Saturday, April 19, 2014

भर्तृहरि नीति शतकः राजनीति तो होती है बहुरूपिया

भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि
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सत्याऽनृता च परुषा प्रियवादिनी च
हिंस्त्रा दयालुरपि चार्थपरा वदान्या |
नित्यव्यया प्रचुरनित्य धनागमा च
वारांगनेव नृपनीतिनेक रूपा ||
     हिंदी में भावार्थ-राज्यकर्म में लिप्त राजाओं को राजनीति करते हुए बहुरुपिया बनना ही पडता है। कभी सत्य तो कभी झूठ, कभी दया तो कभी हिंसा, कभी कटु तो कभी मधुर कभी, धन व्यय करने में उदार तो कभी धनलोलुप, कभी अपव्यय तो कभी धनसंचय की नीति अपनानी पड़ती है क्योंकि राजनीति तो बहुरुपिया पुरुष और स्त्री की तरह होती है।
      वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-यह एक ध्रुव सत्य है कि राजनीति करने वाले को अनेक तरह के रंग दिखाने ही पड़ते हैं। जो अपना जीवन शांति, भक्ति और अध्यात्म ज्ञान के साथ बिताना चाहते हैं उनके लिये राजनीति करना संभव नहीं है। ज्ञानी लोग इसलिये राजनीति से समाज में परिवर्तन की आशा नहीं करते बल्कि वह तो समाज और पारिवारिक संबंधों में राज्य के हस्तक्षेप का कड़ा विरोध भी करते हैं।  सामान्य भाषा में राजनीति का सीधा आशय राज्य प्राप्त करने और उसे चलाने के कार्य करने के लिये अपनायी जाने वाली नीति से है। बहुरंगी और आकर्षक होने के कारण अधिकतर लोगों को यही करना रास आता है। अन्य की बात तो छोडि़ये धार्मिक किताब पढ़कर फिर उसका ज्ञान लोगों को सुनाकर पहले उनके दिल में स्थान बनाने वाले कई कथित गुरु राजनीति को स्वच्छ बनाने के लिये उसमें घुस जाते हैं-यह लोकतंत्र व्यवस्था होने के कारण हुआ है क्योंकि लोग राजनीति विजय को प्रतिष्ठा का अंतिम चरम मानते हैं। लेखक, पत्रकार, अभिनेता-अभिनेत्रियां तथा अन्य व्यवसायों मं प्रतिष्ठत लोग राजनीति के अखाड़े को पसंद करते हैं। इतना ही नहीं अन्य क्षेत्रों में प्रसिद्ध लोग राजनीति में शीर्ष स्थान पर बैठे लोगों की दरबार में हाजिरी देते हैं तो वह भी उनका उपयोग करते हैं। लोकतंत्र में आम आदमी के दिलो दिमाग में स्थापित लोगों का उपयोग अनिवार्य आवश्यकता बन गया है। कोई व्यक्ति अपने लेखन, कला और कौशल की वजह से कितना भी लोकप्रिय क्यों न हो वह उससे सतुष्ट नहीं होता वरन उसे   लगता है कि स्वयं को चुनावी राजनीति में आकार कोई प्रतिष्टित किये  स्थापित किये बिना वह अधूरा है।
      यहाँ हम बता दें कि राजनीति से हमारा आशय आधुनिक चुनावी राजनीति  से है| व्यापक रूप से इस शब्द का अर्थ विस्तृत है|  राजसी कर्म हर व्यक्ति को करने होते हैं और उसे उसके लिए नीतिगत ढंग चलना ही होता है| यानी अपने अर्थकर्म के लिए रजा हो या रंक सभी को राजनीति करनी ही होती है|
      राजनीति तो बहुरुपिये की तरह रंग बदलने का नाम है। लोकप्रियता के साथ कभी अलोकप्रिय भी होना पड़ता है। हमेशा मृद भाषा से काम नहीं चलता बल्कि कभी कठोर वचन भी बोलने पड़ते हैं। हमेशा धन कमाने से काम नहीं चलता कभी व्यय भी करना पड़ता है-लोकतांत्रिक व्यवस्था में तो भारी धन का व्यय करने का अवसर भी आता है तो फिर उसके लिये धन संग्रह भी करना पड़ता है। कभी किसी को प्यार करने के लिये किसी के साथ घृणा भी करना पड़ती है।
      यही कारण है कि अनेक लेखक,कलाकार और प्रसिद्ध संत चुनावी  राजनीति से परे रहते हैं। हालांकि उनके प्रशंसक और अनुयायी उन पर दबाव डालते हैं पर वह फिर भी नहीं आते क्योंकि राजनीति में हमेशा सत्य नहीं चल सकता। अगर हम अपने एतिहासिक और प्रसिद्ध संतों और लेखकों की रचनाओं को देखें तो उन्होंने राजनीति पर कोई अधिक विचार इसलिये नहीं रखा क्योंकि वह जानते थे कि राजनीति में पूर्ण शुद्धता तो कोई अपना ही नहीं सकता। आज भी अनेक लेखक, कलाकर और संत हैं जो राजनीति से दूर रहकर अपना कार्य करते हैं। यह अलग बात है कि उनको वैसी लोकप्रियता नहीं मिलती जैसे राजनीति से जुड़े लोगों को मिलती है पर कालांतर में उनका रचना कर्म और संदेश ही स्थाई बनता है। राजनीति विषयों पर लिखने वाले लेखक भी बहुत लोकप्रिय होते है पर अंततः सामाजिक और अध्यात्मिक विषयों पर लिखने वालों का ही समाज का पथप्रदर्शक बनता है।
      राजनीति के बहुरूपों के साथ बदलता हुआ आदमी अपना मौलिक स्वरूप खो बैठता है और इसलिये जो लेखक, कलाकर और संत राजनीति में आये वह फिर अपने मूल क्षेत्र के साथ वैसा न ही जुड़ सके जैसा पहले जुडे थे। इतना ही नहीं उनके प्रशंसक और अनुयायी भी उनको वैसा सम्मान नहीं दे पाते जैसा पहले देते थे। सब जानते हैं कि राजनीति तो काजल  की कोठरी है जहां से बिना दाग के कोई बाहर नहीं आ पाता। वैसे यह वह क्षेत्र से बाहर आना पसंद नहीं करता। हां, अपने पारिवारिक वारिस को अपना राजनीतिक स्थान देने का मसला आये तो कुछ लोग तैयार हो जाते हैं।

