
लोभी शीश न दे सकै, नाम प्रेम का लेय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि प्रेम का प्याला वही प्रेमी पी सकता है जो अपना सिर दक्षिणा दे सकता है और जो भगवान का नाम केवल दिखाने के लिए लेता है वह लोभी कभी भी प्रेम नहीं कर सकता।

भावार्थ-यहाँ कबीरदास जी का अपना सिर दक्षिणा में दिने से आशय निष्काम भक्ति से है। हमारे दिमाग में भक्ति के समय भी अनेक बाते भरी होतीं है और अगर उन चिंताओं का बोझ सिर से उतार कर भक्ति में लीन हुआ जाये तभी सच्ची भक्ति प्राप्त हो सकती है।

कथन थोथी जगत में, करनी उत्तम सार
कह कबीर करनी भली, उतरै भौजल पार
संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं कि अपने मुहँ से बातें करना बहुत आसन होता है परन्तु करना मुश्किल है। वास्तविकता यह है कि जब कोई अच्छा काम करेंगे, तभी इस जीवन रुपी भवसागर से पार हो सकेंगे।

Friday, January 4, 2008

संत कबीर वाणी:मान पाने की लालसा कुत्ते का लक्षण

मान बढाई जगत में, कूकर की पहचान
प्यार किए मुख चाटई, बैर किये तन हान


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मान पाने की लालसा, बडाई सुनने की इच्छा तो कुत्ते के लक्षण है। कुता पुचकारे जाने पर पुँछ हिलाता हुआ अपने मालिक के प्रति सम्मान प्रकट करता है और जब उसे फटकारा जाता है तो काटने लगता है।

बड़ा बडाई ना करे, बड़ा न बोले बोल
हीरा मुख से ना कहै, लाख टका मेरो मोल


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते है कि जो व्यक्ति वास्तव में योग्य ज्_ंजानी, विद्वान और शक्तिशाली हैं वह कभी भी अपने मुहँ से अपनी बडाई नहीं करता जैसे कोई हीरा अपने मुहँ से अपने कीमती होने का बयान नहीं करता।

Thursday, January 3, 2008

चाणक्य नीति:सज्जन पुरुष अर्थाभाव में भी सज्जनता नहीं छोड़ते

1.दान, शक्ति, मीठा बोलना, धीरता और सम्यक ज्ञान यह चार प्रकार के गुण जन्म जात होते हैं, यह अभ्यास से नहीं आते।
2.जिसकी मन में पाप हैं, वह सौ बार तीर्थ स्नान करने के बाद भी पवित्र नहीं हो सकता, जिस प्रकार मदिरा जलाने पर भी शुद्ध नहीं होता।
3.जो वर्ष भर मौन रहकर भोजन करता है, वह हजार कोटी वर्ष तक स्वर्ग लोक में पूजित होता है।
4.पीछे-पीछे बुराई कर काम बिगाड़ने वाले और सामने मधुर बोलने वाले मित्र को अवश्य छोड़ देना चाहिए।
5.इस संसार में कट जाने पर भी चन्दन का वृक्ष अपनी सुगन्ध नहीं छोड़ता, हाथी बूढा हो जाने पर भी अपनी विलासिता नहीं छोड़ता, गन्ना कोल्हू में पिस जाने पर भी अपनी मिठास नहीं छोड़ता ऐसे ही सज्जन पुरूष अर्थाभाव में भी अपनी सज्जनता नहीं छोड़ते।

Wednesday, January 2, 2008

संत कबीर वाणी:साधू को वैरागी और गृहस्थ को उदार होना चाहिए

'कबीर' हरि कग नाव सूं , प्रीती रहे इकवार
तो मुख तैं मोती झडै , हीरे अंत न पार

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि यदि हरिनाम पर अविरल प्रीती बनी रहे तो उसके मुख से मोती ही मोती झाडेंगे और इतने हीरे कि उनकी गिनती नहीं हो सकती।

