Thursday, October 15, 2009

मनु स्मृति-धर्म का नाम नहीं पर पहचान हैं दस लक्षण (ten point of hindu religion-manu smriti in hindi)

मनु स्मृति में कहा गया है कि
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धृति क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रिवनिग्रहः।
धीविंद्या सत्यमक्रोधी दशकं धर्मलक्षणम्।।

      हिंदी में भावार्थ-धैर्य, क्षमा, मन पर नियंत्रण, चोरी न करना, मन वचन तथा कर्म में शुद्धता,इंद्रियों पर नियंत्रण, शास्त्र का ज्ञान रखना,ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करना, सच बोलना, क्रोध और अहंकार से परे होकर आत्मप्रवंचना से दूर रहना-यह धर्म के दस लक्षण है।
दक्ष लक्षणानि धर्मस्य व विप्राः समधीयते।
अधीत्य चानुवर्तन्ते वान्ति परमां गतिम्।।

      हिंदी में भावार्थ-जो विद्वान दस लक्षणों से युक्त धर्म का पालन करते हैं वे परमगति को प्राप्त होते हैं।
      वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हमारे अध्यात्मिक ग्रंथों में किसी धर्म का नाम देखने को नहीं मिलता है। अनेक स्थानों पर कर्म को ही धर्म माना गया है अनेक जगह मनुष्य के आचरण तथा  लक्षणों से पहचान की जाती है। कहने को तो यह भी कहा जाता है कि हमारा धर्म पहले सनातन धर्म से जाना जाता था पर इसे हम यूं भी कह सकते हैं कि इंसान को इंसान की तरह जीने की कला सिखाने वाला हमारा धर्म ही सनातन काल से चला आ रहा है। धर्म का कोई नाम नहीं होता बल्कि इंसानी कि स्वाभाविक वृत्तियां ही धर्म की पहचान है। इस संसार में विभिन्न प्रकार के इंसान हैं पर वह  मनु द्वारा बताये गये धार्मिक लक्षणों पर चलते हैं  तभी वह धर्म मार्ग पर स्थित माने  जा सकते हैं। हमें इन लक्षणों का अध्ययन करना चाहिये। इसका ज्ञान होने पर यह देखने का प्रयास नहीं करना चाहिए  कि कोई दूसरा व्यक्ति धर्म मार्ग पर स्थित है या नहीं  वरन् हमें स्वयं देखना है कि हमारा अपना  मार्ग कौनसा है?
      वैसे हमारे देश में जगह जगह ज्ञानी मिल जायेंगे। बड़ों की बात छोड़िये आम आदमियों में भी ऐसे बहुत लोग हैं जो खाली समय बैठकर धर्म की बात करते हैं। ज्ञान की बातें इस तरह करेंगे जैसे कि उनको महान सत्य बैठ बिठाये ही प्राप्त हो गया है। मगर जब आचरण की बात आती है तो सभी कोरे साबित हो जाते हैं। कहते हैं कि जैसे लोग और जमाना है वैसे ही चलना पड़ता है। अपने मन पर नियंत्रण करना बहुत सहज है पर उससे पहले यह संकल्प करना पड़ता है कि हम धर्म का मार्ग चलेंगे। धर्म की लंबी चैड़ी व्याख्यायें नहीं होती। परिस्थतियों के अनुसार खान पान में बदलाव करना पड़ता है और उससे धर्म की हानि या लाभ नहीं होता। वैसे खाने, पीने में स्वाद और पहनावे से आकर्षक  दिखने का विचार छोड़कर इस बात पर ध्यान देना चाहिये कि हमारे स्वास्थ्य के लिये क्या हितकर है? दूसरा क्या कर रहा है इसे नहीं देखना चाहिये और जहां तक हो सके अन्य लोगो के कृत्य पर टिप्पणियां करने से भी बचें। जहां हम किसी की निंदा करते हैं वहां हमारा उद्देश्य बिना कोई परोपकार का काम किये बिना स्वयं को श्रेष्ठ साबित करना होता है। यह निंदा और आत्मप्रवंचना धर्म विरुद्ध है। सबसे बड़ी बात यह है कि एक इंसान के रूप में अपने मन, विचार, बुद्धि तथा देह पर निंयत्रण करने की कला का नाम ही धर्म है और मनु द्वारा बताये गये दस लक्षणों से अलग कोई भी दृष्टिकोण धर्म नहीं हो सकता। .........................................
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, Gwlior
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Wednesday, October 14, 2009

विदुर नीति-दूसरे के अधिकार का हनन अनुचित (doosre ka haq marna galat-vidur niti)

विदुर नीति में कहा गया है कि
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हरणं च परम्वानां परदाराभिमर्शनम्।
सुहृदश्चय परित्यागस्त्रयो दोषाः क्षमावहा।।

           
हिंदी में भावार्थ-दूसरे के धन का हरण,  परायी स्त्री से संपर्क रखना तथा सहृदय मित्र का त्याग-यह तीन दोष आदमी का नाश कर देते हैं।

द्वाविमौ पुरुषौ राजन् स्वर्गस्योपरि तिष्ठतः।
प्रभुश्चक्षमया युक्तो दरिद्रश्च प्रदानवान्।।

           
हिंदी में भावार्थ-शक्तिशाली होने पर भी क्षमा करने तथा दरिद्र होने पर भी दान करने वाला मनुष्य स्वर्ग से भी ऊपर स्थान पाता है।

            वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-आजकल सबसे बड़ी समस्या यह है कि आदमी अपने गुण दोषों पर ध्यान नहीं देता। दूसरे के हक मारने से लोग तब रुकें जब उनके पास इतनी चिंतन क्षमता हो कि वह अच्छाई बुराई का निर्णय कर सकें। सभी को अपने स्वार्थ का भान है दूसरे के अधिकार पर कौन ध्यान देता है? हमने कई बार सुना होगा कि किसी ने अनुसंधान से कोई अविष्कार किया तो किसी दूसरे ने अपने नाम से उसे प्रचारित किया। उसी तरह अनेक लोग दूसरों की मौलिक रचनायें अपने नाम से छापकर गर्व महसूस करते हैं। कई लोग दूसरे के परिश्रम के रूप में देय मूल्य से मूंह फेरे जाते हैं या फिर कम देते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि दूसरे का अधिकार मारने में कोई नहीं झिझकता। यह कोई नहीं समझता कि इसका परिणाम कहीं न कहीं भोगना पड़ता है।
      मनुष्य की शक्ति की पहचान उसकी सहनशीलता में है न कि हिंसा का प्रदर्शन करने में। जिसमें शारीरिक शक्ति और मानसिक दृढ़ता की कमी होती है वह बहुत जल्द हिंसक हो उठते हैं। जिन लोगों के पास शक्ति और धीरज है वह क्षमा करने में अधिक विश्वास करते हैं। उसी तरह आजकल धनलोलुपों का हाल है। सभी धन के पीछे अंधे होकर भाग रहे हैं। दिखाने के लिये वह धन का दान भले ही करते हों पर उनके लिये पुण्य कमाना दुर्लभ है क्योंकि उनका धन उचित मार्गों से नहीं अर्जित किया गया। सच तो यह है कि जो मिलबांटकर खाते हैं उनको ही पुण्य मिलता है। जो दरिद्र है वह जब दान करता है तो उसका स्थान स्वर्ग से भी ऊंचा हो जाता है। संकलक एवं  व्याख्याकार-दीपक भारतदीप
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Tuesday, October 13, 2009

मनु स्मृति-अधिक भोजन से आयु का क्षय होता है (bhojan aur ayu-manu sandesh)

मनु महाराज कहते हैं कि
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पूजयेदशनं नित्यमद्याच्चैतदकुत्सन्।
दृष्टया हृध्येत्प्रसींदेच्च प्रतिनदेच्य सर्वेशः।
हिंदी में भावार्थ-
थाली में सजकर जैसा भी भोजन प्राप्त हो उसे देखकर अपने मन में प्रसन्नता का भाव लाना चाहिये। ऐसा अच्छा भोजन हमेशा प्राप्त हो यह कामना हृदय में करना चाहिए।
अनारोगयमन्तयुरूयमस्वगर्यं चारिभोजनम्।
अपुण्यं लोकविद्विष्टं तस्मात्त्परिर्जयेत्।।
हिंदी में भावार्थ-
मनुमहाराज कहते हैं कि भूख से अधिक भोजन करना  देह के लिये अस्वास्थ्यकर है। इससे आयु कम होने के साथ ही पुण्य का भी नाश होता है। दूसरे लोग अधिक खाने वाले की निंदा करते या मजाक उड़ाते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जब सामने थाली में भोजन आता है तो उसे देखकर हमारे मन में कोई न कोई भाव अवश्य आता है। सब्जी मनपंसद हो तो अच्छा लगता है और न हो तो निराशा घेर लेती है। भोजन पसंद का न होने पर परोसने वाला कोई बाहर का आदमी हो तो हम उससे कुछ नहीं कहते पर मन में उपजा वितृष्णा का भाव उस भोजन से मिलने वाले अमृत को विष तो बना ही देता है। घर का आदमी या पुरुष हो तो हम उसे डांटफटकार देते हैं और इससे उसी भोजन को विषप्रद बना देते हैं जो अमृत देने वाला होता है। कहने का तात्पर्य यह है कि मन के भावों से भोजन से मिलने वाली ऊर्जा का स्वरूप निर्धारित होता है।
भोजन खाते समय केवल उसी पर ध्यान रखना चाहिये। न तो उस समय किसी से बात करना चाहिये और न ही मन में अन्य विचार लाना चाहिये। इससे भोजन सुपाच्य हो जाता है। चिकित्साविज्ञान ने अब इस बात की पुष्टि कर दी है कि भोजन करते समय तनाव रहित व्यक्ति विकार रहित भी हो जाते हैं। वैसे
 हमें कुछ लोग ऐसे भी देखें होंगे जिनको देखकर लगता है कि वह खाने के लिए ही जीते हैं। ऐसे लोगों की मानसिकता को ध्यान से देखने तो वह किसी की बात सुनने और समझने के बजाय अपनी ही बात कहते और सुनते हैं।
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Monday, October 5, 2009

संत कबीर वाणी-हीरे की जौहरी और शब्द की परख साधु को होती (heera aur shabd-sant kabir vani)

हीरा न तहां न खोलिए, जहं खोटी है हाट।
कसि करि बांधो गांठरी, उठि करि चालो बाट।।

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपने हीरे को उस बाजार में मत खोलिए जहां खोटी नीयत वाले उपस्थित हैं। उसे तो अपनी गांठ में कसकर अपनी राह चल दीजिए।
हीरा परखै जौहरी, शब्दहि परखै साध।
कबीर परखै साधु को, ताका मता अगाध।।
हीरे की परख जौहरी और सत्य शब्द का मतलब सज्जन व्यक्ति ही समझ सकता है। उसी तरह जो सत्य और ज्ञान के शब्दों को परख लेता है उसकी चिंतन क्षमता अगाध हो जाती है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-विश्व में बाजार की शक्ति निरंतर बढ़ती जा रही है। आधुनिक समय के संचार माध्यमों में विचारों की अभिव्यक्ति के नाम पर ऐसे संदेश लोगों को सुनाये जा रहे हैं जो उनके अंदर काम, लोभ और अहंकार की प्रवृत्तियों को अनियंत्रित होने के लिऐ प्रेरित करते हैं। ऐसे में हालत तो यह है कि भली बात कहना भी अपने आपको परेशानी में डालना है। किसी भी वस्तु का विज्ञापन कर उसे विक्रय के लिये प्रस्तुत किया जाता है पर सत्य अध्यात्मिक ज्ञान के लिये कोई प्रचार नहीं होता। हालांकि हमारे भारत के प्राचीन ग्रंथों में अनेक कथायें हैं और उनको सुनाकर अनेक व्यवसायिक संत खूब धन बटोर रहे हैं। उनको ऐसा करते हुए कुछ लोग भारतीय धर्म के विरुद्ध दुष्प्रचार भी करते हैं पर यह उनका भ्रम है। भारत का अध्यात्मिक ज्ञान अंतकरण में प्रकाश फैलाता है। जब आदमी के अंतकरण में प्रकाश होता है तो वह स्वतः बाहर फैलता है। उसके आचरण, व्यवहार और विचार से उसका आभास हो जाता है उसके लिये विज्ञापन की आवश्यकता नहीं होती।
सच बात तो यह है कि ज्ञानचर्चा बाजार में नहीं की जा सकती। वहां अनेक लोग बहस करते हैं। अनेक लोगों का तो काम ही यही है कि बहस कर अपने को विद्वान साबित करो। उससे भी बात न बने तो अभद्र शब्द उपयोग में लाकर दूसरे को अपमानित कर स्वयं को सम्मानित करो। इसलिये अच्छा यही है कि समान विचार वालों के साथ अपने विचार बांटे। जहां कुविचारी लोगों का जमावड़ा देखें वहां से पलायन कर जायें।
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Saturday, October 3, 2009

श्री गुरु ग्रंथ साहिब वाणी-हजारों सूर्य और सैंकड़ों चंद्रमा भी गुरु के प्रकाश की बराबरी नहीं कर सकते (shri guru granth sahib-guru, sun and moon)

