Tuesday, May 27, 2008

भृतहरि शतक:आलस्य शत्रु और पुरुषार्थ मित्र होता है

आलस्यं हिं मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः
नास्त्यद्यम समो बन्धु कुर्वाणे नावसीदति


हिंदी में अर्थ मनुष्य के शरीर में रहने वाला आलस्य ही उसका सबसे प्रबल शत्रू है, वही पुरुषार्थ के समान उसका कोई मित्र नहीं है, जिसके करते रहने से मनुष्य कभी भी कष्ट नहीं पाता।

संपादकीय व्याख्या-हम अपने जीवन में जितना आलस्य करते हैं उसे कभी स्वयं भी अनुभव नहीं कर पाते। वैज्ञानिक कहते हैं कि एक सामान्य मनुष्य अपने जीवन में अपने दिमाग का केवल दस प्रतिशत ही उपयोग करता है और जो एक प्रतिशत भी इससे अधिक करता है वह श्रेष्ठ लोगो में गिना जाता है। इसक कारण यह है कि हम कई बार ऐसे काम करते हैं जो हमारे लिए केवल मनोरंजन का प्रबंध करते हैं और जो सकारात्मक और लाभ देने वाले है उनसे पीठ फेरना अच्छा लगता क्योंकि उसमें मेहनत होती है। मेरे विचार से आलस्य का आशय यह नहीं है कि हम केवल अनावश्यक रूप से बिस्तर पर सोते हैं बल्कि चलते फिरते अपने मस्तिष्क को वैचारिक क्रिया से दूर रखना भी एक प्रकार का आलस्य है। हम सोचते हैं कि हमारे मस्तिष्क में तनाव पैदा न हो इसलिये ऐसे काम नहीं करते जिनमे सोचना पड़ता है। इस प्रकार मानसिक आलस्य भी एक प्रकार का कष्ट प्रदान करने वाला होता है। जो लोग इस बात की परवाह किये बिना अपना काम करते हैं वही जीवन में सफल होते हैं।

Sunday, May 25, 2008

संत कबीर वाणी:प्रेम का घर दूर है, उसे पाना आसान नहीं

जब लग मरने से डरैं, तब लगि प्रेमी नाहिं
बड़ी दूर है प्रेम घर, समझ लेहू मग माहिं

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जब तक मृत्यु का भय है तब तक प्रेम हो नहीं सकता हैं प्रेम का घर तो बहुत दूर है और उसे पाना आसान नहीं है।

प्रीति बहुत संसार में, नाना विधि की सोय
उत्तम प्रीति सो जानिए, सतगुरू से जो होय


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि इस संसार में प्रेम करने वाले बहुत हैं और प्रेम करने के अनेक तरीक और विधियां भीं हैं पर सच्चा प्रेम तो वही है जो परमात्मा से किया जाये।

संपादकीय व्याख्या-हमारे जन जीवन में फिल्मों का प्रभाव अधिक हो गया है जिसमें प्रेम का आशय केवल स्त्री पुरुष के आपस संबंध तक ही सीमित हैं। सच तो यह है कि अब कोई पिता अपनी बेटीे से और भाई अपनी बहिन से यह कहने में भी झिझकता है कि ‘मैं तुमसे प्रेम करता हूं’ क्योंकि फिल्मी में नायक-नायिका के प्रेम प्रसंग लोगों के मस्तिष्क में इस तरह छाये हुए हैं कि उससे आगे कोई सोच ही नहीं पाता। किसी से कहा जाये कि मैं तुमसे प्रेम करता हूं तो उसके दिमाग में यह आता है कि शायद यह फिल्मी डायलाग बोल रहा हैं। वैसे इस संसार में प्रेम को तमाम तरह की विधियां हैं पर सच्चा प्रेम वह है जो भगवान भक्ति और स्मरण के रूप में किया जाये। प्रेम करो-ऐसा संदेश देने वाले अनेक लोग मिल जाते हैं पर किया कैसे किया जाये कोई नहीं बता सकता। प्रेम करने की नहीं बल्कि हृदय में धारण किया जाने वाला भाव है। उसे धारण तभी किया जा सकता है जब मन में निर्मलता, ज्ञान और पवित्रता हो। स्वार्थ पूर्ति की अपेक्षा में किया जाने वाला प्रेम नहीं होता यह बात एकदम स्पष्ट है।

Saturday, May 24, 2008

भृतहरि शतक: परिवर्तन तो संसार का नियम है

परिवर्तिनि संसारे मृतः को वा न जायते
स जातो येन जातेन याति वंशः समुन्नतिम्

हिंदी में भावार्थ-परिवर्तन होते रहना संसार का नियम। जो पैदा हुआ है उसकी मृत्यु होना निश्चित है। जन्म लेना उसका ही सार्थक है जो अपने कुल की प्रतिष्ठा में वृद्धि करता है अर्थात समस्त समाज के लिये ऐसे काम करता है जिससे सभी का हित होता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-अगर आदमी को किसी से भय लगता है तो वह अपने आसपास परिवर्तन आने के भय से। कहीं भाषा तो कहीं धर्म और कहीं क्षेत्र के विवाद आदमी के हृदय में व्याप्त इसी भय की भावना का दोहन करने की दृष्टि से उनके मुखिया उपयोग करते हैं।कई लोगों के हृदय में ऐसे भाव आते है जैसे- अगर पास का मकान बिक गया तो लगता है कि पता नहीं कौन लोग वहां रहने आयेंगे और हमसे संबंध अच्छे रखेंगे कि नहीं। उसी तरह कई लोग स्थान परिवर्तन करते हुए भय से ग्रस्त होते हैं कि पता नहीं कि वहां किस तरह के लोग मिलेंगे। जाति के आधार पर किसी दूसरे जाति वाले का भय पैदा किया जाता है कि अमुक जाति का व्यक्ति अगर यहां आ गया तो हमारे लिए विपत्ति खड़ी कर सकता है। अपने क्षेत्र में दूसरे क्षेत्र से आये व्यक्ति का भय पैदा किया जाता है कि अगर वह यहंा जम गया तो हमारा अस्तित्व खत्म कर देगा।

ऐसे भाव लाने का कोई औचित्य नहीं है। यह मान लेना चाहिए कि परिवर्तन आयेगा। आज हम जहां हैं वहां कल कोई अन्य व्यक्ति आयेगा। जहां हम आज हैं वह पहले कोई अन्य था। कई परिवर्तनों की अनुभूति तो हमें हो ही नहीं पाती। बचपन के मित्र युवावस्था में नहीं होते। युवावस्था के मित्र नौकरी में साथ नहीं होते। इस संसार में समय का चक्र घूमता है और उसमें परिवर्तन तो होते ही रहना है और हमें उनको दृष्टा होकर देखना चाहिए।

Friday, May 23, 2008

संत कबीर वाणी:देह सराय और मन पहरेदार है

मैं मेरी तू जनि करै, मेरी मूल विनासि
मेरी पग का पैखड़ा, मेरी गल की फांसि

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते है कि इस संसार में मनुष्य देह पाकर अहंकार के जाल में मत फंसा क्योंकि यह तो पांव की फांस है जो भक्ति मार्ग पर चलने नहीं देती। बाद में यही गले की फांसी भी बन जाती है।

तन सराय मन पाहरु, मनसा उतरी आय
को काहू का है नहीं, देखा ठोंकि बजाय


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि यह देह धर्मशाला की तरह है और इसका पहरेदार हमारा मन है। इस देह में इच्छाएं और कामनाएं अतिथि के रूप में आकर ठहर जाती हैं। एक का काम पूरा होता है तो दूसरी वहां रहने चली आती है। यहां कोई किसी का सगा नहीं है यह ठोक बजाकर देख लिया।

इत पर घर उत है घरा बनिजन आये हाट
करम करीना बेचि के, उठि करि चालो बाट

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि इस संसार में देह धारण करने का आशय यह समझना चाहिए कि हम व्यापारी की तरह हाट में आये है। इसलिये हमें सत्कर्मों का व्यापार करना चाहिए। अतः यहां जाने से पहले अपना समय भगवान भक्ति और परमार्थ करते रहना चाहिए। आखिर फिर अपने घर वापस भी तो जाना है।

व्याख्या-हमेशा कहा जाता है कि हमारा आत्मा परमात्मा से बिछड़ कर यहां आया है इसलिये उनका घर ही हमारा घर है। यही कबीरदास जी का आशय है। इसलिये वह यह कहते हैं कि यह देह धारण करना मतलब बाजार में आना है।

Thursday, May 22, 2008

भृतहरि शतक:तृष्णा रुपी लहरें ऊपर उठतीं रहतीं हैं

आशा नाम नदी मनोरथजला तृष्णातरङगाकुला
रामग्राहवती वितर्कविहगा धैर्यद्रुमध्वंसिनी
मोहावर्तसुदुस्तराऽतिगहना प्रोत्तुङगचिन्तातटी
तस्याः पारगता विशुद्धमनसो नन्दन्ति योगश्वराः


आशा एक नदी की भांति इसमे हमारी कामनाओं के रूप में जल भरा रहता है और तृष्णा रूपी लहरें ऊपर उठतीं है। यह नदी राग और अनुराग जैसे भयावह मगरमच्छों से भरी हुई हैं। तर्क वितर्क रूपी पंछी इस पर डेरा डाले रहते हैं। इसकी एक ही लहर मनुष्य के धैर्य रूपी वृक्ष को उखाड़ फैंकती है। मोह माया व्यक्ति को अज्ञान के रसातल में खींच ले जाती हैं, जहा चिंता रूपी चट्टानों से टकराता हैं। इस जीवन रूपी नदी को कोई शुद्ध हृदय वाला कोई योगी तपस्या, साधना और ध्यान से शक्ति अर्जित कर परमात्मा से संपर्क जोड़कर ही सहजता से पार कर पाता है।

Tuesday, May 20, 2008

मनुस्मृति:गाली का उत्तर गाली से नहीं देना चाहिए

अति वादांस्तितिक्षेत नावमन्येत कञ्चन्
न चेमं देहमाश्रित्य वैरं कुर्वीत केनचित्
क्रुद्धयन्तं न प्रतिक्रुध्येदाक्रृष्टः कुशलं वदेत्
साप्तद्वाराऽवकीर्णां च न वाचमनृतां वदेत्

सन्यासी और श्रेष्ठ पुरुषों को दूसरे लोगों द्वारा कहे कटु वचनों को सहन करना चाहिए। कटु शब्द (गाली) का उत्तर वैसे ही शब्द से नहीं दिया जाना चाहिए और न किसी का अपमान करना चाहिए। इस नश्वर शरीर के लिये सन्यासी और श्रेष्ठ पुरुष को किसी से शत्रुता नहीं करना चाहिए।

सन्यासी एवं श्रेष्ठ पुरुषों को कभी भी क्रोध करने वाले के प्रत्युत्तर में क्रोध का भाव व्यक्त नहीं करना चाहिए। अपने निंदक के प्रति भी सद्भाव रखना चाहिए। अपनी देह के सातों द्वारों -पांचों ज्ञानेंद्रियों नाक, कान, आंख, हाथ वाणी और विचार, मन तथा बुद्धि-से सद्व्यवहार करते हुए कभी भी झूठ नहीं बोलना चाहिए।

Saturday, May 17, 2008

संत कबीर वाणी:प्रीती अपने समान व्यक्ति से करना चाहिए

यह तत वह तत एक है, एक प्रान दुइ गात
अपने जिये से जानिये, मेरे जिय की बात

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि सभी लोगों की देह में जीव तत्व एक ही है। आपस में प्रेम करने वालों में कोई भेद नहीं होता क्योंकि दोनो के प्राण एक ही होता है। इस गूढ रहस्य को वे ही जानते हैं जो वास्तव में प्रेमी होते हैं

प्रीति ताहि सो कीजिये, जो आप समाना होय
कबहुक जो अवगुन पडै+, गुन ही लहै समोय


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि प्रीति उसी से करना चाहिए, जो अपने समान ही हृदय में प्रेम धारण करने वाले हों। यह प्रेम इस तरह का होना चाहिए कि समय-असमय किसी से भूल हो जाये तो उसे प्रेमी क्षमा कर भूल जायें।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-प्रेम किया नहीं हो जाता है यह फिल्मों द्वारा संदेश इस देश में प्रचारित किया जाता है। सच तो यह है कि ऐसा प्रेम केवल देह में स्थित काम भावना की वजह से किया जाता है। प्रेम हमेशा उस व्यक्ति के साथ किया जाना चाहिए जो वैचारिक सांस्कारिक स्तर पर अपने समान हो। जिनका हृदय भगवान भक्ति में रहता है उनको सांसरिक विषयों की चर्चा करने वाले लोग विष के समान प्रतीत होते हैं। यहां दिन में अनेक लोग मिलते है पर सभी प्रेमी नहीं हो जाते। कुछ लोग छल कपट के भाव से मिलते हैं तो कुछ लोग स्वार्थ के भाव से अपना संपर्क बढ़ाते हैं। भवावेश में आकर किसी को अपना सहृदय मानना ठीक नहीं है। जो भक्ति भाव में रहकर निष्काम से जीवन व्यतीत करता है उनसे संपर्क रखने से अपने आपको सुख की अनुभूति मिलती है।

Tuesday, May 13, 2008

चाणक्य नीति:शास्त्रों की निंदा करने वाले अल्पज्ञानी


1.आकाश में बैठकर किसी से वार्तालाप नहीं हो सकता, वहां कोई किसी का संदेश वाहक न जा सकता है और न वहां से आ सकता है जिससे कि एक दूसरे के यहां के रहस्यों जाना जा सकें। अंतरिक्ष के बारे में सामान्य मनुष्यों को कोई ज्ञान नहंी रहता पर फिर भी विद्वान लोगों ने सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण के बारे में ज्ञान कर लिया। ऐसे विद्वान प्रतिभाशाली और दिव्य दृष्टि वाले होते हैं।

