Saturday, February 15, 2014

संत चरण दास दर्शन-संसार में सुख पाने के लिये बेपरवाह रहें(sansar mein sukh pane ke liye beparvah rahe-sant charandas darshan)



      इस संसार की माया की महिमा भी विचित्र है। जिसके पास धन कम है वह उसे पाने के लिये भटकता हुआ तकलीफ उठाता है तो जो धनवान है भी अधिक धन के लिये जूझता दिखता है।  माया के इस खेल में मनुष्य यह तय नहीं कर पाता कि उसे चाहिए क्या?  इस संसार में सबसे सरल काम है धन कमाने में लगे रहना।  अनेक लोग शासकीय सेवा से निवृत होने के बाद भी दूसरी जगह जाकर कमाना चाहते हैं भले ही उनका काम पेंशन से चल सकता है।  सच बात तो यह है कि अध्यात्मिक संस्कार और ज्ञान बचपन से नहीं मिले तो बड़ी आयु में सत्संग या भगवान भजन की प्रवृत्ति जाग ही नहीं सकती।  यही कारण है कि बड़ी आयु में भी मनुष्य सांसरिक विषयों में लिप्त रहकर समय काटना चाहता है।  यह अलग बात है कि प्रकृति तथा सामाजिक नियमों में चलते सांसरिक विषय उसे स्वतः छोड़ने लगते हैं तब अध्यात्मिक ज्ञान तथा संस्कारों से रहित मनुष्य चिढ़चिढ़ा हो जाता है।

संत चरणदास कहते हैं कि

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काहू से नहि राखिये, काहू विधि की चाह।

परम संतोषी हूजिये, रहिये बेपरवाह।।

        सामान्य हिन्दी में भावार्थ-किसी भी अन्य मनुष्य से किसी प्रकार की चाहत नहीं करना ही चाहिए।  अपने अंदर संतोष का भाव पालकर बेपरवाह मनुष्य ही इस संसार में सुखी रह सकता है।

चाह जगत की दास है, हरि अपना न करै।

चरनदासयों कहत हैं, व्याधा नाहि टरै।।

      सामान्य हिन्दी मे भावार्थ-मनुष्य के अंदर विचर रही इच्छायें उसे संसार का दास बना देती हैं और वह परमात्मा से दूर हो जाता है। इच्छायें पालने वाला मनुष्य हमेशा ही संकट में घिरा रहता है।

      हमारे यहां स्वतंत्रता का मतलब केवल भौतिक क्रियाओं में अपनायी  जाने वाली स्वैच्छिक प्रवृत्ति से है। कभी कोई नया रचनात्मक विचार करने की बजाय दूसरे के निर्मित पथ पर आगे बढ़ना सहज लगता है पर इससे मस्तिष्क में व्याप्त दासता के भाव का ही बोध होता है। जो जग कर रहा है वही हम कर रहे हैं तो फिर हमारे काम में नयापन क्या है? यह विचार करना ही मनुष्य को डरा देता है।  माया और विषयों का दास मनुष्य संपत्ति संग्रह के बाद भी प्रसन्न नहीं रह पाता।
      अतः जिन लोगों को प्रसन्नता चाहिये उन्हें अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति से अधिक संचय करने की प्रवृत्ति से बचना चाहिये। जीवन में सुख प्राप्त करने का सबसे अच्छा उपाय यही है कि माया के अधिक प्रभाव से बचते हुए लापरवाह हुआ जाये।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

यह ब्लाग/पत्रिका विश्व में आठवीं वरीयता प्राप्त ब्लाग पत्रिका ‘अनंत शब्दयोग’ का सहयोगी ब्लाग/पत्रिका है। ‘अनंत शब्दयोग’ को यह वरीयता 12 जुलाई 2009 को प्राप्त हुई थी। किसी हिंदी ब्लाग को इतनी गौरवपूर्ण उपलब्धि पहली बार मिली थी। ------------------------

Saturday, February 1, 2014

पैसा, पद और प्रतिष्ठा पाकर मद आ ही जाता है-हिंदू आध्यात्मिक चिंत्तन लेख (paisa, pad aur pratishtha paakar sabhi ko mad aa hee jaataa hai-hindu adhyatmik chinntan)



            हमारे देश में लोकतांत्रिक राज्य प्रणाली है जिसमें आमजनों के मत से चुने गये प्रतिनिधि राज्य कर्म पर नियंत्रण करते हैं।  इन्हें राजा या बादशाह अवश्य नहीं कहा जाता पर उनका काम उसी तरह का होता है। पदों के नाम अलग अलग होते हैं पर उन्हें राज्य कर्म में लगी व्यवस्था पर नियंत्रण का अधिकार प्राप्त होता है। पहले राजा की जिम्मेदारी होती थी कि वह प्रजा का पालन करे और वह इस जिम्मेदारी का अपनी योग्यता के अनुसार निभाते भी थे। उनमें कुछ योग्य थे तो कुछ आयोग्य। बहरहाल कम से कम उन पर प्रजा हित की प्रत्यक्ष जिम्मेदारी होती थी।
            लोकतांत्रिक प्रणाली में जनप्रतिनिधि के पास कोई प्रत्यक्ष काम करने का दायित्व नहीं होता वरन् संविधान के अनुसार राज्य व्यवस्था के लिये संस्थायें होती हैं जिनकी वह केवल देखभाल करता है। एक तो उस पर प्रजा हित का प्रत्यक्ष दायित्व नहीं होता दूसरे उनके पद पर कार्य करने की अवधि निश्चित होती है। उसके पूर्ण होने पर उनको फिर प्रजा के समक्ष जाना होता है।  जिन लोगों को राज्य कर्म में उच्च पद पर प्रतिष्ठित होना है उन्हें लोकतंत्र में जनमानस में अपनी छवि बनाये रखने के लिये तमाम तरह के स्वांग करने ही होते हैं। इससे प्रचार माध्यम उन्हें अपनी यहां स्थान देकर अपना व्यवसाय चलाने के लिये विज्ञापन भी जुटाते हैं। जनमानस में छवि बनाये रखने के प्रयास और जल कल्याण के लिये प्रत्यक्ष कार्य न करने की सुविधा का जो अच्छी तरह लाभ उठाये वही सर्वाधिक लोकप्रिय होता है। इस लोकतांत्रिक प्रणाली में  अगर जनहित का काम न हो या भ्रष्टाचार का प्रकरण हो तो दूसरे पर दोष डालना और अगर अच्छा हो जाये तो अपनी वाहवाही करना राज्य कर्म में उच्च पदों पर कार्यरत लोगों को सुविधाजनक लगता है।
            राज्य कर्म में लगे लोगों की प्रवृत्ति राजसी होती है।  जिसमें लोभ, क्रोध,  और अहंकार के साथ ही पद बचाये रखने का मोह और कामना गुण स्वयमेव उत्पन्न होते हैं।  हमारे यहां लोकतंत्र में आस्था रखने वाले राज्यकर्म में लोगों से सात्विक व्यवहार की आशा व्यर्थ ही करते हैं।  जिनके पास कोई राज्य कर्म करने के लिये नहीं है वह सात्विकता से यह काम करने का दावा करते है। जिनके पास है वह भी स्वयं को सात्विक प्रवृत्ति का साबित करने में लगे रहने हैं। इस तरह स्वांग लोकतंत्र में करना ही पड़ता है।  यह नहीं है कि राज्यकर्म में सात्विक लोग आते नहीं है पर वह ज्यादा समय तक अपना वास्तविक भाव नहीं बनाये रख पाते या फिर हट जाते हैं।