      आखिर किसी को तो राजनीति करनी है और उसे उसके हर रूप से सामना करना है जो वह सामने लेकर आती है।ं सच तो यह है कि राजनीति करना भी हरेक के बूते का नहीं है इसलिये जो कर रहे हैं उनकी आलोचना कभी ज्ञानी लोग नहीं करते। इसमें कई बार अपना मन मारना पड़ता है। कभी किसी पर दया करनी पड़ती है तो किसी के विरुद्ध हिंसक रूप भी दिखाना पड़ता है। आखिर अपने समाज और क्षेत्र के विरुद्ध हथियार उठाने वालों को कोई राज्य प्रमुख कैसे छोड़ सकता है? अहिंसा का संदेश आम आदमी के लिये ठीक है पर राजनीति करने वालों को कभी कभी अपने देश और लोगों पर आक्रमण करने वालों से कठोर व्यवहार करना ही पड़ता हैं। राज्य की रक्षा के लिये उन्हें कभी ईमानदार तो कभी शठ भी बनना पड़ता है। अतः जिन लोगों को अपने अंदर राजनीति के विभिन्न रूपों से सामना करने की शक्ति अनुभव हो वही उसे अपनाते हैं। जो लोग राजनेताओं की आलोचना करते हैं वह राजनीति के ऐसे रूपों से वाकिफ नहीं होते। यही कारण है कि अध्यात्मिक और सामाजिक ज्ञानी राजनीति से दूर ही रहते हैं न वह इसकी आलोचना करते हैं न प्रशंसा। अनेक लेखक और रचनाकार राजनीतिक विषयों पर इसलिये भी नहीं लिखते क्योंकि उनका विषय तो रंग बदल देता है पर उनका लिखा रंग नहीं बदल सकता।
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Monday, April 14, 2014

समाज में व्याप्त असंतोष से आँखें फेरना थी नहीं-तुलसीदास दर्शन पर आधारित चिंत्तन लेख(samaj mein vyapta asantosh se aankhen ferna theek nahin-tulsidas darshan par adharit chintta lekh)



      भारत में लोकसभा के चुनाव 2014 में होने हैं।  इसके लिये देश में प्रचार अभियान जोरों पर है।  एक तरफ सत्ता पक्ष दावा करता है कि उसने देश के विकास का काम जमकर किया है दूसरी तरफ विपक्ष जमकर यह प्रचार कर रहा है कि सत्ता पक्ष ने कुछ काम नहीं किया।  इस बहस का निष्कर्ष तो चुनाव परिणाम आने पर ही पता लगेगा पर एक बात तय है कि आर्थिक उदारीकरण की कथित प्रणाली देश के समाज को आंदोलित कर दिया है।  जहां हम यह देख रहे हैं कि भौतिक साधनों का उपभोग बड़ा है जिसे विकास कहा जाता है तो वहीं आर्थिक असमानता ने देश में एक भारी कलह की स्थिति भी पैदा की है। मुदा्रस्फीति की दर के साथ ही महंगाई भी बढ़ी है जिसने मध्यम वर्गीय परिवारों को निम्न वर्ग में लाकर खड़ा कर दिया है। मजे की बात यह है कि जहां से धन लेना है वहां तो मध्यम वर्गीय लोग गरीब कहलाने के लिये तैयार हैं पर जहां उपभोग का प्रश्न आये तो वहां सभी एक दूसरे से होड़ करना चाहते हैं।  बैंक या बाज़ार से कर्ज लेकर स्वयं को सभ्य कहलाने के लिये उनके यह प्रयास अच्छे लगते हैं पर जब उसे चुकाने की बात आती है तो उनकी हवा निकल जाती है।

संत तुलसीदास कहते हैं कि

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कलह न जानब छोट करि, कलह कठिन परिनाम।

गत अगिनि लघु नीच गृह, जरत धनिक धन धाम।।

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-कलह को कभी छोटा विषय नहीं मानना चाहिये। कलह का परिणाम अत्यंत भयानक होता है। एक छोटे आदमी के घर में लगी आग धनिकों के महल तक नष्ट कर देती है।

