Monday, July 21, 2008

रहीम के दोहे-दुष्ट लोगों की संगत से लगता है कलंक

रहिमन उजली प्रकृति को, नहीं नीच को संग
करिया वासन कर गहे, कालिख लागत अंग

कविवर रहीम कहते हैं कि जिनकी प्रवृत्ति उजली और पवित्र है अगर उनकी संगत नीच से न हो तो अच्छा ही है। नीच और दुष्ट लोगों की संगत से कोई न कोई कलंक लगता ही है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-सज्जन और उज्जवन प्रकृति के लोग शांत रहते हैं इसलिये उनको ऐसे लोगों की संगत नहीं करना चाहिये जो दुष्टता और अशांत प्रवृत्ति के होते हैं। वैसे आजकल के लोगों में यह प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है कि वह दलाल और दादा प्रवृत्ति के लोगों की संगत चाहते हैं ताकि कोई उनका कोई बिगाड़ नहीं सके। फिल्म देखकर यह धारणा बना लेते हैं कि दादा लोग किसी से किसी की भी रक्षा कर सकते हैं। कई सज्जन परिवार को लड़के भी भ्रमित होकर दादा किस्म के लड़कों के चक्कर में पड़ जाते हैं तो कई लड़कियां भी अपने लिये ऐसे मित्र चुनती है जो दादा टाईप के हों। उनको लगता है कि वह दादा किस्म के मित्र इस समाज में प्रतिष्ठित होते हैं। देश में इसलिये ही सभी जगह अपराधीकरण का बोलबाला हो रहा है क्योंकि जो उज्जवल और शांत प्रकृत्ति के हैं वह अपना विवेक खोकर ऐसे लोगों को संरक्षण देते हैं जो समाज के लिये खतरा है।

यह बात समझ लेना चाहिये कि बुरे का अंत बुरा ही होता है। दादा और दलाल आकर्षक लगते हैं पर उनकी समाज में कोई सम्मान नहीं होता। बुराई का अंत होता है और ऐसे में जो दुष्ट लोगों की संगत करते हैं उनको भी दुष्परिणाम भोगना पड़ता है।

संत कबीर वाणी:दूसरे की पीडा न समझे वह मूर्ख

पीर सबन की एकसी, मूरख जाने नांहि
अपना गला कटाक्ष क, भिस्त बसै क्यौं नांहि


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि सभी मनुष्यों की पीड़ा एक जैसी होती है पर मूर्ख लोग इसे नहीं समझते। ऐसे अज्ञानी और हिंसक लोग अपना गला कटाकर स्वर्ग में क्यों नहीं बस जाते।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-इस दोहे में अज्ञानता और हिंसा की प्रवृत्ति वाले लोगों के बारे में बताया गया है कि अगर किसी दूसरे को पीड़ा होती है तो अहसास नहीं होता और जब अपने को होती है तो फिर दूसरे भी वैसी ही संवेदनहीनता प्रदर्शित करते हैं। अनेक लोग अपने शौक और भोजन के लिये पशुओं पक्षियों की हिंसा करते हैं। उन अज्ञानियों को यह पता नहीं कि जैसा जीवात्मा हमारे अंदर वैसा ही उन पशु पक्षियों के अंदर होता है। जब वह शिकार होते हैं तो उनके प्रियजनों को भी वैसा ही दर्द होता है जैसा मनुष्यों के हृदय में होता है। बकरी हो या मुर्गा या शेर उनमें भी मनुष्य जैसा जीवात्मा है और उनको मारने पर वैसा ही पाप लगता है जैसा मनुष्य के मारने पर होता है। यह अलग बात है कि मनुष्य समुदाय के बनाये कानून में के उसकी हत्या पर ही कठोर कानून लागू होता है पर परमात्मा के दरबार में सभी हत्याओं के लिऐ एक बराबर सजा है यह बात केवल ज्ञानी ही मानते हैं और अज्ञानी तो कुतर्क देते हैं कि अगर इन जीवो की हत्या न की जाये तो वह मनुष्य से संख्या से अधिक हो जायेंगे।

आजकल मांसाहार की प्रवृत्तियां लोगोंे में बढ़ रही है और यही कारण है कि संवदेनहीनता भी बढ़ रही है। किसी को किसी के प्रति हमदर्दी नहीं हैं। लोग स्वयं ही पीड़ा झेल रहे हैं पर न तो कोई उनके साथ होता है न वह कभी किसी के साथ होते हैं। इस अज्ञानता के विरुद्ध विचार करना चाहिये ।

Sunday, July 20, 2008

संत कबीर वाणीः गाय गंदगी खाने लगे तो समझ लो कलियुग आ गया

छाजन भोजन हक्क है, और अनाहक लेय
आपन दोजख जात है, औरों दोजख देय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि प्रत्येक मनुष्य को जीवन निर्वाह के लिये वस्त्र और भोजन पाने का अधिकार है पर जो अनुचित रूप से अपेय या नशीले पदार्थ लेता है उसे नरक में जाना पड़ता है।

गऊ जो विष्ठा भच्छई, विप्र तमाखू भंग
सस्तर बांधे दरसनी, यह कलियुग का रंग

संत कबीर दास जी कहते हैं कि जब गाय गंदगी खाने लगे, विद्वान अनेक प्रकार के व्यसर करने लगे और जब दर्शन करने वाले साधु अस्त्र-शस्त्र बांधने लगे तब समझ लो घोर कलियुग आ गया।

मद तो बहुतक भांति का, ताहि न जानै कोय
तनमद, मनमद जातिमद, मायामद सब लोय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मद तो बहुत प्रकार का होता है पर सभी इस बात को नहीं जानते। यह मद हैं शरीर, मन, जाति और माया का मद।

Saturday, July 19, 2008

रहीम के दोहे-अपने कार्य और व्यवहार में अति न कीजिये

रहिमन अति न कीजिए, गहि रहिए निज कानि
सैंजन अति फूलै तऊ, डार पात की हानि

कविवर रहीम कहते हैं कि कभी भी किसी कार्य और व्यवहार में अति न कीजिये। अपनी मर्यादा और सीमा में रहें। इधर उधर कूदने फांदने से कुछ नहीं मिलता बल्कि हानि की आशंका बलवती हो उठती है

यही रहीम निज संग लै, जनमत जगत न कोय
बैर प्रीति अभ्यास जस, होत होत ही होय


कविवर रहीम कहते हैं कि प्रीति, अभ्यास और प्रतिष्ठा में धीरे धीरे ही वृद्धि होती है। इनका क्रमिक विकास की अवधि दीर्घ होती है क्योंकि यह सभी आदमी जन्म के साथ नहीं ले आता। इन सभी का स्वरूप आदमी के व्यवहार, साधना और और आचरण के परिणाम के अनुसार उसके सामने आता है।

Friday, July 18, 2008

संत कबीर वाणी-शिष्यों से पांव पुजवाने वाले गुरुओं की दीक्षा से मुक्ति नहीं

सूर लड़ै गुरु दाव से, इक दिस जूझन होय
जूझै बीना सूरमा भला न कहसी कोय


संत शिरोमणि कबीरदास जी के अनुसार जो शूरवीर होता है वह अपने गुरु के बताये ज्ञान के अस्त्र शस्त्र से इस जीवन संघर्ष में जूझता है। जब तक कोई इस संघर्ष में लड़ने के लिये मैदान में नही उतरता वह साहसी नहीं कहलाता।

पांव पुजावे बैठि के, भखै मांस मद दोय
तिनकी दीच्छा मुक्ति नहिं, कोटि नरक फल होय


संत शिरोमणि कबीर दास जी के अनुसार ऐसे गुरु जो बैठकर केवल अपने शिष्यों से पांव पुजवाते हैं उनकी दीक्षा से कभी मुक्ति नहीं हो सकती बल्कि करोड़ों और नरक भोगने पड़ते हैं।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-गुरु से शिक्षा ्रपाप्त करने के बाद मनुष्य को जीवन संघर्ष में लड़ने के लिये उतरना चाहिए। यह संघर्ष दैहिक और मानसिक दोनों स्तरों पर होता है। दैहिक से आशय यह है कि मनुष्य को अपने रोजगार आदि के लिये कार्य करना पड़ता है जिसमें उसे नैतिक आचरण और ईमानदारी से जुटना चाहिए। अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण करते हुए मीठी वाणी बोलना, किसी के कटु बोलने पर भी क्रोध न करना, परोपकार करना और सहज भाव से सभी के प्रति समान भाव रखने के साथ बुरा समय आने पर विचलित न होना आदमी के मानसिक रूप से पुख्ता होने का प्रमाण है। यह किसी सद्गुरू की शिक्षा से सहज और संभव हो जाता है।

जो गुरु शिक्षा देने के बाद अपने शिष्य को अपने से अलग न कर अपने पास ही बुलाते रहते हैं वह गुरु नहीं है बल्कि व्यवसायी है। वह अपने पास शिष्य को बुलाकर उससे अपनी सेवा कराते हैं। ऐसे गुरु तो कभी ज्ञानी नहीं होते बल्कि उनकी संगत करने से इस धरती के अलावा परलोक में भी नरक भोगना पड़ सकता है। गुरु का कार्य है कि वह अध्यात्म की शिक्षा देकर अपने शिष्य को अपने से अलग कर दूसरे शिष्यों को शिक्षा देने का काम शुरू करे अगर वह ऐसा नहीं करता तो इसका आशय यह है कि वह दिखावटी ज्ञानी है। अध्यात्म शिक्षा देने और प्राप्त करने का उद्देश्य यही है कि मनुष्य अपने जीवन संघर्ष में आगे बढ़ता जाये न कि वह बार-बार गुरु के सेवा में लौटकर आये। जब तक वह शिक्षा प्राप्त कर रहा है तभी तक उसका कर्तव्य है कि वह गुरु की सेवा करे और बाद में दक्षिणा देकर चला जाये न कि केवल गुरु की प्रदक्षिणा कर अपना जीवन नष्ट करता रहे।

Thursday, July 17, 2008

संत कबीर वाणीःजिसने घड़े जैसा मुख दिया वह दाना भी देता है

भूखा भूखा क्या करै, कहा सुनावै लोग
भांड़ा घडिया मुख दिया, सोही पूरन जोग

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं अपने भूख के बारे में दूसरे लोगों को बताने से क्या लाभ? जिस परमात्मा ने घड़े जैसा मुख दिया है वह उसकी भूख की पूर्ति के लिये भोजन भी देगा-इस बात पर विश्वास करना चाहिए।

सिरजन हारे सिरजिया, आटा पानी लीन
देनेहारा देत है, मेटनहारा कौन

संत कबीरदास जी कहते हैं कि इस संसार के सृजनकर्ता परमात्मा ने सबके लिये व्यवस्था की है। वह सभी को आटा पानी और नमक देने वाले हैं। उनकी व्यवस्था को मिटाने वाला कोई नहीं है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-परमात्मा ने सभी जीवों को मुख दिया है तो भोजन की व्यवस्था भी की है, पर आदमी है कि अपनी समस्याओं को रोना दूसरे लोगों के सामने रोता रहता है। इस तरह सभी मनुष्य एक दूसरे की हंसी उड़ाते हैं। मनुष्य तो अपना पूरा जीवन कमाते, खाते और रोते बिता देता है। इस सृष्टि में खाने के मुख हैं तो उसको भरने के लिये परमात्मा ने अन्न, जल और नमक का इंतजाम भी कर दिया है पर आदमी का मन नहीं भरता। वह हमेशा अपने जीवन में कभी भूखों मरने की आशंका से संचय करता जाता है। उसका यह भय कभी समाप्त नहीं होता और संचय की लालसा उसे गोल गोल केवल धन के आसपास घुमाने लगती है। यह भाग्यवादी विचार धारा नहीं है कि परमात्मा ने सभी के खाने का प्रबंध कर दिया है तो उसे फिर कर्म करने की क्या आवश्यकता है?बल्कि अपना कर्म करते हुये यह विश्वास करना चाहिए कि कर्ता तो वह परमात्मा है जिसने यह जीवन दिया है। मनुष्य ने देह प्राप्त तो की है पर अपने मन की लालसाओं के कारण वह धन संग्रह से आगे विचार नहीं करता और अपना पूरा जीवन नष्ट कर देता है। सभी अपना सांसरिक दुःखों का रोना एक दूसरे के सामने रोते हैं जैसे कि वह कर्ता हों। इस तरह सभी एक दूसरे का उपहास भी उड़ाते हैं।

Wednesday, July 16, 2008

संत कबीर वाणी-नाचते और गाते हुए भक्ति नहीं हो सकती

कबीर तृस्ना टोकना, लीये, डोलै स्वाद
राम नाम जाना नही, जनम गंवाया बाद

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मन की तृष्णा तो आदमी को अपने स्वाद के लिये इधर उधर भटकाती है। वह राम का नाम को नहीं जानती और आदमी उसकी संतुष्टि में अपना जीवन व्यर्थ कर देता है।

नाचे गावै पद कहै, नाहीं गुरु सों हेत
कहैं कबीर क्यों नीपजै, बीच बिहुला खेत


संत कबीर दास जी कहते हैं कि कुछ लोग नाचते और गाते हुए भक्ति में लीन होने का अपना अहंकार होने का का प्रदर्शन करते हैं उनका वास्तव में परमात्मा के प्रति प्रेमभाव नहीं होता। वह तो ऐसे खेत की तरह हैं जिनमें भक्ति के बीज बोए हीं नहीं नहीं गये। इसलिये उनका जीवन सफल नहीं हो सकता।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-अनेक गुरुओं के सत्संग में प्रवचन के दौरान ही लोग भजन के समय नाचते और गाते यह बताने का प्रयास करते हैं कि वह भगवान की भक्ति में लीन है। गुरु भी यह सोचकर प्रसन्न होते हैं कि इस तरह तो उनकी शक्ति का प्रचार हो रहा है। यह दिखावा है। भक्ति और ज्ञान दिखाने की चीज नहीं होती। उनका प्रभाव तो आदमी के चेहरे से दिखने लगता है। भक्ति एकांत साधना है और इस तरह जो लोग सबके सामने नाचते और गाते हैं वह केवल अहंकार के वशीभूत होकर नाचते हैं जैसे कि वह भक्ति कर रहे हैं जबकि उनका पूरा ध्यान इस तरफ होता है कि वह लोगों को अपनी तरफ आकर्षित करें। मन में परमात्मा का ध्यान हो तो आदमी स्थिर हो जाता है इस तरह नाचता गाता नहीं है।