विदुर नीति में कहा गया है कि

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ऐश्वमदयापिष्ठा सदाः पानामदादयः।

ऐश्वर्यमदत्तो हि नापतित्वा विबुध्यते।।

            हिन्दी में भावार्थ-वैसे तो मादक पदार्थ के सेवन में नशा होता है पर उससे ज्यादा बुरा नशा वैभव का होता है। पद, पैसे तथा प्रतिष्ठा प्राप्त व्यक्ति भ्रष्ट हुए बिना नहीं रहता।

            अभी हाल ही में एक राज्य की विधानसभा के चुनावों में आम इंसानों को राजकीय कर्म में भागीदारी दिलाने का एक उच्च स्तरीय नाटक खेला गया। इस तरह के नाटक लोकतंत्र में जनमानस में अपनी छवि बनाने के लिये अत्यंत आवश्यक होते हैं इसलिये इन्हें गलत मानना भी नहीं चाहिये।  एक दल के लोगों को आमजन का प्रतीक माना गया। इस दल के लोगों ने चुनाव प्रचार के दौरान सत्ता में आने पर राजकीय भवन तथा वाहन न लेने की घोषणा की। दल अल्पमत में था और विधानसभा में अपना बहुमत साबित करना था।  उससे पूर्व तक इसके लोगों ने परिवहन के लिये आमजनों की सार्वजनिक सुविधाओं का उपयोग किया।  ऐसा प्रचार हुआ कि यह लोग आमजन के वास्तविक हितैषी है।  यह प्रचार  दूसरे दलों पर समर्थन देने के लिये दबाव बनाने के रूप में किया गया।  बहुमत मिला तो अगले दिन ही सभी का रूप बदल गया।  जिन प्रचार माध्यमों ने इनकी धवल छवि का प्रचार किया वही अब नाखुश दिख रहे हैं।
            हो सकता है कि इससे कुछ आम बुद्धिजीवी निराश हों पर ज्ञान साधकों के लिये इसमें कुछ नया नहीं है। राजसी कर्म की यही प्रवृत्ति है।  सच बात तो यह है कि जो राजसी कर्म श्रेष्ठता से संपन्न  करता है उसे उसका फल भी मिलता है। दूसरी बात यह कि राजसी कर्म हमेशा ही फल की कामना से किये भी जाते हैं। सात्विक प्रकृत्ति के लोग कभी भी राज्य कर्म करने का प्रयास नहीं करते इसका मतलब यह नही है कि वह राजसी कर्म करते ही नहीं है। राजसी प्रकृत्ति का राज्य कर्म एक हिस्सा भर है।  व्यापार, कला या साहित्य में भौतिक फल की कामना करना भी राजसी प्रकृत्ति का ही है।  सात्विक प्रकृत्ति के लोग अपनी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति की सीमा तक इनमें लिप्त रहते भी हैं पर वह कभी इस तरह का दावा नहीं करते कि निस्वार्थ भाव से व्यापार कर रहे हैं।
            कहने का अभिप्राय यह है कि प्रचार माध्यमों में लोकतंत्र के चलते अनेक प्रकार के नाटकीय दृश्य देखने को मिलते हैं।  एक तरह से यह दृश्य जीवंत फिल्मों की तरह होते हैं जिनमें अभिनय करने वाले स्वयं को सात्विक प्रकृत्ति का दिखाने का प्रयास करते हैं। ज्ञान साधकों को उनके अभिनय का अनुमान होता है पर आमजन अपना हृदय इन दृश्यों और पात्रों में लगा बैठते हैं जो कि बाद में उन्हें निराश करते हैं।  भारतीय अध्यात्म दर्शन के राजसी कर्म में लोगों का इस तरह कार्य करना और फल लेना कोई आश्चर्य की बात नही होती। राजसी कर्म करने वाले बुरे नहीं होते पर उनके सात्विक दावों पर कभी यकीन नहीं करना चाहिए।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


Saturday, January 25, 2014

भर्तृहरि नीति शतक-मनस्वी पुरुष कभी परेशान नहीं होते (bhartrihari neeti shatak-manswi purush kabhee pareshan nahin hote)



      इस संसार में दो प्रकार के लोग होते हैं-एक भोगी तथा दूसरे योगी। भोगी लोग जीवन में विषयों में लिप्तता को ही सर्वोपरि मानते हैं। भोगी  लोगउपभोग के सामानों का संग्रह ही अपना लक्ष्य मानते हुए अपना जीवन उन्हीं को समर्पित कर देते हैं जबकि योगी लोग भौतिक सामानों का जीवन में आनंद उठाने का साधन मानकर समाज के लिये आदर्श स्थितियों का निर्माण करने में लगे रहते हैं। ज्ञानियों की दृष्टि में बिना सामानों के भी जीवन में उठाया जा सकता है। उल्टे अधिक सामानों का संग्रह चिंता तथा तनाव का कारण होता है। कुछ लोग स्वादिष्ट भोजन के चक्कर में अनेक प्रकार स्वांग रचते हैं जबकि योगी तथा ज्ञानी भोजन को देह पालने की दृष्टि से दवा के रूप में ग्रहण करते हैं। 
भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि

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क्वचित् पृथ्वीशय्यः क्वचिदपि च पर्वङ्कशयनः क्वच्छिाकाहारः क्वचिदपि च शाल्योदनरुचिः।

क्वचित्कन्धाधारी क्वचिदपि च दिव्याभवरधरोः मनस्वी कार्यार्थी न गपयति दुःखः न च सुखम्।।

     हिन्दी में भावार्थ-कभी प्रथ्वी पर सोना पड़े कभी पलंग पर मखमली बिछोने पर शयन का सौभाग्य मिले, कभी बढ़िया तो कभी सादा खाना मिले, जिनकी रुचि अपने लक्ष्य में रहती है वह कभी इन बातों की परवाह नहीं करते।  मनस्वी पुरुष दुःख सुख की चिंता में न पड़कर कभी सामान्य तो कभी दिव्य वस्त्र पहनकर  अपने जीवन मार्ग पर दृढ़ता पूर्वक बढ़ते हुए दूसरों के सामने अपना आदर्श प्रस्तुत करते हैं।
      सच बात तो यह है कि उपभोग की प्रवृत्ति मनुष्य को कायर बना देती है। वह किसी बड़े सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक अथवा सांस्कृतिक अभियान में लंबे समय तक सक्रिय नहीं रह पाता। इतना ही अधिक उपभोग मानसिक, वैचारिक तथा अध्यात्मिक से कमजोर भी बनाता है। हम इसे अपने देश में अनेक सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक तथा साहित्यक अभियानों का नेतृत्व करने वाले कथित  शीर्ष पुरुषों की क्षीण वैचारिक, मानसिक तथा अध्यात्मिक स्थिति को देखकर समझ सकते है। यह सभी कथित शीर्ष पुरुष बातें बड़ी बड़ी करते हैं पर किसी का अभियान लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाता।  इसका कारण यह है कि जिनका जीवन सुविधाओं के साथ व्यतीत होता है वह अपने कथित अभियानों की वजह से लोकप्रियता भले ही प्राप्त कर लें पर उनमें इतनी क्षमता नहीं होती कि वह अपने सिद्धांतों या वादों को धरातल पर उतार सकें।  इसके लिये जिस त्याग भाव की आवश्यकता होती है वह केवल उन्हीं लोगों में हो सकता है जो सुविधायें मिलने की परवाह न करते हुए मनस्वी हो जाते हैं। 

