Sunday, June 9, 2013

दादू दयाल के दोहे-जिन का दिल मक्खन की तरह है माया उनके सामने पत्थर हो जाती है (dadu dayal ke dohe-jin ka dil makkhan ke tarah hai maya unke samne pattha ho jaatee hai)



  अनेक मासूम दिल वाले लोग धनी, उच्च पदस्थ तथा बाहुबली लोगों से दया की आशा से निहारते हैं। कुछ लोग बड़े होने पर भी विनम्र हो सकते हैं पर सभी के अंदर सहृदयता का भाव होना  संभव नहीं है। माया के फेर में फंसे लोगों से दया, परोपकार और अपने से कमजोर व्यक्ति के प्रति सहृदयता दिखाने की उम्मीद करना निरर्थक है।  खासतौर से आजकल अंग्रेजी शिक्षा तथा जीवन पद्धति के साथ जीने के आदी हो चुके समाज में तो यह आशा करना ही मूर्खता है कि धनी, उच्च पदस्थ तथा शक्तिशाली लोग समाज के प्रति उत्तरदायित्व निभायेंगे।  अंग्रेजी शिक्षा उपभोग के लिये गुलाम तक बनने के लिये प्रेरित करती है तो जीवन शैली अपना पूरा ध्यान सांसरिक विषयों की तरफ ले जाती है।  ऐसे में सामान्य मनुष्य से आशा करना कि वह भारतीय अध्यात्मिक दर्शन का अध्ययन करेगा, बेकार है |
कविवर दादू दयाल कहते हैं कि
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दादूमाया का खेल देखि करि, आया अति अहंकार।
अंध भया सूझे नहीं, का करिहै सिरजनहार ।।
        सामान्य हिन्दी भाषा में भावार्थ-माया का खेल अत्यंत विकट है। यह संभव ही नहीं है कि जिस मनुष्य के  पास धन, पद और प्रतिष्ठा का अंबार हो वह अहंकार का समंदर में न डूबे। जिसके पास माया है उसे कभी भी परमात्मा की भक्ति हो ही नहीं सकती।
माखन मन पांहण भया, माया रस पीया।
पाहण मन मांखण भया, राम रस लीया।।
      सामान्य हिन्दी भाषा में भावार्थ-जिनका मन मक्खन की तरह है उनके पास धन, पद और प्रतिष्ठा यान माया के प्रभाव में वह भी पत्थर हो जाता है। राम का रस पी ले तो पत्थर मन भी मक्खन हो जाता है।
       सच बात तो यह है कि भारत ने हर क्षेत्र में पाश्चात्य व्यवस्था का अनुकरण किया है। एक अंग्रेजी विद्वान ने बहुत पहले कहा था कि इस संसार में बिना बेईमानी या दो नंबर के धन के बिना कोई धनपति बन ही नहीं सकता।  जब हम अपनी प्राचीन पद्धतियों  से दूर हो गये हैं और  भारतीय अध्यात्म दर्शन की बात नहीं भी करें तो  पश्चिमी विद्वानों का सिद्धांत भी यही कहता है कि बिना बेईमानी के किसी के पास अधिक धन आ ही नहीं सकता।  हम यह भी देखें कि जब किसी के पास बेईमानी से काला धन आता है तो यकीनन उसके साथ अनेक प्रकार के संकट भी जुउ़ते हैं।  ऐसे में ऐसे काले धन के स्वामियों की रात की नींद हराम हो जाती है तो दिन का चैन भी साथ छोड़ देता है। अपने संकटों से दो चार हो रहे बड़े लोग  अपनी रक्षा करेंगे या दूसरों पर दया करने का समय निकालेंगे? इसलिये जहां तक हो सके अपने ही पवित्र साधनों से जीवन बिताना चाहिये और धनी, उच्च पदस्थ तथा प्रतिष्ठावान लोगों से कोई सरोकार न रखते हुए उनसे आशा करना त्याग देना चाहिये।
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Thursday, May 30, 2013

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-जहां राज्य कमजोर हो वहां अनाचार बढ़ते हैं (kautilya ka arthshastra-jahan rajya kamjor ho vahan anachar badhte hain



      पिछले कई दिनों से भारतीय प्रचार माध्यम स्त्रियों के प्रति बढ़ते अपराधों की घटनाऐं प्रचारित कर समाज की स्थिति का रोना रोते हुए  अपने विज्ञापन का समय पास कर रहे हैं।  अनेक प्रकार की बहस होती  है पर निष्कर्ष के रूप में नतीजा शून्य ही रहा है।  सच बात तो यह है कि हमारे देश की  ही नहीं वरन् पूरे विश्व की दंडप्रणालियां अत्यंत अपराधों के अन्वेषण तथा  विलंब से निर्णय करने का कारक बन गयी हैं।  दूसरी बात यह है कि अपराध अन्वेषण तथा न्यायिक प्रणाली के सदुपयोग की योग्यता जिन लोगों में अधिक नहीं  है वह भी राज्य कर्म में लिप्त होकर समाज की रक्षा का जिम्मा ले लेते हैं।  पुरातन सभ्यताओं में अपराध की प्रकृत्ति के अनुसार दंड की व्यवस्था थी। इनमें कई सजायें क्रूर थी जिनको पश्चिमी सभ्यता के लोग पशुवत मानते थे।  अपने को सभ्य समाज साबित करने के लिये पश्चिम के लोगों ने पशुवत अपराधों के प्रति भी मानवीय दृष्टिकोण अपनाने का सिद्धांत स्थापित किया जिससे समाज में अपराध बढ़े ही हैं।

कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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यदि प्रणयेराजा दण्डं उण्ड्येष्वतन्द्रितः।
शले मत्स्यानिवापक्ष्यन्दुर्बलान्बलवत्तराः।
           हिन्दी में भावार्थ-जब राज्य अपनी प्रजा की रक्षा करने के लिये अपराधियों को दंड देने में सावधानी से काम नहीं करता तब अव्यवस्था फैलती है। शक्तिशाली मनुष्य कमजोर लोगों पर भारी अनाचार करने लगते हैं।
अद्यात्काकः परोडाशं श्वा लिह्याद्धविस्तथा।
स्वाम्यं च न स्यात्कस्मिंश्चित्प्रवर्तेताधरोत्तरम्
          हिन्दी में भावार्थ-जब राज्य अपराधियों को दंड नहीं देता तो कौआ पुरोडाश खाने लगेगा, कुत्ता हवि खाकर स्वामी की बात नहीं मानेगा और समाज उच्च से निम्न स्थिति में चला जायेगा।
        भारत में भी कथित रूप से पश्चिमी व्यवस्था को अपनााया गया है। जिस भारतीय संविधान के आधार पर हमारे देश का वर्तमान स्वरूप विद्यमान है वह भी अंग्रेजों से विरासत में मिला है। हमने अपना संविधान बनाया पर उसके साथ ऐसे अनेक नियम हैं जो अंग्रेजों के काल से ही बने हैं।  अंग्रेज आधुनिक सभ्यता के प्रवर्तक होने का दावा करते हैं जो अपराधियों के प्रति मानवीय दृष्टिकोण अपनाने की बात करती है।  इसके विपरीत हमारा दर्शन मानता है कि क्रूरतम अपराधों की सजा भी क्रूर होना चाहिये।  चूंकि हमारे देश में पश्मिमी सभ्यता के समर्थकों के पास सारी शक्ति है इसलिये यह संभव नहीं है कि यहां अपराध के अन्वेषण तथा दंड के लिये अपने ही देश के अनुरूप कोई नयी प्रणाली बनायी जाये।
       हमारा दर्शन मानता है कि कुत्ते की पूंछ कभी सीधी नहीं हेाती जबकि पश्चिमी दर्शन अपराधियों के सुधरने की कल्पनातीत आशा पालता है।  उहापोह फंसे हमारे देश की स्थिति दिन ब दिन इसलिये बिगड़ती जा रही है क्योंकि हमारे यह अपराध तथा  अन्वेषण तथा न्यायालय में उनके प्रमाणीकरण में विलंब होता है।  अनेक अपराधी तो अपने पुराने अपराध के लिये क्षमा तक की आशा करते हैं।  कुछ तो बिना सजा के ही देह छोड़ जाते हैं।  जब तक हम अपने देश के मूल स्वभाव के अनुसार अपराध के अन्वेषण तथा उनके दंड देने की कोई तीव्र प्रणाली नहीं अपनायेंगे तब तक भयमुक्त समाज की आशा करना व्यर्थ है।         