अपने प्रति लोगों में रुझान पैदा करने की तृष्णा उनके अंदर होती है और वह उन्हें भक्ति के नाम पर ऐसे नाटक करने को प्रेरित करती है। वह वास्तव में परमात्मका का नाम नहीं लेते बल्कि अपने अंदर स्थित अहंकार का प्रदर्शन करते हैं। लोगों में आकर्षण का कें्रद बने रहने की तृष्णा की वजह से कई लोग भक्ति का दिखावा करते है। इतना ही नहीं वह यह भी साबित करने का प्रयास करते हैं कि जैसे बहुत बड़े ज्ञानी हों। सच्ची भक्ति तो केवल एकांत में भी संभव है और ज्ञानी आदमी कभी अपने ज्ञान का बिना वजह प्रदर्शन नहीं करते।

Tuesday, July 15, 2008

संत कबीर वाणी:दूसरे से आशा करने पर होता है अपमान

आस आस घर घर फिरै, सहै दुखारी चोट
कहैं कबीर भरमत फिरै,ज्यों चैसर की गोट

संत शिरोमणि कबीरदास कहते हैं कि अपने हृदय मं आशा कर मनुष्य घर घर भटकता है पर पर उसे दूसरे के मुख से अपने लिये अपमान के वचन सुनने पड़ते हैं। केवल आशा पूरी होने के लिये अपनी अज्ञानता के कारण मनुष्य चैसर के गोट की तरह कष्ट उठाता है।
आशा तृस्ना सिंधु गति, तहां न मन ठहराय
जो कोइ आसा में फंसा, लहर तमाचा खाय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं आशा और तृष्णा और समुद्र की लहरों के समान है हो उठती और गिरती हैं जो मनुष्य इसके चक्कर में फंसता है वह इसके तमाचा खाता रहता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-अपना हर कार्य अपने ऊपर ही रखना चाहिए। इस सांसरिक जीवन में सारे कार्य अपने नियत समय पर होते हैं और मनुष्य को केवल निष्काम भाव से कार्य करते हुए ही सुख की प्राप्त हो सकती हैं। श्रीगीता में निष्काम भाव से कार्य करने का उपदेश इसलिये दिया गया है। यह संसार अपनी गति से चल रहा है और उसमें सब कर्मों का फल समय पर प्रकट होता। मनुष्य सोचता है कि मैं इसे चला रहा हूं इसलिये वह अपने ऐसे कार्यों के लिये दूसरों से आशा करता है जो स्वतः होने हैं और अगर मनुष्य उसके लिये अपने कर्म करते हुए परिणाम की परवाह न करे तो भी फलीभूत होंगे। जब अपने आशा पूर्ति के लिये आदमी किसी दूसरे घर की तरफ ताकता है तो उसे उसे अपना आत्मसम्मान भी गिरवी रखना पड़ता है। वैसे अपना कर्म करते जाना चाहिये क्योंकि फल तो प्रकट होगा ही आखिर वह भी इस संसार का एक ही भाग है। आशा और कामना का त्याग कर इसलिये ही निष्काम भाव से कार्य करने का संदेश दिया गया है।

Monday, July 14, 2008

संत कबीर वाणी:प्रेम में सुख पाने की सोचना होता है संकट का कारण

प्रीति कर सुख लेने को सुख गया हिराय
जैसे पाइ छछुंदरी, पकडि सींप पछिताय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि सुख प्राप्त करने के लिये लोग गलत संपर्क बना लेते हैं और फिर कष्ट उठाते हैं। उस समय उनकी दशा ऐसी होती है जैसे सांप छछुंदर को पकड़ कर पछताता है

कबीर विषधर बहु मिले, मणिधन मिला न कोय
विषधर को मणिधर मिले, विष तजि अमृत होय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि इस संसार में विषधर सर्प बहुत मिलते हैं, पर मणि वाला सर्प नहीं मिलता। यदि विषधर को मणिधर मिल जाये तो विष भी अमृत बन जाये।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-संगति का प्रभाव आदमी पर अवश्य होता है। भले ही लोग स्वार्थ के लिये बुरे लोगों की संगति यह विचार कर करते हैं कि उसका कोई प्रभाव नहीं होगा पर यह उनका केवल विचार होता है। जब दुर्गुणी व्यक्ति की संगति की जाती है तो उसकी बातों का प्रभाव धीरे-धीरे पड़ता ही हैं और मन में कलुषिता का भाव आता ही है। इसके अलावा उसकी संगति से लोगों की दृष्टि में ही गिरते हैं और उसक द्वारा पापकर्म करने पर उसका सहभागी का संदेह भी किया जाता है। इससे अच्छा है कि दुष्ट और दुर्गुणी व्यक्ति के साथ संगति हीं नहीं की जाये। ऐसे लोगों के साथ ही अपना संपर्क बढ़ाया जाये जो भक्ति और ज्ञान रस के सेवन करने में दिलचस्पी लेते हों।

Saturday, July 12, 2008

संत कबीर वाणी:हृदय से कपट न जाए तो भजन से क्या लाभ

हरि गुन गावे हरषि के, हिरदय कपट न जाय
आपन तो समुझै नहीं, औरहि ज्ञान सुनाय


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि भगवान के भजन और गुण तो नाचते हुए गाते तो बहुत लोग हैं पर उनके हृदय से कपट नहीं जाता। इसलिये उनमे भक्ति भाव और ज्ञान नहीं होता परंतु वह दूसरों के सामने अपना केवल शाब्दिक ज्ञान बघारते है।

पढ़त गुनत रोगी भया, बढ़ा बहुत अभिमान
भीतर ताप जू जगत का, घड़ी न पड़ती सान


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि पढ़ते और गुनते हुए आदमी का अभिमान बढ़ता गया। उसके अंतर्मन में जेा तृष्णाओं और इच्छाओं की अग्नि जलती है उसके ताप से उसे मन में कभी शांति नहीं मिलती है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-वर्तमान काल में शिक्षा का प्रचार प्रसार तो बहुत हुआ है पर अध्यात्मिक ज्ञान की कमी के कारण आदमी को मानसिक अशांति का शिकार हुआ है। वर्तमान काल में जो लोग भी शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं उनका उद्देश्य उससे नौकरी पाना ही होता है-उसमें रोजी रोटी प्राप्त करने के साधन ढूंढने का ज्ञान तो दिया जाता है पर अध्यात्म का ज्ञान न होने के कारण भटकाव आता है। बहुत कम लोग हैं जो शिक्षा प्राप्त कर नौकरी की तलाश नहीं करते-इनमें वह भी उसका उपयोग अपने निजी व्यवसायों में करते हैं। कुल मिलाकर शिक्षा का संबंध किसी न किसी प्रकार से रोजी रोटी से जुड़ा हुआ है। ऐसे में आदमी के पास सांसरिक ज्ञान तो बहुत हो जाता है पर अध्यात्मिक ज्ञान से वह शून्य रहता है। उस पर अगर किसी के पास धन है तो वह आजकल के कथित संतों की शरण में जाता है जो उस ज्ञान को बेचते हैं जिससे उनके आश्रमों और संस्थानों के अर्थतंत्र का संबल मिले। जिसे अध्यात्मिक ज्ञान से मनुष्य के मन को शांति मिल सकती है वह उसे इसलिये नहीं प्राप्त कर पाता क्योंकि वह अपनी इच्छाओं और आशाओं की अग्नि में जलता रहता है। कुछ पल इधर उधर गुजारने के बाद फिर वह उसी आग में आ जाता है।
जिन लोगों को वास्तव में शांति चाहिए उन्हें अपने प्राचीन ग्रंथों में आज भी प्रासंगिक साहित्य का अध्ययन करना चाहिए। यह अध्ययन स्वयं ही श्रद्धा पूर्वक करना चाहिए ताकि ज्ञान प्राप्त हो। हां, अगर उन्हें कोई योग्य गुरू इसके लिये मिल जाता है तो उससे ज्ञाना भी प्राप्त करना चाहिए। यह जरूरी नहीं है कि गुरु कोई गेहुंए वस्त्र पहने हुए संत हो। कई लोग ऐसे भी भक्त होते हैं और उनसे चर्चा करने से भी बहुत प्रकार का ज्ञान प्राप्त होता है। इसलिये सत्संग में जाते रहना चाहिये।

Friday, July 11, 2008

संत कबीर वाणीः कर्मकांड को धर्म समझना है एक भ्रम

‘कबीर’ मन फूल्या फिरै, करता हूं मैं ध्रंम
कोटि क्रम सिरि ले चल्या, चेत न देखै भ्रम

संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं कि आदमी अपने सिर पर कर्मकांडों का बोझ ढोते हुए फूलता है कि वह धर्म का निर्वाह कर रहा है। वह कभी अपने विवेक का उपयोग करते हुए इस बात का विचार नहीं करता कि यह उसका एक भ्रम है।
त्रिज्ञणा सींची ना बुझै, दिन दिन बधती जाइ
जवासा के रूष ज्यूं, घण मेहां कुमिलाइ


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मन में जो त्रृष्णा की अग्नि कभी बुझती नहीं है जैसे उस पर पानी डालो वैसे ही बढ़ती जाती है। जैसे जवासे का पौधा भारी वर्षा होने पर भी कुम्हला जाता है पर फिर हरा भरा हो जाता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-संत कबीरदास जी ने अपने समाज के अंधविश्वासों और कुरीतियों पर जमकर प्रहार किये हैं। कितने आश्चर्य की बात है कि अनेक संत और साधु उनके संदेशों को ग्रहण करने का उपदेश तो देते हैं पर समाज में फैले अंधविश्वास और कर्मकांडों पर खामोश रहते हैं। आदमी के जन्म से लेकर मृत्यु तक ढेर सारे ऐसे कर्मकांडों का प्रतिपादन किया गया है जिनका कोई वैज्ञानिक तथा तार्किक आधार नहीं है। इसके बावजूद बिना किसी तर्क के लोग उनका निर्वहन कर यह भ्रम पालते हैं कि वह धर्म का निर्वाह कर रहे हैं। किसी कर्मकांड को न करने पर अन्य लोग नकर का भय दिखाते हैं यह फिर धर्म भ्रष्ट घोषित कर देते हैं। इसीलिये कुछ आदमी अनचाहे तो कुछ लोग भ्रम में पड़कर ऐसा बोझा ढो रहे हैं जो उनके दैहिक जीवन को नरक बनाकर रख देता है। कोई भी स्वयं ज्ञान धारण नहीं करता बल्कि दूसरे की बात सुनकर अंधविश्वासों और रूढि़यों का भार अपने सिर पर सभी उसे ढोते जा रहे हैं। इस आर्थिक युग में कई लोग तो ऋण लेकर ऐसी परंपराओं को निभाते हैं और फिर उसके बोझ तले आजीवन परेशान रहते हैं। इससे तो अच्छा है कि हम अपने अंदर भगवान के प्रति भक्ति का भाव रखते हुए केवल उसी कार्य को करें जो आवश्यक हो। अपना जीवन अपने विवेक से ही जीना चाहिए।

Thursday, July 10, 2008

संत कबीर वाणी-झूठे शब्दों की सेना को ज्ञान ध्वस्त कर देता है

हीरा पाया पारखी, धन महं दीन्हा आन
चोट सही फूटा नहीं, तब पाई पहचान

पारखी ने ने हीरा प्राप्त कर लिया और उसकी धन के रूप में कीमत भी आंक ली पर जब चोट की तो वह फूटा नहीं और तब पहचान हुई कि वह कितना मजबूत है।
संक्षिप्त व्याख्या-जब किसी को ज्ञान प्राप्त होता है तो उसको लगता है कि अच्छा हुआ कि वह उसे प्राप्त हो गया और कभी काम आयेगा-उस समय वह उसे सामान्य बात मानता है। जब वक्त पर उसकी परीक्षा वह करता है और अनुभव करता है कि उसका ज्ञान वाकई प्रभावपूर्ण है जो उसके उपयोग करने में चूक नहींे हुई तब उसकी प्रसन्नता का पारावर नहीं रहता। अगर किसी मनुष्य के पास ज्ञान रहता है तो वह विपत्ति आने पर उसकी रक्षा करता है और आदमी चोट खाकर विचलित नहीं होता।

खरी कसौटी तौलतां, निकसि गई सब खोट
सतगुरु सेना सब हनी, सब्द वान की चोट


जब खरी कसौटी पर परीक्षा की जाती है तो सब खोट निकल जाता है। झूठे शब्दों की सेना को सतगुरू का ज्ञान ध्वस्त कर देता है।

संक्षिप्त व्याख्या-झूठ कितना भी बोला जाये अगर उसकी परीक्षा सत्य की कसौटी पर की जाये तो वह पकड़ जाता है उसके लिये जरूरी है ज्ञान होना और ज्ञान के लिये आवश्यक है कोई गुरू होना। कई लोग कहते हैं कि हम बिना गुरू के ज्ञान प्राप्त कर लेंगे पर यह संभव नहीं है। गुरु से आशय यह नहीं है कि कोई संत या सन्यासी हो। जीवन में कई ऐसे लोग होते हैं जो हमें जीवन के बारे में बताते हैं उनको गुरु मानते हुए उनकी बात हृदय में धारण करना चाहिए।

Wednesday, July 9, 2008

संत कबीरवाणीःअपने निंदक को पास में घर बनाकर बसा लो

निन्दक एकहू मति मिलै, पापी मिलै हजार
इक निन्दक के सीस पर, लाख पाप का भार

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि पापी तो हजार मिलते हैं पर पर निंदा करने वाला महापापी नहीं मिलना चाहिये। एक निंदक के सिर पर लाखों पाप का भार रहता है।

निन्दक नेरे राखिये, आंगन कुटी छवाय
बिन पानी साबुन बिना, निरमल करै सुभाय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपनी निंदा करने वाले व्यक्ति को अपने पास मकान बनवाकर रख लो क्योंकि वह बिना पानी और साबुन के ही आपके मन को निर्मल करता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-एक तरह तो कबीरदास जी कहते हैं कि एक भी निंदक नहीं मिलना चाहिऐ दूसरी तरफ कहते हैं कि अपने निंदक को अपने पास ही रखना चाहिए। इसमें सतही तौर पर विरोधाभास लगता है पर गहन अर्थों में दोनों ही गूढ़ रहस्य भरे हुए हैं। हमें स्वयं किसी की निंदा नहीं करना चाहिए। निंदा का अर्थ यह है कि हम दूसरें में दोष देख रहे हैं और जब उनकी कहीं अन्यत्र चर्चा करते हैं तो वह दोष हमारे अंदर भी घर करने लगते हैं। हो सकता है कि हमारी निंदा सुनकर दूसरा व्यक्ति अपने दोष से किनारा कर ले और वह पतित्र हो जाये पर हमारे अंदर उसकी निंदा से जो दोष आया है उसका निराकरण नहीं हो सकता।
दूसरा कोई हमारी निंदा करे तो उससे विचलित नहीं होना चाहिए बल्कि आत्म चिंतन करना चाहिए कि क्या वह दोष वाकई हमारे अंदर है तो फिर उसका निराकरण करना चाहिए। नहीं तो इस बहाने अपना आत्म मंथन तो हो ही जाता है जो कि जीवन के विकास के लिये एक अनिवार्य प्रक्रिया मानी जाती है।

