Sunday, June 21, 2009

संत कबीर वाणी-कवि बहुत हैं भक्त कम

ज्ञानी ज्ञाता बहु मिले, पण्डित कवी अनेक।
राम रता इंन्द्री जिता, कोटी मध्ये एक।।
संत कबीरदास जी कहते हैं कि ज्ञान, ज्ञाता, विद्वान और कवि तो बहुत सारे मिले पर भगवान श्रीराम के भजन में रत तथा इंद्रियां जीतने वाला तो कोई करोड़ो में कोई एक होता है।
पढ़ते-पढ़ते जनम गया, आसा लागी हेत।
बोया बीजहि कुमति ने, गया जू निर्मल खेत।।

संत कबीरदास जी कहते हैं कि पढ़ते और गुनते पूरा जन्म गुजर गया पर मन की कामनायें और इच्छायें पीछा करती रही। कुमति का बीज जो दिमाग के खेत में बोया उससे मनुष्य के मन का निर्मल खेत नष्ट हो गया।
वर्तमान संदर्भ में संपाकदीय व्याख्या-आधुनिक शिक्षा ने सांसरिक विषयों में जितना ज्ञान मनुष्य को लगा दिया उतना ही वह अध्यात्मिक ज्ञान से परे हो गया है। वैसे यह तो पुराने समय से चल रहा है पर आज जिस तरह देश में हिंसा और भ्रष्टाचार का बोलबाला है उससे देखकर कोई भी नहीं कह सकता है कि यह देश वही है जैसे विश्व में अध्यात्मिक गुरु कहा जाता है। आतंकवाद केवल विदेश से ही नहीं आ रहा बल्कि उसके लिये खादी पानी देने वाले इसी देश में है। इसी देश के अनेक लोग विदेश की कल्पित विचाराधारा के आधार पर देश में सुखमय समाज बनाने के लिये हिंसक संघर्ष में रत हैं। यह लोग पढ़े लिखे हैं पर अपने देश में वर्ग संघर्ष में समाज का कल्याण देखते हैं। अपने ही अध्यात्मिक शिक्षा को वह निंदनीय और अव्यवहारिक मानते हैं।
जहां हिंसा होगी वहां प्रतिहिंसा भी होगी। जहां आतंक होगा वहां राज्य को भी आक्रमक होकर कार्यवाही करनी पड़ती है। हिंसा से न तो राज्य चलते हैं न समाज सुधरते हैं। इतना ही नहीं इन हिंसक तत्वों ने साहित्य भी ऐसा ही रचा है और उनके लेखक-कवि भी ऐसे हैं जो हिंसा को प्रोत्साहन देते हैं।
सच बात तो यह है कि समाज पर नियंत्रण तभी रह सकता है जब व्यक्ति पर निंयत्रण हो। व्यक्ति पर निंयत्रण राज्य करे इससे अच्छा है कि व्यक्ति आत्मनियंत्रित होकर ही राज्य संचालन में सहायता करे। व्यक्ति को आत्मनिंयत्रण करने की कला भारतीय अध्यात्म ही सिखा सकता है। इसी कारण जिन लोगों के मन में तनाव और परेशानियां हैं वह भारतीय धर्मग्रंथों खासतौर से श्रीगीता का अध्ययन अवश्य करें तभी इस जीवन रहस्य को समझ पायेंगे।
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Friday, June 19, 2009

विदुर नीति-सुपाच्य भोजन करना ही बेहतर

नीति विशारद विदुर महाराज कहते हैं कि
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भक्ष्योत्तमप्रतिच्छन्नं मत्स्यो वङिशमायसम्।
लोभाभिपाती ग्रसते नानुबन्धमवेक्षते।।
यच्छक्यं ग्रसितुं ग्रस्यं ग्रस्तं परिणमेच्च यत्।
हितं च परिणामे यत् तदाद्यं भतिमिच्छता।।
हिंदी में भावार्थ
-मछली कांटे से लगे चारे को लोभ में पकड़ कर अपने अंदर ले जाती है उस समय वह उसके परिणाम पर विचार नहीं करती। उससे प्रेरणा ग्रहण कर उन्नति चाहने वाले पुरुष को ऐसा ही भोजन ग्रहण करना चाहिये जो खाने योग्य होने के साथ पेट में पचने वाला भी हो। जो भोजन पच सकता है वह ग्रहण करना ही उत्तम है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-हमारे देश में फास्ट फूड संस्कृति का प्रचार निरंतर बढ़ता जा रहा हैं। क्या जवान, क्या अधेड़ और बूढ़े और क्या स्त्री और पुरुष, बाजारों में बिकने वाले फास्ट फूड पदार्थों को खाने में आनंद अनुभव करते हैं। यह पश्चिम से आया फैशन है पर वहीं के स्वास्थ्य विशेषज्ञ उसे पेट के लिये खराब और अस्वास्थ्यकर मानते हैं। इसके अलावा मांस खाना भी पश्चिम के ही विशेषज्ञ गलत मानते हैं।
इन्हीं पश्चिमी स्वास्थ्य विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि मांस खाने से मनुष्य में अनावश्यक आक्रामकता आती है और वह जल्दी ही हिंसा पर उतारु हो जाता है। यह जरूरी नहीं है कि भोजन में विष मिला हो तभी वह बुरा प्रभाव डालता है। विष मिले भोजन को पता तो तत्काल चल जाता है क्योंकि उसकी देह पर तत्काल प्रतिक्रिया होती है पर असात्विक और बीमारी वाले भोजन का पता थोड़े समय बाद चलता है। खाने के बाद भोजन पचने से आशय केवल उसका भौतिक रूप नहीं है बल्कि भावनात्मक रूप से पचने से है। अगर मांस वाला भोजन किया तो लगता है कि वह पच गया पर उसके लिये जिस जीव की हत्या हुई उसकी भावनायें भी उसी मांस में मौजूद होती है और सभी जानते है कि भावनाओं का कोई भौतिक स्वरूप नहीं होता जो किसी को दिखाई दे। अतः मांस खाने वाले के पेट में वह कलुषित भावनायें भी चली जाती हैं जो उस समय उस जीव के अंदर मौजूद थी जब उसे काटा गया। यही हाल ऐसे भोजन का भी है जिसके बहुत से पदार्थ अपच्य है पर वह पेट में धीरे धीरे जमा होकर बड़ी बीमारी का स्वरूप लेते हैं। ऐसा अशुद्ध पेय पदार्थों के सेवन पर भी होता है।
श्रीमदभागवत गीता में ‘गुण ही गुणों के बरतते है’ का जो सिद्धांत बताया गया है उसका यह भी तात्पर्य है कि जैसे अन्न और जल का भोजन हम करते हैं वैसा ही उसका प्रभाव हम पर होता है और हम उससे बच नहीं सकते। अतः प्रयास यही करना चाहिये कि सात्विक भोजन करें ताकि हमारे विचार भी पवित्र रहेें जो कि आनंदपूर्ण जीवन के अति आवश्यक हैं।
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Thursday, June 18, 2009

रहीम के दोहे-अपनी युक्तियां और कष्ट गुप्त रखें

रहिमन ठहरी धूरि की, रही पवन ते पूरि।
गांठ युक्ति की खुलि गई, अंत धूरि को धूरि।
कविवर रहीम कहते हैं कि जिस तरह जमीन पर पड़ी धूल हवा लगने के बाद चलायमान हो उठती है वैसे ही यदि आदमी की योजनाओं का समयपूर्व खुलासा हो जाये तो वह भी धूल हो जाते हैं।
रहिमन निज मन की, बिथा, मन ही राखो गोय।
सुनि अठिलैह लोग सब, बाटि न लैहैं न कोय।।
कविवर रहीम कहते हैं कि मन की व्यथा अपने मन में ही रखें उतना ही अच्छा क्योंकि लोग दूसरे का कष्ट सुनकर उसका उपहास उड़ाते हैं। यहां कोई किसी की सहायता करने वाला कोई नहीं है-न ही कोई मार्ग बताने वाला है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-दूसरे का दुःख देखकर प्रसन्न होने वालों की इस दुनियां में कमी नहीं है। पंच तत्वों से बनी इस देह में मन, बुद्धि और अहंकार की प्रवृत्तियां हर मनुष्य में रहती हैं। इस संसार में भला कौन कष्ट नहीं उठाता पर अपने दिल को हल्का करने के लिये लोग दूसरों के कष्टों का उपहास उड़ाते हैं। इसलिये जहां तक हो सके अपने मन की व्यथा अपने मन में ही रखना चाहिये। सुनने वाले तो बहुत हैं पर उसका उपाय बताने वाला कोई नहीं होता। अगर सभी दुःख हरने का उपाय जानते तो अपना ही नहीं हर लेते।
अपने जीवन की योजनाओं को गुप्त रखना चाहिये। जीवन में ऐसे अनेक अवसर आते हैं जब हम अपने रहस्य और योजनायें दूसरों को यह कहते हुए बताते हैं कि ‘इसे गुप्त रखना’। यह हास्यास्पद है। सोचने वाली बात है कि जब हम अपने ही रहस्य और योजनायें गुप्त नहीं रख सकते तो दूसरे से क्या अपेक्षा कर सकते हैं।
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Wednesday, June 17, 2009

भक्ति के लिए नहाना ज़रूरी नहीं-आलेख

स्नातो या यदि वाऽस्नातः शुचिवां यदि वाऽशुचि।
विभूतिं विश्वरूपं च संस्मरन्सर्वदा शुचिः।
हिंदी में भावार्थ-
स्नान किया हो या न किया हो, देह पवित्र हो या अपवित्र पर जो मनुष्य परमात्मा के विश्वरूप का स्मरण करता है वह सदा ही पवित्र है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-परमात्मा की सच्चे हृदय से भक्ति करने से ही मन और देह को शांति मिलती है। अक्सर लोग यह कहते हैं कि स्नान आदि करके ही परमात्मा का स्मरण करना चाहिए। इसके अलावा अनेक भक्त मूर्तियों पर फूल और जल चढ़ाकर उसे ही सच्ची भक्ति मान लेते हैं। कई लोग तो केवल इसलिये भक्ति का वह तरीका अपना लेते हैं कि दूसरा भी ऐसा ही कर रहा है तो कुछ दूसरों को दिखाने के लिये कर्मकांड या हवन करते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि लोग कुछ अपने को तो कुछ दूसरों को दिखाने के लिये भक्ति करते हैं जबकि भक्ति, स्मरण और ध्यान हृदय से ही की जाना चाहिए।

आखिर यह कैसे पता चले कि हम भक्ति कर रहे हैं? जब हम परमात्मा का स्मरण या ध्यान कर रहे हों तब किसी अन्य बात का विचार हमारे अंदर न आये तब यह समझना चाहिये कि हम हृदय से भक्ति कर रहे हैं। यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि जब हम जब परमात्मा के निरंकार स्वरूप का स्मरण प्रारंभ करते हैं तब उनका कोई स्वरूप हमारे मस्तिष्क में रहता है। उस पर ध्यान केंद्रित करते समय शुरुआत में हमारे अंदर तमाम तरह के विचार आते हैं। उन्हें आने दीजिये। उनके आने से अपना ध्यान लगाना बंद मत कीजिये। दरअसल वह विचार एक विकार के रूप में हमारे अंदर रहते हैं। ध्यान लगाते हुए हमारे अंदर जो ज्ञानाग्नि प्रज्जवलित होती है वही विकार उसमें पूर्णाहति की तरह जलने आते हैं। जब दृढ़ता से अपने ध्यान में स्थिर रहेंगे तब धीरे धीरे अनुभव होगा कि हमारा ध्यान केवल भृकुटि पर ही केद्रित हो गया है और वहां हम आत्मिक रूप से केवल शून्य में स्थित हैं। यह ध्यान की सबसे रोचक और चरम स्थिति है।
स्मरण या ध्यान करने के बाद जब हम वापस लौटें तब हमें इस दुनियां में नवीनता का अनुभव हो तभी यह समझना चाहिए कि उसका लाभ हुआ है। शुरुआत में शायद ऐसा न लगे पर हम ध्यान, भक्ति और स्मरण के तत्काल बाद यह अनुभव करने का अभ्यास करें तो एसा लगने लगेगा कि ध्यान के बाद प्रतिदिन एकदम नवीन होता है।
वैसे तो ध्यान या स्मरण दैहिक स्वच्छता के बाद करना चाहिए पर स्वास्थ्य खराब होने के कारण यह किसी अन्य वजह से नहाना न हो पाये तब भी उतने ही उत्साह से ही भक्ति, स्मरण और ध्यान करना चाहिए। अगर अवकाश हो या समय मिल जाये तब चाहे जब ध्यान और स्मरण हो सकता है। जैसे दोपहर के खाने के बाद ऐसा लगता है कि कुछ देर ध्यान करना या कोई धार्मिक पुस्तक पुस्तक पढ़ना अच्छा रहेगा तो अपने विचार को इसलिये स्थगित न करें कि अस्वच्छ देह से ऐसा करना ठीक नहीं है। तात्पर्य यह है कि भक्ति, स्मरण और ध्यान में दृढता पूर्वक अपन हृदय लगाने का प्रयास करना चाहिए क्योंकि इससे मानसिक और वैचारिक तनाव कम होता है।
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Tuesday, June 16, 2009

भर्तृहरि शतक-आदमी मसखरा नहीं तो फिर राजा से उसका क्या प्रयोजन

स जातः कोऽप्यासीनमदनरिमुणा मूध्निं धवलं कपालं यस्योच्चैर्विनहितमलंकारविधये।
नृभिः प्राणत्राणप्रवणमतिभिः कैश्चिदधुना नमद्धिः कः पुंसामयमतुलदर्प ज्वर भरः।
हिंदी में भावार्थ-
महाराज भर्तृहरि कहते हैं कि भगवान शिव ने अपने अनेक खोपड़ियों की माला सजाकर अपने गले में डाल ली पर जिन मनुष्यों को अहंकार नहीं आया जिनके नरकंकालों से वह निकाली गयीं। अब तो यह हालत है कि अपनी रोजी रोटी के लिये नमस्कार करने वाले को देखकर उससे प्रतिष्ठित हुआ आदमी अहंकार के ज्वर का शिकार हो जाता है।
न नटा न विटा न गायकाः न च सभ्येतरवादचंचवः।
नृपमीक्षितुमत्र के वयं स्तनभारानमिता न योषितः।।
हिंदी में भावार्थ-
महाराज भर्तृहरि कहते हैं कि न तो हम नट हैं न गायक न असभ्य ढंग से बात करने वाले मसखरे और न हमारा सुंदर स्त्रियों से कोई संबंध है फिर हमें राजाओं से क्या लेना देना?
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जिसे देखो वही अहंकार में डूबा है। जिसने अधिक धन, उच्च पद और अपने आसपास असामाजिक तत्वों का डेरा जमा कर लिया वह अहंकार में फूलने लगता है। अपने स्वार्थ की वजह से सामने आये व्यक्ति को नमस्कार करते हुए देखकर कथित बड़े, प्रतिष्ठित और बाहूबली लोग फूल जाते हैं-उनको अहंकार का बुखार चढ़ता दिखाई देता है। यह तो गनीमत है कि भगवान ने जीवन के साथ उसके नष्ट होने का तत्व जोड़ दिया है वरना वह स्वयं चाहे कितने भी अवतार लेते ऐसे अहंकारियों को परास्त नहीं कर सकते थे।
अधिक धन, उच्च पद और बाहूबल वालों को राजा मानकर हर कोई उनसे संपर्क बढ़ाने के लिये आतुर रहता है। जिसके संपर्क बन गये वह सभी के सामने उसे गाता फिरता है। इस तरह के भ्रम वही लोग पालते हैं जो अज्ञानी है। सच बात तो यह है कि अगर न हम अभिनेता है न ही गायक और न ही मसखरी करने वाले जोकर और न ही हमारी सुंदर स्त्रियों से कोई जान पहचान तब आजकल के नये राजाओं से यह आशा करना व्यर्थ है कि वह हमसे संपर्क रखेंगे। बड़े और प्रतिष्ठित लोग केवल उन्हीं से संपर्क रखते हैं जिनसे उनको मनोरंजन या झूठा सम्मान मिलता है या फिर वह उनके लिये व्यसनों को उपलब्ध कराने वाले मध्यस्थ बनते हों। अगर इस तरह की कोई विशेष योग्यता हमारे अंदर नहीं है तो फिर बड़े लोगों से हमारा कोई प्रयोजन नहीं रह जाता।
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Monday, June 15, 2009