      आर्थिक विशेषज्ञ भले ही देश के विकसित होने की बात करते हों पर सामाजिक विशेषज्ञों की दृष्टि से देश में इस कारण जो जातीय, भाषाई, क्षेत्रीय, धार्मिक तथा आर्थिक आधार पर जो कलह या वैमनस्य का वातावरण बन गया है वह अत्यंत चिंताजनक है।  दूसरी बात यह भी है कि जिन लोगों ने धन का प्रचुर मात्रा में संग्रह किया है उन्होंने अपने आसपास आर्थिक विपन्नता की उपस्थिति से मुंह फेर लिया है।  इससे अल्प धनिक लोगों के मन में संपन्न लोगो के प्रति जो निराशा तथा वैमनस्य  का भाव है उसका अनुमान सामाजिक विशेषज्ञ ही कर सकते हैं।  हमारे देश में अनेक समाज सेवक उस कलह को रेखांकित करते हैं जो अंततः अपराध को जन्म देती है।  यह अपराध चाहे स्वयं के प्रति हो या दूसरे के प्रति अंततः उसका परिणाम समाज को ही भोगना होता है।  प्रचार  माध्यमों में इस विषय पर चर्चा या बहस होती तो है पर उसका स्तर सतही रहता है।  सच बात तो यह है कि देश में सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक, भाषाई तथा क्षेत्रीय कलह को निपटाने का गंभीर प्रयास होना चाहिये तभी देश में खुशहाली लायी जा सकती है।


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Wednesday, April 9, 2014

विदुर नीति के आधार चिंत्तन लेख-दुर्जन की संगत में सज्जन भी बिगड़ जाता है(vidur neeti-durjan ki sangat mein sajjan bhi bigad jaata hai)



      अक्सर देखा गया है कि लोग अपने संगी साथियों की छवि तथा आचरण को लेकर यह सोचते हुए उदासीन रहते हैं कि इससे उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। उनको शायद इस बात का ज्ञान नहीं होता कि अंततः मनुष्य पर उसकी संगत का प्रभाव पड़ता ही है।आमतौर से लोग एक दूसरे के प्रति सद्भाव दिखाते ही है। कोई अनावश्यक विवाद नहीं चाहता इसलिये परस्पर मैत्री भाव दिखाना बुरा नहीं है पर दूसरे के कर्म में दोष होने पर उसे न टोकना एक तरह से उसे धोखा देना ही है। संग रहने वाले व्यक्ति का यह दायित्व है कि वह मित्र को उसके कर्म के प्रति सचेत करे पर कोई इसके लिये करने को तैयार नहीं होता।  हालांकि आजकल लोगों की सहनशीलता भी कम हो गयी। कोई अपनी आलोचना को सहजता से नहीं लेता। यदि किसी मित्र ने आलोचना कर दी तो लोग मित्रता तक दांव पर लगाकर उससे मुंह फेर लेते हैं। जिस व्यक्ति में सहनशीलता या वफादारी का भाव नहीं है उससे वैसे भी संपर्क रखना गलत है। यह  सोचना ठीक नहीं है कि असहज या असज्जन व्यक्ति का हम पर प्रभाव नहीं पड़ेगा।
विदुरनीति में कहा गया है कि

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यदि सन्तं सेवति वद्यसंन्तं तपस्विनं यदि वा स्तेनमेव।

वासी था रङ्गबशं प्रयानि तथा स तेषां वशमभ्यूवैति।।

     हिन्दी में भावार्थ-यदि कोई सज्जन, दुर्जन, तपस्वी अथवा चोर की संगत करता है तो वह उसके वश में ही हो जाता है। संगत का रंग चढ़ने से कोई बच नहीं सकता।
      एक बात निश्चित है कि हम जैसे लोगों के बीच उठेंगे और बैठेंगे उनका रंग चढ़ेगा जरूर चाहे उससे बचने का प्रयास कितना भी किया जाये।  किसी से मित्रता करें या किसी की सेवा करें उसके साथ रहते हुए उसके हाव भाव तथा वाणी की शैली का हम पर प्रभाव अवश्य पड़ता है। कई बार हमने देखा होगा कि कुछ लोग अपने संपर्क वाले व्यक्तियों की बोलने चालने की नकल कर  सुनाते हैं। अनेकों के हावभाव और चाल की नकल कर भी दिखाई जाती है। इससे यह बात समझी जा सकती है कि संगत का असर तो होता ही है। यह अलग बात है कि कुछ लोग अपने संगी या मित्र की पीठ पीछे नकल कर मजाक उड़ाते हैं पर सच यह है कि अपने सामान्य व्यवहार में भी उसकी नकल उनसे ही हो जाती है।
      अगर हम चाहते हैं कि हमारी छवि धवल रहे और हम हास्य का पात्र न बने तो सबसे पहले अपनी संगत पर दृष्टिपात करना चाहिये। जीवन में सहजता पूर्वक समय निकालने के लिये यह एक बढ़िया उपाय है कि अपनी निरंतर भलाई का क्रम बनाये रखने के लिये हम ऐसे लोगों से दूर हो जायें जिनसे हमारे आसपास वातावरण विषाक्त होता है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Tuesday, April 1, 2014

संत कबीर दर्शन-गाली का उत्तर में मौन धारण करें(sant kabir darshan-gali ka uttar mein maun dharan karen)