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday, January 18, 2014

संत कबीर दर्शन के आधार पर चिंत्तन लेख-पेशेवर गुरुओं का ज्ञान लोग धारण नहीं कर पाते (peshewar guruon ka gyan log dharan nahin kar pate-hindi thought article on sant kabir darshan)



            हमारे देश में प्रचलित अध्यात्मिक धारा के अनुसार  जिस तरह साकार और निराकार दोनों ही प्रकार की पूजा पद्धतियों को सहज मान्यता प्राप्त है वह विश्व में किसी अन्यत्र विचाराधारा में नहीं है। इसका लाभ यह होता है कि समाज में कभी पूजा पद्धति को लेकर आपस वैमनस्य नहीं फैलता पर इससे हानि यह हुई कि साकार और सकाम भक्ति की आड़ में हमारे यह व्यवसायिक धार्मिक गुरुओं का प्रभाव इस तरह कायम हो गया कि तत्वज्ञान एक अगेय विषय बन गया। इसकी चर्चा सभी करते हैं पर ग्रहण करने का सामार्थ्य बहुत कम लोगों में होता है। 
            सामान्य मनुष्य बहिर्मुखी होता है और इंद्रियों का भी यह स्वभाव होता है कि वह बाहर के विषयों की तरफ आकर्षित होती हैं।  यही कारण है कि आकर्षक आश्रम, मनोरंजन की दृष्टि से कथायें कहने वाले गुरु तथा सांसरिक फल जल्दी दिलाने के लिये प्रसिद्ध धार्मिक स्थान समाज में सदैव लोकप्रिय रहे हैं।  यह कोई आजकल की बात नहीं वरन् कबीर के समय से ही इस तरह का प्रचलन  रहा है इसलिये उन्होंने  व्यास पीठ पर बैठकर कथा करने वालों की तरफ स्पष्ट ऐसा संकेत दिया जिनसे मन में मनोरंजन का भाव तो आ सकता है पर तत्वज्ञान धारण करना कठिन होता है।  यह सभी को पता है कि कथा के सार्वजनिक प्रदर्शन में लगे लोग धन लेते हैं। उनका कथा करना तथा पैसे लेना कोई बुरा काम नहीं  पर उसका अध्यात्मिक ज्ञान की दृष्टि से कितना महत्व है यह भी समझा जाना चाहिये।
संत कबीर दास कहते हैं कि
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कबीर व्यास कथा कहैं, भीतर भेदे नाहिं।
औरों कूं परमोधर्ता, गये मुहर का माहिं।।
            सामान्य हिन्दी में भावार्थ-व्यास पीठ  पर बैठकर कुछ विद्वान कथा करते हैं पर उनकी बातें श्रोताओं का हृदय भेदकर अंदर नहीं जातीं। ऐसे विद्वान दूसरों का उद्धार क्या करेंगे स्वयं ही पैसे की लालच में आकर यह कथा का व्यवसाय अपनाते हैं।
कबीर कहहिं पीर को, समझावै सब कोय।
संसय पड़ेगा आपकूं, और कहें का होय।।
            सामान्य हिन्दी में भावार्थ-दूसरों की पीड़ा को देखकर उनके हरण का उपाय अनेक समझाते हैं पर स्वयं अपनी समस्याओं के हल को लेकर वह स्वयं ही सशंकित रहते हैं।  जिन्होंने ज्ञान का रटा लगाया है पर धारण नहीं किया वही दूसरों को ज्ञान बांटते हैं।
            इस देश में अनेक लोगों ने धार्मिक प्रवचन करते करते इतना धन कमा लिया है कि अनेक उद्योगपति तथा व्यवसायी भी उन जैसी समृद्धि प्राप्त नहीं कर पाते हैं।  देखा जाये तो भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान के नाम पर जितना व्यवसाय होता है उतना शायद ही किसी अन्य विषय या वस्तु का होता हो।  कुछ विद्वान कहते हैं कि भारतीय अध्यात्मिक दर्शन से संबंधित ग्रंथों में  कि भारतीय वेदों में अस्सी फीसदी सकाम तथा बीस फीसदी वाक्य निष्काम भक्ति से सबंधित है। दूसरी बात यह भी त्यागी को बड़ा माना गया है भोगी को नहीं।  मजे की बात यह है कि जो लोग सकाम भक्ति के मंच पर होते हैं वही निष्काम रहने का उपदेश देते हैं।  निराकार की बात करते करते साकार भक्ति की बात करने लगते हैं।  इतना ही नहीं भोग की सामग्री का संचय करने वाले ही अपने शिष्यों को त्याग कर धर्म निर्वाह करने का संदेश देते हैं।  दान के नाम अपनी कथाओं का दाम लेकर अपने शिष्यों को  धन्य करते हैं।
            इन व्यवसायिक कथाकारों पर किसी प्रकार की दोषदृष्टि रखना व्यर्थ है क्योंकि अपनी समस्याओं से परेशान लोगों के मन को को यह कुछ समय तक उसे संसारिक विषयों से परे रख थोड़ी राहत अवश्य देते हैं। हमारे कहने का अभिप्राय तो यह है कि मन में स्थाई रूप से शांति रहे उसके लिये योग तथा ज्ञान की साधना करते रहना चाहिये।



दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


Wednesday, January 8, 2014

प्रजा हित केवल स्वस्थ व्यक्ति ही कर सकता है-हिंदी धार्मिक चिन्तन (prajahit kewal swawsth hi kar sakta hai-hindi dharmik chinntan)