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday, May 25, 2013

मनुस्मृति के आधार पर चिंत्तन-पाखंडी को दान देने वाला भी डूबता है (pakahandi ko dan dene wala bhee doobta hai

       
       वैसे तो हमारे देश में पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव के कारण खान पान, रहन सहन तथा कार्यपद्धति में अनेक परिवर्तन आये हैं।  इतना ही नहीं देश के पेशेवर धार्मिक स्वयंभूओं तथा संगठनों ने भी पश्चिमी देशों की व्यवसायिक कंपनियों की तरह अपने कामकाज का विस्तार किया है।  वह भक्ति के साथ भगवान का नाम अवश्य लें  पर उनका लक्ष्य माया पाना ही होता है। यह सच है कि इन्हीं धार्मिक ठेकेदारों ने अपने शिष्यों को दान तथा दया के आधुनिक प्रयासों के लिये प्रेरित नहीं किया ताकि पुरानी दान परंपरा के नाम पर उनके घर भरत रहें। दान देने के मामले में यही लोग गुरु बनकर दक्षिणा का  मुख अपनी तरफ किये रहते हैं।  तब वह कभी नहीं कहते कि यह दान दक्षिणा गरीब बच्चों की शिक्षा या असहायों की मदद के लिये व्यय करो। यह अलग बात है कि ऐसे साधन संपन्न धार्मिक व्यवसायी लोगों को दिखाने के लिये कथित रूप से गरीबों को खाना खिलाने और बच्चों को किताबें बांटने का काम स्वयं करते हैं। कभी अपने शिष्यों को अपने घर के आसपास स्थित जरूरतमंदों को मदद करने की प्रेरणा नहीं देते।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
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यथा प्लवेनौपलेन निमज्जत्युदके तरन्।
तथा निमज्जतोऽधस्तदजो दातृप्रतीच्छकौ।।
         हिन्दी में भावार्थ-जिस तरह पानी में पत्थर की नाव पर सवार होने वाला व्यक्ति डूब जाता है उसी तरह पाखंडी विद्वान तथा उसका सहायक दानदाता दोनों ही पाप के भागी बनते हैं
तस्मादविद्वान्विद्यस्मात्तस्मात्प्रतिग्रहात्।
स्वल्पकेनाप्यविद्वान्हि पङ्के गौरवि सीदति।।
    हिन्दी में भावार्थ-पाखंडी विद्वान को दान देने से कोई लाभ नहीं होता। बल्कि उसे धन तथा पुण्य दोनों की हानि होती है। मूर्ख बनाकर दान लेने वाला विद्वान भी शीर्घ नष्ट होता है।
          सच बात यह है कि आधुनिक समय में समाज हित के लिये जिस व्यापक दृष्टिकोण की आवश्यकता है उसकी प्रेरणा कथित गुरु देना ही नहीं चाहते।  गरीबों को खाना खिलाना बुरी बात नहीं है पर प्रयास इस बात के होने चाहिये कि गरीबों को  अपने परिश्रम का उचित पारिश्रमिक मिले।  भीख मांगने वाले  को दान देते समय पुण्य का फल की कामना मन में रहती है तो लोग खुलकर देते हैं पर जब किसी मजदूर या सेवक को उचित पारिश्रमिक या वेतन देने की बात हो तो तब अमीर आदमी अपनी चतुराई पर उतर आता है।  उस समय वह मजदूर या सेवक के परिवार का पेट भरने में अपना पुण्य नहीं देखता।  यही कारण है कि अनेक भिखारी परिश्रम कर कमाने की बात कहने पर कहते हैं कि हमें तो अपने ही इस धंधे में ही इतनी कमाई है कि परिश्रम करने पर उसका दसवां हिस्सा भी नहीं मिल सकता।  यह हमारे समाज की बौद्धिक मूर्खता है कि वह मेहनतकश को उचित या अधिक पारिश्रमिक देने को दान नहीं मान पाता। यही कारण है कि हमारे देश में धनिक अधिक संख्या में पैदा रहे हैं पर समाज में उनके प्रति वैमनस्य भी उतनी तेजी से बढ़ रहा है।  सच बात तो यह कि हमारा आधुनिक समाज का संपन्न पहले की अपेक्षा अधिक मेहनतकशों पर निर्भर हो गया है पर उनका सम्मान नहीं करना चाहता जबकि अमीर गरीब के बीच स्थित तनाव से बचने का एक ही मार्ग है कि पूंजीगत शक्तियां मानव श्रम का उचित ढंग से लालन पालन करें।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 



Saturday, May 18, 2013

चाणक्य के दर्शन में भी है समाजवाद का सिद्धांत-हिन्दी लेख (chankya ke darshan mein bhee samajwan ka siddhant-hindi lekh)

          हमारे देश में भारतीय अध्यात्म से प्रथक अनेक विदेशी विचारधाराओं ने लोगों के मनमस्तिष्क में घर कर लिया है। माना जाता है कि भारतीय अध्यात्म का दर्शन केवल बघारने के लिये है और उसके सिद्धांतों का अब कोई व्यवाहारिक महत्व नहीं है।  अनेक बुद्धिमानों ने  योजनाबद्ध ढंग से  साम्यवादी, प्रगतिवादी तथा समाजवादी विचाराधाराओं को  क्रम से यह कहकर स्थापित करने का प्रयास किया है कि उनके अनुसार गरीबों और असहायों को मदद मिलनी चाहिये।  जब यह बुद्धिमान इन विदेशी विचाराधाराओं का गुणगान करते हैं तो उनका संबोधन समाज नहीं वरन् राज्य व्यवस्था की तरफ होता है। उनका मानना है कि मनुष्य समाज तो एक दम संवदेनहीन होता और उसे राज्य के दंड से ही नियंत्रित किया जा सकता है।
           इसके विपरीत भारतीय अध्यात्म दर्शन समाज को संबोधित करता है। उसका मानना है कि अगर समाज स्वतः नियंत्रित होगा ता अधिक शक्तिशाली होगा। यही कारण है कि भारतीय अध्यात्म दर्शन ने ही हमेशा दान की प्रवृत्ति का संदेश दिया हैं। हमारे देश के बुद्धिमान लोग उसका आशय केवल मुफ्त में किसी गरीब को देना मानते हैं। इतना ही नहीं  यह समाज के धनी लोगों के विवेक पर ही निर्भर है जबकि हमारे बुद्धिमान मानते हैं कि जिसके पास राज्य दंड नहं है वह संवेदनशील हो ही नहीं सकता।  दरअसल इस दान की महिमा के लिये पुण्य का लाभ मिलने की बात अवश्य हमारा दर्शन कहता है पर उसका कोई रूप स्पष्ट नहीं किया है।  यह पुण्य केवल  अगले जन्म या इस जन्म में प्रत्यक्ष मिलता हो ऐसा दावा हमारा दर्शन नहीं करता।  इस दान की प्रवृत्ति को उकसाने के पीछे हमारे विद्वान मनीषियों का आशय यही रहा है कि इससे समाज में समरसता और शंाति रहे। जिनके पास धन है वह अपने से कमतर व्यक्ति को उसकी सेवा या वस्तु प्रतिफल या दान में देते रहें ताकि वह कभी भूखे न रहें। अगर वह भूखे या निराश होंगे तो समाज को कहीं न कहीं उनके विद्रोह का सामना करना पड़ता है। इससे अशांति फैलती है। अगर धनी मनुष्य अपने समाज के गरीब लोगों का ख्याल रखता है तो उसके धन देने की प्रक्रिया को भले ही दान कहें पर इससे जो शांति बनी रहती है वह उसके लिये पुण्य के रूप  में प्रतिफल ही होता है।
चाणक्य नीति में कहा गया है कि
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उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणाम्।
लडागोदसंस्थानां परीवाह इवाऽम्भासाम्।।
       हिन्दी में भावार्थ-अर्जित धन का त्याग करने से ही उसकी रक्षा हो सकती है। जैसे तालाब में जमा जल को बाहर निकालने पर उसकी रक्षा होती है।
      चाणक्य महाराज के इस संदेश का विस्तार से अर्थ समझें तो यह स्पष्ट है कि जिन लोगों को पास अधिक धन है वह इस गुमान में कतई नहीं रहें कि वह उसका केवल संग्रह कर अपनी तथा परिवार की रक्षा कर सकते हैं।  उनको अपने आसपास रह रहे लोगों को खुश रखने के लिये भी कुछ व्यय करते रहना चाहिये।  ताकि वह निराशा और हताशा से उनकी तरफ वक्र दृष्टि न डालें।  इतना ही नहीं जब वह धनिकों पर निर्भर रहेंगे तो उनकी रक्षा के लिये भी तैयार रहेंगे।  अगर धनी ऐसा नहीं करेंगे तो निश्चित रूप से न उनका धन और नही परिवार सुरक्षित रह सकता है। एक तरह से यह चाणक्य का समाजवादी सिद्धांत है जिसके लिये अधिक लिखने की आवश्यकता नहीं है।
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 