2.वेद के ज्ञान की गहराई न समझकर वेद की निंदा करने वाले वेद की महानता को कम नहीं कर सकते। शस्त्र निहित आचार-व्यवहार को कार्य बताने वाले अल्पज्ञ लोग शास्त्रों की मर्यादा को नष्ट नहीं कर सकते।

3.बुद्धिमान मनुष्य को कौवे से पांच बातें सीखनी चाहिए। छिपकर मैथुन करना, चारों और दृष्टि रखना अर्थात चैकन्ना रहना, कभी आलस्य न करना, तथा किसी पर विश्वास न करना।


संपादकीय व्याख्या-कई लोग भारतीय वेद शास्त्रों के बारे में दुष्प्रचार में लगे हैं। इनमें तो कई अन्य धर्मों के विद्वान भी हैं। उन्होंने इधर-उधर से कुछ श्लोक सुन लिये और अब वेदों के विरुद्ध विषवमन करते हैं। उनके बारे में वह कुछ नहीं जानते। लाखों श्लोकों में से दो चार श्लोक पढ़कर उन पर टिप्पणियां करना अल्पज्ञान का ही प्रतीक है। इन वेदों के अध्ययन से ऐसा लगता है कि आज अप्रासंगिक लगने वाले कुछ संदेश अपने समय में उपयुक्त रहे होंगे। भारतीय वेदों ने ही इस विश्व में सभ्यता स्थापित की है। वेदों मेें यह कहीं नहीं लिखा हुआ है कि समय के साथ अपने अंदर परिवर्तन नहीं लाओ।

आधुनिक विज्ञान में पश्चिम का गुणगान करने वालों को यह पता होना चहिए कि सूर्य ग्रहण और चंद्रग्रहण के बारे मेें भारतीय विद्वान बहुत पहले से ही जानते थे। भारत के अनेक पश्चिम को ही आधुनिक विज्ञान को सर्वोपरि मानता है जो आज भी पूर्ण नहीं है और प्रयोगों के दौर से गुजर रहा है।

Saturday, May 10, 2008

रहीम के दोहे:जो सुलगे वह बुझ गए, जो बुझे वह सुलगे नहीं

जे रहीम विधि बड़ किए, को कहि दूषण काढि
चंद्र दूबरो कूबरो, तऊ नखत तें बाढि
कविवर रहीम कहते हैं कि परमात्मा ने जिन्हें महान बनाया है, उनके दोष कोई नहीं देखता। जैसे चंद्रमा दुर्बल और कुबड़ा होने पर भी आकाश में नक्षत्रों से आगे बढ़ जाता है।

जे सुलगे ते बुझि गए, बुझे ते सुलगे नाहिं
रहिमन दोहे प्रेम के, बुझि बुझि कै सुलगाहिं


कविवर रहीम कहते है कि जो सुलगे वह बुझे जो बुझे वह फिर नहीं सुलगे। रहीम के दोहे बुझ बुझ के सुलगा देते हैं।

वर्र्तमान संदर्भ में व्याख्या-कविवर रहीम कहते हैं कि जो अनेक व्यक्ति यहां महानता को प्राप्त हुए पर वह भी नष्ट हो गये जो तुच्छ थे वह भी अपना प्रभाव दिखाये बिना समाप्त हो गये पर उनके दोह तो प्रज्जवलित अग्नि की तरह हैं जो लोगों में चेतना जाग्रत करते रहते हैं। यहां उन्होंने रचनाकर्म का प्रधानता दी है। सामान्य व्यक्ति अपने परिवार और कुल के लिये अनेक प्रकार की संपत्तियों का संचय यह सोचकर करते हैं कि वह हमारे बाद हमारे नाम को चलायेंगे। जब उनके जीवन का अंत होता है तो फिर उनका कोई नाम लेवा भी नहीं होता। उसी तरह राजा लोग अपने राज्य के विस्तार में यह सोचकर लगे रहते हैं कि उनके बाद प्रजा उनको याद करेगी। उनके स्वर्ग सिधारने के बाद प्रजा भी उनको भुला देती हैं। जो लोग अपने जीवन के अनुभव और अनुभूतियों लोगों को बांटने के लिये शब्दों में सृजन करते हैं वह प्रज्जवलित र्अिग्न के समान सदैव लोगों में चर्चा का विषय बने रहते हैं। कितनी अजीब बात है कि रहीम आज देह के साथ हमारे बीच नहीं है पर उनके दोह रह रहकर लोगों की जुबान पर आते हैं। अंतर्जाल पर अनेक लोग आज उन पर लिखते और पढ़ते है।

इससे संदेश यही मिलता है कि हमें अपने जीवन के सामान्य कर्मों के साथ ऐसा रचनाकर्म भी करना चाहिए जिससे हमारे बाद भी उसका अस्तित्व बना रहे।

Thursday, May 8, 2008

चाणक्य नीति:मुर्गे से चार गुण ग्रहण करें

प्रत्युत्थानं च युद्ध्र च संविभागं च बन्धुषु
स्वयमाक्रभ्य भुक्तं च शिक्षेेच्चात्वारि कुक्कुटात्

आचार्य चाणक्य कहते हैं कि मनुष्य को अपने जीवन में चार गुण मुर्गे से ग्रहण करना चाहिए, समय पर जागना, युद्ध की ललकार पर उसके लिए तैयार हो जाना, अपने परिवार के साथ मिलकर खाना और अपने खाने के खोज स्वयं करना।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-जितना ही जीवन में आधुनिक सुविधाओं का समावेश होता जा रहा है लोगों के उठने बैठने और सोने जागने की क्रियाओं पर उसका दुष्प्रभाव हुआ है। सुबह देर से उठने से शरीर में भारीपन रहता है और इसी कारण आदमी कई कामों में आलस करता है। कुछ विद्वान कहते हैं कि सुबह जल्दी उठने से दिमाग में फुर्ती रहती है जो कि जीवन में विकास के लिये आवश्यक होती है। देर से उठने से जो आलस होता है उससे आदमी अपने जीवन में चुनौतियों से भागता है और उससे उसके आत्मविश्वास में कमी आती है। इसलिये समय पर उठने और सोने के नियम बनाना चाहिए। अपने भोजन के मामले में स्वावलंबी होना चाहिए और भोजन परिवार के समस्त सदस्य मिलकर बैठकर करें। अनियमित जीवन से मानसिक अस्थिरता पैदा होती है और जीवन में स्वयं निरर्थक तनाव और संकट में घिर जाते हैं। जीवन में हमेशा ही संघर्ष के लिए तैयार रहना चाहिए।

Wednesday, May 7, 2008

संत कबीर वाणी:स्वयं ठग जाएं तो कोई बात नहीं, दूसरे को न ठगें

जो तोको काटा बुवै, ताहि बुवै तू फूल
तोहि फूल को फूल है, वाको है तिरशूल


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं जो अगर कोई व्यक्ति तुम्हारे लिए कांटे बोता है, तुंम उसके लिए फूल बोओ। तुम्हारे तो फूल हमेशा ही फूल होंगे परंतु उसके लिये कांटे तिरशूल की तरह उसको लगेंगे।

कबीर आप ठगाइये, और न ठगिये कोय
आप ठगै सुख, ऊपजै और ठगे दुख होय


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अगर आपको कोई ठग जाता है तो कोई बात नहीं है, पर आप स्वयं किसी को ठगने का प्रयास मत करो। हम ठग जायें तो एक तरह से इस बात का तो सुख होता है कि हमने स्वयं कोई अपराध नहीं किया पर अगर हम किसी दूसरे को ठगते हैं तो मन में अपने पकड़े जाने का भय होता है और कभी न कभी तो उसका दंड भी भोगना पड़ता है।

संपादकीय व्याख्या-ऐसा लगता है कि दूसरों को ठगने वाले लोग सुखी हैं, पर यह वास्तविकता नहीं है। जिन लोगों ने दूसरों के प्रति अपराध कर संपत्ति बनाई है उनको भी कहीं न कहीं मन में भय रहता है और कभी न कभी उनको दंड भोगना ही पड़ता है। यह दंड किसी भी प्रकार का हो सकता है। उनकी संतानें अयोग्य होतीं हैं या उनके घर मे बीमारियों का वास रहता है। पकड़े जाने पर सामाजिक रूप से भी वह अपमानित होते हैं। इसलिये स्वयं हमें किसी को ठगने का प्रयास नहीं करना चाहिए। हां, कभी स्वयं ठगे जाते हैं तब धन या वस्तु खोने का क्षणिक दुःख होता है पर समय के साथ उसे भूल जाते हैं पर अगर किसी और को हम ठगते हैं तो वह अपराध हमारे हृदय में शूल की तरह चुभा रहता है और इससे जीवन में हम सदैव विचलित रहते है।

Saturday, May 3, 2008

संत कबीर वाणी:संगत करने से भक्ति में बाधा होती है

ऊजल पहिनै कापड़ा, पान सुपारी खाय
कबीर गुरु की भक्ति बिन, बांधा जमपुर जाय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि लोग साफ-सुथरे कपड़े पहन कर पान और सुपारी खाते हुए जीवन व्यतीत करते हैं। गुरु की भक्ति के बिना उनका जीवन निरर्थक व्यतीत करते हुए मृत्यु को प्राप्त होते हैं

दुनिया सेती दोसती, होय भजन के भंग
एका एकी राम सों, कै साधुन के संग


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि दुनिया के लोगों के साथ मित्रता बढ़ाने से भगवान की भक्ति मंे बाधा आती है। एकांत में बैठकर भगवान राम का स्मरण करना चाहिये या साधुओं की संगत करना चाहिए तभी भक्ति प्राप्त हो सकती है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-भक्ति लोग अब जोर से शोर मचाते हुए कर रहे हैं। मंदिरों और प्रार्थना घरों में फिल्मी गानों की तर्ज पर भजन सुनकर लोग ऐसे नृत्य करते हैं मानो वह भगवान की भक्ति कर रहे हैं। समूह बनाकर दूर शहरों में मंदिरों में स्थित प्रतिमाओं के दर्शन करने जाते हैं। जबकि इससे स्वयं और दूसरों को दिखाने की भक्ति तो हो जाती है, पर मन में संतोष नहीं होता। मनुष्य भक्ति करता है ताकि उसे मन की शांति प्राप्त हो जाये पर इस तरह भीड़भाड़ में शोर मचाते हुए भगवान का स्मरण करना व्यर्थ होता है क्योंकि हमारा ध्यान एक तरफ नहीं लगा रहता। सच तो यह है कि भक्ति और साधना एकांत में होती है। जितनी ध्यान में एकाग्रता होगी उतनी ही विचारों में स्वच्छता और पवित्रता आयेगी। अगर हम यह सोचेंगे कि कोई हमारे साथ इस भक्ति में सहचर बने तो यह संभव नहीं है। अगर कोई व्यक्ति साथ होगा या हमारा ध्यान कहीं और लगेगा तो भक्ति भाव में एकाग्रता नहीं आ सकती। अगर हम चाहते हैं कि भगवान की भक्ति करते हुए मन को शांति मिले तो एकांत में साधना का प्रयास करना चाहिए।
inglish translation by googl tool
Sant Kabir speech: relevant to interfere with a devotional

1.Sant Kabir G says that the head clean - clean water and clothes to wear a life spent in the nut account. Without the devotional guru spent his life meaningless, are receiving death


2.Sant Kabir G says head of the world's increasing friendship with the people of God comes devotional doubleentry.xml.in.h obstacle. Ram sat in the privacy of a memorial should be relevant only if the sadhus, or can be devotional.

In the context of the current interpretation - devotional people have stressed from the noise are cosy. Temples and prayer houses of worship in the pattern of film songs to hear such people are dancing as if he were God's devotional. Groups in cities away by making statues in the temples of philosophy to go. While the show itself and others, is devotional, not on the mind of satisfaction. The devotional man's mind so that it will be received on such a crowded, noisy, the cosy God in vain to remember because our focus is not on the one hand remains. The fact is that in the privacy of devotional and meditation. Concentration will be the same as in the ideas of cleanliness and purity will. If we think that a fellow with us in this devotional, it became not possible. If a person is or will be with us much attention, and it will take devotional sense of concentration can not come. If we want God's peace of mind, the devotional met in art should try to privacy.