                        हमारे दर्शन के अनुसार पूर्णतः स्वस्थ होने पर ही किसी मनुष्य को राजसी कर्म करना चाहिये। ऐसे में जिन लोगों पर राज्य का भार है उनको प्रजा हित के लिये अधिक ही परिश्रम करना होता है इसलिये उनका पूर्णतः स्वस्थ होना आवश्यक है।  आधुनिक लोकतंत्र ने पूरे विश्व में राज्य व्यवस्थाओं में इस नीति का पालन नहीं किया जा रहा है। आज तो सभी देशों में यही देखा जाता है कि चुनाव में कौन जीत सकता है? चुनाव जीतने की योग्यता और क्षमता ही राज्यपद पाने का एक आधार बन गयी है।  ऐसे में अनेक देशों के राज्य प्रमुख शासन में आने के बाद जनता में अपनी लोकप्रियता खो देते हैं। दूसरी बात यह भी है कि पद की अवधि पांच या छह साल होती है उसमें राज्य पद पर प्रतिष्ठित होने पर व्यक्ति की चिंतायें प्रजा हित से अधिक अपने चुनाव के लिये चंदा देने वालों का उधार चुकाने या फिर अगले चुनाव में फिर अपना पद बरबकरार रहने की होती है।  कुछ समय विपक्षियों का सामना करने तो बाकी समय जनता के सामने नये वादे करते रहने में लग जाता है।
                        अनेक देशों के राज्य प्रमुख शारीरिक, मानसिक तथा वैचारिक दृष्टि से अस्वस्थ होने के बावजूद सत्ता रस पीते रहते हैं। राज्य के अधिकारी भी अपनी नौकरी चलाते हुए केवल राज्य प्रमुख की कुर्सी बचाये रखने में अपना हित समझते हैं। विश्व प्रसिद्ध चिंत्तक कार्लमार्क्स ने अपने पूंजी नामक पुस्तक में इन पूंजीपतियों के हाथ लग चुकी व्यवस्थाओं की चर्चा बहुत की है।  यह अलग बात है कि उसके अनुयायियों ने भी अपने शासित राष्ट्रों में शारीरिक, मानसिक तथा वैचारिक दृष्टि से बीमार लोगों को उच्च पदों पर बैठाये रखा और बेबस जनता तानाशाही की वजह से उनको ढोती रही।  वामपंथी व्यवस्था में बौद्धिकों को वैचारिक मध्यस्थ बन कर मजे लूटने की सुविधा मिलती है इसलिये वह जनहित की बातें बहुत करते हैं पर अपने शिखर पुरुषों की शारीरिक, मानसिक तथा वैचारिक अस्वस्थता को निजी विषय बताते हैं।  मजे की बात यही है कि यही वामपंथी बौद्धिक मध्यस्था मनुस्मृति का जमकर विरोध करते हैं।
मनुस्मृति में कहा गया है कि

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अमात्यंमुख्यं धर्मज्ञं प्राज्ञं दान्तं कुलोद्भवम्।

स्थापयेदासने तस्मिन् खिन्नः कार्येक्षणे नृणाम्।।

                        हिन्दी में भावार्थ-जब राज्य प्रमुख अपने खराब स्वास्थ्य की वजह से प्रजाहित के कार्यों का निरीक्षण करने में असमर्थ हो तब उसे अपना कार्यभार किसी बुद्धिमान, जितेन्द्रिय, सभ्य तथा शिष्ट पुरुष को सौंप देना चाहिये।

विक्रोशन्त्यो यस्य राष्ट्राद्धियन्ते दस्युभिः प्रजाः।

सम्पतश्यतः सभृत्यस्य मृतः स न तु जीवति।।

                        हिन्दी में भावार्थ-उस राजा या राज्य प्रमुख को जीवित रहते हुए भी मृत समझना चाहिये जिसके अधिकारियों के सामने ही डाकुओं से लूटी जाती प्रजा हाहाकर मदद मांगती है पर वह उसे बचाते ही नहंी है।
                        सामान्य सिद्धांत तो यही है कि अस्वथ्यता की स्थिति में राज्य प्रमुख किसी गुणी आदमी को अपना पदभार सौप दे पर होता यह है कि वामपंथी विचारक शिखर पर बैठे पुरुष को अपने अनुकूल पाते हैं तो वह उसकी जगह किसी दूसरे को स्वीकार नहंी करते। दूसरी बात यह है कि आजकल के राज्य प्रमुखों में इतनी मानवीय चतुराई तो होती है कि वह अपने बाद के दावेदारों को आपस में लड़ाये रखते है ताकि कोई उसकी जगह कोई दूसरा नहीं ले सके। अनेक जगह तो राज्य प्रमुख इस तरह की व्यवस्था कर देते हैं कि उनके बाद उनके परिवार के सदस्यों को ही जगह मिले। वामपंथियों के सबसे बड़े गढ़ चीन में भी अब शासन में परिवारवाद आ गया है।  वामपंथियों ने शायद इसलिये ही हमेशा मनुस्मृति का विरोध किया है ताकि उसकी सच्चाई से आम लोग अवगत न हों और उनका छद्म समाज सुधार का अभियान चलता रहे।
                        हम आजकल पूरी विश्व अर्थव्यवस्था चरमराने की बात करते हैं। उसका मुख्य कारण यही है कि अनेक महत्वपूर्ण देशों का शासन पुराने राजनीतिक सिद्धांतों की अनदेखी कर चलाया जा रहा है। स्थिति यह है कि तानाशाही व्यवस्था हो या लोकतांत्रिक सत्य कहने का अर्थ अपने लिये शत्रुओं का निर्माण करना होता है। अपनी आलोचना सहन करने के लिये पर्याप्त प्राणशक्ति बहुत कम लोगों में रह गयी है। इसका मुख्य कारण शारीरिक, मानसिक तथा वैचारिक अस्वस्थता ही है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


Saturday, January 4, 2014

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-शुभ लक्षणों वाले व्यक्ति से ही संपर्क करें(kautilya ka arthshastra-shubh lakshanon wale vyakti se hi sampark karen)



                        सांसरिक जीवन में उतार चढ़ाव आते ही रहते हैं। हम जब पैदल मार्ग पर चलते हैं तब कहीं सड़क अत्यंत सपाट होती है तो कहीं गड्ढे होते हैं। कहीं घास आती है तो कहंी पत्थर पांव के लिये संकट पैदा करते हैं।  हमारा जीवन भी इस तरह का है। अगर अपने प्राचीन ग्रंथों का हम निरंतर अभ्यास करते रहें तो मानसिक रूप से परिपक्वता आती है। इस संसार में सदैव कोई विषय अपने अनुकूल नहीं होता। इतना अवश्य है कि हम अगर अध्यात्मिक रूप से दृढ़ हैं तो उन विषयों के प्रतिकूल होने पर सहजता से अपने अनुकूल बना सकते हैं या फिर ऐसा होने तक हम अपने प्रयास जारी रख सकते हैं।  दूसरी बात यह भी है कि प्रकृति के अनुसार हर काम के पूरे होने का एक निश्चित समय होता है।  अज्ञानी मनुष्य उतावले रहते हैं और वह अपने काम को अपने अनुकूल समय पर पूरा करने के लिये तंत्र मंत्र तथा अनुष्ठानो के चक्कर पड़ जाते हैं।  यही कारण है कि हमारे देश में धर्म के नाम पर अनेक प्रकार के पाखंडी सिद्ध बन गये हैं। ऐसे कथित सिद्धों की संगत मनुष्य को डरपोक तथा लालची बना देती है जो कथित दैवीय प्रकोप के भय से ग्रसित रहते हैं।  इतना ही नहीं इन तांत्रिकों के चक्कर में आदमी इतना अज्ञानी हो जाता है कि वह तंत्र मंत्र तथा अनुष्ठान को अपना स्वाभाविक कर्म मानकर करता है।  उसके अंदर धर्म और अधर्म की पहचान ही नहीं रहती।
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया है कि

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अपां प्रवाहो गांङ्गो वा समुद्रं प्राप्य तद्रसः।

भवत्यपेयस्तद्विद्वान्न्श्रयेदशुभात्कम्।।

                        हिन्दी में भावार्थ-गंगाजल जब समुद्र में मिलता है तो वह पीने योग्य नहीं रह जाता। ज्ञानी को चाहिये कि वह अशुभ लक्षणों वाले लोगों का आश्रय न ले अन्यथा उसकी स्थिति भी समुद्र में मिले गंगाजल की तरह हो जायेगी।