Saturday, May 11, 2013

मनुस्मृति-सन्यासी को त्यागी भी होना चाहिये(sanyasi ko tyagi bhi hana chahiye-manu smriti)

             हमारे देश में सन्यास और सन्यासी को लेकर कभी सार्वजनिक रूप से परिभाषित किया ही नहीं जाता। इसका कारण यह है कि जिन लोगों को सन्यास या वानप्रस्थ का सही अर्थ बताना चाहिये वही गेरुए या सफेद वस्त्र पहनकर इस तरह समाज के सामने प्रस्तुत होते हैं जैसे कि वह भारी भरकम आत्मज्ञानी हों।  इतना ही नहीं स्वयंभू गुरु बनकर वह अपने शिष्यों से धन संपदा संग्रह करने के साथ ही उनसे अपने पांव भी पुजवाते हैं।  भारतीय अध्यात्म ज्ञान में सिद्ध होने का दावा करने वाले यह पेशेवर महापुरुष समाज को भौतिक यज्ञ करने के लिये ही प्रेरित करते हैं।  इतना ही ज्ञान यज्ञ के नाम पर यह ऐसे कार्य करते हैं जिनका धार्मिक कर्मकांडों से संबंध तो होता है पर अध्यात्म के विषय से उनका कोई सरोकार नहीं माना जा सकता।  हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार तो सन्यास का सीधा अर्थ संसार के भौतिक साधनों का पूरी तरह से त्याग करना ही है। सन्यास ग्रहण करने के बाद केवल प्रकृति से निर्मित वस्तुओं का ही उपभोग करना आवश्यक है ।  पहनना, ओढ़ना और सोना हमेशा ही प्रकृति प्रधान वस्तुओं का ही जुड़ा  होना चाहिये । वस्त्रों के रूप में मृगचर्म या फिर पेड़ के पत्तों को ओढ़ना चाहिये। भोजन में फल और कंदमूल का सेवन करना ही श्रेयस्कर माना जाता है।  कहने का अभिप्राय यह है कि मानव निर्मित वस्तुओं का उपभोग एक तरह से निषिद्ध है। देखा जाये तो सन्यास के इस रूप में आज के अनेक गुरु खरे नहीं उतरते।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
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प्राजापत्यां निरुप्येर्ष्टिसर्ववेदसदक्षिणाम्।
आत्मन्यग्नीसमारोप्य ब्राह्म्णः प्रव्रजेद्गृहात्।
       हिन्दी में भावार्थ-वानप्रस्थ आश्रम में रहने वाले को चाहिये कि वह अपनी सारी संपत्ति दान देने के साथ ही परमात्मा के प्रति धन्यवाद ज्ञापित करने के लिये यज्ञ का आयोजन करे। इसके पश्चात् आत्मज्ञान की ज्योति को जलाकर सन्यास के लिये प्रस्थान करे।
यो दत्वा सर्वभूतेभ्यः प्रव्रजत्यभवं गृहात्।
तस्य तेजोमया लोक भवन्ति ब्रह्मवादिनः।
        हिन्दी में भावार्थ-सभी जीवों को अभयदान देकर वानप्रस्थ के लिये  सन्यास ग्रहण करने वालों को तेजपूर्ण लोकों की प्राप्ति होती है।
         सन्यासी को न तो किसी निंदा करना चाहिये न किसी के व्यक्ति के मन में भय पैदा कर उसका हृदय अपने अनुकूल बनाने के प्रयास करना चाहिये।  उसे किसी की मधुर वाणी पर मुग्ध और कटु वाणी पर क्रुद्ध होने के भाव से भ परे होना चाहिये।  जबकि इसके विपरीत हम देख रहे हैं कि जिन्होंने धर्म क्षेत्र में शिखर पर अपनी जगह बनाई है वह आम लोगों में उसका प्रभाव भी दिखाते हैं।  राजसी पुरुषों के अपने शिष्य होने के दावे के प्रचार   के लिये वह उनके साथ खिंचवाये गये फोटो की प्रदर्शनी भी लगाते हैं।  अनेक कथित धर्मगुरु यह कहते थकते नहीं कि वह तो सन्यासी हैं पर अपने पास आने वालों लोगों को वह उनके स्तर के अनुसार दर्शन देते हैं।  अनेक गुरु तो आम तथा विशिष्ट लोगों को दर्शन देने के लिये अलग अलग स्थान निर्धारित करते हैं।  हम उन लोगों की निंदा नहीं कर रहे। हमारा कहना तो यह है कि धर्म के क्षेत्र में उनका यह पेशा है और यह कोई बुराई नहीं है।  हमारा उद्देश्य तो यह बता कहना है कि किसी को वस्त्र, वाणी, या व्यक्तितत्व देखकर उसे सन्यासी मानकर उसके सामीप्य प्राप्त करने का प्रयास नहीं करना चाहिये।  ऐसे में हम अपने जीवन में आये भटकाव से बच नहीं सकते क्योंकि उन पेशेवर साधुओं के पास कोई ऐसी युक्ति नहंी है जिससे  मनुष्य तनाव से बच सकते।  इसके लिये सबसे बेहतर उपाय तो यही है कि अपने अध्यात्मिक ग्रंथों का स्वयं ही अध्ययन करें। उसके संदेशों को समझकर जीवन के प्रति अपना उचित दृष्टिकोण बनाये।  अध्यात्मिक चिंत्तन और मनन की यह प्रक्रिया स्वतः ही मस्तिष्क में वैचारिक स्फृर्ति पैदा करती है और हमें किसी अन्य से राय लेने से बचाती है ।
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 



यह ब्लाग/पत्रिका विश्व में आठवीं वरीयता प्राप्त ब्लाग पत्रिका ‘अनंत शब्दयोग’ का सहयोगी ब्लाग/पत्रिका है। ‘अनंत शब्दयोग’ को यह वरीयता 12 जुलाई 2009 को प्राप्त हुई थी। किसी हिंदी ब्लाग को इतनी गौरवपूर्ण उपलब्धि पहली बार मिली थी। ------------------------

Sunday, April 28, 2013

मजदूर दिवस-चाणक्य का धन के संबंध में दिया गया संदेश आज भी प्रासंगिक (mazdoor diwal or divas-chankya ka dhan ke sambandh mein diya gaya sandesh aaj bhee prasngik)