Friday, May 2, 2008

संत कबीर वाणी:समाज को लाभ न हो तो बड़ा आदमी होना किस काम का

बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जोरे बड़ मति नांहि
जैसे फूल उजाड़ को, मिथ्या हो झड़ जांहि

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि आदमी धन, पद और सम्मान पाकर बड़ा हुआ तो भी क्या अगर उसके पास अपनी मति नहीं है। वह ऐसे ही है जैसे बियावन उजड़े जंगल में फूल खिल कर बिना किसी के काम आये मुरझा जाता है।

हाथी चढि के जो फिरै, ऊपर चंवर ढुराय
लोग कहैं सुख भोगवे, सीधे दोजख जाय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहत हैं कि तो हाथी पर चढ़कर अपने ऊपर चंवर डुलवाते हैं और लोग समझते हैं कि वह सुख भोग रहे तो यह उनका भ्रम है वह तो अपने अभिमान के कारण सीधे नरक में जाते हैं।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-समय ने ऐसी करवट ली है कि इस समय धर्म और जनकल्याण के नाम पर भी व्यवसाय हो गया है। इस मायावी दुनियां में यह पता ही नहीं लगता कि सत्य और माया है क्या? जिसे देखो भौतिकता की तरफ भाग रहा है। क्या साधु और क्या भक्त सब दिखावे की भक्ति में लगे हैं। राजा तो क्या संत भी अपने ऊपर चंवर डुलवाते हैं। उनको देखकर लोग वाह-वाह करते हैं। सोचते हैं हां, राजा और संत को इस तरह रहना चाहिये। सत्य तो यह है कि इस तरह तो वह भी लोग भी भ्रम में हो जाते हैं और उनमें अहंकार आ जाता है और दिखावे के लिये सभी धर्म करते हैं और फिर अपनी मायावी दुनियां में अपना रंग भी दिखाते हैं। ऐसे लोग पुण्य नहीं पाप में लिप्त है और उन्हें भगवान भक्ति से मिलने वाला सुख नहीं मिलता और वह अपने किये का दंड भोगते हैं।

यह शाश्वत सत्य है कि भक्ति का आनंद त्याग में है और मोह अनेक पापों को जन्म देता है। सच्ची भक्ति तो एकांत में होती है न कि ढोल नगाड़े बजाकर उसका प्रचार किया जाता है। हम जिन्हें बड़ा व्यक्ति या भक्त कहते हैं उनके पास अपना ज्ञान और बुद्धि कैसी है यह नहीं देखते। बड़ा आदमी वही है जो अपनी संपत्ति से वास्तव में छोटे लोगों का भला करता है न कि उसका दिखावा। आपने देखा होगा कि कई बड़े लोग अनेक कार्यक्रम गरीबों की भलाई के लिये करते हैं और फिर उसकी आय किन्हीं कल्याण संस्थाओं को देते हैं। यह सिर्फ नाटकबाजी है। वह लोग अपने को बड़ा आदमी सबित करने के लिये ही ऐसा करते हैं उनका और कोई इसके पीछे जनकल्याण करने का भाव नहीं होता।

Thursday, May 1, 2008

संत कबीर वाणी:मन तो बिना सिर का मृग है

धरती फाटे मेघ मिलै, कपड़ा फाटे डौर
तन फाटे को औषधि, मन फाटे नहिं ठौर


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जब पानी बरसता है तो फटी हुई धरती आपस में मिल जाती है और फटा हुआ कपडा डोरे से सिल जाता है और बीमार देह को औषधि से स्वस्थ किया जा सकता है पर अगर कही मन अगर फट गया तो उसके लिये कोई ठिकाना नहीं है।

बिना सीस का मिरग है, चहूं दिस चरने जाय
बांधि लाओ गुरुज्ञान सूं, राखे तत्व लगाय


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि यह मन तो तो बिना सिर के मृग की तरह है जो चारों तरफ भागता रहता है। इस पर नियंत्रण करने के लिये किसी ज्ञानी गुरू से तत्वज्ञान प्राप्त कर नियंत्रण करना चाहिए तभी जीवन का आनंद लिया जा सकता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या- सब भौतिक चीजों पर हम अपना नियंत्रण कर लेते हैं पर मन पर कोई नियंत्रण नहीं कर पाता। वह चारों तरफ आदमी की दौड़ाता है। अपने देहाभिमान के चलते हम कभी नहीं अनुभव कर पाते कि अकारण तमाम तरह की उपलब्धियों के लिये दौड़ लगा रहे हैं। भक्ति भाव से दूर रहकर हम अपने आपको बहुत तकलीफ देते हैं। कोई भौतिक चीज मिल जाती है तो उसे पाकर पुलकित हो उठते हैं पर जल्द ही उससे ऊब जाते हैं फिर किसी नयी चीज की तलाश में लग जाते हैं। फिर सब चीजों से ऊब जाते हैं उससे बचने के लिये निरर्थक बोलने लगते हैं तमाम तरह के स्वांग रचते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि हम अपने आपको धोखा देने लगते हैं।

हम अपने मन के साथ भागते हैं पर अपने अंदर बैठे जीवात्मा को नहंी देखते जो भगवान भक्ति के लिये ताकता रहता है। हम भटकते हुए ऐसे गुरूओं की शरण में जाते हैं जो स्वयं तत्वज्ञान से रहित हैं और किताबों से रटकर हमें सुनाते हैं। ज्ञान का मतलब रटने से नहीं है बल्कि उसे धारण करने से है। ऐसे में हमें निष्काम भाव से ज्ञान देने वाले गुरूओं की शरण लेकर अपने मन पर नियंत्रण करने का प्रयास करना चाहिए।

Wednesday, April 30, 2008

रहीम के दोहे:दु:ख और सुख हैं चौसर की गोट की तरह

जब लगि जीवन जगत में, सुख दुख मिलन अगोट
रहिमन फूटे ज्यों, परत दुहुंन सिर चोट


कविवर रहीम कहते हैं कि इस जगत में जीवन है तब तक सुख और दुख और मिलते रहेंगे। यह ऐसे ही जैसे चैसर की गोट को गोट मारने से दोनो के सिर पर चोट लगती है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-इस संसार में दुःख और सुख दोनों ही रहते हैं। जिस तरह किसी भी खेल में दो खिलाड़ी होते हैं तभी खेल हो पाता है उसी तरह ही जीवन की अनुभूति भी तभी हो पाती है जब दुख और सुख आते हैं। सूरज डूबता है तभी आकाश में समस्त तारे और चंद्रमा दिखाई पड़ता ह। अगर यह प्रकृति द्वारा निर्मित चक्र घूमे नहीं तो हमें दिल औ रात का पता ही न चले-ऐसे मे क्या यह एकरसता हमें तकलीफ नहीं देगी?

गर्मी के दिनों में भी जब हम कूलर में बैठे रहते हैं तो घबड़ाहट होने लगती है और उस समय भी थोड़ी घूप का केवल हमें राहत देता है। गर्मी में धूप कितनी कठोर और दुखःदायी लगती है पर कूलर में भी बहुत देर तक बैठना दुखदायी हो जाता है। इस तरह यह दुख सुख का चक्र है। यह देखा जाये तो यह वास्तव में भ्रम भी है। दुख और सुख मन के भाव हैं। इसलिये अगर हमारे साथ जो परेशानियां हैं उनको सहज भाव से लें तो हमें दुख की अनुभूति नहीं होगी। अगर हम इस चक्र को लेकर प्रसन्न या दुखी होंगे तो उससे मस्तिष्क में तनाव उत्पन्न होता है जो कि वास्तव में कई रोगों का जनक है और उसका इलाज किसी के पास नहीं है।

Tuesday, April 29, 2008

संत कबीर वाणी:मूर्ति रखकर उसकी सेवा की आड़ में होता है .धंधा

मूरति धरि धंधा रखा, पाहन का जगदीश
मोल लिया बोलै नहीं, खोटा विसवा बीस


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि लोग मूर्ति का भगवान बनाकर उसकी सेवा करने के बहाने अपना धंधा करते हैं, पर वह मोल लिया ईश्वर बोलता नहीं है इसलिये नकली है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-आज से नहीं बरसों से मूर्ति पूजा के नाम पर नाटक इस देश में चल रहा है। बड़े-बड़े ऋषि-मुनि और तपस्वी यही कह गये है कि ईश्वर हमारे मन में ही पर फिर भी लोग ऐसी अज्ञानता के अंधेरे में भटकते हैं जहां हर पल उनको रोशनी मिलने की आशा रहती है। मंदिर जो कभी बहुत छोटे थे वह अब बड़े होते गये और उनकी कथित चरणसेवा करने वाले कारों में घूमने लगे हैं फिर भी लोग हैं कि अंधविश्वास के लिये दौड़े जा रहे है। जिसके पास माया का शिखर है वह भी दिखावे के लिये वहां जाता है और अपने दिल को संतोष देने के अलावा वह अन्य लोगों को भी यह संदेश देता है कि वह देख वह कैसा भक्त है। जिसके पास धनाभाव है वह भी वहीं जाता है और देखता है कि वहां धनी लोगों की पूछ है पर फिर भी शायद पत्थर की प्रतिमा की दया हो जाये इस मोह में वह उस पर अपनी श्रद्धा रखता है।

दरअसल मूर्तियों की कल्पना इसलिये की गयी कि मानव मस्तिष्क में इन दैहिक आंखों से देखकर ईश्वर की कल्पना को अपने मन में स्थापित कर ध्यान लगाया जाये और फिर निरंकार की तरफ जाये। इसका कुछ लोगों ने फायदा उठाया और यह कहकर कि ‘अमुक मूर्ति सिद्ध’ है और ‘अमुक जगह सिद्ध ह’ै जैसे भ्रम फैलाकर धंधा करते हैं। आश्चर्य की बात यह है कि अशिक्षित तो ठीक शिक्षित लोग भी इन चक्करों में आ जाते है। हम देश में अनेक व्यवसायों में लोगों की संख्या का अनुमान करते हैं पर इस धर्म के धंधे में कितने लोग हैं यह कोई बता नहीं सकता है। सच तो यह है कि इस तरह की मूर्ति पूजा एक धंधा ही है जिससे बचा जाना चाहिए।

Monday, April 28, 2008

मनुस्मृति:खाने के बाद नहाना नहीं चाहिऐ

मध्र्यदिनाऽर्धरात्रे श्राद्धं भुक्तं च सामिषम्
सन्ध्ययोरुभयोश्चव न सेवेत चतुष्पथम्


दोपहर, आधी रात और दोनों संध्याओं के समय एवं श्राद्ध में मांस का भोजन कर बाजार में चौराहे पर अधिक समय तक नहीं घूमना चाहिए।

न स्नानपाचरद्भुत्वा नातुरा न कहानिशि
न वासोभिःसहाजस्त्रं नाऽविज्ञाते जलाशये


भोजन करने के बाद, रोगी होने, आधी रात के समय, कपड़े पहनकर गहरे पानी और उस सरोवर में नहीं नहाना चाहिए जिसके बारे में ज्ञान न हो।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-अक्सर खाना खाने के बाद लोग घर से बाहर बाजारों में घूमने चले जाते हैं। कुछ लोग बाहर निकलकर सिगरेट, तंबाकू और उसकी पुडिया को खाने ऐसी जगहों पर चले जाते है जहां उनको लोग मिलते हैं। वैसे मनु जी ने यहां शायद इसलिये चौराहे शब्द उपयोग किया है क्योंकि गांवों और शहरों में चौराहों पर अधिकतर दुकाने आदि हुआ करतीं थीं। लगभग आज भी वैसी ही स्थिति है पर सब जगह चौराहे नहीं है और यहां हम बाजार को भी चौराहे के रूप में मान सकते हैं। लोग खाना खाने के बाद लंबे समय तक वहीं खड़े बातचीत में लगे रहते हैं। खाना खाने के बाद बाहर घूमने के बहाने बाहर लोग आपस में वही दुनियावी बातें करते है। जो दिनभर करते हैं। खाने के बाद भोजन को पचाने के लिये देह में कई रसायन होते हैं और इस तरह की कुछ क्रियाएं जो हम करते हैं उन रसायनों के मूल तत्व को नष्ट कर देतीं हैं। हम बातें करते है या घूमते हैं तो हमारे मस्तिष्क की धमनियों पर प्रभाव होता है और संभवत उससे खाने की पाचन क्रिया पर प्रभाव पड़ता है। आधुनिक स्वास्थ्य विज्ञान इस बात की पुष्टि करता है कि चिंता से भोजन की पाचन क्रिया पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। अतः मनु जी के संदेश का महत्व हम समझ सकते हैं।

Friday, April 25, 2008

रहीम के दोहे:बुरे समय पर ओछे वचन भी सहन करने पड़ते हैं

समय परे ओछे बचन, सब के सहे रहीम
सभा दुसासन पट गहे, गदा लिए रहे भीम


कविवर रहीम कहते हैं कि बुरा समय आने पर तुच्छ और नीच वचनों का सहना करना पड़ा। जैसे भरी सभा में देशासन ने द्रोपदी का चीर हरण किया और शक्तिशाली भीम अपनी गदा हाथ में लिए रहे पर द्रोपदी की रक्षा नहीं कर सके।

समय पाय फल होत है, समय पाय झरि जाय
सदा रहे नहिं एक सौ, का रहीम पछिताय


कविवर रहीम कहते हैं कि समय आने पर अपने अच्छे कर्मों के फल की प्राप्ति अवश्य होती है। वह सदा कभी एक जैसा नहीं रहता इसीलिये कभी बुरा समय आता है तो भयभीत या परेशान होने की आवश्यकता नहीं है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-जीवन में सभी के पास कभी न कभी अच्छा समय आता है ऐसे में अपना काम करते रहने के अलावा और कोई चारा नहंी है। आजकल लोग जीवन में बहुत जल्दी सफलता हासिल करने को बहुत आतुर रहते हैं और कुछ को मिल भी जाती है पर सभी के लिये यह संभव नहीं है।
कई लोग जल्दी सफलता हासिल करने के लिये ऐसे मार्ग पर चले जाते हैं वहां उन्हें शुरूआत में बहुत अच्छा लगता है पर बाद में वह पछताते है।


यह सही है कि कुछ लोगों के लिये जीवन का संघर्ष बहुत लंबा होता है पर उन्हें अपना धीरज नहीं खोना चाहिए। कई बार ऐसा लगता है कि हमें जीवन में किसी क्षेत्र मे सफलता नहीं मिलेगी पर सत्य तो यह है कि आदमी को अपने अच्छे कर्मों का फल एक दिन अवश्य मिलता है।

Thursday, April 24, 2008

रहीम के दोहे:ज्ञान और शिक्षा ग्रहण करने के बाद अपनी राह चलें, किसी की सुने नहीं

कहते को कहिं जान दे, गुरू की सीख तू लेय
साकट जन और स्वान को, फेरि जवाब न देय


कविवर रहीम कहते है कि कहने वालों को कुछ भी कहने दो अपने गुरू की सीख लें और फिर अपने मार्ग पर चलें। अज्ञानी लोग और श्वान के भौंकने पर ध्यान न दें

