Monday, April 27, 2009

संत कबीर वाणी-विपत्ति में काम आयें ऐसे लोग कम ही होते हैं


सजन सनेही बहुत हैं, सुख में मिले अनेक।
बिपत्ति पड़े दुख बांटिये, सो लाखन में एक।।

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि इस संसार में जब मनुष्य सुख की स्थिति में होता है तब उसके साथ स्नेह करने वाले सज्जन बहुत होते हैं पर दुःख और विपत्ति में साथ निभायें ऐसे लोगों की संख्या नगण्य ही होती है।
प्रेम प्रीति से मिलै, ताको मिलिये धाय।
कपट राखिके जो मिले, तासे मिलै बलाय।।

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो व्यक्ति सच्चा प्रेम करने वाला हो उससे तो मिलना चाहिये पर जिनके मन में कपट है उनसे दूर रहने में भी भलाई है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जब मनुष्य आत्मनिर्भर और संपन्न होता है तब उसके आसपास लोगों की भीड़ लगी होती है। जो जितना अधिक धनी, उच्च पदारूढ़ और प्रतिष्ठत होता है उसके आसपास उतनी ही भीड़ लगी होती है। अगर हम उनकी तरफ देखें तो लगेगा कि वह तो बड़ा आदमी है। यह केवल सोचने का एक तरीका है और इसका कोई तार्किक आधार नहीं है। जहां शहद फैला होगा वहां चींटियां तो आयेंगी। यही हाल सामान्य मनुष्यों की प्रवृत्ति का भी है। चाहे भले ही धनी, उच्च पदारूढ़ और बाहूबली आदमी से कुछ न मिलता हो पर लोग उसके यहां चक्कर जरूर लगाते हैं कि इस आशा में कि शायद कभी उसकी आवश्यकता पड़ जाये और वह सहायत करे। मगर वह उसके यहां तभी तक जाते हैं जब तक उसके पास शक्ति है और जैसे ही वह उससे विदा हुई वह उससे भी मूंह फेर लेते हैं।

इसलिये अपने उच्च पद, अधिक धन और बाहूबल का अहंकार अपने आसपास लगी भीड़ को देखकर तो नहीं पालना चाहिये क्योंकि जैसे ही वह विदा होगी लोग भी नदारद हो जायेंगे। शक्ति के विदा होते ही जब विपत्तियां आती हैं तब कोई साथ निभाने वाला नहीं होता। कोई कोई होता है जो दुःख में यह सोचकर साथ निभाता है कि अमुक आदमी से अपने अच्छे दिनों में मदद की थी।
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Saturday, April 25, 2009

संत कबीर वाणी-हृदय स्वच्छ हो तभी माला फेरने और जीभ से नाम लेने का लाभ मिलता है


माला फेरै कह भयो, हिंरदा गाठि न खोय।
गुरु चरनन चित राखिये, तो अमरापुर जोय।।

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि हाथ में पकड़कर माला फेरने से कोई लाभ तब तक नहीं होता जब नाम स्मरण हृदय से नहीं किया जाये। यह तभी संभव है जब तब गुरु के चरणों में सिर झुकाकर आदर के साथ उनकी सेवा की जाये तभी अज्ञान और दोष मिट सकते हैं।
माला तो कर में फिरै, जीभ फिरै मुख मांहि।
मनवा तो दहु दिशि फिरै, यह तो सुमिरन मांहि।।

संत शिरोमण कबीरदास जी कहते हैं कि मनुष्य हाथ में माला फेरते हुए जीभ से परमात्मा का नाम लेता है पर उसका मन दसों दिशाओं में भागता है। यह कोई भक्ति नहीं है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-सत्संग में जाना हो या मंदिर में दर्शन करने, जब तक हम परमात्मा का ध्यान हृदय में स्थित नहीं करेंगे तब तक कोई लाभ नहीं होता। देखा जाये तो भक्ति और ज्ञान साधना अपने लौकिक और परलौकिक जीवन को सुखमय करने के लिये करते हैं पर हृदय में केवल भौतिक विषयों का ही ध्यान बना रहता है। भले ही हाथ में माला फेरते हुए परमात्मा का नाम लें या सत्संग में जाकर संतों के प्रवचन सुने पर मन का भटकाव को केवल सांसरिक विषयों में ही बना रहता है। हम वही चिंतायें दुःख और अवसाद हमेशा मस्तिष्क बने रहते हैं जिनसे परेशान होकर हम अध्यात्मिक शांति के लिये उन स्थानों पर जाते हैं जहां सत्संग होता है। इसलिये जब कहीं प्रवचन सुनने जायें या मंदिर में दर्शन करें तब अपने सांसरिक विषयों का विचार मस्तिष्क में नहीं आने देना चाहिये।
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Friday, April 24, 2009

चाणक्य नीतिः गुणों की पहचान न होने पर उपेक्षा होती है

न वेत्ति यो यस्य गुणप्रकर्ष स तं सदा निन्दति नाऽत्र चित्रम्।
यथा किराती करिकुम्भजाता मुक्ताः परित्यज्य विभति गुंजाः।।

हिंदी में भावार्थ- अगर कोई मनुष्य किसी वस्तु या अन्य मनुष्य के गुणों को नहीं पहचानता तो तो उसकी निंदा या उपेक्षा करता है। ठीक उसी तरह जैसे जंगल में रहने वाली कोई स्त्री हाथी के मस्तक से मिलने वाली मोतियों की माला मिलने पर भी उसे त्यागकर कौड़ियों की माला पहनती है।
अकृष्टफलमूलेन वनवासरतः सदा।
कुरुतेऽहरहः श्राद्धमृषिर्विप्रः स उच्यते।।
हिंदी में भावार्थ-
वह विद्वान ऋषि कहलाता है जो जमीन को जोते बिना पैदा हृए फल एवं कंधमूल आदि खाकर हमेशा वन में जीवन व्यतीत करता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-नीति विशारद चाणक्य का कहना है कि अगर किसी व्यक्ति या वस्तु के गुणों का ज्ञान नहीं है तो उसकी उपेक्षा हो ही जाती है। यह स्थिति हम अपने भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान के बारे में आज समाज द्वारा बरती जा रही उपेक्षा के बारे में समझ सकते हैं। हमारे देश के प्राचीन और आधुनिक ऋषियों, मुनियों और तपस्वियों ने बड़े परिश्रम से हमें जीवन और सृष्टि के रहस्यों को जानकर उसका ज्ञान हमारे लिये प्रस्तुत किया पर हमारे देश के विद्वानों ने उसकी उपेक्षा कर दी। यही कारण है कि आज हमारे देश में विदेशी विद्वानों के ज्ञान की चर्चा खूब होती है। देश में पश्चिम खान पान ही सामान्य जीवन की दिनचर्या का भाग बनता तो ठीक था पर वहां से आयातित विचार और चिंतन ने हमारी बौद्धिक क्षमता को लगभग खोखला कर दिया है। यही कारण है कि सामान्य व्यक्ति को शिक्षित करने वाला वर्ग स्वयं भी दिग्भ्रमित है और भारतीय अध्यात्म उसके लिये एक फालतू का ज्ञान है जिससे वर्तमान सभ्यता का कोई लेना देना नहीं है।
जबकि इसके विपरीत पश्चिम में भारतीय अध्यात्म ज्ञान की पुस्तकों पर अब जाकर अनुसंधान और विचार हो रहा है। अनेक महापुरुषों के संदेश वहां दिये जा रहे हैं। हमारी स्थिति भी कुछ वैसी है जैसे किसी घर में हीरों से भरा पात्र हो पर उसे पत्थर समझकर खेत में चिड़ियों को भगाने के लिये कर रहा हो।
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Thursday, April 23, 2009

मनुस्मृतिः अहिंसक व्यक्ति अपना लक्ष्य सहजता से प्राप्त करता है

मनु स्मृति में में कहा गया है कि
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यद्ध्यायति यत्कुरुते धृतिं बध्नाति यत्र च।
तद्वाघ्नोत्ययत्नेन यो हिनस्तिन किंचन।।
     हिंदी में भावार्थ-जो मनुष्य किसी भी प्रकार की हिंसा नहीं करता, वह जिस विषय पर एकाग्रता के साथ विचार और कर्म करता है  अपना लक्ष्य शीघ्र और बिना विशेष प्रयत्न के प्राप्त कर लेता है।

नाऽकृत्वा प्राणिनां हिंसां मांसमुत्यद्यते क्वचित्।
न च प्राणिवधः स्वग्र्यस्तस्मान्मांसं विवर्जयेत्।।
     हिंदी में भावार्थ-किसी भी जीव की हत्या कर ही मांस प्राप्त किया जाता है लेकिन उससे स्वर्ग नहीं मिल सकता इसलिये सुख तथा स्वर्ग को प्राप्त करने की इच्छा करने वालो को मांस के उपभोग का त्याग कर देना चाहिये।
     वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संसार में मनुष्य के चलने के दो ही मार्ग हैं-एक सत्य  परमार्थ और दूसरा असत्य हिंसा। यदि मनुष्य का मन लोभ, लालच और अहंकार से ग्रस्त हो गया तो वह नकारात्मक मार्ग पर चलेगा और उसमें सहृदयता का भाव है तो वह सकारात्मक मार्ग पर चलता है। श्रीगीता के संदेशों का सार यह है कि जैसा मनुष्य अन्न जल ग्रहण करता है तो वैसा ही उसका स्वभाव हो जाता है तब वह उसी के अनुसार ही कर्म करता हुआ फल भोगता है।
      वैसे पश्चिम के वैज्ञानिक भी अपने अनुसंधान से यह बात प्रमाणित कर चुके हैं कि शाकाहारी भोजन और मांसाहारी भोजन करने वालों के स्वभाव में अंतर होता है। वह यह भी प्रमाणित कर चुके हैं कि शाकाहारी भोजन करने वालों के विचार और चिंतन में सकारात्मक पक्ष अधिक रहता है जबकि मांसाहारी लोगों का स्वभाव इसके विपरीत होता है। जहा माँसाहारी उग्र होते हैं वहीँ शाकाहारी शांत स्वाभाव के पाए जाते हैं| अतः जितना संभव हो सके भोजन में मांसाहार से परहेज करना चाहिये।
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Tuesday, April 21, 2009

मनुस्मृतिः लोगों को मूर्ख बनाने वालों को पानी तक न पिलायें

यथा प्लवेनौपलेन निमज्जत्युदके तरन्।
तथा निमज्जतोऽधस्तादज्ञौ दातृप्रतीच्छकौ।।

हिंदी में भावार्थ-जैसे को मनुष्य जल में प्रस्तर की नाव बनाकर डूब जाता है उसी तरह दूसरों को मूर्ख मनाकर दान लेने वाला तथा देना वाला दोनों ही नष्ट हो जाते हैं।

न वार्यपि प्रयच्छेत्तु बैडालव्रति के द्विजे।
न बकव्रतिके विप्रे नावेदविदि धर्मवित्।।

हिंदी में भावार्थ-धर्म की जानकारी रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को चाहिये कि वह ऐसे किसी पुरुष को पानी तक नहीं पिलाये जो ऊपर से साधु बनते हैं पर उनका वास्तविक काम दूसरों को अपनी बातों से मूर्ख बनाना होता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या -हमारे देश में दान देने की बहुत पुरानी परंपरा है। चाहे सतयुग हो या कलियुग दान देने का भाव हमारे देश के लोगों में सतत प्रवाहित है। इसी भाव का देाहन करने के लिये दान लेने वालों ने भी एक तरह से अपना धंधा बना लिया है। यह केवल आज ही नहीं वरन् मनु महाराज के समय से चल रहा है इसलिये वह अपने संदेश में सचेत करते हैं कि अपनी वाणी या कर्म से दूसरे को मोहित कर ठगने वाले को पानी भी न पिलायें। ऐसे ठगों को भोजन खिलाने या पानी पिलाने से कोई पुण्य नहीं मिलने वाला। ऐसे ठगों को दान देने से कोई पुण्य लाभ की बजाय पाप होने की आशंका रहती है। वह स्वयं तो नष्ट होते ही हैं बल्कि दान देने वाला भी नष्ट होता है-उसे इस बात का भ्रम होता है कि वह पुण्य कमा रहा है पर ऐसा होता नहीं है और वह निरंतर पाप का भागी बनता चला जाता है। अतः दान देते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि वह सुपात्र है कि नहीं। देखा जाये तो इस तरह के ठग मनुमहाराज के समय में भी सक्रिय रहे हैं तभी तो उन्होंने ऐसा संदेश दिया है।
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Saturday, April 18, 2009

मनुस्मृतिः दुर्गम स्थानों पर जाने का विचार न करें

अधितिष्ठेन केशांस्तु न भस्मास्थिक पालिकाः।
न कार्पासास्थि न तुषादीर्धमायुजिजीविषुः।।

हिंदी में भावार्थ- जिस व्यक्ति के हृदय में लंबी आयु पाने की इच्छा है उसे कभी बालों, भस्म, हड्डी, खप्पर, कपास की गुठली तथा भूसे के ढेर पर नहीं बैठना चाहिये।
अचक्षुविंषयं दुर्ग न प्रपद्येत कहिंचित्।
न विणुमूत्रमुदीक्षेत न बाहुभ्यां नदीं तरेत्।।

हिंदी में भावार्थ-नीति विशारद चाणक्य कहा कहना है कि जो दुर्गम स्थान आंखों से देखने में कठिन हों वहां कतई नहीं जाना चाहिये। अपनी देह से बाहर निकले मलमूत्र को नहीं देखना चाहिये। किसी नदी को अपने बाहुबल से पार करने का प्रयास नहीं करना चाहिये।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अनेक बार पर्यटन के दौरान ऐसे स्थान सामने आते हैं जो बहुत दुर्गम होते हैं। उनको पेड़ पौद्यों ने घेर रखा होता है। वहां की हरियाली का सौंदर्य देखते ही बनता है पर अगर वह दुर्गम और अगम्य हैं तो वहां जाना खतरनाक हो सकता है। पिकनिक और पर्यटन के दौरान ऐसी अनेक दुर्घटनायें होती हैं जो लोगों के दुस्साहस और अज्ञान के कारण होती है। वैसे भी कहा जाता है कि आग, पान, और हवा से कभी नहीं खेलना चाहिये। आदमी कितना भी अच्छा तैराक क्यों न हो उसे नदी के पार जाने के लिये जल वाहनों का प्रयोग करना चाहिये। अनावश्यक दुस्साहस जीवन के लिये कष्टकारक होता है।
इन संदेशों का जीवन के संदर्भ में भी बहुत महत्व है। हमें अपने लक्ष्य और उद्देश्य हमेशा ही ऐसे तय करना चाहिये जिनकी प्राप्ति सहज हो। अपनी शक्ति और साधनों से अधिक महत्वाकांक्षी उद्देश्य और लक्ष्य संकट का कारण हो सकते हैं। इतना ही नहीं ऐसे स्थानों पर निवास करने का विचार भी नहीं करना चाहिये जहां के लोगों की प्रवृत्ति दुर्गम और क्रूर हो। इस विश्व में अनेक संस्कृतियां और समाज हैं। उनके परस्पर इतिहास, भूगोल, संस्कार, शिक्षा और ज्ञान की दृष्टि से ढेर सारे विरोधाभास हैं। यही विरोधाभास लोगों के आपसी संबंध को प्रगाढ़ बनाने में बाधक हैं। अतः जहां अपने समाज से विरोधी संस्कार वाला समाज हो वहां रहने का आशय यही है कि स्वयं ही दुर्गम स्थान पर जाना जो भारी कष्ट का कारण बन जाता है। जो व्यक्ति अपना समाज, शहर या अपना देश छोड़कर दूसरी जगह जाते हैं और वहां उनको सामाजिक और वैचारिक दृष्टि से आपसी मेलमिलाप वाले लोग नहीं मिलते तब उनके लिये जीवन दुरुह हो जाता है।
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Thursday, April 16, 2009