          हमारे देश में भारतीय अध्यात्म से प्रथक अनेक विदेशी विचारधाराओं ने लोगों के मनमस्तिष्क में घर कर लिया है। माना जाता है कि भारतीय अध्यात्म का दर्शन केवल बघारने के लिये है और उसके सिद्धांतों का अब कोई व्यवाहारिक महत्व नहीं है।  अनेक बुद्धिमानों ने  योजनाबद्ध ढंग से  साम्यवादी, प्रगतिवादी तथा समाजवादी विचाराधाराओं को  क्रम से यह कहकर स्थापित करने का प्रयास किया है कि उनके अनुसार गरीबों और असहायों को मदद मिलनी चाहिये।  जब यह बुद्धिमान इन विदेशी विचाराधाराओं का गुणगान करते हैं तो उनका संबोधन समाज नहीं वरन् राज्य व्यवस्था की तरफ होता है। उनका मानना है कि मनुष्य समाज तो एक दम संवदेनहीन होता और उसे राज्य के दंड से ही नियंत्रित किया जा सकता है।
           इसके विपरीत भारतीय अध्यात्म दर्शन समाज को संबोधित करता है। उसका मानना है कि अगर समाज स्वतः नियंत्रित होगा ता अधिक शक्तिशाली होगा। यही कारण है कि भारतीय अध्यात्म दर्शन ने ही हमेशा दान की प्रवृत्ति का संदेश दिया हैं। हमारे देश के बुद्धिमान लोग उसका आशय केवल मुफ्त में किसी गरीब को देना मानते हैं। इतना ही नहीं  यह समाज के धनी लोगों के विवेक पर ही निर्भर है जबकि हमारे बुद्धिमान मानते हैं कि जिसके पास राज्य दंड नहं है वह संवेदनशील हो ही नहीं सकता।  दरअसल इस दान की महिमा के लिये पुण्य का लाभ मिलने की बात अवश्य हमारा दर्शन कहता है पर उसका कोई रूप स्पष्ट नहीं किया है।  यह पुण्य केवल  अगले जन्म या इस जन्म में प्रत्यक्ष मिलता हो ऐसा दावा हमारा दर्शन नहीं करता।  इस दान की प्रवृत्ति को उकसाने के पीछे हमारे विद्वान मनीषियों का आशय यही रहा है कि इससे समाज में समरसता और शंाति रहे। जिनके पास धन है वह अपने से कमतर व्यक्ति को उसकी सेवा या वस्तु प्रतिफल या दान में देते रहें ताकि वह कभी भूखे न रहें। अगर वह भूखे या निराश होंगे तो समाज को कहीं न कहीं उनके विद्रोह का सामना करना पड़ता है। इससे अशांति फैलती है। अगर धनी मनुष्य अपने समाज के गरीब लोगों का ख्याल रखता है तो उसके धन देने की प्रक्रिया को भले ही दान कहें पर इससे जो शांति बनी रहती है वह उसके लिये पुण्य के रूप  में प्रतिफल ही होता है।
चाणक्य नीति में कहा गया है कि
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उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणाम्।
लडागोदसंस्थानां परीवाह इवाऽम्भासाम्।।
       हिन्दी में भावार्थ-अर्जित धन का त्याग करने से ही उसकी रक्षा हो सकती है। जैसे तालाब में जमा जल को बाहर निकालने पर उसकी रक्षा होती है।
      चाणक्य महाराज के इस संदेश का विस्तार से अर्थ समझें तो यह स्पष्ट है कि जिन लोगों को पास अधिक धन है वह इस गुमान में कतई नहीं रहें कि वह उसका केवल संग्रह कर अपनी तथा परिवार की रक्षा कर सकते हैं।  उनको अपने आसपास रह रहे लोगों को खुश रखने के लिये भी कुछ व्यय करते रहना चाहिये।  ताकि वह निराशा और हताशा से उनकी तरफ वक्र दृष्टि न डालें।  इतना ही नहीं जब वह धनिकों पर निर्भर रहेंगे तो उनकी रक्षा के लिये भी तैयार रहेंगे।  अगर धनी ऐसा नहीं करेंगे तो निश्चित रूप से न उनका धन और नही परिवार सुरक्षित रह सकता है। एक तरह से यह चाणक्य का समाजवादी सिद्धांत है जिसके लिये अधिक लिखने की आवश्यकता नहीं है।
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 



Sunday, April 21, 2013

सर्वरक्षक आत्मा का स्मरण करें-यजुर्वेद (sarvarakshak aatma ka smaran kar-yajurved)

       पूरे विश्व समाज  में सोने  को अत्यंत महंगी धातु माना जाता है। हैरानी की बात यह है कि सोना किसी का पेट न भर सकता है न गले की प्यास  बुझा सकता है फिर भी  लोग उसे पाने को आतुर रहते है।  खासतौर से महिलाओं को सोने के आभूषण पहनने का शौक रहता है।  अपने आप में यह आश्चर्य की बात है कि जिस अन्न से मनुष्य का पेट भरता है उसे कोई सम्मान से नहीं देखता।  इतना ही नहीं जिस अन्न को प्रसाद मानकर खाना चाहिये लोग उसे मजबूरी समझ कर खाते हैं क्योंकि उसके बिना शरीर नहीं चल सकता।   अधिकतर मनुष्य भोजन कर शरीर इसलिये चलाना चाहते हैं कि अधिक से अधिक दैहिक रूप सक्रिय होकर धन संचय कर सकें। इस द्रव्य धन का सर्वश्रेष्ठ भौतिक रूप सोना ही है।  आज के विश्व समाज में सोने  का उपयोग कागजी मुद्रा को भौतिक रूप में स्थिर रखने के लिये किया जाता है।  इसी सोने के पात्र में जीवन का सच छिप जाता है।  यह संसार बिना अधिक धन संपदा, भूमि तथा अन्य भौतिक साधनों के भी स्वर्ग हो सकता है यह तथ कोई सिद्ध या ज्ञान साधक ही समझ सकता है।  
यजुर्वेद में कहा गया है कि
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हिरण्मपेन पवित्र सत्यस्थापिहितं सुखम्।
हिन्दी में भावार्थ-सोने के पात्र से सत्य ढका हुआ है।
वापुरनिलमृतथेदं भस्मान्थमशरीरम्।
क्रततो स्मद।।
क्लिवे स्मर।
कृथ्स्मर।।
हिन्दी
में भावार्थ-प्राण अपार्थिव अमृत हैं जबकि यह शरीर अंततः भस्म हो जाता है। अतः सर्वरक्षक आत्मा का स्मरण कर। अपनेअंदर स्थित कर्म करने वाला पुरुष का स्मरण कर।
       हमारी देह में विराजमान ही आत्म ही वास्तविक स्वर्ण है। यही वह अमृत है जिसका स्मरण करना चाहिये।  निरंतर बहिर्मुखी होने से मनुष्य बाह्य विषयों में सिद्धहस्त हो जाता है पर आंतरिक विषयों के बारे में उसका अज्ञान अंततः उसके लिये घातक होता है। आजकल लोगों के पास भौतिक साधनों का जमावड़ा तो हो गया है पर फिर भी कोई खुश नहीं दिखता। मानसिक तलाव के चलते लोग राजरोगों का शिकार होते जा रहे हैं।  समस्या यह भी है कि शारीरिक रूप से लोग अपने विकारों की चर्चा तो कर सभी को बता देते हैं पर उससे उनकी मानसिकता में  जिंदगी के प्रति उत्पन्न  नकारात्मक  भाव की  अनुभूति प्रत्यक्ष नहीं दिखती पर उनका आचरण तथा व्यवहार पर उसका दुष्प्रभाव अवश्व ही पड़ता है।  यही कारण है कि लोगों को दूसरों के द्वंद्व में मनोरंजन, पीड़ा में सनसनी और व्यसनों में ताजगी का अनुभव हेाता है।  आध्यात्कि विषय पर चर्चा उनके लिये केवल समय नष्ट करना ही होता है।  अपने मन के वेग से भौतिक संपदा के पीछे भाग रहे लोग अपनी आत्मा से साक्षात्कार तो दूर उसका विचार तक नहीं करते।
      जिन लोगों के हृदय में  शारीरिक तथा मानसिक रूप से स्वस्थ् रहने की इच्छा है उनको अंतमुखर््ी होकर योगासन, प्राणायाम, ध्यान और मंत्र जाप में अवश्य लगना चाहिये।  अंतमुर्खी  होकर अध्ययन करने से संसार के विषयों में स्वतः प्रवीणता आती हे पर बहिमुर्खी रहकर सांसकिर विषयों में लिप्त रहने से अध्याित्मक ज्ञान नहीं आ सकता।  जब भौतिकता से मोहभंग होता है तब अध्यात्मिक ज्ञान के अभाव  में मनुष्य निराशा, हताशा और मानसिक विकृतियों का शिकार होकर अपना जीवन दाव पर लगा देता है।
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 