Tuesday, July 8, 2008

संत कबीर वाणी:दूसरों के दोषों पर दृष्टिपात मत करो

दोष पराया देखि करि, चले हसन्त हसन्त
अपना याद न आवई, जाका आदि न अंत

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि परनिंदा करने वाले दूसरों की कमियों को देखकर जोर से हंसते हैं परंतु अपने दोषों को वे कभी अपने अंदर के दोष या कमियां नहीं देख पाते जिनका कोई आदि या अंत नहीं होता।

जो तूं सेवक गुरुन का, निंदा की तज वान
निंदक नेरे आय जब, कर आदर सनमान


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि किसी को भी संतों और अपने गुरुओं को सच्चा सेवक तभी माना जा सकता है जब वह परनिंदा करना छोड़ दे और जब अपना निंदक सामने आये तो उसका मान सम्मान करे।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-मनुष्य का स्वभाव है कि वह दूसरों के दोष या कमी देखकर हंसता है और इस तरह अपने को यह तसल्ली देता है कि वह उसमें नहीं है। कोई गरीब ह,ै कोई अपनी कार्य में असफल हुआ है तो उस पर उसके अपने लोग ही हंसते हैं। दूसरों की बीमारी, गरीबी या किसी अंग दोष पर हंसने वालों की कमी नहीं हैं क्योंकि मनुष्य अपने अंदर दोष देखने लगे तो उसका उसे आदि और अंत ही नहीं मिलेगा। तब उसे पता लगेगा कि उसके अंदर तो ढेर सारे दोष है क्योंकि दूसरे के तो एक या दो दोष ही प्रकट होते हैं पर अगर अपने अंदर झांके तो अपने सारे दोष दिखाई देंगे इस सच से भागता आदमी दूसरों की निंदा कर अपने को श्रेष्ठ साबित करना चाहता है।

लोग दो तरह के होते हैं । एक तो वह जो दूसरे की लकीर को छोटा करने के लिये अपनी बड़ी लकीर खींचते हैं और दूसरे वह जो थूक से दूसरे की लकीर को छोटा करते हैं। दूसरे के दोष देखकर अपने को अच्छा साबित करने का प्रयास करते है। दूसरों के दुःख का प्रचार कर अपने आपको प्रसन्न अनुभव करते हैंैं। अनेक गुरुओं के अनेक संत भी इस परनिंदा और परदोष पर दृष्टिपात करने में लिप्त रहते हैं। यह मूर्खतापूर्ण कार्य हर आदमी जाने अनजाने में करता ही है। जो समझदार हैं अगर उनको इस ज्ञान का आभास कराया जाये तो वह इस बुराई से बच सकते हैं। उनको बताया जाये कि दूसरों की निंदा या दोष पर दृष्टिपात करने से पूर्व अपने अंतर्मन में स्थित दोषों और कमियों पर दृष्टिपात करो। अगर सच्चे भक्त हो तो इस प्रवृत्ति से बचने का प्रयास करो ।

Sunday, June 29, 2008

भय के अँधेरे दूर करने के लिए सत्य के दीप जलाए जाते-हिन्दी शायरी

चलते हैं जो सत्य के पथ पर
अपने घर में भी वह पराये हो जाते
शहर भी जंगल जैसा अहसास कराये जाते
आदर्शों की बात जमाने से वही करते जो
कहने के बाद उसे भुलाये जाते

सभी संत सत्य पथ पर नहीं होते
सभी सत्य मार्ग के पथिक संत नहीं होते
जो चलते नैतिकता के साथ
उनको अनैतिकता के अर्थ पता नहीं होते
जो दुनियां को अपनी मशाल से मार्ग
वही पहले लोगों के घर के चिराग बुझाते
ऊंची ऊंची बातें करते है जो लोग
वही अपना चरित्र गिराये जाते

देव दानव का युद्ध इतिहास नहीं बना
क्योंकि अभी यह जारी है
किस्से बहुत सुनते हैं कि देवता जीते
पर लगता पलड़ा हमेशा दानवों का भारी है
फिर भी नहीं छोड़ते आसरा ईमान का
कितने भी महल खड़े कर ले
ढहता है वह बेईमान का
कोई नहीं गाता किसी के गुण तो क्या
भ्रष्टों के नाम बजते हैं
पर वह अमर नहीं हो जाते
अपने पीछे पीढियों के लिये बुराईयों के झुंड छोड़ जाते
बैचेन जिंदगी गुजारते हैं
उनके पाप ही पीछे से काटते
पर जिन्होने ली है सत्य की राह
वह चैन की बंसी बजाये जाते
भय के अंधेरे को दूर करने के लिये
सत्य के दीप जलाये जाते
.......................
दीपक भारतदीप

Saturday, June 28, 2008

ज़माने भर के विषय बाहर रख दिए-कविता


न कभी मांगी खुशी
न कभी उसने गम दिये
जब भी गये सर्वशक्तिमान के दरबार
जमाने भर के विषय
बाहर द्वार पर रख दिये

जिंदगी में उठते और गिरते रहे
पर उसको पुकारा नहीं
वह रहा चारों तरफ हर कहीं
आखें दी देखने के लिये
कान दिये सुनने के लिये
बुद्धि दी विचार के लिये
इससे ज्यादा उससे क्या मांगते
हाथ दिये हिलाने के लिये
पांव दिये चलने के लिये
पेट दिया पलने के लिये
इससे अधिक उससे क्या मांगते
तय किया फिर कभी न खड़े होंगे
उसकी दरबार पर मांगने के लिये

घूमती घरती और आकाश के
बीच जीवन जीते हुए
कभी गिरे तो कभी उठे
कभी दर्द मिला तो दवा भी मिली
उसके दरबार में जाकर उसका याद में
क्यों अपना समय बरबाद करते
ध्यान लगाकर उसके होने के अहसास में
ही इसलिये अपनी शक्ति व्यय करते
अपने ही हाथों से किसी पर दया करना
अपनी रोटी से ही किसी का पेट भरना
अपनी जुबान से सुंदर शब्दों का संवरना
कभी हमें अचरज में नहीं डालता
किसी के अपमान का दर्द नहीं सालता
किसी के भ्रम को अपना समझ कर नहीं पालता
इतनी शक्ति दी है उसने
सर्वशक्तिमान के आगे सिर झुकाता हूं इसलिये
...........................................
दीपक भारतदीप

Thursday, June 26, 2008

संत कबीर वाणी: शरीर छूट जाए पर लज्जा न छोडें

पपीहा पन को ना तजै, तजै तो तन बेकाज
तन छाड़ै तो कुछ नहीं, पर छाड़ै हैं ना लाज
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि पपीहा कभी भी अपने स्वाभाविकता का त्याग नहीं करता और यदि त्याग दे तो उसका जीवन ही व्यर्थ है। यह देह भले ही नष्ट हो जाये पर अपनी लाज का त्याग नहीं करना चाहिए।

चातक सुतहि पढ़ावई, आन नीर मति लेय
मम कुल याही रीत है, स्वाति बुंद चित देय


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि चातक अपने बालक को शिक्षा देता है कि अन्य किसी स्थान से जल ग्रहण मत करो। केवल स्वाति जल को ही ग्रहण करो। इस तरह वह चातक अपने कुल की रीति के अनुसार चलता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-जीवन में सुख और दुख तो लगे रहते हैं पर आदमी को कभी विचलित नहीं होना चाहिए। कई बार जीवन में ऐसा अवसर आता है कि आदमी को अपने स्वाभाविक गुणों से परे होने के लिये प्रेरित किया जाता है और न होने पर उसे पीड़ा पहुंचायी जाती है पर इससे उसको विचलित नहीं होना चाहिए। समय के अनुसार माया आती जाती है पर जो मानसिक रूप से परिपक्व होते हैं वह धनाभाव में भी अपने चरित्र और विश्वास पर दृढ़ रहते हैं और किसी प्रकार का निकृष्ट कर्म या व्यवहार नहीं करते। ऐसे चरित्र के संस्कार मनुष्य को अपने माता पिता से मिलते हैं। चरित्रवान लोग अपने बच्चों को भी ऐसी ही शिक्षा देते हैं कि विपत्ति पड़ने पर अपने नैतिक आधारों से दूर न रहते हुए दृ+ढ़ता पूर्वक अपने धर्म का पालन करें।

Wednesday, June 25, 2008

संत कबीर वाणीः दूसरे के मांस से खिचड़ी बेहतर भोजन

खुश खाना खीचड़ी, मांहि पड़ा टुक लौन
मांस पराया खाय के, गला कटावै कौन

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि खिचड़ी शरीर को स्वस्थ करने वाली होती है जिसमेंं थोड़ा नमक पड़ना होना चाहिए। किसी दूसरे जीवन का मांस खाकर अपना गला कटवाना बेकार है।

कहता हूं कहि जात हूं, कहा जू मान हमार
जाका गला तुम काटि हो, सो फिर काटि तुम्हार

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि हम जो कह रहे हैं वह बात मान लो जिसका गला तुम काटते हो वह भी समय आने पर (अगले जन्म में भी) तुम्हारा गला काट सकता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-मांसाहार के पक्ष में तर्क देने वाले अक्सर यह तर्क देते हैं कि अगर पशुओं का मांस नहीं खाया जाये तो वह इतनी संख्या में हो जायेंेगे कि मनुष्य का जीना ही दुश्वार हो जायेगा। यह मूर्खतापूण तर्क है। अपने पापों की वजह से कुछ जीव पशुओं के रूप में जन्म लेते हैं और वह अपने भोजन की वजह से दूसरें के मांस पा निर्भर रहते हैं। वह इस धरती पर प्रकृति का संतुलन स्थापित करने के लिए पर्याप्त हैं। यह अलग बात है कि मनुष्य ने वनों का क्षेत्र संकुचित कर दिया है औरा शेर, चीता, बाघ और अन्य पशु अब गिनती के लिये ही रह गये हैं। कुछ विद्वान तर्क देते हैं कि जो जीभ बिना निकाले पानी पीते हैं वह शाकाहारी होते हैं। मनुष्य भी ऐसा ही जीभ है अतः उसे मांसाहार से बचाना चाहिए। मांसाहार के समर्थन मेंं एक कथित विद्वान ने बेकार तर्क दिया था कि हमारी आतें मांसाहार को पचा सकतीं हैं इसलिये हमें मांस खाकर प्रकृति को अपना जीवन उपहार के रूप में देने के लिये पशुओं का मांस खाना चाहिए ताकि उसका संतुलन बना रहे।
स्वास्थ्य विज्ञान ने इस बात की पुष्टि कर दी है कि आदमी की आंतों को मांस खाने से भारी तकलीफ होती है।

जब पेट खराब होता है तो खिचड़ी से शरीर को भारी लाभ होता है अतः यह समझना चाहिए कि हमारी देह में अनेक विकास खाने से उत्पन्न होते है और मांस के बारे में यह कहना कठिन है कि वह किसी स्वस्थ पशु का है या नहीं। ऐसे में बीमारियों का खतरा तो रहता ही है और यह पाप अनवरत चलता है। हो सकता है किसी पशु का मांस विकृत हो और पेट में जाकर वह ऐसा विकास उत्पन्न करे जो मनुष्य को अपनी जान देनी पड़े। यह विचार करना चाहिए। अंततः यह समझ लेना चाहिए कि मांस खाने के दुष्परिणाम होते ही हैं।

Tuesday, June 24, 2008

संत कबीर वाणी -शिक्षा से मन में अहंकार बढ़ जाता है।

पढ़ते गुनते जनम गया, आसा लोगी हेत
बोया बीजहि कुमति ने, गया जू निर्मल खेत

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि पढ़ते और समझते यूं ही सारा जीवन व्यर्थ चला जाता है पर मनुष्य सांसरिक विषयों में ही लिप्त रहते हुए अपना जीवन नष्ट कर देता है। कुमति ऐसा बीज बो देतेी है कि मनुष्य का जीवन रूपी खेत नष्ट हो जाता है।

पढ़त गुनत रोगी भया, बढ़ा बहुत अभिमान
भीतर ताप जू जगत का, घड़ी न पड़ती सान


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं पढ़ते समझते आदमी रोगी और अहंकारी हो जाता है। उसके मन में संसारिक विषयों की अग्नि उसे दग्ध किये देती है पर उसे पल भर भी शांति नहीं मिलती।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-शिक्षित होने वालों को स्वाभाविक रूप से अहंकार तो आ ही जाता है। बहुत कम लोग ऐसे हैं जो यह समझते हैं कि विद्यालयों और महाविद्यालयों में दी जा रही सांसरिक विषयों से जीवन में अध्यात्मिक लाभ नहीं हो सकता है। इस विषय पर अधिक क्या कहा जाये? भारतीय अध्यात्म विषयों से परे वर्तमान शिक्षा प्रणाली से लोगों के चिंतन और मनन की प्रवृत्ति नहीं पैदा हो पाती। शैक्षणिक विषयों से संबंधित पुस्तकों का रट्टा लगा लिया और परीक्षा उत्तीर्ण करते हुए छोटे और बड़े पदों पर पहुंच जाते हैं। इसके बाद जब जीवन अध्यात्मिक ज्ञानकी बात आये तो अपने प्राचीनतम ग्रंथों के चंद वह श्लोक या दोहे सुनाते हैं जिनमें किसी वर्ग के प्रति नकारात्मक विचार होता है। यह श्लोक और दोहे होते हैं जो भारतीय अध्यात्म के विरोधी अपने प्रचार के लिऐ उपयोग करते हैं।

आखिर इस देश में इतने शिक्षित लोग हैं फिर अशांति क्यों है? कहीं भी दृष्टिपात करिये शिक्षित लोग ही अपराधिक कृत्यों में लिप्त हैं। यह इस बात को दर्शाता है कि शिक्षा के कारण में उनमें ऐसा अहंकार आ जाता है जो उनको भले-बुरे की पहचान नहीं होती। उनका पढ़ना लिखना निरर्थक है। वह अपने परिवार और समाज के लिये कोई हित नहीं करते।