बैरागी बिरकत भला, गिरही चित्त उदार
दुहूँ चूका रीता पडै, वाकूं वार न पार


बैरागी वही अच्छा है जिसमें सच्ची विरक्ति हो और गृहस्थ वह अच्छा जिसका हृदय उदार हो। यदि बैरागी के मन में विरक्ति नहीं और गृहस्थ के मन में उदारता नहीं तो दोनों का ऐसा पतन होगा कि जिसकी हद नही है।

Friday, December 28, 2007

मोबाइल की बैटरी का चक्कर

मोबाइल की बैटरी में खराबी की
खबर ने उसे हिला दिया
मिलता था वह जिन गर्लफ्रैंडस से
अलग दिन और अलग जगह पर
बैटरी फटने के भय ने
सबको एक ही दिन
उसके होस्टल के कमरे के छत के नीचे
आपस में मिलवा दिया

उसने सबको एक ही कंपनी के
मोबाइल तोहफ़े में दिये थे
जिनकी बैटरी फटने के चर्चे
टीवी चैनलों ने किये थे
भय से काँपती सब उसके कमरे में पहुँची
जो देखा वहां का मन्जर
वह सब भूल गयीं और मिलकर
उसे छठी का दूध याद दिला दिया


वह पिटा-कुटा अपने कमरे में पडा था
एक दोस्त ने आकर उसे उठाया
वजह पूछी पर वह कुछ नहीं बता रहा था
बस एक ही बात रोते हुए दोहरा रहा था
'मोबाइल वालों तुमने यह क्या किया'
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Wednesday, December 26, 2007

दृश्य-अदृश्य

शूटिंग-हूटिंग
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सुरा, सुंदरी और सता के खेल में
अब ऐसे दृश्य सामने आने लगे हैं
कि पता ही नहीं लगता
असल हैं या फिल्म की शूटिंग है
दौलत, शौहरत और ताकत के सहारे
करने वालों का हर कर्म
शानदार अभिनय कहलाये
गरीब के बुरे क्या अच्छे कर्म पर भी
लोग करते हूटिंग है
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दृश्य-अदृश्य
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प्रचार प्रबंधक रचते हैं
शब्दों का ऐसा मायाजाल कि
फिल्मी हीरो
असल जिन्दगी में विलेन होते हुए भी
लोगों के दिल में हीरो होते हैं
अखबार और टीवी में खबरों की
ऐसी चाल रचते हैं गोया कि
हीरो के जग जाहिर काले कारनामे भी
ऐसे प्रस्तुत होते हैं जैसे
कोई काल्पनिक दृश्य हैं
देश , समाज और मर्यादाओं का
कोई लेना-देना नहीं
हीरो से लड़ने वाली
उसे सताने वाली
ऎसी शक्ति है जो अदृश्य है
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प्रचार प्रबंधन
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असली दृश्य नकली लगे
और नकली लगे असली
इसी करामात को
कहते हैं प्रचार प्रबंधन
खलनायक को फिल्म में पीटकर
बनता है नायक
करता है असल जिंदगी में खलनायकी
पर अखबार रहते हैं खामोश
और टीवी पर ऐसे दृश्य आते जैसे
लोग देख रहे हैं स्वपन
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ख्याल हमेशा हकीकत नहीं हुआ करते
अगर ऐसा होता तो
लोग आसमान में ही उड़ते

जमीन की तरफ नजर तक नहीं करते

Tuesday, December 25, 2007

मोबाइल का माडल दिल का माडल

उसने कई बार राह चलते हुए
उस लडकी को लव लेटर थमाया
पर लडकी की तरफ से कभी
कोई जवाब नही आया
उसने लव में एक्सपर्ट अपने दोस्त
से जब इस बारे में बात की तो
वह बोला
'क्या बाबा आदम के जमाने में रहते हो
मोबाइल के जगह लडकी के हाथ में
सडे-गले कागज़ वाला प्रेमपत्र रखते हो
अब तो गिफ्ट देकर प्रेम का इजहार
करने का ज़माना आया'
दोस्त की बात से उसकी समझ
में पूरा माजरा आया