Monday, March 25, 2013

ऋग्वेद से संदेश-भोजन कर अपनी देह का आदर करें (rigved se sandesh-bhojan kar apne pet ka samman karen)

              हम अपनी इस देह की शक्ति के माध्यम से ही संसार को देखते, सुनते और अनुभव करते हैं।  यह सही है कि हर मनुष्य को अध्यात्मिक ज्ञान के इस सूत्र का अनुभव होना चाहिये कि हम आत्मा हैं पर साथ ही इसे धारण करने वाली देह तथा उसकी इंद्रियों पर ध्यान करना जरूरी है। हमारे अध्यात्मिक ज्ञान में योगासन, प्राणायाम और ध्यान के रूप में ऐसी विधाओं का सृजन किया गया है जिससे शरीर के साथ मन तथा बुद्धि जैसी अनियंत्रित प्रकृत्तियों को नियंत्रत कर जीवन गुजारने की सुविधा मिल जाती है।  संसार के मायावी विषयों का प्रभाव मनुष्य पर इतना बुरा पड़ता है कि उसकी बुद्धि केवल भौतिक संग्रह तक ही काम करती है। अनेक लोगों के पास तो इतना समय भी नहीं रहता कि वह अपनी देह के लिये हितकर विषय पर विचार करें।
          खाने के समय भी लोग सांसरिक विषय पर ही विचार करते हैं।  जहां चार लोग बैठकर खा रहे हों वहां बातचीत का दौर भी  चलता है।  संसार के मायावी विषयों में गहराई तक डूबे लोगों के लिये अपने पद, धन और और दैहिक शक्ति का बखान करना ही ज्ञान की परिधि में आता है और शांति से भोजन करना उनके लिये एक बेकार विषय है। हमारे अध्यात्मिक दर्शन में खाने को लेकर भी अनेक नियम हैं पर उन नियमों पर अब कोई ध्यान नहीं देता।
ऋगवेद में कहा गया है कि
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यजस्व तन्त्रं त्वस्वाम्।
हिन्दी में भावार्थ-अपने तन का भी पोषण कर उसका सत्कार करें।       
     मूल बात यह है कि खाना खाते समय मन में पवित्रता होना चाहिये। भोजन को प्रसाद की तरह ग्रहण करने से वह सहजहता से पच जाता है।  खाने का मतलब केवल पेट भरना ही नहीं होता बल्कि वह प्रक्रिया भी उस देह की पूजा करना है जो परमपिता परमात्मा की कृपा से प्राप्त हुई है।  खाते समय यह अनुभूति करना चाहिये कि मुंह में जाता हुआ भोजन हमारे शरीर को एक नई ऊर्जा दे रहा है।  उससे हमारे शरीर की शिथिल इंद्रियों को राहत अनुभव हो रही है। यह संसार संकल्प का खेल है जब हम इस तरह पवित्र विचार करते हुए अपनी दैहिक क्रियाओं में लिप्त रहेंगे तो हमारे कर्मो के फल भी पवित्र होंगे।  भोजन इस तरह न करें कि वह तो मजबूरी में करना ही है वरना हमारी देह को कष्ट होगा।  हमें यह सोचते हुए खाना चाहिये कि इससे हमारी देह पुष्ट होकर सांसरिक विषयों में हमें विजय दिलायेगी।
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 



Sunday, March 17, 2013

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-ज्ञानी जिसे सराहें वही काम करें (jis kam kee tarif karen vahi kaam karen-Kautilya ka arthshastra)

       प्रचार माध्यमों में-टीवी चैनल एवं समाचार पत्र पत्रिकाएँ-हमारे देश के प्रचलित  धर्मों के विषय पर लेकर अनेक प्रकार की बहस होती है। देश में कुछ बुद्धिमान इतने धर्मनिरपेक्ष हैं कि उनको भारतीय अध्यात्म में केवल जातिवाद और स्त्री शोषण के अलावा कुछ नज़र नहीं आता है।  यहां तक तो सब ठीक है पर धर्म को लेकर उनका नजरिया अजीब लगता है।  वह विश्व में अनेक धर्मो की उपस्थिति स्वीकार्य मानते हैं।  उनकी नजर में सभी धर्म समान हैं।  मतलब उनकी दृष्टि में धर्म केवल पूजा पद्धतियां ही हैं। यह अलग बात है की भारतीय धर्मों पर उनकी ड्रिसथी हमेशा वक्र ही रहती है।   जबकि  हमारा अध्यात्म दर्शन किसी विशेष पूजा पद्धति का न तो समर्थन करता है न विरोध।  वह तो नैतिक आचरण को ही धर्म मानता है।  मूल बात भी है कि हमारे प्राचीन धर्म तथा अध्यात्म ग्रंथों में धर्म को कोई नाम नहीं दिया गया है।  किसी व्यक्ति विशेष की सत्ता को स्वीकार न कर निरंकार कि उपासना को महत्व नहीं दिया गया है।
कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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यमाय्र्याः क्रियामाणं हिः शंसत्यागगमवेदिनः।
स धम्माय विगर्हन्ति तमधम्र्मं परिचक्षते।।

                  हिन्दी में भावार्थ-शास्त्र के ज्ञाता श्रेष्ठ पुरुष जिस कार्य की प्रशंसा करें वही धर्म है और जिसकी निंदा करें वही अधर्म हैं।
       हम जब विदेशी विचाराधाराओं को देखते हैं तो वह पूजा पद्धतियों को ही धर्म माना जाता हैं।  इतना ही नहीं मानवीय जीवन में उनका हस्तक्षेप इतना है कि खानपान, रहन सहन और भाषा को भी धर्म से जोड़ दिया जाता है जबकि उनका आधार प्रकृति के अनुसार तय होता है। इसका सीधा मतलब यह है कि पाश्चात्य विचाराधारायें मनुष्य के बाह्य रूप के आधार पर धर्म का स्वरूप तय करती हैं और इस देह को धारण करने वाला आत्मा जिसे हम अध्यात्म भी कह सकते हैं कोई अर्थ नहीं रखता।  हमारा अध्यात्मिक ज्ञान देह और आत्म दोनों के सत्य को धारण करता है। इतना ही नहीं विदेशी  विचारधाराओं में पूजापद्धति से  मेल न रखने वाले व्यक्तियों को निंदनीय माना जाता है।  यही कारण है कि पूरे विश्व में धर्म के आधार पर वैमनस्य बढ़ता जा रहा हैं इसके विपरीत भारतीय दर्शन अध्यात्म ज्ञान को संचित करता है।  इसमें यह माना जाता है कि मनुष्य अपनी देह और उसमें विराजमान मन, बुद्धि के साथ अहंकार की प्रवृत्ति पर नियंत्रण कर एक सुविधाजनक जीवन बिता सकता है। किसी विशेष प्रकार की पूजा पद्धति अपनाने या वस्त्र पहनने की बात उनमें नहीं है।  भारतीय अध्यात्म दर्शन  मनुष्य को आत्म निर्माण के लिये प्रेरित करता है।  इसके विपरीत विदेशी विचाराधारा समाज निर्माण की बात करती है जबकि व्यक्ति निर्माण के बिना ऐसा करना कठिन है।  यही कारण है कि भारतीय अध्यात्म दर्शन वैज्ञानिक है।  कथित रूप से सभी धर्मों की बात कहना अपने आप में इसलिये अजीब लगता है क्योंकि धर्म का कोई नाम नहीं होता।  नैतिक आचरण में पवित्रता रखना, विचारों में शुद्धता तथा परोपकार की भावना ही धर्म का प्रमाण है। भारतीय अध्यात्म विद्वान इसी आधार पर धर्म और अधर्म का रूप तय करते हैं कि उसके नाम से पहचानते हैं।
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 



Sunday, March 3, 2013

विदुर नीति-शीलवान पुरुष ही समाज पर विजय प्राप्त कर सकता है (sheelwan purush hee samaj par vijay prapt kar sakta hai-vidur neeti)