      हमारे देश में समाज ने  शिक्षा, रहन सहन, तथा चल चलन में पाश्चात्य शैली अपनायी है पर वार्तालाप की शैली वही पुरानी रही है। उस दिन हमने देखा चार शिक्षित युवा कुछ अंग्रेजी और कुछ हिन्दी में बात कर रहे थे।  बीच बीच में अनावश्यक रूप से गालियां भी उपयोग कर वह यह साबित करने का प्रयास भी कर रहे थे कि उनकी बात दमदार है। हमने  देखे और सुने के आधार पर यही  समझा कि वहां वार्तालाप में अनुपस्थित किसी अन्य मित्र के लिये वह गालियां देकर उसकी निंदा कर रहे हैं।  उनके हाथ में मोबाइल भी थे जिस पर बातचीत करते हुए  वह गालियों का धड़ल्ले से उपयोग कर रहे थे। कभी कभी तो वह अपना वार्तालाप पूरी तरह अंग्रेजी में करते थे पर उसमें भी वही हिन्दी में गालियां देते जा रहे थे।  हमें यह जानकर हैरानी हुई कि अंग्रेजी और हिन्दी से मिश्रित बनी इस तोतली भाषा में गालियां इस तरह उपयोग हो रही थी जैसे कि यह सब वार्तालाप शैली का कोई नया रूप हो।
संत  कबीर कहते हैं कि

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गारी ही से ऊपजे कष्ट और मीच।

हारि चले सो सन्त है, लागि मरै सो नीच।।

      सामान्य हिन्दी में भावार्थ-गाली से कलह, कष्ट और झंगडे होते हैं। गाली देने पर जो उत्तेजित न हो वही संत है और जो पलट कर प्रहार करता है वह नीच ही कहा जा सकता है।

आवत गारी एक है, उलटत होय अनेक।

कहें कबीर नहि उलटियो, वही एक की एक।।

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-जब कोई गाली देता है तो वह एक ही रहती है पर जब उसे जवाब में गाली दी जाये तो वह अनेक हो जाती हैं। इसलिये गाली देने पर किसी का उत्तर न दें यही अच्छा है।
      कई बार हमने यह भी देखा है कि युवाओं के बीच केवल इस तरह की गालियों के कारण ही भारी विवाद हो जाता है। अनेक जगह हिंसक वारदातें केवल इसलिये हो जाती हैं क्योंकि उनके बीच बातचीत के दौरान गालियों का उपयोग होता है। जहां आपसी विवादों का निपटारा सामान्य वार्तालाप से हो सकता है वह गालियों का संबोधन अनेक बार दर्दनाक दृश्य उपस्थित कर देता है।
      एक महत्वपूर्ण बात यह कि अनेक बार कुछ युवा वार्तालाप में गालियों का उपयोग अनावश्यक रूप से यह सोचकर करते हैं कि उनकी बात दमदार हो जायेगी।  यह उनका भ्रम है। बल्कि इसका विपरीत परिणाम यह होता है कि जब किसी का ध्यान गाली से ध्वस्त हो तब वह बाकी बात धारण नहीं कर पाता।  यह भी एक मनोवैज्ञानिक सत्य है वार्तालाप क्रम टूटने से बातचीत का विषय अपना महत्व खो देता है और गालियों के उपयोग से यही होता है। इसलिये जहां अपनी बात प्रभावशाली रूप से कहनी हो वहां शब्दिक सौंदर्य और उसके प्रभाव का अध्ययन कर बोलना चाहिये। अच्छे वक्ता हमेशा वही कहलाते हैं जो अपनी बात निर्बाध रूप से कहते हैं तो श्रोता भी उनकी सुनते हैं। गालियों का उपयोग वार्तालाप का ने केवल सौंदर्य समाप्त करता है वरन उसे निष्प्रभावी बना देता है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Wednesday, March 26, 2014

संगत की रंगत से बचना संभव नही-विदुर नीति के आधार पर चिंत्तन लेख(sangat ki rangat se bachna sambhav nahin-hindu religion thought based on vidur neeti)



      आमतौर से लोग एक दूसरे के प्रति सद्भाव दिखाते ही है। कोई अनावश्यक विवाद नहीं चाहता इसलिये परस्पर मैत्री भाव दिखाना बुरा नहीं है पर दूसरे के कर्म में दोष होने पर उसे न टोकना एक तरह से उसे धोखा देना ही है। संग रहने वाले व्यक्ति का यह दायित्व है कि वह मित्र को उसके कर्म के प्रति सचेत करे पर कोई इसके लिये करने को तैयार नहीं होता।  हालांकि आजकल लोगों की सहनशीलता भी कम हो गयी। कोई अपनी आलोचना को सहजता से नहीं लेता। यदि किसी मित्र ने आलोचना कर दी तो लोग मित्रता तक दांव पर लगाकर उससे मुंह फेर लेते हैं। जिस व्यक्ति में सहनशीलता या वफादारी का भाव नहीं है उससे वैसे भी संपर्क रखना गलत है। यह  सोचना ठीक नहीं है कि असहज या असज्जन व्यक्ति का हम पर प्रभाव नहीं पड़ेगा।
विदुरनीति में कहा गया है कि

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यदि सन्तं सेवति वद्यसंन्तं तपस्विनं यदि वा स्तेनमेव।