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-लोगों का काम है कहना। सच तो यह है कि अपने जीवन में वह लोग कोई भी उपलब्धि प्राप्त नहीं कर पाते जो जो इस तरह कहने पर ध्यान देकर कोई कदम नहीं उठाते। अपने गुरू से चाहे वह आध्यात्मिक हो या सांसरिक ज्ञान देने वाला उसे शिक्षा ग्रहण कर अपने जीवन पथ पर बेखटके चल देना चाहिए। अगर उसके बाद अगर किसी के कहने पर ध्यान देते हैं तो अकारण व्यवधान पैदा होगा और अपने मार्ग पर चलने में विलंब करने से हानि भी हो सकती है। एक बात मान कर चलिए यहां ज्ञान बघारने वालों की कमी नहीं है। ऐसे लोग जिन्हें किसी भक्ति या सांसरिक क्षेत्र का खास ज्ञान नहीं होता वह खालीपीली अपनी सलाहें देते हैं और अपने अनुभव भी ऐसे बताते हैं जो उनके खुद नहीं बल्कि किसी अन्य व्यक्ति ने उनको सुनाये होते हैं।


इतना ही नहीं जब अपने माग पर चलेंगे तो दस लोग टोकेंगे। आपके कार्यो की मीनमीेख निकालेंगे और तमाम तरह के भय दिखाऐंगे। इन सबकी परवाह मत करो और चलते जाओ। यही जीवन का नियम है। हम देख सकते हैं जो लोग अपने जीवन में सफल हुए हैं उन्होंने अन्य लोगों की क्या अपने लोगों भी परवाह नहीं की। जिन्होनें परवाह की ऐसे असंख्य लोगों को हम अपने आसपास देख सकते हैं।

Wednesday, April 23, 2008

संत कबीर वाणी:माया छोड़ने की कहने वाले ही उसके चंगुल में फंसे रहते हैं

माया छोड़न सब कहैं, माया छोरि न जाय
छोरन की जो बात करु, बहुत तमाचा खाय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते है कि माया छोड़ने को सब कहते हैं पर छोड़ी किसी से नहीं जाती। जो लोग माया छोड़ने की कहते है वही इसको पाने के लिये तमाम तरह के तमाचे खाने को तैयार रहते हैं।

मन मते माया तजी, यूं कसि निकस बहार
लागि रहि जानी नहीं, भटकी भयो खुवार


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते है कि मन में आता है तो लोग माया को छोड़कर घर छोड़कर बाहर निकल जाते हैं पर वह मन में अटकी रहती है और उनका उसे पाने का लोभ और खुमार और बढ़ जाता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-आजकल तो आप चाहे जो संत देख लें वह माया छोड़ने की बात करता है पर अगर आप उनका रहनसहन देखें तो आपको यह दिखने लगेगा कि आपसे अधिक तो माया की पकड़ में तो वही लोग हैं जो ऐसा कह रहे हैं। फाइव स्टार आश्रमों में रहते हैं तमाम तरह की औषधि वगैरह बेचते है।
इस संसार में दो मार्ग हैं एक तो सत्य प्रधान का दूसरा है माया प्रधान। आशय यह है कि एक तो लोग सत्य के रास्ते पर चलते हुए माया से सीमित मात्रा में संबंध रखते हैं दूसरे माया के रास्ते पर चलते हैं पर सत्य से उनका कोई उनका संबंंध नहीं रहता। आप देखिए गरीब मजदूर अपना कमा खा कर सो जाते हैं। अपने जीवन का अनुभव या ज्ञान बांटने के लिए इधर-उधर जाकर कोई फीस नहीं वसूल करते पर माया के भक्त तो सत्य का नकाब पहनकर उपदेश देते फिरते हैं। आलीशान बंगलों में रहते हैं और वातानुकूलित कारों के यात्रा करते हैं। सत्य के यह उपासक इतने मायावी होते हैं कि लक्जरी बसों और हवाईजहाजों में घूमते हैंे और सब देखते हुए भी लोग उनकी भक्ति करते हैं।

माया यानि धन आवश्यक है और उसके लिये आदमी को परिश्रम करना चाहिए क्योंकि उसके बिना कोई काम नहीं चल सकता। समय निकालकर भगवान भक्ति और सत्संग भी करना चाहिए पर ऐसे मायावी लोगों की बातों में नहंी आना चाहिए।

Tuesday, April 22, 2008

संत कबीर वाणी:ज्ञानी की प्रीती उच्च और अज्ञानी की घटिया होती है

गहरी प्रीति सुजान की, बढ़त-बढ़त बढि जाय
ओछी प्रीति अजान की, घटत घटत घटि जाय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते है कि सज्जन पुरुष का प्रेम में गहराई होती है और वह धीरे-धीरे बढ़ती है, परंतु अज्ञानी की प्रीति बहुत घटिया होती है वह धीरे-धीरे घटती जाती है।

प्रेम बिकांता मैं सुना, माथा साटै हाट
पुछत बिलम न कहजिये, तत छिन दीजै काट


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि प्रेम तो अनमोल है, इसका मूल्य कौन चुका सकता है? प्रेम को बिकते तो सुना है परंतु उसके बदले अपना सिर काटकर देना पड़ता है ऐसे में देर न कीजिये अपनी शीश काटकर मोल चुका दो।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-आजकल समय बदल गया है। लोगों को अपने शहर और देश से परे रोजगार के लिये जाना पड़ता है। ऐसे में अनजान सथानों पर अपना काम निकालने के लिये उन्हें अन्य लोगों से संपर्क करना पड़ता है ऐसे में नये लोगों से धोखे का अंदेशा बना रहता है। ऐसे में सहृदय प्रेमी की पहचान का एक ही तरीका है जो धीरे-धीने प्रेम के रास्ते पर बढ़े और उतावली न दिखाए उसके बारे में यही समझना चाहिए कि उसका कोई स्वार्थ नहीं है। जहां कोई व्यक्ति उतावली से प्रेम संबंध बनाने की करे वहां समझना चाहिए कि उसका कोई फायदा होने वाला है और उसके पूरे होते ही वह दूर हो जायेगा।

हमने देखा होगा कि अनेक प्रकार के इस तरह के समाचार आते रहते हैं कि अमुक ने अमुक को धोखा दिया और अमुक ने अमुक के बारे में जानकारी इधर से उधर कर हानि पहुंचाई। यह सब प्रेम में ही होते है। अतः सावधानी से आगे बढ़ना चाहिए। आजकल सब लोग सच्चे मित्र या प्रेमी होने के दावा करते हैं पर हम सब जानते हैं कि सब कोरी बकवाद करते हैं। एसे में प्रेम मार्ग पर सतर्कता से बढ़ना चाहिए और कोई अपने घर-परिवार का आदमी बाहर के किसी व्यक्ति से प्रेम की पींगें बढ़ा रहा हैं तो उसे भी समझाना चाहिए।

Monday, April 21, 2008

संत कबीर वाणी:सबसे मीठा है चुप रहना

बाले जैसी किरकिरी, ऊजल जैसी धूप
ऐसी मीठी नहीं कछु नहीं, जैसी मीठी चूप

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि रेत के समान अन्य किसी वस्तु में वैसी चिकनाहट नहीं है, धूप के समान काई उजली वस्तू नहीं है ऐसे ही चुप रहने से अधिक कोई मीठी वस्तू नहीं है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-ऐसा हमें कई बार लगता होगा कि कहीं कोई बात अपने मूंह से कहकर फिर वहां तिरस्कार का सामना करते हैं तब यह सोचते हैं कि यहां बेकार बोले। वर्तमान में पर्यावरण प्रदूषण और खानपान की वजह से लोगों की सहशीलता वैसे भी कम होती जा रही है। इस पर आजकल की अपने अध्यात्मिकता से रहित शिक्षा लोगों को अहंकारी बना देती है। शिक्षा के नाम पर ढेर सारी उपाधियों का संग्रह कर लिया पर जीवन और आध्यात्म के ज्ञान से शून्य अहंकारी लोगों की संख्या बहुत अधिक है और ऐसे में उनके पास पद और पैसा हो जाये तो फिर कहना ही क्या? अपनी शक्ति प्रदर्शन की इच्छा उन्हें अंधा बना देती है। अपने सामने किसी को कुछ समझते ही नहीं। ऐसे लोगों से किसी प्रकार के विवाद से बचा जाये तो बहुत अच्छा है।

आयु में छोटा है तो उसे अपनी शक्ति का अहंकार होता है और उसमें बड़े-छोटे का संकोच नहीं होता। अगर अपने को कोई तकलीफ न दे रहा है तो उसे बिना पूछे सलाह देना किसी अन्य से विवाद होने पर उसे समझाना अपना अपमान कराना है। बेहतर है जब तक आवश्यक न हो बोलें नहीं। सभाओं या मीटिंगों या विवाहादि कार्यक्रमों में जायें तो उपस्थिति की औपचारिकता पूरी कर अपने घर की तरफ चल दें। आजकल जिसे देखों आसमान में उड़ रहा है। ऐसे में अगर आप भावुक हैं तो कम से कम बोलने का प्रयास करें। उससे तो अच्छा है खामोश रहें इसी से सम्मान बचा रह सकता है और तनाव से दूर रह सकते हैं। अधिकतर लोग तो इसी चिंता मंे राजरोग बुला लेते हैं कि वह कहते हैं तो कोई सुनता नहीं। इससे बेहतर है फालतु समय ध्यान और मंत्रोच्चारण में लगायें तो मन और वाणी दोनों का व्यायाम हो जायेगा।

Sunday, April 20, 2008

वाल्मीकि रामायण से-शस्त्रों का संयोग ह्रदय में विकार का उत्पादक

अपने वन प्रवास के दौरान सुतीक्षण के आश्रम से निकलकर जब श्री राम अपनी धर्म पत्नी सीताजी और भ्राता लक्ष्मण में साथ आगे चले। अपने पति द्वारा राक्षसों के वध करने के प्रतिज्ञा से वह दुखी थीं इसलिए उन्होने इससे हटने के लिए उनसे हिंसा छोड़ने का आग्रह किया और निम्नलिखित कथा सुनाई

पूर्वकाल की बात है किसी पवित्र वन में जहाँ मृग और पक्षी बडे आनंद से रहते एक सत्यवादी एवं पवित्र तपस्वी निवास करते थे। उन्हीं की तपस्या में विघ्न डालने के लिए शचिपति इन्द्र किसी योद्धा का रूप धारण कर हाथ में तलवार एक दिन उनके आश्रम पर आये। उन्होने मुनि के आश्रम में अपना उतम खड्ग रख दिया। पवित्र तपस्या में लगे हुए मुनि को धरोहर के रूप में वह खड्ग दे दिया। उस शस्त्र को पाकर मुनि उस धरोहर की रक्षा में लग गए, वे अपने विश्वास की रक्षा के लिए वन में विचरते समय भी उसे अपने साथ रखते थे। धरोहर की रक्षा में तत्पर रहने वाले वे मुनि फल-मूल लेने के लिए जहाँ-कहीं भी जाते, उस खड्ग की साथ लिए बिना नहीं जाते। तप ही जिनका धन था उस मुनि ने प्रतिदिन शस्त्र ढोते रहने के कारण क्रमश: तपस्या का निश्चय छोड़कर अपनी बुद्धि को क्रूरतापूर्ण बना लिया। फिर तो अधर्म ने उन्हें आकृष्ट कर लिया। वे मुनि प्रमादवश रोद्र कर्म में तत्पर हो गये और उस शस्त्र के सहवास से नरक जाना पडा।

इस प्रकार शास्त्र का संयोग होने के कारण पूर्वकाल में उन तपस्वी मुनि को ऐसी दुर्दशा भोगनी पडी। जैसे आग का संयोग ईंधन के जलाने का कारण होता है उसी प्रकार शस्त्रों का संयोग शस्त्रधारी के हृदय में विकार का उत्पादक कहा गया है।

आगे सीता जी कहतीं हैं कि-'मेरे मन में आपके प्रति जो स्नेह और विशेष आदर है उसके कारण मैं आपको उस प्राचीन घटना की याद दिलाती हूँ तथा यह शिक्षा भी देती हूँ कि आपको धनुष लेकर किसी तरह बिना बिः के ही वन में रहने वाले राक्षसों के वध का विचार नहीं करना चाहिए। आपका बिना किसी अपराध के किसी को मारना संसार के लोग अच्छा नहीं समझेंगे। अपने मन और इन्दिर्यों को वश में रखने वाले वीरों के लिए वन में धनुष धारण करने का इतना प्रयोजन है कि वे संकट में पड़े हुए प्राणियों की रक्षा करें।''

अरण्यकाण्ड के नौवें सर्ग से लिए गया यह वृतांत इस उद्देश्य से प्रस्तुत किया गया है कि लोग अस्त्रों-शस्त्रों को शौक के लिए अपने पास भी रखते है और उसके जो परिणाम आते हैं वह बहुत भयावह होते हैं ।

Saturday, April 19, 2008

रहीम के दोहे:इस देह में है हर संकट झेलने की क्षमता

जसी परै सो सहि रहै, कहि रहीम यह देह
धरती पर ही परत है, शीत घाम और मेह

कविवर रहीम कहते हैं कि इस मानव काया पर किसी परिस्थिति आती है वैसा ही वह सहन भी करती है। इस धरती पर ही सर्दी, गर्मी और वर्षा ऋतु आती है और वह सहन करती है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-पश्चिमी चिकित्सा विशेषज्ञों तमाम तरह के शोधों के बाद यह कह पाये कि हमारी देह बहुत लोचदार है उसमें हालतों से निपटने की बहुत क्षमता है। इसके लिये पता नहीं कितने मेंढकों और चूहों को काटा होगा-फिर इस निष्कर्ष पर पहुंचे । हमारे मनीषियों ने अपनी योग साधना और भक्ति से अर्जित ज्ञान से बहुत पहले यह जान लिया कि इस देह में बहुत शक्ति है और वह परिस्थितियों के अनुसार अपने को ढाल लेती है। ज्ञान या तो योग साधना से प्राप्त होता है या भक्ति से। रहीम तो भक्ति के शिखर पुरुष थे और अपनी देह पर कतई ध्यान नहीं देते थे पर फिर भी उनको इस मनुष्य देह के बारे में यह ज्ञान हो गया पर आजकल अगर आप किसी सत्संग में जाकर बैठें तो लोग अपनी दैहिक तकलीफों की चर्चा करते हैं, और वहां ज्ञान कम आत्मप्रवंचना अधिक करते हैं। कोई कहेगा ‘मुझे मधुमेह हो गया है’ तो कोई कहेगा कि मुझे ‘उच्च रक्तचाप’ है। जिन संत लोगों का काम केवल अध्यात्मिक प्रवचन करना है वह उनकी चिकित्सा का ठेका भी लेते हैं। यह अज्ञान और भ्रम की चरम परकाष्ठा है।

मैने अपने संक्षिप्त योग साधना के अनुभव से यह सीखा है कि देह में भारी शक्ति होती है। मुझे योगसाधना का अधिक ज्ञान नहीं है पर उसमें मुझे अपने शरीर के सारे विकार दिखाई देते हैं तब जो लोग बहुत अधिक करते हैं उनको तो कितना अधिक ज्ञान होगा। पहले तो मैं दो घंटे योगसाधना करता था पर थोड़ा स्वस्थ होने और ब्लाग लिखने के बाद कुछ कम करता हूं (वह भी एक घंटे की होती है)तो भी सप्ताह में कम से कम दो बार तो पूरा करता हीं हूं। पहले मुझे अपना शरीर ऐसा लगता था कि मैं उसे ढो रहा हूं पर अब ऐसा लगता है कि हम दोनों साथ चलते हैं। मेरे जीवन का आत्मविश्वास इसी देह के लड़खड़ाने के कारण टूटा था आज मुझे आत्मविश्वास लगता है। आखिर ऐसा क्या हो गया?