दूसरी बात यह भी है कि भारतीय अध्यात्म ग्रंथ पढ़ने और सुनने वाले भी कोई भक्त नहीं हो जाते। अनेक कथित विद्वान यह ग्रंथ पढ़कर देहाभिमान से ग्रसित होते हैं और चाहे जहां अपना ज्ञान सुनाकर अपनी श्रेष्ठता का प्रचार करते हुए धनार्जन करते हैं। वह अपने ग्रंथों का वही ज्ञान सुनाते हैं जिससे सुनने वाले उनको गुरू मानते हूए दान-दक्षिण दें। सुनने वाले भी यह सोचकर प्रसन्न हो जाते हैं कि हमने सुनकर कोई पुण्य का काम कर लिया। समाज और देश के हित के लिऐ काम करने वाले शिष्य कोई नहीं बनाना चाहता। मुख्य बात यह है कि ग्रंथों का अध्ययन या श्रवण किया जाना पर्याप्त नहीं है बल्कि उसमें वर्णित ज्ञान को मन मस्तिष्क में धारण कर उस मार्ग पर चलने का है।

Saturday, June 21, 2008

संत कबीर वाणीःमित्रता से उत्पन्न होती है भक्ति में बाधा

दुनिया सेती दोसती, होय भजन में भंग
एका एकी राम सों, कै साधुन के संग


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि लोगों से मैत्री करने से भजन में भंग होता है। इसलिये एकांत में ही राम का नाम लेते हुए ध्यान करना चाहिए या फिर सच्चे संतों की संगत में बैठना चाहिए।

मेरा संगी कोय नहिं, सबै स्वारथी लोय
मन परतीति न ऊपजै, जिस विस्वास न होय


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि इस संसार में मेरा कोई साथी नहीं है। यहां पर तो सभी लोग अपने स्वार्थ के जुड़े हुए हैं। इसलिये भले ही मन नहीं मानता हो या विश्वास न होता हो यह एक सच्चाई है जिसे हमेशा याद रखना चाहिए कि यहां हर व्यक्ति स्वार्थी है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-यह एक वास्तविकता है कि ध्यान, स्मरण और भक्ति का लाभ एकांत साधना से ही संभव है। कहीं किसी धार्मिक कार्यक्रम में जाईये जो लोग अपने साथ किसी को ले जाते हैं पर एक दूसरे से सांसरिक बातें करने लगते हैं और यह भूल जाते हैं कि वह बैठे कहां हैं। कई लोग तो केवल इसलिये सत्संग और प्रवचन कार्यक्रमों में जाते हैं कि कोई परिचित या मित्र साथ चल रहा है-उनका विचार होता है कि इससे दो काम सिद्ध हो जायेंगे एक तो बातें भी हो जायेंगी और सत्संग भी हो जायेगा। कई लोग बसों में भरकर तीर्थस्थानों में भक्ति भाव प्रदर्शन करने जाते हैं और अपने सहयात्रियों के साथ वही सांसरिक बातें करते हैं जो घर पर होती हैं। इस तरह लोग अपने आपको ही धोखा देते हैं। शोर में भक्ति नहीं होती-हालांकि कुछ देर के लिये अपने को लोग तसल्ली देते हैं पर उनके मन और तन के विकार नहीं निकल पाते और इसलिये वह भक्ति और साधना से मिलने वाले लाभों से वंचित हो जाते हैं।

ऐसा नहीं है कि हम अगर किसी मंदिर या ध्यान केंद्र में जायें तो वहां कोई अन्य व्यक्ति न हो तभी भक्ति करें। हां, हमारे साथ कोई न हो और हम वहां जाकर अपने आपको अकेले अनुभव करें तभी एकांत साधना करें। ऐसे धार्मिक स्थलों पर अनेक लोग आते हैं पर कोई परिचित न हो तो किसी से बात नहीं हो पाती और भीड़ में भी एकांत मिल सकता है क्योंकि उस समय किसी के साथ न होने की अनुभूति स्वतः एकांत प्रदान करती है। जहां साथ चलने के लिये किसी व्यक्ति को साथ लिया वहां भक्ति और साधना का भाव लुप्त हो जाता है और मन और तन के विकार निकालने के लिये एकाग्रता होना आवश्यक है।

Thursday, June 19, 2008

संत कबीरवाणी:तोते की तरह पढ़कर पिंजरे में बंद होने से क्या फायदा

पढि पढि और समुझावइ, खोजि न आप सरीर
आपहि संशय में पड़े, यूं कहि दास कबीर


संत शिरोमणि कबीरदास कहते हैं कि लोग लोग किताबें पढ़कर दूसरों को समझाते हैं पर अपने जीवन में सत्य को नहीं खोज पाते। ऐसे पढ़ने वाले स्वयं ही संशय में पड़े होते हैं वह भला और लोगों को क्या मार्ग दिखायेंगे।

चतुराई पोपट पढ़ी, पडि सो पिंजर मांहि
फिर परमोधे और को, आपन समुझै नांहि


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि ऐसे चतुराई का लिखना पढ़ना तो व्यर्थ ही है जो पिंजरे में बंद तोता बनना पड़े। वह तोता अन्य लोगों को उपदेश तो देता है पर अपने पिंजरे से आजाद होने का मार्ग नहीं जानता।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-जब कबीरदास जी ने यह दोहा कहा होगा तब कोई लार्ड मैकाले नहीं था जो गुलाम बनाने की शिक्षा पद्धति का निर्माण करता पर फिर भी उस समय ऐसे कथित विद्वान रहे होंगे जो चंद किताबें पढ़कर उसी तरह ज्ञान बेचने का व्यवसाय करते होंगे जैसा कि वर्तमान में कर रहे हैं। आज की तो समूची शिक्षा पद्धति ही आदमी को गुलाम बनाने वाली है। जिन्होंने शिक्षा पद्धति से शिक्षा ग्रहण की है वह सब नौकरी कर रहे हैं या उसकी तलाश में है। भजन और भक्ति में मन तो तभी लग सकता है जब आदमी अपने मस्तिष्क मेें स्वतंत्र सोच रखता हो। वैसे वर्तमान शिक्षा पद्धति से जिन लोगों ने शिक्षा नहीं ग्रहण की उनको अनपढ़ या निरक्षर कहा जाता है पर वह फिर भी अपने स्वतंत्र व्यवसाय कर भजन भक्ति कर लेते हैं। इसके विपरीत जिन लोगों ने तमाम तरह की उपाधियां प्राप्त की हैं वह तो गुलामों जैसी मानसिकता के हैं अपने से अधिक पद, प्रतिष्ठा और पैसे वाले की ऐसे ही गुलामी करते हैं जैसे उनके बिना उनके जीवन का गुजारा नहीं होता हो। यह अलग बात है कि अब ऐसे ही लोग समाज में उपदेश देने का काम करते हैं। धार्मिक ग्रंथों की अपने ढंग से व्याख्या करते हैं और जो नहीं करते वह भी बिना किसी तर्क के उपदेशों पर यकीन कर उनको अपना गुरू मान लेते हैं। कुल मिलाकर स्वतंत्र सोच और चिंतन का लोगों मे अभाव है जबकि अधिक शिक्षित व्यक्ति को अपने ढंग से स्वतंत्र चिंतन, मनन और अनुसंधान कर परिपक्व अभिव्यक्ति का परिचय देना चाहिए न कि तोते की तरह रटकर ज्ञान बांटते हुए स्वयं के मन को मोह माया के पिंजरे में बंद करना चाहिए।
यह इस ब्लाग की सौवां पाठ है-दीपक भारतदीप

Friday, June 13, 2008

संत कबीर वाणीःजहां हरियाली थी वहां ठूंठ खड़े रह गये

खलक मिला खाली हुआ, बहुत किया बकवाद
बांझ हिलावै पालना, तामें कौन सवाद

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि संसार के विषयों मेंं लिप्त व्यक्तियों से मुलाकात में उनसे निर्रर्थक विषयों पर वार्तालाप कर समय नष्ट करना ही है। यह तो ऐसे ही हुआ जैसे कोई बांझ स्त्री खाली पालना हिलाती रहे क्योंकि उसमें कोई सार्थकता नहीं है।

भय से भक्ति करै सबै, भय से पूजा होय
भय पारस है जीव को, निरभय होय न कोय

संत कबीरदास जी कहते हैं कि मनुष्य भय के कारण ही भगवान की भक्ति और पूजा में लिप्त होते हैं। इस प्रकार भय तो जीवों के लिये पारसमणि होती है जो उनको सत्संग और भक्ति में लगाकर कल्याण करती है। निर्भयता से आदमी निरंकुश होकर कुमार्ग पर भटक जाता है।

राम भजो तो अब भजो, बहोरि भजोगे कब्ब
हरिया हरिया रुखड़, ईंधन हो गये सब्ब


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि भगवान की भक्ति करना है तो शुरु कर दो। फिर समय निकल जायेगा तो कब करोगे। काल की गति विचित्र है। जहां कभी हरे-भरे पेड़ थे वहां ठूंठ खड़े गये और सारा ईंधन समाप्त हो गया।

संक्षिप्त व्याख्या-अक्सर लोग कहते हैं कि भगवान भक्ति तो वृद्धावस्था में करना चाहिए जबकि यह वास्तविकता है कि जब बचपन से ही भगवान भी भक्ति या सत्संग का भाव पैदा नहीं हुआ तो फिर कभी पैदा नहीं होता। भक्ति और सत्संग के प्रति भाव पैदा करने में ही अपने अंदर की बहुत ऊर्जा का होना जरूरी है। विषयों से मन हटाकर भक्ति में मन तभी लग सकता है जब अपने अंदर धैर्य हो वह तभी संभव है जब अपने अंदर शक्ति हो। कहते हैंं न शक्तिशाली व्यक्ति बोलते कम है। जब वृद्धावस्था में सारी इंद्रियां शिथिल हो जाती हैं तब आदमी में धैर्य भी समाप्त हो जाता है और वह जरा जरा सी बात निराश और क्रोधित हो उठता है। ऐसे में उसमें भक्ति भाव बन सके यह संभव नहीं है। इसलिये जब अपने शरीर में शक्ति हो तभी अपने अंदर सत्संग और भक्ति भाव की स्थापना करना चाहिए ताकि वृद्धावस्था में उसके लिये कोई प्रयास नहीं करना पड़े।

Thursday, June 12, 2008

संत कबीर वाणीःकामना का त्याग किये बिना अहंकार से परे होना कठिन

मान तजा तो क्या भया, मन का मता न जाय
संत वचन मानै नहीं, ताको हरि न सुहाय


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपना अहंकार त्यागने से भी क्या लाभ जब मन पर नियंत्रण न हो सके। जो संतों के वचन नहीं सुनता उसे भगवान भक्ति कभी अच्छी नहीं लग सकती।

कंचन तजना सहज है, सहज तिरिया का नेह
मान बढ़ाई ईरषा, दुरलभ तजनी येह


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि सोने का त्याग करना सहज हो सकता है। स्त्री के प्रति जो मन में आकर्षण है उसका त्याग किया जा सकता है। परंतु दूसरों से सम्मान पाने का मोह त्याग करना कठिन है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-अक्सर अनेक गुरु कहते हैं कि अहंकार छोड़ दो। एक नारे की तरह अनेक व्यवसायिक संत दोहराते हैं कि अहंकार छोड़ दो। वास्तव में कई लोग अहंकार छोड़ने का प्रयास भी करते हैं पर मन में जब तक कामनाओं का भाव है तब तक यह प्रयास निरर्थक है। मन में अगर किसी वस्तु की प्राप्ति का भाव पैदा होने पर मनुष्य उसके पीछे भागता तब फिर वही अहंकार का भाव उसमें पैदा होता है। अहंकार छोड़ने का मतलब यह कतई नहीं है कि कामनाओं का दास बना जाये। संसार के पदार्थों के प्रति मोह कभी अहंकार का भाव खत्म नहीं होने देगा। कुछ देर एसा लगता है कि अहंकार का भाव छोड़कर मान-अपमान से परे हुआ जाये पर मन में कामना का भाव इसमें बाधा उत्पन्न कर देता है।

सोना चांदी और अन्य संपत्तियों का त्याग किया जा सकता है, स्त्री के प्रति जो स्वाभाविक भाव है उससे दूर हुआ जा सकता है पर सम्मान पाने का मोह छोड़ पाना तो सिद्ध संतों और योगियों के लिये ही संभव है। हमारे समाज का एक सत्य तो यह है कि लोग साधू और संतों का चोगा केवल भोजन और सम्मान पाने के लिये धारण करत हैं। वही कहते रहते हैं कि अहंकार छोड़ दो पर सबसे अधिक अहंकार उनको ही होता है। अपने प्रवचनों में मैं-मैं रट लगाने वाले यह संत भी माया के वश में इस तरह जकड़े रहते हैं कि उनकी मुक्ति संभव नहीं लगती है। अनेक लोगों ने बड़े-बड़े आश्रम बना लिये हैं। करोड़ों रुपये व्याज पर चला रहे हैं और लोगों से कहते हैं कि माया का त्याग करो। इसके लिये जिस तप की आवश्यकता है वह विरले ही कर पाते हैं और फिर वह आकर अपनी सफलता का ढिंढोरा नहीं पीटते न ही शिष्यों को दीक्षा देने के लिये दौरे करते हैं। भक्त गण उनके पास जाकर उनके दर्शन कर अपने को धन्य समझते हैं।

Wednesday, June 11, 2008

संत कबीर वाणीःसांसरिक कार्यों में केवल समय नष्ट करना मूर्खता

या मन गहि जो थिर रहे, गहरी धूनि गाडि़
चलती बिरियां उठि चला, हस्ती घोड़ा छाडि़
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो अपने मन को स्थिर कर ज्ञान की की गहरी धूनि गाड़ता है वह वही श्रेष्ठ मनुष्य है। मरने के बाद तो सब हाथी, घोड़े और संपदा यही छोड़कर सभी खाली हाथ चले जाते हैं।

दीप गंवायो संग, दूनी न चाली हाथ
पांव कुल्हाड़ी मारिया, मूरख अपने हाथ


संत शिरोमणि कबीरदास के जिन लोगों के साथ रहते हुए आदमी अपना धर्म कर्म छोड़कर सांसरिक कामों में व्यस्त रहता है वे भी अंतकाल में काम नहीं आते। भक्ति और सत्संग छोड़कर केवल सांसरिक कामों में अपना समय बर्बाद करना अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारना जैसी मूर्खता है।
संक्षिप्त व्याख्या-यह एक वास्तविकता है कि बिना भक्ति और सत्संग के मनुष्य के मन को शांति नहीं मिलती। सुबह शाम आदमी अपना समय केवल संसार के पदार्थों क संचय में व्यस्त रहता है। वैसे देखा जाये तो प्रातःकाल का समय अपने तन, मन और विचारों में विकार बाहर निकालने का है पर आदमी सुबह से ही सांसरिक कार्यों में लिप्त होकर या उनकी चर्चा कर उसमें लिप्त हो जाता है। उसे लगता है कि जीवन का आनंद सुबह से उठाना चाहिए। सच तो यह है कि यह आनंद कोई लाभदायक नहीं होता। अगर ऐसा होता तो भला आजकल क्यों लोग मानसिक अवसाद की शिकायत करते हैं। जितना ही सांसरिक कार्यों में व्यस्त होंगे उतना ही मस्तिष्क में तनाव बढ़ेगा। हाड़ मांस के बने इस मस्तिष्क को रात को सोते समय भी चैन नहीं देते और सांसरिक बातों की चर्चा करते या सोचते हुए सोने का प्रयास करते हैं और निद्रा भी ठीक ने नहीं आती। इस तरह अपना पूरा जीवन केवल निरर्थक होता जाता है। इसलिये अपना समय भक्ति और सत्संग में भी अवश्य लगाना चाहिये।