‘जे सउ चंदा उगवहि सूरज चढ़हि हजार।
ऐते चानण होदिआँ गुर बिन घोर अँधार।।
हिंदी में भावार्थ-
श्री गुरु ग्रंथ साहिब वाणी के अनुसार अगर सैंकड़ों चंद्रमा और हजारों सूरज मिलकर भी उग जायें पर बिना गुरु के जीवन में अंधकार ही रहेगा। इतना प्रकाश कोई अन्य नहीं कर सकता जितना गुरू अपने ज्ञान के द्वारा कर देता है।
‘भाई रे गुर बिनु गिआनु न होइ।
पूछहु ब्रह्मै नारदै बेद बिआसै कोइ’।।
हिंदी में भावार्थ-
श्री गुरु ग्रंथ साहिब की वाणी के अनुसार गुरु के बिना ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता इस बात की पुष्टि ब्रह्मा, नारद और वेदव्यास भी करते हैं।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-किताबें चाहे कितनी भी पढ़ लें पर जब तक गुरु से उसके पढ़ने और समझने का तरीका नहीं समझा तब तक ज्ञान को धारण करना कठिन है। हमारे भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान में गुरू का अधिक महत्व प्रतिपादित किया गया है। यह अलग बात है कि सामान्य जनमानस मेें जो गुरू के प्रति भाव है उसे देखते हुए हर कोई गुरू बनना चाहता है। हमारा भारतीय अध्यात्मिक दर्शन यह भी कहता है कि सच्चे गुरू से ही ज्ञान प्राप्त करना चाहिए वरना तो भ्रष्ट गुरु पूरे जीवन को भी नष्ट कर देते हैं। प्रचार माध्यमों में जो गुरु छाये हुए हैं उनमें गुरु की तलाश करने पर अनेक लोग निराशा अनुभव करते हैं। गुरू का फिल्मी अभिनेताओं की तरह प्रसिद्ध होना आवश्यक नहीं है। हमारे आसपास ऐसे अनेक लोग हैं जो ज्ञान रखते हैं उनको ही हृदय में गुरु की तरह धारण कर उनसे ज्ञान चर्चा करें तो भी ठीक है। जिनके ढेर सारे शिष्य हैं उनके प्रवचनों में जाकर बैठने या दीक्षा लेने से हमारी गुरु की आवश्यकता पूरी नहीं होगी। यह जरूरी नहीं है कि गुरु कोई सन्यासी या व्यवसायिक प्रवचनकर्ता हो। आजकल व्यवसायिक सन्यासियों और व्यवसायिक कथावाचकों को भी गुरू बनने का शौक चर्राया है। गुरु कोई भी हो सकता है। कोई सद्गृहस्थ भी ज्ञानी हो सकता है। उनसे ज्ञान प्राप्त करते रहें। अध्यात्मिक शक्ति के बिना भौतिक संसार को समझा नहीं जा सकता। यह शक्ति केवल गुरु के प्रकाश में ही पाई जा सकती है।
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Friday, October 2, 2009

मनुस्मृति-विषयासक्त स्वामी को दंड का उपयोग करना ही नहीं आता(swami aur dand-manu smruti in hindi)

सोऽसहायेन मूढेन लुब्धेनाकृतबुद्धिना।
न शक्तो न्यायतो नेतुं सक्तेन विषयेनणु च।।
हिंदी में भावार्थ-
जिस राजा के सहायक न हों या फिर मूर्ख, लालची, बुद्धिहीन हों एवं स्वयं भी जो विषय और कामनाओं में लीन रहता हो ऐसे राजा को दंड का उपयोग उचित ढंग से प्रयोग करना नहीं आता।
स्वराष्ट्रे न्यायवृत् स्याद् भृशदण्डश्च शत्रुषु।
सहृत् स्वजिह्मः स्निगधेषु ब्राह्मणेषु क्षमान्वितः।।
हिंदी में भावार्थ-
राजा को चाहिए कि वह प्रजा के शत्रुओं को उग्र दंड दे। से प्रजा के मित्रों से सौहार्दपूर्ण तथा राज्य के विद्वानों से उदारता के साथ ही क्षमा का व्यवहार करे।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-किसी राज्य का राजा हो या समाज तथा परिवार का मुखिया उसे अपने संरक्षितों के शत्रुओं से किसी प्रकार की उदारता न बरतते हुए उनको कड़ा दंड दे या कार्रवाई करे। जहां मुखिया या स्वामी का कोई सहायक न हो और वही शराब जैसे व्यसनों में डूबा रहे उसके समूह का सर्वनाश हो जाता है। विषय और कामनाओं का चिंतन करने वाले मनुष्य की बौद्धिक क्षमता समाप्त हो जाती है। ऐसे में उसके आसपास कामी, क्रोधी, लोभी तथा अहंकारी लोगों का मित्र समूह एकत्रित होकर उसे उल्टी सीधी सलाहें देता है जिससे स्वामी के साथ उसके कुल, राज्य और समाज का भी नाश होता है।
इसलिये जिन लोगों को परमात्मा की कृपा से कहीं स्वामित्व का अधिकार प्राप्त होता है वह अपने सरंक्षित तथा शरणागत जीवों के शत्रुओं के विरुद्ध कठोर दंड का उपयोग करें तथा जो मित्र हों उनके साथ सौहार्द का व्यवहार करते हुए अपने समूह का हित सोचें। इसके साथ ही ऐसे विद्वानों का हमेशा सम्मान करें तो संकट पड़ने पर अपने बौद्धिक कौशल से उसे तथा उसके समूह को उबार सकें।
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Thursday, October 1, 2009

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-मधुर वाणी से संसार जीतना संभव (madhur vani aur sansar-hindu sandesh in hindi)

वाक्पारुष्यपरं लोक उद्वेजनमनर्थम्।
न कुर्यात्प्रियया वाचा प्रकृर्यात्ज्जगदात्मताम्।।
हिंदी में भावार्थ-
जिस मनुष्य के वाक्यों में कठोरता है उससे लोग उत्तेजित हो जाते हैं। ऐसी अनर्थकारी वाणी न बोलें। इस जगत को अपने मधुर वाणी से वश में किया जा सकता है।
अकस्मादेव यः कोपादभीक्ष्णं बहु भाषते।
तसमाबुद्धिजते लोकः सस््फुलिंगदिवानलात्।।
हिंदी में भावार्थ-
जो व्यक्ति अचानक ही क्रोध में अनापशनाप बकने लगता है वह संसार को वैसे ही अपने विपरीत बना लेता है जैसे आग से निकलने वाली चिंगारी से लोग उत्तेजित होकर उससे दूर हो जाते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अगर इतिहास का अवलोकन करें तो अधिकतर संघर्ष अहंकार को लेकर हुऐ हैं वरना किसी को किसी पर आक्रमण करने की आवश्यकता क्या है? अपने आसपास होने वाली हिंसक वारदातों को देखें तो उनके पीछे बात का बतंगड़ अधिक होता है। हर समस्या का हल होता है पर उसे व्यक्त करने का अपना एक तरीका होता है। कहीं पानी को लेकर झगड़ा है तो कहीं जमीन का झगड़ा है। किसी की वजह से अगर पानी नहीं मिल रहा है तो उससे प्रेम से भी अपनी बात भी कही जा सकती है तो दूसरा व्यक्ति सहजता से मान भी जाये पर जहां दादागिरी, क्रोध या घृणा से बात कही गयी वहां अच्छे परिणाम की संभावना नगण्य हो जाती है। मनुष्य में अहंकार होता है और जहां उससे लगता है कि वह प्रेम से बोलने पर सामने वाले की आंखों में छोटा हो जायेगा या कड़ा बोलकर बड़प्पन दिखायेगा वहां विवाद होता है वहीं उसके अंदर अहंकार के कारण जो क्रोध पैदा होता है वही झगड़े का कारण बनता है।
इसलिये जहां तक हो सके मधुरवाणी बोलना चाहिये। इसे सज्जनता समझें या चालाकी पर इस संसार को इसी तरह ही जीता जा सकता है। आज जब मनुष्य में विवेक की कमी है वहां तो बड़ी सहजता से किसी में हवा से फुलाकर काम निकलवाया जा सकता है तब क्रोध करने की आवश्यकता है?
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Thursday, September 24, 2009

चाणक्य नीति-आग में तपाये जाने पर भी मदिरा का पात्र शुद्ध नहीं होता (chankya niti-fire and wine)

न दुर्जनः साधुदशामुपैति बहुप्रकारैरपि शिक्ष्यमाणः।
आमूलसिक्तः पयसा घृतेन न निम्बवृक्षो मधुरात्वमेति।।
हिंदी में भावार्थ-
दुष्ट व्यक्ति को कितना भी सिखाया या समझाया जाये पर वह अपना अभद्रता व्यवहार नहीं छोड़कर सज्जन नहीं बन सकता जैसे नीम का वृक्ष, दूध और घी से सींचा जाये तो भी उसमें मधुरता नहीं आती।
अंतर्गतमलो दृष्टस्तीर्थस्नानशतैरपि।
न शुध्यति यथा भाण्डं सुराया दाहितं च यत्।।
हिंदी में भावार्थ-
जिसके मन में मैल भरा है ऐसा दुष्ट व्यक्ति चाहे कितनी बार भी तीर्थ पर जाकर स्नान कर लें पर पवित्र नहीं हो पाता जैस मदिरा का पात्र आग में तपाये जाने पर भी पवित्र नहीं होता।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य की प्रकृत्ति का निर्माण बचपन काल में ही हो जाता है। मनुष्य के माता पिता, दादा दादी तथा अन्य वरिष्ठ परिवारजन जिस तरह का आचार विचार तथा व्यवहार करते हैं उसी से ही उसमें संस्कार और विचार का निर्माण होता है। इसके अलावा बचपन के दौरान ही जैसा खानपान होता है वैसे ही स्थाई गुणों का भी निर्माण होता है जो जीवन पर्यंत अपना कार्य करते हैं। एक बार जैसी प्रकृत्ति मनुष्य की बन गयी तो फिर उसमें बदलाव बहुत कठिन होता है।
इसलिये जिनमें दुष्टता का भाव आ गया है उनके साथ संपर्क कम ही रखें तो अच्छा है। चाहे जितना प्रयास कर लें दुष्ट अपना रवैया नहीं बदलता और अगर उसने किसी व्यक्ति विशेष को अपने दुव्र्यवहार का शिकार बनने का विचार कर लिया है तो फिर उससे बाज नहीं आता। ऐसे में सज्जन व्यक्ति को चाहिये कि वह खामोशी से दुष्ट के व्यवहार को नजरअंदाज करे क्योंकि उनकी प्रकृत्ति ऐसी होती है कि बिना किसी को तकलीफ दिये उनको चैन नहीं पड़ता। ऐसे दुष्ट किसी की मजाक उड़ाकर तो किसी के साथ अभद्र व्यवहार कर अपने को गौरवान्वित अनुभव करते हैं। सज्जन के लिये दो ही उपाय है कि वह चुपचाप अपने रास्ते चले या अगर उसे नियंत्रण करने के लिये शारीरिक या आर्थिक बल है तो उस पर प्रहार करे पर इसके बावजूद भी यह संभावना कम ही होती है कि वह नालायक आदमी सुधर जाये।
ऐसे दुष्ट लोग चाहे जितनी बार तीर्थ स्थान पर जाकर स्नान करें पर उनका उद्धार नहीं होता। तीर्थ पर जाने से शरीर का मल निकल सकता है पर मन का तो कोई योगी ही निकाल पाता है।
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Monday, September 21, 2009

मनुस्मृति-जल में गंदगी बहाना अनुचित (manu smriti-pani aur gandgi)