वासी था रङ्गबशं प्रयानि तथा स तेषां वशमभ्यूवैति।।

     हिन्दी में भावार्थ-यदि कोई सज्जन, दुर्जन, तपस्वी अथवा चोर की संगत करता है तो वह उसके वश में ही हो जाता है। संगत का रंग चढ़ने से कोई बच नहीं सकता।
      एक बात निश्चित है कि हम जैसे लोगों के बीच उठेंगे और बैठेंगे उनका रंग चढ़ेगा जरूर चाहे उससे बचने का प्रयास कितना भी किया जाये।  किसी से मित्रता करें या किसी की सेवा करें उसके साथ रहते हुए उसके हाव भाव तथा वाणी की शैली का हम पर प्रभाव अवश्य पड़ता है। कई बार हमने देखा होगा कि कुछ लोग अपने संपर्क वाले व्यक्तियों की बोलने चालने की नकल कर  सुनाते हैं। अनेकों के हावभाव और चाल की नकल कर भी दिखाई जाती है। इससे यह बात समझी जा सकती है कि संगत का असर तो होता ही है। यह अलग बात है कि कुछ लोग अपने संगी या मित्र की पीठ पीछे नकल कर मजाक उड़ाते हैं पर सच यह है कि अपने सामान्य व्यवहार में भी उसकी नकल उनसे ही हो जाती है।
      अगर हम चाहते हैं कि हमारी छवि धवल रहे और हम हास्य का पात्र न बने तो सबसे पहले अपनी संगत पर दृष्टिपात करना चाहिये। जीवन में सहजता पूर्वक समय निकालने के लिये यह एक बढ़िया उपाय है कि अपनी निरंतर भलाई का क्रम बनाये रखने के लिये हम ऐसे लोगों से दूर हो जायें जिनसे हमारे आसपास वातावरण विषाक्त होता है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday, March 22, 2014

गलत लोगों को मशहूर करने की आदत से बचेें-विदुर नीति(galat logon ko mashahau kanre ki aadat se bachen-vidur neeti)



      योग साधक तथा ज्ञानार्थी लोग  इस बात के विरुद्ध  होते  है कि कोई ज्ञानी अपने धर्म पर किसी दूसरे विचाराधारा के व्यक्ति की टिप्पणी पर उत्तेजित होकर अपना संयम गंवायें। साथ ही किसी ज्ञानी को दूसरे धार्मिक विचाराधारा पर टिप्पणी करने की बजाय अपनी मान्यता के श्रेष्ठ तत्वों का प्रचार करना चाहिये। जबकि देखा जा रहा है कि लोग एक दूसरे की धार्मिक विचाराधारा का मजाक उड़ाकर सामाजिक संघर्ष की स्थिति निर्मित करते हैं।
      अभी हाल ही में एक गैर हिन्दू विचाराधारा की लेखिका के भारतीय धर्म का मजाक उड़ाती हुए एक पुस्तक पर विवाद हुआ। यह पुस्तक छपे चार साल हो गये हैं और इसे भारत में पुरस्कृत भी किया गया।  किसी को यह खबर पता नहीं थी।  जब विवाद उठा तब पता चला कि ऐसी कोई पुस्तक छपी भी थी।  दरअसल इस पुस्तक की वापसी के लिये कहीं किसी अदालत में समझौता हुआ है।  तब जाकर प्रचार माध्यमों में इसकी चर्चा हुई। एक विद्वान ने इस पर चर्चा में कहा कि इस तरह उस लेखिका को प्रचार मिल रहा है। इतना ही नहीं अब तो वह लेखिका भी बेबाक बयान दे रही है। संभव है इस तरह उसकी पुस्तकों की बिक्री बढ़ गयी हो। ऐसे में सभव है कि कहीं उसी लेखिका या प्रकाशक ने उस पुस्तक की प्रसिद्धि तथा बिक्री बढ़ाने के लिये इस तरह का विवाद प्रायोजित किया हो।

विदुर नीति में कहा गया है कि

असन्तोऽभ्यर्थिताः सिद्भः क्वचित्कार्य कदाचन।

मन्यन्ते सन्तमात्मानमसन्तामपि विश्रुत्तम्।।

     हिन्दी में भावार्थ-यदि किसी दुष्ट मनुष्य सेे सज्जन किसी विषय पर प्रार्थना करते हैं तो वह दुष्ट प्रसिद्ध के भ्रम में स्वयं को भी सज्जन मानने लगता है।

      हमारा मानना है कि धर्म चर्चा का नहीं वरन् आचरण का विषय है। किसी भी धार्मिक विचाराधारा में चंद  ठेकेदार यह दावा करते हैं कि वह उसे पूरी तरह समझते हैं। चूंकि हमारे समाज ने भी यह मान रखा है कि ज्ञान का अर्जन तो केवल बौद्धिक रूप से संपन्न लोग ही कर सकते हैं इसलिये कोई अपने प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन नहीं करता जिससे  उसमें से रट्टा लगाकर ज्ञान बेचने वाले लोगों को अपनी श्रेष्ठ छवि बनाने का अवसर मिलता है। दूसरी बात यह भी है कि यह कथित रूप से प्रचार किया जाता है कि बिन गुरु के गति नहीं है।  जबकि हमारे महापुरुष कहते हैं कि अगर योग्य गुरु नहीं मिलता तो परमात्मा को ही सत्गुरु मानकर हृदय में धारण करें। इससे ज्ञान स्वतः ही  मस्तिष्क में स्थापित हो जाता है।  दूसरी बात यह कि धर्म की रक्षा विवाद से नहीं वरन् ज्ञान के आचरण से ही हो सकती है।  दूसरी बात यह कि कुछ लोगों को अपनी प्रसिद्धि पाने की इच्छा पथभ्रष्ट कर देती है और तब वह जनमानस को उत्तेजित करने का प्रयास करते हैं। जब सज्जन लोग उनसे शांति की याचना करते हैं तो उन्हेें लगता है कि वह समाज के श्रेष्ठ तथा अति सज्जन आदमी है। इसलिये अपनी आस्था तथा इष्ट पर की गयी प्रतिकूल टिप्पणियों पर अपना मन खराब नहीं करना चाहिये।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Friday, March 14, 2014