Tuesday, June 10, 2008

मनुस्मृतिःधर्म देह त्यागने के बाद भी साथ चलता है

धर्म एवं हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नोधर्मेहत्तोऽवधीत्


हिंदी में भावार्थ-जो मनुष्य धर्म की हत्या करता है धर्म उसका संपूर्ण नाश कर देता है। जो धर्म की रक्षा करता है धर्म उसकी रक्षा करता है। इसलिये अपने धर्म की रक्षा करना चाहिए तभी हमारी रक्षा हो पाती है।

एक एव सहृद्धर्मो निधनेऽष्यनुयाति यः
शरीरेण समं नाशं सर्वमन्यद्धि गच्छति

हिंदी में भावार्थ-एक मात्र धर्म ही ऐसा मित्र है जो मरने के बाद भी साथ चलता है, वरना इस देह के त्याग करने के बाद यहां कुछ भी नहीं रह जाता।

संक्षिप्त व्याख्या-मनुष्य का धर्म है इस प्रकृति की अपने सामथर्यानुसार सेवा करना, समस्त जीवों पर दया करना तथा अपना सांसरिक कर्म करते हुए भगवान भक्ति एवं सत्संग करना। हमारे अध्यात्म में निरंकार की निष्काम भक्ति की प्रधानता है पर सकाम भक्ति भी स्वीकार्य है पर वह हृदय से की जाना चाहिए। ऐसा लोग करते नहीं है। अधिकतर लोग दिखावे की भक्ति करते हैं और सकाम भक्तों द्वारा थोपे कर्मकांडों की आलोचना कर अपने धर्म पर ही आक्षेप करते हैं। देख जाये तो लोग अपने धर्म से परे हो गये हैं और इसलिये पूरे विश्व में अशांति और प्राकृतिक प्रकोप का बोलबाला है। हमारे धर्म के अनुसार विश्व के सभी जीवन समान है पर अब मानव की प्रधानता वाली विचारों की स्थापना कर यह साबित किया जा रहा है कि यह प्रथ्वी उनके लिये हैं। वन सपंदा और पशु संपदा का दोहन निर्ममता से किया गया है। धर्म से परे होगये तो अब वह रक्षा करने में भी समर्थ नहीं है।

ऐसे में अपने धर्म के मूल तत्वों को अपने हृदय में धारण कर उसके अनुसार ही जीवन व्यतीत करना ही श्रेयस्कर है।

Monday, June 9, 2008

संत कबीर वाणी:नाव में जल और घर में धन बढ़ने लगे तो दोनों हाथ से निकालो


बाले जैसी किरकिरी, ऊजल जैसी धूप
ऐसी मीठी कछु नहीं, जैसी मीठी चूप


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि रेत के समान किसी अन्य वस्तु में किरकिराहट (चिकनाहट)नही है। धूप के समान कोई अन्य वस्तु उजली नहीं है। ऐसे ही चुप या मौन रहने से अधिक कोई अन्य वस्तु मीठी नहीं है।

जो जल बाढ़े नाव में, घर में बाढ़ै दाम
दोनों हाथ उलीचिये, यही सयानों का काम

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते है। कि जब नाव में जल और घर में धर बढ़ने लगे तो उसे दोनों हाथ से बाहर निकालना ही सयानों का काम है।

रितु बसंत याचक भया, हरखि दिया द्रुम पात
ताते नव पल्लव भया, दिया दूर नहिं जात


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि बसंतु ऋतु जब याचना करता है तब वृक्ष अपने पत्ते खुशी से देता है और फिर उसमें शीघ्र ही नये और ताजे हरे पत्ते आ जाते हैं। अतः यह सत्य बात है कि कभी किसी को कुछ निष्फल नहीं जाता।

संक्षिप्त व्याख्या-मनुष्य में संचय की प्रवृत्ति अधिक होती है और वही उसके दुःख का कारण भी है। इस संसार में वही व्यक्ति सुखी है जो किसी को कुछ देता है। देने मं एक सुख है उसे वही अनुभव कर पाता है जो दान करता है। यह कई लोगों का मतिभ्रम होता है कि किसी को कुछ देने से धन कम हो जाता है। पाने का मोह आदमी को अंसयमित बनाता है। धन आ भी जाता है तो मन की शांति नहीं आती। क्योंकि जिस धन को हम कमा रहे हैं उसकी कोई उपयोगिता अधिक नहीं रह जाती। उससे हम उतनी ही खुशी पा सकते हैं जितने से हमारी आवश्यकताएं पूरी होती हैं। बाकी बचा हुआ धन सड़ता है और उसकी अनुयोगिता हमारा मन त्रस्त करती है। अगर उसमें से सुपात्र को धन दिया जाये तो मन में एक अजीब प्रकार की सुखद अनुभूति होती है। सयाने लोग इसलिये ही दान की महिमा का बखान करते है।

Sunday, June 8, 2008

संत कबीर वाणीःबैल बनाते हुए पुरुष बना डाला

बैल गढन्त पर गढ़ा, चूका सींग न पूंछ
एकहि गुरु के नाम बिनु, धिक दाढ़ी धिक मूंछ


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि परमात्मा ने बैल को रचते हुए ही पुरुष की रचना कर डाली बस उसने सींग व पूंछ न लगाने की गलती की। सद्गुरु के ज्ञान के बिना उसकी दाढ़ी मूंछ को धिक्कार है।

संक्षिप्त व्याख्या-यहां कबीरदास जी पुरुष के अहंकार को चुनौती देते हुए कहते हैं कि वह सोचता है कि उसका परिवार उसकी शक्ति पर ही चल रहा है और वह इसलिये हमेशा केवल अपने व्यवसाय और नौकरी में जुटा रहकर भक्ति भाव से परे रहने की गलती करते हुए अपना पूरा जीवन व्यर्थ ही नष्ट कर देता है।

हे मतिहीनी माछीरी, राखि न सकी शरीर
सो सरवर सेवा नहीं, जाल काल नहिं कीर


संत शिरोमणि कबीरदासजी कहते हैं कि बुद्धिहीन मछली अपनी देह की रक्षा नहीं कर सकी क्योंकि उसने गहरे सरोवर का सेवन नहीं किया और जहां जाल रूपी काल उसके पास नहीं पहुंच सकता था। वह तो ऊपर ही तैरती रही और शिकारी के जाल में फंस गयी।

संक्षिप्त व्याख्या-सद्गुरु के ज्ञान के अभाव में मनुष्य सदैव ही मोह माया में चक्कर में फंसा रहता है और परमात्मा का स्मरण नहीं करता और जब अंतकाल आता है तो पछताता है। आदमी अपने जीवन को अक्षुण्ण मानकर भौतिक वस्तुओं का संग्रह करता है पर भक्ति करने के नाम पर नाकभौ सिकोड़ता है। अपना पूरा जीवन ऐसे ही व्यर्थ नष्ट कर देता है। ज्ञान के अभाव में वह जीवन के रहस्यों से अनभिज्ञ रहते हुए ही अपना शरीर त्याग देता है।

Saturday, June 7, 2008

भृतहरि शतकःकामदेव का शिकार हुए बिना युवावस्था निकल जाये तो धन्य समझें

श्रृङगारद्रुमनीरदे प्रचुरतः क्रीडारसस्त्रोतसि
प्रद्युम्नप्रियन्धवे चतुरवाङ्मुक्ताफलोदन्वति।
तन्वीनेत्रयचकोरवनविधौ सौभाग्यलक्ष्मीनिधौ
धन्यः कोऽपि न विक्रियां कलयति प्राप्ते नवे यौवने


हिंदी में भावार्थ’- जैसे श्रृंगार रस के पौधे को मेघ सींचकर उसको वृक्ष का रूप प्रदान करते हैं वैसे ही युवावस्था में अपने कदम रख रहे युवकों के हृदय में कामदेव उत्तेजना और काम भावना उत्पन्न करते हैं। उनका इष्ट तो कामदेव ही होता हे। वह अपनी वाणी से ऐसी भाषा का उपयोग करते हैं जिससे कि नवयुवतियां का हृदय जीतकर उसमें अपना स्थान बनायें। नवयुवतियां भी पूनम के चंद्रमा की तरह दृष्टिगोचर होती हैं और वह उन युवकों को एकटक देखकर आनंद विभोर होती हैं। इस युवावस्था में जो नहीं बहके उस तो धन्य ही समझना चाहिए।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-प्राचीन काल में जब समाज इतना खुला नहीं था तब संभवतः भृतहरि के इस श्लोक को इतना महत्व नहीं मिला होगा जितना अब खुलेपन की राह पर चलते हुए समाज को देखते हुए लग रहा है। भारत के उष्ण जलवायु के चलते वैसे भी लोगों में काम भावना अधिक होती है। हम लोग अक्सर ऐसे समाचार सुंनते हैं जिसमें अनैतिक अथवा विवाहेत्तर संबंधों का दुष्परिणाम सामने आता है। कहा जाता है कि बुराई का अंत भी बुरा ही होता है। कामदेव के क्षणिक प्रभाव में आकर कई लोग अनेक गल्तियां कर जाते हैं और फिर उसका दुष्परिणाम उनको जीवन भर भोगना पड़ता है। आजकल जिनके पास पैसा, पद और प्रतिष्ठा है वह अनैतिक या विवाहेत्तर संबंध बनाने में कोई संकोच नहीं करते। एक नहीं ऐसे हजारांे उदाहरण है जब ऐसे गलत संबंधों के कारण लोग अपराध में लिप्त हो जाते हैं। जो युवक-युवतियां अपने परिवार से मिली छूट का लाभ उठाकर खुलेपन से यौन संबंध तो बना लेते हैं पर बाद में जब जीवन संजीदगी से गुजारने का विचार आता है तो स्वयं को उसके लिये तैयार नहीं कर पाते। कहीं युवतियां तो कहीं युवक इस कामदेव के शिकार होकर अपनी देहलीला तक समाप्त कर लेते हैं। कुछ युवतियां को युवकों की हिंसा का शिकार भी होना पड़ता है। हालांकि आजकल प्रचार माध्यमों में इसे कथित रूप से प्यार कहा जाता है पर यह एक भ्रम है। आजकल के नवयुवक नवयुवतियों को आकर्षित करने के लिए उनको शायरी और गीत सुनाने प्रभावित करने का प्रयास करते हैं जो उन्होंने कहीं से उठा ली होती हैं। वह इस तरह का प्रयास करते हैं कि उनको एक कवि या शायर समझकर नवयुवतियां प्रभावित हो जायें।

यह तो कामदेव की माया है। हमारे देश में प्यार या प्रेम के अर्थ बहुत व्यापक होते हैं पर पश्चिम की संस्कृति को अपनाने के कारण यह केवल युवक-युवतियों के संबंधों तक ही सीमित रह गया हैं। ऐसे में जो नवयुवक और नवयुवतियां इस अवस्था से सुरक्षित निकल जाते हैं वह स्वयं अपने को धन्य ही समझें कि उन्होंने कोई ऐसी गलती नहीं की जिससे उनको जीवन भर पछताना पड़े।

Friday, June 6, 2008

भृतहरि शतकःअकारण बैर लेना दुष्टता का प्रतीक

मृगमीनसज्जनानां तृणजलसन्तोष विहितवृत्तीनाम्।
लुब्धकधीवरपिशुना निश्कारणवैरिणोजगति


हिंदी में भावार्थ मृग वन में घास खाकर और मछली जल में उसका सेवन का अपना जीवन शांति के साथ बिताते हैं पर शिकारी और बहेलिये फिर भी उनसे बैर कर उनका जीवन नष्ट करते हैं। ऐसे ही दुष्ट लोगों का स्वभाव होता है कि वह अकारण ही दूसरों से बैर लेकर उनको कष्ट पहुंचाते हैं।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-आजकल हम पूरे विश्व में आतंकवाद का प्रकोप देख रहे हैं उसका कारण यह है कि उन लोगों की मानसिकता है कि वह अकारण ही दूसरों पर हमला करते हैं। ऐसे दुष्ट लोग स्वयं भी जल्दी नष्ट होते हैं पर जब तक देह धारण करते हैं तब तक दूसरों को कष्ट देते हैं। वैसे हर जगह ऐसे लोगों की बहुतायत है जो दूसरों से बैर लेते हैं पर कई ऐसे लोग भी हैं जो अकारण ही मन में दूसरों के प्रति द्वेष रखते हैं। कई बार कई सामान्य मनुष्यों के मन में भी दूसरे की हानि होते देखने की इच्छा पैदा होती है। ऐसे में सभी लोगों को यह देखना चाहिए कि उनके मन में भी किसी के प्रति द्वेषभाव पैदा न हो। यह ठीक है कि मन में आने से कोई किसी को हानि नहीं पहुंचाता पर आखिर किसी की हानि का भाव मन में भी लाना तो दुष्टता का ही प्रतीक है।

Thursday, June 5, 2008

भृतहरि शतक:नौकर का धर्म निभाना होता है कठिन


मौनान्मूकः प्रवचनपटूर्वातुलो जल्पको वा
धृष्टः पाश्र्वे वसति च सदा दूरतश्र्चाऽप्रगल्भ
क्षान्त्या भीरुर्यदि न सहते प्रायशो नाभिजातः
सेवाधर्मः परमगहना योगिनामप्यगम्यः