चाणक्य नीतिः गलत संबंध बनाना श्रेष्ठ व्यक्ति के लिये दुःखदायी

दुराचारी च दुर्दृष्टिराऽवासी च दुर्जनः।
यन्मैत्री क्रियते पुम्भिर्नरः शीघ्रं विनश्यति।।

हिन्दी में भावार्थ-दुराचारी, कुदृष्टि रखने और बुरे स्थान पर रहने वाले व्यक्ति से संबंध बनाने पर श्रेष्ठ और सज्जन व्यक्ति शीघ्र नष्ट हो जाता है।
ग्रहीत्वां दक्षिणां विप्रास्त्यजन्ति यजमानकम्।
प्राप्तविद्यां गुरुं शिष्या दग्धाऽरण्यं मृगास्तथा।
हिंदी में भावार्थ-
ब्राह्मण दक्षिणा लेकर यजमान का घर छोड़ देते हैं। गुरु से शिक्षा प्राप्त कर शिष्य उसे दक्षिण देकर आश्रम से चले जाते हैं। उसी तरह जंगल जल जाने पर मृग उसका त्याग कर देते हंै।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-संबंध बनाने में हमेशा सतर्कता बरतना चाहिये। देखा गया है कि आजकल के युवक युवतियां अक्सर संबंध तात्कालिक आकर्षण में फंसकर मित्रता ऐसे लोगों से कर बैठते हैं जिनके स्वभाव और इतिहास का पता उनको नहीं होता। बाद में जब वह उनकी वजह से कहीं फंस जाते हैं तब उनको अपनी गलती की अनुभूति होती है मगर तब देर भी हो जाती है। ऐसी एक नहीं अनेक घटनायें घटित हो चुकी हैं जिसमें किसी भले युवक ने किसी गलत साथी का चुनाव किया और बाद में उसके अपराध के छींटे उस पर भी पड़े। उसी तरह युवतियों ने भी प्रारंम्भिक आकर्षण में आकर ऐसे लड़कों से प्रेम प्रसंग स्थापित किये जिसका परिणाम उनके लिये घातक रहा। कई बार तो वह ऐसे युवकों से विवाह भी कर बैठती हैं जो दिखाने के लिये अपने संस्कर अच्छे दिखाते हैं पर बाद में उनकी असलियत सामने आती है तो युवतियों को पछतावा होता है। अनेक युवतियां पहले अपने घरेलू संस्कारों को भुलाकर ऐसे लड़कों से विवाह कर बैठती हैं जिनके घरेलू संस्कार बिल्कुल विपरीत होते हैं। विवाह से पहले तो उनके घर से लड़कियों का संबंध नहीं होता पर बाद विवाह बाद जब उसके परिवार वाले अपने संस्कार अपनाने को विवश करते हैं तब लड़कियों को बहुत परेशानी आती है और इसी बात पर सबसे अधिक तनाव उनको ही झेलना पड़ता है क्योंकि पुरुष तो घर से बाहर रहता है। कहने का तात्पर्य यह है कि लड़का हो या लड़की उसे अपने संबंध बनाने से पहले सामने वाले व्यक्ति की पूरी जांच करना चाहिये।

नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि जब कहीं से अपना उद्देश्य पूरा हो जाये तो उस स्थान पर अधिक नहीं ठहरना चाहिये। कहने का तात्पर्य यह है कि इस जीवन में अपने कार्य और उद्देश्य पूर्ति के लिये अनेक स्थानों पर जाने के साथ ही लोगों से संपर्क भी बनाने पड़ते हैं। उनमें अपनी लिप्तता उतनी ही रहना चाहिये जितनी अपने हित के लिये आवश्यक हो। अधिक लिप्तता कार्य और उद्देश्य पर बुरा प्रभाव डाल सकती है।
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Monday, April 13, 2009

भर्तृहरि शतकः परमात्मा ने एकांत में मौन रहने का गुण भी दिया है

स्वायत्तेमेकांतगुणं विधात्रा विनिर्मितम् छादनमज्ञतायाः।
विशेषतः सर्वविदां समाजे विभूषणं मौनमपण्डितनाम्।।

हिंदी में भावार्थ-विधाता ने स्वयं को एकांत में मौन रहने का गुण बनाया है उसके लिये किसी के सामने याचना करने की आवश्यकता नहीं है। मनुष्य चाहे जब एकांत में बैठकर मौन रह सकता है। समाज में रहते हुए मौन रहने की शक्ति किन्हीं किन्हीं विद्वानों में होती है और वह समाज का अलंकरण मानत जाते हैं।
वर्तमान संपादकीय व्याख्या-परमात्मा ने वाणी दी है पर सभी लोग उससे अपनी बात कहना चाहते हैं। परमात्मा ने कान दिये हैं पर कोई किसी की सुनना उनसे नहीं चाहता। भगवान ने आंखें दी है और इंसान देखता है पर सोचने समझने के लिये बुद्धि भी दी है वह उससे हर दृश्य का विश्लेषण का करते हुए उसके अच्छे और बुरे का विचार नहीं करता।
समाज में जिसे देखों ज्ञान चर्चा कर रहा है पर उसे धारण कोई नहीं करता। स्थिति यह है कि किसी से कोई बात कही जाये तो उसने सुनी कि नहीं इसका यकीन नहीं होता। अगर सुनी तो उसे समझा कि नहीं इसका आभास भी नहीं होता। कई बार एकांत में बैठकर यह विचार हमारे दिमाग में आता है कि हम क्यों अपने दुःख दर्द दूसरों को सुनाते हैं जबकि सभी उसी में फंसे है।
लोगों ने शोर का प्रत्युतर शोर ही बना लिया है जबकि उसका प्रतिकार मौन से ही किया जा सकता है। दूसरों को अपनी समस्यायें और दुःख दर्द सुनाने की बजाय एकांत में मौन रहकर उन पर विचार करें तो कोई मार्ग बन सकता है। लोगों के बीच अपनी बात कहते हुए अपनी हंसी का पात्र बनने से अच्छा है कि हम एकांत में उस पर योजना बनाये। भगवान ने आदमी को आजाद बनाया है और उसे एकांत में बैठकर मौन रहने का गुण भी दिया है तब उसका उपयोग किया जाय तो क्या बुराई है?
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Sunday, April 12, 2009

चाणक्य नीतिः बड़ी आयु होने पर भी कुसंस्कार नहीं जाते

वयसः परिणामेऽपि यः खलः खलः एव सः।
सुपक्वमपि माधुर्य नोपयातीद्रवारुणाम्।।

हिंदी में भावार्थ-आयु में बड़ा हो जाने पर भी दुष्ट की दुष्टता का भाव नहीं जाता। जैसे किसी फल का स्वाद स्वाभाविक रूप कड़वा होता है और उसे अधिक देर तक इसलिये पकाया जाये कि उसमें मीठे का स्वाद आ जाये तो वह संभव नहीं है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य में संस्कार और आस्थायें स्थापित होने के लिये दस या बारह वर्ष तक की आयु मानी जाती है। कुछ संस्कार तो अगर पांच वर्ष तक पड़ जायें तो ठीक नहीं तो उनका फिर आना मुश्किल होता है। कहने का तात्पर्य है छोटी आयु में ही बच्चों में संस्कार डालने का प्रयास करना चाहिये। कुछ माता पिता यह सोचकर बच्चों की परवाह नहीं करते कि ‘अभी तो छोटा है बड़ा होकर सीख जायेगा‘। इतना ही नहीं वह अपने बच्चों के सामने ही लड़ाई झ्रगड़ा और अपने रिश्तेदारों की निंदा करते हैं-सोचते हैं कि यह छोटा है भला क्या समझेगा? और समझ भी ले तो क्या? माता पिता के व्यवहार, आचरण और कार्य से बच्चे बहुत कुछ सीखते हैं। कई चीजें उनको बताई नहीं जाती बस देखकर ही सीख जाते हैं।

संस्कार और आस्थायें स्थापित करने की आयु में अगर माता पिता ने उचित प्रयास नहीं किया या लापरवाही दिखाई तो बाद में उसका परिणाम उनको भोगना पड़ता है। आजकल समाज में लोगों का अपराध, व्यसन और समाज के प्रति उपेक्षा का जो भाव दिख रहा है वह उनके ही पूर्वजों की लापरवाही का परिणाम है। एक अन्य बात यह है कि माता पिता अपने बच्चे को बस यही सिखाते हैं कि अधिक से अधिक कमाओ, प्रतिष्ठत पद प्राप्त करो और जिंदगी मं केवल अपने स्वार्थ ही पूरे करो। बाद में जब बच्चे उनकी ही उपेक्षा करने लगते हैं तब अपने बुढ़ापे को कोसते हैं। जो माता पिता अपने बच्चों की उपेक्षा की शिकायत करते हैं अगर उनसे कहा जाये कि ‘आपने ही यह संस्कार दिये होंगे।’ तब वह जवाब नहीं दे पायेंगे। आप अपने बच्चे के सामने अपनी पत्नी को प्रसन्न करने के लिये अपने माता पिता, भाई बहिन तथा अन्य रिश्तेदारों की निंदा कर बड़े होने पर उससे किसी प्रकार की उदारता की आशा नहीं कर सकते।
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Friday, April 10, 2009

चाणक्य नीतिः अधिक धन को घर से वैसे ही निकालें जैसे तालाब से पानी! (chankya niti on tha money and house)

उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणम्।
तडागोदरसंस्थानां परीवाह इवाऽमभासाम् ।।

हिंदी में भावार्थ-अपने द्वारा अर्जित धन का त्याग करना ही उसकी रक्षा करने का प्रयास है। जिस तरह तालाब में अधिक भरे जल को निकालने से उसकी रक्षा होती है वैसे ही अपने धन की रक्षा भी तभी संभव है जब उसमें से कुछ निकाल दिया जाये।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-व्यक्ति के लोभ की कोई सीमा नहीं है और यही कारण है कि वह केवल धन संग्रह में लगा रहता है। हर आदमी यही सोचता है कि उसका धन केवल उसे ही दिख रहा है बाकी लोग तो उसे जानते नहीं है इसलिये वह सुरक्षित है। यह केवल एक वहम है। दरअसल धन का कोई महत्व हो या नहीं पर इतना तो जरूर है कि वह आत्मविश्वास का एक बहुत बड़ा स्त्रोत है। इसलिये जिस आदमी के पास धन आता है उसका अहंकार भी बढ़ता जाता है। कहीं न कहीं आदमी अपने मुख से ही अपने धन की महिमा का बखान करने ही लगता है। इस तरह अन्य लोगों को वैसे भी धन होने का आभास हो जाता है। यह संभव नहीं है कि आदमी के पास बहुत सारा धन हो और यह बात किसी अन्य को पता नहीं चले। ऐसे में अल्प धन वाले लोगों की नजरें उस पर लगी रहती हैं। ऐसे में अपने धन की रक्षा का एक ही उपाय है कि उसे निकाला जाये। निकालने से यह आशय यह नहीं कि उसका अपव्यय किया जाये बल्कि गरीब और मजबूरों की सहायता करने के उद्देश्य से दान किया जाना चाहिये।
यह दान करते हुए अपने मन में कोई अहंकार नहीं पालने की बजाय यह सोचना चाहिये कि हम तो अपने धन के तालाब की रक्षा कर रहे हैं। जिस तरह तालाब में पानी भर जाने पर उसे निकाला न जाये तो वह किनारों को क्षतिग्रस्त और गंदा करते हुए बाहर स्वतः बहने लगता है वैसे ही धन भी पानी की तरह है। अगर अधिक धन का परित्याग नहीं करेंगे तो वह बुरी नजर वालों को आपके घर में आने का आमंत्रण देगा या फिर ऐसी परेशानियां देगा जिसमें आपका धन अनावश्यक व्यय होगा।
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Thursday, April 9, 2009

संत कबीरदास की वाणी-तेरा प्रीतम और बैरी तेरे अंदर ही है (kabir ke dohe-tera pritam aur dushman andar hai)

हरिजन सोई जानिए, जिव्हा कहैं न मार।
आठ पहर चितवन रहै, गुरु का ज्ञान विचार।।

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि भगवान का सच्चा भक्त वही है जो अपनी जीभ से कभी यह नहीं कहता कि ‘इसे या उसे मार’। वह आठों पहर अपने गुरु के ज्ञान का विचार करते हुए अहिंसा भाव से रहता है।
शीतल शब्द उचारिये, अहं आनिये नाहिं।
तेरा प्रीतम तुझहि में, दुसमन भी तुझ माहिं

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपने मूंह से हमेशा ही ऐसे शब्दों का उच्चारण करो जो दूसरे को श्ीतलता प्रदान करें। अपने अहंकार में भरकर किसी से कठोर वचन मत कहो। सच बात तो यह है कि अपना दुश्मन या प्रेमी अपने अंदर ही है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जीवन में सारा खेल हमार इंद्रियों का है। इनमें भी सबसे अधिक हमारी जीभ का है। यही जीभ हमें तपती धूप में खड़ा कर सकती है और यही किसी छत के नीचे छाया दिला सकती है। ऐसी अनेक धटनायें होती हैं जिसमें बात बेबात मूंहवाद होने पर कत्लेआम हो जाता है। कहते हैं कि ‘न सूत न कपास, जुलाहों में लट्टम लट्ठा’। इसका संबंध केवल बुनकरों से नहीं है बल्कि यह पूरे समाज पर लागू होता है। लोग अपने अहंकार की तुष्टि के लिये अपनी वाणी का दुरुपयोग करते हैं और फिर होता है झगड़ा। अगर आप आये दिन होने वाले झगड़ों का विश्लेषण करें तो पता लगेगा कि बात तो कोई खास है नहीं है बल्कि झगड़ा करने वाले लोग अपने अहंकार की तुष्टि करने के लिये वाणी की आजादी का दुरुपयोग करना चाहते हैं। वह चाहते हैं कि उनकी कटु बातों का कोई प्रतिकार न करे। वह अपशब्द बोलें तो लोग सहें।
सच बात तो यह है कि जो भक्ति और ज्ञानार्जन में लीन होते हैं वह इस तरह का व्यवाहर नहीं करते। उनकी वाणी हमेशा सार्थक वचनों का प्रवाह करती है। हालांकि ऐसे लोगों की संख्या अब बहुत कम है।
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Wednesday, April 8, 2009