उसने बाजार से खरीदा मोबाइल
फिर जाकर लडकी के हाथ में थमाया
उसे गौर से देखने के बात वह बोली
'पुराना माडल है समझ में नहीं आया'
बिचारा सकपकाया
फिर निकला बाजार में
भटका इधर उधर
आख़िर ऐक नया माडल समझ में आया
बहुत महंगा था
फिर भी खरीद कर जा पहुंचा उस रास्ते पर
जहाँ से गुजरी वह तो उसे दिखाया
उसने उलट-पुलट कर देखा
फिर पूछा
'बेटरी फटने वाली तो नहीं
क्या इसे चेक कराया'

उसने ना में गर्दन हिलायी
मुहँ से प्रेम के इजहार के रुप में
प्रथम शब्द की उसकी अभिव्यक्ति
नहीं निकल पायी
लडकी ने वह माडल भी लौटाया
वह तत्काल भागा फिर बाजार की तरफ
बेटरी चेक कराकर लॉट आया
और वापस घर जाती लडकी को दिखाया
लडकी ने अपने पर्स से निकाल कर
उसे दूसरा मोबाइल दिखाया
'सौरी, तुम्हारे इस प्रेजेंट से पहले ही
यह एकदम नए माडल का मोबाइल
एक दोस्त ही
मेरे पास प्रेजेंट देने आया
मुझे पहली नजर में भाया'
उसके जाते ही लड़का आकाश में
देखकर हताशा में चिल्लाया
'शाश्वत प्रेम की इतनी गाथाएं सुनता हूँ
पर इस आधुनिक प्रेम का माडल किसने बनाया
जिस पर है मोबाइल के माडल की छाया
यह कभी मेरे समझ में नहीं आया'
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साबित करना होगा कबूतरनी नहीं पत्नी

बडे लोगों की कबूतरबाजी के
यही हाल रहे तो
विदेश में हर भारतीय को
अपने साथ ले जाने में दिक्कत होगी पत्नी
विदेश में हवाई अड्डे पर
साबित करना होगा नहीं है
वह उड़ाकर लाई कबूतरनी
शादी का एलबम सीडी या कोई
सबूत साथ रखना होगा
यह बताने के लिए
उड़ाकर लाई कबूतरनी नहीं
ब्याह कर लाई पत्नी यही
बार-बार साबित करना होगा
कहना पडेगा चीख-चीख कर'यही है मेरी पत्नी'
कितना हैरान होगा जब कोई
विदेशी पूछेगा
'यह आपकी कौन'
भारतीय कहेगा'पत्नी '
विदेशी पूछेगा'क्या अपनी'
अपने घर में ही उनसे डरते हैं
भला उन विदेशियों से कैसे लड पायेंगे
जब अपने ही समाज के चरित्र पर
लगा दाग वह दिखायेंगे
उनके घर में पलटकर
कैसे पूछ पायेंगे'क्या पराई भी होती है पत्नी'
हवाई अड्डों पर शुरू होगी चेकिंग
'कौन लाया है पत्नी और 'कौन कबूतरनी '
कितनी बार सबूत माँगता है आदमी
अपनी पत्नी से उसके पतिव्रता होने के
वह दिन भी आयेगा जब
पत्निव्रता होने के सबूत उसे
अपने साथ रखने होंगे
हवा में उड़ने से पहले और बाद
उसे कदम-कदम पर
करना होगा साबित
'जो स्त्री मेरे साथ है
उसे लाने का खर्चा मैंने ही उठाया है
कोई नहीं खाया है कमीशन
इसे लाने के लिए इसके
माँ-बाप से भी
लाया हूँ लिखित परमीशन
यह कोई कबूतरनी नहीं
मेरी है अपनी पत्नी'
इस तरह विदेशी दौरे पर आदमी की
जान तो सांसत में रहेगी
हंसती रहेगी पत्नी