किल्श्यन्नाप हि मेघावी शुद्ध जीवनमाचरेत्।

तेनेह श्लाध्यतामेति लोकेश्चयश्चन हीयते।।

                        हिन्दी में भावार्थ-बुद्धिमान को चाहे क्लेश में भी रहे पर अपना जीवन शुद्ध रखे इससे उसकी प्रशंसा होती है। लोकों में अपयश नहीं होता।
                        हमारे देश में अनेक ज्ञानी अपनी दुकान लगाये बैठे हैं। यह ज्ञानी चुटकुलों और कहानियों के सहारे भीड़ जुटाकर कमाई करते हैं। इतना ही नहीं उस धन से न केवल अपने लिये राजमहलनुमा आश्रम बनाते हैं बल्कि दूसरों को अपने काम स्वयं करने की सलाह देने वाले ये गुरु अपने यहां सारे कामों के लिये कर्मचारी भी रखते हैं।  एक तरह से वह धर्म के नाम पर कपंनियां चलाते हैं यह अलग बात है कि उन्हें धर्म की आड़ में अनेक प्रकार की कर रियायत मिलती है।  मूल बात यह है कि हमें अध्यात्मिक ज्ञान के लिये स्वयं पर ही निर्भर होना चाहिये। दूसरी बात यह भी है कि ज्ञान होना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि उसे धारण भी करना चाहिये।  यही बुद्धिमानी की निशानी है। बुद्धिमान व्यक्ति तनाव का समय होने पर भी अपनी मर्यादा नहीं छोड़ता।  यही कारण है कि बुरा समय निकल जाने के बाद वह प्रतिष्ठा प्राप्त करता है।  लोग उसके पराक्रम, प्रयास तथा प्रतिबद्धता देखकर उसकी प्रशंसा करते हैं।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


Wednesday, December 25, 2013

भर्तृहरि नीति शतक-लोग अपने कर्म को लेकर संशय में ही रहते हैं(bhartrihari neeti shatka-log apne karma ko lekar sanshya mein hi rahate hain)



                        ऐसे विरले लोग ही रहते हैं जो जीवन में एकरसता से ऊबते नहीं है वरना तो सभी यह सोचकर परेशान इधर से उधर घूमते हैं कि वह किस तरह अपना जीवन सार्थक करें। धनी सोचता है कि निर्धन सुखी है क्योंकि उसे अपना धन बचाने की चिंता नहीं है।  निर्धन अपने अल्पधन के अभाव को दूर करने के लिये संघर्ष करता हैं  जिनके पास धन है उनके पास रोग भी है जो उनकी पाचन क्रिया को ध्वस्त कर देते हैं। उनकी निद्रा का हरण हो जाता हैं। निर्धन स्वस्थ है पर उसे भी नींद के लिये चिंताओं का सहारा होता हैं। धनी अपने पांव पर चलने से लाचार है और निर्धन अपने पांवों पर चलते हुए मन ही मन कुढ़ता है। जिनके पास ज्ञान नहीं है वह सुख के लिये भटकते हैं और जिनके पास उसका खजाना है वह भी सोचते हैं कि उसका उपयोग कैसे हो? निर्धन सोचता है कि वह धन कहां से लाये तो धनी उसके खर्च करने के मार्ग ढूंढता है।
भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि

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तपस्यन्तः सन्तः किमधिनिवासमः सुरनदीं

गुणोदारान्दारानुत परिचरामः सविनयम्।

पिबामः शास्त्रौघानुत विविधकाव्यामृतरासान्

न विद्मः किं कुर्मः कतिपयनिमेषायुषि जने।।

            हिन्दी में भावार्थ-किसी तट पर जाकर तप करें या परिवार के साथ ही आनंदपूर्वक रहे या विद्वानों की संगत में रहकर ज्ञान साधना करे, ऐसे प्रश्न अनेक लोगों को इस नष्ट होने वाले जीवन में परेशान करते हैं। लोग सोचते हैं कि क्या करें या न करें।
            योग और ज्ञान साधकों के लिये यह विचित्र संसार हमेशा ही शोध का विषय रहा है पर सच यही है कि इसका न तो कोई आदि जानता है न अंत है।  सिद्ध लोग परमात्मा तथा संसार को अनंत कहकर चुप हो जाते है।  वही लोग इस संसार को आनंद से जीते हैं। प्रश्न यह है कि जीवन में आनंद कैसे प्राप्त किया जाये?
            इसका उत्तर यह है कि सुख या आनंद प्राप्त करने के भाव को ही त्याग दिया जाये। निष्काम कर्म ही इसका श्रेष्ठ उपाय है। पाने की इच्छा कभी सुख नहीं देती।  कोई वस्तु पाने का जब मोह मन में आये तब यह अनुभव करो कि उसके बिना भी तुम सुखी हो।  किसी से कोई वस्तु मुफ्त पाकर प्रसन्नता अनुभव करने की बजाय किसी को कुछ देकर अपने हृदय में अनुभव करो कि तुमने अच्छा काम किया।  इस संसार में पेट किसी का नहीं भरा। अभी खाना खाओ फिर थोड़ी देर बाद भूख लग आती है।  दिन में अनेक बार खाने पर भी अगले दिन पेट खाली लगता है। ज्ञान साधक रोटी को भूख शांत करने के लिये नहीं वरन् देह को चलाने वाली दवा की तरह खाते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि केवल एक रोटी खाई जाये तो पूरा दिन सहजता से गुजारा जा सकता है। कहने का अभिप्राय यह है कि जब हम अपने चंचल मन की प्रकृत्ति को समझ लेंगे तब जीवन सहज योग के पथ पर चल देंगे।  यह मन ही है जो इंसान को पशू की तरह इधर से उधर दौड़ाता है।


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


यह ब्लाग/पत्रिका विश्व में आठवीं वरीयता प्राप्त ब्लाग पत्रिका ‘अनंत शब्दयोग’ का सहयोगी ब्लाग/पत्रिका है। ‘अनंत शब्दयोग’ को यह वरीयता 12 जुलाई 2009 को प्राप्त हुई थी। किसी हिंदी ब्लाग को इतनी गौरवपूर्ण उपलब्धि पहली बार मिली थी। ------------------------

Sunday, December 22, 2013

भर्तृहरि नीति शतक-मन तो आदमी को इधर से उधर नचाता है(bhritharti neeti shatak-man to admi ko idhar se udhar nachata hai)