चाणक्य नीतिः भंवरे को कमलिनी के रस का महत्व विदेश में पता चलता है

अलिरय नलिनीदलमध्यगः मलिनीमकरंदमदालसः।
विधिवशात्परदेशमुपागतः कुटजपुष्परसं बहु मन्यते।।


हिन्दी में भावार्थ-भंवरा जब तक कमलिनी के बीचों बीच रहकर उसके रस का सेवन करता तब उसके नशे में आलस्य उसे घेरे रहता है मगर जब समय और भाग्यवश परदेस में जाना पड़ता है तब कुटज के फूल के रस को भी बहुत महत्वपूर्ण मानता है जिसमेें किसी प्रकार की गंध नहीं होती।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- जिन लोगों का जन्म ही सुविधा संपन्न परिवारों में होता है वह अभावों का अर्थ नहीं जानते। तब वह लोग अपनी सुविधाओं के बारे में यह सोचते हैं कि यह तो उनको जन्मजात विरासत में मिली है। इसके अलावा अपने लिये उपलब्ध धन तथा भौतिक उपलब्ध साधनों का महत्व नहीं समझते। ऐसे में जब किसी कारण वश जब उनको उन सुविधाओं से वंचित हो पड़ता है तब पता लगता है कि वास्तव में उनका क्या मोल है?
इस संदेश में भारत में उपलब्ध जल संपदा का उदाहरण ले सकते हैं। विश्व के अनेक वैज्ञानिकों के अनुसार भारत में भू जल स्तर किसी भी अन्य देश से अधिक है। प्रकृत्ति की इस कृपा का महत्व हम कम वर्षा काल में भी नहीं कर पाते क्योंकि भूजल स्तर इतना तो उपलब्ध हो ही जाता है कि हमारा काम चल जाये। जिन देशों में यह उपलब्ध नहीं है वहां एक वर्ष की अल्प वर्षा में ही अकाल का महान प्रकोप उपस्थित हो जाता है। भारत में वह लोग जो पानी का अपव्यय करते हैं और उनका विदेश में-खासतौर से मध्य एशिया में-प्रवास होता है तब उनको वहां पता लगता है कि पानी कितना महत्वपूर्ण है। इतना ही नहीं भारत के ही कुछ रेगिस्तानी भागों में जाने पर भी उनको पता लगता है कि पानी का कितना महत्त है? कहने का तात्पर्य यह है कि जो वस्तु उपलब्ध है उसका महत्व तब पता लगता है जब वह हाथ से निकल जाती है।
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Tuesday, April 7, 2009

भर्तृहरि शतकः तेजस्वी लोग अपना अपमान सहन नहीं करते (hindu dharm and thought)

यद चेतनाऽपिापदैः स्पृष्टः प्रज्वलति सवितुरिनकान्तः।
तत्तेजस्वी पुरुषः परकृत निकृतिं कथं सहते।।

हिंदी में भावार्थ- जब जड़ सूर्यकांतिमणि भी सूर्य की तीव्र किरणों में जल जाती हैं तो तेजस्वी ज्ञानी पुरुष-जो चेतन होता है-भला कैसे किसी के अपमान को सहकर चुप बैठ सकता है?
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-यह अजीब बात है कि जब कहीं किसी मूर्ख और विद्वान में विवाद होता है तो विद्वान जब उसका प्रतिकार क्रोध में करता है तो बीच बचाव करने वाले कहते हैं कि ‘आप तो ज्ञानी हो क्रोध क्यों करते हो?’
अनेक बार ऐसे अवसर हमारे सामने आते हैं जब हम देखते हैं कि तमाम तरह के ज्ञान और अध्यात्म की पूंजी से संपन्न विद्वान अपने ऊपर हुए अपमानजनक शब्दाक्रमण का प्रतिकार करते हैं तब सामान्य लोग उनका उपहास उड़ाते हैं कि ‘देखो कितना ज्ञानी बनता है’। दरअसल यह उनकी अज्ञानता का ही प्रमाण है। सच बात तो यह है कि सामान्य लोग मूर्ख से डरते हैं इसलिये उसे समझाने या धमकाने की बजाय विद्वान, संतों और सहज जीवन व्यतीत करने वाले लोगों का मजाक उड़ाते हैं।
अज्ञानियों, मूर्खों, धनवानों और बाहूबलियों से डरकर उनके आगे सिर झुकाने वाले लोगों के लिये तेजस्वी विद्वान लोगों का मजाक उड़ाना आसान है। लोग यही करते हैं पर भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि जब जड़ पदार्थ सूर्य की किरणों से जल जाता है तो तेजस्वी और ज्ञानी आदमी भला कैसे अपना अपमान सह सकता है।
वैसे क्रोध करना अच्छी बात नहीं है पर चाणक्य कहते हैं कि ‘अवसर आये तो सांप की तरह फुफकारो अवश्य’। सभी संाप जहरीले नहीं होते पर अपने ऊपर आक्रमण होने पर फुफकारते हैं। इसलिये अगर तेजस्वी और ज्ञानी व्यक्ति अपने ऊपर आक्रमण होने पर जब उसका क्रोध में प्रतिकार करते हैं तो उस आक्षेप करना अनुचित हैं। यहां यह भी याद रखने वाली बात है कि ज्ञानियों का क्रोध उनको नहीं जलाता क्योंकि वह उसे अपने अंदर अधिक देर ठहरने नहीं देते। इसक अलावा क्रोध करने के बाद वह क्षमा भी प्रदान करते हैं जबकि सामान्य आदमी के लिये यह कठिन होता है। इसलिये तेजस्वी और ज्ञानियों के क्रोध पर उन्हें उनके ज्ञान का वास्ता नहीं दिया जाना चाहिये।
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Monday, April 6, 2009

भर्तृहरि शतकः अपमान झेलने पर भी तृष्णा कहां शांत होती है?

भ्रान्तं देशमनेकदुर्गविषमं प्राप्तं न किंचित्फलं त्यकत्वा जातिकुलाभिमानमुचितं सेवा कृता निष्फला।
भुक्तं मानिववर्जितं परगुहेध्वाशंक्या काकवततृष्णे दुर्गतिपापकर्मनिरते नाद्यापि संतुष्यसि ।।

हिंदी में भावार्थ- राजा भर्तृहरि कहते हैं कि अनेक दुर्गम और कठिन देशों में गया पर वहां कुछ भी न मिला। अपनी जाति और कुल का अभिमान त्याग कर दूसरों की सेवा की पर वह निष्फल गयी। आखिर में कौवे की भांति भयभीत और अपमानित होकर दूसरों के घरों में आश्रय ढूंढता रहा। अपने मन की तृष्णा यह सब झेलने पर भी शांत नहीं हुई।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- मन की तृष्णा आदमी को हर तरह का अपमान और दुर्गति झेलने को विवश करती है। कहते हैं कि जिसने पेट दिया है वह उसके लिये भोजन भी देगा पर आदमी को इस पर विश्वास नहीं है। इसके अलावा वह केवल दैहिक आवश्यकताओं से संतुष्ट नहीं होता। उसके मन में तो भोग विलास और प्रदर्शन के लिये धन पाने की ऐसी तृष्णा भरी रहती है जो उसे अपने से कम ज्ञानी और निम्न कोटि के लोगों की सेवा करने को विवश कर देती है जिनके पास धन है। वह उनकी सेवा में प्राणप्रण से इस आशा जुट जाता है कि वह धनी आदमी उस पर प्रसन्न होकर धन की बरसात कर देगा।
आदमी अपने से भी अल्प ज्ञानी बाहुबली और पदारूढ़ व्यक्ति के इर्दगिर्द घूमने लगता है कि वह उसका प्रतिष्ठा के शिखर पर पहुंचा देगा। किसी भी आदमी की ऐसी तृष्णा शांत नहीं होती। इस दुनियां में हर बड़ा आदमी अपने से छोटे लोगों की सेवा तो लेता है पर अपने जैसा किसी को नहीं बनाता। छोटा आदमी धन और मान सम्मान पाने की इसी तृष्णा की वजह से इधर उधर भटकता है पर कभी उसके हाथ कुछ नहीं आता। मगर फिर भी वह चलता जाता है। उसकी तृष्ण उसे इस अंतहीन सिलसिले से परे तब तक नहीं हटने देती जब तक वह देह धारण किये रहता है।
जीवन के मूल तत्व को जानने वाले ज्ञानी इससे परे होकर विचार करते हैं और इसलिये जो मिल गया उससे संतुष्ट होकर भगवान की भक्ति में लीन हो जाते हैं। वह अपने तृष्णाओं के वशीभूत होकर इधर उधर नहीं भटकते जो कभी शांत ही नहीं होती।
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Sunday, April 5, 2009

चाणक्य नीतिः उच्च कुल में उत्पन्न होने पर भी विद्या रहित होने से क्या लाभ?

किं कुलेन विशालेन विद्याहीनेन देहिनाम्।
दुष्टकुलीनोऽपि विद्वांश्च देवैरपि सुपूज्यते।।

हिंदी में भावार्थ- आचार्य चाणक्य कहते हैं कि प्रतिष्ठित कुल में जन्म लेने के बावजूद ज्ञान और विद्या से रहित होने वाले व्यक्ति से समाज को कोई लाभ नहीं होता। उससे तो निम्म कोटि में उत्पन्न व्यक्ति धन्य है जो विद्वता अजिर्त कर समाज में सम्मान पाते हैं।
विद्वान् प्रशस्यते लोक विद्वान् गच्छति गौरवम्।
विद्ययां लभते सर्व विद्या सर्वत्र पूज्यते।।

हिंदी में भावार्थ-सारे संसार में विद्वान ही प्रशंसा के योग्य होते हैं और उनका अपनी विद्या े कारण गौरव प्राप्त होता है। विद्या का यह गुण है कि उससे प्राप्त करने वाले व्यक्ति का सभी जगह सम्मान हेाता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-चाहे कोई व्यक्ति कितने भी धनी,प्रतिष्ठत और उच्च कुल में पैदा क्यों न हुआ अगर उसके पास विद्या और ज्ञान नहीं है तो उसका समाज में कोई हृदय से सम्मान नहीं करता। यह अलग बात है कि धनी, बाहूबली और उच्च परिवार का होने के कारण किसी व्यक्ति के समक्ष कोई उसका दोष नहीं कहता और दिखाने के लिये सामने सभी वाह वाह करते हैं पर हृदय से उसका सम्मान नहीं होता। यह सही है कि धन जीवन की जरूरत है पर मान सम्मान से जीन में भी मनुष्य की शान होती है। समाज तभी किसी व्यक्ति का सम्मान करता है जब वह अपने कर्म से जनहित मेें काम करता है। जिसके पास विद्या है वही इस सत्य को जानते हैं इसलिये समाज को भी यही शिक्षा देते हैं। विद्या के बिना मनुष्य पशु की तरह बनकर रह जाता है। चाहे व्यक्ति गरीब हो या अमीर, राजा हो या रंक, और स्त्री हो या पुरुष विद्यावान व्यक्ति का ही सम्मान करते हैं क्योंकि उससे उनको आपातकाल में बौद्धिक सहायता मिलती है।
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Thursday, April 2, 2009

चाणक्य नीतिः अर्थोपासक विद्वान समाज के किसी काम के नहीं होते

अर्थार्थीतांश्चय ये शूद्रन्नभोजिनः।
त द्विजः कि करिष्यन्ति निर्विषा इन पन्नगाः।।


हिंदी में भावार्थ- नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि अर्थोपासक विद्वान समाज के लिये किसी काम के नहीं है। वह विद्वान जो असंस्कारी लोगों के साथ भोजन करते हैं उनको यश नहीं मिल पता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- इस देश का अध्यात्मिक ज्ञान सदेशों के अनमोल खजाने से भरा पड़ा है। उसका कारण यह है कि प्राचीन विद्वान अर्थ के नहीं बल्कि ज्ञान के उपासक थे। उन्होंने अपनी तपस्या से सत्य के तत्व का पता लगाया और इस समाज में प्रचारित किया। आज भी विद्वानों की कमी नहीं है पर प्रचार में उन विद्वानों को ही नाम चमकता है जो कि अर्थोपासक हैं। यही कारण है कि हम कहीं भी जाते हैं तो सतही प्रवचन सुनने को मिलते हैं। कथित साधु संत सकाम भक्ति का प्रचार कर अपने भोले भक्तों को स्वर्ग का मार्ग दिखाते हैं। यह साधु लोग न केवल धन के लिये कार्य करते हैं बल्कि असंस्कारी लोगों से आर्थिक लेनदेने भी करते हैं। कई बार तो देखा गया है कि समाज के असंस्कारी लोग इनके स्वयं दर्शन करते हैं और उनके दर्शन करवाने का भक्तों से ठेका भी लेते हैं। यही कारण है कि हमारे देश में अध्यात्मिक चर्चा तो बहुत होती है पर ज्ञान के मामले में हम सभी पैदल हैं।
समाज के लिये निष्काम भाव से कार्य करते हुए जो विद्वान सात्विक लोगों के उठते बैठते हैं वही ऐसी रचनायें कर पाते हैं जो समाज में बदलाव लाती हैं। असंस्कारी लोगों को ज्ञान दिया जाये तो उनमें अहंकार आ जाता है और वह अपने धन बल के सहारे भीड़ जुटाकर वहां अपनी शेखी बघारते हैं। इसलिये कहा जाता है कि अध्यात्म और ज्ञान चर्चा केवल ऐसे लोगों के बीच की जानी चाहिये जो सात्विक हों पर कथित साधु संत तो सार्वजनिक रूप से ज्ञान चर्चा कर व्यवसाय कर रहे हैं। वह अपने प्रवचनों में ही यह दावा करते नजर आते हैं कि हमने अमुक आदमी को ठीक कर दिया, अमुक को ज्ञानी बना दिया।
अतः हमेशा ही अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने के लये ऐसे लोगों को गुरु बनाना चाहिये जो एकांत साधना करते हों और अर्थोपासक न हों। उनका उद्देश्य निष्काम भाव से समाज में सामंजस्य स्थापित करना हो।
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Wednesday, April 1, 2009

कबीर के दोहे: राम के भक्त हमेशा मजे में रहते हैं

दुखिया भूखा दुख कीं, सुखिया सुख कौं झूरि
सदा अजंदी राम के, जिनि सुख-दुख गेल्हे दूरि

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि भूख के कष्ट के कारण दुखी आदमी मर रहा है तो ढेर सारे सुख के कारण सुखी भी कष्ट उठा रहा है किंतु राम के भक्त तो हर हाल में में मजे से रहते हैं क्योंकि वह दुःख सुख के भाव से परे हो गये हैं।
हैवर गैवर सघन धन, छन्नपती की नारि
तास पटेतर ना तुलै, हरिजन की पनिहारि