नाप्सु मूत्रं पुरीषं वाष्ठीवनं वा समुत्सृजेत्।
अमेध्यमलिप्तमन्यद्वा लोहतं वा विषाणि वा।
हिंदी में भावार्थ-
जल में मल मूत्र, कूड़ा, रक्त तथा विष आदि नहीं बहाना चाहिये। इससे पानी विषाक्त हो जाता है और पर्यावरण पर इसका बुरा प्रभाव दिखाई देता है। इससे मनुष्य तथा अन्य जीवों को स्वास्थ्य भी खराब होता है।
अधस्तान्नोपदध्याच्च न चैनमभिलंघयेत।
न चैनं पादतः कुर्यान्न प्राणबाधामाचरेत्।।
हिंदी में भावार्थ-
आग को किसी तरह के सामान के नीचे नहीं रखना चाहिये। आग को कभी लांघें नहीं। अपने पैरों को कभी आग पर नहीं रखना चहिये और न ही कभी ऐसा काम करें जिससे किसी जीव का वध हो।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हमारी पवित्र नदिया गंगा और यमुना की क्या स्थिति है इसे देखकर कौन कहेगा कि हमारे देश के लोग धर्मभीरु हैं? कहने को कवि, लेखक, संत और कथित अध्यात्मिक नेता दावा करते हैं कि हमारे देश की संस्कृति और सस्कारों की रक्षा होना चाहिए या हम विश्व क अध्यात्मिक गुरु हैं। मगर जब हम अपने देश की नदियों और तालाबों को देखते हैं तो पाते हैं कि यहां केवल नारे लगते हैं पर सच में तो लोग आंखें बंद कर जीने के आदी हो गये हैं। गंगा और यमुना नदियों में आम हो या खास सभी लोग गंदगी बहाते हैं। अधजले शवों को फैंक देते हैं। पंचतत्वों से बने इस शरीर को लेकर जितना अहंकार हमारे देश में हैं अन्यत्र कहीं नहीं है। आदमी पैदा हो या मरे उसके देह को लेकर नाटक बाजी होती है। अब तो अनेक शहरों में बिजली से मुर्दा जलाने की व्यवस्था है मगर वहां अभी भी मृत देह को लकड़ियों से इसलिये जलाया जाता है क्योंकि मृतक के संबंधियों को लगता है कि समाज क लोग कहेंगे कि पैसे बचा रहे हैं। अस्थियां गंगा में विसर्जित की जाती हैं। यह देहाभिमान हैं जिससे बचने की सलाह हमारा अध्यात्मिक ज्ञान देता है पर हिन्दू के नाम पर अपना अहंकार रखने वाले लोग कर्मकांडों के निर्वाह में अपना गौरव मानते हैं उसके नाम पर पर्यावरण को विषाक्त कर देते हैं। बनारस में गंगा की जो स्थिति है उसे सभी जानते हैं और इसे विषाक्त करने वाले हम लोग ही है यह भी सच है। गंगा मैली हो गयी पर की किसने। तमाम तरह के आरोप लगाये जाते हैं पर उसे साफ रहने की पहल कोई नहीं करता।
पर्यावरण प्रदूषण से मनुष्य स्वभाव पर बुरा प्रभाव करता है जिससे उसकी मानसिकता विकृत होती है। आज हम अपने देश में जो आर्थिक और सामाजिक तनाव देख रहे हैं वह केवल इसी पर्यावरण से उपजी खराब मानसिकता का परिणाम है। इसलिये अब भी समय है कि चेत जायें और जितना हो सके अपने जल स्त्रोंतों को साफ रखने का प्रयास करें। कम से कम इतना तो हम कर ही सकते हैं कि हम स्वयं गंदा न करें बाकी जो करते हैं वह जाने। अपने आपको तो यह संतोष होना चाहिए कि हम गंदा नहीं कर रहे। जल गंदा करना पाप है और इसका अपराध नरक में जाकर भोगना पड़ता है।
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Saturday, September 19, 2009

रहीम के दोहे-टेढ़ी चाल वाला घोड़ा कभी राजा नहीं बनता (horse and king of chess-rahin ke dohe

रहिमन सीधी चाल सों, प्यादा होत वजीर।
फरजी साह न हुइ सकै, गति टेढ़ी तासीर।।
कविवर रहीम कहते हैं कि शतरंज के खेल में सीधी चाल चलते हुए प्यादा वजीर बन जाता है पर टेढ़ी चाल के कारण घोड़े को यह सम्मान नहीं मिलता।
रहिमन वहां न जाइये, जहां कपट को हेत।
हम तन ढारत ढेकुली, संचित अपनी खेत।
कविवर रहीम कहते हैं कि उस स्थान पर बिल्कुल न जायें जहां कपट होने की संभावना हो। कपटी आदमी हमारे शरीर के खून को पानी की तरह चूस कर अपना खेत जोतता है/अपना स्वार्थ सिद्ध करता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य कपट से चाहे जितनी भी भौतिक उपलब्धि प्राप्त कर ले पर समाज में उसका सम्मान बिल्कुल नहीं होता। डर और लालच के के मारे लोग दिखावे का सम्मान देते हैं पर दिल में तो सभी गालियां बकते हैं। हम देख सकते हैं कि कई वर्षों से अनेक ऐसे लोग हमारी आखों में चमक रहे हैं या चमकाये जा रहे हैं जो किसी भी दृष्टि से सज्जन नहीं है पर उनके पास ढेर सारी भौतिक उपलब्धियां हैं। उनको भगवान का अवतार या महापुरुष कहकर प्रचारित किया जाता है जबकि समाज के लोग उनको वक्र दृष्टि से देखते हैं। यह अलग बात है कि सामने कोई नहीं कहता। इधर आजकल के विज्ञापन युग में तो पैसा देकर लोग अपना नाम सभी प्रकाशित करवा रहे हैं। इससे यह भ्रम हो जाता है कि झूठ और अयोग्यता पुज रही है। सच बात तो यह है कि जिस व्यक्ति का अपने न रहने या पीठ पीछे भी सम्मान होता है वही सच्चा कहा जा सकता है। अनेक कथित महापुरुष मर गये पर अब उनका कोई नाम भी नहीं लेता। कई जग तो उनको गालियां पड़ती हैं पर ऐसे भी लोग हैं जो अल्प धनिक होने के बावजूद सज्जन थे उनको समाज आज भी याद करता है। इसलिये कपट के द्वारा भौतिक सफलता प्राप्त करने को विचार छोड़ते हुए किसी कपटी मनुष्य के पास जाना भी नहीं चाहिये।
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Friday, September 18, 2009

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-अपने अंदर के व्यसनों की उपेक्षा न करें (kautilya ka arthshastra in hindi)

इत्यादि सर्व प्रकृति तथावद्बुध्यत राजा व्यसनं प्रयत्नात्।
बुद्धया च शक्त्वा व्यसनस्य कुर्याकालहीन व्यवरोपर्णहि।।
हिंदी में भावार्थ-
राज विधिपूर्वक सबके व्यसनों को जाने तथा अपनी बुद्धि तथा शक्ति से अपने अंदर स्थित व्यसनों को अधूरेपन में ही नष्ट कर दे क्योंकि विपत्ति होने पर हीन वस्तु और व्यक्ति शीघ्र नष्ट हो जाते हैं।
प्रकृतिव्यवसननि भूतिकामः समुपेक्षेत नहि प्रमाददर्पात्।
प्रकृत्तिवयवसनान्यूपेक्षते यो न चिरात्तं रिपवःपराभवन्ति।।
हिंदी में भावार्थ-
विभूति की इच्छा पैदा से उत्पन्न प्रमाद या अहंकार से प्रकृत्ति से व्यसनों की उपेक्षा न करें। प्रकृत्ति के व्यसनों की उपेक्षा करने वाले को शत्रु शीघ्र नष्ट कर डालते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य के व्यसन उसको कमजोर करते हैं। शराब, तंबाकू तथा अन्य कोई भी बुरी आदत पालना ठीक नहीं होती। व्यसनों से न केवल देह की रोगों से लड़ने के लिये प्रतिरोधक क्षमता का क्षरण होता है बल्कि मानसिक रूप से भी मनुष्य कमजोर होता है। इतना ही नहीं व्यसनी मित्रों के साथ रहना भी ठीक नहीं है क्योंकि वह उनके वशीभूत होते हैं और किसी भी समय संकट का कारण बन सकते हैं। कहने का आशय यह है कि व्यवसनी का मन अपने वश में नहीं रहता इसलिये वह अपनी अन्मयस्कता की वजह से विश्वास योग्य नहीं होता। अपने अंदर कोई व्यसन हो और लगे कि उसे छोड़ना ही हितकर है तो बिना विलंब किये उससे परे हो जाना चाहिये।
उसी तरह मौसम के अनुसार ही भोजनादि ग्रहण करना चाहिये क्योंकि प्रकृत्ति के अनुसार न चलने पर भी भारी परेशानी उठानी पड़ती है। उसके विपरीत चलने का व्यसन बहुत हानिकारक होता है। व्यसन किसी भी प्रकार से मनुष्य को हानि पहुंचा सकते हैं चाहे वह शारीरिक हो या मानसिक।
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Thursday, September 17, 2009

संत कबीर वाणी-इस संसार में सच्चा साथी कोई नहीं (sant kabir vani-sansar aur sathi)

मेरा संगी कोय नहिं, सबै स्वारथी लोय।
मन परतीति न ऊपजै, जिस विश्वास न होय।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि इस संसार में कोई सच्चा मित्र या साथी नहीं है। जिसे देखो वही अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिये आता है। किसी के मन में प्रीति या विश्वास नहीं है बस दिखावा करते हैं।
कहत सुनत जग जात है, विषय न सूझै काल।
कहैं कबीर सुन प्रानिया, साहिब नाम समहाल।
संत शिरोमणि कबीरदास जी के अनुसार यहां सभी लोग विषयों को लेकर बहस करते हैं किसी को अपना काल दिखाई नहीं देता। सभी प्राणियों को चाहिये कि विषयों में मोह रखने की बजाय परमात्मा का स्मरण करें।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-कहने को यहां अनेक लोग प्रेम और विश्वास करते हुए एक दूसरे के प्रति मित्रता और सद्भाव का प्रदर्शन करते हैं पर सच सभी जानते हैं कि यह स्वार्थ की ही देन है। स्वार्थ हो तो एक नहीं हजार बार आदमी संपर्क करेगा और फिर मूंह फेरने में किसी को देर नहीं लगती। कहीं परंपराओं के नाम पर तो कहीं प्रेम के नाम पर अपना काम निकालने का प्रयास हर कोई करता है। ढौंग इतना हो गया है कि ऐसे में भले आदमी को भी पहचानना कठिन लगता है। ऐसा नहीं है कि समाज में भले लोग नहीं है पर चारों तरफ जब स्वार्थाी, लालची और घमंडी लोगों का मित्र और परिवार समूह हो तो उनको पहचानना कठिन है। अगर देखा जाये तो जहां विश्वास है वहीं धोखा हो सकता है जहां रिश्ता है वहीं बेवफाई का डर है। ऐसे में तो केवल एक ही मार्ग है कि भगवान का स्मरण करते हुए जीवन व्यतीत किया जाये और जो सामने आ रहा है उसे उसकी लीला मानकर संतोष कर लें। दूसरी बात यह है कि अपने अंदर इतनी विवेक शक्ति भी पैदा करें जिससे भले और स्वार्थी मित्र और रिश्तेदार की पहचान हो सके।
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Wednesday, September 16, 2009

चाणक्य नीति-कोल्हू में कुचले जाने पर भी ईख मिठास नहीं छोड़ती (chankya niti-kolhu aur eekh)

छिन्नोऽपि चन्दनतरुनं जहाति गन्धं।
वृद्धोऽपि वारणपतिर्न जहाति लीलाम्।
यन्त्रार्पितो मधुरतां न जहाति चेक्षुः
क्षीणोऽपि न त्यजति शीलगुणान् कुलीनः।।
हिंदी में भावार्थ-
कट जाने पर चंदन का वृक्ष अपनी सुंगध नहीं छोड़ता। बूढ़ा हो जाने पर भी हाथी विलसिता से विरक्त नहीं होता और ईख कोल्हू में पेरे जाने पर भी अपनी मिठास नहीं छोड़ती उसी प्रकार गुणवान और कुलीन मनुष्य दरिद्र हो जाने पर दया तथा अन्य गुणों को नहीं छोड़ता।
हिंदी में भावार्थ-मनुष्य को अपने चरित्र पर दृढ़ होना चाहिये और वही उसके गुणवान होने का प्रमाण है। जीवन में अपने कार्य के प्रति हमेशा उत्साहित रहकर ही कोई सफलता प्राप्त की जा सकती है। धन संपदा तो चंचल लक्ष्मी की प्रतीक हैं जो कभी इस घर जाती तो कभी उस घर। जिसके पास धन है वह अपने अंदर ढेर सारे गुण होने का बखान करता है। लोग भी यह मानते हैं कि जिसके पास धन है वह बड़ा आदमी ज्ञानी और गुणवान है। आजकल तो धन संपदा होना ही कुलीन होने का प्रतीक हो गयी है। जिसके पास धन है वह साहसी, ज्ञानी, और शक्तिशाली होने का प्रदर्शन करते हैं पर जैसे ही उनके पास से धन चला जाता है वह टूट जाते हैं। लोग धन संचय के प्रति इतना आकर्षित होते हैं अन्य गुणों के संचय पर उनका ध्यान ही नहीं जाता। आम तौर से सभी यही समझते हैं कि धन आने से समाज में उनको कुलीन, दयालु और ज्ञानी मान लिया जायेगा। मगर यह सच यह है कि गुणों की पहचान तो विपत्ति में ही होती है। जो कुलीन और गुणवान हैं वह दरिद्रता आने पर भी तनाव रहित होते अपनी दया, बौद्धिक कुशाग्रता और मधुरवाणी का त्याग नहीं करते और समाज के सामने यह एक आदर्श होता है।
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Saturday, September 12, 2009

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-व्यसनी होता है एक आसान लक्ष्य (drunkar a soft target-kautilya sandesh