संत कबीर वाणी-पढ़ते हुए आदमी रोगी हो गया

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि
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पढ़त गुनत रोगी भया, बढ़ा बहुत अभिमान
भीतर ताप जू जगत का, घड़ी न पड़ती सान

पढ़ते और गुनते हुए आदमी का अभिमान बढ़ता गया। उसके अंतर्मन में जो तृष्णाओं और इच्छाओं की अग्नि जलती है उसके ताप से उसे मन में कभी शांति नहीं मिलती है।
हरि गुन गावे हरषि के, हिरदय कपट न जाय
आपन तो समुझै नहीं, औरहि ज्ञान सुनाय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि भगवान के भजन और गुण तो नाचते हुए गाते तो बहुत लोग हैं पर उनके हृदय से कपट नहीं जाता। इसलिये उनमे भक्ति भाव और ज्ञान नहीं होता परंतु वह दूसरों के सामने अपना केवल शाब्दिक ज्ञान बघारते है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-वर्तमान काल में शिक्षा का प्रचार प्रसार तो बहुत हुआ है पर अध्यात्मिक ज्ञान की कमी के कारण आदमी को मानसिक अशांति का शिकार हुआ है। वर्तमान काल में जो लोग भी शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं उनका उद्देश्य उससे नौकरी पाना ही होता है-उसमें रोजी रोटी प्राप्त करने के साधन ढूंढने का ज्ञान तो दिया जाता है पर अध्यात्म का ज्ञान न होने के कारण भटकाव आता है। बहुत कम लोग हैं जो शिक्षा प्राप्त कर नौकरी की तलाश नहीं करते-इनमें वह भी उसका उपयोग अपने निजी व्यवसायों में करते हैं। कुल मिलाकर शिक्षा का संबंध किसी न किसी प्रकार से रोजी रोटी से जुड़ा हुआ है। ऐसे में आदमी के पास सांसरिक ज्ञान तो बहुत हो जाता है पर अध्यात्मिक ज्ञान से वह शून्य रहता है। उस पर अगर किसी के पास धन है तो वह आजकल के कथित संतों की शरण में जाता है जो उस ज्ञान को बेचते हैं जिससे उनके आश्रमों और संस्थानों के अर्थतंत्र का संबल मिले। जिसे अध्यात्मिक ज्ञान से मनुष्य के मन को शांति मिल सकती है वह उसे इसलिये नहीं प्राप्त कर पाता क्योंकि वह अपनी इच्छाओं और आशाओं की अग्नि में जलता रहता है। कुछ पल इधर उधर गुजारने के बाद फिर वह उसी आग में आ जाता है।
जिन लोगों को वास्तव में शांति चाहिए उन्हें अपने प्राचीन ग्रंथों में आज भी प्रासंगिक साहित्य का अध्ययन करना चाहिए। यह अध्ययन स्वयं ही श्रद्धा पूर्वक करना चाहिए ताकि ज्ञान प्राप्त हो। हां, अगर उन्हें कोई योग्य गुरू इसके लिये मिल जाता है तो उससे ज्ञाना भी प्राप्त करना चाहिए। यह जरूरी नहीं है कि गुरु कोई गेहुंए वस्त्र पहने हुए संत हो। कई लोग ऐसे भी भक्त होते हैं और उनसे चर्चा करने से भी बहुत प्रकार का ज्ञान प्राप्त होता है। इसलिये सत्संग में जाते रहना चाहिये।
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Saturday, June 13, 2009

चाणक्य नीति-ईख में गुड़ की तरह ही आत्मा है देह में

वाचः शौचं च मनसः शौचन्द्रियनिग्रहः।
सर्वभूतिे दया शौचं एतच्छौत्रं पराऽर्थिनाम्।।
हिंदी में भावार्थ-
वाणी की पवित्रता, मन की स्वच्छता, इंन्द्रियों पर नियंत्रण, समस्त जीवों पर दया और भौतिक साधनों की शुद्धता ही वास्तव में धर्म है।
पुष्पे गंधं तिले तैलं काष्ठेऽग्निं पयसि घृतम्।।
इक्षौ गुडं तथा देहे पश्चाऽऽत्मानं विवेकतः।।
हिंदी में भावार्थ-
पुष्पों में सुंगध, तिल में तेल, लकड़ी में आग और ईख में गुड़ प्रकार विद्यमान होते हुए भी दिखाई नहीं देता वैसे ही शरीर में आत्मा का निवास है। इस बात को विवेकशील व्यक्ति ही समझ पाते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस विश्व में अनेक प्रकार के धर्म प्रचलन में आये हैं और हरेक में एक मध्यस्थ होता है जो उसका आशय समझाता है-आम आदमी उसकी बात पर ही यकीन कर लेता है। अनेक तरह की कहानियां सुनाकर लोगों की धार्मिक भावनाओं का दोहन किया जाता है। धर्म के नाम पर शांति की बात इसलिये की जाती है क्योंकि उसी के नाम पर सबसे अधिक झगड़े होते हैं। कहीं धार्मिक मध्यस्थ का प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ होता है तो कहीं उसका सामाजिक महत्व ही इस प्रकार का होता है उसे राज्य और समाज से अप्रत्यक्ष रूप में लाभ मिलता है। धर्म के आशय इतने बड़े कर दिये गये हैं कि लोगों को यही पता नहीं रह जाता कि वह क्या है?
धर्म का आशय है वाणी, मन और विचारों में शुद्धता होना साथ ही अपने नियमित कर्म मेें पवित्रता रखना। केवल मनुष्य ही नहीं सभी प्रकार के जीवों पर दया करना ही मनुष्य का धर्म है। शेष बातें तो केवल सामाजिक एवं जातीय समूह बनाकर शक्तिशाली लोग उन पर नियंत्रण बनाये रखने के लिये करते हैं।

अक्सर लोग आत्मा को लेकर भ्रमित रहते हैं। उनके लगता है कि अपनी इंद्रियों से जो सुनने, बोलने, देखने और खाने की क्रियायें हम कर रहे हैं। यह केवल एक संकीर्ण सोच है। यह हमारी देह है जिसकी समस्त इंद्रियां स्वतः इसलिये कर पाती हैं क्योंकि आत्मा उनको ऊर्जा देती है। वही आत्मा हम है। जिस तरह ईख (गन्ने) में गुड़ दिखाई नहीं देता उसी तरह आत्मा भी नहीं दिखाई देता। जिस तरह एक गन्ने को निचोड़कर उसमें से गुड़ निकालने पर दिखाई देता है इसलिये इं्रद्रियों पर नियंत्रण कर जब उनहें निचोड़ा जाये तभी वह आत्मा दिखाई देता है। ध्यान योगासन,प्राणायम और भक्ति भाव से जीवन गुजारना ही वह प्रक्रिया है जिससे अपने आत्मा का दर्शन किया जा सकता है।
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Thursday, June 11, 2009

संत कबीरदास वाणीः भौतिक विषयों के शिक्षक कभी अध्यात्मिक गुरु नहीं कहलाते (kabir ke dohe)

शब्द गुरु का शब्द है, काया का गुरु काय।
भक्ति करै नित शब्द की, सत्गुरु यौं समुझाय।।

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो गुरु जीवन रहस्यों का शब्द ज्ञान दे वही गुरु है। जो गुरु केवल भौतिक शिक्षा देता है उसे गुरु नहीं माना जा सकता। गुरु तो उसे ही कहा जा सकता है जो भगवान की भक्ति करने का तरीका बताता है।

पंख होत परबस पयों, सूआ के बुधि नांहि।
अंकिल बिहूना आदमी, यौ बंधा जग मांहि।।

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं बुद्धिमान पक्षी जिस तरह पंख होते हुए भी पिंजरे में फंस जाता है वैसे ही मनुष्य भी मोह माया के चक्क्र में फंसा रहता है जबकि उसकी बुद्धि में यह बात विद्यमान होती है कि यह सब मिथ्या है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-वर्तमान शिक्षा पद्धति में विद्यालयों और महाविद्यालयों में अनेक शिक्षक छात्रों को अपनी अपनी योग्यता के अनुसार पाठ्यक्रमों का अध्ययन कराते हैं पर उनको गुरु की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। वर्तमान शिक्षा के समस्त पाठयक्रम केवल छात्र को नौकरी या व्यवसाय से संबंधित प्रदान करने के लिये जिससे कि वह अपनी देह का भरण भोषण कर सके। अक्सर देखा जाता है कि उनकी तुलना कुछ विद्वान लोग प्राचीन गुरुओं से करने लगते हैं। यह गलत है क्योंकि भौतिक शिक्षा का मनुष्य के अध्यात्मिक ज्ञान से कोई संबंध नहीं होता।

उसी तरह देखा गया गया है कि अनेक शिक्षक योगासन, व्यायाम तथा देह को स्वस्थ रखने वाले उपाय सिखाते हैं परंतु उनको भी गुरुओं की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। हां, ध्यान और भक्ति के साथ इस जीवन के रहस्यों का ज्ञान देने वाले ही लोग गुरु कहलाते हैं। तात्पर्य यह है कि जिनसे अध्यात्मिक ज्ञान मिलता है उनको ही गुरु कहा जा सकता है। वैसे आजकल तत्वज्ञान का रटा लगाकर प्रवचन करने वाले भी गुरु बन जाते हैं पर उनको व्यापारिक गुरु ही कहा जाना चाहिये। सच्चा गुंरु वह है जो निष्काम और निष्प्रयोजन भाव से अपने शिष्य को अध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करता है।
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Wednesday, June 10, 2009

चाणक्य नीतिः अधिकारी कभी कामना रहित नहीं होता

निस्पृहो नाऽधिकारी स्यान्नाकामी मण्डनप्रियः।
नाऽविदग्धः प्रियं ब्रूयात् स्पष्टवक्ता न वंचकः।।

हिंदी में भावार्थ-अधिकारी कभी इच्छा और लोभ रहित, श्रृंगार का रसिक निष्काम, मूर्ख मधुरवाणी तथा स्पष्टवादी कभी धोखा देने वाला नहीं होता।
अभ्यासाद्धर्यते विद्या कुलं शीलेन धार्यते।
गुणेन ज्ञायते त्वार्यः कोपो नेत्रेण गम्यते।।
हिंदी में भावार्थ-
अभ्यास से ज्ञान और गुण और शील से कुलप्रतिष्ठा प्राप्त हो जाती है। मनुष्य अपने गुणों से पहचाना जाता है और उसका क्रोध नेत्रों से प्रकट होता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जहां किसी व्यक्ति को कोई अधिकार मिला है वहां वह लोभ और कामना रहित नहीं हो सकता। कहते हैं न कि ‘घोड़ा घास से यारी करेगा तो खायेगा क्या?‘ मनुष्य में अधिकार आने पर अहंकार आ ही जाता है। ऐसे विरले ही लोग होत हैं जो आत्मज्ञान से युक्त होने पर अधिकार आने पर पर लालची नहीं होते। सच बात तो यह है कि आदमी अपने कर्तव्य बोध से अधिक अपने अधिकार पर अहंकार करता है।
जहां मनुष्य अधिकारी है वहां इस बात को भूल जाता है कि उसका कर्तव्य क्या है? वह बस अधिकार की बात करता और सोचता है। अगर उसके साथ वह अपने कर्तव्य के निर्वहन का अभ्यास करे तो उसके अधिकार स्वतः बने रह सकते हैं पर इसके विपरीत वह बिना कर्तव्य के अधिकार चाहता है। इसी कारण वह अलोकप्रिय होता है। अपने कर्तव्य निर्वाह के अभ्यास करने पर जहां मनुष्य की लोक प्रतिष्ठा में वृद्धि होती है और न करने पर वह अपयश का भागी बनता है। विश्व में जितने भी महापुरुष हुए हैं उन्होंने लोक प्रतिष्ठा इसलिये अर्जित की क्योंकि उन्होंने अपने कर्तव्य निर्वहन का निरंतर अभ्यास किया। जहां केवल अपने लिये अधिकारों की लड़ाई होती है वहां लड़ाई झगड़े और वैमनस्य फैलता है। विश्व में जो हम इस समय तनाव का वातावरण देख रहे हैं उसका कारण यही है कि लोग अपने अधिकार की बात तो करते हैं पर कर्तव्य के विषय में खामोश हो जाते हैं। अगर अधिकारी अपने कर्तव्य निर्वहन के प्रति सजग हों तो ही परिवार, समाज और राष्ट्र में शांति रह सकती है।
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Tuesday, June 9, 2009

संत कबीर वाणीः सितारों की बैठक में चांद पाता है सम्मान

तारा मण्डल बैठि के, चांद बड़ाई खाय।
उदै भया जब सूर का, तब तारा छिपि जाय।।


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि आसमान में तारा मंडल में बैठकर चांद बढ़ाई प्राप्त करता है पर जैसे ही सूर्य नारायण का उदय होता है वैसे ही तारा मंडल और चंद्रमा छिप जाते हैं।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जहां अज्ञान होता है वह थोड़ा बहुत ज्ञान रट लेते हैं और उसी के सहारे प्रवचन कर अपने आपको विद्वान के रूप में प्रतिष्ठत करते हैं। आज के भौतिकतावादी युग में विज्ञापन की महिमा अपरंपार हो गयी है। इसने आदमी की चिंतन, मनन, अनुसंधान और अभिव्यक्ति क्षमता लगभग नष्ट कर दिया है। मनोरंजन के नाम पर लोग टीवी, अखबार तथा इंटरनेट पर सामग्री तलाशते हैं जो कि बाजार और विज्ञापन के सहारे ही हैं। इन विज्ञापनों में आदमी का सोच का अपहरण कर लिया है। उनकी सहायता करते हैं वह धार्मिक लोग जिनके पास रटा रटाया ज्ञान है और वह लोगों को तत्व ज्ञान से दूर रहकर केवल परमात्मा के स्वरूपों की कथायें मनोरंजन के रूप में सुनाकर भक्ति करवाते हैं।