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि भगवान की भक्ति करने वाली गरीब नारी की बराबरी महलों में रहने वाली रानी भी नहीं कर सकती भले ही उसके राजा पति के पास हाथियों और घोड़ो का झुंड और बहुत सारी धन संपदा है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-दुनियां में तीन तरह के लोग होते हैं-दुःखी,सुखी और भक्त। अभाव और निराशा के कारण दुःखी आदमी हमेशा परेशान रहता है तो सुखी आदमी अपने सुख से उकता जाता है और वह हर ‘मन मांगे मोर’ की धारा में बहता रहता है। विश्व के संपन्न राष्ट्रों के देश भारत के अध्यात्मिक ज्ञान की तरफ आकर्षित होते हैं तो भारत के लोग उनकी भौतिक संपन्नता प्रभावित होते हैं। पश्चिम में तनाव है तो पूर्व वाले भी सुखी नहीं। कहने का तात्पर्य यह है कि लोेग इस मायावी संसार में केवल दैहिक सुख सुविधाओं के पीछे भागते हैं। जिसके भौतिक साधन नहीं है वह कर्ज वगैरह लेता है और फिर उसे चुकाते हुए तकलीफ उठाता है और अगर वह चीजें नहीं खरीदे तो परिवार के लोग उसका जीना हराम किये देता है। सुख सुविधा का सामान खरीद लिया तो फिर दैहिक श्रम से स्त्री पुरुष विरक्त हो जाते हैं और इस कारण स्वास्थ बिगड़ने लगता है।

जिन लोगों ने अध्यात्म ज्ञान प्राप्त कर लिया है वह जीवन को दृष्टा की तरह जीते हैं और भौतिकता के प्रति उनका आकर्षण केवल उतना ही रहता है जिससे देह का पालन पोषण सामान्य ढंग से हो सके। वह भौतिकता की चकाचैंध मेंे आकर अपना हृदय मलिन नहीं करते और किसी चीज के अभाव में उसकी चिंता नहीं करते। ऐसे ही लोग वास्तविक राजा है। जीवन का सबसे बड़ा सुख मन की शांति हैं और किसी चीज का अभाव खलता है तो इसका आशय यह है कि हमारे मन में लालच का भाव है और कहीं अपने आलीशान महल में भी बैचेनी होती है तो यह समझ लेना चाहिये कि हमारे अंदर ही खालीपन है। दुःख और सुख से परे आदमी तभी हो सकता है जब वह निष्काम भक्ति करे।
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Tuesday, March 31, 2009

चाणक्य नीतिः बांस का पेड़ खोखलेपन के कारण वायु का प्रभाव ग्रहण नहीं कर पाता

अंतःसारविहनानामुपदेशो न जायते।
मलयाचलसंसर्गान् न वेणुश्चंदनायते।।

नीति विशारद चाणक्य जी का मानना है कि मलयाचल पर्वत से प्रवाहित वायु देह के स्पर्श से ही सामान्य पेड़ भी चंदन जैसे सुगंधित हो जाते हैं। एक मात्र बांस का पेड़ ही खोखला होता है जिस पर कोई हवा अपना प्रभाव नहीं डालती।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-यहां महात्मा चाणक्य ने मनुष्य के गुणों पर प्रकाशा डाला है। जिस मनुष्य में उत्साह और विश्वास है वह कहीं थोड़ा ज्ञान अपने कान से सुनता या पढ़ता है तो उसे आत्मसात कर लेता है। उसे धारण कर वह अपना जीवन प्रसन्नता से व्यतीत करने मेें समर्थ होता है। इसके विपरीत जिन लोगों के अहंकार है वह ज्ञान चर्चा को एक व्यर्थ की चर्चा समझते हैं। इसके अलावा वह धनहीन ज्ञानी का मजाक उड़ाते हैं। उनके लिये धन संपदा और कथित सामाजिक प्रतिष्ठा ही जीवन का सार है। ऐसे लोगों को कितना भी ज्ञान दिया जाये पर प्रभाव नहीं पड़ता। जिस तरह मलयाचल पर्वत की वायु के स्पर्श से कोई भी हरा भरा पेड़ चंदन की खुशबु बिखरने लगता है पर बांस का पेड़ अपने खोखले पन के कारण ऐसा नहीं कर पाता। अहंकार और बुद्धिरहित व्यक्ति की भी यही स्थिति होती है। वह चाहे दिखावे के लिये अध्यात्मिक चर्चा करे लों या सत्संग में चले जायें पर उनका अज्ञान और अहंकार जा नहीं सकता।

इसलिये ज्ञान प्राप्त करने के लिये आवश्यक है कि पहले मन में मौजूद अहंकार पर नियंत्रण किया जाये। इसके अलावा मन में यह संकल्प करना भी जरूरी है कि हम ज्ञान चर्चा और सत्संग से अपने मन को शांत करेंगे। तभी अपने जीवन का आनंद उठाया जा सकता है।
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Monday, March 30, 2009

भर्तृहरि शतकः मानसिक तनाव से मुक्ति के लिये शास्त्रों का ज्ञान जरूरी (hindi thought on hindu dharm)

पुरा विद्वत्तासीदुषमवतां क्लेशहेतये गता कालेनासौ विषयसुखसिद्धयै विषयिणाम्।
इदानी, सम्प्रेक्ष्य क्षितितललभुजः शास्त्रविमुखानहो कष्टं साऽपि प्रतिदिनमधोऽधः प्रविशति।।


हिंदी में भावार्थ-प्राचीन काल में वह लोग विद्याध्ययन करते थे जो मानसिक तनाव से मुक्ति चाहते थे। बाद में ऐसे लोगों ने इसे अपना साधन बना लिया जो उससे विद्वता अर्जित कर विषय सुख प्राप्त करना चाहते थे। अब तो लोग उससे बिल्कुल विमुख हो गये हैं। उनको पढ़ना तो दूर सुनना भी नहीं चाहते। राजा लोग भी इससे विमुख हो रहे हैं। इसलिये यह दुनियां पतन के गर्त में जा रही है जो कि कष्ट का विषय है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- हमारे प्राचीन मनीषियों ने अपनी तपस्या और यज्ञों से जो ज्ञान अर्जित कर उसे शास्त्रों में दर्ज किया वह अनूठा है। इसी कारण विश्व में हमें अध्यात्म गुरु की पहचान मिली। अनेक ग्रंथ आज भी प्रासंगिक विषय सामग्री से भरपूर हैं पर लोग हैं कि उसे सुनना नहीं चाहते। पहले जहां लोग ज्ञानार्जन इसलिये करते थे ताकि उससे अपने जीवन को सहजता पूर्वक व्यतीत कर सकें। बाद में ऐसे लोग बढ़ने लगे जो उनका ज्ञान रटकर दूसरों को सुनाने का व्यापार करने लगे। उनका मुख्य उद्देश्य केवल अपने लिये भोग विलास की सामग्री जुटाना था। अब तो पूरा समाज ही इन शास्त्रों से विमुख हो गया है हालांकि ज्ञान का व्यापार करने वालों की संख्या में कोई कमी नहीं और उनके लिये तो पौ बाहर हो गया है। इसका कारण यह है कि लोगों को अपने शास्त्रों की रचनाओं का जरा भी आभास नहीं है। आज के तनाव भरे युग में लोग जब वह किसी के श्रीमुख से उन शास्त्रों के अच्छे वाक्य सुनते हैं तो प्रसन्न हो जाते हैं और फिर वक्ताओं को गुरु बनाकर उन पर चढ़ावा चढ़ाते हैं। ऐसा करने की बजाय लोग शास्त्रों का अध्ययन इसलिये करें ताकि उसके ज्ञान से उनके मन का तनाव कम हो सके तो अच्छा हो।

वैसे आजकल लोग शिक्षा इसलिये प्राप्त कर सकें ताकि उससे किसी धनपति की गुलामी करने का सौभाग्य मिले। यह सौभाग्य कई लोगों को मिल भी जाता है पर तनाव फिर भी पीछा नहीं छोड़ता। हमारे देश में लार्ड मैकाले ने ऐसी शिक्षा पद्धति का निर्माण किया जिससे गुलाम पैदा हों और गुलाम कभी सुखी नहीं रहते। वैसे यह आरोप लगाना गलत है कि लार्ड मैकाले ने ही ऐसा किया। राजा भर्तृहरि के संदेशों को देखें तो उनके काल में ही समाज अपने शास्त्रों से विमुख होने लगा था। इसलिये इस बात को ध्यान में रखकर विचार करना चाहिये कि हमने विषयों में आसक्ति के कारण शास्त्रों से मूंह फेरा है न कि विदेशियों के संपर्क के कारण! हमारे शास्त्रों का ज्ञान जीवन में तनाव से मुक्ति दिलाता है इसलिये उनका निरंतर अध्ययन करना चाहिये।
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Sunday, March 29, 2009

संत कबीर वाणीः नर ही नारायण है

नर नारायन रूप है, तू मति जाने देह।
जो समझे तो समझ ले, खलक पलक में खेह।।

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मनुष्यों तुम अपने को देह मत समझो बल्कि स्वयं को परमात्मा ही समझो। यह शरीर तो जड़ है और उसमें सांस प्रवाहित कर रहा आत्मा है वही स्वयं को समझो। यह समझ लो यह शरीर एक दिन माटी हो जायेगा पर आत्मा तो अमर है।
आंखि न देखि बावरा, शब्द सुनै नहिं कान।
सिर के केस उज्जल भये, अबहुं निपट अजान।।

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि संसार के लोग आंख से देखने और कान से ज्ञान समझने सुनने का काम नहीं कर पाते। उनके सिर के बाल सफेद हो जाते हैं पर फिर भी अज्ञानी बने रहते हैं।

वर्तमान सदंर्भ में संपादकीय व्याख्या-हमारा अध्यात्मिक दर्शन स्पष्ट करता है कि यह शरीर पंच तत्वों से बना है और उसमें मन, बुद्धि और अहंकार की प्रवृति स्वाभाविक रूप से विद्यमान रहती हैं। आंख हैं तो देखती है, कान हैं तो सुनते हैं, नासिका है तो सुगंध ग्रहण करती है, मुख है तो भोजन ग्रहण करता है और मस्तिष्क है तो विचार करता है। कहने का तात्पर्य यह है कि गुण ही गुणों को बरत रहे हैं पर हम सोचते हैं कि यह सभी हम कर रहे हैं हृदय में दृष्टा भाव होने की जगह कर्तापन का अहंकार आ जाता है। इसी अहंकार में मनुष्य के बाल सफेद हो जाते हैं पर वह अज्ञान के अंधेरे में ही अपना जीवन गुजार देता है।
हम आत्मा हैं और परमपिता का अंश है। यह आत्मा अनश्वर है पर हम अपने नष्ट होने के भय में रहते हैं। कर्तापन का अहंकार हमें माया का गुलाम बनाकर रख देता है। संत कबीर दास जी के मतानुसार सत्य का ज्ञान प्राप्त कर हमें अपने अंदर आत्मविश्वास पैदा करना चाहिये कि हम परमात्मा का अंश या स्वरूप हैं। जिस परमात्मा को हम दर दर ढूंढते हैं वह हम स्वयं ही हैं या कहें कि वह हमारे अंदर ही हैं। जरूरत है तो बस शब्द ज्ञान को समझने की है। इस संसार में आकर अपने दैहिक कर्तव्य पूरा तो करना चाहिये पर अपनी बुद्धि और मन को उसमें अपनी संलिप्पता की अनुभूति से परे रखें।
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Thursday, March 26, 2009

भर्तृहरि शतकः इस धरती पर है धन की घणी विचित्र लीला

तानींद्रियाण्यविकलानि तदेव नाम सा बुद्धिरप्रतिहता वचनं तदेव।
अर्थोष्मणा विरहितः पुरुषः क्षपोन सोऽष्यन्य एव भवतीति विचित्रमेतत्।।


हिंदी में भावार्थ-मनुष्य की इंद्रिया नाम,बुद्धि तथा अन्य सभी गुण वही होते हैं पर धन की उष्मा से रहित हो जाने पर पुरुष क्षणमात्र में क्या रह जाता है? धन की महिमा विचित्र है।
वर्तमान संदभ में संपादकीय व्याख्या- इस सृष्टि को परमात्मा ने बनाया है पर माया की भी अपनी लीला है जिस पर शायद किसी का भी बस नहीं है। माया या धन के पीछे सामान्य मनुष्य हमेशा पड़ा रहता है। चाहे कितना भी किसी के पास आध्यत्मिक ज्ञान या कोई दूसरा कौशल हो पर पंच तत्वों से बनी इस देह को पालने के लिये रोटी कपड़ा और मकान की आवश्यकता होती है। अब तो वैसे ही वस्तु विनिमय का समय नहीं रहा। सारा लेनदेन धन के रूप में ही होता है इसलिये साधु हो या गृहस्थ दोनों को ही धन तो चाहिये वरना किसी का काम नहीं चल सकता। हालांकि आदमी का गुणों की वजह से सम्मान होता है पर तब तक ही जब तक वह किसी से उसकी कीमत नहीं मांगता। वह सम्मान भी उसको तब तक ही मिलता है जब तक उसके पास अपनी रोजी रोटी होती है वरना अगर वह किसी से अपना पेट भरने के लिये धन भिक्षा या उधार के रूप में मांगे तो फिर वह समाप्त हो जाता है।
वैसे भी सामान्य लोग धनी आदमी का ही सम्मान करते है। कुछ धनी लोगों को यह भ्रम हो जाता है कि वह अपने गुणों की वजह से पुज रहे हैं। इसी चक्कर में कुछ लोग दान और धर्म का दिखावा भी करते हैं। अगर धनी आदमी हो तो उसकी कला,लेखन तथा आध्यात्मिक ज्ञान-भले ही वह केवल सुनाने के लिये हो-की प्रशंसा सभी करते हैं। मगर जैसे ही उनके पास से धन चला जाये उनका सम्मान खत्म होते होते क्षीण हो जाता है।

इसके बावजूद यह नहीं समझना चाहिये कि धन ही सभी कुछ है। अगर अपने पास धन अल्प मात्रा में है तो अपने अंदर कुंठा नहीं पालना चाहिये। बस मन में शांति होना चाहिये। दूसरे लोगों का समाज में सम्मान देखकर अपने अंदर कोई कुंठा नहीं पालना चाहिये। यह स्वीकार करना चाहिये कि यह धन की महिमा है कि दूसरे को सम्मान मिल रहा है उसके गुणों के कारण नहीं। इसलिये अपने गुणों का संरक्षण करना चाहिये। वैसे यह सच है कि धन का कोई महत्व नहीं है पर वह इंसान में आत्मविश्वास बनाये रखने वाला एक बहुत बड़ा स्त्रोत है।
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Tuesday, March 24, 2009