हिंदी में भावार्थ-इस संसार में सेवा का धर्म अत्यंत कठिन है। यदि सेवाक मौन रहे तो उसे गूंगा और बात करे तो बकवादी कहेंगे। अगर हमेशा ही अपने पास बैठा रहे तो ढीठ और दूर रहे तो मूर्ख माना जायेगा। क्षमाशील होता भीरु और अगर कोई बात सहन न करे तो निम्न कोटि का कहा जायेगा। इस बात को तो योगीजन भी समझ नहीं पाते।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-यहां सेवा से आशय परमार्थ के लिए की जाने वाली सेवा नहीं है वरन् जो अपने पेट पालने के लिए दूसरों की नौकरी करने से है। आज हमारे देश के सभी शिक्षित लोग नोकरी के पीछे भाग रहे हैं और जो नौकरी कर रहे हैं वह सब ऐसी हालत का सामना करते हैं जिसमें उन्हें अपनी स्थिति समझ मेे नहीं आती। कुल मिलाकर अगर हम कहीं नौकरी कर रहे हैं तो अपने आत्म सम्मान की बात आजकल तो भूल ही जाना चाहिए। नौकरी चाहे निजी हो या सरकारी उसमें आदमी के लिऐ तनाव तो रहता ही है। यहां बोस के ऊपर बोस है पर हैं सभी नौकरी करने वाले। नौकरी करते हुए किसी को प्रसन्न नहीं किया जा सकता हैं। इसलिये निश्चिंत होकर नौकरी करें तो ही ठीक है। उसमें अगर आत्म सम्मान बचाने का विचार किया तो वह संभव नहीं है।

Wednesday, June 4, 2008

रहीम के दोहे:छोटे लोग इतराते हैं बहुत

बड़े पेट के भरन को, है रहीम देख बाढि
यातें हाथी हहरि कै, दया दांत द्वे काढि

कविवर रहीम कहते हैं कि जो आदमी बड़ा है वह अपना दुख अधिक दिन तक नहीं छिपा सकता क्योंकि उसकी संपन्नता लोगों ने देखी होती है जब उसके रहन सहन में गिरावट आ जाती है तब लोगों को उसके दुख का पता लग जाता है। हाथी के दो दांत इसलिये बाहर निकल आये क्योंकि वह अपनी भूख सहन नहीं कर पाया।

बड़े बड़ाई नहिं तजैं, लघु रहीम इतराइ
राइ करौंदा होत है, कटहर होत न राइ

कविवर रहीम कहते हैं कि बड़े आदमी कभी अपने मुख से स्वयं अपनी बड़ाई नहीं करते जबकि छोटे लोग अहंकार दिखाते है। करौंदा पहले राई की तरह छोटा दिखाई देता है परंतु कटहल कभी भी राई के समान छोटा नजर नहीं आता।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-कहा जाता है कि धनाढ्य व्यक्ति इतना अहंकार नहीं दिखाता जितना नव धनाढ्य दिखाते हैं। होता यह है कि जो पहले से ही धनाढ्य हैं उनको स्वाभाविक रूप से समाज में सम्मान प्राप्त होता है जबकि नव धनाढ्य उससे वंचित होते हैं इसलिये वह अपना बखान कर अपनी प्रभुता का बखान करते हैं और अपनी संपत्ति को उपयोग इस तरह करते हैं जैसे कि किसी अन्य के पास न हो।

वैसे बड़ा आदमी तो उसी को ही माना जाता है कि जिसका आचरण समाज के हित श्रेयस्कर हो। इसके अलावा वह दूसरों की सहायता करता हो। लोग हृदय से उसी का सम्मान करते हैं जो उनके काम आता है पर धन, पद और बाहुबल से संपन्न लोगों को दिखावटी सम्मान भी मिल जाता है और वह उसे पाकर अहंकार में आ जाते हैं। आज तो सभी जगह यह हालत है कि धन और समाज के शिखर पर जो लोग बैठे हैं वह बौने चरित्र के हैं। वह इस योग्य नहीं है कि उस मायावी शिखर पर बैठें पर जब उस पर विराजमान होते हैं तो अपनी शक्ति का अहंकार उन्हें हो ही जाता है। जिन लोगों का चरित्र और व्यवसाय ईमानदारी का है वह कहीं भी पहुंच जायें उनको अहंकार नहीं आता क्योंकि उनको अपने गुणों के कारण वैसे भी सब जगह सम्मान मिलता है।

Tuesday, June 3, 2008

संत कबीर वाणी:पतंगे की तरह माया के आगे न मंडराएं

माया सेती मति मिली, जो सोबरिया देहि
नारद से मुनिवर गले, क्याहि भरोसा तेहि


संता शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि कभी माया के चक्कर में मत पड़ो चाहे वह कितनी भी आकर्षक देह वाली क्यों न हो। इसने तो मुनिश्रेष्ठ नारद तक को भी भ्रमित कर दिया था इसलिए इस पर भरोसा नहीं करना चाहिए।

माया दीपक नर पतंग, भ्रमि भ्रमि माहिं परन्त
कोई एक गुरु ज्ञानते, उबरे साधु सन्त


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि माया तो जलते दीपक की लौ के समान है है और मनुष्य उन पतंगों की तरह है जो उसके आसपास मंडराते रहते हैं। इसका ज्ञान तो गुरुओं को होता है और कोई संत ही हैं जो इसके मोह से बच पाते हैं।

कबीर माया डाकिनी, सब काहू को खाय
दांत उपारुं पापिनी, सन्तो नियरै जाय।


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि माया तो एक डायन की तरह है जो अपना शिकार ढूंढकर खा जाती है। यही माया जब सिद्ध संतों के पास जाती है तो वह इसके दांत उखाड़ देते है।

Saturday, May 31, 2008

संत कबीर वाणी:क्रोध और अंहकार की अग्नि में जल रहा है संसार

जगत मांहि धोखा घना, अहं क्रोध अरु काल
पोरि पहुंचा मारिये, ऐसा जम का जाल

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं मनुष्य अहंकार, क्रोध तथा कपोल कल्पना में अधिक धोखा खाते हैं। यह यम का एक ऐसा जंजाल है जिसे मन में आते ही मार डालना चाहिए।

दसौं दिसा से क्रोध की, उठी अमरबल आग
सीतल संगत साध की, तहां ऊबरिये भाग

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि दसों दिशाओं में क्रोध की आग लगी हुई है। जहां साधु और संतों की छांव हैं वहीं शांति है। इसलिये भागकर वहीं जाओं तभी शांति मिलेगी।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-पूरे विश्व में शांति के लिए प्रयास हो रहे हैं क्योंकि सभी जगह क्रोध और अहंकार की अग्नि प्रज्जवलित है। अगर यह अग्नि नहीं होती तो फिर शांति के लिए प्रयास ही नहीं होते और फिर कुछ लोगों की रोजी रोटी कैसे चलती? वह समाज के शिखर पर बैठ कर शासन कैसे करते। यह शांति प्रयास केवल एक दिखावा भर है। यह मनुष्य के अंदर स्थित क्रोध और अहंकार की प्रवृत्ति का दोहन करने के लिऐ है। पहले कुछ मनुष्यों को समक्ष उन्हें उत्तेजित करने वाले विषय प्रस्तुत कर दो और वह क्रोध और अहंकार के वशीभूत होकर असामाजिक गतिविधियों में लिप्त होकर दूसरे मनुष्यों में भय उत्पन्न करें और फिर उनको सांत्वना देने के लिये शांति प्रयास किये जायें-यही कर रहे हैं पेशेवर समाज सेवक।

अपने आसपास हो रहे घटनाक्रमों को देखिए। एक क्रोधग्नि के वशीभूत आंखें तरेर रहा है दूसरी तरफ शांति के मसीहा उनसे वार्ता कर रहे हैं। दोनो का काम चल रहा है। कभी कोई विषय समाप्त ही नहीं होता। दोनों की समाज के सामने प्रस्तुत होकर अपनी छबि बनाये हुए हैं। जाति, भाषा, धर्म और वर्गों के आधार पर समाज के लोगों को बांटकर कुछ लोग शासन कर रहे हैं। यह विभाजन एकदम भ्रम है पर लोग हैं कि अपनी कपोल कल्पनाओं में उनको वास्तविकता समझते हैंं। इसका लाभ उठाते हैं पेशेवर समाज सेवक जिनका उद्देश्य ऐसे झगड़ों से आर्थिक लाभ उठाने के साथ समाज में प्रतिष्ठा अर्जित करना भी होता है। अगर हम चाहते हैं कि हमारे आसपास शांति रहे तो भगवान भक्ति और सत्संग में व्यस्त होना चाहिए। अगर हम ऐसे विवादों में आयेंगे तो फिर चर्चा भी ऐसी ही करेंगे और इससे हमारे अंदर ही विकृतियां पैदा होंगी। इसलिये ऐसी चर्चाओं का त्याग कर अपने मन में ध्यान और स्मरण से शुद्धता लाना चाहिए। तब दूसरे लोगों की क्रोध और अहंकार की अग्नि हमें कष्ट नहीं पहंुंचा सकती।

याद रखिये हमारे मन में दूसरों की प्रेरणो से ही क्रोध और अहंकार की अग्नि प्रज्जवलित होती है और अगर हम सत्संग में व्यस्त रहेंगे तो कोई हमें उत्तेजित नहीं कर पायेगा।

Friday, May 30, 2008

भृतहरि शतक:कुपात्र को दान देने और प्रमाद से धन नष्ट हो जाता है

दौर्मन्त्र्यान्नृपतिर्विनष्यति यतिः सङगात्सुतालालनात् विप्रोऽन्ध्ययनात्कुलं कुतनयाच्छीलं खलोपासनात्
ह्यीर्मद्यादनवेक्षणादपि कृषिः स्नेहः प्रवासाश्रयान्मैत्री चाप्रणयात्सृद्धिरनयात् त्यागपमादाद्धनम्


हिंदी में भावार्थ-कुमित्रता से राजा, विषयासक्ति और कामना योगी, अधिक स्नेह से पुत्र, स्वाध्याय के अभाव से विद्वान, दुष्टों की संगत से सदाचार, मद्यपान से लज्जा, रक्षा के अभाव से कृषि, परदेस में मित्रता, अनैतिक आचरण से ऐश्वर्य, कुपात्र को दान देने वह प्रमाद से धन नष्ट हो जाता है।

Thursday, May 29, 2008

भृतहरि शतक:आदमी को नचाती हैं इच्छा और आशा

खलालापाः सोढा कथमपि तदाराश्र्चनपरैर्निगुह्मान्तर्वाष्पं हस्तिमपि शून्येन मनसा
कृतश्चियत्तस्तम्भः प्रहसितश्रिचयामञ्जलिरपि त्वमाशे मोघाशे किममपरमतो नर्तयसि माम्

हिंदी में भावार्थ-दुष्टजनों की सेवा करते हुए उनके ताने और व्यंग्य सुने। दुख के कारण हृदय में उमड्ने वाले आंसुओं को रोक और उनका मन रखने के लिए उनक सामने हंसने का दिखावा किया। मन को समझाकर उन्हें प्रसन्न करने के लिए उनके समक्ष हाथ भी जोड़े। हे आशा क्या अभी और नचायेगीं।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-यह गंभीर प्रसंग हैं। हम अपने जीवन के दूसरों के सामने हंसने का प्रयास करते हैं, कई लोगों के व्यंग्य बाण और आलोचना को झेलते हैं। कई बार ऐसा अवसर आता है कि आंखों से आंसु निकलने वाले होते हैं पर हम उन्हें रोक लेते हैं। दुनियां में सबका यही हाल है। आजकल तो सारी माया ही ऐसे लोगों के हाथों में जो जिनके कर्म खोटे हैं। उनके यहां कई लोग सेवा में रहते हैं। वह उनके इशारे पर हंसते और चिल्लाते हैं। दूसरों पर अपने मालिक की तरफ से ताने और फब्तियां कसते हैं। मगर सच यही है कि वह भी वक्त के मारें हैं। हर बार सोचते हैं कि यह हमारा काम हो जाये तो मुक्ति हो जायेगी। ऐसा होता नहीं है। एक कामना पूरी होती है तो दूसरी शुरू हो जाती है। ऐसे में आदमी सोचता ही रह जाता है कि हम उनका साथ छोड़ें जिनके साथ रहने में मन को रंज होता है।

Wednesday, May 28, 2008

संत कबीर वाणी:इस संसार में मनुष्य एक पथिक है

हम जाने थे खायंगे, बहुत जिमीं बहु माल
ज्यों का त्यों ही रहि गया, पकडि ले गया काल

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते है कि हम तो इसी विचार में रहते हैं कि इस दुनियां में रहकर बहुत सारे माल जमाकर उसका उपभोग करेंगे पर जब काल पकड़ कर ले जाता है तो सब यहीं रखा रहा जाता है।

पंथी उभा पंथ सिर, बगुचा बांधा पूंठ
मरना मुंह आगे खड़ा, जीवन का सब झूठ

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मनुष्य इस संसार में एक पथिक की तरह होता है जो अपने सिर पर अपनी चिंताओं का बोझ लिये चला जाता है। उसके सामने हमेशा काल खड़ा रहता है और वह झूठ के सहारे चलते हुए थका हुआ लगता है।

Tuesday, May 27, 2008

भृतहरि शतक:आलस्य शत्रु और पुरुषार्थ मित्र होता है

आलस्यं हिं मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः
नास्त्यद्यम समो बन्धु कुर्वाणे नावसीदति


हिंदी में अर्थ मनुष्य के शरीर में रहने वाला आलस्य ही उसका सबसे प्रबल शत्रू है, वही पुरुषार्थ के समान उसका कोई मित्र नहीं है, जिसके करते रहने से मनुष्य कभी भी कष्ट नहीं पाता।

संपादकीय व्याख्या-हम अपने जीवन में जितना आलस्य करते हैं उसे कभी स्वयं भी अनुभव नहीं कर पाते। वैज्ञानिक कहते हैं कि एक सामान्य मनुष्य अपने जीवन में अपने दिमाग का केवल दस प्रतिशत ही उपयोग करता है और जो एक प्रतिशत भी इससे अधिक करता है वह श्रेष्ठ लोगो में गिना जाता है। इसक कारण यह है कि हम कई बार ऐसे काम करते हैं जो हमारे लिए केवल मनोरंजन का प्रबंध करते हैं और जो सकारात्मक और लाभ देने वाले है उनसे पीठ फेरना अच्छा लगता क्योंकि उसमें मेहनत होती है। मेरे विचार से आलस्य का आशय यह नहीं है कि हम केवल अनावश्यक रूप से बिस्तर पर सोते हैं बल्कि चलते फिरते अपने मस्तिष्क को वैचारिक क्रिया से दूर रखना भी एक प्रकार का आलस्य है। हम सोचते हैं कि हमारे मस्तिष्क में तनाव पैदा न हो इसलिये ऐसे काम नहीं करते जिनमे सोचना पड़ता है। इस प्रकार मानसिक आलस्य भी एक प्रकार का कष्ट प्रदान करने वाला होता है। जो लोग इस बात की परवाह किये बिना अपना काम करते हैं वही जीवन में सफल होते हैं।

Sunday, May 25, 2008

संत कबीर वाणी:प्रेम का घर दूर है, उसे पाना आसान नहीं

जब लग मरने से डरैं, तब लगि प्रेमी नाहिं
बड़ी दूर है प्रेम घर, समझ लेहू मग माहिं

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जब तक मृत्यु का भय है तब तक प्रेम हो नहीं सकता हैं प्रेम का घर तो बहुत दूर है और उसे पाना आसान नहीं है।