सच बात तो यह है कि ज्ञान का सपूर्ण स्त्रोत है ‘श्रीमद्भागवत गीता’। पर हमारे कथित धार्मिक ज्ञानियों ने उसका केवल सन्यासियों के लिये अध्ययन करना उपयुक्त बताया है। यही कारण है कि काल्पनिक फिल्मों के नायक और नायिकाओं को देवता के रूप में प्रतिष्ठत कर दिया जाता है। लोग सत्संग की चर्चा की बजाय आपसी वार्तालाप में उनकी अदाओं और अभिनय की चर्चा करते हुए अपना खाली समय बिताना पसंद करते हैं। इन अभिनय को सितारा भी कहा जाता है-अब इन सितारों में कितनी अपनी रौशनी है यह समझा जा सकता है। वह लोग संवाद दूसरों को लिखे बोलते हैं। नाचते किसी दूसरे के इशारों पर हैं। हर दृश्य में उनके अभिनय के लिये कोई न कोई निर्देशक होता है।

उसी तरह ऐसे लोग भी समाज सेवी के रूप में प्रतिष्ठत हो जाते हैं जिनका उद्देश्य उसके नाम पर चंदा वसूल कर अपना धंधा करना होता है। इतना ही नहीं वह लोग महान लेखक बन जाते हैं जो भारतीय अध्यात्म के विपरीत लिखते हैं और जो उस पर निष्काम भाव से लिखते हैं उनको रूढि़वादी और पिछड़ा माना जाता है। कुल मिलाकर इस दुनियां में एक कृत्रिम दुनियां भी बना ली गयी है जो दिखती है पर होती नहीं है।
हमारे देश के लोगों को कथित आधुनिक विचारों के नाम पर ऐसे जाल में फंसाया गया है जिसमें चंद्रमा की तरह उधार की रौशनी लेकर अपनी शेखी स्वयं बघारने वाले ही सम्मान पाते हैं। इस जाल में वह लोग नहीं फंसते जो भारतीय अध्यात्म में वर्णित तत्व ज्ञान के पढ़, सुन और समझ कर धारण कर लेते हैं। भारतीय अध्यात्म ज्ञान तो सूर्य की तरह है जिसमें इस प्रथ्वी पर मौजूद हर चीज की सत्यता को समझा जा सकता है। यही कारण है कि व्यवसायिक कथित समाजसेवी, विद्वान, लेखक और संत उससे लोगों को परे रखने के लिये अपना सम्मान करने की अप्रत्यक्ष रूप से देते हैं।
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Monday, June 8, 2009

भर्तृहरि शतकः भक्ति में वणिकवृत्ति का त्याग करें (hindu dharm and thought on the money in hindi)

कि वेदैः स्मृतिभिः पुराणपठनैः शास्त्रेर्महाविस्तजैः स्वर्गग्रामकुटीनिवासफलदैः कर्मक्रियाविभ्रमैः।
मुक्त्वैकं भवदुःख भाररचना विध्वंसकालानलं स्वात्मानन्दपदप्रवेशकलनं शेषाः वणिगवृत्तयं:।।


हिंदी में भावार्थ- वेद, स्मुतियों और पुराणों का पढ़ने और किसी स्वर्ग नाम के गांव में निवास पाने के लये कर्मकांडों को निर्वाह करने से भ्रम पैदा होता है। जो परमात्मा संसार के दुःख और तनाव से मुक्ति दिला सकता है उसका स्मरण और भजन करना ही एकमात्र उपाय है शेष तो मनुष्य की व्यापारी बुद्धि का परिचायक है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य अपने जीवन यापन के लिये व्यापार करते हुए इतना व्यापारिक बुद्धि वाला हो जाता है कि वह भक्ति और भजन में भी सौदेबाजी करने लगता है और इसी कारण ही कर्मकांडों के मायाजाल में फंसता जाता है। कहा जाता है कि श्रीगीता चारों वेदों का सार संग्रह है और उसमें स्वर्ग में प्रीति उत्पन्न करने वाले वेद वाक्यों से दूर रहने का संदेश इसलिये ही दिया गया है कि लोग कर्मकांडों से लौकिक और परलौकिक सुख पाने के मोह में निष्काम भक्ति न भूल जायें।

वेद, पुराण और उपनिषद में विशाल ज्ञान संग्रह है और उनके अध्ययन करने से मतिभ्रम हो जाता है। यही कारण है कि सामान्य लोग अपने सांसरिक और परलौकिक हित के लिये एक नहीं अनेक उपाय करने लगते हंै। कथित ज्ञानी लोग उसकी कमजोर मानसिकता का लाभ उठाते हुए उससे अनेक प्रकार के यज्ञ और हवन कराने के साथ ही अपने लिये दान दक्षिणा वसूल करते हैं। दान के नाम किसी अन्य सुपात्र को देने की बजाय अपन ही हाथ उनके आगे बढ़ाते हैं। भक्त भी बौद्धिक भंवरजाल में फंसकर उनकी बात मानता चला जाता है। ऐसे कर्मकांडों का निर्वाह कर भक्त यह भ्रम पाल लेता है कि उसने अपना स्वर्ग के लिये टिकट आरक्षित करवा लिया।

यही कारण है कि कि सच्चे संत मनुष्य को निष्काम भक्ति और निष्प्रयोजन दया करने के लिये प्रेरित करते हैं। भ्रमजाल में फंसकर की गयी भक्ति से कोई लाभ नहीं होता। इसके विपरीत तनाव बढ़ता है। जब किसी यज्ञ या हवन से सांसरिक काम नहीं बनता तो मन में निराशा और क्रोध का भाव पैदा होता है जो कि शरीर के लिये हानिकारक होता है। जिस तरह किसी व्यापारी को हानि होने पर गुस्सा आता है वैसे ही भक्त को कर्मकांडों से लाभ नहीं होता तो उसका मन भक्ति और भजन से विरक्त हो जाता है। इसलिये भक्ति, भजन और साधना में वणिक बुद्धि का त्याग कर देना चाहिये।
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Saturday, June 6, 2009

चाणक्य नीतिःसतत अभ्यास है सफलता का मंत्र

जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्वते घटः।
स हेतु सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य चः।।
हिंदी में भावार्थ-
पानी की एक एक बूंद से जिस तरह घड़ा भर जाता है उसी प्रकार थोड़े से अभ्यास से सभी प्रकार विद्यायें, धार्मिक ज्ञान तथा धन प्राप्त किया जा सकता है।
नाहारं विच्तयेत् प्राज्ञो धर्ममेकं हि चिन्तयेत्।
आहारा हि मनुष्याणां जन्मना सह जायते।।
हिंदी में भावार्थ-
विद्वान को भोजन तथा अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति की चिंता छोड़कर केवल धर्म संग्रह की चिंता करना चाहिए क्योंकि परमात्मा ने दैहिक आवश्यकताओं की पूर्ति की व्यवस्था पहले ही कर दी है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जीवन में सफलता प्राप्त करने का कोई संक्षिप्त मार्ग नहीं है। जीवन में धीरज के साथ अपने कर्म करने के साथ ही ज्ञानार्जन का अभ्यास सतत करना ही सफलता का मंत्र है। संक्षिप्त मार्ग ढूंढने का आशय है अप्राकृतिक साधनों की तरफ आकर्षित होकर अपने लिये विपत्तियों का बुलाना। लोग एक दिन में ही लखपति और फिर करोड़पति बनना चाहते हैं। सच बात तो यह है कि अवैध या अपराधिक कार्यों में ही यह संभव है पर स्वच्छ और पवित्र व्यवसायों में तो धीरज के साथ ही उन्नति की तरफ बढ़ा जाता है। इस बात पर विचार कर सुख के साथ शांति पूर्वक जीवन की इच्छा करने वालों को अपने व्यवसाय और नौकरी के साथ ही अध्यात्मिक विषयों में भी रुचि लेना चाहिए।
इतना ही नहीं जीवन में परिश्रम से बचने का कोई प्रयास नहीं करना चाहिए। काम करने से ही आत्मविश्वास बढ़ता है और इसके लिये जरूरी है कि अपने प्रयास में नैतिकता और ईमानदारी बरतें। अपने व्यवसाय और अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्ति के कार्य के निरंतर अभ्यासरत रहने से उपलब्धियों प्राप्त होती हैं और इस पर विश्वास करना चाहिए।
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Thursday, June 4, 2009

संत कबीर वाणी-जादू टोने के चक्कर में मत पड़ो

जंत्र मंत्र सब झूठ है, मति भरमो जग कोय।
सार शब्द जानै बिना, कागा हंस न होय।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं जादू टोना और जंत्र मंत्र सब झूठ है और उनके चक्कर में मत पड़ो। शब्द ज्ञान के बिना कोई कौवा हंस नहीं हो सकता।
सार शब्द जानै बिना, जिव परलै में जाय।
काया माया थिर नहीं, शब्द लेहु अरथाय।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि शब्द ज्ञान के बिना इंसान प्रलय मे फंस जाता है। माया तो स्थिर नहीं है इसलिये शब्द से अर्थ लेना चाहिए-अर्थात इस तत्व ज्ञान को धारण कर लेना चाहिये कि यह संसार नश्वर है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-सप्ताह में सात दिन होते हैं और इनमें कुछ जंत्र मंत्र और जादू टोना करने वालों ने अपने लिये कर रखे हैं। खासतौर से मंगलवार, शनिवार और गुरुवार के दिनों में ऐसे कथित सिद्धों और फकीरों की दरबारों में भीड़ लगती है जो दावा करते हैं कि वह सभी का दर्द दूर कर देंगे। यह एक तरह का ढोंग है। यह संसार चक्र स्वतः ही चलता है और समयानुसार संकट आते और जाते हैं। किसी के जंत्र मंत्र या ताबीज से उनका दूर होने का मात्र भ्रम है और कुछ नहीं। ऐसे कथित के पास कोई सिद्धि नहीं होती और न ही उनके पास तत्वज्ञान होता है। वह इस आड़ में प्रत्यक्ष धनार्जन करते हैं या मुफ्त सेवा कर समाज में प्रभाव जमाते हुए अप्रत्यक्ष रूप से अपने हित साधते हैं।
बिना तत्वज्ञान के मनुष्य का उद्धार नहीं हो सकता। उसके बिना वह इस संसार में आने वाले उतार चढ़ाव को चमत्कार और संकट की तरह देखते हुए ऐसे ढोंगियों के यहां जाकर सिर झुकाता है जो स्वयं ही अज्ञान के अंधेरे में भटकते हुए मायावी संसार की समस्याओं को दूर करने का दावा करते हैं। अतः उनके पास जाने की बजाय सच्चे मन से भगवान की भक्ति करना चाहिये।
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Wednesday, June 3, 2009

चाणक्य नीति-अपने मुख में निंदात्मक शब्दों की खेती न करें

स जीवति गुणा यस्य धर्मः स जीवति।
गुणधर्मविहीनस्य जीवतं निष्प्रयोजनम्।।
हिंदी में भावार्थ-
नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि वही मनुष्य जीवित माना जाता है जिसमें गुण हों और उसने जीवन में धर्म धारण कर लिया है। गुण और धर्म के बिना मनुष्य का जीवन जीना व्यर्थ है।
यदीच्छसि वशीकर्तंु जगदेकेन कर्मणा।
परापवादसस्येभ्यो गां चरंन्तीं निवारथ।।
हिंदी में भावार्थ-
नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि यदि कोई मनुष्य अपने किसी एक काम से ही सारी पृथ्वी पर अपना नाम करना चाहता है तो बस दूसरों की निंदा त्याग दे। अपने मूंह में किसी दूसरे के प्रतिकूल लगने वाले शब्दों की खेती करना बंद कर देना चाहिए।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जिस मनुष्य में दूसरों को प्रभावित करने वाला गुण नहीं है और न ही उसका अपने स्वार्थ के अलावा कोई धर्म है वह जीवित होेते हुए भी मृतक समान है। अपने और परिवार का पेट तो सभी पालते हैं पर जो परोपकार करे वही सच्चा मनुष्य है।
मनुष्य का सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि वह स्वयं कोई धर्म या परोपकार किये बिना ही अपने को ज्ञानी और परोपकारी प्रमाणित करना चाहता है। इसके लिये वह दूसरों की निंदा करता है। अक्सर वार्तालाप में अज्ञानी लोग अपने मुख से दूसरे के लिये निंदात्मक शब्द कहकर यह साबित करते हैं कि अमुक दुर्गुण हमारे अंदर नहीं है या दूसरे के मुकाबले हमारे अंदर यह गुण है। देखा जाये तो इस विश्व में अधिकतर झगड़े इसी बात को लेकर होते हैं कि सभी अपने को श्रेष्ठ साबित करना चाहते हैं पर उसके लिये वह कोई सात्विक काम नहीं करना चाहते। ज्ञानी आदमी को किसी की न तो निंदा करना चाहिए न ही किसी में दोष देखना चाहिए। हो रहा है उल्टा! लोग एक दूसरे को नीचा बताते हुए आक्रामक रूप से अपनी श्रेष्ठता साबित करना चाहते हैं। सच बात तो यह है कि दूसरे के प्रति बुरा सोचना और बोलना अगर लोग कम कर दें तो पूरे विश्व में शांति स्वतः आ जाये।
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Sunday, May 31, 2009

तंबाकू निषिद्ध दिवस पर कबीर दास के दोहे-तंबाकू खाने वालों की बुद्धि भ्रष्ट होती है