रहीम के दोहे-खुशी देने वाले को दाम देना चाहिए

नाद रीझि तन देत मृग, नर धन हेत समेत
ते रहीम पशु से अधिक, रीझेहु कछू न देत

कविवर रहीम कहते हैं कि बांसी की धुन पर प्रसन्न होकर मृग अपना शरीर शिकारी को सौंप देता है उसी तरह मनुष्य भी दूसरे को धन देकर हित करता है। वह आदमी पशु के समान है जो प्रसन्नता प्राप्त होने पर भी किसी को कुछ नहीं देता।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या -अधिकतर लोगों की प्रवृत्ति होती है मु्फ्त मेंं काम कराना। अनेक बड़े और धनी लोग अपनी शक्ति दिखाने के लिये छोटे और गरीब से से मु्फ्त में काम कराकर अपने आपको गौरवान्वित अनुभव करते हैं। एक तरह से अपने बड़प्पन के आतंक तले कुछ लोग दूसरों का सामान और श्रम मुफ्त में लेना चाहते हैं। यह पशुत का प्रमाण है। अगर कोई व्यक्ति हमें थोड़ी भी प्रसन्नता प्रदान करता है तो उसे धन के रूप में कुछ न कुछ देना चाहिये। अगर उसे धन देना उचित न लगे तो उसके हित का कोई काम करना चाहिये जिससे उसे प्रसन्नता प्राप्त हो।

कई बार देखा गया है कि लोग अपनी डींगें हांकने के लिये यह बताते हैं कि अमुक वस्तु उसे मुफ्त में प्राप्त हुई या अमुक आदमी से मैंने यह काम मुफ्त में प्राप्त कर दिया। मुफ्त में काम कराने पर अपने गुणों या शक्ति का यह प्रदर्शन स्वयं को धोखा देने के लिये है। यह सोचना चाहिये कि अगर हमने किसी से कोई वस्तु ली या काम करवाया और उसे पैसा नहीं दिया तो उस आदमी के मन में क्या बात आयी होगी? यकीनन निराशा का भाव पैदा हुआ होगा। यह विचार भी करना चाहिये कि जब हम किसी को प्रसन्न करने वाले काम करते हैं और वह हमें कुछ नहीं देता तो उसके प्रति हमारे मन में कोई अच्छे भाव नहीं रहते।
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Sunday, March 22, 2009

विदुर संदेश:विद्या,तप,संयम और त्याग के अलावा शान्ति का कोई उपाय नहीं

1.थोड़े धन वाले कुल भी सदाचार से संपन्न है तो भी वे अच्छे कुलों में मान लिये जाते हैं और उनको यश प्राप्त होता है।
2.मन को प्रिय लगने वाली वस्तु शोक करने से प्राप्त नहीं होती। शोक से तो केवल शरीर का नाश होता है। इसे देखकर शत्रु प्रसन्न होते हैं।
3.जैसे हंस सूखे सरोवर के आसपास मंडराते रह जाते हैं और उसके अंदर प्रविष्ट नहीं होते। वैसे ही जिसके मन में चंचलता का भाव है वह अज्ञानी इंद्रियों के का गुलाम बन कर रह जाता है और उसे अर्थ की प्रािप्त नहीं हेाती।
4.विद्या,तप,संयम और त्याग के अलावा शांति का कोई उपाय नहीं है।
5.भले की बात कहीं जाये तो भी उन्हें अच्छी नहीं लगती। उनकी योग से भी सिद्धि नहीं हो पाती। भेदभाव करने वाले आदमी की विनाश के सिवा और कोई गति नहीं है।
6.जो भेदभाव करते हैं उनके लिये धर्म का आचरण करना संभव नहीं है। उनको न तो सुख मिलता है न ही गौरव। उनको शांति वार्तालाप करना नहीं सुहाता।

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Saturday, March 21, 2009

मनुस्मृतिः ज्ञानी गृहस्थ करते हैं पंचयज्ञ ( manu smruti on home nad yagya)

ज्ञानेनैवापरे विप्राः यजन्ते तैर्मखैःसदा।
ज्ञानमुलां क्रियामेषां पश्चन्तो ज्ञानचक्षुक्षा।।

हिंदी में भावार्थ-कुछ विद्वान लाग अपनी सभी क्रियाओं को अपने ज्ञान चक्षुओं से हुए एक तरह से ज्ञान यज्ञ करते हैं। वह अपने ज्ञान द्वारा ही यज्ञानुष्ठान करते हैं। उनकी दृष्टि में ज्ञान यज्ञ ही महत्वपूर्ण होता है।

तानेके महायज्ञान्यज्ञशास्त्रविदो जनाः।
अनीहमानाः सततमिंिद्रयेघ्वेव जुह्नति।।


हिंदी में भावार्थ-शास्त्रों के ज्ञाता कुछ गृहस्थ उनमें वर्णित यज्ञों को नहीं करते पर अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रखते हैं। उनके लिये नेत्र,नासिका,जीभ,त्वचा तथा कान पर संयम रखना ही पवित्र पंच यज्ञ है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अपने देश में तमाम तरह के भौतिक पदार्थों से यज्ञा हवन करने की परंपरा हैं। इसकी आड़ में अनेक प्रकार के अंधविश्वास भी पनपे हैं। यह यही है कि यज्ञ हवन से वातावरण में व्याप्त विषाक्त कीटाणु नष्ट होते हैं जिससे उसमें सुधार आता है। पदार्थों की सुगंध से नासिका का कई बार अच्छा भी लगता है पर यह भौतिक या द्रव्य यज्ञ ही सभी कुछ नहीं है। सबसे बड़ा यज्ञ तो ज्ञान यज्ञ है। श्रीगीता में भी ज्ञान यज्ञ को सबसे अधिक महत्वपूर्ण बताया गया है। ज्ञान यज्ञ का आशय यह है कि अपने अंदर मौजूद परमात्मा क अंश आत्मा को पहचानना तथा जीवन के यथार्थ को पहचानते हुए अपने कर्म करते रहना। निष्काम भाव से उनमें रत रहते हुए निष्प्रयोजन दया करना।

हमारे देश में अनेक धर्म गुरु अपने प्रवचनों में भौतिक पदार्थ से होने वाले द्रव्य यज्ञों का प्रचार करते हैं क्योकि वह स्वयं ही जीवन में मूलतत्व को नहीें जानते। इस प्रकार के भौतिक तथा द्रव्य यज्ञ केवल उन्हीं लोगों को शोभा देते हैं जो सांसरिक कर्म से परे रहते हैं। गृहस्थ को तो ज्ञान यज्ञ करना ही चाहिये। यह यज्ञ इस प्रकार है
1. आखों से बेहतर वस्तुओं को देखने का प्रयास करें। बुरे, दिल को दुःखाने या डराने वाले दृश्यों से आंखें फेर लें। आजकल टीवी पर आदमी को रुलाने और भावुक करने वाले दृश्य दिखाये जाते हैं उससे परहेज करेंं तो ही अच्छा।
2.नासिका से अच्छी गंध ग्रहण करने का प्रयास करें। आजकल सौंदर्य प्रसाधनों की कुछ गंधें हमे अच्छी लगती है पर कई बार वह सिर को चकराने लगती हैं। यह देखना चाहिये कि जो गंधे तैयार की गयी हैं वह प्राकृतिक पदार्थों से तैयार की गयी है कि रसायनों से।
3.जीभ को स्वादिष्ट लगने वाले अनेक पदार्थ पेट के लिये हानिकारक होते हैं इसलिये यह देखना चाहिये कि कहीं हम उनको उदरस्थ तो नहीं कर रहे। दूसरा यह भी अपनी जीभ से हम जो शब्द बाहर निकालते हैं उससे दूसरे को दुःख न पहुंचे।
4.अपनी त्वचा को ऐसे पदार्थ न लगायें जो उसे जला देते हैं।
5.अपने कानों से अच्छी चर्चा सुनने का प्रयास करें। टीवी पर चीखने चिल्लाने की आवाजों से हमारे दिमाग पर कोई अच्छा असर नहीं पड़ता। तेज संगीत सुनने से भी हृदय पर कोई अच्छा प्रभाव नहीं पड़ता। वही वाणी और ंसगीत सुनना चाहिये जो मद्धिम हो और उससे हृदय में प्रसन्नता का भाव पैदा होता है।

कहने का तात्पर्य यह है कि अपनी पंचेंद्रियों पर नियंत्रण कर ज्ञानी गृहस्थ पंच यज्ञ करते हैं।
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Friday, March 20, 2009

इस ब्लाग की पाठक संख्या 10 हजार के पार-संपादकीय

जहां तीन लाख के आसपास व्यूज मेरे सभी ब्लाग पर हों वहां दस हजार की संख्या कोई मायने नहीं रखती पर ब्लागस्पाट पर आधिकारिक रूप से यह संख्या पार करने वाला यह पहला ब्लाग है। अध्यात्मिक ब्लाग पर यह सफलता कोई अधिक नहीं है पर अगर वह ब्लागस्पाट का हो तो उसका महत्व इसलिये दिखता है क्योंकि वर्डप्रेस के मुकाबले यहां कम ही व्यूज आते हैं। वैसे इसका सहधर्मी ब्लाग शब्दलेख सारथी भी दस हजार के पार पहुंच चुका होगा स्टेटकांउटर उस पर बहुत विलंब से लगाया था इसलिये आधिकारिक रूप से वह इससे अभी कुछ पीछे है। वैसे मेरे ब्लाग स्पाट के ब्लाग भी यह संख्या पार कर चुकें होंगे पर आधिकारिक रूप से उसका कोई लेखा नहीं है।
इस ब्लाग पर कांउटर पहले दिन से ही लगा है इसलिये इसकी संख्या को लेकर कोई संदेह नहीं है। मजे की बात यह है कि मेरे मित्र ब्लाग लेखकों को यही ब्लाग पसंद है और यह संख्या पार होने में उनका ही योगदान अधिक है। प्रसंगवश अनेक मित्रों ने अन्य ब्लाग के मुकाबले इसे ही अधिक लिंक किया है।
जहां तक अध्यात्म विषयों पर लिखने का सवाल है तो मैं नहीं जानता इन पर क्यों लिखता हूं? एक आदत बन गयी है। मेरे पास जो किताबें हैं सुबह उठकर उनका अध्ययन करते हुए ही इन पर लिखता हूं। इस ब्लाग और शब्दलेख सारथी पर नये पाठ लिखता हूं बाकी अन्य अध्यात्म ब्लाग पर यहीं से पाठ कापी कर रखता हूं। आखिर इतने सारे ब्लाग क्यों?
यह सवाल कई मित्र मुझसे पूछते हैं? दरअसल मैंने कुछ ब्लाग सर्च इंजिनों के रुख को देखने के लिये बनाये हैं। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि मैं स्वयं भ्रमित हो रहा हूं पर फिर यह भी देखता हूं कि यहां कोई पूरी तरह अपने आपको सर्वज्ञानी नहीं है। कहने का तात्पर्य यह है कि अंतर्जाल पर कुछ नया सीखने और उसके प्रयोग करने की गुंजायश है और इसी कारण कुछ ब्लाग लेखक अधिक
संख्या में ब्लाग बनाते हैं और यकीनन वह कुछ इससे सीख रहे हैं।

शब्दलेख सारथी मैंने पहले छद्म नाम से बनाया था पर फिर एक मित्र के आग्रह पर उस पर अपना नाम लिखा। इन दोनों ब्लाग पर लिखते समय मेरे मन में कोई भाव नहीं होता। न तो टिप्पणियों की चिंता होती है न पाठकों की। इस भौतिक युग में सुख सुविधाओं से ऊबे लोगों के मन में अध्यात्म के प्रति रुझान अधिक बढ़ रहा है यह अलग बात है कि उनकी भावनाओं का शोषण कर उसे अपने आर्थिक लाभ में परिवर्तन करने वालों की सख्या भी बढ़ रही है। भारतीय अध्यात्म के मूल तत्वों की पूरी जानकारी होने का दावा तो कोई खैर क्या करेगा पर इतना जरूर कहा जा सकता है कि उसमें ही हृदय को प्रफुल्लित करने वाले तत्व मौजूद हैं पर उसके लिये ज्ञान का होना जरूरी है। दरअसल अध्यात्मिक ब्लाग शुरु करने का उद्देश्य श्रीगीता पर लिखना था पर उस समय हिंदी टूल लिखने वाले टूल संस्कृत के श्लोक लिखने के लिये ठीक नहीं लगे। तब अन्य महापुरुषों की रचनाओं से काम चलाया तो यह एक आदत बन गयी। भर्तृहरि,चाणक्य,कबीरदास,रहीम,मनुस्मृति,विदुर तथा अन्य अध्यात्मिक मनीषियों के संदेशों में आज भी भारत के लोगों की अथाह रुचि है यह बात अंतर्जाल पर ही आकर पता लगी।
इस ब्लाग के दस हजार पूरे होने पर कुछ लिखने का कुछ मतलब नहीं है पर यहां यह बताना जरूरी है कि हमारा देश विश्व में अध्यात्म गुरु इसलिये माना जाता है क्योंकि हमारे प्राचीन मनीषियों ने अपनी तपस्या से जो ज्ञान अर्जित किया वह सत्य के निकट था। उनके पास कोई लेबोरेटरी या दूरबीन नहीं थी जिसका प्रयोग कर वह सृष्टि के सत्यों के निकट पहुंचते बल्कि उन्होंने अपनी अंतदृष्टि को ही इतना सिद्ध बना दिया कि जो विश्लेषण उन्होंने बहुत पहले प्रस्तुत किये पश्चिम की दुनियां अब उस पर पहुंच रही है।
पहले तो मैं केवल महापुरुषों के संदेश ही लिखता था पर कृतिदेव का टूल मिलने के बाद इन पर व्याख्यान भी लिखने लगा। अनेक ब्लाग लेखक मित्र इसके लिये आग्रह करते थे पर इंडिक टूल से ऐसा करना संभव नहीं लगता था। अब जैसी बनती है लिखता हूं। कोई व्यवसायिक अध्यात्मिक गुरु तो हूं नहीं कि उन पर बहुत आकर्षक लिख सकूं। जैसा विचार मन में आता है लिखता हूं। सच बात तो यह है कि यह लिखना अपने अध्ययन के लिये होता है न कि अपना ज्ञान बघारने के लिये। इस अवसर पर अपने ब्लाग लेखक मित्रों और पाठकों को धन्यवाद।
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Thursday, March 19, 2009

भर्तृहरि संदेश: प्रमाद से धन नष्ट होता है

दौर्मन्त्र्यान्नृपतिर्विनष्यति यतिः सङगात्सुतालालनात् विप्रोऽन्ध्ययनात्कुलं कुतनयाच्छीलं खलोपासनात्
ह्यीर्मद्यादनवेक्षणादपि कृषिः स्नेहः प्रवासाश्रयान्मैत्री चाप्रणयात्सृद्धिरनयात् त्यागपमादाद्धनम्