इस देह को लेकर हम बहुत चिंतित रहते हैं। गर्मी, सर्दी और वर्षा से इसके त्रस्त होने की हम व्यर्थ ही आशंका करते हैं। सच तो यह है कि यह आशंकाएं ही फिर वैसी ही बीमारियां लातीं हैं। हम अपनी इस देह के बारे में यह मानकर चलें यह हम नहीं है बल्कि आत्मा है तो ही इसे समझ पायेंगे। इसलिये दैहिक तकलीफों की न तो चिंता करें और न ही लोगों से चर्चा करें। ऐसा नहीं है कि योगसाधना करने से आदमी कभी बीमार नहीं होता पर वह अपने आसनों से या घरेलू चिकित्सा से उसका हल कर लेता है। यह बात मैने अपने अनुभव से सीखी है और वही बता रहा हूं। योगसाधना कोई किसी कंपनी का प्राडक्ट नहीं है जो मैं बेच रहा हूं बल्कि अपना सत्य रहीम के दोहे के बहाने आपको बता रहा हूं।

Friday, April 18, 2008

रहीम के दोहे:समुद्र में मिलने से गंगा का महत्व हो जाता है कम

कौन बड़ाई जलधि मिलि, गंग नाम भो धीम
केहि की प्रभुता नहिं घटी, पर घर गये रहीम


कविवर रहीम कहते है कि पवित्र नदी गंगा जब समुद्र में मिलती है तो उसका महत्व नहीं रह जाता। उसी तरह किसी दूसरे के घर जाने पर अपना भी महत्व कम हो जाता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-हमें अपने काम के सिलसिले में दूसरों के घर जाना ही पड़ता है और वहां अगर हमें सम्मान नहीं मिलता तो उसे हृदय में नहीं रखना चाहिए। यह स्वाभाविक बात है कि हर कोई अपने घर, क्षेत्र और देश में ही राजा होता है। जब काम या रोजगार के सिलसिल में अपना मूल स्थान या घर छोड़ना पड़े तो आत्म सम्मान का मोह भी छोड़ देना चाहिए। अक्सर अपना क्षेत्र या देश छोड़कर गये कुछ लोग वहां बराबरी का सम्मान न मिलने की शिकायत करते हैं उन्हें यह समझना चाहिए कि यह स्वाभाविक मनोवृति है कि अपने क्षेत्र में बाहर से आये आदमी का बहुत कम लोग सम्मान करते हैं क्योंकि उनको लगता है कि हम तो निस्वार्थ भाव से रहते हैं और बाहर से आया आदमी तो अपनी रोजी-रोटी कमाने के उद्देश्य से आया है।

विदेशों में गये कई भारतीयों ने ऊंचे ओहदों के साथ बहुत सारा धन और प्रतिष्ठा अर्जित की है पर उनका वैसा सम्मान नहीं है जैसा कि यहां अपने लोग करते हैं। कुछ तो सत्य स्वीकारते हैं पर कुछ लोग इस तरह यहां प्रचारित करते हैं कि जैसे उनको विदेश में लोगों का बहुत सम्मान प्राप्त है जो कि उनका स्वयं का ही भ्रम होता है। उनका वहां वही लोग सम्मान करते हैं जो उनसे अपना स्वार्थ निकालते हैं। विदेशों में कई देश ऐसे हैं जो धर्म पर आधारित हैं और वहां इस देश के किसी भी धर्म के पालन की अनुमति नहीं है। जहां यह अनुमति नहीं है वहां के लोग भी अपने स्वार्थ की खातिर अपने खुश होने का प्रमाण पत्र देते हैं पर अगर उनका वहां सम्मान होता तो भला उनको सार्वजनिक रूप से अपने धर्म पालन की अनुमति होती कि नहीं। हम यह नहीं कह रहे कि यह अनुमति मिलना चाहिए। हां यह वास्तविकता उनको स्वीकार कर लेना चाहिए कि वहां वह अपने काम और रोजगार के सिलसिले में हैं और उनको किसी भी मान सम्मान की चाहत नहीं है। जब आप अपना घर या देश छोड़कर दूसरी जगह जाते हैं तो सम्मान का मोह छोड़ना ही सत्य के साथ चलना है।

Thursday, April 17, 2008

संत कबीर वाणी:सम्मान पाने की इच्छा श्वान का लक्षण

मान बढ़ाई जगत में, कुकर की पहचान
प्यार किए मुख चाटई, बैर किए तन हान


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि सम्मान पाने की इच्छा तो श्वान के लक्षण है। प्यार करने पर वह मुख चाटने लगता है और फटकारने पर काट लेता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-आधुनिक स्वास्थ्य विज्ञान के अनुसार तो श्वान का चाटना भी रैबीज पैदा कर देता है और अधिकतर लोगों को रैबीज होता ही उन लोगों को है जो कुता पालते हैं। कबीर दास जी न यह दोहा व्यंजना विधा में कहा है जिसका आशय यह है कि आदमी में अपना सम्मान पाने का मोह उसकी तरह ही होता है। संसार में सभी लोग आत्मप्रवंचना में लगे हैं। मैने कई जगह देखा है कि जैसे मैं अपने भाई की बात करूं तो सामने वाला भी अपने भाई की बात शुरू कर देता है। मैं अपने किसी व्यापारी दोस्त की बात करूं तो सामने वाला अपने किसी व्यापारी दोस्त की बात शुरू कर देता है। मैं किसी अधिकारी दोस्त की बात करूं तो वह भी अपने अधिकारी दोस्त की बात कर देता है।

सच बात तो यह है कई बार तो ऐसा लगता है कि लोगों से बात करने की बजाय तो किसी रचनात्मक काम में लगा जाये। हम जो बात कहें उसे कोई सुने ही नहीं तो कहने से क्या फायदा? सब लोग केवल अपने मूंह से अपनी बड़ाई करते हैं। मैं अमुक को जानता हूं, अमुक मेरी इज्जत करता है। ऐसी बातें हास्यास्पद होती है। सब जानते हैं पर अपने बोलने को अवसर आने पर सब भूल जाते हैं। ऐसे में कबीर का यह दोहा जो पढ़ कर अपने मन में धारण कर लेगा वह अपने मूंह से कभी भी अपनी बड़ा ई नहीं करेगा।

अधिकतर लोगों का व्यवहार भी अजीब होता है कोई भी उनके मूंह पर झूठी तारीफ कर दे तो वह बहुत खुश हो जाते हैं और कोई उनका दुर्गुण बता दे तो उग्र हो जाते हैं। ऐसे व्यवहार से सब एक दूसरे पर हंसते हैं पर अपने पर नियंत्रण नहीं करते।

Wednesday, April 16, 2008

रहीम के दोहे:आदमी नाचता है कठपुतली की तरह

ज्यों नाचत कठपूतरी, करम नचावत गात
अपने हाथ रहीम ज्यों, नहीं आपुने हाथ


कविवर रहीम कहते हैं कि जैसे नट कठपुतली को नचाता है वैसे ही मनुष्य को उसके कर्म नाच करने के लिऐ बाध्य करते हैं। जिन्हें हम अपने हाथ समझते हैं वह भी अपने नियंत्रण में नही होते हैं।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-जब मैं रहीम के दोहे देखता हूं तो सोचता हूं कि इस संत ने जीभर कर जीवन का आनंद लिया होगा। किसी प्रकार के भ्रम में नहीं जीना ही मनुष्य की पहचान है और रहीम हमेशा सत्य के साथ जिये। सामान्य आदमी कितना भ्रम में जीता है यह उनके दोहे पढ़कर समझा जा सकता है। सभी लोग और आपको कर्ता समझते है जबकि सभी जीवों का शरीर पांच तत्वों से बना वह पुतला है जिसमें तीन प्रकृतियां-मन, बुद्धि और अहंकार -अपना काम करती हैं। आंख है तो देखेगी, कान है तो सुनेंगे, नाक है तो सूंघेगी, पांव है तो चलेंगे और हाथ हैं तो हिलेंगे। मन विचार करता है, बुद्धि योजना बनाती है और अहंकार उकसाता है। हम सोचते हैं कि हम करते हैं जबकि हम तो एक तरह से सोये हुए हैं। अपने आपको देखते ही नहीं। हमारी आत्मा तो परमार्थ से प्रसन्न होती है पर हम अपने कर्मों के अधीन होकर स्वार्थ में लगे रहते हैं जबकि यह काम तो हमारी इंद्रियां तब भी करेंगी जब इन पर नियंत्रण करेंगे। मतलब हम जो कर रहे हैं वह तो करेंगे ही पर जो हमें करना चाहिए परमार्थ वह करते नहीं। सत्संग और भक्ति केवल दिखावे की करते है। कुल मिलाकर कठपुतली की तरह नाचते रहते हैं।

Tuesday, April 15, 2008

संत कबीर वाणी:व्यवहार में अति से बचना जरूरी

अति को भला न बोलना, अति की भली न चुप
अति को भलो न बरसनो, अति की भली न धुप्प

संत शिरामणि कबीरदास जी कहते हैं कि न तो अधिक बोलना चाहिए न एकदम चुप रहना चाहिए। समयानुसार अपने अंदर बदलाव करना चाहिए। कभी न तो एकदम क्रोध करना चाहिए न ही एकदम घबड़ा कर बैठ जाना चाहिए। किसी काम में न तो उतावली दिखाना चाहिए और न ही विलंब करना चाहिए।

ज्ञानी को ज्ञानी मिले, रस की लूटम लूट
ज्ञानी अज्ञानी मिर्ल, होवे माथा फूट


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जब कोई एक ज्ञानी दूसरे को मिलता है तो दोनों को आनंद मिलता है और वह एक दूसरे के ज्ञान के रस को आनंद उठाते हैं। जब कहीं मूर्खों और अज्ञानियों को मेल होता है तो उनके जमकर वाद-विवाद होता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-आजकल लोग कामकाज के सिलसिले में अपने घरों से दूर रहते हैं तो अधिकतर को अपना जीवन अकेले ही दूसरों के साथ व्यतीत करना पड़ता है और नित नये लोगों से संपर्क होता है। ऐसे में अपने व्यवहार में अधिक सतर्कता बरतना चाहिए। न तो किसी से अधिक बोलना चाहिए क्योंकि वह आपकी कमी का लाभ उठाकर आपको हानि पहुंचा सकता है और न ही किसी से डरना चाहिए क्योंकि उसको देखकर कोई भी आपसे अधर्म का कार्य करा सकता है। जहां तक हो सके अपने से अधिक ज्ञानियों के बीच उठना-बैठना चाहिए ताकि उनसे ज्ञान रस प्राप्त किया जा सके अज्ञानियों के साथ संपर्क से तो वाद विवाद और मारपीट होने का भय रहता है।

Monday, April 14, 2008

रहीम के दोहे:भोग कर रोग बुलाने की बजाय राम का नाम लें

रहिमन राम न उर धरै, रहत विषय लपटाय
पसु खर खात सवाद सों, गुर बुलियाए खाय


कविवर रहीम कहते है कि भगवान राम को हृदय में धारण करने की बजाय भोग और विलास में डूबे रहते है। पहले तो अपनी जीभ के स्वाद के लिए जानवरों की टांग खाते हैं और फिर उनको दवा भी लेनी पड़ती है।

वर्तमान सदंर्भ में व्याख्या-वर्तमान समय में मनुष्य के लिये सुख सुविधाएं बहुत उपलब्ध हो गयी है इससे वह शारीरिक श्रम कम करने लगा हैं शारीरिक श्रम करने के कारण उसकी देह में विकार उत्पन्न होते है और वह तमाम तरह की बीमारियों की चपेट में आ जाता है। स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन भी रहता है। इसके अलावा जैसा भोजन आदमी करता है वैसा ही उसका मन भी होता है।