                        ऐसे विरले लोग ही रहते हैं जो जीवन में एकरसता से ऊबते नहीं है वरना तो सभी यह सोचकर परेशान इधर से उधर घूमते हैं कि वह किस तरह अपना जीवन सार्थक करें। धनी सोचता है कि निर्धन सुखी है क्योंकि उसे अपना धन बचाने की चिंता नहीं है।  निर्धन अपने अल्पधन के अभाव को दूर करने के लिये संघर्ष करता हैं  जिनके पास धन है उनके पास रोग भी है जो उनकी पाचन क्रिया को ध्वस्त कर देते हैं। उनकी निद्रा का हरण हो जाता हैं। निर्धन स्वस्थ है पर उसे भी नींद के लिये चिंताओं का सहारा होता हैं। धनी अपने पांव पर चलने से लाचार है और निर्धन अपने पांवों पर चलते हुए मन ही मन कुढ़ता है। जिनके पास ज्ञान नहीं है वह सुख के लिये भटकते हैं और जिनके पास उसका खजाना है वह भी सोचते हैं कि उसका उपयोग कैसे हो? निर्धन सोचता है कि वह धन कहां से लाये तो धनी उसके खर्च करने के मार्ग ढूंढता है।
भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि

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तपस्यन्तः सन्तः किमधिनिवासमः सुरनदीं

गुणोदारान्दारानुत परिचरामः सविनयम्।

पिबामः शास्त्रौघानुत विविधकाव्यामृतरासान्

न विद्मः किं कुर्मः कतिपयनिमेषायुषि जने।।

            हिन्दी में भावार्थ-किसी तट पर जाकर तप करें या परिवार के साथ ही आनंदपूर्वक रहे या विद्वानों की संगत में रहकर ज्ञान साधना करे, ऐसे प्रश्न अनेक लोगों को इस नष्ट होने वाले जीवन में परेशान करते हैं। लोग सोचते हैं कि क्या करें या न करें।
            योग और ज्ञान साधकों के लिये यह विचित्र संसार हमेशा ही शोध का विषय रहा है पर सच यही है कि इसका न तो कोई आदि जानता है न अंत है।  सिद्ध लोग परमात्मा तथा संसार को अनंत कहकर चुप हो जाते है।  वही लोग इस संसार को आनंद से जीते हैं। प्रश्न यह है कि जीवन में आनंद कैसे प्राप्त किया जाये?
            इसका उत्तर यह है कि सुख या आनंद प्राप्त करने के भाव को ही त्याग दिया जाये। निष्काम कर्म ही इसका श्रेष्ठ उपाय है। पाने की इच्छा कभी सुख नहीं देती।  कोई वस्तु पाने का जब मोह मन में आये तब यह अनुभव करो कि उसके बिना भी तुम सुखी हो।  किसी से कोई वस्तु मुफ्त पाकर प्रसन्नता अनुभव करने की बजाय किसी को कुछ देकर अपने हृदय में अनुभव करो कि तुमने अच्छा काम किया।  इस संसार में पेट किसी का नहीं भरा। अभी खाना खाओ फिर थोड़ी देर बाद भूख लग आती है।  दिन में अनेक बार खाने पर भी अगले दिन पेट खाली लगता है। ज्ञान साधक रोटी को भूख शांत करने के लिये नहीं वरन् देह को चलाने वाली दवा की तरह खाते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि केवल एक रोटी खाई जाये तो पूरा दिन सहजता से गुजारा जा सकता है। कहने का अभिप्राय यह है कि जब हम अपने चंचल मन की प्रकृत्ति को समझ लेंगे तब जीवन सहज योग के पथ पर चल देंगे।  यह मन ही है जो इंसान को पशू की तरह इधर से उधर दौड़ाता है।


ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday, November 30, 2013

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-अक्लमंद हमेशा ही बुरे लोगों की संगत से बचता है(aklaman hamesha hi bure logon ki sangat se bachta hai-kautilya ka arthshastra)



                        सांसरिक जीवन में उतार चढ़ाव आते ही रहते हैं। हम जब पैदल मार्ग पर चलते हैं तब कहीं सड़क अत्यंत सपाट होती है तो कहीं गड्ढे होते हैं। कहीं घास आती है तो कहंी पत्थर पांव के लिये संकट पैदा करते हैं।  हमारा जीवन भी इस तरह का है। अगर अपने प्राचीन ग्रंथों का हम निरंतर अभ्यास करते रहें तो मानसिक रूप से परिपक्वता आती है। इस संसार में सदैव कोई विषय अपने अनुकूल नहीं होता। इतना अवश्य है कि हम अगर अध्यात्मिक रूप से दृढ़ हैं तो उन विषयों के प्रतिकूल होने पर सहजता से अपने अनुकूल बना सकते हैं या फिर ऐसा होने तक हम अपने प्रयास जारी रख सकते हैं।  दूसरी बात यह भी है कि प्रकृति के अनुसार हर काम के पूरे होने का एक निश्चित समय होता है।  अज्ञानी मनुष्य उतावले रहते हैं और वह अपने काम को अपने अनुकूल समय पर पूरा करने के लिये तंत्र मंत्र तथा अनुष्ठानो के चक्कर पड़ जाते हैं।  यही कारण है कि हमारे देश में धर्म के नाम पर अनेक प्रकार के पाखंडी सिद्ध बन गये हैं। ऐसे कथित सिद्धों की संगत मनुष्य को डरपोक तथा लालची बना देती है जो कथित दैवीय प्रकोप के भय से ग्रसित रहते हैं।  इतना ही नहीं इन तांत्रिकों के चक्कर में आदमी इतना अज्ञानी हो जाता है कि वह तंत्र मंत्र तथा अनुष्ठान को अपना स्वाभाविक कर्म मानकर करता है।  उसके अंदर धर्म और अधर्म की पहचान ही नहीं रहती।
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया है कि

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अपां प्रवाहो गांङ्गो वा समुद्रं प्राप्य तद्रसः।

भवत्यपेयस्तद्विद्वान्न्श्रयेदशुभात्कम्।।

                        हिन्दी में भावार्थ-गंगाजल जब समुद्र में मिलता है तो वह पीने योग्य नहीं रह जाता। ज्ञानी को चाहिये कि वह अशुभ लक्षणों वाले लोगों का आश्रय न ले अन्यथा उसकी स्थिति भी समुद्र में मिले गंगाजल की तरह हो जायेगी।

किल्श्यन्नाप हि मेघावी शुद्ध जीवनमाचरेत्।

तेनेह श्लाध्यतामेति लोकेश्चयश्चन हीयते।।

                        हिन्दी में भावार्थ-बुद्धिमान को चाहे क्लेश में भी रहे पर अपना जीवन शुद्ध रखे इससे उसकी प्रशंसा होती है। लोकों में अपयश नहीं होता।
                        हमारे देश में अनेक ज्ञानी अपनी दुकान लगाये बैठे हैं। यह ज्ञानी चुटकुलों और कहानियों के सहारे भीड़ जुटाकर कमाई करते हैं। इतना ही नहीं उस धन से न केवल अपने लिये राजमहलनुमा आश्रम बनाते हैं बल्कि दूसरों को अपने काम स्वयं करने की सलाह देने वाले ये गुरु अपने यहां सारे कामों के लिये कर्मचारी भी रखते हैं।  एक तरह से वह धर्म के नाम पर कपंनियां चलाते हैं यह अलग बात है कि उन्हें धर्म की आड़ में अनेक प्रकार की कर रियायत मिलती है।  मूल बात यह है कि हमें अध्यात्मिक ज्ञान के लिये स्वयं पर ही निर्भर होना चाहिये। दूसरी बात यह भी है कि ज्ञान होना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि उसे धारण भी करना चाहिये।  यही बुद्धिमानी की निशानी है। बुद्धिमान व्यक्ति तनाव का समय होने पर भी अपनी मर्यादा नहीं छोड़ता।  यही कारण है कि बुरा समय निकल जाने के बाद वह प्रतिष्ठा प्राप्त करता है।  लोग उसके पराक्रम, प्रयास तथा प्रतिबद्धता देखकर उसकी प्रशंसा करते हैं।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