नानाप्रकारैव्र्यसनेर्विमुक्तः शक्तिवेणाप्रतिमेन युक्तः।
परं दुरन्तव्यसनोपपन्नं याग्रान्नरन्द्रो विजयाभिकांक्षी।।
हिंदी में भावार्थ-
विभिन्न प्रकार के व्यसनों से रहित महाप्रभावशाली तीन शक्तियों से युक्त जीतने की इच्छा करने वाला राज प्रमुख व्यसनों से युक्त शत्रु पर आक्रमण की योजना बनाये।
प्रावेण सन्तो व्यसने रिपूणां यातव्यमित्येव सभादिशंति।
तत्रैव पक्षी व्यसने हि नित्यं क्षमस्तुन्नभ्युदितोऽभियायात्।
हिंदी में भावार्थ-
अधिकतर महानतम विचारक व्यसनों से युक्त व्यक्ति पर आक्रमण करने का सुझाव देते हैं और जिसके साथी भी व्यसनी हों अर्थात उसका पूरा पक्ष ही व्यसनी हो उस पर तो हमला कर ही देना चाहिए।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संदेश को हम अलग तरीके से भी समझ सकते हैं। अब राजा तो रहे नहीं और लोकतात्रिक सभ्यता में हर व्यक्ति अपने घर का राजा है अतः उसे अपने परिवार और अपनी रक्षा के लिये अनेक अवसर पर रणनीति बनानी पड़ती है। ऐसे में दूसरे व्यसनी पर आक्रमण की बात सोचने की बजाय इस बात पर ध्यान करना चाहिये कि अपने अंदर व्यसन न हों ताकि कोई दूसरा हमें और परिवार को परेशान करने के लिये आक्रमण न कर सके। इस समय हमारे देश में अधिकतर लोगोंआत्मसंयम का अभाव है जो कि इन्हीं व्यसनों का परिणाम है। शराब, जुआ सट्टे जैसे व्यसनों ने चहुं ओर से घेर रखा है और इससे जुड़े व्यवसायों में खूब कमाई है। सच तो यह है कि जिन व्यवसायों में कमाई है वह सभी व्यसनों से जुड़े हैं। लोगों के अंदर मनोरंजन के नाम पर ऐसे व्यसन पेश किये जा रहे हैं जिससे समाज विकृत हो रहा है। यही कारण है कि हमारे देश को बाहर से चुनौती मिल रही है तो अंदर असामाजिक प्रकृत्ति के लोग अपना प्रभुत्व कायम कर लोगों को आतंकित किये रहते हैं। मनोरंजन के नाम पर शराब, खेल, और फिल्मों के व्यसनों ने लोगों को कायर बना दिया है और साथ में उनकी चिंतन क्षमता भी लुप्त हो गयी है। यही कारण है कि जब चार लोग की बैठक जमने पर देश के सामने आ रही चुनौतियों की चर्चा तो है पर उसके हल का कोई उपाय उनको नहीं सूझता। सभी लोग निराशाजनक बातें करते हैं।
व्यक्तिगत रूप से देश की चिंता करने के साथ ही अपनी स्थिति पर भी विचार करना चाहिए। जितना हो सके उतना व्यसनों से बचें वरना धन, पद और बाहुबल से सुसज्ज्ति असामाजिक तत्व-जो व्यसनों के कारण स्वयं ही डरपोक होते हैं उन उनका डर क्रूरता पैदा करता है- आपको या परिवार को तंग कर सकते हैं। एक बात याद रखें अगर आप अपने चरित्र पर दृढ़ रहते हुए व्यसनों से परे हैं तो आपकी रक्षा स्वतः होगी। व्यसनी होने पर हर कोई आपको एक आसान लक्ष्य (साफ्ट टारगेट) समझने लगता है।
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Friday, September 11, 2009

मनुस्मृति-क्लेश करते हुए भोजन ग्रहण न करें (bhojan aur manushya-manu smruti)

पूजयेदशनं नित्यमद्याच्चेतकुत्सयन्
दृष्टवा हृध्येत्प्रसीदेच्च प्रतिनन्देच्च सर्वशः।।
हिंदी में भावार्थ-
मनुष्य को जैसा भोजन मिले उसे देखकर प्रसन्नता हासिल करना चाहिए। उसे ईश्वर प्रदत्त मानकर गुण दोष न निकालते हुए उदरस्थ करें। भोजन करते हुए अपनी झूठन न छोड़ें। यह कामना करें कि ऐसा अन्न हमेशा ही मिलता रहे।
पूजितं ह्यशनं नित्यं बलमूर्ज च यच्छाति।
अपूजितं च तद्भुक्तमूभयं नाशयेदिदम्।।
हिंदी में भावार्थ-
सदाशयता से ग्रहण किया भोजन बल और वीर्य में वृद्धि करता है जब निंदा करते हुए उदरस्थ करने से उसके तत्व नष्ट होते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जिनको भोजन आराम से मिलता है उनको उसका महत्व नहीं पता इसलिये वह उसे ऐसे करते हैं जैसे कि उसकी उनको परवाह ही नहीं है। भोजन करते समय उनको यह अहंकार आता है कि यह तो हमारा अधिकार ही है और हमारे लिये बना है। सच तो यह है कि भोजन का महत्व वही लोग जानते हैं जिनको यह नसीब में पर्याप्त मात्रा में नहीं होता। स्वादिष्ट भोजन की चाह आदमी को अंधा बना देती है। अनेक बार ऐसा समय आता है जब वह सब्जी के कारण भोजन नहीं करता या उसे त्याग देता है। भोजन करते समय उसकी निंदा करेंगे। शादी विवाह में तो अब यह भी होने लगा है कि लोग भोजन थाली में भरकर लेते हैं पर उसमें से ढेर सारा झूठन में छोड़े देते हैं। सार्वजनिक अवसरों पर ऐसे भोजन की बरबादी देखी जा सकती है।
यह समझ लेना चाहिये कि भोजन तो ईश्वरीय कृपा से मिलता है। यह सही है कि दाने दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम, पर यह भी नहीं भूलना कि अपने कर्म और भाव से भी भाग्य का निर्माण होता है। अगर हम भोजन करते हुए अहंकार पालेंगे तो संभव है कि दानों पर लिखा हमारा नाम मिट भी जाये। अपनी गृहिणी को कभी भी सब्जी आदि को लेकर ताना नहीं देना चाहिये। यह भगवान की कृपा समझें कि एक ऐसी गृहिणी आपके साथ है जो अपने हाथ से खाना बनाकर देती है वरना तो अनेक लोग घर के खाने के लिये तरस जाते हैं।
कहने का तात्पर्य यह है कि खाते हुए अपना भाव सौम्य और सरल रखना चाहिए तभी भोजन के तत्व संपूर्ण रूप से काम करते हैं अगर मन में क्लेश या अप्रसन्नता है तो फिर खाना न खाना बराबर है।
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Thursday, September 10, 2009

विदुर नीति-क्षमा और धैर्य से आयु बढ़ती है (kshama aur dhiraj-vidur niti)

मार्दव सर्वभूतनामसूया क्षमा धृतिः।
आयुष्याणि बुधाः प्राहुर्मित्राणा चाभिमानना।।
हिंदी में भावार्थ-
संपूर्ण जीवों के प्रति कोमलता का भाव, गुणों में दोष न देखना, क्षमा, धैर्य और मित्रों का अपमान न करना जैसे गुण मनुष्य की आयु में वृद्धि करते हैं।
अपनीतं सुनीतेन योऽयं प्रत्यानिनीषते।
मतिमास्थाय सुदृढां तदकापुरुषव्रतम्।।
हिंदी में भावार्थ-
जो अन्याय के कारण नष्ट हुए धन को अपनी स्थिर बुद्धि का आश्रय लेकर पवित्र नीति से वापस प्राप्त करने का संकल्प लेता है वह वीरता का आचरण करता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य के स्वयं के अंदर ही गुण दोष होते हैं। उनको पहचानने की आवश्यकता है। दूसरे लोगों के दोष देखकर उनके प्रति कठोरता का भाव धारण करना स्वयं के लिये घातक है। जब किसी के प्रति क्रोध आता है तब हम अपने शरीर का खून ही जलाते हैं। अवसर आने पर हम अपने मित्रों का भी अपमान कर डालते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि अपने हृदय में कठोरता या क्रोध के भाव लाकर मनुष्य अपनी ही आयु का क्षरण करता है।
कोमलता का भाव न केवल मनुष्य के प्रति वरन् पशु पक्षियों तथा अन्य जीवों के प्रति रखना चाहिए। कभी भी अपने सुख के लिये किसी जीव का वध नहीं करना चाहिये। आपने सुना होगा कि पहले राजा लोग शिकार करते थे पर अब उनका क्या हुआ? केवल भारत में ही नहीं वरन् पूरे विश्व में ही राजशाही खत्म हो गयी क्योंकि वह लोगा पशुओं के शिकार का अपना शौक पूरा करते थे। यह उन निर्दोष और बेजुबान जानवरों का ही श्राप था जो उनकी आने वाली पीढ़ियां शासन नहीं कर सकी।
हम जब अपनी मुट्ठियां भींचते हैं तब पता नहीं लगता कि कितना खून जला रहे हैं। यह मानकर चलिये कि इस संसार में सभी ज्ञानी नहीं है बल्कि अज्ञानियेां के समूह में रह रहे हैं। लोग चाहे जो बक देते हैं। अपने को ज्ञानी साबित करने के लिये न केवल उलूल जुलूल हरकतें करते हैं बल्कि घटिया व्यवहार भी करते हैं ताकि उनको देखने वाले श्रेष्ठ समझें। ऐसे लोग दिमाग से सोचकर बोलने की बजाय केवल जुबान से बोलते हैं। उनकी परवाह न कर उन्हें क्षमा करें ताकि उनको अधिक क्रोध आये या वह पश्चाताप की अग्नि में स्वयं जलें। अपनी आयु का क्षय करने से अच्छा है कि हम अपने अंदर ही क्षमा और कोमलता का भाव रखें। दूसरे ने क्या किया और कहा उस कान न दें।
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Monday, September 7, 2009

मनुस्मृति-सभी के हित की कामना वाला सुखी (Wished everyone a happy interest-manu smriti)

योऽहिंसकानि भूतानि हिनस्त्यात्मसुखेच्छया।
स जीवेश्च मृतश्चैव नववचित्सुखमेधते।।
हिंदी में भावार्थ-
जो व्यक्ति अहिंसक तथा किसी को न सताने वाले जीवों को अपने सुख के लिये मारता है वह अपनी जिंदगी तथा मौत के बाद भी सुख प्राप्त नहीं करता।
जो बनधन्वधक्लेशाान्प्राणिनां न चिकीर्षति।
स सर्वस्य हिनप्रेप्सुः सुखमत्यन्तमश्नुते।।
हिंदी में भावार्थ-
ऐसा व्यक्ति जो किसी का वध तो दूर दूसरे प्राणियों को बांधकर भी नहीं रखता न ही पीड़ा देता, सभी के हित की कामना करता है वह सदैव सुखी रहता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हर कोई अपने हित और सुख की कामनाओं की पूर्ति में लगा रहता है यह किसी को ज्ञान नहीं है कि सभी के हित में ही हमारा हित है। सभी लोग पेड़ों और जलाशयों से सुख तो स्वयं लेना चाहते हैं पर लगाने बनाने के लिये उनके पास न समय है न इच्छा। कहने का तात्पर्य यह है कि लोग धरती और अन्य व्यक्तियों का दोहन करना चाहते हैं पर किसी के लिये स्वयं कुछ नहीं करते। कुंऐं से पानी निकालना है पर उसे भरने का जिम्मा दूसरे का हो तो बहुत अच्छा है-सभी यही सोचते हैं। इसी दोहन की प्रवृत्ति ने प्राकृतिक सुख के समस्त साधनों को सुखा दिया है।
हमें यह समझ लेना चाहिये कि इस संसार जीव तो सभी एक जैसे हैं पर मनुष्य को ही बुद्धि सभी से अधिक मिली है वह केवल इसलिये कि वह परमात्मा को इस दुनियां के संचालन में सहयोग दे पर हो रहा है इसका उल्टा! सभी मनुष्य यही सोचते हैं कि हम तो मनुष्य हैं और इस संसार के सर्वाधिक उपभोग के लिये ही हमें यह बुद्धि मिली है। हम देख रहे हैं कि समाज में प्राकृतिक और भौतिक साधनों के विषम वितरण ने जो वैमनस्य उत्पन्न किया है उसने हमारे समाज के समक्ष एक विशाल संकट उत्पन्न कर दिया है। यह संभव नहीं है कि हम तथा परिवार ही सदा सुखी रहे और बाकी समाज त्रस्त रहे। याद रखिये हम समाज के ही कुछ तत्वों द्वारा निष्काम भाव से किये गये सत्कार्यों का लाभ लेते हैं और बदले में वह दूसरे जरूरतमंद लोगों को लौटाना हमारा कर्तव्य बनता है। यह कभी नहीं हो सकता कि हम समाज और प्राकृति से लेते जायें पर दें कुछ नहीं।
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Friday, September 4, 2009

श्री गीता से-मनुष्य स्वयं ही अपना शत्रु और मित्र (from shri geeta- man himself your enemy and friendly)