आज कई ऐसी बीमारिया हैं जो आदमी के मानसिक तनाव के कारण उत्पन्न होती है। इसके अलावा मांसाहार की प्रवृत्ति भी बढ़ी है। मुर्गे की टांग खाने के लिय लोग बेताब रहते हैं। शरीर से श्रम न करने के कारण वैसे ही सामान्य भोजन पचता नहीं है उस पर मांस खाकर अपने लिये विपत्ति बुलाना नहीं तो और क्या है? फिर लोगों का मन तो केवल माया के चक्कर में ही लगा रहता है। आधुनिक स्वास्थ्य विज्ञान कहता है कि अगर कोई आदमी एक ही तरफ ध्यान लगाता है तो उसे उच्च रक्तचाप और मधुमेह जैसे विकास घेर लेते हैं। माया के चक्कर से हटकर आदमी थोड़ा राम में मन लगाये तो उसका मानसिक व्यायाम भी हो, पर लोग हैं कि भगवान श्रीराम चरणों की शरण की बजाय मुर्गे के चरण खाना चाहते हैं। यह कारण है कि आजकल मंदिरों में कम अस्पतालों में अधिक लोग शरण लिये होते हैं। भगवान श्रीराम के नाम की जगह डाक्टर को दहाड़ें मारकर पुकार रहे होते है।

अगर लोग शुद्ध हृदय से राम का नाम लें तो उनके कई दर्दें का इलाज हो जाये पर माया ऐसा नहीं करने देती वह तो उन्हें डाक्टर की सेवा कराने ले जाती है जो कि उसके भी वैसे ही भक्त होते हैं जैसे मरीज।

Sunday, April 13, 2008

रहीम के दोहे: मनुष्य को आत्मसम्मान के साथ जीना चाहिए

मान सहित विष खाय के, संभु जगदीस
बिना मान अमृत पिये, राहु कटायी सीस

कविवर रहीम कहते हैं कि सम्मान के साथ शिव जी विष उदरस्थ किया तो जगदीश कहलाये पर बिना मान के राहु ने अमृत पिया तो अपना सिर कटवा लिया।
मान सरोवर ही मिले, हंसनि मुक्ता भोग
सफरनि भरे रहीम सर, बस-बालकनहिं जोग

कविवर रहीम कहते हैं कि हंस तो केवल मानसरोवर में ही मोती चुन कर खाता है और सीपियों से भरे हुए तालाब तो केवल बगुले उसके बालकों के लिये ही होते है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-आज के भौतिक प्रधान युग में कई लोगों के पास ढेर सारी सुखसुविधा है तो दूसरी तरफ लोगों के पास रोटी खाने के लाले भी है। ऐसे में हम अक्सर सुनते हैं कि अमुक आदमी अमुक किसी बड़े व्यक्ति का चमचा है। दरअसल आजकल लोग अपनी कुछ ऐसी सुविधाओं को उन लोगों से बांटते है जो उनके इर्द-गिर्द फिरते हैं। अगर कोई अमीर घर का लड़का है तो उसके साथ चार ऐसे भी होंगे जो उसकी मोटर सायकल या कार की वजह से उसके मित्र होंगे। हालांकि इस मित्रता की वजह से उनको अपना सम्मान खोना पड़ता है। इसी तरह अमीर और बड़े घर के स्त्री पुरुष भी अपने से छोटे और गरीब घरों के लोगों से मन बहलाने के लिये मित्रता कर लेते हैं। इसके लिये वह अपनी सुविधाओं का इस्तेमाल इस तरह करते हैं कि उसका थोड़ा लाभ लेकर गरीब और छोटे घरों के लोग उनकी मुफ्त में चाकरी करते रहे। कई बार हम में से ही कई लोग ऐसे इस्तेमाल होते हैं।

कई बार बड़े आदमी के घर-परिवार में किसी खास अवसर पर जाने पर वहां हम भोजन करते हैं पर ऐसा लगता है कि वहां हमारा कोई सम्मान नहीं है ऐसे में हम जो वस्तु खा रहे हैं वह रोटी विष लगती है। हां ऐसी जगहों पर हमें जाना नहीं चाहिए जहां लगे कि भोजन एक तरह से विष होगा। अपना आत्मसम्मान बचाना हर मनुष्य का कर्तव्य है और इसलिये उसे मनुष्य भी कहा जाता है।

Saturday, April 12, 2008

रहीम के दोहे:बोलने पर ही कोयल और कौए के भेद का पता चलता है

दोनों रहिमन एक से, जौ बोलत नाहिं
जान परत हैं काक पिक ऋतु बसंत के माहिं


कविवर रहीम कहते हैं कि जब तक मुख से बोल नहीं निकलते तब तक कौआ और कोयल एक समान ही प्रतीत होते हैं। ऋतुराज बसंत के समय कोयल की मीठी और कौए की कर्कश वाणी के अंतर का अनुभव होता है।

वर्तमान के संदर्भ में व्याख्या-इसमें मनुष्य के भ्रम में पड़ जाने की प्रवृत्ति की ओर संकेत है। आजकल तो कुछ लोग होते तो कौए की प्रवृति के है पर कोयल जैसी मीठी वाणी बोलते हैं। उनके मन काले होते हैं और जब शिकार उनके जाल में फंस जाता है तो फिर कौए की तरह कर्कश वाणी बोलने लगते हैं। कौआ अगर मूंह न खोले तो उसके कोयल होने की अनुभूति होती है उसी तरह कुछ लोग अपनी वाणी से मधुर होने का अहसास दिलाते हैं परंतु अपना काम निकलते ही वह अपना औकात पर आ जाते हैं। कविवर रहीम ने अपने जीवन रहस्यों को व्यंजना विधा में प्रस्तुत किया है। यहां कोयल और कौए का उदाहरण देते हुए वह मनुष्यों को अपने जीवन में सतर्क रहने का संदेश देते है।

आजकल खासतौर से युवक-युवतियों को ऐसे संदेशों से प्रेरणा लेनी चाहिए। आपने देखा होगा कि इश्क और प्यार की आड़ में वासना के वशीभूत होकर कुछ युवक अपनी मीठी वाणी से युवतियों को अपने जाल में फंसा लेते हैं और फिर पहले तो शादी नहीं करते और शादी करते हैं तो फिर पता लगता है कि वह वैसे नहीं है जैसी युवतियां अपेक्षा करतीं हैं। फिर शुरू होता है उनके नारकीय जीवन का दौर।

उसी तरह युवकों को रोजगार का लालच देकर कुछ लोग पैसा वसूल कर देते हैं या फिर ऐसी जगहों पर भेज देते है जहां से उनकी वापसी होना मुश्किल हो जाती है। कुछ युवकों ऐसे गलत कामों में फंसा दिया जाता है जो उनको अपराध की दुनियां में ले जाता है। इसलिये कोयल और कौए के भेद को समझकर ही किसी पर विश्वास करना चाहिए। यहां वाणी से तात्पर्य हम नीयत से भी ले सकते हैं। कौऐ की नीयत रखने वाला कुछ देर तक कोयल होने का आभास दे सकता है पर समय आने पर उसकी असलियत खुल जाती है।

Thursday, April 10, 2008

संत कबीर वाणी:पत्थर और पानी पूजने से भक्ति नहीं होती

पाहन पानी पूजि से, पचि मुआ संसार
भेद अलहदा रहि गयो, भेदवंत सो पार


संत शिरोमणि कबीदासजी कहते हैं कि पत्थर और पानी को पूज कर सारे संसार के लोग नष्ट हो गये पर अपने तत्व ज्ञान को नहीं जान पाये। वह ज्ञान तो एकदम अलग है। अगर कोई ज्ञानी गुरु मिल जाये तो उसे प्राप्त कर इस दुनियां से पार हुआ जा सकता है।

पाहन ही का देहरा, पाहन ही का देव
पूजनहारा आंधरा, क्यौं करि मानै सेव


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मूर्ति पत्थर की होती है और उसको घर में रखा जाता है वह भी पत्थर का है और लोग उसकी पूजा कर रहे हैं। जिसे खुद कुछ नहीं दिखाई देता वह भला आदमी की सेवा और भक्ति को कैसे स्वीकार कर सकता है।
आज के संदर्भ में व्याख्या-सच तो यह है कि पत्थरों की प्रतिमाएं या मकान बनाकर उसमेें लोगों को अपनी आस्था और भक्ति व्यक्त करने के परंपरा इस संसार में शूरू हुई है तब से इस संसार में लोगों के मन में तत्वज्ञान के प्रति जिज्ञासा कम हो गयी है। लोग पत्थरों की प्रतिमाओं या स्थानों के जाकर अपने दिल को तसल्ली देते है कि हमने भक्ति कर ली और दुनियां के साथ भगवान ने भी देख लिया। मन में जो विकास है वह जस के तस रहते है जबकि सच्ची भक्ति के लिये उसका शुद्ध होना जरूरी है। इस तरह भक्ति या सेवा करने का कोई लाभ नहीं है। पत्थर की पूजा करते हुए मन भी पत्थर हो जाता है और उसकी मलिनता के कारण शुद्ध भक्ति और सेवा का भाव नहीं बन पाता और आध्यात्मिक शांति पाने के लिये किये गये प्रयास भी कोई लाभ नहीं देते।

Tuesday, April 8, 2008

रहीम के दोहे:देता तो परमात्मा है किसी अन्य का भ्रम मत पालो

देनदार कोउ और है, भेजत सा दिन रैन
लोग भरम पै धरे, वाते नीचे नैन

कविवर रहीम कहते हैं कि इस जीवन में कुछ देने वाला तो परमात्मा है पर लोग अपने द्वारा लेने-देने की भ्रम पाल लेते है। इसी कारण हमारे नेत्र झुके रहते है।

दुरदिन परे रहीम कहि, भूलत सब पहिचानि
सोच नहीं वित हानि को, जो न होय हित हानि


कविवर रहीम कहते हैं कि जीवन में बुरे दिन आने पर सब लोग पहचानना भी भूल जाते है। ऐसे समय में यदि अपने सहृदय लोगों से सम्मान ओर प्रेम मिलता रहे तो फिर धन की हानि की पीड़ा कम हो जाती है।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-इस संसार में कुछ लोग तो गरीब है और कुछ अमीर, पर मनुष्य का स्वभाव है कि वह माया के इस भ्रम का शिकार हो जाता है और उसे लगता है कि जो अमीर है वह कुछ अधिक योग्य है और जो गरीब है वह अयोग्य। आजकल तो यह भ्रम और बढ़ गया है लोग चर्चित और धनवान लोगों को देवता समझ लेते हैं जैसे कि उनमें इंसानों जैसे गुणों के साथ कोई दोष हो ही नहीं। चारों तरफ भ्रम का साम्राज्य है। इसलिये लोग छलकपट और अपराध करके अधिक से अधिक धन कमा कर समाज में प्रतिष्ठित होना चाहते है।

समझदार और ज्ञानी लोग कभी भी भ्रम का शिकार नहीं होते उनको पता होता है कि यह सब माया का खेल है। इसलिये वह अमीर गरीब का भेद नहीं करते। ऐसे सहृदय सज्जन ऐसे किसी अमीर मित्र या रिश्तेदार का साथ नहीं छोड़ते तो उस व्यक्ति को अपने आप को धनी ही समझना चाहिए। माया तो आनी जानी है पर अगर कोई अपने लोग फिर भी सम्मान देते हैं तो समझ लो कुछ नहीं गया।

Saturday, April 5, 2008

संत कबीर वाणी:स्वार्थ के कारण ही सब सगे बनते हैं

स्वारथ का सबको सगा, सारा ही जग जान
बिन स्वारथ आदर करै, सो नर चतुर सुजान


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि इस संसार में सभी स्वार्थ के कारण सगे बनते हैं। सारा संसार ही स्वार्थ के लिये अपना बनता है। परंतु चतुर व्यक्ति वही है जो बिना किसी स्वार्थ के गुणी आदमी का सम्मान करते हैं।

निज स्वारथ के कारनै, सेव करै संसार
बिन स्वारथ भक्ति करै, सो भावै करतार


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि इस संसार में जो भी लोग सेवा करते हैं वह स्वार्थ के कारण करते हैं पर परमात्मा को तो वही भक्त भाते हैं जो बिना किसी स्वार्थ के भक्ति करते हैं।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-जीवन का यह एक सत्य है कि जो भी संबंध आपस में बनते हैं वह कोई न कोई स्वार्थ के कारण होते हैं। हालांकि लोग कहते जरूर है कि हम तो निस्वार्थ सेवा करते हैं पर उनके यह वचन मिथ्या होते हैं। लोग तो भगवान की भक्ति में भी अनेक प्रकार के स्वार्थों की अपेक्षा रखते हैं। अगर कोई कहीं धर्म का काम कर रहा है तो उसमें उसके अपने और अपने परिवार का नाम या अपनी व्यवसाय के प्रचार का भाव रहता है। कई जगह लोग अपने नाम से मंदिर और प्याऊ बनवाकर वहां अपना नाम लगा देते हैं।

सेवा के नाम पर इतने पाखंड हो गये हैं। जिसे देखो वही समाज सेवा करने चला आ रहा है। हाथ में होती हैं बस अपने नाम की तख्तियां और मूंह में लोगों के कल्याण के नारे। इस आड़ में तो कई लोग धन कमा रहे हैं। आजकल तो अपने स्वार्थ की सेवा ही सच्ची सेवा बन गयी है।

इसके बावजूद सच्चे भक्तों को सच्ची सेवा का मार्ग अनुसरण करना चाहिए। कब तब कोई आदमी अपने को धोखा दे सकता है। धार्मिक स्थलों पर मन्नतें मांगना भक्ति नहीं हो सकती। कई मनोकामना पूरी होने के बावजूद लोगों को मन की शांति नहीं मिल रही। वजह निष्काम भक्ति ही एक ऐसी दवा है जो मन का इलाज कर सकती है। जो लोग हृदय में कोई स्वार्थ रखे बिना भगवान की भक्ति और लोगों की सेवा करते हैं वही अपने अंदर उसके सुख की अनुभूति कर पाते हैं। पाने को तो सब लोग कुछ न कुछ पाते हैं पर सुख की अनुभूति वही लोग करते हैं जो भौतिक उपलब्धियों को अधिक महत्व नहीं देते बल्कि मन की शांति को ही सर्वोपरि मानते हैं।