Monday, December 17, 2007

नये खेल के नये मदारी

मैंने रास्ते पर कई मदारी देखे हैं जो जोर-जोर से चिल्लाकर लोगों का ध्यान अपनी और आकर्षित करते हैं और फिर कभी बंदरिया का नाच दिखाकर, कभी सांप नेवले की जंग दिखाकर और कभी कुछ अन्य दिखाकर लोगों की जेब से पैसा निकालते हैं-इनमें कुछ खेल दिखाकर बाद में अपनी दवा वगैरह भी बेचते हैं। ऐसे मदारियों को आमतौर से सम्मान की तरह नहीं देखा जाता है।



मैं आजकल टीवी पर चैनलों को देखता हूँ तो मुझे मदारियों और उनके कार्यक्रमों में कोई अंतर नहीं दिखाई देता। खासतौर पर नृत्य और गानों की प्रतियोगिताएं तो मदारियों की तरह ही चलाई जा रहीं है। इसके एंकर इतनी जोर से चिल्लाते हैं जैसे मदारी की तरह अपने आसपास भीड़ एकत्रित करना हो। अगर घर में कोई बैठकर नहीं सुन रहा है तो वह भी आ जाये और कोई टीवी के सामने बैठकर भी कोई देख-सुन नहीं रहा है वह भी देखने लगे शायद इसलिए ही उसके एंकर इतनी जोर से चिल्लाते हैं। प्रतियोगियों को कोइ परिणाम सुनाने से पहले ऐसी धुन बजती है जैसे कोई सस्पेंस का सीन सामने हो और कई बार ऐसे बात की जाती है मानो अभी वह बाहर होने वाला हो फिर उसे रख लिया जाता है। इस तरह वह सारे काम किये जाते हैं जो मदारी करते हैं। इन प्रतियोगिताएं में धर्मवाद, क्षेत्रवाद और भाषावाद का उपयोग इतनी चालाकी से किया जाता है कि कोई समझ ही नहीं सके कि कैसे उनकी प्रशंसा कर एस.एम्.एस.कर उनकी जेब से पैसे निकल रहे हैं।



हालांकि यह भी नये तरह के मदारी हैं पर वहाँ मौजूद प्रतियोगियों के साथ उनके माता-पिता को भी भावुक कर उनकी आंखों से गम और खुशी की आंसू निकलवाकर दर्शकों को बाँध देते हैं। इनको एंकर कहा जाता है और लोग बडे चाव से देखते हैं जबकि इनकी वजह से अपने देश के पुराने मदारियों का काम मंदा होता जा रहा है। समस्या यह है कि कि पुराने मदारियों को देखना या न देखना अपनी इच्छा पर निर्भर था पर यह तो जबरन घर में घुसे हुए हैं। घर के दो सदस्यों को पसंद हो और दो को नहीं तो आखिर इनकों वह भी झेलते हैं जो नहीं देखना चाहते। कुल मिलकार इन्हें नये खेल के नये मदारी ही कहा जा सकता है।