उद्धरेदात्मनाऽमानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैय ह्यात्मनो बंधुरात्मैव रिपुरात्मनः।।
हिंदी में भावार्थ-
स्वयं ही अपना संसार रूप समुद्र से उद्धार करते हुए अधोगति से बचे, क्योंकि मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र और शत्रु है।
बन्धुरात्मात्मनस्तस्य यैनात्मैवात्मना जितः।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्ः।।
हिंदी में भावार्थ-
जिस जीवात्मा द्वारा मन और इंद्रियों सहित देह जीत ली गयी है उस जीवात्मा के लिये वह मित्र जिसके द्वारा नहीं जीता गया उसके लिये वह शत्रु है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-किसी दूसरे में अपना मित्र ढूंढना या सहयोग की आशा करना व्यर्थ है। हम अपने मित्र और शत्रु स्वयं हैं। मनुष्य स्वयं खोटे काम करते हुए धर्म का दिखावा करता है पर अंततः उसे बुरे परिणाम भोगने हैं यह वह नहीं सोचता। हर कोई दूसरे को धर्म का ज्ञान देता है पर स्वयं उसे धारण नहीं करता। सच तो यह है कि लोगों में धर्म और अधर्म की पहचान ही नहीं रही। देश में आप देखिये कितने जोर शोर से धार्मिक कार्यक्रम होते हैं पर समाज का आचरण देखें तो कितना निकृष्ट दिखाई देता है। देश में व्याप्त भ्रष्टाचार, अपराध, दहेज प्रथा तथा भ्रुण हत्या जैसे प्रतिदिन होने वाले कृत्य इस बात का प्रमाण है कि हमारे लिये देह केवल उपभोग करने के लिये ही एक साधन बन गयी है भक्ति तो हम सांसरिक लोगों को दिखाने के लिये करते हैं न कि भगवान को पाने के लिये। धर्म के नाम पर ऐसे आस्तिकों के हाथ से ऐसे काम हो रहे हैं कि नास्तिक इंसान करने की भी न सोचे। अधर्म से धन कमाकर उसे धर्म के नाम पर व्यय कर लोग सोचते हैं कि हमने पुण्य कमा लिया।
सच बात तो यह है कि हमें आत्मंथन करना चाहिये। दूसरा क्या कर रहा है यह देखने की बजाय यह सोचना चाहिये कि हम क्या कर रहे हैं। दूसरे ने भ्रष्टाचार से संपत्ति अर्जित की तो हम भी वैसा ही करे यह जरूरी नहीं है। एक बात याद रखिये जिस तरह से धन आता है वैसे जाता ही है। जिन लोगों ने भ्रष्टाचार या अपराध से पैसा कमाया है वह उसका परिणाम भोगते हैं। अगर हम स्वयं करेंगे तो वह भी हमें भोगना ही है। कहने का तात्पर्य यह है कि हम अपने मित्र और शत्रु स्वयं ही हैं।
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Wednesday, September 2, 2009

मनु स्मृति-छोटी मछली को बड़ी मछली न निगले, यह दायित्व राज्य का है (duty of state-manu smriti in hindi)

यदि न प्रणयेद्राजा दण्डं उण्डयेघ्वतन्द्रितः।
शूले मत्स्यानिवापक्ष्यन्दुर्बलन्बलवत्तराः।।
हिंदी में भावार्थ-
यदि अपराध कर्म करने वालो को सजा देने में राज्य अगर सावधानी से काम नहीं लेता तो शक्ति शाली व्यक्ति कमजोर को उसी तरह नष्ट कर देता है जैसे बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है।
अद्यत्काकः पुरोडाशं श्वा च लिह्याद्धविस्तथा।
स्वाम्यं च न स्यात्कस्मिंश्चितप्रवतेंताधरोत्तरम्।।
हिंदी में भावार्थ-
अगर राज्य अपनी प्रजा को बचाने के लिये अपराधियों को दंड नहीं देता तो कौआ पुरोडाश खाने लगेगा, श्वान हवि खा जायेगा और कोई किसी को स्वामी नहीं मानेगा अंततः समाज पहले उत्तम से मध्यम और फिर अधम स्थिति को प्राप्त होगा।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-किसी भी देश में राज्य दंड का प्रभावी होना आवश्यक है। वहां की न्यायायिक व्यवस्था का मजबूत होना ही जनता की शांति और सुख की गारंटी होती है। अगर वर्तमान संदर्भ में अपने देश की स्थिति देखें तो ऐसा लगता है कि हमारे देश में कानून व्यवस्था की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। मजे की बात यह है कि अपराधियों और धनियों के इशारे पर चलने वाले लोग मनुस्मृति के विरुद्ध प्रचार अभियान छेड़े रहते हैं शायद इसका कारण यह है कि इसमें अपराधों कें लिये कड़े दंड का प्रावधान किया गया है। हालांकि इसमें कुछ जातीय पूर्वाग्रह हैं पर जातिगत व्यवस्था जन्म पर आधारित हो इसका समर्थन नहीं किया गया। फिर सभी जातियों को अपने स्वाभाविक कर्म में लिप्त होने का आग्रह इसमें किया गया है पर इसका आशय यह नहीं कि कोई उसमें बदलाव नहीं किया जा सकता।
इस आधार पर ही मनुस्मृति का विरोध नहीं किया जाता कि उसमेें छोटी जातियों और महिलाओं आज के संदर्भ में प्रासंगिक बातें लिखी हुई है। हो सकता है कि मनुजी के काल में उन बातों को लिखने वाले प्रसंग रहे हों और अब उनका कोई महत्व नहीं हो। दूसरा यह भी है कि अनेक विद्वान कहते हैं कि मनुस्मृति में अनेक अंश उनके बाद जोड़े गये हैं।
इस आधार पर यह तो कहा जा सकता है कि मनुस्मृति के कुछ अंश वर्तमान संदर्भ में महत्व न हों पर उसे पूरी तरह नकारना एक तरह से समाज को चेतनाविहीन बनाये रखने की एक योजना लगती है। इसमें कई ऐसे संदेश हैं जो व्यक्तिगत जीवन में भी बहुत महत्व रखते हैं।
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Saturday, August 29, 2009

चाणक्य नीति-इस धरती पर तीन रत्न हैं (chnakya niti-three gold coin on earth)

खलानां कपटकानां च द्विविधैव प्रतिक्रिया।
उपानंमुखभंगो वा दूरतो वा विसर्जनम्।।
हिंदी में भावार्थ-
दुर्जन और कांटो को अपने से दूर करने का उनका मूंह कुचन दें अथवा उनसे दूर होकर उनका त्याग करें।
पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जनमन्नं सुभाषितम्।
मूढ़ैः पाषाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा विधीयते।।
हिंदी में भावार्थ-
इस प्रथ्वी पर तीन ही रत्न हैं, जल, अन्न और मधुर वचन किन्तु मूर्ख लोग इनका महत्व न समझते हुए पत्थर के टुकड़ों को ही रत्न कहते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-आजकल की सभ्यता भिन्न हैं। फिर पूरी दुनियां में इस तरह के कानून बने गये हैं कि बेईमान, अधर्मी, कुकर्मी तथा अन्य निंदक गतिविधियों में शामिल लोगों को सजा राज्य द्वारा नियुक्त न्यायाधीश ही दे सकते हैं इसलिये दुर्जन लोगों को स्वयं दंड देना ठीक नहीं है। अतः बेहतर यह है कि जिसका व्यवहार खराब हो या आचरण अनैतिक हो ऐसे दुष्ट व्यक्ति से परे ही रहें। याद रखें कि तात्कालिक लाभ के लिये कभी दुर्जन की संगत अच्छी लग सकती है पर कालांतर में उसके परिणाम बुरे होते हैं।
ऐसे दुष्ट लोग न केवल क्रूर बल्कि मूर्ख भी होते हैं, इसलिये इस धरती पर विद्यमान तीन रत्नों-जल, अन्न तथा मधुर वचनों-की पहचान उनको नहीं होती और पत्थर के टुकड़ों को ही रत्न मानते हैं। इस विश्व मेें जीवन की धारा बहाने वाले दो रत्न जल और अन्न तो प्रकृत्ति द्वारा प्रदाय किये जाते हैं पर मधुर तथा प्रिय वचन मनुष्य को स्वयं ही बोलना चाहिए। धन और पत्थर को सोना मानकर अपना जीवन नष्ट करना ही है। दुष्ट और मूर्ख लोग अपना सारा ध्यान सपंत्ति के संग्रह की ओर लगाते हैं और वह इसके लिये दूसरों को प्रेरित भी करते हैं ताकि अपनी श्रेष्ठता साबित कर सके। उनकी बात को न मानकर जहां देर को तृप्त करने के लिये शुद्ध जल और अन्न मिले वहीं रहते हुए जितना मिले उससे संतुष्ट हो जाना चाहिये। इसके अलावा अपने मूंह से हमेशा पवित्र वचन बोलना चाहिये। यह तीन रत्न हैं जिनका उपभोग करना ही हमें जीवन भर संतोष दे सकता है।
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Friday, August 28, 2009

विदुर नीति-अच्छा काम सिद्ध न हो तो भी ग्लानि अनुभव न करें (vidur niti-work and result)

मिथ्यापेतानि कर्माण सिध्येवुर्यानि भारत।
अनुपायवुक्तानि मा स्म तेष मनः कृथाः।।
हिंदी में भावार्थ-
मिथ्या उपाय से कपट पूर्ण कार्य सिद्ध हो जाते हैं पर उनमें मन लगाना ठीक नहीं है।
तथैव योगविहितं यत्तु कर्म नि सिध्यति।
उपाययुक्तं मेधावी न तव्र गलपयेन्मनः।।
हिंदी में भावार्थ-
अच्छे और सात्विक प्रयास करने पर कोई सत्कर्म सिद्ध नहीं भी होता है तो भी बुद्धिमान पुरुष को अपने अंदर ग्लानि नहीं अनुभव करना चाहिए।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अक्सर आपने सुना होगा कि प्यार और जंग में सब जायज है-यह पश्चिम से आयातित विचार है। जीवन की तो यह वास्तविकता है कि जैसा कर्म करोगे वैसा परिणाम सामने आयेगा। जैसा मन में संकल्प होगा वैसे ही यह संसार हमारे साथ व्यवहार करेगा। अपने स्वार्थ को सिद्ध करने में मनुष्य इतना तल्लीन हो जाता है कि उसे अपने कर्म की शुद्धता और अशुद्धता का बोध नहीं रहता। इसी कारण वह ऐसे उपायों का भी सहारा लेता है जो अपवित्र और अनैतिक हैं। फिर उसको अपनी बात के प्रमाण रखने के लिये अनेक प्रकार के झूठ भी बोलने पड़ते हैं। इस तरह वह हमेशा पाप की दुनियां में घूमता है। मगर मन तो मन है वह उसकी तृप्ति के लिये भक्ति और साधना का ढोंग भी करता है। इससे प्रकार वह एक ऐसे मायाजाल में फंसा रहता है जिससे जीवन भर उसकी मुक्ति नहीं होती।
इसलिये अपने जीवन में अच्छे संकल्प धारण करने के साथ ही अपने कार्य की सिद्ध के लिये पवित्र और नैतिक उपायों की ही सहायता लेना चाहिए।

बाकी लोग किस रास्ते पर जा रहे हैं यह विचार करने की बजाय यह देखना चाहिए कि हमारे लिये उचित मार्ग कौनसा है। इसके अलावा यह भी एक अन्य बात यह भी है कि अगर हमारा कोई पवित्र और सात्विक कर्म अपने उचित उपाय से सिद्ध नहीं होता तो भी परवाह नहीं करना चाहिए। याद रखें कार्य सिद्ध होने का भी अपना एक समय होता है और जब आता है तो हमें यह भी पता नहीं लगता कि वह काम कैसे पूरा हुआ।
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Wednesday, August 26, 2009

एक प्रयास भर-आलेख (one efforts-hindi lekh)

अक्सर अनेक कवितायें, शायरियों गीत, और गद्य रचनायें हमारे सामने आती हैं जिसमें भारतीय धर्म ग्रंथों के साथ ही अन्य धर्मों की पवित्र पुस्तकें भूलकर इंसान से प्रेम करने का संदेश शामिल होता है। जिन कवियों और शायरों को देशभक्ति, एकता और धार्मिक सद्भावना सुसज्जितत कर अपनी रचनाओं में दिखानी होती है वह अक्सर भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों के साथ ही अन्य धार्मिक ग्रंथों पर भी बरसने लगते हैं। इस पर कोई आपत्ति नहीं करता क्योंकि अपने देश के लोगों का यह रवैया है कि चलो हमारे साथ दूसरे धर्म की पुस्तक को भी भुलाने की बात तो कही। हमारा कान पकड़ तो दूसरे का भी तो नहीं छोड़ा।
अगर कोई कवि या शायर अकेली यह बात कहे कि श्री रामायण या श्री रामचरित मानस पढ़ना छोड़ दो, श्रीगीता और वेद पुराण और श्रीगीता भूल जाओ तो उस पर हाहाकार मच जायेगा। लोग उस पर छद्म धर्मनिरपेक्ष होने का आरोप लगा देंगे। अगर उसने किसी अन्य धर्म का नाम लिया तो उस पर सांप्रदायिक होने का आरोप लग जायेगा। अगर भारतीय अध्यात्म ग्रंथों के साथ अन्य धर्म की पुस्तकों को त्यागने की बात कोई शायर, कवि या निबंधकार कहता है तो कोई उस पर ध्यान नहीं देता। चलो हमें काना कहा तो दूसरे को भी तो एक आंख वाला कहा।
अगर कोई अन्य भारतीय धर्मग्रंथ की बात कहे तो हम भी मूंह फेर सकते हैं पर जब मामला श्रीगीता का हो तब बात हमें कुछ जमती नहीं। हमें याद है कि बचपन में हमने जब हिंदी का प्रारंम्भिक ज्ञान प्राप्त किया था तब महाभारत ग्रंथ पढ़ते समय हमने श्रीगीता को पढ़ा था तब समझ में नहीं आया, पर कहते हैं कि बचपन में कोई बात भले ही समझ में न आये पर उसका अर्थ कहीं न कहीं आदमी के जेहन में रहता है। यही हाल हमारे साथ श्रीगीता का हुआ। अन्य किसी धर्मग्रंथ से जब भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथ की तुलना किसी फिल्मी या साहित्यक गीत, कविता, शायरी या आलेख में होती तो हम सहजता से लेते पर श्रीगीता का नाम आते ही असहज होते हैं। जब हिंदी का पूर्णता से ज्ञान हुआ तब पता लगा कि यह दुनियां की इकलौती ऐसी पुस्तक है जिसमें ज्ञान और विज्ञान है। समय के साथ हम भी चलते रहे पर श्रीगीता का ज्ञान कहीं न कहीं हमारे मस्तिष्क में रहा। इस पर अनेक लेख समाचार पत्रों में भेजे पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। तब हम सोचते थे कि हो सकता है कि हमारे लिखे में कमी हो।