Friday, April 4, 2008

संत कबीर वाणी:शब्द के बराबर कोई धन नहीं

शब्द बराबर धन नहीं, जो कोय जानै बोल
हीरा तो दामों मिलै, सब्दहिं मोल न तोल

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अगर कोई अपनी वाणी से शब्द बोलना जानता हो तो वास्तव में उचित शब्द के बराबर कोई धन नहीं है। हीरा तो फिर भी पैसा खर्च करने पर मिल जाता है पर दूसरे को प्रभावित करने वाले शब्द हर कोई नहीं बोल पाता।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-आज के भौतिक युग में लोगों के संवेदनशीलता कम होती जा रही है। किसी से प्रेमपूर्वक बोलना चमचागिरी कहा जाता है। सच तो यह है कि लोग उसी से प्रेम से बोलते हैं जिससे कोई काम निकलता है या किसी से डरते हैं। अपने से छोटे या निम्न व्यक्ति के साथ तो हर कोई शुष्क और कठोर व्यवहार करता है। इसका एक पक्ष यह भी है कि अगर किसी से प्रेमपूर्वक बात की जाये तो वह सामने वाले को कमजोर और डरपोक समझने लगता है। कुछ लोग तो ऐसे भी है जो प्रेम ओर मित्रता से बात करने पर मखौल उड़ाने लगते हैं। इसके बावजूद विचलित होने की आवश्यकता नहीं है। हमें अपना व्यवहार साफ रखना चाहिए। जितना हो सके सुंदर और मधुर वाणी में बोलना चाहिए।

एक सच यह भी है कि मधुर और प्रेमपूर्ण वाणी भी तभी बोली जा सकती है जब अपना मन साफ हो। अगर मन में कुविचार रखकर किसी से मधुर वाणी में बोलेंगे तो उसका कोई प्रभाव नहीं होता। किसी से डरकर भी जब उससे मधुर शब्द बोलते हैं तो वह समझ जाता है। कई लोग तो मधुर शब्द बोलकर ठगते हैं और यह सब लोग समझ जाते हैं। अतः मन में स्वच्छता रखकर हम किसी से बात करेंगे तो हमारी वाणी से सुंदर और मधुर शब्द जरूर निकलेगें और उसका प्रभाव भी होगा।

Tuesday, April 1, 2008

रहीम के दोहे:विपत्ति के समय पहचान वाले भी भूल जाते हैं

दुरनि परे रहीम कहिए भूलत सब पहिचानि
सोच नहीं वित हानि को, जो न होन हित हानि

कविवर रहीम कहते है कि जीवन में बुरे दिन आने पर सब लोग पहचानना भी भूल जाते हैं। ऐसे समय में अपने मित्रों और रिश्तदारों से सहानुभूति मिल जाये तो अच्छा लगता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या- वर्तमान समय में यही संभव नहीं है जब तक किसी के पास धन है लोगों का जमावड़ा उसके आसपास रहता है और जैसे ही उसके बुरे दिन आये तो सब मूंह फेर जाते हैं। कोई भी मित्र या रिश्तेदार आर्थिक दृष्टि के परेशान किसी भी आदमी के पास फटकने को तैयार नहीं होता। ऐसे में अगर कोई रिश्तेदार या मित्र थोड़ी ही सहानुभूति जताए तो मानसिक रूप के सुख मिलता है पर आजकल वह संभव नहीं हैं। क्योंकि जब पेसा होता है तो आदमी अपना अहंकार दिखाता है और लोग उससे नाराज हो जाते हैं और इसलिये बाद में उससे दूरी बना लेते हैं।

जो लोग संपन्नता और सुख के समय विनम्र रहते हैं उनको इस स्थिति का सामना नहीं करना पड़ता।

Saturday, March 29, 2008

रहीम के दोहे:बन्दर की तरह उछलकूद कर जनसेवा करने वालों से सावधान रहें

बड़े दीन को दुख, सुनो, लेत दया उर आनि
हरि हाथीं सौं कब हुतो, कहूं रहीम पहिचानि


कविवर रहीम कहते है इस संसार में बड़े लोग तो वह जो छोट आदमी की पीड़ा सुनकर उस पर दया करते हैं, परंतु बंदर कभी हाथी नहीं हो सकता-कुछ लोग बंदर की तरह उछलकूद कर दया दिखाते हैं पर करते कुछ नहीं। वह कभी हाथी नहीं हो सकते।

आज के संदर्भ में व्याख्या- आजकल बच्चों, विकलांगों, महिलाओं और तमाम के तरह की बीमारियों के मरीजों की सहायतार्थ संगीत कार्यक्रम, क्रिकेट मैच तथा अन्य मनोरंजक कार्यक्रम होते हैं-जो कि मदद के नाम पर दिखावे से अधिक कुछ नहीं है। यह तो केवल बंदर की तरह उछलकूद होती है। ऐसे व्यवसायिक कार्यक्रम तो तमाम तरह के आर्थिक लाभ के लिये किये जाते हैं। जो सच्चे समाज सेवी हैं वह बिना किसी उद्देश्य के लोगों की मदद करते है, और वह प्रचार से परे अपना काम वैसे ही किये जाते हैं जैसे हाथी अपनी राह पर बिना किसी की परवाह किये चलता जाता है।

समझदार लोग तो सब जानते हैं पर कुछ बंदर की तरह उछलकूद कर समाजसेवा का नाटक करने वालों को देखकर इस कटु सत्य को भूल जाते है। कई लोग ऐसे कार्यक्रमों की टिकिट यह सोचकर खरीद लेते हैं कि वह इस तरह दान भी करेंगे और मनोरंजन भी कर लेंगे। उन्हें यह भ्रम तोड़ लेना चाहिये कि वह दान कर रहे हैं क्योंकि सुपात्र को ही दिया दान फलीभूत होता है। अतः हमें अपने बीच एसे लोग की पहचान कर लेना चाहिए जो इस तरह समाज सेवा का नाटक करते है। इनसे तो दूर रहना ही बेहतर है।

Friday, March 28, 2008

संत कबीर वाणी:एक बूंद के नाश होने पर रोता है संसार

इक दिन ऐसा होयगा, कोय काहू का नाहिं

घर की नारी को कहै, तन की नारी जाहिं

संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं कि आदमी भ्रम में रहता है कि यह देह कभी नष्ट नहीं होगी। वास्तविकता यह है कि एक दिन इस देह का त्याग करना ही पड़ता है। उस समय घर की नारी तो छोडिये अपने शरीर की नाड़ी तक हमारी इस देह का साथ छोड़ देती ही।

एक बूँद के कारनैं, रोता सब संसार

अनेक बून्द खाली गए, तिनका नहीं विचार

संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं कि कोई मनुष्य देह त्याग देता है तो परिवार के रो-रोकर उसका शोक करते हैं वह इस बात का विचार नहीं करते कि अनेक लोग इस तरह जा चुके हैं वह भी खाली हाथ।

व्याख्या-यहाँ कबीर दास जीइस शाश्वत सत्य के और इशारा करते हैं कि यहाँ सब नश्वर है और जो आया है वह जायेगा इसलिए किसी की मृत्यु पर शोक करना व्यर्थ है।

Thursday, March 27, 2008

संत कबीर वाणी:जहाँ अहं वहाँ आफत, जहाँ अज्ञान वहाँ शोक होगा

जहाँ आपा तहं आपदा, जहाँ संसै तहां सोग

कहैं कबीर कैसे मिटै, चारों दीरघ रोग

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं किजहाँ मनुष्य में अहंकार हैं वहाँ विपत्ति जरूर आयेगी। जहाँ अज्ञान के कारण संशय होगा वहाँ निराशा और शोक प्रकट होगा। ऐसे में चार महारोग अहंकार, संकट, संशय और शोक मिट नहीं सकते।

आज के संदर्भ में व्याख्या-वैसे तो मनुष्य में अहंकार की प्रवृति स्वाभाविक रूप से रहती है और यह कबीर जी के समय में भी रही है, पर उस समय फिर भी लोग अपना समय आध्यात्म में बिताते होंगे पर आजकल तो आदमी की दिनचर्या इतनी व्यस्त है कि उसे भक्ति और ज्ञान प्राप्त करने का समय ही कहाँ मिल पाता है। कई माता-पिता अपने बच्चों को भी कुछ सिखाने का समय नहीं निकाल पाते, ऐसे में चारों तरफ अज्ञान फैलता जा रहा है। साधू संत जिन्होंने केवल ज्ञान की किताबें पढी होतीं हैं पर धारण नहीं किया होता और वह अहंकार में मनोरंजन कार्यक्रम की तरह अपने प्रवचन प्रस्तुत करते हैं तो उनको सुनने वाले भी सत्संगी होने का अहंकार पाल लेते हैं।

कई लोग तो इन संतों के पास से ऐसे लौटते हैं मानो स्वर्ग का टिकिट लेकर लौटे हों। आशय यह है कि आजकल लोगों में जो मानसिक तनाव बढ़ रहा है और उससे जो तन और मन में व्याधियां फ़ैल रही हैं उसका कारण अहंकार और अज्ञान है। हर कोई अपनी बात एक ज्ञानी की तरह कर रहा है पर सुन कोई किसी की नहीं रहा है। हर कोई दर्द बयान कर रहा है पर कोई किसी का हमदर्द नहीं बन रहा है। कई जगह यह अंहकार छोटी-छोटी बातों पर पैदा होता है जो बडे संकट का कारण बनता है। हमारे यहाँ संयुक्त परिवार की परंपरा विघटन का कारण भी यही है जिससे लोगों की संघर्ष करने की भावना कम हुई है। इसलिए जो लोग अपना अंहकार छोड़ कर निरंकार भाव से काम करेंगे वही सुखी रह पायेंगे।

Wednesday, March 26, 2008

रहीम के दोहे:अब वह छायादार वृक्ष कहाँ हैं?

रहिमन अब वे बिरछ कहं जिनकी छांह गंभीर

बागन बिच बिच देखिअत, सेंहुड, कुंज करीर

कवीवर रहीम कहते हैं की अब इस संसार रुपी बैग में अब वह वृक्ष कहाँ है जो घनी छाया देते हैं। अब तो इस बगीचे में सेमल और घास फूस के ढेर या करील के वृक्ष ही दिखाई देते हैं।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-हम कहते हैं कि ज़माना बहुत खराब हैं पर देखें तो यह केवल हमारा एक नजरिया है। इस कलियुग में तो झूठे और लघु चरित्र के लोगों का बोलबाला है। रहीम जी के समय तो फिर भी सात्विक भाव कुछ अधिक रहा होगा पर अब तो स्थिति बदतर है।

पहले तो लोग दान -पुण्यके द्वारा समाज के गरीब तबके पर दया करते थे और अन्य भी तमाम तरह की समाज सेवा करते थे। आपने देखा होगा कि अनेक धर्म स्थलों पर तीर्थ यात्रियों के लिए धर्मशालाएं बनीं हैं जो अनेक तरह के दानी सेठों और साहूकारों ने बनवाईं पर आज उन जगहों पर फाईव स्टारहोटल बन गए हैं। कहने का तात्पर्य अब वह लोग नहीं है जो समाज को अपने पैसे, पद और प्रतिष्ठा से छाया देते थे। अगर कुछ लोग दानवीर या दयालू बनने का दिखावा करते हैं तो उनके निज स्वार्थ होते हैं। ऐसे लोगों से सतर्क रहने की जरूरत है।

Tuesday, March 25, 2008

संत कबीर वाणी:गुरु के ज्ञान से एकाध ही उबरता है

माया दीपक नर पतंग, भ्रमि भ्रमि इवेन पड़ंत

कह कबीर गुरु ग्यान तैं एक आध उबरंत

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मनुष्य के पतंगे के सामान मायारूपी दीपक के प्रति आकर्षित होकर भ्रम में पडा रहता है। कोई भाग्यशाली मनुष्य होता है जिसे योग्य गुरु का ज्ञान मिल जाता है और वह इससे उबर पाता है।

आज के संदर्भ में व्याख्या- आजकल तो माया का ऐसा विस्तार है कि बडे साधू-संत उसके चक्कर में पड़े हैं। लंबे चौड़े व्याख्यान देते हैं, किताबे बेचते हैं, दवाईया बेचते हैं और उससे कमाए धन से अपने पांच सितारा आश्रम बनाते हैं। माजी की बात यह है भारी संख्या में लोग उनसे ज्ञान लेने जाते हैं जो केवल माया के आसपास ही अपना ज्ञान देते हैं। वैसे ही आम आदमी स्वाभाविक रूप से भ्रमित रहता है ऐसे में यह ज्ञान के मूलतत्व से परे हैं। अपने प्रवचनों में ही अपनी दवाईयों का बखान करते हैं। तिस पर इलेक्ट्रोनिक माध्यमों की प्रबलता और चकाचौंध में वह अधिक भ्रमित हो जाता है। ऐसे में मुक्ति की चाहे में घूम रहा आदमी और भ्रम पाल लेता है।

ऐसे में मेरा विचार है कि लोगों को आजकल गुरु बनाने की बजाय अपने अध्यात्मिक ग्रंथों को ही अपना गुरु मान कर उनको पढ़ना चाहिऐ, क्योंकि शाश्वत सत्य और ज्ञान उन्हीं में भरा पडा है। आजकल के गुरु उसमें से केवल उतना ही ज्ञान लोगों को सुनाते हैं जिनसे उनका खुद का व्यवसाय चल सके।

Monday, March 24, 2008

विदुर नीति:जैसे लोगों में रहता है वैसे ही हो जाता है आदमी

  1. बोलने से न बोलना अच्छा बताया गया है, किन्तु सत्य बोलना भी एक गुण है। चुप या मौन रहने से सत्य बोलना दो गुना लाभप्रद है। सत्य मीठी वाणी में बोलना तीसरा गुण है और धर्म के अनुसार बोला जाये यह उसका चौथा गुण है।
  2. मनुष्य जैसे लोगों के साथ रहता है और जिन लोगों की सेवा में रहता है और जैसी उसकी कामनाएं होतीं है वैसा ही वह हो भी जाता है।
  3. मनुष्य जिन विषयों से मन हटाता है उससे उसकी मुक्ति हो जाती है। इस प्रकार यदि सब और से निवृत हो जाये तो उसे कभी भी दुख प्राप्त नहीं होगा।
  4. जो न तो स्वयं किसी से जीता जाता है न दूसरों को जीतने के इच्छा करता है न किसी से बैर करता और न दूसरे को हानि पहुंचाता है और अपनी निंदा और प्रशंसा में भी सहज रहता है वह दुख और सुख के भाव से परे हो जाता है।