हिंदी में भावार्थ-कुमित्रता से राजा, विषयासक्ति और कामना योगी, अधिक स्नेह से पुत्र, स्वाध्याय के अभाव से विद्वान, दुष्टों की संगत से सदाचार, मद्यपान से लज्जा, रक्षा के अभाव से कृषि, परदेस में मित्रता, अनैतिक आचरण से ऐश्वर्य, कुपात्र को दान देने वह प्रमाद से धन नष्ट हो जाता है।
वर्तमान संदर्भ संक्षिप्त व्याख्या-आशय यह है कि जीवन में मनुष्य जब कोई कर्म करता है तो उसका अच्छा और बुरा परिणाम यथानुसार प्राप्त होता है। कोई मनुष्य ऐसा नहीं है जो हमेशा बुरा काम करे या कोई हमेशा अच्छा काम करे। कर्म के अनुसार फल प्राप्त होता है। अच्छे कर्म से अर्थ और सम्मान की प्राप्ति होती है। ऐसे में अपनी उपलब्ध्यिों से जब आदमी में अहंकार या लापरवाही का भाव पैदा होता है तब अपनी छबि गंवाने लगता है। अतः सदैव अपने कर्म संलिप्त रहते हुए अहंकार रहित जीवन बिताना चाहिये।

यह मानकर चलना चहिये कि हमें मान, सम्मान तथा लोगों का विश्वास प्राप्त हो रहा है वह अच्छे कर्मों की देन है और उनमें निरंतरता बनी रहे उसके लिये कार्य करना चाहिये। अगर अपनी उपलब्धियों से बौखला कर जीवन पथ से हट गये तो फिर वह मान सम्मान और लोगों का विश्वास दूर होने लगता है।
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Tuesday, March 17, 2009

रहीम के दोहे: दिल से प्रयास करें तो मनुष्य क्या परमात्मा मिल जाते हैं ( rahim ke dohe on heart and men)

रहिमन मनहि लगाईं कै, देखि लेहू किन कोय
नर को बस करिबो कहा, नारायन बस होय

कविवर रहीम के मतानुसार मन लगाकर कोई काम कर देखें तो कैसे सफलता मिलती है। अगर अच्छी नीयत से प्रयास किया जाये तो नर क्या नारायण को भी अपने बस में किया जा सकता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-लोग बहुत जल्दी सफलता हासिल करना चाहते हैं। काम में मन कम उससे होने वाली उपलब्धि पर अधिक दृष्टि रखते हैं यही कारण है कि उनको सफलता नहीं मिलती। भक्ति हो या सांसरिक काम उसमें मन लगाकर ही आदमी कोई उपलब्धि प्राप्त कर सकता है। अधिकतर लोग अपना काम करते हुए केवल इस बात की चिंता करते हैं कि उससे उनको क्या मिलेगा? जो भक्ति करते हैं वह सोचते हैं कि भगवान बस तत्काल उनका काम बना दें। मन भक्ति में कम अपने काम में अधिक होता है। न उनको इससे भक्ति का लाभ होता है और न काम बनने की संभावना होती है। भक्ति में काम का भाव और जो काम है उससे करने की बजाय भगवान की भक्ति में लगने से दोनों में उनकी सफलता संदिग्ध हो जाती है और फिर ऐसा करने वाले लोग अपनी नाकामी का दोष दूसरों को देते हैं।

अगर मन लगाकर भक्ति या सांसरिक काम किया जाये तो उसमें सफलता मिलती है। आदमी क्या भगवान भी बस में किये जा सकते हैं।
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Sunday, March 15, 2009

संत कबीर के दोहे:मन जीता तो पूरा संसार जीत लिया

सुर नर मुनि सबको ठगै, मनहिं लिया औतार
जो कोई याते बचै, तीन लोक ते न्यार

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि यह मन तो एक महान ठग है जो देवता, मनुष्य और मुनि सभी को ठग लेता है। यह मन जीव को बार बार अवतार लेने के लिये बाध्य करता है। जो कोई इसके प्रभाव से बच जाये वह तीनों लोकों में न्यारा हो जाता है।

अपने अपने चोर को, सब कोय डारै मार
मेरा चोर मुझको मिलै, सरबस डारूं वार

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि संसार के सब तो अपने अपने चोर को मार डालते हैं, परंतु मेरा चोर तो मन है। वह अगर मुझे मिल जाये तो मैं उस पर सर्वस्व न्यौछावर कर दूंगा।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य की पहचान तो मन है और वह उसे जैसा नचाता। आदमी उसके कारण स्थिर प्रज्ञ नहीं रह पाता। कभी वह किसी वस्तु का त्याग करने का निर्णय लेता है पर अगले पर ही वह उसे फिर ग्रहण करता है। अर्थात मन हमेशा ही व्यक्ति का अस्थिर किये रहता है। कई बार तो आदमी किसी विषय पर निर्णय एक लेता है पर करता दूसरा काम है। यह अस्थिरता मनुष्य को जीवन पर विचलित किये रहती है और वह इसे नहीं समझ सकता है। यह मन सामान्य मनुष्य क्या देवताओं और मुनियों तक को धोखा देता है। इस पर निंयत्रण जिसने कर लिया समझा लो तीनों को लोकों को जीत लिया।
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Saturday, March 14, 2009

कबीर के दोहे: सिर के बाल उज्जवल होने पर भी रहे अज्ञानी

आंखि न देखि बावरा,शब्द सुनै नहिं कान
सिर के केस उज्जल भये, अबहूं निपट अजान

संत शिरोमिणि कबीरदास जी कहते हैं कि संसार के लोग अपनी देह की अवस्था का विचार नहीं करते। इन बावलों को आंख से दिखते नहीं है और कानों से उपदेश और संतों के प्रवचन सुनाई नहीं देते है। सिर के बाल पूरी तरह सफेद हो और तब भी अज्ञानी हैं।

मूरख शब्द न मानई, धर्म न सुनै विचार
सत्य शब्द नहिं खोजई, जावैं जम के द्वारा


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मूर्ख व्यक्ति सत्य शब्द नहीं मानता न ही धर्म आदि का विचार करता। वह बिना सत्संग और भगवान भक्त के बिना ही मृत्यू को प्राप्त होता है।

संक्षिप्त व्याख्या-इस देश में इतने सारे कथित संत और उनके शिष्य हैं और इतने सारे धार्मिक अनुष्ठान होते हैं पर फिर भी समाज निरंतर संस्कृति, संस्कार और साहित्य के क्षेत्र में पतन की तरफ जा रहा है। लोग अपने संस्कारों को निरर्थक, संस्कृति को पिछड़ा और धार्मिक साहित्य को अप्रासंगिक मानने लगे हैं। इसका कारण यह है कि हमारे देश में पाखंड बहुत बढ़ चुका है। लोग ऐसे धार्मिक कार्यक्रमों में जाते हैं पर आखें होते हुए भी देखते नहीं, कान से सुनी बात दूसरे कान से निकाल देते हैं और बुद्धि का उपयोग करना तो उनको निरर्थक समय नष्ट करना होता है। वैसे वह फिल्मी और राजनीतिक विषयों पर बातचीत कर अपने आपको विद्वान और ज्ञानी समझते हैं पर सत्संग की बात करो तो कहते हैं-‘इनसे कोई संसार थोड़े ही चलता है।’

आधुनिक शिक्षा से भारतीय अध्यात्म विषय को दूर रखने की वजह से आजकल लोगों में मानसिक विकृतियां जन्म ले चुकी हैं। ऐसे में वही लोग थोड़ा बहुत ज्ञान धारण किये हुए हैं जिनको माता पिता या किसी योग्य गुरू द्वारा उससे परिचित कराया गया है वरन लोग तो मन की आखों से दृष्टिहीन, कान से बहरे और बुद्धि से विवेकहीन हो गये हैं। उनको केवल सांसरिक विषय ही प्रिय लगते हैं।
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Thursday, March 12, 2009

कबीर के दोहे: डरपोक आदमी पीछे से वार करता है

कबीर तो सांचै मतै, सहै जू सनमुख वार
कायर अनी चुभाय के, पीछे झखै अपार


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहत हैं कि सच्चा वीर तो वह है जो सामने आकर लड़ता है पर जो कायर है वर पीठ पीछे से वार करता है।

तीर तुपक सों जो लड़ैं, सो तो सूरा नाहिं
सूरा सोइ सराहिये, बांटि बांटि धन खांहि

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो अस्त्र शस्त्र से लड़ते है। उनको वीर नहीं कहा जा सकता है। सच्चे शूरवीर तो हैं जो आपस में मिल बैठकर खाते हैं। वह जो भी कमाते हैं उसे समान रूप से आपस में बांटते हैं।

वर्तमान सन्दर्भ में संपादकीय व्याख्या-शूरवीर हमेशा उसे ही माना जाता है जो अस्त्र शस्त्र का उपयोग करता है। उनमें भी वही वीर है जो सामने से वार करता है पर जो कायर हैं वह पीठ पीछे वार करते हैं। वैसे अस्त्र शस्त्र से लड़ने में भी साहस की आवश्यकता कहां होती है। अगर अस्त्र शस्त्र हाथ में हों तो वेसे भी मनुष्य के मन में दुस्साहस आ ही जाता है और कोई भी उपयोग कर सकता है। कुछ लोग कहते हैं कि हथियार रखने से क्या होता है उसे चलाने के लिये साहस भी होना चाहिये-विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर लोहे से बना कोई हथियार मनुष्य के हाथ में हो तो उसमें आक्रामता आ ही जाती है।

असली साहस तो अपने कमाये धन का दूसरे के साथ बांटकर खाने में दिखाना चाहिये। आदमी जब धन कमाता है तो उसके प्रति उसका मोह इतना हो जाता है कि वह उसे किसी को थोड़ा देने में भी हिचकता है। मिलकर बांटने की बात तो छोडि़ये अपनी रोटी का छोटा टुकड़ा देने में भी आदमी की जान जाती है।

हमारे प्राचीन मनीषियों ने दान की महिमा को इसलिये प्रतिपादित किया कि समाज में सामाजिक समरसता का भाव रहे। हमारे अध्यात्म में इतना तक कहा गया है कि किसी को दान देते हुए आंखें नीची करना चाहिये ताकि दूसरे को हमारा अहंकार नहीं दिखाई दे और उसके अंदर अपने प्रति कुंठा भाव न उत्पन्न हो। मगर अब तो समाज कल्याण की बात राज्य के भरोसे छोड़ दी गयी है और वही लोग जन कल्याण के लिये मैदान में उतर रहे हैं जिनको उससे कुछ आर्थिक फायदा है। यह लोग कायर होते हैं क्योंकि दान और कल्याण क लिये प्राप्त धन का वह हरण करते हैं।

कलुषित तरीके से प्राप्त धन का भी वह दान करने का साहस नहीं कर पाते। अपने धन देने में सभी का हृदय कांपने लगता है। सच है कि जो दानी है वही सच्चा शूरवीर है। वह भी सच्चा वीर है जो अस्त्र शस्त्र लेकर कहकर सामने से प्रहार करता है पर आजकल तो कायरों की पूरी फौज है जो पीठ पीछे से वार करती है। चोर और डकैतों द्वारा किये गये और अपराध और निरंतर बम धमाकों की बढ़ती घटनायें इस बात का प्रमाण हैं।
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Wednesday, March 11, 2009

रहीम संदेश:राम का नाम न लेने वाले विषयों में लिप्त रहते हैं

रहिमन राम न उर धरै, रहत विषय लपटाय
पसु खर खात सवाद सों, गुर बुलियाए खाय


कविवर रहीम कहते है कि भगवान राम को हृदय में धारण करने की बजाय लोग भोग और विलास में डूबे रहते है। पहले तो अपनी जीभ के स्वाद के लिए जानवरों की टांग खाते हैं और फिर उनको दवा भी लेनी पड़ती है।

वर्तमान सदंर्भ में व्याख्या-वर्तमान समय में मनुष्य के लिये सुख सुविधाएं बहुत उपलब्ध हो गयी है इससे वह शारीरिक श्रम कम करने लगा हैं शारीरिक श्रम करने के कारण उसकी देह में विकार उत्पन्न होते है और वह तमाम तरह की बीमारियों की चपेट में आ जाता है। स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन भी रहता है। इसके अलावा जैसा भोजन आदमी करता है वैसा ही उसका मन भी होता है।

आज कई ऐसी बीमारिया हैं जो आदमी के मानसिक तनाव के कारण उत्पन्न होती है। इसके अलावा मांसाहार की प्रवृत्ति भी बढ़ी है। मुर्गे की टांग खाने के लिय लोग बेताब रहते हैं। शरीर से श्रम न करने के कारण वैसे ही सामान्य भोजन पचता नहीं है उस पर मांस खाकर अपने लिये विपत्ति बुलाना नहीं तो और क्या है? फिर लोगों का मन तो केवल माया के चक्कर में ही लगा रहता है। आधुनिक स्वास्थ्य विज्ञान कहता है कि अगर कोई आदमी एक ही तरफ ध्यान लगाता है तो उसे उच्च रक्तचाप और मधुमेह जैसे विकास घेर लेते हैं। माया के चक्कर से हटकर आदमी थोड़ा राम में मन लगाये तो उसका मानसिक व्यायाम भी हो, पर लोग हैं कि भगवान श्रीराम चरणों की शरण की बजाय मुर्गे के चरण खाना चाहते हैं। यह कारण है कि आजकल मंदिरों में कम अस्पतालों में अधिक लोग शरण लिये होते हैं। भगवान श्रीराम के नाम की जगह डाक्टर को दहाड़ें मारकर पुकार रहे होते है।

अगर लोग शुद्ध हृदय से राम का नाम लें तो उनके कई दर्दें का इलाज हो जाये पर माया ऐसा नहीं करने देती वह तो उन्हें डाक्टर की सेवा कराने ले जाती है जो कि उसके भी वैसे ही भक्त होते हैं जैसे मरीज।
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Monday, March 9, 2009

भर्तृहरि शतकः बुढ़ापे में भले काम की आदत नहीं पड़ सकती

यावत्स्वस्थमिदं शरीरमरुजं यावच्च दूरे जरा यावच्चेंिद्रयशक्तिरप्रतिहता यावत्क्षयो नायुषः।
आत्मश्रेयसि तावदेव विदुषा कार्यः प्रयत्नो महान् संदीप्ते भवने तु कुपखननं प्रत्युद्यम कीदृशः

हिंदी में भावार्थ- जब शरीर स्वस्थ है, वृद्धावस्था परे है, इंद्रियां सही ढंग से काम कर रही हैं और आयु भी ढलान पर नहीं है विद्वान और ज्ञानी लोग तभी तक अपनी भलाई का काम प्रारंभ कर देते हैं। घर में आग लगने पर कुंआ खोदने का प्रयास करने से कोई लाभ नहीं होता।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-भर्तृहरि महाराज का यहां आशय यह है कि जब तक हम शारीरिक रूप से सक्षम हैं तभी तक ही अपने मोक्ष के लिये कार्य कर सकते हैं। इसके लिये आवश्यक है कि प्रारंभ से ही मन, वचन, और शरीर से हम भगवान के प्रति सच्ची श्रद्धा रखें। कुछ लोग यह कहते हैं कि अभी तो हम सक्षम हैं इसलिये भगवान की भक्ति क्यों करें? जब रिटायर हो जायेंग्रे या बुढ़ापा आ जायेगा तभी भगवान की भक्ति करेंगे। सच बात तो यह है कि भगवान की भक्ति या साधना की आदत बचपन से ही न पड़े तो पचपन में भी नहीं पड़ सकती। कुछ लोग अपने बच्चों को इसलिये अध्यात्मिक चर्चाओंे में जाने के लिये प्रेरित नहीं करते कि कहीं वह इस संसार से विरक्त होकर उन्हें छोड़ न जाये जबकि यह उनका भ्रम होता है। सच बात तो यह है कि भारतीय अध्यात्म ज्ञान किसी भी आदमी को जीवन से सन्यास होने के लिये नहीं बल्कि मन से सन्यासी होने की प्रेरित करता है। सांसरिक कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए उसके फल की कामना से परे रहना कोई दैहिक सन्यास नहीं होता।