भांग तमाखू छूतरा, आफू और सराब।
कौन करेगा बंदगी, य तो भये खराब।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो भांग, तम्बाकू छूतरा, अफीम तथा शराब जैसे नशीली वस्तुओं का सेवन करते हैं वह भ्रष्ट हैं। उनकी इज्जत कौन करेगा क्योंकि वह तो बेकार हो गये।
भांग भखै बल बुद्धि को, आफू अहमक होय।
दोय अमल औगुन कहा, ज्ञानवंत नर जाये।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं भांग खाने वाले व्यक्ति कि बुद्धि और दैहिक शक्ति नष्ट हो जाती है। अफीम खाने वाला मूर्ख हो जाता है। ज्ञानी लोगों ने इन दोनों पदार्थों के बहुत सारे अवगुण बताये हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-पश्चिमी चिकित्सा शास्त्रियों ने तंबाकू, भांग तथा शराब के अनेक दोष बताये हैं। उनके निष्कर्ष तो प्रयोगों पर आधारित होते हैं पर भारतीय विद्वानों ने इनके सेवन करने वालों के चरित्र देखकर यह निष्कर्ष बहुत निकाल लिया था कि इससे मनुष्य की शारीरिक और मानिसक शक्ति का क्षय होता है और धीरे धीरे इनका सेवन करने वाला कायरता, अज्ञानता और आलस्य जैसे विकारों का शिकार हो जाता है। पश्चिमी विशेषज्ञों ने तंबाकू को सेवन इतना खतरनाक माना है कि इसके उपयोग को निरुत्साहित करने के लिये बकायदा एक ‘तंबाकू निषिद्ध दिवस’ घोषित कर दिया है।
इस अवसर पर यह विचार अवश्य करना चाहिए कि जितना हो सके न केवल स्वयं तंबाकू सेवन से बचे बल्कि दूसरों को भी रोकें। वैसे आजकल पाउच के तंबाकू खाने का अधिक प्रचलन हो गया है क्योंकि लोग हाथ में लेकर घिसने की मेहनत से बचना चाहते हैं पर दूसरा यह भी सच है कि उसमें मिले रसायन सामान्य तंबाकू को अधिक खतरनाक बना देेते हैं। सामान्य तंबाकू वाले खाना खाकर उसके बुरे प्रभाव को कम कर लेते हैं पर पाउच खाने वाले तो एक तरह से उनका सेवन रोटी की तरह करते हैं और खाना वगैरह भी कम खाते हैं। विश्लेषणों ये पता लगता है कि युवा वर्ग में इन पाउच से अधिक बीमारिया हो रही है। इस पर प्रतिबंध की मांग सभी करते हैं पर सुनता कोई नहीं। इसका आशय यह नहीं कि सामान्य तंबाकू कोई कम खतरनाक होती है। उससे व्यक्ति का उच्च रक्तचाप बढ़ता है पर इन पाउच वाले तंबाकू को तो कभी खाने की सोचना भी नहीं चाहिए।
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Saturday, May 30, 2009

मनुस्मृति-नाचने-गाने, वाद्य यंत्र बजाने और बिना प्रयोजन कुतूहल से बचें

न कुर्वीत वृथा चेष्टां न वार्य´्जलिना पिबेत्।
नौत्संगे भक्षयेद् भक्ष्यानां जातु स्यात्कुतूहली।।
हिंदी में भावार्थ-
मनुमहाराज कहते हैं कि जिस कार्य को करने से अच्छा फल नहीं मिलता हो उसे करने का प्रयास व्यर्थ है। अंजली में भरकर पानी और गोद में रखकर भोजन करना ठीक नहीं नहीं है। बिना प्रयोजन का कौतूहल नहीं करना चाहिए।
न नृत्येन्नैव गायेन वादित्राणि वादयेत्।
नास्फीट च क्ष्वेडेन्न च रक्तो विरोधयेत्।।
हिंदी में भावार्थ-
मनुमहाराज कहते हैं कि नाचना गाना, वाद्य यंत्र बजाना ताल ठोंकना, दांत पीसकर बोलना ठीक नहीं और भावावेश में आकर गधे जैसा शब्द नहीं बोलना चाहिये।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जब आदमी तनाव रहित होता है तब वह कई ऐसे काम करता है जो उसकी देह और मन के लिये हितकर नहीं होते। लोग अपने उठने-बैठने, खाने-पीने, सोने-चलने और बोलने-हंसने पर ध्यान नहीं देते जबकि मनुमहाराज हमेशा सतर्क रहने का संदेश देते हैं। अक्सर लोग अपनी अंजली से पानी पीते हैं और बातचीत करते हुए खाना गोद में रख लेते हैं-यह गलत है।
जब से फिल्मों का अविष्कार हुआ है लोगों का न केवल काल्पनिक कुतूहल की तरफ रुझान बढ़ा है बल्कि वह उन पर चर्चा ऐसे करते हैं जैसे कि कोई सत्य घटना हो। फिल्मों की वजह से संगीत के नाम पर शोर के प्रति लोग आकर्षित होते हैं।
मनुमहाराज इनसे बचने का जो संदेश देते है उनके अनुसार नाचना, गाना, वाद्य यंत्र बजाना तथा गधे की आवाज जैसे शब्द बोलना अच्छा नहीं है। फिल्में देखना बुरा नहीं है पर उनकी कहानियों, अभिनेताओं, अभिनेत्रियों को देखकर कौतूहल का भाव पालन व्यर्थ है इससे आदमी का दिमाग जीवन की सच्चाईयों को सहने योग्य नहीं रह जाता।

नाचने गाने और वाद्य यंत्र बजाना या बजाते हुए सुनना अच्छा लगता है पर जब उनसे पृथक होते हैं तो उनका अभाव तनाव पैदा करता है। इसके अलावा अगर इस तरह का मनोरंजन जब व्यसन बन जाता है तब जीवन में अन्य आवश्यक कार्यों की तरफ आदमी का ध्यान नहीं जाता। लोग बातचीत में अक्सर अपना प्रभाव जमाने के लिये किसी अन्य का मजाक उड़ाते हुए बुरे स्वर में उसकी नकल करते हैं जो कि स्वयं उनकी छबि के लिये ठीक नहीं होता। कहने का तात्पर्य यह है कि उठने-बैठने और चलने फिरने के मामले में हमेशा स्वयं पर नियंत्रण करना चाहिए।
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Friday, May 29, 2009

विदुर नीतिः सज्जनों की याचना पर दुष्ट अपने को प्रसिद्ध मान लेते हैं

विद्यामदो धनमदस्तृतीयोऽभिजनो मदः।
मदा एतेऽवलिपतनामेत एवं सतां दमः।।
हिंदी में भावार्थ-
विद्या, धन, और ऊंचे कुल का मद अहंकार पुरुष के लिए तो व्यसन के समान है पर सज्जन पुरुषों के लिये वह शक्ति होता है।
असन्तोऽभ्यार्थितताः सद्भिः क्वचित्कायें कदाचन।
मन्यन्ते स्न्तमात्मानमसन्तमपि विश्रुतम्।
हिंदी में भावार्थ-
किसी विशेष कार्य के लिये जब कोई सज्जन पुरुष किसी दुष्ट से मदद की याचना करता है तो अपने को प्रसिद्ध दुष्ट जानते हुए वह अपने को सज्जन समझने लगते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-विश्व में असत्य (माया) के विस्तार के साथ धनाढ्य लोगों की संख्या के साथ आधुनिक शिक्षा से संपन्न बुद्धिमानों की संख्या भी बेतहाशा बढ़ रही है पर उसी अनुपात में अन्याय और हिंसा की वारदातों की संख्या भी बढ़ी है। वजह साफ है कि विद्या और धन वह शक्ति है जो किसी को भी भ्रमित कर सकती है। धन की प्रचुरता जिनके पास है वह उसकी शक्ति दिखाने के लिये ऐसे अनैतिक काम करते हैं जो एक सामान्य आदमी नहीं करता। उसी तरह जिन्होंने तकनीकी ज्ञान-जिसे विद्या भी कहा जाता है-प्राप्त कर लिया है उनमें बहुत कम ऐसे हैं जो उसका रचनात्मक उपयोग करते हैं। अधिकतर तो ऐसे हैं जो उसके सहारे दूसरे को हानि पहुंचाकर अपनी शक्ति दिखाना चाहते हैं। इंटरनेट पर बढ़ते अपराध और ठगी इसी का प्रमाण है कि शिक्षा या विद्या का अहंकार आदमी की बुद्धि भ्रष्ट कर देता है।
यही स्थिति दुष्ट लोगों की है। सज्जन लोगों का समूह नहीं बन पाता पर दुष्ट लोग जल्दी ही समूह बनाकर समाज में वर्चस्व स्थापित कर लेते हैं। वह ऐसी जगहों पर अपना दबदबा बना लेते हैं जहां सज्जन लोगों को अपने काम से जाना ही पड़ता है। ऐसे में दुष्ट लोगों से अपने काम के लिये वह सहायता की याचना करते हैं पर अपनी प्रसिद्धि के अहंकार में दुष्ट लोग उनको कीड़ा मकौड़ा मान लेते हैं। आप अगर प्रचार माध्यमों को देखें तो वह भी सज्जनों की सक्रियता पर कम दुष्ट लोगों की दुष्टता का प्रचार इस तरह करते हैं जैसे कि वह नायक हों। यही कारण है कि विश्व में अपराध और हिंसा का पैमाना दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है।
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Wednesday, May 27, 2009

विदुर नीतिः ‘क्षमा’ शक्तिशाली के लिए भूषण और निशक्त के लिये गुण है

एक क्षमवतां दोषो द्वितीयो नोपपद्यते।
यदेनं क्षमया युक्तशक्तं मन्यते जनः।।
सोऽस्य दोषो न मन्तव्यः क्षमा हि परमं यत्नम्।
क्षमा गुणो ह्यशक्तनां भूक्षणं क्षमा।।
हिंदी में भावार्थ-
जिस मनुष्य में क्षमा करने का गुण है उसका बस एक ही दोष है लोग उसे निशक्त और युक्ति रहित समझने लगते हैं। किन्तु यह समझना गलत है कि क्षमाशील पुरुष कमजोर या निशक्त हैं। क्षमा एक बहुत बड़ी ताकत है। क्षमा का गुण असमर्थ व्यक्ति के लिये गुण तथा शक्तिशाली के लिये भूषण है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-यह समझना गलत है कि असमर्थ पुरुष अगर क्षमाशील है तो फिर उसका वह गुण नहीं है। याद रखिये गरीब, बेसहारा और कमजोर की आह भी बहुत खतरनाक है। क्षमा का गुण केवल अमीरों और बाहुबलियों द्वारा ही धारण किया जाने वाला गुण नहीं है।
यह बात ठीक है कि क्षमा करने वाले को लोग कमजोर या डरपोक समझते हैं पर फिर भी इस गुण को छोड़ना नहीं चाहिए। अगर आप बाहुबली और धनी हैं तो क्षमा का गुण आपके लिये भूषण हैं पर आप कमजोर हैं और निर्धन हैं तो भी आपका यह गुण हैं। ऐसे में कोई बाहूबली या अमीर आपके प्रति अपराध करता है तो भी उसका हृदय से बुरा न चाहें-उसे बद्दुआ न दें-क्योंकि आह लगती है और दूसरे को सताने वाले को कभी न कभी दंड मिलता है भले ही कोई सांसरिक व्यक्ति यह काम न करें प्रकृत्ति स्वयं दंड प्रदान करती है।
बाहूबलियों ओर धनवानों पर माया का वरदहस्त होता है पर इससे वह संसार के ठेकेदार नहीं हो जाते-यह अलग बात है कि आजकल अनेक बाहुबली और अमीर इसी भ्रम में जीते हैं। उनको अपने से कमजोर और निर्धन के अपराध क्षमा करना चाहिये तभी वह समाज में सम्मान प्राप्त कर सकते हैं। इसके अगर कोई निर्धन या गरीब उनको अपने प्रति किये गये अपराध के लिये क्षमा प्रदान करता है तो उसे कमजोर या युक्तिरहित समझकर उसकी उपेक्षा नहीं करना चाहिए।
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Tuesday, May 26, 2009

भर्तृहरि शतकः लोग अपने शास्त्रों से विमुख हो गये हैं

पुरा विद्वत्तासीदुषशमतां क्लेशहेतये गता कालेनासौ विषयसुखसिद्धयै विषयिणाम्।
इदानीं सम्प्रेक्ष्य क्षितितलभुजः शास्त्रविमुखानहो कष्टं साऽप प्रतिदिनमधोऽधः प्रविशति।।
हिंदी में भावार्थ-
प्राचीन समय में विद्या वह लोग प्राप्त करते थे जो सांसरिक क्लेशों से मुक्त होकर मन की शांति चाहते थे। फिर यह विषयासक्त लोगों के लिये विषय और सुख का साधन बन गयी और अब तो राजा और प्रजा दोनों ही प्राचीन शास्त्रों से एकदम विमुख हो गये हैं। यही कारण है कि यह प्रथ्वी रसातल में जा रही है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-समय खराब हो गया है-अक्सर हम लोग यह कहते है। यह सब हमारा भ्रम है। जैसे जैसे हमारे ऋषि और मुनि सत्य की खोज कर प्रस्तुत करते गये हमारा समाज वेसे वैसे हमारा समाज माया की तरफ अग्रसर होते गये हैं। अक्सर हम लोग कहते हैं कि लार्ड मैकाले ने भारतीयों को गुलाम बनाने के लिये वर्तमान शिक्षा पद्धति का विकास किया पर सच तो यह है कि उसने तो केवल खाली जगह भरी है। हम लोग कहते हैं कि हमारे गुरुकुल काफी प्रभावी थे पर सच तो यह है कि वह सीमित रूप से शिक्षा प्रदान करने में समर्थ थे। इसके अलावा वहां सात्विक ज्ञान दिया जाता था। दैहिक ज्ञान भी उतना ही दिया जाता जितना किसी मनुष्य के जीवन में आवश्यक था। सत्य का ज्ञान प्राप्त कर अनेक लोग उसको धारण करते हुए जीवन शांति से व्यतीत करते थे पर इस मायावी संसार में समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग हवा में उड़ना चाहता था। वह विकास-जो विनाश का ही एक रूप है-उसे पाना चाहता था। सत्य स्थिर रहता है और माया दौड़ती है-आदमी का मन उसके साथ भागना चाहता है।
माया के गुलाम बनने को तत्पर इस समाज को लार्ड मैकाले ने ऐसी शिक्षा प्रणाली प्रदान की जो इस मायावी संसार में दौड़ने के लिये शक्ति प्रदान करती है। अतः यह कहना गलत है कि लार्ड मैकाले ने कोई हमारे समाज के प्रति अपराध किया था। डाक्टर, इंजीनियर,वकील,शिक्षक और प्रबंधक बनने की नौकरी की चाहत ने हमारे समाज को शास्त्रों से विमुख किया यह सोचना ही गलत है। सच तो यह है कि अपने धार्मिक ग्रंथों की कथाओं से ऊब चुके लोगों को चाहिये थी अब विदेशी कहानियां जिसमें आदमी रातो रात लखपति या राजा बन जाता है। हमारा समाज अपने सत्य ज्ञान से विमुख तो भर्तृहरि महाराज के समय में ही हो चुका था। अतः समाज का पतन कोई एक दिन में नहीं हुआ बल्कि यह तो पहले ही प्रारंभ हो चुका था।
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Saturday, May 23, 2009