संत कबीर दर्शन-वार्तालाप में अभद्र शब्द प्रयोग करने से बचें (sant kabir darshan-abhadra shabd prayog karne se bachen)



      हमारे देश में समाज ने  शिक्षा, रहन सहन, तथा चल चलन में पाश्चात्य शैली अपनायी है पर वार्तालाप की शैली वही पुरानी रही है। उस दिन हमने देखा चार शिक्षित युवा कुछ अंग्रेजी और कुछ हिन्दी में बात कर रहे थे।  बीच बीच में अनावश्यक रूप से गालियां भी उपयोग कर वह यह साबित करने का प्रयास भी कर रहे थे कि उनकी बात दमदार है। हमने  देखे और सुने के आधार पर यही  समझा कि वहां वार्तालाप में अनुपस्थित किसी अन्य मित्र के लिये वह गालियां देकर उसकी निंदा कर रहे हैं।  उनके हाथ में मोबाइल भी थे जिस पर बातचीत करते हुए  वह गालियों का धड़ल्ले से उपयोग कर रहे थे। कभी कभी तो वह अपना वार्तालाप पूरी तरह अंग्रेजी में करते थे पर उसमें भी वही हिन्दी में गालियां देते जा रहे थे।  हमें यह जानकर हैरानी हुई कि अंग्रेजी और हिन्दी से मिश्रित बनी इस तोतली भाषा में गालियां इस तरह उपयोग हो रही थी जैसे कि यह सब वार्तालाप शैली का कोई नया रूप हो।

संत  कबीर कहते हैं कि

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गारी ही से ऊपजे कष्ट और मीच।

हारि चले सो सन्त है, लागि मरै सो नीच।।

      सामान्य हिन्दी में भावार्थ-गाली से कलह, कष्ट और झंगडे होते हैं। गाली देने पर जो उत्तेजित न हो वही संत है और जो पलट कर प्रहार करता है वह नीच ही कहा जा सकता है।

आवत गारी एक है, उलटत होय अनेक।

कहें कबीर नहि उलटियो, वही एक की एक।।

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-जब कोई गाली देता है तो वह एक ही रहती है पर जब उसे जवाब में गाली दी जाये तो वह अनेक हो जाती हैं। इसलिये गाली देने पर किसी का उत्तर न दें यही अच्छा है।

      कई बार हमने यह भी देखा है कि युवाओं के बीच केवल इस तरह की गालियों के कारण ही भारी विवाद हो जाता है। अनेक जगह हिंसक वारदातें केवल इसलिये हो जाती हैं क्योंकि उनके बीच बातचीत के दौरान गालियों का उपयोग होता है। जहां आपसी विवादों का निपटारा सामान्य वार्तालाप से हो सकता है वह गालियों का संबोधन अनेक बार दर्दनाक दृश्य उपस्थित कर देता है।
      एक महत्वपूर्ण बात यह कि अनेक बार कुछ युवा वार्तालाप में गालियों का उपयोग अनावश्यक रूप से यह सोचकर करते हैं कि उनकी बात दमदार हो जायेगी।  यह उनका भ्रम है। बल्कि इसका विपरीत परिणाम यह होता है कि जब किसी का ध्यान गाली से ध्वस्त हो तब वह बाकी बात धारण नहीं कर पाता।  यह भी एक मनोवैज्ञानिक सत्य है वार्तालाप क्रम टूटने से बातचीत का विषय अपना महत्व खो देता है और गालियों के उपयोग से यही होता है। इसलिये जहां अपनी बात प्रभावशाली रूप से कहनी हो वहां शब्दिक सौंदर्य और उसके प्रभाव का अध्ययन कर बोलना चाहिये। अच्छे वक्ता हमेशा वही कहलाते हैं जो अपनी बात निर्बाध रूप से कहते हैं तो श्रोता भी उनकी सुनते हैं। गालियों का उपयोग वार्तालाप का ने केवल सौंदर्य समाप्त करता है वरन उसे निष्प्रभावी बना देता है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday, March 8, 2014

संत कबीर दर्शन-गालियाँ देने से बचना ही ठीक(gaaliyan dene se bachana hee theek-sant kabir darshan)



      हमारे देश में समाज ने  शिक्षा, रहन सहन, तथा चल चलन में पाश्चात्य शैली अपनायी है पर वार्तालाप की शैली वही पुरानी रही है। उस दिन हमने देखा चार शिक्षित युवा कुछ अंग्रेजी और कुछ हिन्दी में बात कर रहे थे।  बीच बीच में अनावश्यक रूप से गालियां भी उपयोग कर वह यह साबित करने का प्रयास भी कर रहे थे कि उनकी बात दमदार है। हमने  देखे और सुने के आधार पर यही  समझा कि वहां वार्तालाप में अनुपस्थित किसी अन्य मित्र के लिये वह गालियां देकर उसकी निंदा कर रहे हैं।  उनके हाथ में मोबाइल भी थे जिस पर बातचीत करते हुए  वह गालियों का धड़ल्ले से उपयोग कर रहे थे। कभी कभी तो वह अपना वार्तालाप पूरी तरह अंग्रेजी में करते थे पर उसमें भी वही हिन्दी में गालियां देते जा रहे थे।  हमें यह जानकर हैरानी हुई कि अंग्रेजी और हिन्दी से मिश्रित बनी इस तोतली भाषा में गालियां इस तरह उपयोग हो रही थी जैसे कि यह सब वार्तालाप शैली का कोई नया रूप हो।
संत  कबीर कहते हैं कि