                आमतौर से हमारे समाज में यह भ्रम प्रचारित किया जाता है कि स्त्री को ही चरित्रवान होना चाहिए।  अपने चरित्र और मान की रक्षा करना उसकी ही स्वयं की जिम्मेदारी है।  कुछ लोग तो यह भी कहते है कि नारी का चरित्र और सम्मान  मिट्टी या कांच के बर्तन की तरह होता है, एक बार टूटा तो फिर नहीं बनता जबकि पुरुष का चरित्र और सम्मान पीतल के लोटे की तरह होता है एक बार खराब हुआ तो फिर मांजकर वैसी ही दशा में आ जाता है।  संभवतः यह कहावत राजसी मानसिकता के लोगों की देन है।  सात्विकत लोग इसे नहीं मानते।  ऐसा लगता है कि समाज की सच्चाईयों और मानसिकता को समझने का नजरिया अलग अलग है।  कुछ लोगों ने पुरुष की मनमानी को सहज माना है और औरत को सीमा में रहने की सलाह दी है। मगर कुछ कुछ विद्वान मानते हैं कि अंततः समस्त मनुष्य जाति के लिये ही उत्तम आचरण आवश्यक है। यही उत्तम आचरण ही वास्तविकता में धर्म है।
विदुर नीति में कहा गया है कि
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जिता सभा वस्त्रवता मिष्ठाशा गोमाता जिता।
अध्वा जितो यानवता सर्व शीलवता जितम्।।
   हिन्दी में भावार्थ-अच्छे कपड़े पहनने वाला सभा, गाय पालने वाला मीठे स्वाद की इच्छा और सवारी करने वाला मार्ग को जिस तरह जीतने वाला मार्ग को जीत लेता है उसी तरह शीलवान पुरुष समाज पर विजय पा लेता है।

शीलं प्रधानं पुरुषे तद् यस्येह प्रणश्यति।
न तस्य जीवितेनार्थो न धनेन न बन्धुभिः।।
   हिन्दी में भावार्थ-किसी पुरुष में शील ही प्रधान है। जिसका शील नष्ट हो जाता है इस संसार में उसका जीवन, धन और परिवार से कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता।
        दरअसल जिन राजसी मानसिकता वाले लोगों ने पुरुष को श्रेष्ठ माना है उनको पता नहीं कि हम जिस धर्म की रक्षा की बात करते हैं उसमें पुरुष की शक्ति का सर्वाधिक उपयोग होता है।  वह शक्ति तभी अक्षुण्ण रह सकती है जब आचरण और विचारों में पवित्रता हो। पवित्र आचरण की प्रवृत्ति भी बाल्यकाल में माता पिता के प्रयासों से ही निर्मित हो सकती है।  जो पुरुष शीलवान नहीं है वह अंततः समाज के साथ ही अपने परिवार के लिये संकट का कारण बनता है।  समाज के लोग कलुषित आचरण वाले लोगों से दूरी बनाते है।  डर के मारे में वह सामने कुछ नहीं कहें पर अधर्म और अपवित्र आचरण वाले पुरुष की निंदा सभी करते हैं। अंतः यह भ्रम कभी नहीं पालना चाहिए कि पुरुष का आचरण कोई चर्चा का विषय नहीं है या उसकी प्रतिष्ठा अमरत्तव लिये हुए है।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Saturday, February 23, 2013

विदुर नीति-ईर्ष्या जैसी बीमारी का कोई इलाज नहीं(vidur neeti-eershya jaise bimari ko koyee ilaz nahin)

                 विश्व  समाज में अधिकतर लोगों की सहनशीलता कम ही होती है। इसका कारण मनुष्य में व्याप्त अहंकार का भाव है जिससे वह कहीं अपने को कमतर रूप में नहीं देखना चाहता। अनेक लोग कोई बड़ा लक्ष्य अपने हाथ में लेते हैं पर उसमें समय अधिक लगता है।  इस दौरान उन्हें अन्य लोगों के मुख से निकलने वाले व्यंग्य बाणों का सामना करना पड़ता है।  दूसरी बात यह कि लक्ष्य मिलने तक मनुष्य की उज्जवल छवि नहीं बन पाती इस कारण लोग मजाक भी बनाते है।  तब कुछ हल्की प्रवृत्ति के लोग आत्मप्रवंचना कर अपना लक्ष्य, उसकी प्राप्ति के साधन तथा सहायकों के नाम दूसरों को बताकर यह आशा करते हैं कि उनका काम पूरा होने तक सभी चुप रहेंगे।  वह इस बात का अनुमान नहीं कर पाते कि अपनी योजना जब दूसरों को बता देंगे तो फिर कोई भी उनकी लक्ष्य प्राप्ति में संकट उत्पन्न कर सकता है।  होता यही है और अधिकतर लोग अपनी नाकामी झेलते हैं।
          दूसरी बात यह कि कुछ लोग अपने लक्ष्य तो ऊंचे बनाते हैं पर साथ ही दूसरों का धन, रूप, पराक्रम, सुख और कुल देखकर अपने अंदर ईर्ष्या का भाव पाल लेते हैं।  यह ईर्ष्या का भाव मनुष्य की पराक्रम क्षमता के साथ ही मस्तिष्क की एकाग्रता को नष्ट करता है।  जिससे मनुष्य अपने लक्ष्य के पास तक नहीं पहुंच पाता है।  ईर्ष्या और आत्मप्रवंचना दोनों तरह की स्थिति मनुष्य को पतन की तरफ ढकेलती है।
         विदुर नीति में कहा गया है कि
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   य ईर्षुः परवित्तेषु रूपे वीर्य कुलान्वये।
सुखभौभाग्यसतकरि तस्य व्याधिरन्नतकः।।
             हिन्दी में भावार्थ-जिस मनुष्य में दूसरे का धन, रूप, पराक्रम, सुख और कुल देखकर ईर्ष्या होती है उसका कोई इलाज नहीं हो सकता।

अकार्यकरणाद् भीतःकार्यालणां च विवर्जनात्।
अकाले मन्त्रभेदाच्च येन माद्येत ततफ पिवेत्।।
             हिन्दी में भावार्थ-न करने योग्य काम करना, करने योग्य काम में प्रमाद का प्रदर्शन और कार्य को सिद्ध करने से पहले ही उसका मंत्र दूसरों का बताने से डरना चाहिए।     
   हम जब समाज की स्थिति को देखते हैं तो हास्यास्पद दृश्य सामने आता है। लोग अपने दुःख से कम दूसरे के सुख से अधिक दुःखी लगते हैं।  अपने अंदर कोई गुण न होने की कुंठा उन्हें दूसरे की निंदा करने के लिये प्रेरित करती है।  इसका मुख्य कारण यह है कि लोग अपने ही अध्यात्मिक ज्ञान से परे हैं।  अशांत मन लेकर मस्तिष्क को सहज मार्ग पर चलाना कठिन है। असहज मार्ग पर चलते हुए मनुष्य के विचार नकारात्मक हो जाते हैं। ऐसे में धन, वैभव और प्रतिष्ठा  के अधिक होने का सुख भोगना भी असहज हों जाता है। बड़े पद पर बड़ी जिम्मेदारी निभाना तो दूर छोटे पद की छोटी जिम्मेदारी निभाना भी मुश्किल लगता है।  ईर्ष्या से प्रतिस्पर्घा और प्रतिस्पर्धा से वैमनस्य पैदा होता है।  यही वैमनस्य हमारे समाज के बिखराव का कारण है। इसका समाधान यही है कि हम अपने अंदर भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के सिद्धांतों को समझें।
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Saturday, February 16, 2013

अथर्ववेद के आधार पर चिंत्तन-हृदय में सदैव पवित्र विचार रखें(thought on based on atharvaved-hridya mein hamesha pavitra vichar rakhen)