Friday, December 14, 2007

ब्लोगर चाय की दुकान का नहीं तो क्या ब्यूटी पार्लर का उदघाटन करेगा

वह ब्लोगर अपने घर से पैदल्-पैदल सड़क से जा रहा था और एक जगह चायकी दुकान देखकर रुक गया उसने देखा कि दुकान के बाहर रिबन बंधा था पर उसने इस पर ध्यान नहीं दिया और वहां खडे बीडी पी रहे एक आदमी से कहा-''बंधुवर, एक कट चाय बना दो।''
''अभी नहीं बाबूजी''-उस आदमी ने बीडी का धूआं उडाते हुए कहा-''अभी इस दुकान का इनोग्रेशन नहीं हुआ। जब प्रापर ढंग से इनोग्रेशन हो जायेगा तभी काम शुरू करेंगे।''
ब्लोगर ने पूछा -''कब होगा उदघाटन?''
वह फ़िर धूआं छोड़ते हुए बोला- ''उदघाटन नही इनोग्रेशन। आप नैक रुक जाओ हमारे बाबूजी इनोग्रेशन करने वाले को लेने गये हैं। एक बहुत बडे लेखक हैं उनसे यह रिबन कटवाने का काम कराना है।
''उन लेखक महोदय क्या नाम है। और कौन लेने गया है उनको?''ब्लोगर इस फिराक में था कि कुछ मसाला मिल जाये ब्लोग पर लिखने के लिये।
जब उसने नाम बताये तो ब्लोगर के हाथ के तोते उड गये। लेखक के रूप में उसका और उसको लेने गये व्यक्ति के रूप में दूसरे ब्लोगर नाम उसने लिये थे।
ब्लोगर को याद आया कि इसने इस दुकान वाले को उस दूसरे ब्लोगर के घर के आसपास देखा है-उसे यह समझते देर नहीं लगी यह दूकान उसके और ब्लोगर के घर की लगभग बीच की दूरी स्थित है और उसने इस दुकानदार से अपनी जुगाड़ बिठाने के लिए उसका इस्तेमाल करने की योजना बनाई है। अब तो ब्लोगर वहां से खिसकने को हुआ कि किसी तरह इस मुसीबत से निकल जाये। वह अभी कुर्सी से उठा कर ही थोडा चला था कि दूसरा ब्लोगर उसके सामने पहुंच गया और बोला-''वाह यार अच्छा ही हुआ कि तुम यहां मिल गये। अभी मैं तुम्हारे घर से ही वापस लौटा हूं। तुम यार ज़रा इसके चाय की दुकान का इनोग्रेशन कर दो। अपना ही आदमी है। कोई इसके लिये तैयार नहीं हो रहा था मैंने सोचा तुमसे बढिया केंडीडेट और कौन हो सकता है?"
पहले ब्लोगर ने मन ही मन खुश होते हुए कहा-"यार, मैं अदना सा ब्लोगर भला इस सम्मान के योग्य कहां?"
दूसरा ब्लोगर बोला -"चुप हो जाओ। मैने इससे कहा कि तुम बहुत बडे लेखक हो। यह मेरे ससुराल के रिश्ते वाला है और मेरी पत्नि ने उनको ऐसे भर रखा है कि ब्लोगर के नाम से ही चिढ़ने लग्ते हैं।''

पहला ब्लोगर घबडा गया और बोला-"फ़िर तो मैं नहीं करता उदघाटन। अगर कहीं इसे बाद में पता चला तो।"
दूसरा ब्लोगर उसे आश्वासन देते हुए बोला-"नहीं कौन बतायेगा।''
पहले ब्लोगर ने अपने बचाव करने के लिहाज से कहा-''पर क्या तुम्हें ठीक लगता है कि हम किसी चाय की दुकान का उदघाटन करें। अरे कुछ तो ब्लोगरों की इज्जत का ख्याल करो।"

दूसरा ब्लोगर गुस्सा होकर बोला-''धीरे-धीरे ही आदमी प्रगति करता है। वैसे भी क्या कोई ब्लोगर चाय की दुकान का नहीं तो क्या किसी फ़ाईव स्टार ब्यूटी पार्लर का उदघाटन करेगा? एक तो मैं तुम्हारा सम्मान करा रहा हूं और तुम हो कि नखरे दिखा रहे हो।''पहले ब्लोगर ने भी गुस्से से कहा-"तुम खुद ही क्यों नहीं कर लेते?''