इधर जब से अंतर्जाल पर लिखने का सौभाग्य मिला तो हमने सोचा कि चलो यहां अपनी अध्यात्मिक भूख भी मिटा लो। ऐसा करते हुए हमारा ध्यान श्रीगीता की तरफ जाना स्वाभाविक था। सच बात तो यह है कि अंतर्जाल पर लिखने से पहले हम इतना नहीं लिखते थे पर कहते हैं कि लिखते लिखते लव हो जाये। जब भी अवसर मिलता है श्रीगीता पर अवश्य लिखते हैं और यही लिखते लिखते हमें ऐसा लग रहा है कि या तो हम ही कुछ दिमाग से विचलित हैं या फिर शायर और कवि लोग ही सतही रूप से लिखते रहे हैं। एक तरह से वह कार्ल माक्र्स और अंग्रेजों के चेलों की संगत में नारे और वाद ढोने आदी हो गये हैं।
नारों और वाद पर चलने के आदी हो चुके इस समाज से यह आशा ही नहीं करना चाहिये कि वह कवियों और शायरों की चालाकियों को समझकर उनकी योग्यता पर उंगली उठाये। हम तो दूसरी बात कहते हैं कि जिस विषय पर आप जानते नहीं उस पर नहीं लिखें। हमने केवल भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथ ही पढ़े हैं इसलिये उन पर लिखते हैं-वह भी सकारात्मक पक्ष में। न तो हमने विदेशी लेखकों को पढ़ा है न ही गैर भारतीय धर्म ग्रंथों को देखा है इसलिये उन पर नहीं लिखते। उनकी आलोचना भी नहीं करते क्योंकि उर्दू शायरों की यह प्रवृत्ति हमें बिल्कुल नहीं भाती कि बिना जाने ही किसी विषय पर भी कुछ लिखने लगो।
एक सवाल हमारे दिमाग में आता है कि अगर कोई अन्य धर्म का भारतीय व्यक्ति भारतीय धर्म ग्रंथ पर कुछ प्रतिकूल बात कहता है तो हम उस पर चढ़ दौड़ते हैं चाहे भले ही उसने अपने धर्म ग्रंथ पर भी प्रतिकूल लिखा या कहा हो पर अगर कोई भारतीय धर्म का व्यक्ति ऐसा करे तो उसे हम सामान्य कहकर नजरअंदाज करते हैं-क्या यह हमारी बौद्धिका संकीर्णता का प्रमाण नहीं है।
दरअसल हुआ यह है कि उर्दू शायरों की लच्छेदार शायरियों से प्रभावित होकर जब देश के लोग वाह वाह करने लगे होंगे तो तो हिंदी कवि भी इसी राह पर चल पड़े होंगे। इसमें भी एक पैंच हैं। भले ही उर्दू और हिंदी समान भाषायें लगती हैं पर दोनों का भाव अलग है। एक बार धर्म को लेकर मामला बढ़ गया था तब एक विद्वान ने कहा कि अंग्रेजी में रिलीजन शब्द का भाव सीमित है पर हिंदी में धर्म शब्द का भाव बहुत व्यापक है। यही हाल उर्दू का है। उर्दू का प्यार शब्द दैहिक संबंधों तक ही सीमित है जबकि हिंदी का प्रेम शब्द इतना व्यापक है कि उसे इंसान के अलावा सर्वशक्तिमान और अन्य जीवों से भी जोड़ जाता है और उसे तभी समझा जा सकता है जब हमारे अपने आध्यात्मिक ज्ञान के प्रति आस्था हो। मुख्य बात संकल्प की है और हिंदी के प्रेम शब्द का उच्चारण करते ही हमारे अंदर समस्त जीवों के प्रति दया, करुणा और सहृदयता का भाव आता है।
बात कहां से शुरु हुई और कहां पहुंच गयी। उर्दू शायरों में केवल श्रोताओं और लेखकों में सतही भाव पैदा करने की ललक होती है। इसके विपरीत हिंदी कवियों में इसके साथ ही अध्यात्मिक ज्ञान जाग्रत करने का भाव भी पैदा होता है। मगर उर्दू शायरों की सफलता ने हिंदी कवियों को भी पथभ्रष्ट कर दिया है। यही कारण है कि कबीर, रहीम, तुलसी और मीरा के बाद फिर कोई कवि रत्न पैदा ही नहीं हुआ। यह शिकायत नहीं है और न ही किसी कवि विशेष के विरुद्ध प्रचार है बल्कि अपनी बात कहने का अंतर्जाल पर कहने का जो अवसर मिला है उसका लाभ उठाने का एक प्रयास भर है। हमें तो हर पाठक और लेखक प्रिय है। जो लिखने और पढ़ने में परिश्रम करते हैं। परिश्रम करने वालों का प्रेम करते हुए उनका सम्मान करना चाहिये- श्रीगीता को पढ़ने और समझने के बाद हम इसी निष्कर्ष पर पहुंचे हैं। शेष फिर कभी
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Saturday, August 22, 2009

मनुस्मृति-अध्ययन से पहले ॐ शब्द का जाप करें (manu smruti-om word and education)

अध्येयष्यमाणं तु गुरुर्नित्यकालमतन्द्रितः।
‘अधीष्व भो! इति ब्रुयाद्विरामोऽस्त्विति चारमेत्।।
हिंदी में भावार्थ-
शिष्य को पढ़ाने के विषय में गुरु को कभी भी आलस नहीं बरतना चाहिये। इसके अलावा बेमन से भी अध्यापन का कार्य करना उचित नहीं है। अध्यापन प्रारंभ करने से पहले छात्र से कहना चाहिये कि ‘पढ़ो’ और समाप्ति पर कहना चाहिये कि विश्राम करो।
ब्रह्यणः प्रणवः कुर्यादादावन्ते च सर्वदा।
स्त्रवत्यनोंकृतं पूर्व परस्ताच्च विशीर्यति।।
हिंदी में भावार्थ-
गुरु का यह कर्तव्य है कि वह अध्यापन प्रारंभ करने से पहले ॐ शब्द का आप छात्र से करावे। ऐसा न करने से पढ़ा हुआ स्मरण में नहीं रहता। इस कारण दोनों का परिश्रम व्यर्थ हो जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-वर्तमान शिक्षा पद्धति में अनेक दोष हैं और इसी कारण हमारे यहां समाज में विकृत्तियां बढ़ती जा रही है। हम समाज के आचरण को लेकर तमाम तरह की निराशाजनक प्रतिक्रियायें तो व्यक्त करते हैं पर उसमें सुधार की कोई योजना हमारे पास नहीं है। किसी भी मनुष्य में संस्कार और बौद्धिक निर्माण का समय उसका छात्र जीवन ही रहता है। उस समय संयम और नियम से जीवन व्यतीत करने पर ही शिक्षा प्राप्त हो सकती है। समाज चल रहा है इसकी विपरीत दिशा में। आजकल तो छात्र जीवन ही मौज मस्ती का माना जाता है और कहा जाता है कि आजकल बच्चे अपने माता पिता से अधिक कुशाग्र बुद्धि हैं क्योंकि वह मोबाइल और टीवी का रिमोट चलाना जानते हैं। मगर हम संस्कारों की बात नहीं करते जिनके बारे में सभी मानते हैं कि उनका क्षरण हो गया है। छात्र जीवन में ज्ञान प्राप्त करने के साथ ही इस बात की भी होड़ लगी है कि उसका अधिक से अधिक प्रदर्शन किया जाये।
कहते हैं कि भजन और भक्ति तो बुढ़ापे में किया जाना चाहिये जबकि सच यह है कि जो संस्कार बचपन में नहीं पड़े फिर उनकी स्थापना एकदम कठिन है। ऐसे में बचपन से बच्चों को अपनी नियमित शिक्षा के साथ ही आध्यात्म का ज्ञान भी दिया जाना चाहिये। विद्यालयों में तो यह शिक्षा मिलती नहीं है इसलिये माता पिता या दादा दादी को ही यह दायित्व उठाना चाहिये।
ॐ शब्द का हमारे अध्यात्म में बहुत महत्व है और इसलिये अध्ययन से पूर्व उसका जाप मन ही मन में अवश्य करना चाहिये। शब्दों में ओम को सर्वोत्तम माना गया है। विद्यालयों और महाविद्यालयों में तो इसका जाप अध्यापक कराते नहीं है इसलिये माता पिता को चाहिये कि वह अपने बच्चों को इसका जाप करने का संदेश दें। इसके जाप से पढ़ा हुआ याद रहता है और इससे मन भी स्वच्छ रहता है।
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Saturday, August 8, 2009

श्री गुरु ग्रंथ साहिब-नाचने कूदने से भक्ति नहीं होती (shri guru granth sahib)

नचिअै टपिअै भगति न होइ।
सब्दि मरै भगति पाए जन सोइ।।
हिंदी में भावार्थ-
श्री गुरु ग्रंथ साहिब वाणी के अनुसार नाचने और कूदने से भक्ति नहीं होती। गुरु के शब्द अनुसार ही चलने वाला व्यक्ति ही भक्ति को प्राप्त होता है।
मूत पलीती कपड़ु होइ। दे साबुण लइअै उहु धोइ।।
भरीअै मति पापा के संगि। उहु धोपैं नावे कै रंगि।।
हिंदी में भावार्थ-
मल मूत्र से मलिन वस्त्र साबुन से साफ हो जाते हैं पर जो मन में विकारों की गंदगी है उन्हें तो ईश्वर का नाम स्मरण कर ही धोया जा सकता है।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-भक्ति का भाव किसी को दिखाना संभव नहीं है। जब हम सभी को दिखाने के लिये नाचते कूदते हुए भगवान का नाम लेते हैं तो इसका आशय यह है कि हमारे हृदय में भगवान नहीं बल्कि वह लोग स्थित हैं जिनको हम प्रभावित करने का प्रयास करते हैं। नाम जुबान पर भगवान का होता है पर हृदय में यह भाव होता है कि लोग हमें भक्त समझकर सम्मान दें। इस तरह का ढोंग या पाखंड करने वाले कहीं भी देखे जा सकते हैं। अनेक धार्मिक कार्यक्रमों में संत गीत गाते हैं और उनके भक्त जोर जोर से गाते हुए नाच कर ऐसा दिखाते हैं गोया कि वह भक्ति में लीन हों। यह एक तरह से दिखावा है।

सच तो यह है कि जब आदमी भक्ति के चरम पर होता है उस समय उसका अपने अंगों पर से नियंत्रण समाप्त हो जाता है और वह कहीं मूर्तिमान होकर बैठा रहता है। उसके हाथ कहीं फैले रहते हैं तो सिर कहीं लटका होता है। वैसे भी भक्ति एकांत में की जाने वाली साधना है। भीड़ में तो केवल दिखावा ही हो सकता है।

तन और उस पर पहने जाने वाले कपड़े तो साबुन से साफ हो जाते हैं पर मन के मैले कुचले विचारों का ध्यान, योग साधना तथा हृदय से भगवान का नाम स्मरण किये बिना शुद्ध होना संभव नहीं है। कुछ लोग कहते हैं कि हम तो अपना कर्म ही धर्म समझते हैं पर अपनी आजीविका के लिये कर्म तो सभी जीव करते हैं। मनुष्य यौनि में ही यह सौभाग्य प्राप्त होता है कि हम भगवान का नाम स्मरण कर सकें। इसलिये यह जरूरी है कि हम अपने मन की शांति के लिये नित्य कुछ समय प्राणायम और भक्ति के लिये निकालें।
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Friday, August 7, 2009

मनुस्मृति-योग्य व्यक्तियों से संधि करना ही उचित (manu smruti-study of life)