प्रीति बहुत संसार में, नाना विधि की सोय
उत्तम प्रीति सो जानिए, सतगुरू से जो होय


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि इस संसार में प्रेम करने वाले बहुत हैं और प्रेम करने के अनेक तरीक और विधियां भीं हैं पर सच्चा प्रेम तो वही है जो परमात्मा से किया जाये।

संपादकीय व्याख्या-हमारे जन जीवन में फिल्मों का प्रभाव अधिक हो गया है जिसमें प्रेम का आशय केवल स्त्री पुरुष के आपस संबंध तक ही सीमित हैं। सच तो यह है कि अब कोई पिता अपनी बेटीे से और भाई अपनी बहिन से यह कहने में भी झिझकता है कि ‘मैं तुमसे प्रेम करता हूं’ क्योंकि फिल्मी में नायक-नायिका के प्रेम प्रसंग लोगों के मस्तिष्क में इस तरह छाये हुए हैं कि उससे आगे कोई सोच ही नहीं पाता। किसी से कहा जाये कि मैं तुमसे प्रेम करता हूं तो उसके दिमाग में यह आता है कि शायद यह फिल्मी डायलाग बोल रहा हैं। वैसे इस संसार में प्रेम को तमाम तरह की विधियां हैं पर सच्चा प्रेम वह है जो भगवान भक्ति और स्मरण के रूप में किया जाये। प्रेम करो-ऐसा संदेश देने वाले अनेक लोग मिल जाते हैं पर किया कैसे किया जाये कोई नहीं बता सकता। प्रेम करने की नहीं बल्कि हृदय में धारण किया जाने वाला भाव है। उसे धारण तभी किया जा सकता है जब मन में निर्मलता, ज्ञान और पवित्रता हो। स्वार्थ पूर्ति की अपेक्षा में किया जाने वाला प्रेम नहीं होता यह बात एकदम स्पष्ट है।

Saturday, May 24, 2008

भृतहरि शतक: परिवर्तन तो संसार का नियम है

परिवर्तिनि संसारे मृतः को वा न जायते
स जातो येन जातेन याति वंशः समुन्नतिम्

हिंदी में भावार्थ-परिवर्तन होते रहना संसार का नियम। जो पैदा हुआ है उसकी मृत्यु होना निश्चित है। जन्म लेना उसका ही सार्थक है जो अपने कुल की प्रतिष्ठा में वृद्धि करता है अर्थात समस्त समाज के लिये ऐसे काम करता है जिससे सभी का हित होता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-अगर आदमी को किसी से भय लगता है तो वह अपने आसपास परिवर्तन आने के भय से। कहीं भाषा तो कहीं धर्म और कहीं क्षेत्र के विवाद आदमी के हृदय में व्याप्त इसी भय की भावना का दोहन करने की दृष्टि से उनके मुखिया उपयोग करते हैं।कई लोगों के हृदय में ऐसे भाव आते है जैसे- अगर पास का मकान बिक गया तो लगता है कि पता नहीं कौन लोग वहां रहने आयेंगे और हमसे संबंध अच्छे रखेंगे कि नहीं। उसी तरह कई लोग स्थान परिवर्तन करते हुए भय से ग्रस्त होते हैं कि पता नहीं कि वहां किस तरह के लोग मिलेंगे। जाति के आधार पर किसी दूसरे जाति वाले का भय पैदा किया जाता है कि अमुक जाति का व्यक्ति अगर यहां आ गया तो हमारे लिए विपत्ति खड़ी कर सकता है। अपने क्षेत्र में दूसरे क्षेत्र से आये व्यक्ति का भय पैदा किया जाता है कि अगर वह यहंा जम गया तो हमारा अस्तित्व खत्म कर देगा।

ऐसे भाव लाने का कोई औचित्य नहीं है। यह मान लेना चाहिए कि परिवर्तन आयेगा। आज हम जहां हैं वहां कल कोई अन्य व्यक्ति आयेगा। जहां हम आज हैं वह पहले कोई अन्य था। कई परिवर्तनों की अनुभूति तो हमें हो ही नहीं पाती। बचपन के मित्र युवावस्था में नहीं होते। युवावस्था के मित्र नौकरी में साथ नहीं होते। इस संसार में समय का चक्र घूमता है और उसमें परिवर्तन तो होते ही रहना है और हमें उनको दृष्टा होकर देखना चाहिए।

Friday, May 23, 2008

संत कबीर वाणी:देह सराय और मन पहरेदार है

मैं मेरी तू जनि करै, मेरी मूल विनासि
मेरी पग का पैखड़ा, मेरी गल की फांसि

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते है कि इस संसार में मनुष्य देह पाकर अहंकार के जाल में मत फंसा क्योंकि यह तो पांव की फांस है जो भक्ति मार्ग पर चलने नहीं देती। बाद में यही गले की फांसी भी बन जाती है।

तन सराय मन पाहरु, मनसा उतरी आय
को काहू का है नहीं, देखा ठोंकि बजाय


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि यह देह धर्मशाला की तरह है और इसका पहरेदार हमारा मन है। इस देह में इच्छाएं और कामनाएं अतिथि के रूप में आकर ठहर जाती हैं। एक का काम पूरा होता है तो दूसरी वहां रहने चली आती है। यहां कोई किसी का सगा नहीं है यह ठोक बजाकर देख लिया।

इत पर घर उत है घरा बनिजन आये हाट
करम करीना बेचि के, उठि करि चालो बाट

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि इस संसार में देह धारण करने का आशय यह समझना चाहिए कि हम व्यापारी की तरह हाट में आये है। इसलिये हमें सत्कर्मों का व्यापार करना चाहिए। अतः यहां जाने से पहले अपना समय भगवान भक्ति और परमार्थ करते रहना चाहिए। आखिर फिर अपने घर वापस भी तो जाना है।

व्याख्या-हमेशा कहा जाता है कि हमारा आत्मा परमात्मा से बिछड़ कर यहां आया है इसलिये उनका घर ही हमारा घर है। यही कबीरदास जी का आशय है। इसलिये वह यह कहते हैं कि यह देह धारण करना मतलब बाजार में आना है।

Thursday, May 22, 2008

भृतहरि शतक:तृष्णा रुपी लहरें ऊपर उठतीं रहतीं हैं

आशा नाम नदी मनोरथजला तृष्णातरङगाकुला
रामग्राहवती वितर्कविहगा धैर्यद्रुमध्वंसिनी
मोहावर्तसुदुस्तराऽतिगहना प्रोत्तुङगचिन्तातटी
तस्याः पारगता विशुद्धमनसो नन्दन्ति योगश्वराः


आशा एक नदी की भांति इसमे हमारी कामनाओं के रूप में जल भरा रहता है और तृष्णा रूपी लहरें ऊपर उठतीं है। यह नदी राग और अनुराग जैसे भयावह मगरमच्छों से भरी हुई हैं। तर्क वितर्क रूपी पंछी इस पर डेरा डाले रहते हैं। इसकी एक ही लहर मनुष्य के धैर्य रूपी वृक्ष को उखाड़ फैंकती है। मोह माया व्यक्ति को अज्ञान के रसातल में खींच ले जाती हैं, जहा चिंता रूपी चट्टानों से टकराता हैं। इस जीवन रूपी नदी को कोई शुद्ध हृदय वाला कोई योगी तपस्या, साधना और ध्यान से शक्ति अर्जित कर परमात्मा से संपर्क जोड़कर ही सहजता से पार कर पाता है।

Tuesday, May 20, 2008

मनुस्मृति:गाली का उत्तर गाली से नहीं देना चाहिए

अति वादांस्तितिक्षेत नावमन्येत कञ्चन्
न चेमं देहमाश्रित्य वैरं कुर्वीत केनचित्
क्रुद्धयन्तं न प्रतिक्रुध्येदाक्रृष्टः कुशलं वदेत्
साप्तद्वाराऽवकीर्णां च न वाचमनृतां वदेत्

सन्यासी और श्रेष्ठ पुरुषों को दूसरे लोगों द्वारा कहे कटु वचनों को सहन करना चाहिए। कटु शब्द (गाली) का उत्तर वैसे ही शब्द से नहीं दिया जाना चाहिए और न किसी का अपमान करना चाहिए। इस नश्वर शरीर के लिये सन्यासी और श्रेष्ठ पुरुष को किसी से शत्रुता नहीं करना चाहिए।

सन्यासी एवं श्रेष्ठ पुरुषों को कभी भी क्रोध करने वाले के प्रत्युत्तर में क्रोध का भाव व्यक्त नहीं करना चाहिए। अपने निंदक के प्रति भी सद्भाव रखना चाहिए। अपनी देह के सातों द्वारों -पांचों ज्ञानेंद्रियों नाक, कान, आंख, हाथ वाणी और विचार, मन तथा बुद्धि-से सद्व्यवहार करते हुए कभी भी झूठ नहीं बोलना चाहिए।

Saturday, May 17, 2008

संत कबीर वाणी:प्रीती अपने समान व्यक्ति से करना चाहिए

यह तत वह तत एक है, एक प्रान दुइ गात
अपने जिये से जानिये, मेरे जिय की बात

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि सभी लोगों की देह में जीव तत्व एक ही है। आपस में प्रेम करने वालों में कोई भेद नहीं होता क्योंकि दोनो के प्राण एक ही होता है। इस गूढ रहस्य को वे ही जानते हैं जो वास्तव में प्रेमी होते हैं

प्रीति ताहि सो कीजिये, जो आप समाना होय
कबहुक जो अवगुन पडै+, गुन ही लहै समोय


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि प्रीति उसी से करना चाहिए, जो अपने समान ही हृदय में प्रेम धारण करने वाले हों। यह प्रेम इस तरह का होना चाहिए कि समय-असमय किसी से भूल हो जाये तो उसे प्रेमी क्षमा कर भूल जायें।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-प्रेम किया नहीं हो जाता है यह फिल्मों द्वारा संदेश इस देश में प्रचारित किया जाता है। सच तो यह है कि ऐसा प्रेम केवल देह में स्थित काम भावना की वजह से किया जाता है। प्रेम हमेशा उस व्यक्ति के साथ किया जाना चाहिए जो वैचारिक सांस्कारिक स्तर पर अपने समान हो। जिनका हृदय भगवान भक्ति में रहता है उनको सांसरिक विषयों की चर्चा करने वाले लोग विष के समान प्रतीत होते हैं। यहां दिन में अनेक लोग मिलते है पर सभी प्रेमी नहीं हो जाते। कुछ लोग छल कपट के भाव से मिलते हैं तो कुछ लोग स्वार्थ के भाव से अपना संपर्क बढ़ाते हैं। भवावेश में आकर किसी को अपना सहृदय मानना ठीक नहीं है। जो भक्ति भाव में रहकर निष्काम से जीवन व्यतीत करता है उनसे संपर्क रखने से अपने आपको सुख की अनुभूति मिलती है।

Tuesday, May 13, 2008

चाणक्य नीति:शास्त्रों की निंदा करने वाले अल्पज्ञानी


1.आकाश में बैठकर किसी से वार्तालाप नहीं हो सकता, वहां कोई किसी का संदेश वाहक न जा सकता है और न वहां से आ सकता है जिससे कि एक दूसरे के यहां के रहस्यों जाना जा सकें। अंतरिक्ष के बारे में सामान्य मनुष्यों को कोई ज्ञान नहंी रहता पर फिर भी विद्वान लोगों ने सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण के बारे में ज्ञान कर लिया। ऐसे विद्वान प्रतिभाशाली और दिव्य दृष्टि वाले होते हैं।

2.वेद के ज्ञान की गहराई न समझकर वेद की निंदा करने वाले वेद की महानता को कम नहीं कर सकते। शस्त्र निहित आचार-व्यवहार को कार्य बताने वाले अल्पज्ञ लोग शास्त्रों की मर्यादा को नष्ट नहीं कर सकते।

3.बुद्धिमान मनुष्य को कौवे से पांच बातें सीखनी चाहिए। छिपकर मैथुन करना, चारों और दृष्टि रखना अर्थात चैकन्ना रहना, कभी आलस्य न करना, तथा किसी पर विश्वास न करना।


संपादकीय व्याख्या-कई लोग भारतीय वेद शास्त्रों के बारे में दुष्प्रचार में लगे हैं। इनमें तो कई अन्य धर्मों के विद्वान भी हैं। उन्होंने इधर-उधर से कुछ श्लोक सुन लिये और अब वेदों के विरुद्ध विषवमन करते हैं। उनके बारे में वह कुछ नहीं जानते। लाखों श्लोकों में से दो चार श्लोक पढ़कर उन पर टिप्पणियां करना अल्पज्ञान का ही प्रतीक है। इन वेदों के अध्ययन से ऐसा लगता है कि आज अप्रासंगिक लगने वाले कुछ संदेश अपने समय में उपयुक्त रहे होंगे। भारतीय वेदों ने ही इस विश्व में सभ्यता स्थापित की है। वेदों मेें यह कहीं नहीं लिखा हुआ है कि समय के साथ अपने अंदर परिवर्तन नहीं लाओ।

आधुनिक विज्ञान में पश्चिम का गुणगान करने वालों को यह पता होना चहिए कि सूर्य ग्रहण और चंद्रग्रहण के बारे मेें भारतीय विद्वान बहुत पहले से ही जानते थे। भारत के अनेक पश्चिम को ही आधुनिक विज्ञान को सर्वोपरि मानता है जो आज भी पूर्ण नहीं है और प्रयोगों के दौर से गुजर रहा है।

Saturday, May 10, 2008

रहीम के दोहे:जो सुलगे वह बुझ गए, जो बुझे वह सुलगे नहीं

जे रहीम विधि बड़ किए, को कहि दूषण काढि
चंद्र दूबरो कूबरो, तऊ नखत तें बाढि
कविवर रहीम कहते हैं कि परमात्मा ने जिन्हें महान बनाया है, उनके दोष कोई नहीं देखता। जैसे चंद्रमा दुर्बल और कुबड़ा होने पर भी आकाश में नक्षत्रों से आगे बढ़ जाता है।

जे सुलगे ते बुझि गए, बुझे ते सुलगे नाहिं
रहिमन दोहे प्रेम के, बुझि बुझि कै सुलगाहिं


कविवर रहीम कहते है कि जो सुलगे वह बुझे जो बुझे वह फिर नहीं सुलगे। रहीम के दोहे बुझ बुझ के सुलगा देते हैं।