दूसरे ब्लोगर फ़िर बडे प्रेम से बोला-''यार मेरा सम्मान तो हो चुका है अब मेरे मन मे यह इच्छा थी कि तुम्हारा सम्मान हो जाये। आओ, चलें अब बहुत टाईम हो गया है।"
पहला ब्लोगर यंत्रवत उसके पीछे उस दुकान पर फिर वापस आया और उसने दुकान का फीता काटा।

वहां मौजूद दोनों दर्शकों ने तालिया बजाईं। दुकान वाले ने चाय बनाई तो तीनों ने पी। पहला ब्लोगर वहां से चला तो दूसरा ब्लोगर पीछे से आया और बोला-"देखो यार, उस बिचारे को कमाई की शुरुआत तो कराते जाओ। तीन चायके उसे बारह रूपये दे दो। वह मेरी इज्जत के कारण मांग तो नहीं पाया"

पहला ब्लोगर्-''पर यार मैने तो एक चाय पी थी।"

दूसरा ब्लोगर बोला-'यार एक दुकान का इनोग्रेशन करने का सम्मान मिलने पर तुम इतना पैसा खर्च नहीं कर सकते। चलो मेरे साथ उसे पैसे दो।

पहला ब्लोगर बोला-''पर मैने तो उसे कट कही थी। तुम तो पूरे तीन कप के पैसे दिलवा रहे हो। कहाँ में दो रूपये कट की चाय पीने आया था और तुम तो बारह रूपये का झटका दिलवा रहे ho।"
दूसरा ब्लोगर''यार कुछ अपनी इमेज का ख्याल करो, अरे इतने बडे ब्लोगर क्या कट चाट पीयेंगे।

पहला ब्लोगर लौट पड़ा और दुकान वाले को बारह रूपये देकर घर की तरह चला तो फ़िर पीछे से दूसरा ब्लोगर आया और बोला-''यार इस ब्लोगर मीट पर भी रिपोर्ट जरूर लिखना।
पहला ब्लोगर गुस्से में बोला-क्या लिखूं यहीं न कि ब्लोगर एक चाय की दूकान का नहीं तो क्या ब्युटी पार्लर का उदघाटन करेगा। ''
दूसरा ब्लोगर उसका गुस्सा देखकर चला गया। उसके जाने के बाद पहले ब्लोगर का गुसा शांत हुआ तब उसे याद आया कि यह तो उससे पूछा नहीं कि इस पर हास्य कविता लिखूं कि नहीं? फ़िर उसने सोचा अगली बार पूछ लूंगा।

नोट-यह एक हास्य व्यंग्य रचना है और किसी घटना या व्यक्ति से कोई लेनादेना नहीं है,अगर किसी की कारिस्तानी से मेल खा जाये तो वही इसके लिए जिम्मेदार होगा।

Wednesday, December 12, 2007

क्रिकेट और फिल्म के हीरो बन रहे हैं जीरो

खिलाडियों का मैदान में खेलना
अब पर्याप्त नहीं
जब तक दर्शकों में हीरो की
छबि अब पहले जैसी व्याप्त नहीं
इसलिए मैदान में लगाओ
किसी हीरो की छाप
फ्लाप होने की तरह बढ़ रहे हीरो
क्रिकेट भी देखते
खिलाडियों को भी
रंगीन चश्में से देखते
फिल्मी दर्शकों को देते सन्देश
उनकी फिल्में भी देखते रहो
क्रिकेट को अभी भी सहते रहो
हिट बनाने का यह नया फार्मूला है
फ्लाप से जोड़ दो फ्लाप
फिल्म में फ्लॉप होने के भय से
क्रिकेट के मैदान में जाते हीरो
रैंप पर कमर नचाते क्रिकेट खिलाड़ी
मैदान में बनाते जीरो
इसलिए फिल्म और क्रिकेट
मिलाकर परोसा जा रहा है पब्लिक के सामें
भले ही दोनों का आपस में कोई नाता नहीं