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गारी ही से ऊपजे कष्ट और मीच।

हारि चले सो सन्त है, लागि मरै सो नीच।।

      सामान्य हिन्दी में भावार्थ-गाली से कलह, कष्ट और झंगडे होते हैं। गाली देने पर जो उत्तेजित न हो वही संत है और जो पलट कर प्रहार करता है वह नीच ही कहा जा सकता है।

आवत गारी एक है, उलटत होय अनेक।

कहें कबीर नहि उलटियो, वही एक की एक।।

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-जब कोई गाली देता है तो वह एक ही रहती है पर जब उसे जवाब में गाली दी जाये तो वह अनेक हो जाती हैं। इसलिये गाली देने पर किसी का उत्तर न दें यही अच्छा है।

      कई बार हमने यह भी देखा है कि युवाओं के बीच केवल इस तरह की गालियों के कारण ही भारी विवाद हो जाता है। अनेक जगह हिंसक वारदातें केवल इसलिये हो जाती हैं क्योंकि उनके बीच बातचीत के दौरान गालियों का उपयोग होता है। जहां आपसी विवादों का निपटारा सामान्य वार्तालाप से हो सकता है वह गालियों का संबोधन अनेक बार दर्दनाक दृश्य उपस्थित कर देता है।
      एक महत्वपूर्ण बात यह कि अनेक बार कुछ युवा वार्तालाप में गालियों का उपयोग अनावश्यक रूप से यह सोचकर करते हैं कि उनकी बात दमदार हो जायेगी।  यह उनका भ्रम है। बल्कि इसका विपरीत परिणाम यह होता है कि जब किसी का ध्यान गाली से ध्वस्त हो तब वह बाकी बात धारण नहीं कर पाता।  यह भी एक मनोवैज्ञानिक सत्य है वार्तालाप क्रम टूटने से बातचीत का विषय अपना महत्व खो देता है और गालियों के उपयोग से यही होता है। इसलिये जहां अपनी बात प्रभावशाली रूप से कहनी हो वहां शब्दिक सौंदर्य और उसके प्रभाव का अध्ययन कर बोलना चाहिये। अच्छे वक्ता हमेशा वही कहलाते हैं जो अपनी बात निर्बाध रूप से कहते हैं तो श्रोता भी उनकी सुनते हैं। गालियों का उपयोग वार्तालाप का ने केवल सौंदर्य समाप्त करता है वरन उसे निष्प्रभावी बना देता है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Sunday, March 2, 2014

रहीम दर्शन-अपनी सच्चाई के साथ जीना चाहिए(rahim darshan-apne sachchai sa sath jeena chahiye)



      आधुनिक युग में मनुष्य की जीवन को न केवल अस्थिर किया है बल्कि उसकी मानसिकता को भी अन्मयस्क कर दिया है। लोग अपने खानपान, रहनसहन तथा विचारों को लेकर इतने अस्थिर तथा अन्मयस्क हो गये हैं कि उन्हें यह समझ में ही नहीं आता कि क्या रें या क्या न करें? इसलिये प्रकृत्ति से दूर हटकर जीवन जी रहे लोगों को दैहिक तथा मानसिक रोग घेर लेते हैं।
      अपने लिये उत्कृष्ट रोजगार की लालसा में शहर और प्रदेश ही नहीं लोग देश भी छोड़ने को तैयार है। हम अक्सर यह शिकायत करते हैं कि हमारे यहां से प्रतिभाशाली लोग पलायन कर विदेश चले जाते हैं।  हम यह भी देख रहे हैं कि अनेक लोगों ने विदेश में जाकर भारी सम्मान पाया है। वैसे भी कहा जाता है कि अपने व्यक्तिगत विकास के लिये मूल स्थान से बिछड़ना ही पड़ता है। हालांकि अपने मूल शहर, प्रदेश अथवा देश को छोड़कर गये लोगों के हृदय में कहीं न कहीं इस बात का अफसोस होता है कि उन्हें अपने जन्मस्थान से दूर जाना पड़ा। यह स्वाभाविक भी है क्योंकि आप अपने मूल स्थान से जाकर कितना भी विकास करें आपको अपने कार्यस्थल पर बाहरी ही माना जाता है।  उसी तरह मूल स्थान में रहने वाले लोग भी पराया मानने लगते हैं। कहा जाता है कि जो चूल के निकट है वही दिल के भी निकट है।

कविवर रहीम कहते हैं कि

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धनि रहीमगति मीन की, जल बिछुरत जिय जाय।

जिअत कंज तलि अनत बसि, कहा भौंर को भाय।।

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-मछली का जीवन धन्य है जो जल से बिछड़ते ही जीवन त्याग देती है। कमल अगर कीचड़ से प्रथक कहीं दूसरे स्थान पर जीना चाहता है तो भौंरे को उसकी यह बात पसंद नहीं आती।