भर्तृहरि शतकः मोहित आदमी को ज्ञान देना कठिन

लभेत सिकतासु तैलमपि यत्नतः पीडयन् पिबेच्च मृगतृष्णिकासु सलिलं पिपासार्दितः।
कदाचिदपि पर्यटंछशविषाणमासादयेत् न तु प्रतिनिविश्टमूर्खजनचित्तमाराधयेत्।।
हिंदी में भावार्थ-
अगर प्रयास करें तो यह संभव है कि रेत में से तेल निकल आये, मृगतृष्णा से ही मनुष्य अपने गले की प्यास शांत कर ले। यह भी संभव है कि ढूंढने से सींग वाले खरगोश मिल जायें। मगर यह संभव नहीं है कि मूर्ख व्यक्ति अगर किसी वस्तु या व्यक्ति पर मोहित हो गया है तो उसका ध्यान वहां से हटाया जा सके।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अगर किसी व्यक्ति में किसी वस्तु या व्यक्ति के प्रति मोह उत्पन्न हो जाये तो उसका ध्यान वहां से नहीं हटाया जा सकता। आशय यह है कि भौतिक पदार्थों पर मोहित होना मूर्खता का परिचायक है।
श्रीगीता के संदेश के अनुसार पूरा संसार त्रिगुणमयी माया के प्रभाव से मोहित हो रहा है। मन में यह भाव लाना कि ‘मैं कर्ता हूं’ मोह का प्रमाण है। ‘यह मेरा है’ और ‘मैं उसका हूं’ जैसे विचार मन में मौजूद मोह भाव का प्रमाण है।
अपने दैहिक कर्म से प्राप्त धन और प्रतिष्ठा को ही फल मान लेना मोह की चरम सीमा है। विचार करें कि हमें जब कहीं नौकरी या व्यवसाय से धन प्राप्त होता है उसका हम क्या करते हैं?
उस धन को हम परिवार के पालन पोषण के साथ सामाजिक दायित्वों के निर्वाह में ही व्यय करते हैं। अधिक धन है तो उसका संचय कर बैंक आदि में रख देते हैं। वहां उसका उपयोग दूसरे करते हैं। ऐसे में हमारे लिये वह फल कैसे हो सकता है।
फल है आत्मा की तृप्ति। आत्मा की तृप्ति तभी संभव है जब भक्ति, दान और परमार्थ करते हुए हम परमात्मा को इस बात का प्रमाण दें कि उसने हमारी आत्मा को जो देह प्रदान की उसका उपयोग हम उसके द्वारा निर्मित संसार के संचालन में निष्काम भाव से योगदान दे रहे हैं। हमारा पेट कोई दूसरा भर रहा है तो हम दूसरे को भी रोटी प्रदान करें न कि अपने लिये रोटी का जुगाड़ कर उसे फल मान लें।
इस मोह भाव से विरक्त होना आसान नहीं है। इस मूर्ख मन को कोई ज्ञानी भी भारी परिश्रम के बाद ही संभाल पाता है।
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Friday, May 22, 2009

विदुर नीति-सांसरिक सुख के छह प्रकार

आरोग्यमानृण्यमविप्रवासः सदिभर्मनुष्यैः सह सम्प्रभोग।
स्वर्पत्यया वृत्तिरभौतवासः यह जीवलोकस्यं सुखानि राजन्््।।
हिंदी में भावार्थ-
निरोगी काया, किसी का ऋण न होना, विदेश में न रहना, सज्जन लोगों से संपर्क, अपने दम पर ही जीविकोपार्जन और निडरता के साथ जीना-यह छह प्रकार के सुख हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-लोग भौतिक सुख और सुविधाओं के पीछे तो भागते हैं पर यह जानते ही नहीं कि सुख होता क्या है? यही कारण है कि वह सुख के नाम पर इतने भौतिक साधन जुटा लेते हैं कि उनमें से कई तो काम के ही नहीं रहते और कई दुःख का कारण भी बनते हैं। इस भागदौड़ में न उनकी मानसिक, शारीरिक तथा आर्थिक का ऊर्जा का क्षरण होता है बल्कि अध्यात्मिक साधना का समय ही नहीं मिल पाता और पूरा जीवन मानसिक तनाव में बीत जाता है।
सुख के बारे में निम्न प्रकार विचार करना चाहिए।
1. शरीर अगर स्वस्थ है तो उसके लिये किसी प्रकार की सुविधा की आवश्यकता नहीं है। जितना हो सके उससे काम लेना चाहिए। शरीर से पसीना निकलता है तो परवाह न करें वह शरीर में से निकलने वाली बीमारी है।
2.घर और शहर में रहते हुए ही अगर हमारा जीवन शांति से व्यतीत हो रहा है और आवश्यकताओं की पूर्ति हो रही है तो फिर यह सोचकर संतोष करना चाहिए कि हमें विदेश जाकर दूसरे लोगों की शरण नहीं लेनी पड़ी।
3.गुणवान, ज्ञानी और दयालू लोगों से निरंतर संपर्क होता है तो यह मान लेना चाहिए कि यह भी एक बहुत बड़ा सुख है। वरना तो आजकल सभी जगह अहंकारी, पाखंडी और काली नीयत वाले लोग मिलते हैं।
4.हमारे घर का खर्च अपने ही परिश्रम से चल रहा है तो समझ लें कि यह एक बहुत बड़ा सुख है और किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ रहा है। दूसरे के सामने हाथ फैलाना मृत्यु के समान हैं।
5.किसी का ऋण नहीं होना भी एक बहुत बड़ा सुख है। इस बात की चिंता नहीं होती कि किसी का पैसा देना है और उसे जुटाने का प्रयास करने की आवश्यकता नहीं हैं।
6. जहां हम रह रहे हैं वहां किसी प्रकार का भय नहीं है यह भी एक बहुत बड़ा सुख है। अपने रोजगार के लिये किसी ऐसे स्थान पर नहीं जाना पड़ रहा है जहां हमारे लिये लिये दैहिक या मानसिक प्रताड़ना की आशंका है-इस बात पर संतोष करना चाहिए।
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Thursday, May 21, 2009

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-बंधु बांधव उपभोग न कर सकें उस धन का क्या लाभ?

लक्षम्या लक्ष्मीवतां लोके विकाशिन्या च किन्तवा।
बंधुभिश्च सुहृद्धिश्च मित्रवधं व न भुज्यते।।
हिन्दी में भावार्थ-
संसार में उस धनपति का धन का क्या लाभ जो उसके बंधु और सहृदयजन उपभोग न कर सकें।
श्लाभ्या चानन्दनीया च महातामुपाकारिता।
काले कल्याणमाघत्ते स्वल्पापि सुमहोदयम्।।
हिंदी में भावार्थ-
बड़े और महान पुरुषों का उपकार करना आनंदमय होता है। उनका थोड़ा भी कल्याण करना महान उदय का कारण बनता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-संसार में अनेक धनी है पर सभी को सम्मान नहीं प्राप्त होता जैसी कि वह अपेक्षा करते हैं। किसी मनुष्य के पास धन की प्रचुरता हो और वह उसे व्यय करने संकोच करता है तो उसे कंजूस कहा जाता है। धन की महत्ता दान से है। अगर कोई व्यक्ति धनी है पर इसका लाभ उसके परिवार, मित्रों और बंधुओं को नहीं मिलता तो फिर उसे समाज में सम्मान की आशा नहीं करना चाहिए। वैसे भी धनियों के सामने दिखाने के लिये उनका सम्मान हर कोई इस आशा करता है कि भविष्य में शायद कोई लाभ हो? हां, अगर यह निश्चित हो जाये कि वह धनी किसी भी हालत में सहायता करने वाला या दान देने वाला नहीं है तो फिर उसकी मूंह पर भी कोई प्रशंसा नहीं करता।
समाज को बौद्धिक सहायता करने वाले ज्ञानियों की मदद करना कभी निरर्थक नहीं जाता। वह अपने ज्ञान और शिक्षा से समाज की पीढ़ियों तक ज्ञान गंगा बहाने का सामथ्र्य रखते हैं। ऐसे निष्काम और निष्कपट महान लोगों की सहायत कर समाज स्वयं को कृतकृत्य समझना चाहिए। जिन समाजों में ज्ञानियों को आर्थिक, सामाजिक और नैतिक संरक्षण प्रदान नहीं किया जाता वह बहुत जल्दी पतन को प्राप्त होते हैं।
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Wednesday, May 20, 2009

चाणक्य नीतिः गुस्सा अपनी ताकत के अनुसार ही करें

सुसिद्धमौषधं धर्म गृहच्द्रिं मैथुनम्।
कुभुक्तं कुश्रुतं चैव मतिमान्न प्रकाशयेत्।।
हिंदी मे भावार्थ-
बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिऐ कि वह छह बातें किसी को भी न बताये। यह हैं अपनी सिद्ध औषधि, धार्मिक कृत्य, अपने घर के दोष, संभोग, कुभोजन तथा निंदा करने वाली बातें।
प्रस्तावसदृशं वाक्यं प्रभावसदृशं पिय्रम!
आत्मशक्तिसमं कोपं यो जानाति स पण्डितः।
हिंदी में भावार्थ-
जैसा प्रस्ताव देखें उसी के अनुसार प्रभावपूर्ण विचार मधुर वाणी में व्यक्त करे और अपनी शक्ति के अनुसार ही क्रोध करे वही सच्चा ज्ञानी है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-नीति विशारद चाणक्य के अनुसार मनुष्य को अपने जीवन में वाक्पटु होना चाहिये। समय के अनुसार ही किसी विषय को महत्व को देखते हुए अपना विचार व्यक्त करना चाहिए। इतना ही नहीं किसी विषय पर सोच समझ कर प्रिय वचनों में अपना बात रखना चाहिए। इसके अलावा अपने पास किसी सिद्ध औषधि का ज्ञान हो तो उसे सभी के सामने अनावश्यक रूप से व्यक्त करना ठीक नहीं है। अपने घर के दोष, तथा स्त्री के साथ समागम की बातें सार्वजनिक रूप से नहीं करना चाहिए। इसके अलावा जो भोजन अच्छा नहीं है उसके खाने का विचार तक अपने मन में न लाना ही ठीक है-दूसरे के सामने प्रकट करने से सदैव बचना चाहिए। किसी भी प्रकार के निंदा वाक्य किसी के बारे में नहीं कहना चाहिये।

अगर इतिहास देखा जाये तो वही विद्वान समाज में सम्मान प्राप्त कर सके हैं जिन्होंने समय समय पर कठिन से कठिन विषय पर अपनी बात इस तरह सभी लोगों के के सामने रखी जिसके प्रभाव से न केवल उनका बल्कि दूसरा समाज भी लाभान्वित हुआ। अधिक क्रोध अच्छा नहीं है और जब किसी के बात पर अपना दिमाग गर्म हो तो इस बात का भी ख्याल करना चाहिए कि अपने क्रोध के अनुसार संघर्ष करने की हमारी क्षमता कितनी है। अविवेकपूर्ण निर्णय न केवल हमारे उद्देश्यों की पूर्ति बाधक होते हैं बल्कि उनसे समाज में प्रतिष्ठा का भी हृास होता है।
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Monday, May 18, 2009

चाणक्य नीतिः नीम के वृक्ष को घी और दूध से सींचा जाये तो भी मधुर नहीं होता

गृहाऽसक्तस्य नो विद्या नो दया मांसभोजिनंः।
द्रव्ययालुब्धस्य नो सत्यं स्त्रेणस्य न पवित्रता।
हिंदी में भावार्थ-
नीति विशारद चाणक्य महाराज के मतानुसार जिसकी घर में आसक्ति अधिक है उसे कभी विद्या प्राप्त नहीं होती। मांस का सेवन करने वाले में कभी दया नहीं होती। जिसके मन में धन का लोभ है वह कभी सत्य की सहायता नहीं लेता। दुराचारी, व्याभिचारी तथा भोग विलास वाले व्यक्ति से पवित्रता की आशा करना व्यर्थ है।
न दुर्जनः साधुदशामुपैति बहुप्रकारैरपि शिक्ष्यमाणः।
आमूलसिक्तः पया घृतेन न निम्बवृक्षो मधुरत्वमेति।।
हिंदी में भावार्थ-
दुर्जन व्यक्ति को कितना भी प्रेम से समझाया जाये पर वह किसी भी हालत में सज्जन भाव को प्राप्त नहीं होता, जैसे नीम का वृक्ष दूध और घी से सींचा जाये पर उसमें मधुरता नहीं आती।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-नीति विशारद चाणक्य महाराज कहते हैं कि जिस व्यक्ति को अपने घर के मामलों में अधिक रुचि है वह कोई अन्य विद्या या ज्ञान नहीं प्राप्त कर सकता।
मांसाहार के विषय में अनेक प्रकार की बहस होती है। अब तो यह पश्चिमी स्वास्थ्य और मनोचिकित्सक भी मानने लगे है कि मांसाहार से व्यक्ति में हिंसा की प्रवृ त्ति आती है। भारतीय अध्यात्मिक संदेश भी यही कहता है कि मनुष्य देह पंचतत्वों से बनी है और उनके गुणों के प्रभाव से ही उसका संचालन होता है। इसका सीधा आशय यह कि जिस तरह का खानपान मनुष्य ग्रहण करेगा उसके गुण दोषों के अनुसार ही उसकी सोच का निर्माण होगा। अगर मनुष्य सात्विक भोजन ग्रहण करेगा तो उसमें स्वाभाविक रूप से दया, प्रेम और अहिंसा के भाव आयेंगे। यदि वह तामसिक पदार्थों का भक्षण और सेवन करेगा तो उसकी मूल प्रवृत्ति में क्रोध, हिंसा और घृणा के भाव स्वयं ही आयेंगे। इस विषय में किसी तर्क वितर्क की गुंजायश नहीं है भले ही कहने वाले कुछ भी कहते रहें। जैसे गुण हम बाहर से अपने अंदर ग्रहण करेंगे वैसे ही बाहर विसर्जन भी होगा।
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Sunday, May 17, 2009

मनु स्मृति: ज्ञान के बिना मन पर नियंत्रण संभव नहीं

नीति विशारद मनु महाराज कहते हैं कि
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वशे कृत्वेन्दिियग्रामं संयम्य च मनस्तथा।
सर्वान्संसाधयेर्थानिक्षण्वन् योगतस्तनुम्।।

हिंदी में भावार्थ-मनुष्य के लिये यही श्रेयस्कर है कि वह अपने मन और इंद्रियों पर नियंत्रण रखे जिससे धर्म,अर्थ,काम तथा मोक्ष चारों प्रकार का लक्ष्य प्राप्त किया जा सके।
न तथैंतानि शक्यन्ते सन्नियंतुमसेवया।
विषयेषु प्रजुष्टानि यथा ज्ञानेन नित्यशः