Sunday, December 2, 2007

कहेका भला आदमी

वह सुबह जाने की लिए घर से निकले, तो कालोनी में रहने वाले एक सज्जन उनके पास आ गए और बोले-''मेरी बेटी कालिज में एडमिशन लेना चाहती है उसे कालेज में प्रवेश का लिए फार्म चाहिये। आपका उस रास्ते से रोज का आना-जाना है। आप तो भले आदमी हैं इसलिए आपसे अनुरोध है कि वहाँ से उसका फार्म ले आयें तो बहुत कृपा होगी।''
वह बोले-''इसमें कृपा की क्या बात है? आपकी बेटी तो मेरी भी तो बेटी है। मैं कालिज से उसका फार्म ले आऊँगा।''

समय मिलने पर वह उस कालिज गए तो वहाँ फार्म के लिए लाइन लगी थी। वह फार्म लेने के लिए उस लाइन में लगे और एक घंटे बाद उनको फार्म मिल पाया। वह बहुत प्रसन्न हुए और घर आकर अपना स्कूटर बाहर खडा ही रखा और फिर थोडा पैदल चलकर उन सज्जन के घर गए और बाहर से आवाज दी वह बैठक से बाहर आये तो उन्होने उनका फार्म देते हुए कहा-"लीजिये फार्म''।
सज्जन बोले-"अन्दर तो आईये। चाय-पानी तो लीजिये।''
वह बोले-"नहीं, मैं जल्दी में हूँ। बिलकुल अभी आया हूँ। फिर कभी आऊँगा।''
सज्जन फार्म लेकर अन्दर चले गए और यह अपनी घर की तरफ। अचानक उन्हें याद आया कि'फार्म भरने की आखरी तारीख परसों है यह बताना भूल गए'।
वह तुरंत लौट गए तो अन्दर से उन्होने सुना कोई कह रहा था-'आदमी तो भला है तभी तो फार्म ले आया ।'
फिर उन्होने उन सज्जन को यह कहते हुए सुना-''कहेका भला आदमी है। फार्म ले आया तो कौनसी बड़ी बात है। नहीं ले आता तो मैं क्या खुद ही ले आता। जरा सा फार्म ले आने पर क्या कोई भला आदमी हो जाता है।"
वह हतप्रभ रह गए और सोचने लगे-'क्या यह सज्जन अगर कह देते कि भला आदमी है तो क्या बिगड़ जाता। सुबह खुद ही तो कह रहा था कि आप भले आदमी हो।''
फिर मुस्कराते हुए उन सज्जन को आवाज दी तो वह बाहर आये उनके साथ दूसरे सज्जन भी थे। वह बोले-''मैं आपको बताना भूल गया था कि फार्म भरने की परसों अन्तिम तारीख है।''

वह सज्जन बोले-'अच्छा किया जो आपने बता दिया है। हम कल ही यह फार्म भर देंगे।''-फिर वह अपने पास खडे सज्जन से बोले''यह भले आदमी हैं। देखो अपनी बिटिया के लिए फार्म ले आये।
वह मुस्कराये। उनके चेहरे के पर विद्रूपता के भाव थे। वह सज्जन फिर दूसरे सज्जन से मिलवाते हुए बोले-''यह मेरा छोटा भाई है। बाहर रहता है कल ही आया है।''
वह मुस्कराये और उसे नमस्ते की और बाहर निकल गए और बाहर आकर बुदबुदाये-'' काहेका भला आदमी!