      एक बात निश्चित है कि मनुष्य अगर संतोषी भाव का हो तो वह  अपने मूल स्थान पर ही बना रहता है यह अलग बात है कि उसे तब वह शनैः शनैः ही विकास की धारा में शामिल हो पाता है। भौतिक विकास को धन्य मानने वाले अपने जीवन का अर्थ तथा प्रकृति को नहीं समझते।  मनुष्य में कमाने वाले को उसके निकटस्थ  लोगों का दिमागी रूप से सम्मान मिलता है पर त्याग करने वाले को पूरा समाज हार्दिक प्रेम करता है।  इस संसार में हर जीव अपना पेट भर लेता है और कोई मनुष्य अगर पेट से ज्यादा कमाकर धन जमा करता है तो कोई तीर नहीं मार  लेता।  मनुष्य की पहचान कमजोर पर परोपकार और बेबस पर दया करने से ही होती है। अगर मनुष्य इन गुणों से हटकर अगर स्वार्थी जीवन जाता है तो उसे यह समझ लेना चाहिये कि उसे हार्दिक सम्मान कभी नहीं मिल सकता है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Sunday, February 23, 2014

पद और पैसे के मद से बचना कठिन-हिंदू चिन्तन लेख -pad aur paise ke mad se bachna kathin-hindu chinntan lekh)



      हमारे अध्यात्मिक महापुरुषों की शिक्षा को भले ही प्राचीन मानकर भुला दिया गया हो पर वह उसके सूत्र आज भी प्रासंगिक है।  हम नये वातावरण में नये सूत्र ढूंढते हैं पर इस बात को भूल जाते हैं प्रकृत्ति तथा जीव का मूल जीवन जिन तत्वों पर आधारित है वह कभी बदल नहीं सकते। हमने सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक तथा धार्मिक स्तर पर अनेक परिवर्तन देखे हैं और कहते हैं कि संसार बदल गया है।  अध्यात्मिक ज्ञान साधक ऐसा भ्रम कभी नहीं पालते। उन्हें पता होता है कि आजकल आधुनिकता के नाम पर पाखंड बढ़ गया है। स्थिति यह हो गयी है कि आर्थिक, राजनीतिक साहित्यक, धार्मिक, सामाजिक तथा कला संस्थाओं में ऐसे लोग शिखर पुरुष स्थापित हो गये हैं जो समाज के सामान्य मनुष्य को भेड़ों की तरह समझकर उनको अपना अहंकार दिखाते हैं।  ऐसे लोग बात तो समाज  के हित की करते हैं पर उनका मुख्य लक्ष्य अपने लिये पद, पैसा तथा प्रतिष्ठा जुटाना  होता है। स्थिति यह है कि मजदूर, गरीब तथा बेबस को भगवान मानकर उसकी सेवा का बीड़ा उठाते हैं और उनका यही पाखंड उन्हें शिखर पर भी पहुंचा देता है।  एक बार वहां पहुंचने के बाद ऐसे लोग अहंकारी हो जाते हैं। फिर तो वह अपने से छोटे लोगों से सम्मान करवाने के लिये कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं।
संत कबीर कहते हैं कि

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जग में भक्त कहावई, चुकट चून नहिं देय।

सिष जोरू का ह्वै रहा, नाम गुरु का लेय।।

     सामान्य हिन्दी भाषा में भावार्थ-कुछ मनुष्य संसार में भला तो  दिखना चाहते हैं पर वह किसी थोड़ा चूना भी नहीं देसकते।  ऐसे लोगों के मस्तिष्क में तो परिवार के हित का ही भाव रहता पर अपने मुख से केवल परमात्मा का नाम लेते रहते हैं।

विद्यामद अरु गुनहूं मद, राजमद्द उनमद्द।

इतने मद कौ रद करै, लब पावे अनहद्द

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-विद्या के साथ  गुण का अहंकार तथा राजमद मनुष्य के अंदर उन्माद पैदा कर देता है।  इस तरह के मद से मुक्त होकर ही परमात्मा का मार्ग मिल सकता है।

      अनेक बुद्धिमान  यह देखकर दुःखी होते हैं कि पहले समाज का भले करने का वादा तथा दावा कर शिखर पर पहुंचने के बाद लोग उसे भूल जाते हैं। इतना ही नहीं समाज के सामान्य लोगों की दम पर पहुंचे ऐसे लोग विकट अहंकार भी दिखाते हैं।  ज्ञान साधकों के लिये यह दुःख विषय नहीं होता। पद, पैसे और प्रतिष्ठा के शिखर पर पहुंचा व्यक्ति उन्मादी हो ही जायगा यह वह जानते हैं। ऐसे विरले ही होते हैं जिनको यह अहंकार नहीं आता।  जिनको अर्थ, राजनीति, समाजसेवा, धर्म तथा कला के क्षेत्र में पहली बार शिखर मिलता है तो उनके भ्रम का तो कोई अंत नहीं होता। उन्हें लगता है कि उनका पद तो उनके जन्म के साथ ही जमीन पर आया था। उनमें यह विचार तक नहीं आता कि जिस पद पर वह आज आयें हैं उस पर पहले कोई दूसरा बैठा था।  ऐसे लोग समाज सेवा और भगवान भक्ति का जमकर पाखंड करते हैं पर उनका लक्ष्य केवल अपने लिये पद, पैसा और प्रतिष्ठा जुटाना ही होता है।
      सामान्य लोगों को यह बात समझ लेना चाहिये कि उनके लिये दाल रोटी खाओ, प्रभु के गुण गाओजैसी नीति का पालन करने के  अलावा कोई अन्य मार्ग नहीं होता। उन्हें पाखंडियों पर अपनी दृष्टि रखने और उन पर चर्चा कर अपना समय बर्बाद करने से बचना चाहिये।



दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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