                 हमारी देह में स्थित इंद्रियों का अत्यंत महत्व हैं। इसमें कान, नाक, मुख, आंख तथा बुद्धि अत्यंत चंचल तथा विलासिताप्रिय होती हैं। उनमें उपभोग की प्रवृत्ति तो होती है पर रचनात्मक कार्यों के प्रति आलस्य का भाव रहता है।  इसे समझना जरूरी है। हम लोग भले ही यह सोचते हैं कि यह संसार ईश्वर के अनुसार चलता है पर सच यह है कि हमारे संकल्पों के अनुसार ही हमारा जीवन क्रम निर्मित होता है। जैसे हमारा विचार या संकल्प है वैसा ही हमारे सामने दृश्य घटित होता है। अगर दृश्य हमारे प्रतिकूल है तो हम दूसरों को दोष देते हैं। कभी भाग्य तो कभी भगवान की मर्जी बताकर आत्ममंथन से बचने का प्रयास करते हैं। कभी मित्र, कभी रिश्तेदार तो कभी परिवार के सदस्यों पर दोषारोपण कर यह मानते हैं कि हम और हमारा संकल्प तो हमेशा ही पवित्र रहता है। यह अज्ञान का प्रमाण है। आत्ममंथन की प्रक्रिया से दूर अज्ञानी लोग इसी कारण ही अपने जीवन में भारी कष्ट उठाते हैं।
अथर्ववेद में कहा गया है कि
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सुश्रतौ कर्णो भद्रश्रतौ कर्णो भद्र श्लोकं श्रुयासम्।
‘‘हमारे दोनो कान उत्तम विचार सुने। कल्याणकारी वचन तथा कल्याणकारी प्रशंसा सुनने को मिले।’’
बृहसपतिर्म आत्मा तृमणा यनाम हृद्यः।।
‘‘हमारी आत्मा ज्ञान युक्त हो और मनुष्य में मनन करने वाला हृदय पवित्र हो।’’
                जब हम परमात्मा का स्मरण करते हैं तो उससे सांसरिक विषयों में सफलता की ही मांग करते हैं जबकि यह संसार कर्म और फल के सिद्धांत के आधार पर यंत्रवत चलता है। आम बोयेंगे तो आम पैदा होगा और बबूल बोने पर कांटों का झाड़ हमारे सामने खड़ा होगा। ज्ञानी लोग यह जानते हैं पर अज्ञानियों का झुंड इससे बेखबर होकर सुख में प्रसन्न हेता है और दुःख में विलाप करता है। अपने मुख से अच्छी वाणी बोलना चाहिए तो अपने कानों से ऐसी बातें सुनना चाहिए जो सुख देने के साथ ही मन स्वच्छ करने वाली हो। अपनी आंखों से किसी के संताप का दृश्य देखने की चाहत की बजाय प्रकृति और संसार के विषयों में विराजमान सौंदर्य की तरफ अपनी दृष्टि रखना चाहिए। दूसरों की निंदा या दोष का अध्ययन करने की बजाय सभी के गुण देखकर उसकी प्रशंसा करने से मन पवित्र होता है। कहने का अभिप्राय यह है कि जैसी कल्पना और हमारा विचार होता है वैसी ही हमारे सामने घटनायें होती हैं। इसलिये जहां तक हो सके अच्छा देखो, अच्छा खाओ और अच्छा सोचो।
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Thursday, January 17, 2013

जो सुनना नहीं चाहता उसे ज्ञान देना बेकार-हिन्दू धार्मिक चिंत्तन

              हमारे देश में कहीं भी चले जायें जहां चार लोग मिल बैठेंगे वहां अपने अध्यात्म ज्ञान का बखान जरूर करेंगे। अगर हम इन चर्चाओं को देखें तो लगेगा कि इस देश में भ्रष्टाचार, बेकारी, भुखमरी जैसी समस्याओं के साथ ही समाज को नष्ट करने वाली पुरानी रूढ़िवादिता का अस्तित्व दिखना ही नहीं चाहिए। ऐसा हो नहीं रहा है। यहां तक कि पाश्चात्य शिक्षा पद्धति का अनुसरण भी इसलिये किया गया ताकि हमारा समाज विश्व के अन्य देशों की बराबर कर सके। हो इसका उल्टा रहा है। पाश्चात्य प्रणाली पर आधारित शिक्षा में नैतिक ज्ञान का अभाव है और इस कारण अधिक शिक्षित आदमी एक तरह से न तो घर का रह जाता है न घाट का! इसके विपरीत अशिक्षित तथा अल्प शिक्षित कम से कम अपने अध्यात्म दर्शन से तो जुड़े रहने का पाखंड तो कर ही लेते हैं। जहां तक ज्ञान और उसके अनुसरण का प्रश्न है तो समाज की स्थिति देखकर नहीं लगता कि हमारा नैतिक स्तर कोई ऊंचा है। भ्रष्टाचार के विषय में हमारा देश अग्रणी देशों में गिना जाता है।
                       विदुर नीति में कहा गया है कि
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                     असभ्यगपयुक्तं हि ज्ञानं सुकुशलैरपि।
                    उपलभ्यं चाविदितं विदितं चाननुष्ठिम्।।
             ‘‘विद्वान चाहे कितना भी प्रतिष्ठित क्यों न हो यदि उससे कर्तव्य का ज्ञान नहीं हुआ अथवा उस ज्ञान से उचित अनुष्ठान नहीं हुआ तो वह व्यर्थ ही है।
              नष्टं समुद्रे पतितं नष्टं वाक्यमश्रृ्ण्वति।
              अनामास्मनि श्रृतं नष्ट नष्ट हुतमनाग्निकम्।।
           ‘‘समुद्र में गिरी हुई कोई भी वस्तु नष्ट हो जाती है उसी तरह जो सुनता नहीं है उससे कही हुई बात भी नष्ट हो जाती है। अजितेंद्रिय पुरुष का शास्त्र ज्ञान और राख में किया हुआ हवन भी नष्ट हो जाता है।
           अगर एक राष्ट्र के रूप में चिंत्तन करें तो भले ही विश्व में हमारे देश को अध्यात्मिक गुरु माना जाता है पर जिस ज्ञान के आधार पर यह छवि बनी है उसके अनुरूप हमारे अनुष्ठान नहीं है। देश में जगह जगह धार्मिक कार्यक्रम और प्रवचन होते हैं। वहां आने वाले असंख्य लोगों को देखें तो पूरा देश ही धर्ममय लगता है पर जब अखबार या टीवी चैनल देखते हैं तो लगता है कि इतना अधर्म शायद ही विश्व में कहीं अन्यत्र होता हो। अपने अध्यात्मिक ज्ञान पर गर्व करने वाले अनेक महानुभाव मिल जायेंगे पर उसका अनुसरण करने वालों की संख्या नगण्य है। एक तरह से हम अपने महापुरुषों से प्राप्त ज्ञान को नष्ट करने में लगे हैं। सच बात तो यह है कि जब तक हमारा नैतिक और अध्यात्मिक स्तर नीचे हैं हमारे यज्ञ, हवन तथा अन्य धार्मिक कर्मकांड व्यर्थ है।
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Friday, January 4, 2013

अथर्ववेद से सन्देश- ॐ (ओम) शब्द अत्यंत मूल्यवान (om word as a gold, om shabd swarn ke saman-message of atharvaved se sandesh)


        श्रीमद्भागवत गीता में ओम (ॐ ) शब्द को परमात्मा का पर्याय माना गया है। अनेक ऋषियों, मुनियों और संतों ने माना है कि ओम शब्द का निरंतर वाणी और मन से उच्चारण करने पर हृदय में पवित्र विचार आते हैं।  बुद्धि और मन शुद्ध होकर सकारात्मक कार्यों के लिये प्रवृत्त होता हैं।  ओम शब्द के वाणी से उच्चारण करने पर शरीर के सारे अंगों पर ऐसा प्रभाव होता है कि अंतर्मन में अद्भुत प्रकाश दीप प्रज्जवलित हो उठता है। उनके विचार तथा व्यवहार में यह प्रकाश विसर्जित दूसरे लोगों को भी प्रसन्नता देता हैं जिन लोगों को संस्कृत के श्लोक मन ही मन दोहराने में परेशानी होती है वह चाहें तो केवल ओम शब्द का जाप करें।
अथर्ववेद में कहा गया है कि
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त्रयः सुपर्णास्त्रिवृता यदायत्रेकाक्षस्मभि-संभूय शका शका।
प्रत्यौहन्मृत्युमृतेन सत्कमन्तर्दधान्त दुरितानी विश्वा।।
        हिन्दी में भावार्थ-जब समर्थ तीन सुवर्ण तिहरे होकर एक अक्षर में सब प्रकार मिल रहे हैं। वे अमृत के साथ सब अनिष्टों को मिटाकर मृत्यु को दूर करते हैं।
     योगासन के दौरान या बाद में ओम शब्द का उच्चारण करने से शरीर में एक अद्भुत रोमांच का अनुभव होता है। ओम शब्द के उच्चारण से वाणी, विचार और व्यवहार में जो स्वर्णिम परिवर्तन आता है उसकी अनुभूति इसका नियमित जाप करने पर ही पता चल सकती है। प्रयोगों से यह बात सिद्ध हो जाती है कि ओम शब्द का निरंतर जाप करने वालों के अंदर गुणात्मक रूप से परिवर्तन आते हैं जो उसके जीवन को उज्जवल पक्ष की तरफ ले जाते हैं।  यह प्रमाण विदेशी अनुसंधानकर्ताओं ने ही प्रस्तुत किया है।  अतः जिन लोगों को अपने जीवन, विचार तथा व्यवहार को प्रकाशमय बनाना है उन्हें ओम शब्द का दीपक अपने मन में स्थापित करना चाहिए। जब हम नियनित  रूप से ॐ  शब्द का जाप करेंग तब निश्चित रूप से दिव्यानुभूति होंगी।
लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Writer-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh

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Thursday, December 27, 2012

मनु स्मृति-बिना कुल्ला किये बाहर न जाएँ

         पूरे विश्व में सोना स्त्रियों की कमजोरी है तो अपराधियों के लिये आकर्षण की वस्तु  है।  देखा जाये तो सोना किसी का काम नहीं है पर फिर भी इसकी कीमत का महत्व इतना है कि किसी आदमी की प्रशंसा करनी हो तो उसे सोने के समान कहा जाता है। स्वयं को दूसरों के सामने स्वयं को श्रेष्ठ प्रमाणित करना मनुष्य का स्वभाव होता है। अनेक लोग दूसरे मनुष्यों का ध्यान अपनी तरफ खींचने के लिये उच्छृंखलता का व्यवहार करते हैं। कुछ अपनी उद्दंण्डता से स्वयं को शक्तिशाली साबित करना चाहते है। दरअसल इस प्रयास में अनेक लोग ऐसे निंदनीय कार्य करते हैं जिनका आभास ज्ञान न होने के कारण उनको नहीं होता। आमतौर से सोने का हार पहनना स्त्री जाति के लिये एक धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा रही है। वह भी उसे अपने वस्त्रों के पीछे छिपाये रहती हैं या उसे ऐसे पहनती हैं कि हार का पूरा भाग दूसरे को नहीं दिखाई दे। अब तो पुरुष जाति में भी सोने की चैन पहनने का रिवाज प्रारंभ हो गया है। तय बात है कि यह सब दिखाने के लिये है और इसलिये जो पुरुष सोने की चैन पहनते है उसे वस्त्रों के बाहर प्रदर्शित करते हैं। मनुस्मृति में इसे निंदनीय कार्य बताया गया है।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
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न विगृह्य कर्था कुर्याद् बहिर्माल्यं न धारयेत्।
गवां च यानं पृष्ठेन सर्वथैव विगर्हितम्।।
               ‘‘उच्छृ्रंखल पूर्व बातचीत करने, प्रदर्शन के लिये कपड़ो के बाहर सोने की माला पहनना और बैल की पीठ पर सवारी करना निंदनीय कार्य हैं।’’
सर्वे च तिलसम्बद्धं नाद्यादस्तमिते रवी।
न च नग्न शयीतेह च योच्छिष्ट क्वच्तिद्व्रजेत्।
             ‘‘सूर्यास्त होने के बाद तिलयुक्त पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए और न ही नग्न होकर पानी पीना चाहिए। जूठे मुंह यानि बिना कुल्ला किये बाहर भी नहीं जाना चाहिए।’’
          यह तो केवल एक उदाहरण है जबकि हम समाज की दिनचर्या में कई ऐसे तथ्य देख सकते हैं जिसमें लोग आचरणहीनता दर्शाने वाले विषयों को फैशन मानने लगे हैं। बातचीत में अनावश्यक रूप से उग्र भाषा का प्रयोग करना अथवा जोरदार आवाज में बोलकर अपनी बात को सही प्रमाणित करना इसी श्रेणी में आता है। अनेक लोगों की तो यह आदत है वह वार्तालाप के समय हर वाक्य के साथ गाली का प्रयोग करते हैं बिना यह जाने कि इसका उपस्थित श्रोताओं पर विपरीत प्रभाव होता है। मनुस्मृति का अध्ययन करने पर अनेक ऐसे कामों से बचा जा सकता है जिनके दुष्प्रभावों से अवगत न होने पर हम उनको करते हैं।
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Monday, December 24, 2012

मलूकदास का दर्शन-वेश धारण करने से कोई साधु नहीं बन जाता


         हमारे देश के लोगों की प्रकृति इस तरह की है उनकी अध्यात्मिक चेतना स्वतः जाग्रत रहती है। लोग पूजा करें या नहीं अथवा सत्संग में शामिल हों या नहीं मगर उनमें कहीं न कहीं अज्ञात शक्ति के प्रति सद्भाव रहता ही है। इसका लाभ धर्म के नाम पर व्यापार करने वाले उठाते हैं। स्थिति यह है कि लोग अंधविश्वास और विश्वास की बहस में इस तरह उलझ जाते हैं कि लगता ही नहीं कि किसी के पास कोई ज्ञान है। सभी धार्मिक विद्वान आत्मप्रचार के लिये टीवी चैनलों और समाचार पत्रों का मुख ताकते हैं। जिसे अवसर मिला वही अपने आपको बुद्धिमान साबित करता है।
            अगर हम श्रीमद्भागवत गीता के संदेशों के संदर्भ में देखें तो कोई विरला ही ज्ञानी की कसौटी पर खरा उतरता है। यह अलग बात है कि लोगों को दिखाने के लिये पर्दे या कागज पर ऐसे ज्ञानी स्वयं को प्रकट नहीं करते। सामाजिक विद्वान कहते हैं कि हमारे भारतीय समाज एक बहुत बड़ा वर्ग धार्मिक अंधविश्वास के साथ जीता है पर तत्वज्ञानी तो यह मानते हैं कि विश्वास या अविश्वास केवल धार्मिक नहीं होता बल्कि जीवन केे अनेक विषयों में भी उसका प्रभाव देखा जाता है।
                  संत मलूक जी कहते हैं कि
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भेष फकीरी जे करै, मन नहिं आये हाथ।
दिल फकीरी जे हो रहे, साहेब तिनके साथ।
          ‘‘साधुओं का वेश धारण करने से कोई सिद्ध नहीं हो जाता क्योंकि मन को वश करने की कला हर कोई नहीं जानता। सच तो यह है कि जिसका हृदय फकीर है भगवान उसी के साथ हैं।’’
               ‘‘मलूक’ वाद न कीजिये, क्रोधे देय बहाय।
              हार मानु अनजानते, बक बक मरै बलाय।।
          ‘‘किसी भी व्यक्ति से वाद विवाद न कीजिये। सभी जगह अज्ञानी बन जाओ और अपना क्रोध बहा दो। यदि कोई अज्ञानी बहस करता है तो तुम मौन हो जाओ तब बकवास करने वाला स्वयं ही खामोश हो जायेगा।’’
             हमारे यहां धार्मिक, सामाजिक, कला तथा राजनीतिक विषयों पर बहस की जाये तो सभी जगह अपने क्षेत्र के अनुसार वेशभूषा तो पहन लेते हैं पर उनको ज्ञान कौड़ी का नहीं रहता। यही कारण है कि समाज के विभिन्न क्षेत्रों के शिखरों पर अक्षम और अयोग लोग पहुंच गये हैं। ऐसे में उनके कार्यों की प्रमाणिकता पर यकीन नहीं करना चाहिए। मूल बात यह है कि अध्यात्मिक ज्ञान या धार्मिक विश्वास सार्वजनिक चर्चा का विषय कभी नहीं बनाना चाहिए। इस पर विवाद होते हैं और वैमनस्य बढ़ने के साथ ही मानसिक तनाव में वृद्धि होती है।
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