हिन्दी में भावार्थ-जब तक इंद्रियों और विषयों के बारे में जानकारी नहीं है तब तब उन पर निंयत्रण नहीं किया जा सका। इंद्रियों पर नियंत्रण करना कोई आसान काम नहीं है। इसके लिये यह आवश्यक है कि विषयों की हानियों और दोषों पर विचार किया जाये।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इंद्रियों पर नियंत्रण और विषयों से परे रहने का संदेश देना आसान है पर स्वयं उस पर नियंत्रण करना कोई आसान काम नहीं है। आप चाहें तो पूरे देश में ऐसे धार्मिक मठाधीशों को देख सकते हैं जो श्रीगीता का ज्ञान देते हुए निष्काम भाव से कर्म करने का संदेश देते हैं पर वही अपने प्रवचन कार्यक्रमों के लिये धार्मिक लोगों से सौदेबाजी करते हैं। लोगों को सादगी का उपदेश देने वाले ऐसे धर्म विशेषज्ञ अपने फाइव स्टार आश्रमों से बाहर निकलते हैं तो वहां भी ऐसी ही सुविधायें मांगते हैं। देह को नष्ट और आत्मा को अमर बताने वाले ऐसे लोग स्वयं ही नहीं जानते कि इंद्रियों पर नियंत्रण करते हुए विषयों से परे कैसे रहा जाता है। उनके लिये धार्मिक संदेश नारों की तरह होते हैं जिसे वह लगाये जाते हैं।
दरअसल ऐसे लोगों से शास्त्रों से अपने स्वार्थ के अनुसार संदेश रट लिये हैं पर वह इंद्रियों और विषयों के मूलतत्वों को नहीं जानते। इंद्रियों पर नियंत्रण तभी किया जा सकता है जब विषयों से परे रहा जाये। यह तभी संभव है जब उसके दोषों को समझा जाये। वरना तो दूसरा कहता जाये और हम सुनते जायें। ढाक के तीन पात। सत्संग सुनने के बाद घूम फिरकर इस साँसससिक दुनियां में आकर फिर अज्ञानी होकर जीवन व्यतीत करें तो उससे क्या लाभ?
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Saturday, May 16, 2009

विदुर नीतिः धर्म का संचय हमेशा करें

उत्सृत्न्य विनिवर्तन्ते ज्ञातयः सह्दः सुताः।
अपुष्पानफलान् वृक्षान् यथातत पतित्रणः।।
हिंदी में भावार्थ-
जिस तरह फल और फूल से हीन वृक्ष को पक्षी त्याग कर चले जाते हैं वैसे इस शरीर से आत्मा निकल जाने पर उसे जाति वाले, सहृदय और पुत्र चिता में छोड़कर लौट जाते हैं।
अग्नी प्रास्तं पुरुषं कर्मान्वेति स्वयंकृतम्।
तस्मातु पुरुषो यत्नाद् धर्म संचितनुयाच्छनैः।।
हिंदी में भावार्थ-
इस देह के अग्नि में जलकर राख हो जाने के बाद मनुष्य का अच्छा और बुरा कर्म ही उसके साथ जाता है अतः जितना हो सके धर्म के संचय का प्रयत्न करें।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस देह को लेकर अभिमान पालना व्यर्थ है। एक न एक दिन इसे नष्ट होना है। इस देह से बने जाति, धर्म, परिवार और समाज के रिश्ते तभी तक अस्तित्व में हैं जब तक यह इस धरती पर विचरण करती है। मनुष्य मोहपाश में फंसकर उनको ही सत्य समझने लगता है। इसमें मेहमान की तरह स्थित आत्मा का कोई सम्मान नहीं करता जिसकी वजह से यह देह रूपी शरीर प्रकाशमान है।
आपने देखा होगा कि आजकल हर जगह विवाहों के लिये बहुत सारी इमारतें बनी हुईं हैं। वहां जिस दिन कोई वैवाहिक कार्यक्रम होता है उस दिन वह रौशनी से जगमगाता है। जब विवाह कार्यक्रम नहीं होता उस दिन वहां अंधेरा रहता है। यह विचार करना चाहिये कि जब उस इमारत में बिजली और उससे चलने वाले उपकरण तथा सजावट का सामान हमेशा विद्यमान रहता है तब क्यों नहीं उसे हमेशा रौशन किया जाता? स्पष्ट है कि विवाह स्थलों के मालिक विवाह कार्यक्रम के आयोजकों से धन लेते हैं और इसी कारण वहां उस स्थान पर रौशनी की चकाचौंध रहती है। आयोजक भी धन क्यों देता है? उसके रिश्तेदार, मित्र और परिवार के लोग उस कार्यक्रम में शामिल होते हैं। अगर दूल्हा दुल्हन के माता पिता अकेले ही विवाह कार्यक्रम करें तो उनको व्यय करने की आवश्यकता ही नहीं पर तब ऐसे विवाह स्थल जगमगा नहीं सकते। तात्पर्य यह है कि मेहमानों की वजह से ही वहां सारी सजावट होती है। जब सभी चले जाते हैं तब वहां सन्नाटा छा जाता है। यही स्थिति इस देह में विद्यमान आत्मा की है। यह देह तो बनी यहां मौजूद पंच तत्वों से ही है पर उसको प्रकाशमान करने वाला आत्मा है। इस सत्य को पहचानते हुए हमें अपने जीवन में धर्म का संचय करना चाहिये। हमारे अच्छे काम ही इस आत्मा को तृप्त करते हैं।
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Thursday, May 14, 2009

विदुर नीतिः अपने मन के भावों से बनता है दृष्टिकोण

द्वेषो न साधुर्भवति न मेधावी न पण्डित।
प्रिये शुभानि कार्याणि द्वेष्ये पापानि चैव ह।।
हिंदी में भावार्थ-
मनुष्य के हृदय में अगर किसी के प्रति द्वेष भाव का निर्माण होता है तो-भले ही वह साधु या विद्वान हो-उसमें दोष ही दोष दिखाई देते हैं। उसी तरह अगर किसी के प्रति स्नेह या प्रेम पैदा हो तो-चाहे भले ही वह दुष्ट और पापी हो- उसमें गुण ही गुण दिखाई देते हैं।
न वृद्धिबंहु मन्तव्या या वृद्धि क्षयमावहेत्।
क्षयोऽपि बहु मन्तव्यो यः क्षयो वृद्धिमावहेत्।।
हिंदी में भावार्थ-
जो विकास या वृद्धि अपने लिये भविष्य में घातक होने होने की आशंका हो उससे अधिक महत्व नहीं देना चाहिये। साथ ही अगर ऐसा पतन या कमी हो रही हो जिससे हमारा अभ्युदय होने की संभावना है तो उसका स्वागत करना चाहिये।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-एक दृष्टा की तरह अगर हम अपने भौतिक स्वरूप देह का अवलोकन करें तो पायेंगे कि सारी दुनियां के प्राणी एक समान हैं पर कुछ लोग ऐसे हैं जिनके प्रति हमारे मन में प्यार या स्नेह होता है उनके दोषों पर हमारा ध्यान नहीं जाता। उसी तरह जिनके प्रति द्वेष या नाराजी है उनमें कोई गुण हमें दिखाई नहीं देता-कभी कभी ऐसा होता है कि उनका कोई गुण हमारे दिमाग में आता भी है तो उसे अपने चिंतन से जबरन दूर हटाने का प्रयास करते हैं। कहने का तात्पर्य है कि हमारा मन और मस्तिष्क हमारी पूरी देह पर नियंत्रण किये रहता है। इसका आभास तभी हो सकता है जब योग साधना और ध्यान के द्वारा हम अपने अंदर बैठे दृष्टा के दृष्टिकोण को आत्मसात करें।
नीति विशारद विदुर यह भी कहते हैं कि हमें अपने आसपास हो रहे भौतिक तत्वों में विकास या वृद्धि बहुत अच्छी लगती है पर उनमें से कुछ ऐसे भी हो सकते हैं जो भविष्य में हमारे लिये घातक हों उसी तरह उनमें पतन या कमी ऐसी भी हा सकती है जो अच्छा परिणाम देने वाली हो। अतः अपने अंदर समबुद्धिरूप से विचार करने की शक्ति विकसित करना चाहिये।
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Wednesday, May 13, 2009

मनुस्मृति-स्त्री को अपनी शक्ति पर ही मिलती है सुरक्षा

न कश्चिद्योषितः शक्तः प्रसहय परिक्षितुम्।
एतैरुपाययोगैस्तु शक्यास्ताः परिरिक्षितम्।।
हिंदी में भावार्थ-
कोई भी पुरुष स्त्री को बलपूर्वक अनुचित कार्य करने से रोक नहीं सकता। उसके पास बस यही उपाय है कि वह स्त्री को केवल समझाये। तात्पर्य यह है कि स्त्री को किसी काम से रोकने के लिये शारीरिक प्रताड़ना की बजाय प्यार से समझाया जा सकता है और वह इतनी सहृदय होती है कि प्रेम से कही गयी बात को सहजता से समझ लेती हैं।
अरक्षिता गृहे रुद्धाः पुरुषैराताकरिभिः।
आत्मानमात्मना वास्तु रक्षेयुस्तः सुरक्षिताः।।
हिन्दी में भावार्थ-
जिन स्त्रियों को सज्जन पुरुष का सानिध्य प्राप्त है वह उस घर में सुरक्षित हैं। वह स्त्रियां अधिक सुरक्षित हैं जो अपनी रक्षा स्वयं करती हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जब भी स्त्रियों की रक्षा की बात आती है तो तमाम तरह के तर्क दिये जाते हैं। इस संबंध में मनुमहाराज का कहना है कि जो स्त्रियां सज्जन पुरुषों के घर में रहती हैं उनको तो स्वाभाविक रूप से सुरक्षा प्राप्त हैं पर अंततः स्त्रियों को अपनी रक्षा अपनी शक्ति और बुद्धि से ही प्राप्त होती है। प्रायः देखा गया है कि पुरुष पहले प्रेमजाल में स्त्री को फंसा लेता है फिर उसका दैहिक और आर्थिक शोषण करता है। जहां भी स्त्री संकट में आती है वह अपनी सादगी या लालच के कारण आती है। कोई अनजान पुरुष आमतौर से स्त्री पर हमला नहीं करता। आंकड़े इस बात का प्रमाण है कि स्त्रियां अपनो का ही शिकार बनती हैं। शायद यही कारण है कि मनु महाराज भी इस बात को मानते हैं कि स्त्री को अपने विवेक, बुद्धि और चतुराई से अपनी रक्षा करना चाहिये।
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Tuesday, May 12, 2009

विदुर नीतिः धन कभी बुद्धि और दरिद्रता बुद्धिहीनता का प्रमाण नहीं होती

न बुद्धिर्धनलाभाय न जाह्यमसद्धये।
लोकपर्यावृतांत प्राज्ञो जानाति नेतरः।।
हिंदी में भावार्थ-
धन केवल बुद्धि से ही प्राप्त होता है या मूर्खता के कारण आदमी दरिद्र रहता है, ऐसा कोई नियम नहीं है। इस संसार के नियमों को केवल विद्वान पुरुष ही जानते हैं।
असंविभागो दुष्टात्मा कृतघ्नो निरपत्रपः।
तादृंनारिधपो लोके वर्जनीवो नारधिपः।।
हिंदी में भावार्थ-
अपने व्यक्ति अपने आश्रितां में अपनी धन संपत्ति को ठीक से बंटवारा नहंी कर तो दुष्ट कृतघ्न और निर्लज्ज है उसे इस लोक में त्याग देना चाहिए।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जिन लोगों के पास धन नहीं है या अल्पमात्रा में है उन्हें धनवान लोग मूर्ख और अज्ञानी मानते हैं। अक्सर धनवाल लोग कहते हैं कि ‘अक्ल की कमी के कारण लोग गरीब होते हैं।’

उनका यह तर्क गलत और बेहूदा है। अगर ऐसा है तो अनेक धनवान गरीब क्यों हो जाते हैं? जिनके पास धन और संपत्ति विपुल मात्रा में वह अपने व्यवसाय में हानि उठाने या अपने बच्चों की गलत संगत के कारण उनके द्वारा किये जा रहे अपव्यय के से संकटग्रस्त हो जाने से निर्धनता को प्राप्त हो जाते हैं। तब उनके बारे में क्या यह कहना चाहिये कि ‘वह अक्ल के कारण ही अमीर हुए और अब उसके न रहने से गरीब हो गये।’ या ‘अब धन नहीं है तो उनके पास अक्ल भी नहीं होगी।’

कहने का तात्पर्य है कि यह धारणा भ्रांत है कि बुद्धि या अक्ल के कारण कोई अमीर या गरीब बनता है। संसार का अपना एक चक्र है। शाश्वत सत्य कभी नहीं बदलता पर माया तो महाठगिनी है। आज इस घर में सुशोभित है तो कल वह किसी दूसरे दरवाजे पर जायेगी। लक्ष्मी के नाम का एक पर्यायवाची शब्द ‘चंचला’ भी है। वह हमेशा भ्रमण करती हैं। अतः हमेशा ही अमीरों को बुद्धिमान और गरीबों को बुद्धिहीन मानने वालों को अपने विचार बदलना चाहिए।
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Sunday, May 10, 2009

श्री गुरु ग्रंथ साहिब से-जिसके मन में भ्रम नहीं है वह निडर हो जाता है

‘‘जाकै बिनसिउ मन ते भरमा।
ताकै कछु नाहीं डर जमा।।’’
हिंदी में भावार्थ-
श्री गुरुग्रंथ साहिब के अनुसार जिस मनुष्य के मन में कोई भ्रम नहीं रहता उसे मौत का भी डर नहीं रहता।
‘‘मनि मैले सभ किछु मैला तनि धोतै मनु हछा न होइ।‘
हिंदी में भावार्थ-
श्री गुरुग्रंथ साहिब के अनुसार जिस मनुष्य के मन में कुविचार और मैल है वह पूरी तरह से स्वयं ही मैला है। चाहे कितना भी वह तन धो ले पर उसका पवित्र नहीं होगा।
‘मनि जीतै जगु जीतु।‘
हिंदी में भावार्थ
-श्री गुरुग्रंथ साहिब के अनुसार जिसने मन जीत लिया उसे सारा जग ही जीत लिया।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-हमारे अध्यात्म दर्शन में मनुष्य को मन का पंछी बताया जाता है। सच तो यह है कि मनुष्य एक आत्मा है पर देह में स्थित मन उसकी बुद्धि को अपने होने का आभास देता है। इस त्रिगुणमयी माया में मनुष्य का मन उसे इस तरह फंसाये रहता है कि उसकी बुद्धि को वही सच लगता है।
देह का अस्तित्व आत्मा से है पर मन उसे पशु की तरह हांकता चला जाता है और मनुष्य बुद्धि में यह अहसास तक नहीं होता। मन कभी साफ नहीं होता जब तक अध्यात्मिक ज्ञान या भक्ति से आदमी अपनी बुद्धि, मन और अहंकार पर नियंत्रण कर ले। लालच,लोभ,क्रोध और मोह के जाल में फंसा मनुष्य अपना अस्तित्व उस मन से ही अनुभव करता है जो कि उसकी देह का हिस्सा है। अगर कोई मनुष्य ईश्वर की भक्ति दृढ़ भाव से करे तो उसकी बुद्धि स्थिर हो जायेगी और फिर मन काबू में आयेगा। काबू में आने पर ही उसमें शुद्धता लायी जा सकती है वरना तो वह मनुष्य देह में मौजूद अहंकार को बढ़ाकर उसके बंधन में मनुष्य का बांध देता है और फिर पशु की तरह हांकता चला जाता है-मनुष्य को यही भ्रम रहता है कि मैं चल रहा हूं। इस प्रकार के भ्रम पर भक्ति और ज्ञान से विजय पायी जा सकती है अन्यथा नहीं।
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Saturday, May 9, 2009