हमारा अध्यात्मिक ज्ञान तो यह कहता है कि आदमी अपने स्वभाव वश अपने नित्यप्रति के कर्तव्य तो वैसे ही करता है पर भगवान की भक्ति और साधना के लिये उसे स्वयं को प्रवृत्त करने के लिये प्रयास करना होता है। एक तो उसमें मन नहीं लगता फिर उससे मिलने वाली मन की शांति का पैमाना धन के रूप में दृश्यव्य नहीं होता इसलिये भगवान की भक्ति और साधना में मन लगाना कोई आसान काम नहीं रह जाता। बुढ़ापे आने पर जब इंद्रियां शिथिल हो जाती हैं तब मोह और बढ़ जाता है ऐसे में भक्ति और साधना की आदत डालना संभव नहीं है। सच बात तो यह है कि योगसाधना, ध्यान, मंत्रजाप और भक्ति में अपना ध्यान युवावस्था में ही लगाया जाये तो फिर बुढ़ापे में भी बुढ़ापे जैसा भाव नहीं रहता। अगर युवावस्था में ही यह आदत नहीं डाली तो बुढ़ापे में तो नयी आदत डालना संभव ही नहीं है।
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Friday, March 6, 2009

रहीम के दोहेःकीचड़ का जल समंदर से अधिक सम्मानीय

धनि रहीम जल पंक को, लघु जिय पियत अघाय
उदधि बड़ाई कौन है, जगत पिआसौ जाय

कविवर रहीम कहते हैं कि गंदे स्थान पर पड़ा जल भी धन्य है जिसे छोटे जीव पीकर तृप्त तो हो जाते हैं। उस समंदर की प्रशंसा कौन करता है जिसके पास जाकर भी कोई उसका पानी नहीं पी सकता।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अगर आज के संसार में सामाजिक तथा आर्थिक ढांचे को देखें तो समाज में अमीर और गरीब का अंतर बहुत बढ़ गया है। इसके साथ ही धनियों और समाज के श्रेष्ठ वर्ग के लोगों की संवेदनायें भी एक तरह से मर गयी हैं। वह अपने आत्म प्रचार के लिये बहुत सारा धन व्यय करते हैं पर अपने निकटस्थ अल्प धन वालों के साथ उनका व्यवहार अत्यंत शुष्क रहता है। श्रमिक,गरीब, मजदूर तथा मध्यम वर्ग के बुद्धिजीवी लोग दिखने के लिये समाज का हिस्सा दिख रहे हैं पर उनके मन के आक्रोश को धनिक तथा श्रेष्ठ वर्ग के लोग नहीं समझ सकते । क्रिकेट और फिल्मी सितारों पर अनाप शनाप खर्च करने वाला श्रेष्ठ वर्ग अपने ही अधीनस्थ कर्मचारियों के लिये जेब खाली बताता है। विश्व भर में आतंकवाद फैला है। जिसके पास बंदूक है उसके आगे सब घुटने टेक देते हैं। आपने सुना होगा कि कई बड़े शहरों में अपराधी सुरक्षाकर वसूल करते हैं। फिल्मी सितारों, क्रिकेट खिलाडि़यों और कथित संतों के साथ अपने फोटो खिंचवाने वाले धनिक और श्रेष्ठ वर्ग के लोग इस बात को नहीं जानते कि उनके नीचे स्थित वर्ग के लोगों की उनसे बिल्कुल सहानुभूति नहीं है। प्रचार माध्यमों में निरंतर अपनी फोटो देखने के आदी हो चुके श्रेष्ठ वर्ग के लोग भले ही यह सोचते हों कि आम आदमी में उनके लिये सम्मान है पर सच यह है कि आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर लोग उनसे अब बहुत चिढ़ते हैं। वह उनके लिये उस समंदर की तरह है जिसके पास जाकर भी दया रूपी पानी मिलने की आस वह नहीं करते।

पहले जो अमीर थे वह धार्मिक स्थानों पर धर्मशालाएं बनवाते थे ताकि वहां आने वाले गरीब लोग रह सकें। अब बड़े बड़े होटल बन गये हैं जिनके पास से गरीब आदमी गुजर जाता है यह सोचकर कि वहां रुकने लायक उसकी औकात नहीं है। गर्मियों में अनेक स्थालों पर धनिक और दानी लोग प्याऊ खुलवाते थे पर अब पुराने प्याऊ सभी जगह बंद हो गये हैं। उनकी जगह पानी के कारखानों की बोतलों और पाउचों को महंगे दामों पर खरीदना पड़ता है। हर चीज का व्यवसायीकरण हो गया है। इससे गरीब,मजदूर,श्रमिक तथा मध्यम वर्ग के बौद्धिक वर्ग में जो विद्रोह है उसे समझने के लिये विशिष्ट वर्ग तैयार नहीं है। सभी हथियार नहीं उठाते पर कुछ युवक भ्रमित होकर उठा लेते हैं-दूसरे शब्दों में कहें तो आतंकवाद भी समाज से उपजी निराशा का परिणाम है।
प्रयोजन सहित दया कर प्रचार करने में अपनी प्रतिष्ठा समझने वाले विशिष्ट वर्ग अध्यात्म में भी बहुत रूचि दिखाते हुए कथित साधु संतों की शरण में जाकर अपने धार्मिक होने का प्रमाण अपने ये निचले तबके को देता है पर निष्प्रयोजन दया का भाव नहीं रखना चाहता।

इसके बावजूद कुछ लोग हैं जो अधिक धनी या प्रसिद्ध नहंी है पर वह समाज के काम आते हैं। भले ही अखबार या टीवी में उनका नाम नहीं आता पर अपने क्षेत्र में निकटस्थ लोगों में लोकप्रिय होते हैं। उनका सम्मान करने वालों की संख्या बहुत कम होती है पर वह विशिष्ट वर्ग के लोगों के मुकाबले कहीं अधिक हृदय में स्थान बनाते हैं।
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Thursday, March 5, 2009

भर्तृहरि शतकः कामदेव का दंड भी कम नहीं होता ( hindu dharm and thought on sex in hindi)

स्त्रीमुद्रां कुसुमायुधस्य जविनीं सर्वार्थस्म्पत्करीं ये मूढ़ा प्रविहाय यान्ति कुधियो मिथ्याफलान्वेषणः।
ते तेनैव निहत्य निर्दयतरं नग्नीकृता मुण्डिताः केचित्तपंचशिखीकृताश्च जटिलाः कापालिश्चापरे।।

हिंदी में भावार्थ- जो मूर्ख लोग काम पर विजय प्राप्त करने के लिये स्त्री का त्याग करते हैं उनको कामदेव दंड देकर ही रहते हैं। उसमें कोई कोई वस्त्रहीन होकर धर्म का पालन करने लगता है तो कोई सिर मुंडवा लेता है। कोई बड़े बालों की जटा बना लेता है तो कोई भीख मांगने ही लग जाता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-भर्तृहरि जी का यह संदेश बहुत रोचक तथा प्रेरणादायक है। कितनी विचित्र बात है कि हमारे देश में कुछ लोग अध्यात्म ज्ञान का गलत अर्थ लेकर काम से बचने के लिये ब्रह्मचर्य का व्रत लेते हैं। ऐसे लोग वैराग्य वेश धारण करते हैं। इनमें से कोई जीवन भर वस्त्र नहीं पहनता तो कोई अपने बाल मुंडवा लेता है। कोई सिर पर जटा धारण कर लेता है। यह सभी लोग अर्थाजन तो करते नहीं इसलिये पेट पालने के लिये उनको दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है। यही कारण है कि उन्हें शिष्य बनाकर उनसे दान लेना ही पड़ता है। यह सभी अध्यात्म ज्ञान के गलत अर्थ लेने के कारण है। सच बात तो यह है कि हमारी श्रीमद्भागवत गीता आदमी को त्याग के लिये प्रेरित करती है पर उसका आशय यह नहीं है कि वह सांसरिक कार्यों से वैराग्य लिया जाये। सांसरिक कार्य करते हुए उनके फल में लिप्त न होना ही वास्तविक त्याग है। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि मनुष्य अपने मूल स्वभाव के अनुकूल कर्म करने को बाध्य होता है-जिसका साीधा आशय यह है कि मनुष्य को अपने तन,मन और विचारों की तृष्णा शांत करने के लिये जीवन में कार्य तो करना ही है। श्रीगीता में सांख्यभाव की चर्चा है पर यह भी कहा गया है कि वह एक असंभव काम है। सांख्यभाव का मतलब यह है कि इंद्रियों पर पूर्ण नियंत्रण-यानि आंखों से देखें ही नहीं, नाक से सांस ही न लें और कान से सुने ही नहीं। यह एक कठिन त्याग है और इसे विरले योगी ही कर पाते हैं। सभी के लिये यह संभव नहीं है। इसके बावजूद कुछ लोग सांस लेते, आंख से देखते,पांव से चलते और मुख से खाते हुए वैराग्य का ढोंग करते हैं और उनको अंततः दूसरे लोगों का आसरा लेना पड़ता है। एक तरह से कामदेव उनको दंड देते हैं।

देखा जाये तो भर्तृहरि के काल में भी ढोंगी थे और आज अधिक ही हो गये हैं। कहने को अनेक लोग वैरागी हैं पर उनके यौन प्रकरण अक्सर चर्चा में आते हैं। अनेक लोग तो वैराग्य का दिखावा करते हुए विवाह तक कर लेते हैं पर सार्वजनिक रूप से अपनी पत्नी को मानने से इंकार करते हैं। एक तरह से यह उनके स्वयं के लिये भी दुःखदायी है। वह कामदेव पर विजय प्राप्त करने का ढोंग करते हैं तो कामदेव भी उनको एक तरह से चोर और भिखारी बना देते हैं।
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Sunday, March 1, 2009

संत कबीर वाणी- पिंजरा बन जाता है किताबों का अधिक ज्ञान


चतुराई पोपट पढ़ी, पंडि़ सो पिंजर मांहि
फिर परमोधे और को, आपन समुझै नांहि

                              हिन्दी में भावार्थ-विद्वान लोग वेद पढ़ते हुए बहुत प्रकार का ज्ञान प्राप्त तो कर लेते हैं पर वह इतना भारी होता है कि उसे ढोना कठिन है। वह एक तरह से उनके लिये पिंंजरा बन जाता है जिसमें से निकलना उनके लिये संभव नहीं होता। धार्मिक ग्रंथ पढ़कर बहुत सारे लोग ज्ञानी कहलाते हैं पर दूसरों को तो उपदेश देते हैं पर स्वयं समझ नहीं पाते।
                          वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-कहते हैं कि भारत में शिक्षा का प्रसार हो रहा है पर दूसरा सच यह भी है कि अधिकतर लोग नौकरी-एक तरह से गुलामी-के लिये तैयार हो रहे हैं। शिक्षा प्राप्त करने के बाद वह अपने लिये किसी कंपनी या संस्थान का पिंजरा ढूंढते हैं जिसमें वह चैन से बैठ सकें। जब मालिक या बोस अनुमति दे-अवकाश स्वीकृत करे-तभी वह उड़कर इस दुनियां का आनंद लें फिर अपने पिंजरे में फिर वापस लौट आयें-वैसे ही जैसे तोता अपने पिंजरे में लौट आता है।
बहुत सारे ज्ञानी तो हम देख सकते हैं। पंडालों में हजारों की भीड़ बैठी रहती है और कथित ज्ञानी अपने प्रवचन देते हुए लोगों को मोह माया से दूर रहने का संदेश देते हैं। कार्यक्रम समाप्त होने से पहले फिर लोगों से दान का आग्रह जरूर करते हुए यह जरूर कहते हैं कि ‘धन के बिना आजकल कोई काम नहीं होता। इसलिये अपना पैसा प्रदान अवश्य करें कि धर्म का प्रचार कर सकें।’
इस तरह अनेक कथित ज्ञानियों ने पंचसितारा आश्रम बना लिये हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि धमग्रंथों का अध्ययन उन लोगों ने किया होता है। उनके प्रवचनों से यह प्रमाणित भी होता है पर वह भी उसी अज्ञान के पिंजरे में बंदी लगते हैं जिसमें सामान्य आदमी के होने का आभास हमेशा होता है। धर्म प्रचार के लिये संलग्न ऐसे लोग यह नहीं जानते कि वह स्वयं ही एक पिंजरे में कैद हैं।
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Saturday, February 28, 2009

कबीर के दोहे: समभाव से ही हृदय को शीतलता मिलती है


सीतलता तब जानिये, समता रहै समाय
विघ छोड़ै निरबिस रहै, सक दिन दूखा जाय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपने अंदर तभी शीतलता की अनुभूति हो सकती है जब हर स्थिति के लिए हृदय में समान भाव आ जाये। भले ही अपने काम में विघ्न-बाधा आती रहे और सभी दिन दुःख रहे तब भी आदमी के मन में शांति हो-यह तभी संभव है जब वह अपने अंतर्मन में सभी स्थितियों के लिए समान भाव रखता हो।

यही बड़ाई शब्द की, जैसे चुम्बक भाय
बिना शब्द नहिं ऊबरै, केता करै उपाय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते है कि उसी शब्द के प्रभाव की प्रशंसा की जाती है जो सभी लोगों के हृदय में चुंबक की तरह प्रभाव डालता है। जो मधुर वचन नहीं बोलते या रूखा बोलते हैं वह कभी भी अपने जीवन के संकटों से कभी उबर नहीं सकते।

सीखे सुनै विचार ले, ताहि शब्द सुख देय
बिना समझै शब्द गहै, कछु न लोहा लेय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो व्यक्ति अपने गुरूजनों से शब्द सीखकर उसे अपने हृदय में धारण कर उनका सदुपयोग करता है वही जीवन का आनंद उठा सकता है पर जो केवल उन शब्दों को रटता है उसका कभी उद्धार नहीं हो सकता।