प्राज्ञं कुलीनं शूरं च दक्षं दातारमेव च।
कृतज्ञः धुतिमंत च कष्टमाहुररि बुधाः।।
हिंदी में भावार्थ-
बुद्धिमान, कुलीन, शूरवीर, चतुर, धर्मात्मा, धैर्यवान, तथा कृतज्ञ व्यक्ति पर विजय पाना कठिन है। ऐसे व्यक्ति से संधि कर लेना चाहिए।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-अनेक अवसर पर क्रोध अथवा विवाद के कारण आदमी अपनी बुद्धि पर नियंत्रण खो बैठता है और यही उसके लिये आपत्ति का कारण बनता है। क्रोध या निराशा की स्थिति क्षणिक और जीवन बहुत लंबा होता है। इसलिये अवसाद के क्षणों में भी बुद्धिमान, वीर, चतुर, धर्मात्मा तथा धैर्य धारण करने वाले व्यक्ति से विवाद मोल नहीं लेना चाहिये। जीवन में पता नहीं कम किस के सहयोग की आवश्यकता पड़ जाये। क्रोध और निराशा के क्षणिक आवेग में सुयोग्य व्यक्ति से बैर लेना भविष्य में उससे मिलने वाले सहयोग की अपेक्षाओं को समाप्त करना है। जब कोई आपत्ति आती है तब उससे निपटने के लिये योजनाबद्ध तरीके से निपटने के लिये कार्यक्रम बनाना, साधन जुटाना तथा नियत समय पर कार्यवाही करने के लिये जिस बौद्धिक चातुर्य की आवश्यकता होती है उसकी पूर्ति के लिये सुयोग्य व्यक्तियों का साथ होना जरूरी है। ऐसे लोगों के साथ हमेशा अच्छा व्यवहार रखना चाहिये।
अनेक लोगों को यह भ्रम होता है कि धनी, प्रतिष्ठित तथा बाहूबली लोगों के साथ मित्रता होने से ही सारे संकट दूर हो जायेंगे तो यह उनका भ्रम है। कुछ लोग तो ऐसे लोगों की संगत में शांतिप्रिय, धैयैवान तथा बुद्धिमान लोगों से बैर भी लेते हैं पर जब विपत्ति आती है तो उन्हें ऐसे ही लोगों की आवश्यकता होती है। यही कारण है कि जीवन में अपने मित्र और सहयोगियों के संग्रह करते समय इस बात को अवश्य देखना चाहिये कि वह न केवल सुयोग्य हों बल्कि समय आपने पर मददगार भी हों। इसके लिये उनके साथ हमेशा सौहार्दपूर्ण संबंध रखें।
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Tuesday, August 4, 2009

गीता संदेश-स्वप्न,भय,शोक,विषाद एवं मद तामसी धारणाशक्ति का प्रमाण (gita sandesh-tamsi dharna shakti)

श्री गीता में श्री कृष्ण महाराज कहते हैं कि
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यथा स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च।
न विमुंचति दुमेंधा धृति सा पार्थ तामसी।।
हिंदी में भावार्थ-
मनुष्य में जिस धारणा शक्ति में स्वप्न, भय, शोक, विषाद और मद व्याप्त होते हैं उसे तामसी धारणाशक्ति कहा जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-पंचतत्वों से बनी यह देह नश्वर है पर मनुष्य अपना पूरा जीवन इसकी रक्षा करते हुए बिता देता है। यह देह जो कभी इस संसार को छोड़ देगी-इस सत्य से मनुष्य भागता है और इसी कारण उसे भय की भावना हमेशा भरी होती है। मनुष्य कितना भी धन प्राप्त कर ले पर फिर भी उसमें यह भय बना रहता है कि कभी वह समाप्त न हो जाये। परिणामतः वह निरंतर धन संग्रह में लगता है। भगवान की सच्ची भक्ति करने की बजाय वह दिखावे की भक्ति करता है-कहीं वह स्वयं को तो कहीं वह दूसरों को दिखाकर अपने धार्मिक होने का प्रमाण जुटाना ही उसका लक्ष्य रहता है।
दिन रात वह अपनी उपलब्धियों के स्वप्न देखता है। अगर आपको रात का सपना सुबह याद रहे तो इसका अर्थ यह है कि आप रात को सोये नहीं-निद्रा का सुख आपसे दूर ही रहा। लोग इसके विपरीत रात के स्वप्न याद रखकर दूसरों को सुनाते हैं। दिन में भौतिक लक्ष्य की प्राप्ति का हर मनुष्य हर पल सपना देखता है। जो उसके पास है उससे संतुष्ट नहीं होता।

सभी जानते हैं कि इस संसार में जो आया है उसे एक दिन यह छोड़ना है पर फिर भी अपने सगे संबंधी के मरने पर वह दुःखी होता है। न हो तो भी जमाने को दिखाने के लिये शोक व्यक्त करता है।
यह देह कभी स्वस्थ होती है तो कभी अस्वस्थ हो जाती है। इस दैहिक विपत्ति से बड़े बड़े योगी मुक्त नहीं हो पाते पर मनुष्य के शरीर में जब पीड़ा होती है तब वह विषाद में सब भूल जाता हैं वह पीड़ा उसके मस्तिष्क और विचारों में ग्रहण लगा देती है। देह में यह परेशान मौसम, खान पान या परिश्रम से कभी भी आ सकती है और जैसे ही उसका प्रभाव कम हो जाता है वैसे ही मनुष्य स्वस्थ हो जाता है पर इस बीच वह भारी विषाद में पड़ा रहता है।
थोड़ा धन, संपदा और शक्ति प्राप्त होने से मनुष्य में अहंकार आ जाता है। उसे लगता है कि बस यह सब उसके परिश्रम का परिणाम है। सब के सामने वह उसका बखान करता है।
कहने का तात्पर्य यह है कि हम दृष्टा की तरह इस संसार को देखें। गुण ही गुणों को बरतते हैं अर्थात हमारे अंदर सपनें, शोक, भय, विषाद और मद की प्रवृत्ति का संचालन वाले तत्व प्रविष्ट होते हैं जिनका अनुसरण यह देह सहित उसमें मौजूद इंद्रियां करती हैं। जब हम दृष्टा बनकर अपने अंदर की चेष्टाओं और क्रियाओं को देखेंगे तब इस बात का आभास होगा कि हम देह नहीं बल्कि आत्मा हैं।
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Saturday, August 1, 2009

विदुर नीति-ईर्ष्या रोग के इलाज के लिये कोई औषधि नहीं (vidur sandesh-irshya ka koyi ilaj nahin)

य ईर्षुः परवित्तेषु रूपे वीर्य कुलान्वये।
सुखभौभाग्यसत्कारे तस्य व्याधिनन्तकः।।
हिंदी में भावार्थ
-जो दूसरे का धन, सौंदर्य, शक्ति और प्रतिष्ठा से ईष्र्या करता है उसकी व्याधि की कोई औषधि नहीं है।
न कुलं वृत्तही प्रमाणमिति मे मतिः।
अन्तेध्वपि हि जातानां वृत्तमेव विशिष्यते।।
हिंदी में भावार्थ-
अगर प्रवृत्ति नीच हो तो ऊंचे कुल का प्रमाण भी सम्मान नहीं दिला सकता। निम्न श्रेणी के परिवार में जन्मा व्यक्ति प्रवृत्ति ऊंची का हो तो वह अवश्य विशिष्ट सम्मान का पात्र है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-ईर्ष्या का कोई इलाज नहीं है। मनुष्य में रहने वाली यह प्रवृत्ति उसका पूरा जीवन ही नरक बना देती है। मनुष्य जीवन में बहुत सारा धन कमाता और व्यय करता है पर फिर भी सुख उससे परे रहता है। सुख कोई पेड़ पर लटका फल नहीं है जो किसी के हाथ में आ जाये। वह तो एक अनुभूति है। अगर हमारे रक्तकणों में आनंद पैदा करने वाले तत्व हों तभी सुख की अनुभूति हो सकती है। इसके विपरीत लोग तो दूसरे के सुख से जले जा रहे हैं। अपनी पीड़ा से अधिक कहीं उनको दूसरे का सुख परेशान करता है। इससे कोई विरला ही मुक्त हो पाता है। ईर्ष्या और द्वेष से मनुष्य में पैदा हुआ संताप मनुष्य को बीमार बना देता है। उसके इलाज के लिये वह चिकित्सकों के पास जाता है। फिर भी उसमें सुधार नहीं होता क्योंकि ईष्र्या और द्वेष का इलाज करने वाली कोई दवा इस संसार में बनी ही नहीं है।

जो लोग जाति, भाषा, धर्म और क्षेत्र के नाम पर सम्मान पाने का मोह पालते हैं वह मूर्ख हैं। उसी तरह पैसा, पद, और प्रतिष्ठा पाने पर अगर कोई यह भ्रम पाल लेता है कि लोग उनका सम्मान करते हैं तो वह भी नहीं रखना चाहिये। लोग दिखाने के लिये अपने से अधिक धनवान का सम्मान करते हैं पर हृदय से उसी व्यक्ति को चाहते हैं जो उनसे अधिक गुणवान होता है। गुणों की पहचान ही मनुष्य की पहचान होती हैं। इसलिये अपने अंदर सद्गुणों का संचय करना चाहिए।
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Thursday, July 30, 2009

चाणक्य नीति-निर्धन को हमेशा अयोग्य न समझें (chankya niti in hindi)

धनहीनो न हीनश्च धनिकः स सुनिश्चयः।
विद्यारत्नेद यो हीनः स हीनः सर्ववस्तुष।।
हिंदी में भावार्थ-
नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि धन से रहित व्यक्ति को
दीन हीन नहीं समझना चाहिये अगर वह विद्या ये युक्त है। जिस व्यक्ति के पास धन और अन्य वस्तुयें हैं पर अगर उसके पास विद्या नहीं है तो वह वास्तव में दीन हीन है।
दुष्टिपतं न्यसेत् पादं वस्त्रपूतं पिबेजलम्।
शास्त्रपूतं वदेद् मनः पूतं समाचरेत्।।
हिंदी में भावार्थ-
आंखों से देखकर जमीन पर पांव रखें। कपड़े से छान कर पानी पियो। शास्त्र से शुद्ध कर वाक्य बोलें और कोई भी पवित्र काम मन लगाकर संपन्न करें।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-समाज में निर्धन आदमी को अयोग्य मान लेने की प्रवृत्ति है और यही कारण है कि उसमें वैमनस्य फैल रहा है। एक तरफ धनी मानी लोग यह अपेक्षा करते हैं कि कोई उनकी रक्षा करे दूसरी तरफ अपनी रक्षा के लिये शारीरिक सामथ्र्य रखने वाले निर्धन व्यक्ति का सम्मान करना उनका अपने धन का अपमान लगता है। संस्कार, संस्कृति और धर्म बचाने के लिये आर्तनाद करने वाले धनी लोग अपने देश के निर्धन लोगों का सम्मान नहीं करते और न ही उनके साथ समान व्यवहार उनको पसंद आता है। धनीमानी और बाहूबली लोग देश पर शासन तो करते हैं पर उसे हर पल प्रमाणिक करने के उनके शौक ने उनको निर्धन समाज की दृष्टि में घृणित बना दिया है।
यह एक सर्वमान्य तथ्य है कि युद्ध में कोई धनीमानी नहीं बल्कि गरीब परिवारों के बच्चे जाते हैं। अमीर तो उनकी बहादुरी और त्याग के वजह से सुरक्षित रहते हैं पर फिर भी उनके लिये गरीब और उसकी गरीबी समाज के लिये अभिशाप है। गरीब की गरीबी की बजाय उसे ही मिटा डालने के लिये उनकी प्रतिबद्धता ने निचले तबके का शत्रु बना दिया है। यह देश दो हजार वर्ष तक गुलाम रहा तो केवल इसलिये कि समाज के धनी और बाहूबली वर्ग ने अपना दायित्व नहीं निभाया।

आदमी को हमेशा ही सतर्क रहना चाहिये। कहीं भी जमीन पर पांव रखना हो तो उससे पहले अपनी आंखों की दृष्टि रखना चाहिये। आजकल जिस तरह सड़क पर हादसों की संख्या बढ़ रही है उससे तो यही लगता है कि लोग आंखों से कम अनुमान से अधिक चलते हैं। अधिकतर बीमारियां पानी के अशुद्ध होने से फैलती हैं और जितना स्वच्छ पानी का उपयोग किया जाये उतना ही बीमार पड़ने का खतरा कम हो जाता है। इसके अलावा निरर्थक चर्चाओं से अच्छा है आदमी धार्मिक ग्रंथों और सत्साहित्य की चर्चा करे ताकि मन में पवित्रता रहे।
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Monday, July 27, 2009

विदुर नीति-सदा चमत्कारपूर्ण वाणी बोलना भी कठिन (vidur niti in hindi)

वाक्संयमो हि नपते सुदुष्करतमो मतः।
अर्थवच्च विचित्रं च न शक्यं बहु भाषितम्।
हिंदी में भावार्थ-
मुख से वाक्य बोलने पर संयम रखना तो कठिन है पर हमेशा ही अर्थयुक्त तथा चमत्कारपूर्ण
वाणी भी अधिक नहीं बोली जा सकती।
अभ्यावहति कल्याणं विविधं वाक् सुभाषिता।
सैव दुर्भाषिता राजन्नर्थायोपपद्यते।।
हिंदी में भावार्थ-
अच्छे और मधुर ढंग से कही हुई बात से सभी का कल्याण होता है पर यदि कटु वाक्य बोले जायें तो महान अनर्थ हो जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-यह सच है कि अपनी वाणी पर सदैव संयम रखना कठिन है। दूसरा यह भी कि हमेशा अपने मुख से चमत्कार पूर्ण वाक्य निकलें यह संभव नहीं है। पांच तत्वों से बनी इस देह में मन, बुद्धि और अहंकार की प्रवृत्तियां हमेशा अपना घर किये बैठी हैं और जब तक आदमी उन पर दृष्टि रखता है तभी तब नियंत्रण में रहती हैं। जहां आदमी ने थोड़ा दिमागी आलस्य दिखाया उनका आक्रमण हो जाता है और मनुष्य उनके प्रभाव में अपने ही मुख से अंटसंट बकने लगता है। आत्मनिंयत्रण करना जरूरी है पर पूर्ण से करना किसी के लिये संभव नहीं है। हम हमेशा अच्छा बोलने का प्रयत्न करें पर दूसरे लोग कभी न कभी अपने व्यवहार से उत्तेजित कर गलत बोलने को बाध्य कर ही देते हैं।