वर्र्तमान संदर्भ में व्याख्या-कविवर रहीम कहते हैं कि जो अनेक व्यक्ति यहां महानता को प्राप्त हुए पर वह भी नष्ट हो गये जो तुच्छ थे वह भी अपना प्रभाव दिखाये बिना समाप्त हो गये पर उनके दोह तो प्रज्जवलित अग्नि की तरह हैं जो लोगों में चेतना जाग्रत करते रहते हैं। यहां उन्होंने रचनाकर्म का प्रधानता दी है। सामान्य व्यक्ति अपने परिवार और कुल के लिये अनेक प्रकार की संपत्तियों का संचय यह सोचकर करते हैं कि वह हमारे बाद हमारे नाम को चलायेंगे। जब उनके जीवन का अंत होता है तो फिर उनका कोई नाम लेवा भी नहीं होता। उसी तरह राजा लोग अपने राज्य के विस्तार में यह सोचकर लगे रहते हैं कि उनके बाद प्रजा उनको याद करेगी। उनके स्वर्ग सिधारने के बाद प्रजा भी उनको भुला देती हैं। जो लोग अपने जीवन के अनुभव और अनुभूतियों लोगों को बांटने के लिये शब्दों में सृजन करते हैं वह प्रज्जवलित र्अिग्न के समान सदैव लोगों में चर्चा का विषय बने रहते हैं। कितनी अजीब बात है कि रहीम आज देह के साथ हमारे बीच नहीं है पर उनके दोह रह रहकर लोगों की जुबान पर आते हैं। अंतर्जाल पर अनेक लोग आज उन पर लिखते और पढ़ते है।

इससे संदेश यही मिलता है कि हमें अपने जीवन के सामान्य कर्मों के साथ ऐसा रचनाकर्म भी करना चाहिए जिससे हमारे बाद भी उसका अस्तित्व बना रहे।

Thursday, May 8, 2008

चाणक्य नीति:मुर्गे से चार गुण ग्रहण करें

प्रत्युत्थानं च युद्ध्र च संविभागं च बन्धुषु
स्वयमाक्रभ्य भुक्तं च शिक्षेेच्चात्वारि कुक्कुटात्

आचार्य चाणक्य कहते हैं कि मनुष्य को अपने जीवन में चार गुण मुर्गे से ग्रहण करना चाहिए, समय पर जागना, युद्ध की ललकार पर उसके लिए तैयार हो जाना, अपने परिवार के साथ मिलकर खाना और अपने खाने के खोज स्वयं करना।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-जितना ही जीवन में आधुनिक सुविधाओं का समावेश होता जा रहा है लोगों के उठने बैठने और सोने जागने की क्रियाओं पर उसका दुष्प्रभाव हुआ है। सुबह देर से उठने से शरीर में भारीपन रहता है और इसी कारण आदमी कई कामों में आलस करता है। कुछ विद्वान कहते हैं कि सुबह जल्दी उठने से दिमाग में फुर्ती रहती है जो कि जीवन में विकास के लिये आवश्यक होती है। देर से उठने से जो आलस होता है उससे आदमी अपने जीवन में चुनौतियों से भागता है और उससे उसके आत्मविश्वास में कमी आती है। इसलिये समय पर उठने और सोने के नियम बनाना चाहिए। अपने भोजन के मामले में स्वावलंबी होना चाहिए और भोजन परिवार के समस्त सदस्य मिलकर बैठकर करें। अनियमित जीवन से मानसिक अस्थिरता पैदा होती है और जीवन में स्वयं निरर्थक तनाव और संकट में घिर जाते हैं। जीवन में हमेशा ही संघर्ष के लिए तैयार रहना चाहिए।

Wednesday, May 7, 2008

संत कबीर वाणी:स्वयं ठग जाएं तो कोई बात नहीं, दूसरे को न ठगें

जो तोको काटा बुवै, ताहि बुवै तू फूल
तोहि फूल को फूल है, वाको है तिरशूल


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं जो अगर कोई व्यक्ति तुम्हारे लिए कांटे बोता है, तुंम उसके लिए फूल बोओ। तुम्हारे तो फूल हमेशा ही फूल होंगे परंतु उसके लिये कांटे तिरशूल की तरह उसको लगेंगे।

कबीर आप ठगाइये, और न ठगिये कोय
आप ठगै सुख, ऊपजै और ठगे दुख होय


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अगर आपको कोई ठग जाता है तो कोई बात नहीं है, पर आप स्वयं किसी को ठगने का प्रयास मत करो। हम ठग जायें तो एक तरह से इस बात का तो सुख होता है कि हमने स्वयं कोई अपराध नहीं किया पर अगर हम किसी दूसरे को ठगते हैं तो मन में अपने पकड़े जाने का भय होता है और कभी न कभी तो उसका दंड भी भोगना पड़ता है।

संपादकीय व्याख्या-ऐसा लगता है कि दूसरों को ठगने वाले लोग सुखी हैं, पर यह वास्तविकता नहीं है। जिन लोगों ने दूसरों के प्रति अपराध कर संपत्ति बनाई है उनको भी कहीं न कहीं मन में भय रहता है और कभी न कभी उनको दंड भोगना ही पड़ता है। यह दंड किसी भी प्रकार का हो सकता है। उनकी संतानें अयोग्य होतीं हैं या उनके घर मे बीमारियों का वास रहता है। पकड़े जाने पर सामाजिक रूप से भी वह अपमानित होते हैं। इसलिये स्वयं हमें किसी को ठगने का प्रयास नहीं करना चाहिए। हां, कभी स्वयं ठगे जाते हैं तब धन या वस्तु खोने का क्षणिक दुःख होता है पर समय के साथ उसे भूल जाते हैं पर अगर किसी और को हम ठगते हैं तो वह अपराध हमारे हृदय में शूल की तरह चुभा रहता है और इससे जीवन में हम सदैव विचलित रहते है।

Saturday, May 3, 2008

संत कबीर वाणी:संगत करने से भक्ति में बाधा होती है

ऊजल पहिनै कापड़ा, पान सुपारी खाय
कबीर गुरु की भक्ति बिन, बांधा जमपुर जाय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि लोग साफ-सुथरे कपड़े पहन कर पान और सुपारी खाते हुए जीवन व्यतीत करते हैं। गुरु की भक्ति के बिना उनका जीवन निरर्थक व्यतीत करते हुए मृत्यु को प्राप्त होते हैं

दुनिया सेती दोसती, होय भजन के भंग
एका एकी राम सों, कै साधुन के संग


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि दुनिया के लोगों के साथ मित्रता बढ़ाने से भगवान की भक्ति मंे बाधा आती है। एकांत में बैठकर भगवान राम का स्मरण करना चाहिये या साधुओं की संगत करना चाहिए तभी भक्ति प्राप्त हो सकती है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-भक्ति लोग अब जोर से शोर मचाते हुए कर रहे हैं। मंदिरों और प्रार्थना घरों में फिल्मी गानों की तर्ज पर भजन सुनकर लोग ऐसे नृत्य करते हैं मानो वह भगवान की भक्ति कर रहे हैं। समूह बनाकर दूर शहरों में मंदिरों में स्थित प्रतिमाओं के दर्शन करने जाते हैं। जबकि इससे स्वयं और दूसरों को दिखाने की भक्ति तो हो जाती है, पर मन में संतोष नहीं होता। मनुष्य भक्ति करता है ताकि उसे मन की शांति प्राप्त हो जाये पर इस तरह भीड़भाड़ में शोर मचाते हुए भगवान का स्मरण करना व्यर्थ होता है क्योंकि हमारा ध्यान एक तरफ नहीं लगा रहता। सच तो यह है कि भक्ति और साधना एकांत में होती है। जितनी ध्यान में एकाग्रता होगी उतनी ही विचारों में स्वच्छता और पवित्रता आयेगी। अगर हम यह सोचेंगे कि कोई हमारे साथ इस भक्ति में सहचर बने तो यह संभव नहीं है। अगर कोई व्यक्ति साथ होगा या हमारा ध्यान कहीं और लगेगा तो भक्ति भाव में एकाग्रता नहीं आ सकती। अगर हम चाहते हैं कि भगवान की भक्ति करते हुए मन को शांति मिले तो एकांत में साधना का प्रयास करना चाहिए।
inglish translation by googl tool
Sant Kabir speech: relevant to interfere with a devotional

1.Sant Kabir G says that the head clean - clean water and clothes to wear a life spent in the nut account. Without the devotional guru spent his life meaningless, are receiving death


2.Sant Kabir G says head of the world's increasing friendship with the people of God comes devotional doubleentry.xml.in.h obstacle. Ram sat in the privacy of a memorial should be relevant only if the sadhus, or can be devotional.

In the context of the current interpretation - devotional people have stressed from the noise are cosy. Temples and prayer houses of worship in the pattern of film songs to hear such people are dancing as if he were God's devotional. Groups in cities away by making statues in the temples of philosophy to go. While the show itself and others, is devotional, not on the mind of satisfaction. The devotional man's mind so that it will be received on such a crowded, noisy, the cosy God in vain to remember because our focus is not on the one hand remains. The fact is that in the privacy of devotional and meditation. Concentration will be the same as in the ideas of cleanliness and purity will. If we think that a fellow with us in this devotional, it became not possible. If a person is or will be with us much attention, and it will take devotional sense of concentration can not come. If we want God's peace of mind, the devotional met in art should try to privacy.

Friday, May 2, 2008

संत कबीर वाणी:समाज को लाभ न हो तो बड़ा आदमी होना किस काम का

बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जोरे बड़ मति नांहि
जैसे फूल उजाड़ को, मिथ्या हो झड़ जांहि

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि आदमी धन, पद और सम्मान पाकर बड़ा हुआ तो भी क्या अगर उसके पास अपनी मति नहीं है। वह ऐसे ही है जैसे बियावन उजड़े जंगल में फूल खिल कर बिना किसी के काम आये मुरझा जाता है।

हाथी चढि के जो फिरै, ऊपर चंवर ढुराय
लोग कहैं सुख भोगवे, सीधे दोजख जाय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहत हैं कि तो हाथी पर चढ़कर अपने ऊपर चंवर डुलवाते हैं और लोग समझते हैं कि वह सुख भोग रहे तो यह उनका भ्रम है वह तो अपने अभिमान के कारण सीधे नरक में जाते हैं।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-समय ने ऐसी करवट ली है कि इस समय धर्म और जनकल्याण के नाम पर भी व्यवसाय हो गया है। इस मायावी दुनियां में यह पता ही नहीं लगता कि सत्य और माया है क्या? जिसे देखो भौतिकता की तरफ भाग रहा है। क्या साधु और क्या भक्त सब दिखावे की भक्ति में लगे हैं। राजा तो क्या संत भी अपने ऊपर चंवर डुलवाते हैं। उनको देखकर लोग वाह-वाह करते हैं। सोचते हैं हां, राजा और संत को इस तरह रहना चाहिये। सत्य तो यह है कि इस तरह तो वह भी लोग भी भ्रम में हो जाते हैं और उनमें अहंकार आ जाता है और दिखावे के लिये सभी धर्म करते हैं और फिर अपनी मायावी दुनियां में अपना रंग भी दिखाते हैं। ऐसे लोग पुण्य नहीं पाप में लिप्त है और उन्हें भगवान भक्ति से मिलने वाला सुख नहीं मिलता और वह अपने किये का दंड भोगते हैं।

यह शाश्वत सत्य है कि भक्ति का आनंद त्याग में है और मोह अनेक पापों को जन्म देता है। सच्ची भक्ति तो एकांत में होती है न कि ढोल नगाड़े बजाकर उसका प्रचार किया जाता है। हम जिन्हें बड़ा व्यक्ति या भक्त कहते हैं उनके पास अपना ज्ञान और बुद्धि कैसी है यह नहीं देखते। बड़ा आदमी वही है जो अपनी संपत्ति से वास्तव में छोटे लोगों का भला करता है न कि उसका दिखावा। आपने देखा होगा कि कई बड़े लोग अनेक कार्यक्रम गरीबों की भलाई के लिये करते हैं और फिर उसकी आय किन्हीं कल्याण संस्थाओं को देते हैं। यह सिर्फ नाटकबाजी है। वह लोग अपने को बड़ा आदमी सबित करने के लिये ही ऐसा करते हैं उनका और कोई इसके पीछे जनकल्याण करने का भाव नहीं होता।

Thursday, May 1, 2008

संत कबीर वाणी:मन तो बिना सिर का मृग है

धरती फाटे मेघ मिलै, कपड़ा फाटे डौर
तन फाटे को औषधि, मन फाटे नहिं ठौर


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जब पानी बरसता है तो फटी हुई धरती आपस में मिल जाती है और फटा हुआ कपडा डोरे से सिल जाता है और बीमार देह को औषधि से स्वस्थ किया जा सकता है पर अगर कही मन अगर फट गया तो उसके लिये कोई ठिकाना नहीं है।

बिना सीस का मिरग है, चहूं दिस चरने जाय
बांधि लाओ गुरुज्ञान सूं, राखे तत्व लगाय


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि यह मन तो तो बिना सिर के मृग की तरह है जो चारों तरफ भागता रहता है। इस पर नियंत्रण करने के लिये किसी ज्ञानी गुरू से तत्वज्ञान प्राप्त कर नियंत्रण करना चाहिए तभी जीवन का आनंद लिया जा सकता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या- सब भौतिक चीजों पर हम अपना नियंत्रण कर लेते हैं पर मन पर कोई नियंत्रण नहीं कर पाता। वह चारों तरफ आदमी की दौड़ाता है। अपने देहाभिमान के चलते हम कभी नहीं अनुभव कर पाते कि अकारण तमाम तरह की उपलब्धियों के लिये दौड़ लगा रहे हैं। भक्ति भाव से दूर रहकर हम अपने आपको बहुत तकलीफ देते हैं। कोई भौतिक चीज मिल जाती है तो उसे पाकर पुलकित हो उठते हैं पर जल्द ही उससे ऊब जाते हैं फिर किसी नयी चीज की तलाश में लग जाते हैं। फिर सब चीजों से ऊब जाते हैं उससे बचने के लिये निरर्थक बोलने लगते हैं तमाम तरह के स्वांग रचते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि हम अपने आपको धोखा देने लगते हैं।

हम अपने मन के साथ भागते हैं पर अपने अंदर बैठे जीवात्मा को नहंी देखते जो भगवान भक्ति के लिये ताकता रहता है। हम भटकते हुए ऐसे गुरूओं की शरण में जाते हैं जो स्वयं तत्वज्ञान से रहित हैं और किताबों से रटकर हमें सुनाते हैं। ज्ञान का मतलब रटने से नहीं है बल्कि उसे धारण करने से है। ऐसे में हमें निष्काम भाव से ज्ञान देने वाले गुरूओं की शरण लेकर अपने मन पर नियंत्रण करने का प्रयास करना चाहिए।

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