यह ब्लाग/पत्रिका विश्व में आठवीं वरीयता प्राप्त ब्लाग पत्रिका ‘अनंत शब्दयोग’ का सहयोगी ब्लाग/पत्रिका है। ‘अनंत शब्दयोग’ को यह वरीयता 12 जुलाई 2009 को प्राप्त हुई थी। किसी हिंदी ब्लाग को इतनी गौरवपूर्ण उपलब्धि पहली बार मिली थी। ------------------------

Wednesday, October 16, 2013

अथर्ववेद से सन्देश-हाथों से कमाने के साथ दान भी करें(atharvved se sandesh-hathon se kamane se saath daan bhee karen)



    हमारे देश में धर्म को लेकर अनेक भ्रम प्रचलित हैं जिनका मुख्य कारण धन के आधारित पर प्रचलित पंरपराऐं हैं जिनको निभाने के लिये कथित धर्मभीरु अपना पूरा जीवन पर दाव पर लगा देते हैं। दूसरी बात यह है कि आधुनिक शिक्षा पद्धति में डूबा समाज अध्यात्मिक ज्ञान से परे हो गया है और उसके पास धर्म तथा भ्रम की पहचान ही नहीं रही।  सच बात तो यह है कि हम जिस अपनी महान संस्कृति और संस्कारों की बात करते रहे हैं उनका आधार वह पारिवारिक संबंध रहे हैं जो अब धन के असमान वितरण के कारण कलह का कारण बनते जा रहे हैं। पहले एक रिश्तेदार के  पैसा अधिक होता तो दूसरे के पास कम पर अंतर इतना नहीं रहता था कि उसकी अनुभूति प्रत्यक्ष रूपे की जा सके पर  कि अब असमान स्तर दिखने लगा है। इतना ही नहीं स्तर में अंतर इतना अधिक आ गया है कि सद्भाव बने रहना कठिन हो गया है। एक रिश्तेदार सामान्य जीवन जी रहा है तो दूसरा राजकीय कर्म से जुड़ने के कारण विशिष्ट हो जाता है। ऐसे में रिश्तों में मिठास कम कड़वाहट अधिक हो जाती है।
       महत्वपूर्ण बात यह कि हम धर्म के नाम पर सभी एक होने का स्वांग करते हैं पर हो नहीं पाते। इसका मुख्य कारण यह है कि हमारे देश में दो प्रकार के भारतीय धार्मिक लोग हैं। एक तो हैं लालची दूसरे हैं त्यागी।  एक बात निश्चित है कि भारतीय धर्म से जुड़े लोग अधिकतर त्यागी होते हैं पर आधुनिक लोकतंत्र ने कुछ लालची लोगों को आगे बढ़ने का मार्ग दिया है। समाज पर नियंत्रण करने वाली अनेक संस्थाओं में कथित रूप से लालची लोगों ने कब्जा कर लिया है। यह लालची लोग एक तरफ से चंदा लेते हैं दूसरी तरफ दान करने का स्वांग करते हैं। अंधा बांटे रेवड़ी आपु ही आपको दे की तर्ज पर यह उस दान का हिस्सा भी अपने घर ही ले जाते हैं। धर्म, अर्थ, राज्य, कला, तथा शिक्षा के शिखर पर अनेक ऐसे कथित लोग पहुंचें हैं जो भारतीय धर्म के रक्षक होने का दावा तो करते हैं पर होते महान लालची हैं। सीधी बात कहें तो हमारे भारतीय धर्म को खतरा बाहर से नहीं बल्कि अपने ही लालची लोगों से है।  यह लालची लोग प्रचार तंत्र में अपने समाज सेवक होने का प्रचार करते हैं जो जब बाहरी लोग उनका चरित्र देखते हैं तो समस्त भारतीय धर्म के लोगों को वैसा ही समझते हैं जबकि हमारे हमारे देश के अधिकतर  लोग अपने धर्म के अनुसार त्यागी होते हैं।  लालची लोग सौ हाथों से धन तो बटोरते हैं पर दान एक हाथ से भी नहीं करते।  ऐसे ही लोग धर्म के लिये सबसे बड़ा संकट हैं। अगर हम अपने देश में श्रम पर आधारित करने वाले लोगों को देखें तो वह गरीब होने के बावजूद अपने आसपास के लोगों की सहायता को तत्पर होते हैं। इसका वह प्रचार नहीं  करते वरन् करने के बाद किसी प्रकार की फल याचना भी नहीं करते।  इसके विपरीत जिन लोगों ने अपनी लालच की वजह से येन केन प्रकरेण समाज पर नियंत्रण करने वाली संस्थाओं पर कब्जा किया है वह अपना स्तर बनाये रखने के लिये षडयंत्रपूर्वक काम करते हैं। इतना ही नहीं धर्म का कोई एक नाम देना हमारे अध्यात्मिक दर्शन की दृष्टि गलत है वहीं वह सभी धर्मों की रक्षा की बात कहते हुए भ्रमित भी करते हैं।  सबसे बड़ी  इन लोगों ने सभ्रांत होने का रूप भी रख लिया है और अपने से नीचे हर व्यक्ति को हेय मानकर चलते हैं।
अथर्ववेद में कहा गया है कि

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शातहस्त समाहार सहस्त्रस्त सं किर।

कृतस्य कार्यस्य चहे स्फार्ति समायह।।

        हिन्दी में भावार्थ-हे मनुष्य! तू सौ हाथों वाला होकर धनार्जन कर और हजार हाथ वाला बनकर दान करते हुए समाज का उद्धार कर।
       समाज में समरसता बनाये रखने के लिये यह आवश्यक है कि शक्तिशाली तथा समृद्ध वर्ग कमतर श्रेणी के लोगों की सहायता करे पर अब तो समाज कल्याण सरकार का विषय बना दिया गया है जिससे लोग अब सारा दायित्व सरकार का मानने लगे हैं।   धनी, शिक्षित तथा शक्तिशाली वर्ग यह मानने लगा  है कि अपनी रक्षा करना ही एक तरह से  समाज की रक्षा है।  इतना ही नहीं यह वर्ग मानता है कि वह अपने लिये जो कर रहा है उससे ही समाज बचा हुआ है।  जब धर्म की बात आती है तो सभी उसकी रक्षा की बात करते हैं पर लालची लोगों का ध्येय केवल अपनी समृद्धि, शक्ति तथा प्रतिष्ठा बचाना रह जाता है।  कहने का अभिप्राय यह है कि हमें केवल किसी को अपने धर्म से जुड़ा मानकर उसे श्रेष्ठ मानना गलत है बल्कि आचरण के आधार पर ही किसी के बारे में राय कायम करना चाहिये। हमारा समाज त्याग पर आधारित सिद्धांत को मानता है जबकि लालची लोग केवल इस सिद्धांत की दुहाई देते हैं पर चलते नहीं। समाज की सेवा भी अनेक लोगों का पारिवारिक व्यापार जैसा  हो गया है यही कारण है कि वह अपनी संस्थाओं का पूरा नियंत्रण परिवार के सदस्यों को सौंपते हैं। दावा यह करते हैं कि पूरे समाज का हम पर विश्वास है पर यह भी दिखाते हैं कि  उनका समाज में  परिवार के बाहर किसी दूसरे पर उनका विश्वास नहीं है।  हम जाति, धर्म, शिक्षा, क्षेत्र तथा कला में ऐसे लालची लोगों की सक्रियता पर दृष्टिपात करें तो पायेंगे कि उनका ढोंग वास्तव में समूचे समाज  को बदनाम करने वाला हैं। बहरहाल हमें अपने आचरण पर ध्यान रखना चाहिये। जहां तक हो सके धर्म, जाति, भाषा, कला, राज्यकर्म तथा क्षेत्र के नाम पर समाज को समूहों में  बांटने वाले लोगों  की लालची प्रवृत्ति देखते हुए उनसे दूरी बनाने के साथ ही अपना सहज त्याग कर्म करते रहना चाहिये।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