मधुर स्वर और प्रेमभाव से कही गयी बात का प्रभाव होता है यह सत्य है। इसी तरह ही अपने जीवन को सहजता से व्यतीत किया जा सकता है। कठोर एवं दुःख देने वाली वाणी बोलकर भले ही हम अपने अहं की शांति कर लें पर कालांतर में वह स्वयं के लिये ही बहुत कष्टदायी होती है। यह तय है कि हम अपनी मधुर वाणी से दस काम किसी से करवा सकते हैं पर कठोर वाणी से किसी को कष्ट पहुंचाकर स्वयं भी चैन से नहीं बैठ सकते।
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Saturday, July 25, 2009

मनुस्मृति-पश्चाताप के लिये कुरुक्षेत्र या गंगा नहीं जाना तो झूठ का आसरा न लें (jhuth ka asara na len-manu smruti)

एकोऽहमस्मीत्यातमानं यत्तवं कल्याण मन्यसे।
नित्यं स्थितस्ते हृद्येष पुण्यपापेक्षिता मुनिः।।
हिंदी में भावार्थ-
यदि कोई आदमी यह सोचकर झूठी गवाही दे रहा है कि वह अकेला है और सच्चाई कोई नहंी जानता तो वह भूल करता है क्योंकि पाप पुण्य का हिसाब रखने वाला ईश्वर सभी के हृदय में रहता है।
यमो वैवस्वतो देवो यस्तवैध हृदिस्थितः।
तेन चेदविवादस्ते मां गंगा मा कृरून गमः।।
हिंदी में भावार्थ-
सभी के हृदय में भगवान विवस्वान यम साक्षी रूप में स्थित रहते हैं। यदि उनसे कोई विवाद नहीं करना है तथा पश्चाताप के लिये गंगा या कुरुक्षेत्र में नहीं जाना तो कभी झूठ का आश्रय न लें।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अपने स्वार्थ के लिये झूठ बोलना अज्ञानी और पापी मनुष्य का लक्षण है। सभी का पेट भरने वाला परमात्मा है पर लालची, लोभी, कामी और दुष्ट प्रवृत्ति के लोग झूठ बोलकर अपना काम सिद्ध करना अपनी उपलब्धि मानते हैं। अनेक लोग झूठी गवाही देते हैं या फिर किसी के पक्ष में पैसा लेकर उसका झूठा प्रचार करते हैं। अनेक कथित ज्ञानी तो कहते हैं कि सच बोलने से आज किसी का काम नहीं चल सकता। यह केवल एक भ्रम है।
यह दुनियां वैसी ही होती है जैसी हमारी नीयत है। अगर हम यह मानकर चल रहे हैं कि झूठ बोलने से अब काम नहीं चलता तो यह अधर्म की तरफ बढ़ाया गया पहला कदम है। कई लोग ऐसे है जो अपनी झूठी बेबसी या समस्या बताकर दूसरे से दान और सहायता मांगते हैं और उनको मिल भी जाती है। अब यह सोच सकते हैं कि झूठ बोलने से कमाई कर ली पर उनको यह विचार भी करना चाहिये कि दान या सहायता देने वाले ने अपनी धार्मिक प्रवृत्ति के कारण ही अपना कर्तव्य निभाया। इसका आशय यह है कि धर्म का अस्तित्व आज भी उदार मनुष्यों में है। इसे यह भी कहना चाहिये कि यह उदारता ही धर्म के अस्तित्व का प्रमाण है। इसलिये झूठ बोलने से काम चलाने का तर्क अपने आप में बेमानी हो जाता है क्योंकि अंततः झूठ बोलना धर्म विरोधी है।
आदमी अनेक बार झूठ बोलता है पर उसका मन उस समय कोसता है। भले ही आदमी सोचता है कि झूठ बोलते हुए कोई उसे देख नहीं रहा पर सच तो यह है कि परमात्मा सभी के हृदय में स्थित है जो यह सब देखता है। एक मजेदार बात यह है कि आजकल झूठ बोलने वाली मशीन की चर्चा होती है। आखिर वह झूठ कैसे पकड़ती है। होता यह है कि जब आदमी झूठ बोलता है तब उसके दिमाग की अनेक नसें सामान्य व्यवहार नहीं करती और वह पकड़ा जाता है। यही मशीन इस बात का प्रमाण है कि कोई ईश्वर हमारे अंदर है जो हमें उस समय इस कृत्य से रोक रहा होता है।
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Friday, July 24, 2009

रहीम के दोहे-परोपकार करने वाले दोस्ती बीच में नहीं लाते (rahim ke dohe-paropkar aur dosti)

रहिमन पर उपकार के, करत न यारी बीच
मांस दियो शिवि भूप ने, दीन्हो हाड़ दधीच

कविवर रहीम कहते हैं कि जिस मनुष्य का परोपकार करना है वह जरा भी नहीं हिचकता। वह परोपकार करते हुए यारी दोस्ती का विचार नहीं करते। राजा शिवि ने ने प्रसन्न मुद्रा में अपने शरीर का मांस काट कर दिया तो महर्षि दधीचि ने अपने शरीर की हड्डियां दान में दीं।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-विश्व का हर बड़ा आदमी परोपकार करने का दावा करता है पर फिर भी किसी का कार्य सिद्ध नहीं होता। अभिनेता, कलाकार, संत, साहुकार तथा अन्य प्रसिद्ध लोग अनेक तरह के परोपकार के दावों के विज्ञापन करते हैं पर उनका अर्थ केवल आत्मप्रचार करना होता है। आजकल गरीबों, अपंगों,बच्चों,बीमारों और वृद्धों की सेवा करने का नारा सभी जगह सुनाई देता है और इसके लिये चंदा एकत्रित करने वाली ढेर सारी संस्थायें बन गयी हैं पर उनके पदाधिकारी अपने कर्मों के कारण संदेह के घेरे में रहते हैं। टीवी चैनल वाले अनेक कार्यक्रम कथित कल्याण के लिये करते हैं और अखबार भी तमाम तरह के विज्ञापन छापते हैं पर जमीन की सच्चाई यह है कि परोपकार भी एक तरह से व्यापार हो गया है और इसके माध्यम से प्रचार और आय अर्जित करने की योजनाओं को पूरा किया जाता है।
हमारे देश में निरंतर गरीबी और बेरोजगारी बढ़ रही है। कहने को दान धर्म करने वाले बहुत लोग हैं पर देखने वाली बात यह है कि उनके आय के स्त्रोत कितने पवित्र हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि स्वच्छ और परिश्रमी व्यवसायों में लोग इतना नहीं कमा पाते जितना अपवित्र व्यापारों में कमा लेते हैं। ऐसे लोग दान और धर्म भी इसी तरह करते हैं कि जिससे प्रचार मिले और उसकी आड़ में वह अपनी छबि साफ बनाकर समाज में प्रतिष्ठित रह सकें।

जिन लोगों को परोपकार करना है वह किसी की परवाह नहीं करते। न तो वह प्रचार करते हैं और न ही इसमें अपने पराये का भेद करते हैं। उनके लिये परोपकार करना एक नशे की तरह होता है। सच तो यह है कि यह मानव जाति अगर आज भी चैन की सांस ले रही है तो वह ऐसे लोगों की वजह से ले रही हैं ऐसे लोग न केवल बेसहारा की मदद करते हैं बल्कि पर्यावरण और शिक्षा के लिये भी निरंतर प्रयत्नशील होते हैं। वरना तो जिनके पास पद, पैसे और प्रतिष्ठा की शक्ति है वह इस धरती पर मौजूद समस्त साधनों का दोहन करते हैं पर परोपकारी लोग निष्काम भाव से उन्हीं संसाधनों में श्रीवृद्धि करते है। जिनका परोपकार करने का संकल्प लेना है उन्हें यह तय कर लेना चाहिए कि वह प्रचार और पाखंड से दूर रहेंगे।
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Thursday, July 23, 2009

चाणक्य नीति-काम करने का गुण सिंह और बगुले से सीखें (chankya niti-singh aur bagule ke gun)

प्रभूतं कार्यमल्पं या यन्नरः कर्तुमिच्छति।
सवरिमभेण तत्कार्य सिंहादेके प्रचक्षते।।
हिंदी में भावार्थ-
कार्य छोटा हो या बड़ा उससे पूरी शक्ति के साथ करने का गुण सिंह से सीखना चाहिये।
इंद्रियाणि च संयभ्य बकवत् पण्डितो नरः।
देशकालबलं ज्ञात्वां सर्वकार्याणि साधयेत्।।
हिंदी में भावार्थ-
ज्ञानी लोगों को चाहिये कि अपनी इंद्रियों को वश में कर देशकाल के अनुसार अपनी शक्ति को पहचाते हुए कोई भी कार्य एकाग्रता से करने का गुण बगुले से सीखे।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-आज के प्रतियोगी युग में जहां आदमी को अधिक सतर्कता, एकाग्रता तथा अपनी पूरी शक्ति से काम करने की आवश्यकता होती है वहां लोग लापरवाही तथा और बिना सोचे समझे कार्य करने के आदी होते जा रहे हैं। जीवन की सफलता का कोई संक्षिप्त मार्ग नहीं है। दूसरों के कहने में आकर बिना जांचे परखे काम प्रारंभ करने का अर्थ है कि अपने लिये नाकामी और तनाव मोल लेना। इतना ही नहीं दूसरों की सफलता को देखकर उन जैसा ही जल्दी बनने की इच्छा अनेक लोगों को कर्जे और अपराध के दलदल में डाल देती है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि लोगों ने परिश्रम के काम को छोटा काम मान लिया है। हर कोई चाहता है कि वह आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित कार्यालयों में काम करे जहां वह समाज में दूसरे लोगों को सभ्य लगे। परिश्रम के प्रति यह अरुचि समाज में वैमनस्य का भी कारण बन रही है। परिश्रमी व्यक्ति को असम्मानित दृष्टि से देखना उसके अंदर कुंठा को जन्म देती है जो अंततः कहीं घृणा तो कहीं अपराध के रूप में परिवर्तित हो जाती है। इसके अलावा जिन लोगों को परिश्रम से परहेज है वह जिंदगी में अधिक तरक्की भी नहीं कर पाते-केवल ख्वाब देखते हुए तनाव में जीते हैं। काम करने का गुण तो शेर से सीखना चाहिये जो अपने लिये भोजन स्वयं जुटाने के लिये परिश्रम करता है। एकाग्रता बगुले से सीखना चाहिये। जो काम करना है उसी में भविष्य की सफलता मानकर एकाग्रता से उसमें लगना चाहिये।
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Wednesday, July 22, 2009

चाणक्य नीति-विद्वान को धर्म संग्रह की चिंता करना चाहिए (chankya niti-gyani aur dharm sangrah)

नाहारं विच्तयेत् प्राज्ञो धर्ममेकं हि चिन्तयेत्।
आहारा हि मनुष्याणां जन्मना सह जायते।।
हिंदी में भावार्थ-
विद्वान को भोजन तथा अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति की चिंता छोड़कर केवल धर्म संग्रह की चिंता करना चाहिए क्योंकि परमात्मा ने दैहिक आवश्यकताओं की पूर्ति की व्यवस्था पहले ही कर दी है।
जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्वते घटः।
स हेतु सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य चः।।
हिंदी में भावार्थ-
पानी की एक एक बूंद से जिस तरह घड़ा भर जाता है उसी प्रकार थोड़े से अभ्यास से सभी प्रकार विद्यायें, धार्मिक ज्ञान तथा धन प्राप्त किया जा सकता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जीवन में सफलता प्राप्त करने का कोई संक्षिप्त मार्ग नहीं है। जीवन में धीरज के साथ अपने कर्म करने के साथ ही ज्ञानार्जन का अभ्यास सतत करना ही सफलता का मंत्र है। संक्षिप्त मार्ग ढूंढने का आशय है अप्राकृतिक साधनों की तरफ आकर्षित होकर अपने लिये विपत्तियों का बुलाना। लोग एक दिन में ही लखपति और फिर करोड़पति बनना चाहते हैं। सच बात तो यह है कि अवैध या अपराधिक कार्यों में ही यह संभव है पर स्वच्छ और पवित्र व्यवसायों में तो धीरज के साथ ही उन्नति की तरफ बढ़ा जाता है। इस बात पर विचार कर सुख के साथ शांति पूर्वक जीवन की इच्छा करने वालों को अपने व्यवसाय और नौकरी के साथ ही अध्यात्मिक विषयों में भी रुचि लेना चाहिए।
इतना ही नहीं जीवन में परिश्रम से बचने का कोई प्रयास नहीं करना चाहिए। काम करने से ही आत्मविश्वास बढ़ता है और इसके लिये जरूरी है कि अपने प्रयास में नैतिकता और ईमानदारी बरतें। अपने व्यवसाय और अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्ति के कार्य के निरंतर अभ्यासरत रहने से उपलब्धियों प्राप्त होती हैं और इस पर विश्वास करना चाहिए।
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