चाणक्य नीति-दूसरों की विपत्ति पर प्रसन्न होने वाले दुष्ट होते हैं

हस्ती अंकुशमात्रेण वाजी हस्तेन ताडयते।
श्रृङगी लगुडहस्तेन खङगहस्तेन दुर्जनः।।
हिंदी में भावार्थ-
जिस तरह अंकुश से हाथी तथा चाबुक से घोड़ा, बैल तथा अन्य पशु नियंत्रित किये जाते हैं वैसे ही दुष्ट से निपटने के लिये खड्ग हाथ में लेना ही पड़ता है।
तुष्यन्ति भोजने विप्रा मयूरा धनगर्जिते।
साधवः परसम्पतिौ खलः परविपत्तिषुः।।
हिंदी में भावार्थ-
विद्वान अच्छा भोजन, मेघों की गर्जना से मोर तथा साधु लोग दूसरों की संपत्ति देखकर प्रसन्न होते हैं वैसे ही दुष्ट लोग दूसरों को संकट में फंसा देखकर हंसते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संसार में भांति भांति प्रकार के लोग हैं। जो ज्ञानी और विद्वान है उनको रहने, खाने,पीने और पहनने के लिये अच्छी सुविधा मिल जाये तो वह संतुष्ट हो जाते हैं। जो सच्चे साधु और सज्जन हैं वह दूसरों की भौतिक उपलब्धियों देखकर प्रसन्न होते हैं क्योंकि उनकी मान्यता होती है कि आसपास के लोग प्रसन्न होंगे तो उनके स्वयं के पास अच्छा वातावरण रहेगा और वह शांति से रह सकेंगे। इसके विपरीत कुछ लोग दुष्ट प्रवृत्ति के भी होते हैं जो स्वयं तो विपत्ति में पड़े रहते हैं पर उनका खेद तब कम हो जाता है जब कोई दूसरा भी विपत्ति मेें पड़ता है। ऐसे लोग अपने दुःख से अधिक दूसरे के सुख से अधिक दुःखी होती हैं। इसके अलावा अपने सुःख से अधिक दूसरे का दुःख उनको अधिक प्रसन्न करता है।
वैसे तो जीवन में हिंसा कभी नहीं करना चाहिये क्योंकि फिर प्रतिहिंसा का सामना करने पर स्वयं को भी कष्ट उठाना पड़ा सकता है, पर इस संसार में कुछ ऐसे दुष्ट लोग भी हैं जिनको कितना भी समझाया जाये वह दैहिक आक्रमण से बाज नहीं आते। उनसे शांति और अहिंसा की अपील निरर्थक साबित होती है। ऐसे लोगों से मुकाबला करने के लिये अपने अस्त्रों शस्त्रों तथा अन्य साधनों उपयोग करने में कोई झिझक नहीं करना चाहिये। ऐसे लोगों के लिये धर्म और ज्ञान एक निरर्थक वस्तु हैं। देहाभिमान से ग्रस्त ऐसे लोगों के विरुद्ध लड़ना पड़े तो संकोच त्याग देना चाहिए।
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Wednesday, May 6, 2009

चाणक्य नीतिः अपनी भौतिक उपलब्धियों पर संतोष करना ही उचित

संतोषाऽमृत-तुप्तानां यत्सुखं शान्तचेतसाम्।
न च तद् धनलूब्धानामितश्चयेतश्च धावताम्।।
हिंदी में भावार्थ-
जो मनुष्य संतोष रूप अमृत से तुप्त है उसका ही हृदय शांत रह सकता है। इसके विपरीत जो मनुष्य असंतोष को प्राप्त होता है उसे जीवन भर भटकना ही पड़ता है उसे कभी भी शांति नहीं मिल सकती।
संतोषस्त्रिशु कत्र्तव्यः स्वदारे भोजने धने।
त्रिषु चैव न कत्र्तव्योऽध्ययने तपदानयोः।।
हिंदी में भावार्थ-
मनुष्य को अपनी पत्नी, भोजन और धन से ही संतोष करना चाहिये पर ज्ञानार्जन, भक्ति और दान देने के मामले में हमेशा असंतोषी रहे यही उसके लिये अच्छा है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-नीति विशारद चाणक्य के संदेशों के ठीक विपरीत हमारा देश चल रहा है। जिन लोगों के पास धन है उनके पास भी संतोष नहीं है और जिनके पास नहीं है उनसे तो आशा करना ही व्यर्थ है। अपनी पत्नी और घर के भोजन से धनी लोगों को संतोष नहीं है। जीभ का स्वाद बदलने के लिये ऐसी वस्तुओं का सेवन बढ़ता जा रहा है जो स्वास्थ्य के लिये हितकर नहीं है। कहा जाता है कि खाने पीने की वस्तुओं को स्वच्छता होना चाहिये पर होटलों और बाजार की वस्तुओं में कितनी स्वच्छता है यह हम देख सकते हैं। किसी रात एक साफ रुमाल घर में रख दीजिये और सुबह देखिये तो उस पर धूल जमा है तब बाजार में कई दिनों से रखी चीजों में स्वच्छता की अपेक्षा कैसे रखी जा सकती है। घर में गृहिणी सफाई से भोजन बनाती है पर क्या वैसी अपेक्षा होटलों के भोजन में की जा सकती है। ढेर सारे ट्रक, ट्रेक्टर,बसेें, मोटर साइकिलें तथा अन्य वाहन सड़कों से गुजरते हुए तमाम तरह की धूल और धूंआ उड़ाते हुए जाते हैं उनसे सड़कों पर स्थित दुकानों,चायखानों और होटलों में रखी वस्तुओं के विषाक्त होने की आशंका हमेशा बनी रहती है। ऐसे में बाजारों में खाने वाले लोगों के साथ अस्पतालों में मरीजों की संख्या भी बढ़ रही है तो आश्चर्य की बात क्या है?
इसके विपरीत लोगों की आध्यात्मिक ज्ञान और भक्ति के भाव के प्रति कमी भी आ रही है। लोगों को ऐसा लगता है कि यह तो पुरातनपंथी विचार है। असंतोष को बाजार उकसा रहा है क्योंकि वहां उसे अपने उत्पाद बेचने हैं। प्रचार के द्वारा बैचेनी और असंतोष फैलाने वाले तत्वों की पहचान करना जरूरी है और यह तभी संभव है कि जब अपने पास आध्यात्मि ज्ञान हो।
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Tuesday, May 5, 2009

मनु स्मृति: ज्ञान देने वाला छोटो होने पर भी सम्मानीय

उत्पादकब्रह्मदात्रोर्गरीयान् ब्रह्मदः पिता।
ब्रह्मजन्म हि विप्रस्य चेह च शाश्वतम्।।
हिंदी में भावार्थ-
मनुष्य को जन्म और शिक्षा देने वाले दोनों ही पिता होते हैं पर पर विद्या और ज्ञान देने से मनुष्य लोक तथा परलोक दोनों ही सुधारता है इसलिये उसका ही महत्व अधिक है। अतः ज्ञान देने वाले का ही अधिक महत्व है।
अध्यापयामास पितृन् शिशुरङिगरस कविः
पुत्रका इति होवाच ज्ञानेन परिगृह्म तान्।।
हिंदी में भावार्थ-
अङिगरस ऋषि ने अपने बुजुर्गों को अध्ययन कराते हुए ‘हे पुत्रों’ कहकर ज्ञान दिया था। इस तरह अपने से छोटा होने पर भी ज्ञान देने वाला गुरु कहलाता है।
संपादकीय व्याख्या -भारतीय अध्यात्म में माता पिता तथा गुरु को परम आदरणीय माना जाता है पर जीवन और व्यवहार का ज्ञान देने वाले गुरु का विशेष स्थान होता है। माता पिता तो अपने पुत्र को परिवार तथा व्यवसायों की परंपराओं से अवगत स्वाभाविक रूप से कराते हैं क्योंकि वह देह के निकट होते हैं पर गुरु तो निष्काम भाव से अपने शिष्यों को जीवन और अध्यात्म का ज्ञान देते हैं जो कि न केवल इस लोक में बल्कि परलोक में भी सहायक होता है। गुरु का अपने शिष्य से कोई दैहिक संबंध नहीं होता इसलिये उसकी शिक्षा का अधिक महत्व है।
अङिगरस ऋषि ने भी अपने पिता, चाचा और ताउओं को ब्रह्मज्ञान दिया और उस समय उनको ‘हे पुत्रों’ कहकर संबोधित किया था। कहने का तात्पर्य यह है कि ज्ञान देने वाला अपने से छोटी आयु का भी क्यों न हो उसका गुरु की तरह सम्मान करना चाहिये। उसी तरह अपने से बड़े को ज्ञान देते समय भी उसे अपना शिष्य समझना चाहिये। यही कारण है कि हमारे संत और ऋषि गुरु महिमा का बखान करते हैं।
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Sunday, May 3, 2009

मनुस्मृति-इंद्रियों पर कुशल सारथी की तरह नियंत्रण करने वाला ही विद्वान

इंद्रियाणां विचरतां विषयेस्वपहारिषु।
संयमे यलमातिष्ठेद्विद्वान्यन्तेव वाजिनाम्।।
हिंदी में भावार्थ-
एक विद्वान अपने मन और इंद्रियों पर वैसे ही लगाम से नियंत्रण करता है जैसे कि कोई कुशल सारथी अपने घोड़ों पर करता है।
जप्येनैव तु संसिध्येद् ब्राह्मणो नात्र संशयः।
कुर्यादन्यन्नवा कुर्यान्मैत्रो ब्राह्मण उच्यते।
हिंदी में भावार्थ-
इसमें कोई संदेह नहीं है कि जाप यज्ञ से ही किसी को भी लाभ हो सकता है। परमात्मा का नाम जाप करने वाला अगर कोई अन्य यज्ञ नहीं करे तो भी उसे सिद्धि मिल जाती है और उसे समाज में भी सम्मान प्राप्त होता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुमहाराज ने भी समाज में कर्मकांडों को महत्व को नकारते हुए यह विचार व्यक्त किया है कि अगर कोई मनुष्य हृदय से भगवान का जाप करे तो उसे पूरी तरह भक्ति का लाभ होगा। मनुमहाराज को भारतीय समाज का पथप्रदर्शक कहा जाता है। आलोचक तो उन पर समाज में अंधविश्वास फैलाने का आरोप लगाते हैं जबकि उनका यह स्पष्ट मत है कि अगर मनुष्य भगवान का नाम हृदय से जाप करे तो उसे कोई अन्य यज्ञ या हवन करने की आवश्यकता नहीं है। यह अलग बात है कि मनुमहाराज के प्रशंसक होने का दावा करने वाले अन्य प्रकार के कर्मकांडों पर ही अधिक जोर देते हैं और हृदय से जाप करने की बजाय न बल्कि स्वयं बल्कि दूसरों को भी प्रेरित करते हैं-कहीं कहीं तो बाध्य भी करते हैं।
उसी तरह मनु महाराज यह भी कहते हैं कि विद्वान वही है जो अपनी इंद्रियों पर अपना शासन करता है न कि उनसे शासित होता है। कितनी विचित्र बात है कि हमारे देश में शिक्षा का विस्तार होने के साथ ही लोगों में व्यसनों की प्रवृत्ति भी बढ़ी है। शराब पीना तथा अनैतिक संबंध स्थापित करना शिक्षित लोगों के लिये एक फैशन बन गया है। असंयमित जीवन जीने वाले अधिकतर वही लोग हैं जिन्होंने शिक्षा प्राप्त की है और अपने आपको विद्वान कहने में उनको गौरव की अनुभूति होती है। सबसे अधिक लालच, लोभ और अहंकार की प्रवृत्ति का शिकार पढ़ा लिखा तबका ही हुआ है। मनुमहाराज के संदेश के अनुसार तो वह साक्षर और शिक्षित हैं पर विद्वान नहीं है। विद्वान तो उसी व्यक्ति को कहा जा सकता है जो अपनी इंद्रियों पर संयम रखता हो।
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Saturday, May 2, 2009

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-मणि के आगे कांच का महत्त्व नहीं होता

निरालोके हिः लोकेऽस्मिन्नासते तत्रपण्डिताः।
जात्यस्य हिं मणेयंत्र काचेन समता मताः।।
हिंदी में भावार्थ-
जो व्यक्ति ज्ञान के अंधेरे में रहते हैं उनके समीप विद्वान लोग नहीं बैठते। जहां भला मणि हो वहां कांच के साथ कैसा व्यवहार किया जा सकता है।
उतमाभिजनोपेतानम न नीचैः सह वर्द्धयेतु।
कृशीऽपि हिवियेकहो याति संश्रयणीयाताम्।।
हिंदी में भावार्थ-
जो उत्तम गुणों वाले हों उनको नीच गुणों वालों से मेल नहीं करना चाहिये। इसमें संदेह नहीं है कि संकट में आये उत्तम गुणी विद्वान को राज्य का आश्रय अवश्य प्राप्त होता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-आदमी को अपने गुणों की पहचान करते हुए समान गुणों वाले लोगों से ही मेल मिलाप करना चाहिये। अगर कोई व्यक्ति अधिक शिक्षित व्यक्ति है और वह अशिक्षितों में बैठकर अपने ज्ञान का बखान करता है तो वह लोग उसकी मजाक बनाते हैं। कई तो कह देते हैं कि ‘पढ़े लिखे आदमी किस काम के?’
उसी तरह अशिक्षित व्यक्ति जब शिक्षितों के साथ बैठता है तो वह उसकी मजाक उड़ाते हैं कि देखोे बेचारा यह पढ़ नहीं पाया। इस तरह समान स्तर न होने पर आपस में एक दूसरे को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति मनुष्य में स्वाभाविक रूप से होती है।
कहने को कहा जाता है कि यहां झूठे आदमी का बोलबाला है पर यह एक वहम है। अगर व्यक्ति शिक्षित, ज्ञानी और कर्म में निरंतर अभ्यास में रत रहने वाला है तो विपत्ति आने पर उसे राज्य का संरक्षण अवश्य प्राप्त होता है। बेईमानी, भ्रष्टाचार और अनैतिक व्यापार करने वालों को हमेशा राज्य से भय लगा रहता है। उनके पास बहुत सारा धन होने के बावजूद उनका मन अपने पापों से त्रस्त रहता है। कहते हैं कि पाप की हांडी कभी न कभी तो फूटती है। यही हालत अनैतिक आचरण और कर्म से कमाने वालों की है। वह अगर इस प्रथ्वी के दंड से बचे भी रहें तो परमात्मा के दंड से बचने का उनके पास कोई उपाय नहीं है। वह अनैतिक ढंग से धन कमाकर अपने परिवार का भरण भोषण करते हैं पर उनके साथ शारीरिक विकार लगे रहते हैं। इसके अलावा उनके काले धन के प्रभाव से उनके परिवार के सदस्यों का आचरण भी निकृष्टता और अहंकार से परिपूर्ण हो जाता है जिसका बुरा परिणाम आखिर उनकेा ही भोगना पड़ता है।
उसी तरह जो लोग अपने जीवन में नैतिकता और ईमानदारी के सिद्धांतों का पालन करते हैं उनके परिवार सदस्यों पर भी उसका अच्छा प्रभाव पड़ता है। चाहे लाख कहा जाये सत्य के आगे झूठ की नहीं चल सकती जैसे मणि के आगे कांच का कोई मोल नहीं रह जाता।
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Tuesday, April 28, 2009