Sunday, September 29, 2013

मनुस्मृति-स्वस्थ राजा ही प्रजा के हित का काम कर सकता है(manu smriti-swasth raja hi prajaa hit ke hit ka kam kar sakta hai)



                        हमारे दर्शन के अनुसार पूर्णतः स्वस्थ होने पर ही किसी मनुष्य को राजसी कर्म करना चाहिये। ऐसे में जिन लोगों पर राज्य का भार है उनको प्रजा हित के लिये अधिक ही परिश्रम करना होता है इसलिये उनका पूर्णतः स्वस्थ होना आवश्यक है।  आधुनिक लोकतंत्र ने पूरे विश्व में राज्य व्यवस्थाओं में इस नीति का पालन नहीं किया जा रहा है। आज तो सभी देशों में यही देखा जाता है कि चुनाव में कौन जीत सकता है? चुनाव जीतने की योग्यता और क्षमता ही राज्यपद पाने का एक आधार बन गयी है।  ऐसे में अनेक देशों के राज्य प्रमुख शासन में आने के बाद जनता में अपनी लोकप्रियता खो देते हैं। दूसरी बात यह भी है कि पद की अवधि पांच या छह साल होती है उसमें राज्य पद पर प्रतिष्ठित होने पर व्यक्ति की चिंतायें प्रजा हित से अधिक अपने चुनाव के लिये चंदा देने वालों का उधार चुकाने या फिर अगले चुनाव में फिर अपना पद बरबकरार रहने की होती है।  कुछ समय विपक्षियों का सामना करने तो बाकी समय जनता के सामने नये वादे करते रहने में लग जाता है।
                        अनेक देशों के राज्य प्रमुख शारीरिक, मानसिक तथा वैचारिक दृष्टि से अस्वस्थ होने के बावजूद सत्ता रस पीते रहते हैं। राज्य के अधिकारी भी अपनी नौकरी चलाते हुए केवल राज्य प्रमुख की कुर्सी बचाये रखने में अपना हित समझते हैं। विश्व प्रसिद्ध चिंत्तक कार्लमार्क्स ने अपने पूंजी नामक पुस्तक में इन पूंजीपतियों के हाथ लग चुकी व्यवस्थाओं की चर्चा बहुत की है।  यह अलग बात है कि उसके अनुयायियों ने भी अपने शासित राष्ट्रों में शारीरिक, मानसिक तथा वैचारिक दृष्टि से बीमार लोगों को उच्च पदों पर बैठाये रखा और बेबस जनता तानाशाही की वजह से उनको ढोती रही।  वामपंथी व्यवस्था में बौद्धिकों को वैचारिक मध्यस्थ बन कर मजे लूटने की सुविधा मिलती है इसलिये वह जनहित की बातें बहुत करते हैं पर अपने शिखर पुरुषों की शारीरिक, मानसिक तथा वैचारिक अस्वस्थता को निजी विषय बताते हैं।  मजे की बात यही है कि यही वामपंथी बौद्धिक मध्यस्था मनुस्मृति का जमकर विरोध करते हैं।
मनुस्मृति में कहा गया है कि

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अमात्यंमुख्यं धर्मज्ञं प्राज्ञं दान्तं कुलोद्भवम्।

स्थापयेदासने तस्मिन् खिन्नः कार्येक्षणे नृणाम्।।

                        हिन्दी में भावार्थ-जब राज्य प्रमुख अपने खराब स्वास्थ्य की वजह से प्रजाहित के कार्यों का निरीक्षण करने में असमर्थ हो तब उसे अपना कार्यभार किसी बुद्धिमान, जितेन्द्रिय, सभ्य तथा शिष्ट पुरुष को सौंप देना चाहिये।

विक्रोशन्त्यो यस्य राष्ट्राद्धियन्ते दस्युभिः प्रजाः।

सम्पतश्यतः सभृत्यस्य मृतः स न तु जीवति।।

                        हिन्दी में भावार्थ-उस राजा या राज्य प्रमुख को जीवित रहते हुए भी मृत समझना चाहिये जिसके अधिकारियों के सामने ही डाकुओं से लूटी जाती प्रजा हाहाकर मदद मांगती है पर वह उसे बचाते ही नहंी है।
                        सामान्य सिद्धांत तो यही है कि अस्वथ्यता की स्थिति में राज्य प्रमुख किसी गुणी आदमी को अपना पदभार सौप दे पर होता यह है कि वामपंथी विचारक शिखर पर बैठे पुरुष को अपने अनुकूल पाते हैं तो वह उसकी जगह किसी दूसरे को स्वीकार नहंी करते। दूसरी बात यह है कि आजकल के राज्य प्रमुखों में इतनी मानवीय चतुराई तो होती है कि वह अपने बाद के दावेदारों को आपस में लड़ाये रखते है ताकि कोई उसकी जगह कोई दूसरा नहीं ले सके। अनेक जगह तो राज्य प्रमुख इस तरह की व्यवस्था कर देते हैं कि उनके बाद उनके परिवार के सदस्यों को ही जगह मिले। वामपंथियों के सबसे बड़े गढ़ चीन में भी अब शासन में परिवारवाद आ गया है।  वामपंथियों ने शायद इसलिये ही हमेशा मनुस्मृति का विरोध किया है ताकि उसकी सच्चाई से आम लोग अवगत न हों और उनका छद्म समाज सुधार का अभियान चलता रहे।
                        हम आजकल पूरी विश्व अर्थव्यवस्था चरमराने की बात करते हैं। उसका मुख्य कारण यही है कि अनेक महत्वपूर्ण देशों का शासन पुराने राजनीतिक सिद्धांतों की अनदेखी कर चलाया जा रहा है। स्थिति यह है कि तानाशाही व्यवस्था हो या लोकतांत्रिक सत्य कहने का अर्थ अपने लिये शत्रुओं का निर्माण करना होता है। अपनी आलोचना सहन करने के लिये पर्याप्त प्राणशक्ति बहुत कम लोगों में रह गयी है। इसका मुख्य कारण शारीरिक, मानसिक तथा वैचारिक अस्वस्थता ही है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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