Wednesday, November 14, 2007

ग्वालियर में कल एकदिवसीय क्रिकेट मैच

कल ग्वालियर में बहुत समय बाद कोई क्रिकेट मैच होने जा रहा है। वैसे ग्वालियर का रूपसिंह स्टेडियम देश के उन चार स्टेडियमों में है जहाँ शुरू में फ्लड लाईट लगाई गई थी, पर बहुत दिन से यहाँ अंतर्राष्ट्रीय मैच नहीं हुआ इसलिए इस कारण यहाँ के स्थानीय निवासियों की इसमें विशेष दिलचस्पी है। यह दिन-रात का मैच वैसे भी श्रंखला की दृष्टि से बहुत दिलचस्प है क्योंकि अगर भारत की टीम इसे जीतती है तो वह श्रंखला जीत लेगी और पाकिस्तान जीतता है तो फैसला जयपुर में होगा। ग्वालियर में दिन का मौसम गर्म हो जाता है शाम होते-होते ठंडा होने लगता है। मतलब यह कि दिन और रात के मौसम में जो अंतर है वह खेल को प्रभावित करेगा। वैसे यहाँ कि पिच बल्लेबाजों के लिए बहुत अच्छी है। स्टेडियम बहुत छोटा है इसलिए कोई बल्लेबाज जमकर बल्लेबाजी करे तो चोकों और छक्कों की बरसात कर सकता है। जो टीम पहले दो सौ अस्सी से तीन सौ रण बनाएगी उसे जीतने का अवसर मिल सकता है। इससे नीचे का स्कोर ज्यादा सुरक्षित नहीं है। गेंदबाजों के लिए अभी तक यह पिच अधिक मददगार नहीं रही-इसके बावजूद जो तेज गेंदबाज सधी लाइन लैंथ से गेंदबाजी करेंगे उन्हें विकेट मिलेंगे। मेरे विचार से पाकिस्तान के उमर गुल अगर अपने स्वाभाविक ढंग से गेंदबाजी करें तो वह भारतीय बल्लेबाजों की गति को रोक सकते हैं। इस स्टेडियम को लेकर मेरे मन में कई यादें हैं। जब शुरू में फ्लड लाईट लगी तो यहाँ कई मैच खेले गए। मुंबई और दिल्ली के बीच रणजी ट्राफी का फाइनल मैच यहाँ फ्लड लाईट में खेला गया जो कि इस प्रतियोगिया के लिए एक एतिहासिक घटना थी। जो ट्वेन्टी-ट्वेन्टी मैच आज लोकप्रिय हुए हैं वह एक या दो वर्ष पहले उसकी एक अनौपचारिक प्रतियोगिता यहाँ हुई थी और उसमें पाकिस्तान सहित कई विदेशी टीमों ने इसमें भाग लिया था और भारत उसमें भी जीता था। हालांकि उस समय लब्ध प्रतिष्ठत खिलाड़ी थे पर उस समय की भारतीय टीम का कोई खिलाड़ी नहीं था। कई वर्ष पुराना यह स्टेडियम भारतीय हाकी के भूतपूर्व हाकी खिलाड़ी स्व। रूपसिंह के नाम पर रखा गया है। पहले यह हाकी का स्टेडियम था पर क्रिकेट के बढ़ते आकर्षण ने इसे क्रिकेट का भी स्टेडियम बना दिया। रेलवे स्टेशन से थोडी दूर स्थित यह स्टेडियम अब पहले से अधिक आकर्षक है। चारों तरफ से घने पेडो से घिरा होने के कारण यहाँ गर्मी के मौसम भी रात को थोडा ठंडा हो जाता है। खेल में हार-जीत तो चलती है पर खेल की मूल भावना लोगों में आपसी सद्भावना कायम करना होती है। ग्वालियर के लोग राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की घटनाओं में बहुत दिलचस्पी लेते हैं और कानपुर में हुए मैच बाद इस मैच में क्या होगा इस पर खूब चर्चा हो रही है।

Friday, July 20, 2007

मन के बहरों के आगे क्या बीन बजाना

अपनी-अपनी सब कहैं
सुने न कोई किसी की बात
इससे तो अच्छा हैं
हम मौन हो जाये
अपने ही मन की सुने बात
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किस्से कहें और
क्या कहें
सुनते सभी हैं
पर गुनते नजर नहीं आते
कान से सुनते सभी हैं
पर मन के बहरे सभी हैं
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अपने मन की बात
किसी से कहें तो क्या
पहले तो कान न धरे
और धरे तो बनाए मजाक
कहें दीपक बापू
कान से भरे तो ठीक
मन के बहरों के आगे
क्या बीन बजाना
दुसरे उडाएं
इससे तो अपने पर ही
हंस कर अपना उडायें मजाक

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