संत कबीर वाणी-शब्द में चुंबक जैसा प्रभाव ज्ञान के बिना संभव नहीं

यही बड़ाई शब्द की, जैसे चुंबक भाय।
बिना शब्द नहिं ऊबरै, केता करै उपाय।।

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि उसी शब्द की प्रशंसा होती है जो चुंबक की तरह दूसरे के हृदय को प्रभावित करता है। जब तक शब्द ज्ञान नहीं होगा तब तक कितना भी प्रयास किया जाये आदमी इस संसार रूपी भव सांगर से उबर नहीं सकता।
सीखै सुनै विचार ले, ताहि शब्द सुख देय।
बिना समझै शब्द गहै, कछु न लोहा लेय।।

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जब अच्छी तरह सीखकर सोचते और विचारते हुए शब्द बोला जाता है वही सुख देता है। जब तक शब्द का अर्थ और भाव समझ में नहंी आयेगा तब तक कोई लाभ नहीं होने वाला।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अनेक लोगों ने शिक्षा के क्षेत्र में ढेर सारी उपाधिययों प्राप्त की ली हैं। इतना ही नहीं उन्होंने धर्मग्रंथों से भी अनेक प्रकार के दोहे और श्लोक रट लिये हैं उसका अर्थ भी बढ़िया ढंग से प्रस्तुत करते हैं पर वह उसे धारण नहीं कर पाते। तोते की तरह रटने वाले ऐसे लोगों ने समाज के कल्याण का ठेका भी ले लिया है। समस्या यह है कि शब्द ज्ञान सुनने या पढ़ने के बाद उस पर चिंतन और मनन आवश्यक है वरना वह व्यवहार में नहीं आ पाता। आप देखियें प्रेम, अहिंसा और मधुर वाणी का उपयोग करने के संदेश देने वाले कितने ज्ञानी इस देश में है पर वह उनका व्यवसाय है और कभी वह उस ज्ञान को धारण कर पायें हों -जो उन्होंने पढ़ा है-ऐसा नहीं लगता।
लोग भी उनको सुनते हैं फिर भूल जाते हैं। उनके शब्दों में चुंबक जैसी शक्ति नहीं है जिससे लोग प्रभावित हो सकें। जो व्यक्ति ज्ञान के शब्द पढ़कर उसे धारण करता है उसी की वाणी में ओज आ सकता है वरना नहीं।
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Monday, April 27, 2009

संत कबीर वाणी-विपत्ति में काम आयें ऐसे लोग कम ही होते हैं


सजन सनेही बहुत हैं, सुख में मिले अनेक।
बिपत्ति पड़े दुख बांटिये, सो लाखन में एक।।

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि इस संसार में जब मनुष्य सुख की स्थिति में होता है तब उसके साथ स्नेह करने वाले सज्जन बहुत होते हैं पर दुःख और विपत्ति में साथ निभायें ऐसे लोगों की संख्या नगण्य ही होती है।
प्रेम प्रीति से मिलै, ताको मिलिये धाय।
कपट राखिके जो मिले, तासे मिलै बलाय।।

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो व्यक्ति सच्चा प्रेम करने वाला हो उससे तो मिलना चाहिये पर जिनके मन में कपट है उनसे दूर रहने में भी भलाई है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जब मनुष्य आत्मनिर्भर और संपन्न होता है तब उसके आसपास लोगों की भीड़ लगी होती है। जो जितना अधिक धनी, उच्च पदारूढ़ और प्रतिष्ठत होता है उसके आसपास उतनी ही भीड़ लगी होती है। अगर हम उनकी तरफ देखें तो लगेगा कि वह तो बड़ा आदमी है। यह केवल सोचने का एक तरीका है और इसका कोई तार्किक आधार नहीं है। जहां शहद फैला होगा वहां चींटियां तो आयेंगी। यही हाल सामान्य मनुष्यों की प्रवृत्ति का भी है। चाहे भले ही धनी, उच्च पदारूढ़ और बाहूबली आदमी से कुछ न मिलता हो पर लोग उसके यहां चक्कर जरूर लगाते हैं कि इस आशा में कि शायद कभी उसकी आवश्यकता पड़ जाये और वह सहायत करे। मगर वह उसके यहां तभी तक जाते हैं जब तक उसके पास शक्ति है और जैसे ही वह उससे विदा हुई वह उससे भी मूंह फेर लेते हैं।

इसलिये अपने उच्च पद, अधिक धन और बाहूबल का अहंकार अपने आसपास लगी भीड़ को देखकर तो नहीं पालना चाहिये क्योंकि जैसे ही वह विदा होगी लोग भी नदारद हो जायेंगे। शक्ति के विदा होते ही जब विपत्तियां आती हैं तब कोई साथ निभाने वाला नहीं होता। कोई कोई होता है जो दुःख में यह सोचकर साथ निभाता है कि अमुक आदमी से अपने अच्छे दिनों में मदद की थी।
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Saturday, April 25, 2009

संत कबीर वाणी-हृदय स्वच्छ हो तभी माला फेरने और जीभ से नाम लेने का लाभ मिलता है


माला फेरै कह भयो, हिंरदा गाठि न खोय।
गुरु चरनन चित राखिये, तो अमरापुर जोय।।

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि हाथ में पकड़कर माला फेरने से कोई लाभ तब तक नहीं होता जब नाम स्मरण हृदय से नहीं किया जाये। यह तभी संभव है जब तब गुरु के चरणों में सिर झुकाकर आदर के साथ उनकी सेवा की जाये तभी अज्ञान और दोष मिट सकते हैं।
माला तो कर में फिरै, जीभ फिरै मुख मांहि।
मनवा तो दहु दिशि फिरै, यह तो सुमिरन मांहि।।

संत शिरोमण कबीरदास जी कहते हैं कि मनुष्य हाथ में माला फेरते हुए जीभ से परमात्मा का नाम लेता है पर उसका मन दसों दिशाओं में भागता है। यह कोई भक्ति नहीं है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-सत्संग में जाना हो या मंदिर में दर्शन करने, जब तक हम परमात्मा का ध्यान हृदय में स्थित नहीं करेंगे तब तक कोई लाभ नहीं होता। देखा जाये तो भक्ति और ज्ञान साधना अपने लौकिक और परलौकिक जीवन को सुखमय करने के लिये करते हैं पर हृदय में केवल भौतिक विषयों का ही ध्यान बना रहता है। भले ही हाथ में माला फेरते हुए परमात्मा का नाम लें या सत्संग में जाकर संतों के प्रवचन सुने पर मन का भटकाव को केवल सांसरिक विषयों में ही बना रहता है। हम वही चिंतायें दुःख और अवसाद हमेशा मस्तिष्क बने रहते हैं जिनसे परेशान होकर हम अध्यात्मिक शांति के लिये उन स्थानों पर जाते हैं जहां सत्संग होता है। इसलिये जब कहीं प्रवचन सुनने जायें या मंदिर में दर्शन करें तब अपने सांसरिक विषयों का विचार मस्तिष्क में नहीं आने देना चाहिये।
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Friday, April 24, 2009

चाणक्य नीतिः गुणों की पहचान न होने पर उपेक्षा होती है

न वेत्ति यो यस्य गुणप्रकर्ष स तं सदा निन्दति नाऽत्र चित्रम्।
यथा किराती करिकुम्भजाता मुक्ताः परित्यज्य विभति गुंजाः।।

हिंदी में भावार्थ- अगर कोई मनुष्य किसी वस्तु या अन्य मनुष्य के गुणों को नहीं पहचानता तो तो उसकी निंदा या उपेक्षा करता है। ठीक उसी तरह जैसे जंगल में रहने वाली कोई स्त्री हाथी के मस्तक से मिलने वाली मोतियों की माला मिलने पर भी उसे त्यागकर कौड़ियों की माला पहनती है।
अकृष्टफलमूलेन वनवासरतः सदा।
कुरुतेऽहरहः श्राद्धमृषिर्विप्रः स उच्यते।।
हिंदी में भावार्थ-
वह विद्वान ऋषि कहलाता है जो जमीन को जोते बिना पैदा हृए फल एवं कंधमूल आदि खाकर हमेशा वन में जीवन व्यतीत करता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-नीति विशारद चाणक्य का कहना है कि अगर किसी व्यक्ति या वस्तु के गुणों का ज्ञान नहीं है तो उसकी उपेक्षा हो ही जाती है। यह स्थिति हम अपने भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान के बारे में आज समाज द्वारा बरती जा रही उपेक्षा के बारे में समझ सकते हैं। हमारे देश के प्राचीन और आधुनिक ऋषियों, मुनियों और तपस्वियों ने बड़े परिश्रम से हमें जीवन और सृष्टि के रहस्यों को जानकर उसका ज्ञान हमारे लिये प्रस्तुत किया पर हमारे देश के विद्वानों ने उसकी उपेक्षा कर दी। यही कारण है कि आज हमारे देश में विदेशी विद्वानों के ज्ञान की चर्चा खूब होती है। देश में पश्चिम खान पान ही सामान्य जीवन की दिनचर्या का भाग बनता तो ठीक था पर वहां से आयातित विचार और चिंतन ने हमारी बौद्धिक क्षमता को लगभग खोखला कर दिया है। यही कारण है कि सामान्य व्यक्ति को शिक्षित करने वाला वर्ग स्वयं भी दिग्भ्रमित है और भारतीय अध्यात्म उसके लिये एक फालतू का ज्ञान है जिससे वर्तमान सभ्यता का कोई लेना देना नहीं है।
जबकि इसके विपरीत पश्चिम में भारतीय अध्यात्म ज्ञान की पुस्तकों पर अब जाकर अनुसंधान और विचार हो रहा है। अनेक महापुरुषों के संदेश वहां दिये जा रहे हैं। हमारी स्थिति भी कुछ वैसी है जैसे किसी घर में हीरों से भरा पात्र हो पर उसे पत्थर समझकर खेत में चिड़ियों को भगाने के लिये कर रहा हो।
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Thursday, April 23, 2009

मनुस्मृतिः अहिंसक व्यक्ति अपना लक्ष्य सहजता से प्राप्त करता है

मनु स्मृति में में कहा गया है कि
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यद्ध्यायति यत्कुरुते धृतिं बध्नाति यत्र च।
तद्वाघ्नोत्ययत्नेन यो हिनस्तिन किंचन।।
     हिंदी में भावार्थ-जो मनुष्य किसी भी प्रकार की हिंसा नहीं करता, वह जिस विषय पर एकाग्रता के साथ विचार और कर्म करता है  अपना लक्ष्य शीघ्र और बिना विशेष प्रयत्न के प्राप्त कर लेता है।

नाऽकृत्वा प्राणिनां हिंसां मांसमुत्यद्यते क्वचित्।
न च प्राणिवधः स्वग्र्यस्तस्मान्मांसं विवर्जयेत्।।
     हिंदी में भावार्थ-किसी भी जीव की हत्या कर ही मांस प्राप्त किया जाता है लेकिन उससे स्वर्ग नहीं मिल सकता इसलिये सुख तथा स्वर्ग को प्राप्त करने की इच्छा करने वालो को मांस के उपभोग का त्याग कर देना चाहिये।
     वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संसार में मनुष्य के चलने के दो ही मार्ग हैं-एक सत्य  परमार्थ और दूसरा असत्य हिंसा। यदि मनुष्य का मन लोभ, लालच और अहंकार से ग्रस्त हो गया तो वह नकारात्मक मार्ग पर चलेगा और उसमें सहृदयता का भाव है तो वह सकारात्मक मार्ग पर चलता है। श्रीगीता के संदेशों का सार यह है कि जैसा मनुष्य अन्न जल ग्रहण करता है तो वैसा ही उसका स्वभाव हो जाता है तब वह उसी के अनुसार ही कर्म करता हुआ फल भोगता है।
      वैसे पश्चिम के वैज्ञानिक भी अपने अनुसंधान से यह बात प्रमाणित कर चुके हैं कि शाकाहारी भोजन और मांसाहारी भोजन करने वालों के स्वभाव में अंतर होता है। वह यह भी प्रमाणित कर चुके हैं कि शाकाहारी भोजन करने वालों के विचार और चिंतन में सकारात्मक पक्ष अधिक रहता है जबकि मांसाहारी लोगों का स्वभाव इसके विपरीत होता है। जहा माँसाहारी उग्र होते हैं वहीँ शाकाहारी शांत स्वाभाव के पाए जाते हैं| अतः जितना संभव हो सके भोजन में मांसाहार से परहेज करना चाहिये।
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Tuesday, April 21, 2009

मनुस्मृतिः लोगों को मूर्ख बनाने वालों को पानी तक न पिलायें

यथा प्लवेनौपलेन निमज्जत्युदके तरन्।
तथा निमज्जतोऽधस्तादज्ञौ दातृप्रतीच्छकौ।।

हिंदी में भावार्थ-जैसे को मनुष्य जल में प्रस्तर की नाव बनाकर डूब जाता है उसी तरह दूसरों को मूर्ख मनाकर दान लेने वाला तथा देना वाला दोनों ही नष्ट हो जाते हैं।

न वार्यपि प्रयच्छेत्तु बैडालव्रति के द्विजे।
न बकव्रतिके विप्रे नावेदविदि धर्मवित्।।

हिंदी में भावार्थ-धर्म की जानकारी रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को चाहिये कि वह ऐसे किसी पुरुष को पानी तक नहीं पिलाये जो ऊपर से साधु बनते हैं पर उनका वास्तविक काम दूसरों को अपनी बातों से मूर्ख बनाना होता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या -हमारे देश में दान देने की बहुत पुरानी परंपरा है। चाहे सतयुग हो या कलियुग दान देने का भाव हमारे देश के लोगों में सतत प्रवाहित है। इसी भाव का देाहन करने के लिये दान लेने वालों ने भी एक तरह से अपना धंधा बना लिया है। यह केवल आज ही नहीं वरन् मनु महाराज के समय से चल रहा है इसलिये वह अपने संदेश में सचेत करते हैं कि अपनी वाणी या कर्म से दूसरे को मोहित कर ठगने वाले को पानी भी न पिलायें। ऐसे ठगों को भोजन खिलाने या पानी पिलाने से कोई पुण्य नहीं मिलने वाला। ऐसे ठगों को दान देने से कोई पुण्य लाभ की बजाय पाप होने की आशंका रहती है। वह स्वयं तो नष्ट होते ही हैं बल्कि दान देने वाला भी नष्ट होता है-उसे इस बात का भ्रम होता है कि वह पुण्य कमा रहा है पर ऐसा होता नहीं है और वह निरंतर पाप का भागी बनता चला जाता है। अतः दान देते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि वह सुपात्र है कि नहीं। देखा जाये तो इस तरह के ठग मनुमहाराज के समय में भी सक्रिय रहे हैं तभी तो उन्होंने ऐसा संदेश दिया है।
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