Friday, February 27, 2009

संत कबीर वाणीः दिल की बात जो समझे उसी से कहें

गाहक मिलै तो कुछ कहूं, न तर झगड़ा होय
अन्धों आगे रोइये अपना दीदा खोय

संत कबीरदास जी का कहना है कि कोई ऐसा व्यक्ति मिले जो अपनी बात समझता हो तो उससे कुुछ कहें पर जो बुद्धि से अंधे हैं उनके आगे कुछ कहना बेकार अपने शब्द व्यर्थ करना है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-आजकल हर कोई बस अपनी बात कहने के लिये उतावला हो रहा है। किसी की कोई सुनना नहीं चाहता। दो व्यक्ति आपस में मिलते हैं। एक कहता है कि ‘मेरे लड़के की नौकरी नहीं लगी रही’ तो दूसरा तत्काल कहता है कि ‘मैं भी अपने लड़के लिये लिये दुकान ढूंढ रहा हूं’। एक कहता है कि ‘मेरी लड़की की शादी तय हो गयी है’ तो दूसरा तत्काल कहता है कि ‘मेरी लड़की की शादी पिछले माह हुई थी, वह घर आयी है‘। तात्पर्य यह है कि किसी की बात सुनकर उसमें मुख्य विषय के शीर्षक-जैसे लड़का,लड़की,माता पिता,भाई बहिन और चाचा चाची-एक शब्द पर ही आदमी बोलने लगता है। अनेक बार वार्तालाप में शामिल होकर मौन रहे और देखें कि कौन किसकी कितनी सुना है। तब इस बात की अनुभूति होगी कि सभी अपनी बात कहने के लिये उतावले हो रहे हैं। तब ऐसा लगता है कि उनके बीच में अपने शब्द बोलकर समय और ऊर्जा व्यर्थ करना ही है। कई बार तो ऐसा होता है कि ऐसे वार्तालाप में लोग सकारात्मक शब्द तो भूल जाते हैं पर नकारात्मक भाव के आशय दूसरों को सुनाकर बदनाम भी करते हैं। इसलिये अपनी बात ऐसे लोगोंे से ही कहनी चाहिये जो अच्छी तरह सुनते और समझते हों।
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Wednesday, February 25, 2009

विदुर नीति: नारी पर अनाचार करने वालों का पतन होता है ( vidur niti on mam woman in hindi)

1.प्रतिदिन सींचने से जिस तरह पतली लताएं संख्या में बहुत होने के कारण हवाओं को झौंके बहुत समय तक झेलती है उसी प्रकार सत्य पुरुष दुर्बल होने पर भी अपने गुणों की शक्ति पर बलवान हो जाते हैं।
2.विद्वान और सत्पुरुषों, स्त्रियों, स्वजातीय बंधुओं और गायों पर अपनी शूरता प्रकट करते हैं वे डण्ठल से पके हुए फलों की भांति नीचे गिरते हैं।
3.बीमारी हुए बिना ही उत्पन्न, कड़वा, सिर में दर्द पैदा करने वाला और पाप से जोड़ने वाला, कठोर, तीखा और गरम है तथा सज्जनों द्वारा ग्रहण करने योग्य नहीं है उस क्रोध को पी जाना ही बेहतर है।
4.अपनी उन्नति चाहने वाले को चाहिए कि वह उत्तम पुरुषों की सेवा करे, समय आने पर मध्यम पुरुषों की भी सेवा करे परंतु अधम पुरुषों की सेवा कदापि न करेnari ।
5दुष्ट पुरुष बल से तो अन्य पुरुष निरंतर उद्योग , बुद्धि के प्रयोग तथा पुरुषार्थ से धन भले ही प्राप कर ले परंतु उत्तम कुल का आचरण और सदाचार प्राप्त करना आसान नहीं है।
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Monday, February 23, 2009

आज है महाशिवरात्रि का पावन पर्व-आलेख

आज महाशिवरात्रि का पर्व पूरे देश में हर्षोल्लास से मनाया जा रहा है। भगवान् शिव हमारे आराध्य देवता हैं और हिन्दू आध्यात्म में उनको सत्य स्वरूप माना जाता है। हमारे देश के लोग अनेक देवताओं की पूजा करते हैं और भगवान् शिव सब देवताओं के भी भगवान् हैं। उनको सत्य स्वरूप इसलिए भी माना जाता है क्योंकि उनका चरित्र ही शाश्वत सत्य के निकट दिखाई देता है।

समुद्र मंथन के समय विष पीकर उन्होने पृथ्वी पर जीवन का मार्ग प्रशस्त किया। उसके बाद भागीरथ की तपस्या से प्रभावित होकर श्री गंगा जी को प्रथ्वी पर लाने से पहले अपनी जटाओं में धारण कर उसके वेग से बचाया। अपने भक्तो की संक्षिप्त तपस्या से ही प्रसन्न होने के कारण उन्हें भोलेनाथ भी कहा जाता है। आज उनका लोग स्मरण कर उनसे इसी तरह पृथ्वी पर जीवन की रक्षा की आशा करते हैं।

सत्य के प्रतीक शिव को संहार का देवता भी माना जाता। उनको लेकर तमाम तरह की कथाएँ हैं। सच बात तो यह है कि मनुष्य को अपने लिए नहीं बल्कि पूरे समाज के लिए कार्य करना चाहिए उनसे यही प्रेरणा मिलती है। मनुष्य को न केवल मनुष्य से बल्कि उसे पशु,पक्षियों,तथा वन्य जीवों के प्रति भी मन में प्रेम रखना चाहिए। गंगा को प्रथ्वी पर लाने के लिए उसे अपनी जटाओं में धारण कर प्रकृति के प्रति मनुष्य को सजग रहने के प्रेरणा भी उन्होंने दी।
भगवान् शिव जी को मैं नमन करता हूँ और अपने मित्रों, पाठको और साथियों को शुभकामनाएँ देता हूँ।
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Saturday, February 21, 2009

कबीर के दोहे: मन में नाम जापिए, बाहर दिखाने से क्या लाभ

बाहर राम क्या दिखराइये, अन्तर जपिए राम
कहा काज संसार से, तुझे घनी से काम


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि दिखावटी रूप से राम का भजन करने से कोई लाभ नहीं होता. राम का स्मरण हृदय से करो. इस संसार में तुम्हारा क्या काम है तुम्हें तो भगवान का स्मरण मन में करना चाहिऐ.

फूटी आँख विवेक की, लखें न संत असतं
जिसके संग दस बीच हैं, ताको नाम महंत


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं जिन लोगों की ज्ञान और विवेक नष्ट हो गये है वह सज्जन और दुर्जन का अन्तर नहीं बता सकता है और सांसरिक मनुष्य जिसके साथ दस-बीस चेले देख लेता है वह उसको ही महंत समझा करता है.
वर्तमान सन्दर्भ में व्याख्या-लोगों की बुद्धि जब कुंद हो जाती है तब उनको सज्जन और दुर्जन व्यक्ति की पहचान नहीं रहती है। सच बात यही की इसी कारण अज्ञानी व्यक्ति संकटों में फंस जाते हैं। झूठी प्रशंसा करने वाले, चिकनी चुपड़ी बातें कर अपना स्वार्थ सिद्ध करने वाले, पहले दूसरों की निंदा करने के लिए प्रेरित कर फ़िर झगडा कराने वाले लोग इस दुनिया में बहुत हैं। ऐसे दुष्ट लोगों की संगत से बचना चाहिए। इसके अलावा ऊंची आवाज़ में भक्ति कर लोगों में अपनी छबि बनाने से भी कोई लाभ नहीं है। इससे इंसान अपने आपको धोखा देता है। जिनके मन में भगवान् के प्रति भक्ति का भाव है वह दिखावा नहीं करते। मौन रहते हुए ध्यान करना ही ईश्वर सबसे सच्ची भक्ति है।
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Wednesday, February 18, 2009

कबीर के दोहे: मन तो देवताओं को भी ठग लेता है

सुर नर मुनि सबको ठगै, मनहिं लिया औतार
जो कोई याते बचै, तीन लोक ते न्यार

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि यह मन तो एक महान ठग है जो देवता, मनुष्य और मुनि सभी को ठग लेता है। यह मन जीव को बार बार अवतार लेने के लिये बाध्य करता है। जो कोई इसके प्रभाव से बच जाये वह तीनों लोकों में न्यारा हो जाता है।

अपने अपने चोर को, सब कोय डारै मार
मेरा चोर मुझको मिलै, सरबस डारूं वार

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि संसार के सब तो अपने अपने चोर को मार डालते हैं, परंतु मेरा चोर तो मन है। वह अगर मुझे मिल जाये तो मैं उस पर सर्वस्व न्यौछावर कर दूंगा।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य की पहचान तो मन है और वह उसे जैसा नचाता। आदमी उसके कारण स्थिर प्रज्ञ नहीं रह पाता। कभी वह किसी वस्तु का त्याग करने का निर्णय लेता है पर अगले पर ही वह उसे फिर ग्रहण करता है। अर्थात मन हमेशा ही व्यक्ति का अस्थिर किये रहता है। कई बार तो आदमी किसी विषय पर निर्णय एक लेता है पर करता दूसरा काम है। यह अस्थिरता मनुष्य को जीवन पर विचलित किये रहती है और वह इसे नहीं समझ सकता है। यह मन सामान्य मनुष्य क्या देवताओं और मुनियों तक को धोखा देता है। इस पर निंयत्रण जिसने कर लिया समझा लो तीनों को लोकों को जीत लिया।

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Tuesday, February 17, 2009

भर्तृहरि संदेश: ज्ञानियों के बीच बैठकर पता चलता है अपने अज्ञान का

वरं पर्वतदुर्गेषु भ्रान्तं वनचरैः सह
न मूर्खजनसम्पर्कः सुरेन्द्रभवनेष्वपि
हिंदी में अर्थ- बियावान जंगल और पर्वतों के बीच खूंखार जानवरों के साथ रहना अच्छा है किंतु अगर मूर्ख के साथ इंद्र की सभा में भी बैठने का अवसर मिले तो भी उसे स्वीकार नहीं करना चाहिए।
यदा किंचिज्ज्ञोऽहं द्विप इव मदान्धः समभवम्
तदा सर्वज्ञोऽस्मीत्यभवदवलिपतं मम मनः
यदा किञ्चित्किाञ्चिद् बुधजनसकाशादवगतम्
तदा मूर्खोऽस्मीति जवन इव मदो में व्यपगतः

हिंदी में अर्थ-जब मुझे कुछ ज्ञान हुआ तो मैं हाथी की तरह मदांध होकर उस पर गर्व करने लगा और अपने को विद्वान समझने लगा पर जब विद्वानों की संगत में बैठा और यथार्थ का ज्ञान हुआ तो वह अहंकार ज्वर की तरह उतर गया तब अनुभव हुआ कि मेरे समान तो कोई मूर्ख ही नहीं है।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-आजकल जिसे देखो उसक पास ही कोई न कोई उपाधि है पर जीवन और अध्यात्म का ज्ञान कितना है यह तो समय आने पर ही पता चलता है। आधुनिक साधनों की वजह से लोगों का जीवन एकाकी हो गया है और सत्संग में कम जाने के कारण उनको पता ही नहीं लगता कि आखिर अध्यात्म ज्ञान होता क्या है? फिर आधुनिक शिक्षा से भौतिक ज्ञान तो इतना प्राप्त हो जाता है कि लोग उसे ही सम्पूर्ण समझने लगते हैं और भक्ति और अध्यात्म विषय उनके लिये पौंगापंथी हैं। जब भौतिकता से ऊब जाते हैं तो फिर ढूंढते हैं धार्मिक लोगों में शांति। ऐसे में धार्मिक ग्रंथ पढ़कर अपने को गुरु कहलाने वाले ढोंगी उनका शोषण करत हैं। होता यह है कि कोई अध्यात्म ज्ञान न होने के कारण लोग उनकी बात को ही सत्य समझने लगते हैं। फिर जब कभी वास्तविक ज्ञानी से भेंट होती है तब पता लगता है कि ज्ञान क्या है? इसलिये ज्ञानियों की संगत करना चाहिये।

कहते हैं कि नादान मित्र से दाना शत्रु भला, यह एकदम सच बात है। मूर्ख के साथ कब कहां फंस जायें पता ही नहींे लगता। मूर्ख का काम होता है बिना सोचे समझे काम करना। कुछ लोग तो ऐसे होते हैं जो दूसरों को पीड़ा देने में अपने को प्रसन्न अनुभव करते हैं। ऐसे मूर्ख लोगों से बचकर रहना चाहिये क्योंकि वह कभी भी हमारे पर प्रहार कर सकते हैं।

Monday, February 16, 2009

रहीम संदेश: मूर्खों को सजा देने पर ही काम चलता है

खीरा सिर तें काटिए, मलियत नमक बनाय

रहिमन करुए मुखन को , चाहिअत इहै सजाय

कविवर रहीम कहते हैं कि जिस तरह खीरे का मुख काटकर उस पर नमक घिसा जाता है तभी वह खाने में स्वाद देता है वैसे ही मूर्खों को अपनी करनी की सजा देना चाहिऐ ताकि वह अनुकूल व्यवहार करें।

नये संदर्भ में व्याख्या-यह सही है कि बडों को छोटों के अपराध क्षमा करना चाहिए, पर कुछ लोग ऐसे होते हैं जो नित्य मूर्खताएं करते रहते हैं। कभी किसी की मजाक उडाएंगेतो कभी किसी को अपमानित करेंगे। कुछ तो ऐसी भी मूर्ख होते हैं जो दूसरे व्यक्ति को शारीरिक, आर्थिक और मानसिक हानि पहुँचने के लिए नित्य तत्पर रहते हैं। ऐसे लोगों को बर्दाश्त करना अपने लिए तनाव मोल लेना है। ऐसे में अपने क्रोध का प्रदर्शन कर उनको दण्डित करना चाहिए। अगर ऐसा नहीं करेंगे तो उनका साहस बढ़ता जायेगा।

व्याख्याकार स्वयं कई बार ऐसा देख चुका है कि कई लोग तो इतने नालायक होते हैं कि उनको प्यार से समझाओ तो और अधिक तंग करने लगते हैं और जब क्रोध का प्रदर्शन कर उन्हें धमकाया जाये तो वह फिर दोबारा वह बदतमीजी करने का साहस नहीं कर पाते। हालांकि इसमें अपनी सीमाओं का ध्यान अवश्य रखना चाहिऐ और क्रोध का बहाव बाहर से बाहर होना चाहिए न कि उसकी पीडा हमारे अन्दर जाये।
कुछ लोगों की आदत होती है कि वह दूसरों की मजाक उड़ाकर यह अभद्र व्यवहार कर उन्हें अपमानित करते हैं। अनेक लोग उनसे यह सोचकर झगड़ा मोल नहीं लेते कि इससे तो मूर्ख और अधिक प्रज्जवलि हो उठेगा पर देखा गया है कि जब ऐसे लोगों को किसी से कड़े शब्दिक प्रतिकार का सामना करना पड़े पर पीछे हट जाते हैं। अगर प्रतिकार नहीं किया जाये तो वह निरंतर अपमानित करते रहते हैं। अगर हमें ऐसा लगता है कि कोई हमारा निरंतर अपमान या अपेक्षा कर अपने को श्रेष्ठ साबित कर हमारे साथ बदतमीजी कर रहा है तो उसका प्रतिकार करने में अधिक सोचना नहीं चाहिये।


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