Monday, March 17, 2008

विदुर नीति:आकर्षक वाणी बोलना भी कठिन

  1. दुष्ट पुरुषों का बल हिंसा, राजाओं का बल दंड देना, स्त्रियों का बल सेवा और गुणवानोंका बल है क्षमा कर देना।
  2. वाणी का पूर्ण संयम तो बहुत कठिन माना ही गया है, परन्तु सार्थक तथा दूसरे आदमी को प्रभावित कर सके ऐसी आकर्षक वाणी बोलना भी कम कठिन नहीं है।
  3. मधुर शब्दों से युक्त बात अनेक प्रकार से लाभदायक होती है किन्तु कटु वाणी तो महान अनर्थकारी होती है और उससे तो हर हाल में बचना चाहिए।
  4. शरीर में घुसे बाण तो निकाले जा सकते हैं परन्तु कटु शब्द अगर किसी के मन में घर कर जाएं तो उसे निकालना कठिन होता है।
  5. जिसने स्वयं अपने आत्मा को ही जीत लिया है, वही उसका बंधू बन जाता है। आत्मा ही सच्चा बंधू है और वही नियत शत्रु भी है।
  6. जो धर्म और अर्थ का परित्याग कर अपनी इन्द्रियों के वश में हो जाता है वह जल्द ही अपने ऐश्वर्य, प्राण, धन-संपदा और स्त्री से वंचित हो जाता है।

Sunday, March 16, 2008

विदुर नीति:संतुलित भोजन से होते हैं अनेक लाभ

  1. नित्य स्नान करने वाले मनुष्य को बल, रूप, मधुर स्वर, आकर्षक वर्ण,, कोमलता, सुगंध, पवित्रता, शोभा, सुकुमारता और सौन्दर्य प्राप्त होता है।
  2. संतुलित भोजन करने वाले को आरोग्य, आयु, बल, सुख, सुन्दर संतान और समाज में सम्मान प्राप्त होता है। लोग उस पर अधिक खाने का आक्षेप नहीं करते।
  3. अकर्मण्य, अधिक खाने वाले और सबसे लड़ने वाले, मायावी, क्रूर, देश-काल न रखने वाले और खराब वेशभूषा धारण करने वाले को अपने घर में न ठहरने दें
  4. बहुत कष्ट झेलने पर भी कमजोर, अभद्र शब्द बोलने वाले,निर्बुद्धि, जंगल में रहने वाले, धूर्त, निर्दयी और कृतघ्न से कभी सहायता नहीं मांगनी चाहिए।

Saturday, March 15, 2008

मनुस्मृति:विद्यादान का है सर्वाधिक महत्व

1.किसी प्यासे को पानी पिलाने से स्वयं को भी तृप्ति मिलती है। इसी प्रकार अन्न का दानकरने पर दीर्घकाल का सुख, तिल का दान करने वाले को प्रिय संतान, दीपक का दान करने से उत्तम दृष्टि, भूमि का दान करने वाले को धरती, सोने का दान करने वाले को दीर्घायु , मकान दान करने वाले को महल और चांदी दान करने वाले को सुन्दर रूप की प्राप्ति होती है।

2.जल, अन्न, गाय, भूमि, वस्त्र तिल, सोना, और घी आदि समस्त दानों में विद्या और ज्ञान का दान सबसे अधिक महत्वपूर्ण है।

3.दान देने वाला जिस भाव से दान देता है उसी भाव से उसका फल भी उसे प्राप्त होता है।
4.जो व्यक्ति सम्मान के साथ दान देता है और लेने वाला भी उसी तरह लेता है तो उनको स्वर्ग की प्राप्ति होती है और श्रद्धा से रहित होकर दान देने और लेने वाला नरक में जाते हैं।

5.यदि दान मांगने वाला दान का उचित पात्र न लगता हो फिर भी उसे श्रद्धा के साथ दान देना चाहिए क्योंकि अगर दान देने की प्रवृति बनी रहती है तो कभी तो दान लेने वला योग्य पात्र मिल ही जायेगा जो दादा का उद्धार कर देगा।

Friday, March 14, 2008

विदुर नीति:मित्र की परीक्षा कभी न लें

१.जो मित्रों से सत्कार और सहायता पाकर कृतार्थ होकर भी उनका साथ नहीं निभाते ऐसे कृत्घ्नों के मरने पर उनका मांस तो मांसाहारी पशु भी नहीं खाते।
२.धनवान हो धनहीन मित्र का सम्मान करें। मित्रों से न तो किसी प्रकार की याचना करें और न ही उनकी परीक्षा लें।
३.दुष्ट पुरुषों का स्वभाव मेघ के समान चंचल होता है, वे सहसा क्रोध कर बैठते हैं और अकारण ही प्रसन्न हो जाते हैं।
४.हंस जिस प्रकार सूखे सरोवर के पास मंडरा कर रह जाते हैं उनके अन्दर प्रवेश नहीं करते उसी प्रकार जिसके ह्रदय में चंचलता का भाव विद्यमान है और अज्ञानी हैं वह भी इन्द्रियों के वश में रहता है अरु उसे अर्थ की प्राप्ति नहीं होती।

Saturday, March 8, 2008

रहीम के दोहे:मूर्ख को करनी का दंड देना जरूरी

खीरा सिर तें काटिए, मलियत नमक बनाय

रहिमन करुए मुखन को , चाहिअत इहै सजाय

कविवर रहीम कहते हैं कि जिस तरह खीरे का मुख काटकर उस पर नमक घिसा जाता है तभी वह खाने में स्वाद देता है वैसे ही मूर्खों को अपनी करनी की सजा देना चाहिऐ ताकि वह अनुकूल व्यवहार करें।

नये संदर्भ में व्याख्या-यह सही है कि बडों को छोटों के अपराध क्षमा करना चाहिए, पर कुछ लोग ऐसे होते हैं जो नित्य मूर्खताएं करते रहते हैं। कभी किसी की मजाक उडाएंगेतो कभी किसी को अपमानित करेंगे। कुछ तो ऐसी भी मूर्ख होते हैं जो दूसरे व्यक्ति को शारीरिक, आर्थिक और मानसिक हानि पहुँचने के लिए नित्य तत्पर रहते हैं। ऐसे लोगों को बर्दाश्त करना अपने लिए तनाव मोल लेना है। ऐसे में अपने क्रोध का प्रदर्शन कर उनको दण्डित करना चाहिए। अगर ऐसा नहीं करेंगे तो उनका साहस बढ़ता जायेगा।

व्याख्याकार स्वयं कई बार ऐसा देख चुका है कि कई लोग तो इतने नालायक होते हैं कि उनको प्यार से समझाओ तो और अधिक तंग करने लगते हैं और जब क्रोध का प्रदर्शन कर उन्हें धमकाया जाये तो वह फिर दोबारा वह बदतमीजी करने का साहस नहीं कर पाते। हालांकि इसमें अपनी सीमाओं का ध्यान अवश्य रखना चाहिऐ और क्रोध का बहाव बाहर से बाहर होना चाहिए न कि उसकी पीडा हमारे अन्दर जाये।

Friday, March 7, 2008

रहीम के दोहे: जहाँ दान और सम्मान का भाव न हो वहाँ से चले जाएं

रहिमन तब लगि ठहरिये, दान मान सनमान

घटत मान देखिय जबहिं तुरतहिं करिय पयान

कविवर रहीम कहते हैं कि उसी स्थान पर ठहरें जहाँ लोगों में दान और मान-सम्मान का भाव रहता है। जहाँ अपना सम्मान काम होते देखें वहाँ से पलायन कर जाना चाहिए।

संक्षिप्त व्याख्या- आजकल के महंगाई के युग में तो रहीम के यह वाक्य और अधिक प्रासंगिक है। वैसे भी हमें कई जगह अपने काम से जाना पड़ता है। आजकल रिश्तेदारी भी बहुत दूर-दूर होने लगी है इसलिए लोगों को दूसरे शहर जाना पड़ता है। पहले गावों में शादी-विवाह पर बहुत दिन तक रिश्तेदार रहते थे पर अब यह संभव नहीं। मनु स्मृति में तो लिखा है कि 'एक दिन से अधिक जो ठहरे अतिथि नहीं'। अत: लोग वैसे ही दूरी के कारण एक दिन से अधिक नहीं ठहरते। इसके अलावा भी हम किसी समूह में नित-प्रतिदिन रहते हैं और लग रहा हो कि अब उनके मन में सम्मान काम हो रहा है तो उनसे दूरी बना लेना चाहिए। स्थान से यहाँ आशय केवल भौतिक नहीं है बल्कि व्यवहार और संबंध से भी है। अगर हमसे व्यवहार करने वाले लोगों में जब हमारे लिए मान काम हो रहा है उनसे दूरी बनाना चाहिए। अगर हम किसी से रोज मिलेंगे तो वह वैसा सम्मान नहीं करेगा जिसकी हम आशा करते हैं।

इसके अलावा उन लोगों से भी दूरी बनाना चाहिऐ जो किसी का काम नहीं करते। यहाँ दान से आशय देने से है और इसे व्यापक अर्थों में लेना चाहिऐ। जिस्मने दान देने की प्रुवृति नहीं होती उसमें किसी का काम करने के भावना भी नहीं होती। अत: उनसे संपर्क रखने का कोई मतलब भी नहीं है।

Thursday, March 6, 2008

रहीम के दोहे:संसार को सूक्ष्म रूप में देखें

रूप, कथा, पद, चारु, पट, कंचन, दोहा, लाल

ज्यों ज्यों निरखत सूक्ष्मगति , मोल रहीम बिसाल

कविवर रहीम कहते हैं की सुन्दरता, कथा, काव्य, आकर्षक वस्त्र सोना, दोहा और अपने पुत्र का जब सूक्ष्म रूप में देखते हैं तो उनका महत्व बढ़ जाता है।

लेखकीय अभिमत- रहीम जी ने हर बात गूढ़ अर्थों में अपनी बात कही है। यह संसार बहुत सुन्दर हैं अगर हम उसका आनंद उठाएं पर यह तभी संभव है जब उसे निर्लिप्त भाव से देखें। अगर हम इसे गहराई और सूक्ष्म रूप से देखें तो इसमें परमात्मा की कला के दर्शन होते हैं। हम इसे भोगने के साथ निहारें तो इसमें परमात्मा के सुंदर स्वरूप के दर्शन होंगे। सुन्दर वस्त्रों को देखते हैं और फिर ध्यान कर पृथ्वी पर फ़ैली हरियाली को देखें तो वह उसी सुन्दर वस्त्रों की जननी है। कहीं कविता सुनते हैं तो उसमें छिपे गूढ़ अर्थों को समझें तभी आन्नद आता है। अक्सर कवियों का मजाक उडाया जाता है पर वह अपने अनुभव से जो सृजन करते हैं उसकी अनुभूति वही कर सकता है जो उसे ध्यान से पढता और सुनता है। सोना और अपनी संतान को सूक्ष्म रूप में देखना चाहिऐ किकिस तरह परमात्मा ने इस संसार का सृजन किया है। हम केवल बाह्य रूप देखते हैं और अपना समझकर उसमें तल्लीन हो जाते हैं और यही हमारे दुख का कारण बनता है। हमें इस तरह देखना चाहिए कि यह परमात्मा के ही देन और रचना है इसी को सूक्ष्म रूप से देखना कहते हैं। इससे मन में निर्लिप्ता और निष्काम भाव उत्पन्न होता है जीवन का आनंद वास्तविक रूप में तभी महसूस किया जा सकता है।

Wednesday, March 5, 2008

रहीम के दोहे:बेसन का आटा अच्छा, मैदा का नष्ट होना ठीक

रहिमन रहिला की भली, जो परसै चित लाय
परसत मन मैलो करे, सो मैदा जरि जाय


कविवर रहीम कहते हैं कि बेसन का आटा हितकर है क्योंकि उसको प्रेम से शरीर पर मला जाता है जबकि जो तन और मन को गंदा करता है उस मैदा का नष्ट होना ही अच्छा है।

भावार्थ- जिस प्रकार के आचरण, विचार और कार्य से हमारा स्वयं का मन शुद्ध होता हो, दूसरे का उपकार होता है और लोगों की बीच अच्छी छवि बनती है वह अच्छा है और उसी तरफ अपनी दृष्टि रखनी चाहिऐ। हमें मन में ऐसा कोई विचार नहीं लाना चाहिए जिससे अपने या दूसरे के प्रति वितृष्णा का भाव पैदा होता हो। अपने आचरण और कार्य से किसी को हानि पहुँचती है तो उसको नहीं करना चाहिऐ। बुरे विचार को नष्ट कर देना चाहिऐ।

जबकि आजकल हम देख रहे हैं कि किसी को अपमानित कर लोग अपने को सम्मानित समझते हैं और दूसरे को हानि पहुंचाने में अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हैं और इतना ही नहीं अपने बच्चो को भी ऐसे संस्कार भरते हैं जो बाद में उनके लिए ही भयावह सिद्ध होते हैं। जो अपने कुकर्मों और बाहुबल से प्रभाव बनाते हैं लोग उनको सम्मान देते हैं और उनके प्रति आदर भाव व्यक्त करते हैं। जबकि उनकी तरफ से मुहँ फेर लेना चाहिऐ। बुरा व्यक्ति, आचरण, विचार और सामान त्याग देना चाहिऐ।

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